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तीसरा चरण: कहीं चाचा-भतीजा की लड़ाई, कहीं सबरीमाला का मुद्दा, कहीं 3 यादवों की ज़ंग

लोकसभा के तीसरे चरण के लिए चुनाव प्रचार का शोर थम चुका है। अब गेंद पूरी तरह से जनता के पाले में है। तीसरे चरण में 14 राज्यों की 116 सीटों पर मतदान होना है। इसमें चुनावी रूप से महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश की 10 सीटें भी शामिल हैं। जहाँ इस चुनाव में एक तरफ़ समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा का सवाल है, वहीं दूसरी तरफ़ कर्णाटक-महाराष्ट्र में भाजपा की गढ़ बचाने की चुनौती है। सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की किस्मत का फ़ैसला भी इसी चुनाव में होगा। आइए एक नज़र डालते हैं इस चुनाव में हिस्सा ले रहे दिग्गज उम्मीदवारों का, जिसकी किस्मत का फैसला जनता को कल मंगलवार (अप्रैल 23, 2019) को करना है।

गाँधीनगर से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह

गाँधीनगर से भाजपा अध्यक्ष इस बार ख़ुद चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा की पारम्परिक सीट रही गाँधीनगर से पूर्व भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण अडवाणी जीतते रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी भी यहाँ से जीत दर्ज कर चुके हैं। अगर अमित शाह को यहाँ से जीत मिलती है तो वो तीसरे ऐसे सांसद होंगे, जो भाजपा अध्यक्ष भी रहे। हालाँकि अमित शाह नामांकन के बाद से सिर्फ़ 2 बार ही गाँधीनगर जा पाए हैं लेकिन वहाँ उनके प्रचार अभियान का संचालन एक विश्वस्त टीम कर रही है। अमित शाह की लड़ाई गाँधीनगर से दो बार विधायक रहे सीजे चावड़ा से है। जब अडवाणी 2009 में भारत भर में प्रचार में व्यस्त थे, गाँधीनगर में उनके प्रचार अभियान की ज़िम्मेदारी शाह ने ही संभाली थी।

मैनपुरी से सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव

मैनपुरी सपा के प्रमुख परिवार की पारम्परिक सीट रही है। सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने मैनपुरी से पहली बार 1996 में चुनाव लड़ा था। उसके बाद से अभी तक इस सीट पर सपा का ही कब्ज़ा रहा है। पिछले चुनाव में भी मुलायम ने यहाँ से जीत दर्ज की थी लेकिन दो सीटों से चुनाव लड़ने के कारण उन्हें ये सीट छोड़नी पड़ी थी। उपचुनाव में तेज प्रताप सिंह यादव ने जीत दर्ज की। वो मुलायम के बड़े भाई के पोते हैं और लालू यादव के दामाद हैं। मुलायम 2004 और 2009 में भी यहाँ से जीत दर्ज कर चुके हैं। 28 वर्ष की उम्र में 1967 में वे पहली बार विधायक यहीं की सीट (जसवंतनगर) से बने थे। उनका मुक़ाबला इस बार भाजपा के प्रेम सिंह शाक्य से होना है।

रोम पोप का, मधेपुरा गोप का

बिहार की मधेपुरा सीट पर भी इस बार रोचक लड़ाई है। दिग्गज नेता पप्पू यादव की किस्मत का भी कल फ़ैसला होना है। यहाँ से 4 बार सांसद रहे शरद यादव ने कभी इस सीट पर लालू यादव को हरा दिया था। पप्पू यादव इस सीट से शरद यादव को हरा चुके हैं। पिछले 40 वर्षों से इस सीट पर किसी न किसी यादव का ही कब्ज़ा रहा है। इस बार महागठबंधन में स्थान पाने में असफल रहे पप्पू यादव अपनी जन अधिकार पार्टी से मैदान में हैं। उनका मुक़ाबला राजद के सिंबल पर लड़ रहे पूर्व जदयू अध्यक्ष शरद यादव और जदयू के दिनेश चंद्र यादव से होगा। बिहार में मंत्री रह चुके दिनेश के लिए ख़ुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चुनाव प्रचार किया है।

