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‘मर्यादा’ का भार सिर्फ मोदी पर ही क्यों… विपक्ष ‘शब्दों की गरिमा’ का अर्थ भूल गया है क्या?

आज (अप्रैल 11, 2019) सुबह AIUDF के प्रमुख बदरूद्दिन अजमल से जुड़ी एक खबर आई है। जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए आपत्तिजनक टिप्पणी की। अजमल ने ढुभरी में रैली को संबोधित करते हुए कहा कि अगर एक बार वो चुनाव जीत जाते हैं तो वो प्रधानमंत्री मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और असम के मंत्री हिमंत बिस्वा को बांग्लादेश भेज देंगे।

यह पहली बार नहीं था कि विपक्ष के किसी नेता ने प्रधानमंत्री मोदी को लेकर ऐसा ज़हर उगला हो। इससे पहले भी लोकतांत्रिक देश के कई तथाकथित राजनेताओं ने देश के पीएम के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया है, जिसे शायद 2014 से पहले केवल गलियों में घूमते लोफरों के मुँह से ही सुना जाता रहा।

वैसे तो मोदी को लेकर घटिया बयानबाजियों का दौर उनके प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के साथ ही शुरू हो गया था लेकिन 2019 के चुनाव करीब आते-आते तो मानो इस तरह के बयानों की झड़ी लग गई। इस दौर की शुरुआत इमरान मसूद के बोटी-बोटी वाले बयान से हुई थी, और आज ये कहानी पीएम को अनपढ़, जाहिल, धोबी का कुत्ता, नामर्द कहने तक पहुँच चुकी है।

मोदी सरकार के प्रति विपक्ष में इतनी नफरत और घृणा है कि शायद वो भूल चुके हैं कि पीएम पद की गरिमा को बनाए रखना सिर्फ़ मोदी का ही काम नहीं हैं। राजनीति में शब्दों के बाण शुरूआती समय से ही चलते आए हैं। लेकिन जिस नीचता पर आज राजनेता उतर आए हैं, वैसा इतिहास में कभी भी देखने को नहीं मिला था।

इसे मोदी का प्रभाव कहा जाए या मोदी के लिए नफरत, लेकिन जो राजनेता कुछ समय पहले तक समाज को नैतिकता का पाठ पढ़ाते घूमते थे, वो अब खुद ही नैतिकता के सिद्धांत भूलकर, मोदी को गाली देने के लिए हर जनसभा, रैली में व्याकुल नज़र आते हैं।

बीते कुछ समय में अगर गौर किया जाए तो फारूक़ अब्दुल्ला, चंद्रबाबू नायडू, दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गज़ नामों ने पीएम मोदी पर जमकर निशाना साधने के क्रम में मर्यादा की सभी सीमाएँ लाँघते नज़र आ रहे हैं। नीचता की हद को पार करने वाले इन राजनेताओं के कुछ बेलगाम-बेतुके बयानों के उदाहरण नीचे दिए गए हैं, देखिए ये सभी राजनेता राजनीतिक बयानबाजी के स्तर को किस रसातल में जाकर छोड़े हैं, इसे सिर्फ इनके बिगड़े बोल कहने से काम नहीं चलेगा।

चंद्रबाबू नायडू: पिछले महीने टीडीपी के प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ने चुनाव प्रचार के दौरान एक रैली को संबोधित करते हुए PM को खूँखार उग्रवादी और देश में रहने लायक तक नहीं बताया था। इसके अलावा एक बार आँध्र के सीएम, मोदी की माँ पर सवाल उठाने के कारण भी आलोचनाओं का शिकार हुए थे, जिसमें उन्होंने पीएम से सवाल किया था कि “मुझे लोकेश के पिता, देवांश के दादा और भुवनेश्वरी के पति होने पर गर्व है, मैं आपसे (नरेंद्र मोदी से) पूछ रहा हूँ- आप कौन हैं?”

PM मोदी एक खूँखार उग्रवादी, देश में रहने लायक नहीं: ‘अल्पसंख्यक’ भाइयों से नायडू की गुहार

फारूक़ अब्दुल्ला: बालाकोट हमले के बाद देश में बहुत से राजनेताओं ने एयर स्ट्राइक के सबूत माँगकर IAF की बहादुरी पर सवाल उठाए, लेकिन इस बीच फारूक़ अब्दुल्ला एक ऐसी आवाज़ थे जिन्होंने प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ बयानबाजी करते हुए यह तक बोल डाला कि उन्हें शक हैं पुलवामा हमले पर…

मगर वो 40 लोग CRPF के शहीद हो गए… उसपर भी मुझे शक है – फारूक अब्दुल्ला का शर्मनाक बयान

मजीद मेमन: याकूब मेमन के वकील मजीद मेमन ने हाल ही में प्रधानमंत्री को लेकर कहा था कि वे एक अनपढ़, जाहिल और रास्ते पर चलने वाले व्यक्ति की तरह बात करते हैं। यहाँ मजीद का कहना था कि पीएम इतने बड़े पद पर बैठे हैं, उनका पद एक संवैधानिक पद है। उस संवैधानिक पद के लिए प्रधानमंत्री रास्ते में नहीं चुना जाता।

‘प्रधानमंत्री एक अनपढ़, जाहिल या रास्ते पर चलने वाले आदमी की तरह बात करते हैं’

बी नारायण राव: एक तरफ़ जहाँ लोकतांत्रिक देश की सबसे सेकुलर पार्टी के प्रमुख लोग नागरिकों के बीच जाकर उन्हें उनके अधिकारों से परिचित करवा रहे हैं, वहीं उसी पार्टी के कुछ नेता देश के प्रधाममंत्री पर निजी टिप्पणी करने से भी नहीं चूँक रहे। हाल ही में कॉन्ग्रेस के विधायक बी नारायण राव ने मोदी पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि जो लोग शादी कर सकते हैं लेकिन बच्चे नहीं पैदा कर सकते, वे नामर्द हैं।