फ़िरोज़ाबाद में चाचा-भतीजा की लड़ाई

फ़िरोज़ाबाद सीट से इस बार शिवपाल सिंह यादव और उनके भतीजे अक्षय यादव में लड़ाई है। अक्षय रामगोपाल यादव के पुत्र हैं। भाजपा नेता डॉ चंद्रसेन जादौन के कारण त्रिकोणीय बने इस मुक़ाबले को लेकर ख़ुद मुलायम सिंह यादव ख़ामोश हैं। सपा के कई नेताओं को अपने पाले में कर के शिवपाल ने अपने भतीजे के लिए ऐसा चक्रव्यूह रच दिया है, जिससे वो बहार नहीं निकल पा रहे। हालाँकि, अक्षय को 2014 में इस सीट से जीत मिली थी लेकिन जो नेता उस वक़्त अक्षय के साथ थे, वो अब शिवपाल के लिए प्रचार कर रहे हैं। माया-अखिलेश-चौधरी अजीत की साझा रैली के बावजूद यहाँ शिवपाल डटे हुए हैं। चाचा-भतीजे की इस लड़ाई में भाजपा की जीत के लिए शाह और योगी ने यहाँ रैलियाँ भी कीं। यही वो सीट है जहाँ से कभी राज बब्बर ने डिंपल यादव को हरा दिया था।

शशि थरूर के ख़िलाफ़ इस बार मज़बूत उम्मीदवार

कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर के ख़िलाफ़ इस बार भाजपा ने केरल में पार्टी के अध्यक्ष रहे पुराने संघी कुमानम राजशेखरन को उतारा है। राजशेखरन ने मिजोरम के राज्यपाल पद से इस्तीफा देकर लोकसभा चुनाव में कूदने का फ़ैसला लिया है। स्थानीय ओपिनियन पोल्स में राजशेखरन को बढ़त मिलती दिख रही है। पिछले 2 चुनावों से यहाँ से जीत रहे थरूर को पहली बार कड़ी चुनौती मिल रही है। पिछले चुनाव में अंतिम राउंड में थरूर को जीत तो मिल गई थी लेकिन उनका मत प्रतिशत अच्छा-ख़ासा गिरा था। सबरीमाला के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे अनुभवी राजशेखरन कॉन्ग्रेस और लेफ्ट के विकल्प के रूप में उभरने की कोशिश कर रहे हैं। जहाँ 2009 में थरूर की जीत का अंतर क़रीब 1 लाख था, 2014 में यह घटकर सिर्फ़ 15,000 रह गया था।

उपर्युक्त उम्मीदवारों के अलावा पुरी से संबित पात्रा, अनंतनाग से महबूबा मुफ़्ती, पीलीभीत से वरुण गाँधी और पश्चिम बंगाल में पूर्व राष्ट्रपति के पुत्र अभिजीत मुख़र्जी के भाग्य का भी फ़ैसला होना है।

केन्द्रीय मंत्री महेश शर्मा से ₹2 करोड़ का ब्लैकमेल, मीडिया में काम कर चुकी लड़की गिरफ्तार

लोकसभा निर्वाचन के तीसरे चरण के ठीक पहले केन्द्रीय संस्कृति व पर्यटन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) महेश शर्मा को ब्लैकमेल कर उनसे पैसे ऐंठने की कोशिश का मामला सामने आया है। मंत्री की कुछ व्यक्तियों के साथ निजी बातचीत को सार्वजनिक करने की धमकी दे उनसे ₹2 करोड़ की राशि माँगी गई थी।

पुलिस को दी सूचना, बिछा जाल

समाचार पत्र दैनिक जागरण के पोर्टल के अनुसार महेश शर्मा ने लड़की के धमकी भरे पत्र की तहरीर गौतम बुद्धनगर के एसएसपी वैभव कृष्ण को दी। सोमवार को ₹45 लाख की किश्त लेने जब लड़की कैलाश अस्पताल पहुँची तो उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

चुनाव से पहले की बातचीत, मीडिया में काम कर चुकी है लड़की

अब तक प्राप्त जानकारी के अनुसार गिरफ्तार लड़की मीडिया में काम कर चुकी है। यही नहीं, साजिश में कुल 6-7 लोगों के शामिल होने की आशंका जताई जा रही है, जिनमें एक किसी निजी चैनल का मालिक भी हो सकता है। हिंदी दैनिक अमर उजाला ने यह भी दावा किया है कि यह गैंग पहले भी कई लोगों को अपना शिकार बना चुका है।

बातचीत किस बारे में थी, यह तो पता नहीं चला है पर मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बातचीत चुनावों के पहले की है।

पश्चिम उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता माने जाते हैं महेश शर्मा

महेश शर्मा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा का कद्दावर चेहरा माना जाता है। मंत्री बनने के पहले भी वह नोएडा के विधायक रह चुके हैं। इस बार वह पुनः निर्वाचित होने के लिए उम्मीदवार हैं। 2009 में पहला चुनाव गौतमबुद्ध नगर लोकसभा का लड़ने वाले महेश शर्मा 2012 में पहली बार नोएडा से विधायक निर्वाचित हुए, और 2014 में सांसद व मंत्री बने।