तनवीर हसन: प्रधानमंत्री द्वारा हाल ही में वंशवाद की आलोचना करते हुए एक ब्लॉग लिखा था जिस पर बार सांसद रह चुके तनवीर हसन ने कहा था कि चूँकि मोदीजी को आगे भी अपना वंश बढ़ाना नहीं है, इसीलिए वंशवाद की आलोचना करते हैं।

ओवैसी: AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के मोदी से मतभेद हमेशा उनके बयानों में झलकते रहे हैं। कुछ दिन पहले ओवैसी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला था। हैदराबाद लोकसभा क्षेत्र के प्रत्याशी और वर्तमान सांसद ओवैसी ने पूछा, “जब पुलवामा का हमला हुआ तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्या बीफ बिरयानी खा कर सो रहे थे।” 

मोदी बीफ बिरयानी खा कर सो गए थे क्या : ओवैसी

पवन खेड़ा (कॉन्ग्रेस प्रवक्ता): कुछ समय पहले इंडिया टीवी पर एक डिबेट के दौरान कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने आवेश में आकर मोदी के अंग्रेजी शब्द का विच्छेद करते हुए उन्हें मसूद अज़हर, ओसामा बिन लादेन, दाऊद इब्राहिम और पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई बताया। इसके बाद जनता ‘शेम-शेम’ बोलती हुई खड़ी हो गई और कॉन्ग्रेस प्रवक्ता को दुत्कारा।

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता ने PM मोदी को बताया मसूद, ओसामा, दाऊद और ISI; जनता ने दुत्कारा

ये सिर्फ़ कुछ एक नेताओं की टिप्पणियाँ हैं। ऐसी अनेकों टिप्पणियाँ चुनाव के नज़दीक होने के कारण आए दिन दोहराई जा रही है। इन टिप्पणियों में धड़ल्ले से दलाल, हरामज़ादा, पूतना, दरिंदा, चोर, भड़वा, खूँखार उग्रवादी जैसे शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है। कभी मोदी से उनकी मर्दानगी का सबूत माँगा जाता है, तो कभी उनकी बूढ़ी माँ को लेकर अभद्र टिप्पणियाँ की जाती हैं। उनसे राफेल जैसे मुद्दों पर सवाल किया जाता है जिसकी क्लिन चिट खुद सुप्रीम कोर्ट मोदी सरकार को दे चुका है।

दलाल, हरामज़ादा, पूतना, दरिंदा, चोर, भड़वा आदि आराम से क्यों बोलने लगे हैं हमारे नेता?

यहाँ मोदी पर हुई इन विवादित टिप्पणियों को हाईलाइट करने का मतलब ये बिलकुल भी नहीं हैं कि उन्होंने कभी किसी के लिए जनसभाओं में रैलियों में उपनाम (युवराज, नामदार, कामदार) नहीं बोले। लेकिन पीएम द्वारा चुने गए शब्दों में और उनके ख़िलाफ़ विपक्ष की टिप्पणियों में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों में जमीन और आसमान का फर्क़ है।

संसद में सवाल पहले भी उठाए जाते थे, विपक्ष पहले भी मौजूद होता था, रैलियाँ-जनसभाएँ-चुनाव प्रचार पहले भी आयोजित होती थीं, लेकिन विपक्ष का इतना ओछा रूप कभी भी नहीं देखने को मिलता था। आज भावों को प्रकट करने के लिए शब्द की हर गरिमा को तार-तार कर दिया गया है। मोदी से घृणा करते हुए विपक्ष अब इतना आगे निकल चुका है कि सेना के पराक्रम पर सवाल भी उठाता है और माँ की ममता को भी राजनीति करार देता है।

हथियारों के ईनामी तस्कर मोहम्मद इसरार को दिल्ली पुलिस ने किया गिरफ्तार

दिल्ली में लोकसभा चुनाव के बीच आपराधिक गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई जारी है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने एक हथियार तस्कर को गिरफ्तार किया है। ये बदमाश अवैध रूप से हथियारों का जखीरा सप्लाई किया करता था। पुलिस पिछले 10 महीनों से इस शातिर बदमाश की तलाश में जुटी थी। इसका नाम मोहम्मद इसरार बताया जा रहा है।

इसरार अवैध रूप से हथियार की खरीद-बिक्री किया करता था। पुलिस ने इसके ऊपर एक लाख का ईनाम भी घोषित किया था। पुलिस से हुई पूछताछ के दौरान इसरार ने बताया कि वो मध्यप्रदेश के बुरहानपुर के किसी जीत नाम के व्यक्ति से अवैध हथियार खरीदता था और फिर अपने आदमियों के जरिए दिल्ली और यूपी में संबंधित गिरोह को इसकी आपूर्ति किया करता था। पुलिस को इसरार की खोज मई 2018 से ही थी, जब इसके लिए काम करने वाले दो बदमाशों को पुलिस ने हिरासत में लिया था, जिसके पास से 21 पिस्टल और 42 मैगजीन बरामद हुआ था। उस समय भी पुलिस ने इसरार को खोजने की काफी कोशिश की थी, लेकिन अब जाकर पुलिस अपने मिशन में कामयाब हुई है।

सेना का राजनीतिकरण मोदी कर रहा है या विपक्ष? इस वैचारिक जंग में पुराने क़ायदों को तोड़ना ज़रूरी है

एक कहानी कई बार कही जाती है सनातन धर्म के लोगों के बारे में। बताया जाता है कि इस्लामी लुटेरों और आतंकियों को यह बात समझ में आ गई थी कि भारत के हिन्दू गाय का बहुत सम्मान करते हैं। जबकि यहाँ के लोग लड़ने में सक्षम होते थे, फिर भी इस्लामी आक्रांताओं के इस जुगाड़ के कारण अपना सब कुछ खो देते थे। कहा जाता है कि लूटने से पहले ये लोग गायों की एक भीड़ छोड़ देते थे, और हिन्दू उन पर हथियार नहीं उठा पाता था, क्योंकि गौहत्या का पाप लगेगा।

हो सकता है कि यह कहानी सही हो। क्योंकि सदियाँ बीत गईं लेकिन इस तरह के विचारों को हम लोग आज तक अनजाने में ही आत्मसात किए चल रहे हैं। हिन्दू जनता सहिष्णुता का सबसे बड़ा उदाहरण होने के बावजूद असहिष्णुता के डिबेट में खींच लाई जाती है, और कुछ हिन्दू ही इस बात को सच भी मानने लगते हैं।

जिस धर्म के लोगों ने न तो किसी देश को लूटा, न किसी के मजहबी स्थलों को तोड़ा, न किसी देश-समाज के सामूहिक इतिहास को आग लगाई, जो भी आया, भले ही लुटेरा, हत्यारा और बलात्कारी हो, उसे यहाँ रहने दिया, उसके साथ रहे, उस धर्म की सहिष्णुता पर भी सवाल उठाए जाते हैं, पैनल डिस्कशन्स होते हैं, आम चर्चाएँ होती हैं, और हिन्दुओं को यह अहसास दिलाने के साथ-साथ विश्वास दिला दिया जाता है कि उनके पूर्वज और वो सबसे ज़्यादा असहिष्णु थे।

हिन्दू आतंक जैसे शब्द गढ़े जाते हैं, सामाजिक अपराधों को धार्मिक और राजनैतिक रंग दिया जाता है क्योंकि उसमें शामिल व्यक्ति हिन्दू था। जबकि उस अपराध को करने की पीछे की मंशा मानवीय गलती होती है, आपराधिक सोच होती है, न कि उसका हिन्दू होना। उदाहरण के लिए अगर कोई सीट के झगड़े में किसी को छुरा मार दे, तो ये एक सामाजिक अपराध है क्योंकि वहाँ झगड़े में धर्म या मज़हब शामिल नहीं। हाँ, अगर किसी हिन्दू को कोई कट्टरपंथी, या हिन्दू ही, उसके हिन्दू होने के कारण मार दे, तब वह एक धार्मिक अपराध हो जाएगा।

अब आइए आज के दौर में जबकि चुनाव प्रचार ज़ोरों पर है। सारी पार्टियाँ लगी पड़ी हैं, पीएम मोदी भी लगातार रैलियों और इंटरव्यू के माध्यम से अपनी बातें रख रहे हैं। उनकी बोली में शहज़ादा की जगह नामदार-कामदार ज़्यादा है, और पुलवामा से लेकर उरी तक का ज़िक्र है। बाकी पार्टियाँ, मुद्दों के अभाव में और अपनी हार को सामने देख कर मोदी पर निजी आक्षेप से होते हुए घटिया टिप्पणियाँ करने लगी हैं जिसमें मोदी को नामर्द बताने से लेकर उनकी पत्नी, उनकी माँ तक को घसीटा जा रहा है।

इस बात पर भी चर्चा होनी ज़रूरी है कि सोनिया गाँधी एक सांसद हैं, उन्होंने पार्टी चलाई है, यूपीए की चेयर पर्सन हैं, और कॉन्ग्रेस की अध्यक्षा थीं। प्रियंका गाँधी पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, उनके पति पर कई मामले चल रहे हैं। राहुल गाँधी पब्लिक लाइफ में हैं, घोटालों वाली पार्टी के मुखिया हैं, और कॉन्ग्रेस के मुख्य चुनाव प्रचारक भी (और भाजपा के भी) इसलिए मोदी या भाजपा का उनकी पार्टी, सोनिया, प्रियंका, वाड्रा पर हमला बोलना ज़ायज है। लेकिन मोदी की माँ या पत्नी तो कहीं पोलिटिकल सीन में हैं ही नहीं, फिर उन्हें किस लिहाज से इसमें घसीटा जा रहा है?

फिर भी, अगर शब्दों के चुनावों की बात करें तो मर्यादा का भार मोदी पर ही क्यों? जबकि बाक़ियों ने तो भाजपा पर हर दिन दंगे भड़काने से लेकर साम्प्रदायिकता और झूठे घोटाले का आरोप लगाया है, और गिरते-गिरते पत्नी, माँ के साथ मर्दानगी तक पहुँच गए। क्या मोदी के बच्चे न होना, उनका अपनी पत्नी से अलग रहना, माताजी से कभी-कभार मिलने जाने से देश की राजनीति पर कोई प्रभाव डालता है? मुझे नहीं लगता कि ऐसा होता है। लेकिन सत्ता की लगाम पकड़े सोनिया, राहुल, प्रियंका या वाड्रा के ज़मीन घोटाले, FTIL से संबंध, राफेल की जगह यूरोफाइटर की लॉबीइंग, अगस्टावैस्टलेंड घोटाले आदि का देश की राजनीति से सीधा संबंध है।

दूसरी बात आजकल खूब चल रही है कि मोदी ने सेना का राजनीतिकरण कर दिया है। पुलवामा और उरी के नाम पर वोट माँग रहे हैं। अब याद कीजिए गाय और इस्लामी आक्रांताओं वाली कहानी। लोग तुरंत मर्यादा और गरिमा को ले आते हैं कि सेना को इससे दूर रखा जाना चाहिए। मेरा सवाल यह है कि सेना तो दूर ही थी, सबूत किसने माँगे थे? चाहे सर्जिकल स्ट्राइक हो, एयर स्ट्राइक हो या कुछ और, सबूत माँगने वाली लॉबी में कौन नेता रहते हैं!