FT संपादक ने किया आजम खान के बेहूदा बयान का समर्थन, दक्षिणपंथी पत्रकार ने लताड़ा

जहाँ आजम खान के जयाप्रदा पर दिए गए अश्लील बयान की पूरे देश में आलोचना हो रही है, वहीं एक विदेशी पत्रकार ने इसका समर्थन करने की कोशिश की है। फाइनेंशियल टाइम्स के संपादक लायोनेल बार्बर ने आजम खान के वक्तव्य को “कोई बुरा कथन नहीं” कहकर उसे हल्का करने की कोशिश की है।

भारत के निर्वाचन दौरे के दौरान किया लज्जाजनक बचाव

लायोनेल बार्बर अपने समाचारपत्र फाइनेंशियल टाइम्स की ओर से भारत के आम चुनावों को कवर कर रहे हैं। केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के बीच अमेठी के चुनावी मुकाबले के बारे में लिखते हुए उन्होंने प्रदेश के अपने अनुभव साझा किए। इसी दौरान अपने एक दौरे पर, जिसमें वह खुद आजम खान के मेहमान थे, लिखते हुए उन्होंने जयाप्रदा पर आजम की टिप्पणी का उल्लेख किया और लिखा, “Not a bad line, though Khan was temporarily banned for it।(अनुवाद: कोई बुरा कथन नहीं है, हालाँकि इसके लिए खान पर अस्थाई प्रतिबंध लगा दिया गया।”)

सोशल मीडिया पर कड़ी प्रतिक्रिया

बार्बर के इस कथन को सोशल मीडिया पर दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी धड़ों ने आड़े हाथों लिया। नवम कैपिटल के संस्थापक और कार्यकारी निदेशक राजीव मंत्री ने ट्विटर पर लिखा:

उन्हें रीट्वीट करते हुए प्रख्यात पत्रकार और स्तंभकार शेफ़ाली वैद्य ने बार्बर को आड़े हाथों लिया, और उनके दोहरे मापदंडों को उजागर करते हुए उनसे पूछा कि अगर जयाप्रदा पर आजम खान की बातें बुरी नहीं हैं तो ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे की आलोचना करने वाला नारीद्वेषी कैसे हो जाता है?

RaGa के सिर फिर चढ़ी ‘गर्मी’ कहा, ‘कमलछाप चौकीदार…’ – लोगों ने कमजोरी-कबूतर शब्द फेंक कर मारा

चुनावी दौर के बीच सियासी घमासान की रफ़्तार ज़ोरों पर है। आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने अपने ट्विटर हैंडल से पीएम मोदी के ख़िलाफ़ फिर से निशाना साधा है। अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा कि 23 मई को जनता की अदालत में फैसला होकर रहेगा कि कमलछाप चौकीदार ही चोर है। साथ ही चौकीदार को सज़ा मिलेगी जैसी बात भी लिखी।

‘चौकीदार चोर है’ की टिप्पणी के लिए 10 अप्रैल को भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की थी। इस याचिका पर कार्रवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गाँधी को नोटिस जारी कर 22 अप्रैल तक जवाब देने को कहा था।

सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के जवाब में राहुल गाँधी ने आज जो हलफ़नामा दाखिल किया उसमें उन्होंने अपनी टिप्पणी के लिए चुनावी जोश यानी चुनावी गर्मी को इसका कारण बताया। राहुल ने अपने हलफ़नामे में यह भी स्पष्ट किया वो भविष्य में कोर्ट का हवाला देकर ऐसा कुछ नहीं कहेंगे जो कोर्ट ने न कहा हो।

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी का यह चेहरा समझ से परे है, वो स्वांग रचने में माहिर हैं। एक तरफ तो कोर्ट में वो अपनी ग़लती के लिए हाथ जोड़कर माफ़ी माँगने का स्वांग रचते दिखते हैं, तो दूसरे ही पल कोर्ट से बाहर आते ही फिर से अपना वही हमलावर रुख़ अख़्तियार करते हैं। अपने माफ़ीनामे के बाद भी आदतन पीएम मोदी को आड़े हाथों लेना उनकी कुंठित मानसिकता और हताशा को दर्शाता है।

जनता को बरगलाने के लिए राहुल गाँधी जिन ज़ुबानी अल्फ़ाज़ों का इस्तेमाल करते हैं वो सब धरे के धरे ही रह जाते हैं, जब सोशल मीडिया पर यूज़र्स उन्हें आईना दिखाते हैं।

एक यूज़र ने तो यह तक लिख दिया कि राहुल जी, अब आपके पास बोलने को बचा क्या है?