और हाँ, सेना को दूर क्यों रखें? कमरे में बैठे हम और आप यह सवाल तो पूछ ही लेते हैं कि आखिर पुलवामा हमला हुआ ही कैसे? जबकि, हम यह बात आसानी से भूल जाते हैं कि ऐसे कई हमले नहीं हुए क्योंकि सेना और सुरक्षा एजेंसियों ने उसे होने से रोका। वो ख़बर नहीं बनती क्योंकि बम तो फटा ही नहीं। दूसरी बात, लोन वूल्फ अटैक, यानी जब हमलावर एक ही हो, तब उसे ट्रैक करने में फ़्रान्स, ब्रिटेन से लेकर ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका तक नाकाम रहे हैं, फिर भारत तो उनसे तकनीकी मामले में पीछे ही है।

चाहे ऑस्ट्रेलिया के रेस्तराँ में हुआ हमला हो, नीस-पेरिस-लंदन में कार, ट्रक या चाकू से लेकर मारने की आतंकी वारदातें हों, या ओरलैंडो के समलैंगिक बार में गोलियाँ बरसाता आतंकी, ये सब हमसे ज्यादा सक्षम देशों में हुआ है। ये हुआ है, ये होता है, और होता रहेगा क्योंकि आपको हर दिन हमला रोकना है, किसी को बस एक दिन सफल होना है। ऐसा नहीं है कि हमारे सैनिक सोए रहते हैं।

इसलिए, जब ऐसे हमले होते हैं तो स्वतः ज़िम्मेदारी सरकार की बनती है, उसके लिए मोदी या राजनाथ सिंह को यह कहना नहीं पड़ेगा कि सरकार ज़िम्मेदारी लेती है। ज़ाहिर सी बात है कि जिस सरकार के अंदर यह घटना हुई उसकी ज़िम्मेदारी है। लेकिन उसके बाद जो कार्रवाई होगी, उसकी ज़िम्मेदारी भी सरकार ही लेगी। इसलिए अगर छप्पन इंच का सीना नापा जाता है, तो फिर एयर स्ट्राइक का भी श्रेय सरकार को जाएगा।

इसलिए, रैलियों में यह बोला जाएगा, बार-बार बोला जाएगा क्योंकि हाँ, भारत के नागरिकों को पहली बार महसूस हो रहा है कि पाकिस्तान या बाहरी आतंकी मनमर्ज़ी से हमला कर के भाग नहीं सकते। यह सरकार उनकी सीमाओं को लाँघ कर निपटाएगी, बार-बार। इसलिए, जब जनता में क्षोभ हो कि हम इतने कमजोर क्यों है, तो जब सेना जवाब देगी तो प्रधानमंत्री की ड्यूटी है कि वह देश को आश्वस्त करे कि सक्षम नेतृत्व जनता की भावनाओं का सम्मान करती है, और बदला लिया जाएगा।

वैचारिक लड़ाई और भारतीयता पर दम्भ भरने का समय है यह

अगर विपक्ष सरकार को सेना का नाम लेकर नीचा दिखाते हुए, सेना को ही नीचा दिखाने लगे, तो सरकार को गाय की भीड़ को प्रणाम करने की ज़रूरत नहीं। वैचारिक लड़ाई ऐसे नहीं जीती जाती। वैचारिक लड़ाई में विरोधियों को उसी की भाषा में, उससे ज़्यादा तेज ज़हर से धावा बोला जाता है। यही कारण है कि मेरी सहमति हमेशा ऐसी हर सरकार को रहेगी जो सेना के योगदान को आम जनता तक लाता है। अगर संसद में जनता ने उन्हें चुनकर भेजा है, और सेना उनकी सहमति से अपना कार्य करती है, तो सरकार सेना का नाम लेकर रैलियों में वाहवाही भी लूटेगी।

हम इतिहास के उस मोड़ पर खड़े हैं जहाँ भारतीयता का अहसास पहले जैसा नहीं है। हम एक झुके हुए राष्ट्र नहीं है। हमारे नेता को कोरिया से लेकर यूएई और रूस तक शांति और सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से अलंकृत कर रहा है। हमारे नेता को विश्व का हर देश जानता है, उसे अपने एक्सक्लूसिव क्लब में जगह दे रहा है। यह नया भारत है, और हर भारतीय को यह जानने का हक़ है कि आखिर नया भारत होता कैसा है।

इसीलिए, इस अहसास को हवा देकर ज़िंदा रखना ज़रूरी है। इस अहसास को पोषित करना ज़रूरी है। इसलिए, जब कोई पूछे कि मोदी सेना का राजनीतिकरण कर रहा है तो पूछिए कि क्यों न करे? सेना को स्वतंत्रता देने का कार्य अगर सरकार करती है, तो उसे भी क्रेडिट लेने का हक़ है। असली राजनीतिकरण तो वो लोग कर रहे हैं जो देश की इस पवित्र संस्था पर, अपने निजी और राजनैतिक हितों को साधने के लिए, सबूतों का बोझ डालते हैं।

मोदी ने तो जयकार लगाया है, घृणित कार्य तो राहुल, केजरीवाल, ममता, फ़ारूख, ओमर, नायडू, लालू, अखिलेश, मायावती, महबूबा से लेकर राजदीप, रवीश, सगारिका जैसे बकचोन्हर नेताओं और पत्रकारों ने लगाया है। ‘भारत माता की जय’ या ‘भारतीय सेना ज़िंदाबाद’ कहना सेना का राजनीतिकरण नहीं है, ‘उरी के सबूत लाओ’, ‘बालाकोट में तो पेड़ गिराए, सबूत दो’, ‘पुलवामा भाजपा ने ही करवाया’ आदि कहना उसका राजनीतिकरण है।

चूँकि, विपक्ष के लोग कह देते हैं कि राजनीतिकरण हुआ है, उससे वो हो नहीं जाता। इन चोरों की शक्लें देखा कीजिए जब ये ऐसी बेहूदगी करते हैं कि बालाकोट में तो कुछ हुआ ही नहीं। अगर आपको लगता है कि सेना के नाम पर राजनीति यह नहीं, बल्कि मोदी द्वारा सेना का अभिनंदन करना है, तो आप दिमाग का इलाज कराइए या फिर सही व्यक्ति से बात कीजिए।

इस देश के हर नागरिक को पचास बार यह सुनना चाहिए कि इस देश की पराक्रमी सेना ने मुंबई हमले के बाद भी एयर स्ट्राइक की अनुमति माँगी थी, जो मनमोहन ने नहीं दी। इसलिए, इस देश की जनता को पचास बार यह सुनना चाहिए कि तुमने जिसे सत्ता दी, उसमें यह हिम्मत थी कि पाकिस्तान को घुस कर मारे, बार-बार मारे, उसे अपाहिज बना दे, और वो उस हालत में पहुँच जाए कि उसे आकाश में अपने लड़ाकू विमानों की भी गर्जना सुनाई दे, तो उसकी पतलून यह सोचकर गीली हो जाए कि कहीं भारतीय सेना हमला तो नहीं बोल रही।

इसलिए, मर्यादा की बात रहने दीजिए। इस वैचारिक लड़ाई में, हर नियम तोड़े जाएँगे जो माओवंशियों और कॉन्ग्रेस के चोर नेताओं ने बनाए थे। चूँकि साठ साल से यही चल रहा था, तो ये सार्वभौमिक सत्य नहीं हो जाता। अब इतिहास और वर्तमान को नए सिरे से लिखा जाएगा, ताकि हमारा भविष्य बेहतर हो। हम इतिहास फिर से लिखेंगे क्योंकि चोरों और घूसखोरों ने इसे रेलवे स्टेशन पर बिकते उपन्यास की तरह लिखा है। ग़ुलामी की दास्ताँ पर तीन चैप्टर और गौरवगाथा एक पैराग्राफ़ में?

हर रैली में इस देश की जनता को अपने पराक्रमी सेना और सक्षम नेतृत्व की बातों को सुनने-जानने का हक़ है। पहले विपक्ष अपनी तरफ से व्यक्तिगत हमले बंद करे, मुद्दों पर लौटे, सेना पर प्रश्न उठाना बंद करे, तब स्वतः पब्लिक डिस्कोर्स साफ हो जाएगा। क्योंकि गंदगी फैलाने का काम इन्हीं लोगों ने किया है, मोदी तो सफ़ाई अभियान पर निकला आदमी है। सड़क पर कूड़ा फैलाओगे तो एक-दो बार तो झाड़ू खाना ही पड़ेगा।

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फ़ैक्ट चेक: कॉन्ग्रेस ने तिरंगे को बनाया पार्टी का झंडा, पकड़े जाने पर हटाया ट्वीट

गुजरात यूथ कॉन्ग्रेस ने तिरंगे की जगह अपनी पार्टी के फोटोशॉप्ड झंडे का इस्तेमाल किया, इस इमेज को ट्विटर और फेसबुक पर शेयर करने के बाद हटा दिया गया है।

सभी धर्मों द्वारा एक पसंदीदा राजनीतिक पार्टी के रूप में ख़ुद को चित्रित करने के लिए, गुजरात युवा कॉन्गेस ने तिरंगे को पार्टी के झंडे के साथ बदलने के लिए डिजिटल रूप से सहारा लिया। Social Media hoax slayer नामक एक वेबसाइट ने इस बात को उजागर किया कि गुजरात यूथ कॉन्ग्रेस के ट्विटर हैंडल के ज़रिए एक इमेज अपलोड की गई, जिसमें तिरंगे को अपनी पार्टी के झंडे के साथ बदलने का काम किया।


गुजरात यूथ कॉन्ग्रेस द्वारा किया गया ट्वीट, जिसे अब डिलीट कर दिया गया

ट्वीट में कॉन्ग्रेस ने कहा था कि यह केवल कॉन्ग्रेस है जो हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई को एक साथ रख सकती है। इमेज में, विभिन्न धर्मों के पाँच पुरुषों को कॉन्ग्रेस पार्टी के झंडे पकड़े हुए सड़क पर चलते हुए दिखाया गया।

हालाँकि, Social Media hoax slayer ने अपनी ख़बर में ख़ुलासा किया था कि इमेज को डिजिटल रूप से तिरंगे के स्थान पर कॉन्ग्रेस के झंडे के साथ बदला गया।

सच यह है कि इस इमेज एक जैन संत मुनि लोकेश द्वारा 26 जनवरी 2018 को 69वें गणतंत्र दिवस पर भारतीयों को शुभकामनाएँ देने के लिए शेयर की गई थी। कॉन्ग्रेस ने उसी इमेज को बदलकर तिरंगे की जगह उसे अपनी पार्टी का झंडा बना दिया। धर्मनिरपेक्षता का संदेश देने के लिए यो लोग झंडा लेकर भारत-पाकिस्तान सीमा पर चले गए थे।

सच्चाई सामने आने के बाद कॉन्ग्रेस ने बिना कोई स्पष्टीकरण दिए या माफ़ी माँगे अपने आधिकारिक ट्विटर हैंंडल से इस ट्वीट को हटा लिया।

कॉन्ग्रेस से पहले, समाजवादी पार्टी ने भी इसी इमेज का इस्तेमाल करके तिरंगे की जगह समाजवादी पार्टी का झंडा लगाया था।

हालाँकि, समाजवादी पार्टी के नेता ने अभी तक इस इमेज को नहीं हटाया है।

‘जिनके पास खाने के लिए नहीं होता, वो सेना में शामिल हो जाते हैं’, कुमारस्वामी ने सेना का किया अपमान

कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी अक्सर अपने विवादित बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं। कभी राजनीतिक पार्टी तो कभी किसी राजनेता पर वो विवादित बयान देते रहते हैं। अब कुमारस्वामी ने सेना के ऊपर विवादित बयान देते हुए कहा है कि बॉर्डर पर खड़े रह कर देश की रक्षा करने वाले जवान अमीर घरानों से नहीं आते हैं। वे उन गरीब परिवारों से आते हैं, जिनके लिए दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके बलिदान पर राजनीति कर रहे हैं।

कर्नाटक बीजेपी ने अपने ट्विटर हैंडल से ये वीडियो शेयर किया है, जिसमें कुमारस्वामी कन्नड़ भाषा में ये बातें बोलते हुए दिखाई दे रहे हैं। इस ट्वीट में कुमारस्वामी के बयान का जिक्र करते हुए लिखा गया है कि कुमारस्वामी ने जो सेना के लिए बयान दिया है, उन्हें इसके लिए शर्म आनी चाहिए। उन्हें पता होना चाहिए लोग देश प्रेम की वजह से सेना में जाते हैं। इसके साथ ही पार्टी ने कुमारस्वामी को चुनौती देते हुए कहा है कि वो क्यों नहीं अपने बेटे को लोकसभा चुनाव लड़वाने की बजाए सेना में भेजते हैं। अगर वो ऐसा करेंगे तभी पता चलेगा कि सैनिक होने का क्या मतलब होता है।

हालाँकि, कुमारस्वामी ने एक ट्वीट के जरिए इस बात का खंडन करते हुए वीडियो से छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि बीजेपी उन्हें बदनाम करने के लिए पुराने ट्रिक्स आजमा रही है।

गौरतलब है कि पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान के बालाकोट में किए गए एयर स्ट्राइक के बाद से कॉन्ग्रेस और तमाम विपक्षी दल लगातार भाजपा एवं उसके समर्थकों पर हमलावर रही है। इससे पहले सीएम कुमारस्‍वामी ने मोदी को तनाशाह बताते हुए अब तक का सबसे खराब प्रधानमंत्री करार दिया था।

कॉन्ग्रेस के चेले जितना अपमानित करेंगे, मुझे नामदार से लड़ने के लिए उतनी ही ताकत मिलेगी: स्मृति ईरानी

उत्तर प्रदेश के अमेठी से BJP उम्मीदवार केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने डिग्री विवाद पर कॉन्ग्रेस के आरोपों पर पलटवार किया है। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा कि कॉन्ग्रेस हमेशा ही उन्हें अपमानित करने का प्रयास करती रही है और महिला होने के कारण ऐसी कोई प्रताड़ना नहीं है, जो कॉन्ग्रेस ने उनके खिलाफ इस्तेमाल ना की हो। उन्होंने कहा कि इस तरह से कॉन्ग्रेस उन्हें रोक नहीं सकती।

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा, “मुझ पर हमला करना उनका अधिकार है, कॉन्ग्रेस के चेले-चपाटे चाहे जो भी कर लें, लेकिन वे मुझे नहीं रोक सकते हैं। जितना भी अपमानित करेंगे, मुझे उतनी ही ताकत मिलेगी कि मैं उनसे लड़ूँ। क्योंकि मैं कॉन्ग्रेस पार्टी के नामदार के खिलाफ लड़ रही हूँ, इसलिए उनसे यह सब देखा नहीं जा रहा है।”

चीन की सहमति के बिना भी लग सकता है मसूद अज़हर पर प्रतिबंध: UNSC सदस्य देशों ने दिया अल्टीमेटम

पाकिस्तान की मुसीबत बढ़ने वाली है, साथ ही चीन पर दबाव भी उतनी ही तेजी से बढ़ाया जा रहा है। यह सब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जैश-ए-मुहम्मद सरगना मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगाने के भारत के प्रयासों का हिस्सा है। इसे भारतीय कूटनीति की विजय के रूप में देखा जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मसूद अज़हर पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए प्रस्ताव लाने वाले US, UK और फ्रांस ने चीन पर दबाव डाला है कि वह रेसोलुशन UNSC-1267 से तकनीकी रोक एक-दो सप्ताह में हटाए। यदि चीन ऐसा नहीं करता है तो चीन को मसूद अजहर पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए काउंसिल में दूसरे प्रस्ताव का सामना करने के लिए तैयार रहने को कहा गया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे मामले पर एक विदेशी डिप्लोमेट ने कहा कि चीन को 23 अप्रैल तक का समय दिया गया है कि वह इस पर से रोक हटा ले नहीं तो 1267 को दरकिनार करते हुए एक नया प्रस्ताव लाया जाएगा। यह भी बताया जा रहा है कि ऐसा एक प्रस्ताव अनौपचारिक रूप से सभी 15 सदस्य देशों के बीच सर्कुलेट किया जा रहा है, इस आशय के साथ कि चीन इससे दबाव में आकर आतंकी सरगना मसूद अज़हर पर अपने स्टैंड पर पुनर्विचार करे।

हालाँकि, अभी तक ऐसे संकेत नहीं मिले हैं चीन होल्ड हटाने जा रहा है। बता दें कि मौजूदा हालात में चीन पर कई तरह से दबाव बनाया जा रहा है ताकि मसूद पर प्रस्ताव पारित करा कर उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित किया जा सके। ऐसा करना ज़रूरी है तभी मसूद पर यात्रा प्रतिबन्ध के साथ उसकी संपत्तियों को सीज़ किया जा सकता है।

बता दें कि पुलवामा अटैक के बाद से एक बार फिर मसूद अज़हर पर प्रतिबन्ध के लिए अमेरिका और फ्रांस द्वारा प्रस्ताव लाया गया था। लेकिन चीन की धूर्तता की वजह से पाकिस्तान एक बार फिर मसूद को बचाने में कामयाब रहा। यह चौथी बार है जब चीन ने 1267 प्रस्ताव पर तकनीकी होल्ड लगाकर मसूद अज़हर पर प्रतिबन्ध लगाने में अड़चने पैदा की हैं।