एक अन्य यूज़र ने अपने ट्वीट में लिखा कि कमलछाप का तो पता नहीं लेकिन 281 करोड़ रुपए वाला कमलनाथ जरूर चोर है, और जिसको 20 करोड़ रुपए पहुँचे वो भी !!!

राहुल गाँधी अगर चाहें भी तो भी वो पीएम मोदी को बेवजह घेरने से बाज नहीं आएँगे। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उनके पास कोई दूसरा चारा या बहाना ही नहीं है जिसके दम पर वो अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंक सकें। अब वो इसे अगर चुनावी गर्मी का नाम देना चाहते हैं तो यह उनका भ्रम है, जिसमें वो बने रहना चाहते हैं।

दिग्विजय ने युवक से ₹15 लाख को लेकर पूछा सवाल, जवाब सुनकर भरी सभा में हुई किरकिरी

दिग्विजय सिंह का एक वीडियो ख़ूब वायरल हो रहा है। इस वीडियो में दिग्विजय सिंह रैली के मंच से भाषण देते हुए दिखाई दे रहे हैं। इस दौरान नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए दिग्विजय सिंह ने लोगों से पूछा कि क्या उनके खातों में 15 लाख रुपए आ गए? मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सभा में से एक युवक को बुलाकर पूछा की क्या उसके खाते में 15 लाख रुपए आ गए हैं? युवक ने मंच पर आकर दिग्विजय की बोलती बंद कर दी। युवक ने मंच पर पहुँच कर सर्जिकल स्ट्राइक का ज़िक्र करते हुए कहा ‘मोदीजी ने आतंकवादियों को मारा।‘ नीचे दिए गए वीडियो में आप देख सकते हैं कैसे युवक ने दिग्विजय को मुँहतोड़ जवाब दिया।

युवक का इतना कहना था कि मंच पर उपस्थित कॉन्ग्रेस नेताओं ने माइक को युवक से अलग कर दिया। फिर उन्होंने युवक को मंच से नीचे उतार दिया। दिग्विजय ने इसके बाद अपना भाषण फिर से चालू किया। विपक्षी नेताओं के भाषण में उपस्थित लोगों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करना अब आम बात होती जा रही है। आज सोमवार (अप्रैल 22, 2019) को ही तेजस्वी यादव की रैली में उपस्थित कई लोगों ने न सिर्फ़ मोदी-मोदी के नारे लगाए बल्कि कहा कि वे तो तेजस्वी की सभा में हैलीकॉप्टर देखने आते हैं। इसका भी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की रैली में भी लोग मोदी की प्रशंसा कर चुके हैं।

दिग्विजय सिंह का उक्त वीडियो भोपाल की रैली का है। भोपाल में भाजपा ने दिग्विजय के ख़िलाफ़ साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को उतारकर चुनावी माहौल गरमा दिया है। 71 वर्षीय दिग्विजय ने साध्वी प्रज्ञा का भोपाल में स्वागत करते हुए एक वीडियो भी जारी किया, जिसमें उन्होंने माँ नर्मदा का जिक्र किया। साध्वी प्रज्ञा ने कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा उन पर लगाए गए आतंकवाद के दाग को मुद्दा बनाया है और लोगों की सहानुभूति भी उनकी तरफ़ दिख रही है। 9 वर्षों तक जेल में रहीं साध्वी ने अपने ऊपर किए गए अत्याचारों को चुनावी मुद्दा बनाया है। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने भी उनका खुला समर्थन किया और कहा कि कॉन्ग्रेस विरोधियों को फँसाने के लिए मनगढंत चार्ज लगाती है।

मध्य प्रदेश में साध्वी बनाम दिग्विजय मुक़ाबले के लिए दोनों पार्टियों ने कमर कस ली है। जब साध्वी प्रज्ञा ने दिग्विजय को ‘भगवा आतंकवाद’ का सूत्रधार बताया तो दिग्विजय ने पलटवार करते हुए कहा कि ‘हिन्दू आतंकवाद’ शब्द उन्होंने नहीं गढ़ा है। नामांकन भरने के बाद दिग्विजय ने कहा कि उनकी डिक्शनरी में हिंदुत्व शब्द है ही नहीं। साध्वी प्रज्ञा साफ़ कर चुकी हैं कि उन्हें आध्यात्मिक जीवन पसंद है लेकिन वो सिर्फ़ और सिर्फ़ भगवा आतंकवाद जैसे शब्द गढ़ने वालों को हराने के लिए ही राजनीति में आई हैं। दिग्विजय ने भी अब अपने ट्वीट्स में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ और सनातन धर्म की बातें करनी शुरू कर दी हैं।

कश्मीरी पंडितों से इतनी नफरत क्यों राहुल गाँधी? आप तो ‘दत्तात्रेय-कौल ब्राह्मण’ हो!