हालाँकि, चीन के बार-बार होल्ड लगाने से तंग आकर अमेरिका अनौपचारिक रूप से प्रतिबन्ध के एक नए प्रस्ताव को सर्कुलेट कर रहा है। जिसमे यह प्रावधान है कि 1267 के बिना भी मसूद पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है। अब देखना यह है कि भारत की कूटनीति कितने सफल होती है। क्या चीन 23 अप्रैल तक अपने होल्ड पर पुनर्विचार करता है? या अमेरिका, UK और फ्रांस सहित बाकि सदस्य देश नए प्रस्ताव के ज़रिए 1267 को बायपास करते हुए चीन के प्रतिरोध को धता बताते हुए मसूद पर प्रतिबन्ध लगाकर पाकिस्तान के मुँह पर एक और करारा तमाचा देते हैं।

राहुल गाँधी ने SC का नाम लेकर बोला बड़ा झूठ, BJP ने कोर्ट में दायर की अवमानना याचिका

भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने राफ़ेल डील मामले में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के बयान के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की है। ख़बर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद राहुल गाँधी ने कोर्ट का नाम लेकर पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए टिप्पणी की थी, “सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि चौकीदार चोर है।” इसी बयान को लेकर मीनाक्षी लेखी ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ आपराधिक अवमानना याचिका दाखिल की है। सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार है, जिसकी सुनवाई 15 अप्रैल को होगी। इस मामले पर कॉन्ग्रेस की कड़ी निंदा करते हुए रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी आपत्ति दर्ज की।


जानकारी के अनुसार, केंद्र की आपत्तियों को ख़ारिज करते हुए राफेल पर सुप्रीम कोर्ट ने 10 अप्रैल को फैसला सुनाया था। इस फ़ैसले में न्यायालय ने तीन दस्तावेज़ों को साक्ष्य मानते हुए पुनर्विचार याचिका पर आगे सुनवाई करने की बात कही थी। लेकिन कोर्ट ने कहीं भी यह नहीं कहा था कि मोदी सरकार ने राफेल में कोई घोटाला किया या नरेंद्र मोदी दोषी हैं जबकि राहुल ने झूठ फ़ैलाने के लिए बयान दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चौकीदार चोर है।

इसी बात को लेकर अपनी याचिका में सांसद मिनाक्षी लेखी ने आपत्ति जताई कि राहुल गाँधी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ग़लत तरह से पेश किया और ‘चौकीदार चोर है’ बयान को इस तरह से प्रचारित-प्रसारित किया कि जैसे वो सुप्रीम कोर्ट का बयान हो। मीनाक्षी लेखी ने सुप्रीम कोर्ट से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के पीएम पद पर की गई टिप्पणी पर आपराधिक अवमानना के मामले के तहत कार्रवाई करने की याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट में मीनाक्षी लेखी का प्रतिनिधित्व पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने किया। आगामी सोमवार को मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की बेंच इस पर सुनवाई करेगी।

राहुल गाँधी ने प्रतिशोधात्मक रवैया अपनाते हुए शीर्ष अदालत के इस फ़ैसले के तुरंत बाद संवाददाताओं से कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि चौकीदार ने चोरी की अनुमति दी है। सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया कि राफ़ेल सौदे में किसी तरह का भ्रष्टाचार हुआ था।” राफ़ेल डील पर कॉन्ग्रेस हमेशा से ही पीएम मोदी के ख़िलाफ़ हमलावर रुख़ अपनाती आई है। इस डील के लिए कॉन्ग्रेस अपने बयानों के माध्यम से पीएम मोदी को आए दिन चौकीदार चोर है जैसी आपत्तिजनक टिप्पणी करती आई है।

Breaking News: नरेंद्र मोदी को रूस ने दिया सर्वोच्च नागरिक सम्मान ऑर्डर ऑफ़ सेंट एंड्रयूज

रूस ने पीएम मोदी को अपने सबसे बड़े सम्मान ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयूज से नवाजा है। रूस और भारत के बीच संबंधों को बढ़ाने के लिए उन्हें यह सम्मान दिया गया है। यह रूस का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है।

मॉस्को ने शुक्रवार (अप्रैल 12, 2019) को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को दोनों देशों के बीच विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी को बढ़ावा देने के लिए और उनकी असाधारण सेवाओं के लिए। रूस के सर्वोच्च सम्मान ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयू से सम्मानित किया।

रूसी सरकार के अनुसार, ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयू द एपोस्टल की स्थापना 17 वीं शताब्दी में पीटर द ग्रेट ने 1699 के आस-पास की थी और यह रूस के राष्ट्रीय अलंकरण में सबसे पुराना है।

द ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयू एपोस्टल रूस की सर्वोच्च और पुराना अलंकरण है। यह सम्मान 1918 में तत्कालीन सोवियत संघ में समाप्त कर दिया गया था और 1998 में इसे फिर से स्थापित किया गया था।

फैक्ट चेक: किसी सेना प्रमुख ने राष्ट्रपति को नहीं लिखी कोई चिट्ठी

मोदी सरकार पर तरह-तरह के आरोप लगाकर दिन की शुरुआत करने वाले मीडिया गिरोह और राजनीतिक दल लोकसभा चुनाव के पहले चरण के बाद भी अपने प्रोपेगेंडा में मशगूल हैं। आज सुबह से ही पूर्व सैनिकों द्वारा लिखित एक कथित चिट्ठी भी मीडिया एवं सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। एक एक ओर जहाँ चुनाव आयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हर दूसरी गतिविधि को चुनावी स्टंट बताने वालों की शिकायत पर तुरंत प्रतिक्रिया दे देता है, वहीं दूसरी ओर इस प्रकार की ख़बरें अपना मकसद पूरा कर के चुपचाप दबा दी जाती हैं।