राहुल गाँधी, नमस्कार!

इस खत की शुरुआत मैं अपने परिचय के साथ करती हूँ। मेरा नाम साक्षी है और मैं एक कश्मीरी पंडित हूँ। मेरा जन्म विश्वामित्र-वशिष्ट के गोत्र में हुआ था। हालाँकि एक कश्मीरी युवक के साथ शादी होने के बाद मेरा गोत्र पत स्वमीना कौशिक हो गया है। हमारे समाज में जो गोत्र प्रणाली है, उसके बारे में आपके ज्ञान पर मुझे जरा सा भी शक नहीं है। आपने नवंबर 2018 में पुष्कर में एक मंदिर का दौरा करने के दौरान अपने आपको दत्तात्रेय (कौल) ब्राह्मण बताया था। आपके इस ख़ुलासे से राजनीतिक गलियारे में हलचल पैदा हो गई थी और आपको काफी नाराजगी का सामना भी करना पड़ा था।

जहाँ तक मुझे याद है और सार्वजनिक रिकॉर्ड में है, उसके हिसाब से आपके दादा जी फिरोज गाँधी थे, जो पारसी थे। हालाँकि आपके पिता और स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी की आस्था पर भी शक है। मैं आपको बता दूँ कि गोत्र परंपरागत रूप से एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक जाते हैं। जिस तरह से आपको अपना उपनाम अपने पिता से विरासत में मिला, उसी तरह से गोत्र भी आपको अपने पिता से विरासत में मिला होगा। वास्तविकता तो यह है कि आप गोत्र को नहीं चुन सकते, बल्कि गोत्र आपको चुनता है। मैं आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि गोत्र कोई कमोडिटी (बिकाऊ वस्तु) नहीं है, जिसे आप अपनी इच्छा और राजनीतिक जरूरतों के लिए उधार ले सकते हैं या फिर त्याग कर सकते हैं। मुझे आशा है कि आपके संदेहास्पद दावे पर मेरे न्यायसंगत संदेह के मेरे अधिकार से आप सहमत होंगे।

मैं आपकी राजनीतिक विवशता को समझ सकती हूँ; आप वर्षों से भारत में राजनीतिक परिदृश्य में एक मुकाम पाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। फिर भी कमोबेश सफलता आपके हाथ नहीं आती लग रही है। आप राजनीतिक परिवार यानी नेहरू-गाँधी परिवार में पैदा होने के लाभ को भुनाने में भी सक्षम नहीं हैं। आश्चर्य की बात यह है कि मेरे 8 साल के बेटे समेत हममें से अधिकतर आम भारतीय मानते हैं कि आप भारतीय राजनीति में बेमेल हैं। मेरे बेटे का विचार है कि आपको सक्रिय राजनीति छोड़कर प्राथमिक रूप से कॉमेडी को तवज्जो देनी चाहिए। आप अपने कॉमिक और अबोधगम्य भाषणों से उसे अचंभित करने से नहीं चूकते। वह कहता है कि आप और राजनीति एक विरोधाभास है!

आप जिस तरह की राजनीति करते हैं और आपकी जो विचारधारा है, उसे व्यक्तिगत तौर पर मैं समझ नहीं पा रही हूँ। वैसे तो आप काफी पक्षपाती हैं, लेकिन धर्मनिरपेक्षता की आड़ में उसे छिपाने का काम किया गया है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि भारतीयों के एक विशेष वर्ग में आपकी तरह की धर्मनिरपेक्षता की भूख है, जो स्पष्ट रूप से हिन्दू-विरोधी भावनाओं में तब्दील हो जाती है।

मिस्टर गाँधी, यह एक खुला रहस्य है कि आपके राजनीतिक दुस्साहसों को वामपंथी लुटियन तंत्र द्वारा छिपाया जाता है और उसे ‘सफेद’ कर दिया जाता है। ऐसा देखा गया है कि सार्वजनिक जीवन में आपकी छवि को साफ-सुथरा दिखाने के लिए मुख्यधारा की मीडिया ने आपका खूब समर्थन किया और आपकी छवि को बेहतरीन बनाने की काफी कोशिश की है। मगर उनके इतनी सफाई से किए प्रयासों के बावजूद, सोशल मीडिया पर आपकी छवि लगातार बिगड़ रही है। आपके झूठ का पर्दाफाश हो रहा है और साथ ही आपके संदेहास्पद इरादे भी उजागर हो रहे हैं।

मिस्टर गाँधी, मैं आपसे कुछ प्रश्न पूछती हूँ। आप जिस समुदाय को अपना कहते हैं, उस समुदाय के प्रति आपके मन में इतनी नफरत क्यों है? मैं ऐसा इसलिए कह रही हूँ क्योंकि भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष के रूप में आप, एक कश्मीरी दत्तात्रेय (कौल) ब्राह्मण, अपने समुदाय के कल्याण की उपेक्षा कैसे कर सकते हैं? 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए कॉन्ग्रेस की तरफ से जारी किए गए घोषणा-पत्र में क्या उस कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए एक शब्द का भी उल्लेख नहीं करना चाहिए था, जिस समुदाय के होने का आप दावा करते हैं?

मिस्टर गाँधी, अब आप कृपया यह मत कहिएगा कि आपको इसके बारे में सूचित नहीं किया गया या फिर आप अपनी पार्टी के घोषणा पत्र की सामग्री से ही अनजान थे। यह किसी राजनीतिक दल के प्रमुख के रूप में आपकी स्थिति के लिए बहुत ही निराशाजनक और अपमानजनक होगा। वास्तव में इन दिनों आप पूरे देश में रैलियों में जाकर इसी घोषणा-पत्र के आधार पर ही मतदाताओं से वोट देने की अपील करते हैं। पर इतनी स्पष्ट चूक के बावजूद, मैं आपको लेकर हैरान क्यों नहीं हूँ? इसलिए कि बहुत समय पहले से ही आपके इरादों के बारे में ऐसी बातें कही जा रही थीं।

हिंदुओं के प्रति, हमारे समुदाय के प्रति, आपकी अनभिज्ञता और हिंदुओं के प्रति आपकी घृणा आपके व्यवहार से स्पष्ट है। आपके घोषणा-पत्र में जम्मू और कश्मीर के लिए स्वाभिमान वाले सेक्शन में कश्मीरी हिंदुओं पर एक भी शब्द शामिल नहीं किया गया। तथ्य यह है कि आपको हमारी दुर्दशा और पुनर्वास की कोई परवाह नहीं। वास्तव में आपको सिर्फ अपनी झूठी हिंदुत्ववादी छवि की चिंता है। आपके पास अपने राजनीतिक विरोधियों के आरोपों के लिए इस छवि को महज एक राजनीतिक ‘काट’ के रूप में रखने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है।

आपकी स्पष्ट नफरत के बावजूद आप चाहते हैं कि हम आप पर भरोसा करें और आपको अपने नेता के रूप में स्वीकार करें! लेकिन कैसे? मैं अपनी अंतरात्मा को धोखा नहीं दे सकती।

एक तरफ तो आप महिलाओं का मसीहा होने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ आप बेहद ही चतुराई से अनुच्छेद-35A पर स्टैंड लेने से बचते हैं। यह आश्चर्यजनक है क्योंकि हर कश्मीरी पंडित इसको लेकर परेशान है। आपको 35A की ख़ामियों से बख़ूबी वाकिफ होना चाहिए था, जिससे हर कश्मीरी पंडित महिला नफरत करती है। 35A जम्मू-कश्मीर की हर एक बेटी के लिए एक बुरा सपना है जो अपनी जाति/राज्य के बाहर शादी करना चाहती है। यह उसके मौलिक अधिकारों को दाँव पर लगाता है, जो कि उसके लिए न्यायसंगत नहीं है। मेरे राज्य की महिलाएँ इस अनुच्छेद के खतरों से अवगत हैं। आश्चर्य है कि आपको इस विषय पर अधिक जानकारी नहीं है और इसी वजह से मुझे गुस्सा आता है।