सरकार द्वारा सेना के राजनीतिकरण के विरोध में चिठ्ठी लिखने की है अफवाह

मीडिया में चल रही खबरों के अनुसार, तीनों सेनाओं के 8 पूर्व प्रमुखों सहित 150 से अधिक पूर्व सैन्य अधिकारियों ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को सेना के राजनीतिकरण के खिलाफ चिट्ठी लिखी है। इस चिट्ठी में यह शिकायत की गई है कि सत्ताधारी दल सर्जिकल स्ट्राइक जैसे सेना के ऑपरेशन का श्रेय ले रही है। साथ ही, सेना को मोदी जी की सेना के तौर पर बताया जा रहा है।

मोदी सरकार के विरोध में होने के कारण इस अफवाह को NDTV से लेकर जनसत्ता जैसे लगभग सभी प्रमुख मीडिया चैनल्स ने तत्परता से प्रकाशित किया है। इसमें दावा किया गया है कि चुनाव प्रचार के दौरान सेना और सैनिकों की वर्दी का इस्तेमाल करने पर कई सैन्य अधिकारियों ने नाराजगी जाहिर की है और पूर्व सेना प्रमुख एस एफ रोड्रिग्स और शंकर राय चौधरी समेत करीब 156 पूर्व सैनिकों ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को इसको लेकर चिट्ठी लिखी है। रिपोर्ट्स में बताया गया है कि इस चिट्ठी को लिखने वालों में आर्मी, नेवी और एयरफोर्स के पूर्व प्रमुख भी शामिल हैं। बताया जा रहा है कि पत्र राष्ट्रपति के साथ-साथ चुनाव आयोग को भी भेजा गया है।

क्या है सच्चाई?

इस खबर के वायरल होने के बाद राष्ट्रपति भवन ने खंडन करते हुए इस प्रकार के किसी भी पत्र के मिलने की खबरों से इंकार कर दिया है। राष्ट्रपति भवन ने स्पष्ट किया है कि तीनों सेनाओं के 8 पूर्व प्रमुखों सहित 150 से अधिक पूर्व सैन्य अधिकारियों द्वारा लिखी गई कोई चिट्ठी उन्हें नहीं मिली है, जो मीडिया में चल रहा है।

राष्ट्रपति को भेजी गई चिठ्ठी पर जिन लोगों के हस्ताक्षर बताए गए हैं, उनमें पूर्व सेना प्रमुख जनरल (सेवानिवृत्त) एसएफ रोड्रिग्स, जनरल (सेवानिवृत्त) शंकर राय चौधरी और जनरल (सेवानिवृत्त) दीपक कपूर, भारतीय वायु सेना के पूर्व प्रमुख एयर चीफ मार्शल (सेवानिवृत्त) एन सी सूरी शामिल हैं। इसके अलावा पत्र लिखने वालों में 8 पूर्व चीफ आफ स्टॉफ के भी नाम हैं।

कॉन्ग्रेस और मीडिया गिरोहों द्वारा शेयर की जा रही फर्जी चिठ्ठी

जनरल एसएफ रोड्रिग्स ने बताया कि उनके नाम पर अफवाह फैलाई जा रही है

वहीं दूसरी ओर, पूर्व सैन्य अधिकारियों द्वारा राष्ट्रपति को लिखे गए पत्र में अपना नाम शामिल होने की खबर का जनरल एसएफ रोड्रिग्स ने खंडन किया है। उन्होंने कहा कि वो अराजनीतिक व्यक्ति, पता नहीं कौन यह झूठ फैला रहा है। उन्होंने बताया कि अपने जीवनभर वो राजनीति से दूर रहे हैं और सेवानिवृत्ति के 42 वर्ष बाद अपने निर्णय को बदलने के लिए बहुत देर हो चुकी है।

इसके अलावा एयर चीफ मार्शल एनसी सूरी ने इस तरह के किसी भी खत को लिखने से इनकार किया है। न्यूज एजेंसी ANI से बातचीत में एयर चीफ मार्शल एनसी ने कहा है, “मैं उस पत्र में जो कुछ भी लिखा गया है, उससे सहमत नहीं हूँ।”

मोदी सरकार के दौरान पिछले 4-5 सालों में अक्सर देखा गया है कि कॉन्ग्रेस ने सरकारी संस्थाओं और पूर्व पदाधिकारियों को ढाल बनाकर जनता के सामने हर बार झूठे तथ्य पेश कर जनता को गुमराह करने के अथक प्रयास किए हैं। इस प्रोपेगैंडा के कारोबार में मीडिया गिरोहों ने भी इनका खूब साथ दिया है। हमने देखा है कि वास्तविक तथ्यों से परे, राफेल डील से लेकर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई तक पर मीडिया गिरोहों ने हर रोज सरकार और संस्थाओं को अपमानित करने का प्रयास कर उनका समय बर्बाद किया है।

पूर्व सैनिकों के नाम पर सरकार को के खिलाफ भड़काने जैसी झूठी अफवाहों पर क्या यही मीडिया गिरोह और कॉन्ग्रेस दल स्वीकार करेगा कि सेना का इस्तेमाल और सेना का राजनीतिकरण मोदी सरकार नहीं बल्कि वो स्वयं कर रहे हैं?

कॉन्ग्रेस से लेकर मीडिया गिरोहों ने इस कथित पत्र को सोशल मीडिया पर शेयर किया है।

ट्विटर यूजर्स ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि यह सत्ता और ताकत पाने के लिए की जाने वाली सबसे खतरनाक हरकतों में से एक है। कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी देश के लिए शर्मिंदगी से ज्यादा और कुछ नहीं हैं।

कॉन्ग्रेस के साथ ही मीडिया गिरोह के कुछ निष्पक्ष पत्रकारों ने भी इस खबर को ‘महत्वपूर्ण’ बताते हुए ट्वीट किया है।