खुशबू एक कश्मीरी पंडित महिला हैं। उन्होंने गैर-कश्मीरी युवक से शादी की और फ़िलहाल बेंगलुरु में रहती हैं। उनके अंदर अनुच्छेद 35A को लेकर काफी गुस्सा है, क्योंकि यह उनके अधिकारों के साथ विश्वासघात करता है। उनका कहना है कि कश्मीरी पंडित और ऋषि कश्यप की भूमि होने के बावजूद, कानून उनके प्रति और उनके समुदाय से बाहर शादी करने वाली हर लड़की के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया अपनाता है। वह आगे कहती हैं कि यह अनुच्छेद जम्मू और कश्मीर के नागरिक के रूप में उनके मौलिक अधिकार को छीन लेता है। राहुल गाँधी, यह निराशाजनक है कि आप जैसे अधिकांश राजनेता इस तथ्य से बेखबर हैं कि 35A उन्हें उनकी पहचान, आवाज, भाषा और संस्कृति से अलग कराता है। वह चाहती हैं कि इस तरह के कानूनों को निरस्त किया जाए, लेकिन वो मानती हैं कि किसी को भी इसकी परवाह नहीं, क्योंकि उनके समुदाय को वोट बैंक के रूप में नहीं देखा जाता है। खुशबू जैसी कई लड़कियाँ हैं, जिन्हें इस कड़वी सच्चाई के साथ जीना पड़ता है। अफसोस की बात तो यह है कि अनुच्छेद 35A, जो हमारे अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है, इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस या फिर किसी भी कॉन्ग्रेसी नेता के लिए चर्चा योग्य विषय नहीं है।

इसके विपरीत, एक विदेशी माँ की कोख से इंग्लैंड के रोचफ़ोर्ड में पैदा हुए भी उमर अब्दुल्ला को इस तरह की किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा। वो 5 जनवरी 2009 से लेकर 8 जनवरी 2015 के बीच राज्य के 8वें मुख्यमंत्री बने। उनकी गठबंधन सरकार को आपकी पार्टी का समर्थन प्राप्त था। तो, मिस्टर गाँधी, अगर पुरुष इस अनुच्छेद से बँधे हुए नहीं हैं, तो फिर केवल महिलाएँ ही क्यों? मुझे यकीन है कि आप इस सवाल का कोई तार्किक जवाब देने की बजाए चुप्पी साधना पसंद करेंगे।

आपका यह ढुलमुल रवैया चिंताजनक और विचारनीय है। आप एक नकली हिंदू हैं और यह यूपी के हिंदू गढ़ अमेठी और केरल के मुस्लिम बहुल वायनाड में आपकी उपस्थिति के अंतर से स्पष्ट हो गया है। वास्तव में आपका रवैया हास्यास्पद है क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्रों में जनता से रूबरू होते हुए आपको अपने आप पर भरोसा नहीं रहता। या फिर आप अपनी पहचान को लेकर असमंजस में ही रहते हैं?

अब वापस से इस बिंदु पर आते हुए इस बात को समझने में मैं असफल हूँ कि कैसे आप एक हिंदू जनेऊधारी होकर भी अपने ही समुदाय/धर्म के साथ हो रहे दुर्व्यवहार को देखते हुए भी सहिष्णु बने हुए हैं? न तो आपने कभी हमारे लिए आवाज उठाई और ना ही कभी कोई चिंता जाहिर की। आप हमारे नरसंहार और 7वें पलायन के लिए जिम्मेदार अपराधियों को कानून के सामने लाने के बारे में मुखर नहीं हैं, क्यों? इसके इतर, मैंने हमेशा आपको हिंदू-विरोधी ताकतों के साथ खड़ा पाया है। बड़े दुख की बात है कि आप एक उग्र विचारधारा के लोगों के साथ खड़े हो कर उनका और उनकी माँगों का समर्थन करते हैं, लेकिन आप उस जगह पर बिल्कुल ही चुप्पी साध लेते हैं, जहाँ पर आपसे कश्मीरी पंडित समुदाय की ओर से कुछ बोलने की उम्मीद की जाती है।

यह वाकई बड़ा दुखद है कि एक आदमी, जो कश्मीरी हिंदू होने का दावा करता है, वह “भक्त” शब्द के बारे में पूरी तरह अंजान है। मिस्टर गाँधी आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि भक्त महज एक शब्द नहीं है, बल्कि ये शब्द उन लोगों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है, जो वास्तव में हिंदू हैं। मगर अफसोस! आप जैसे नकली हिंदू कभी भी इसका गूढ़ अर्थ नहीं समझ पाएँगे।

इसलिए, मिस्टर गाँधी, मैं आपसे आग्रह करती हूँ कि आप अपनी राजनीतिक यात्रा का आत्मविश्लेषण करें और इसे गंभीरता से लें। एक बार के लिए, इस बाहरी लबादे को हटाकर अपने अंतर्मन में झाँके और अपनी आत्मा के प्रति सच्चे रहें। कुछ ऐसा करें, जो करना आपको वाकई में पसंद हो। यह हमारे हित में (और आपके भी) सबसे अच्छा होगा कि आप राजनीति से संन्यास लें और एक शांत तथा गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत करें। शायद आप राजनीति के लिए नहीं बने हैं, एक बार इसके बारे में जरूर सोचें।

भविष्य में आपके प्रयासों के लिए आपको शुभकामनाएँ। आपकी बुद्धि सही रहे, यही मेरी कामना है!

वामपंथी आतंकवाद और आईसिस के मजहबी जिहाद में कोई अंतर नहीं, बिलकुल नहीं

सबसे पहले मैं यह साफ कर देना चाहता हूँ कि मुझे न तो इससे मतलब है कि पहले के तथाकथित क्रांतिकारी लेनिन, माओ या विचारक मार्क्स ने क्या लिखा था, उनके विचार क्या थे, न ही इससे कि किसी आतंकी के हाथों की आसमानी किताब किसी मज़हब के बारे में क्या कहती है। मतलब इसलिए नहीं है कि विचारों का, या किताबी बातों का, सच्चाई और जमीनी हक़ीक़त से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। इसलिए, मैं किसी के विचारों के नाम पर, किसी किताब की कुछ आयतों के नाम पर जो हो रहा है, उसमें ज्यादा रुचि रखता हूँ, बजाय इसके कि कहीं दूसरी जगह यह कहा गया है कि हम तो शांतिप्रिय लोग हैं, या हम सर्वहारा की क्रांति कर रहे हैं।

मैं उन प्रतीकों का, उन बातों के वीभत्स रूप को हर रोज झेल रहा हूँ, इसलिए मैं अपने अनुभव, अपने समाज के अनुभव और अपने आस-पास देख कर बातें करूँगा न कि लेनिन ने जो हत्याएँ कराईं, माओ ने जो सामूहिक नरसंहार कराए, उसके पीछे की वजह क्या थी। मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि फ़लाँ किताब के फ़लाँ चैप्टर में यह लिखा है कि एक मानव की हत्या पूरे मानवता की हत्या है, क्योंकि ये कहने की बातें हैं, इनका वास्तविकता से कोई नाता नहीं है।

वामपंथ क्या है? एक ख़ूनी विचारधारा जिसका नाम लेकर भारत में पिछले 20 सालों में 12000 हत्याएँ कर दी गईं जिसमें 2700 सुरक्षा बलों का बलिदान शामिल है। ये हत्या किसके नाम पर हुई? ‘पीपुल्स’ यानी आम जनता के नाम पर, सर्वहारा के नाम पर। मरने वाले कौन थे? प्राइवेट जेट से घूमने वाले जॉन ट्रवोल्टा टाइप के लोग, या प्राइवेट आइलैंड में छुट्टियाँ बिताने वाले जॉनी डेप्प की हैसियत वाले?

जी नहीं, भारत में नब्बे प्रतिशत लोग या गरीब हैं, या बहुत ज़्यादा गरीब हैं। मरने वाले आँकड़े सरकारी हैं, और जो मरे हैं, वो अधिकतर वैसे लोग हैं जो भारत के सीमित संसाधनों के बीच किसी तरह जीवनयापन कर रहे थे। वो भी वही आम इन्सान थे जिनका नाम इनके पीपुल्स वार ग्रुप से लेकर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी या कम्यून की बातों में होता है।

हत्या तो महज़ एक संख्या है जो बड़ी या छोटी हो सकती है, जिसे हम या आप आँक सकते हैं, लेकिन उन 68 जिलों का क्या जहाँ माओवादी या नक्सली आतंक के साए में लोग जीने को मजबूर हैं? क्या उस डर को आँका जा सकता है? क्या उन बच्चियों पर किए गए बलात्कार, उन परिवारों पर की गई हर रोज की हिंसा को संख्या में आँका जा सकता है? शायद नहीं।

‘सर्वहारा’ शब्द इन वामपंथी आतंकवादियों के लिए एक ढाल है। ‘जन आंदोलन’ इनके निजी स्वार्थ के लिए पावर तक पहुँचने का एक ज़रिया मात्र है। आप खूब ढोल और डुगडुगी बजा लीजिए और क्रांति के गीत गाइए, लेकिन हर वामपंथी नेता के पीछे हिंसा और व्यभिचार की मेनस्ट्रीमिंग आपको दिख जाएगी। ‘तुम्हारी देह कम्यून की संपत्ति है’ जैसे जुमले सुना कर महिला काडरों का सेक्सुअल मोलेस्टेशन और रेप, इन कामपंथियों का ट्रेडमार्क है।

इनके नेताओं को कभी सुनिए कि कैसे इन्होंने शब्दों का सहारा लेकर सपने दिखाए हैं और जहाँ भी इन्होंने राज किया है, वहाँ पोलिटिकल किलिंग्स की बाढ़ ला दी है। मुझे याद आता है इसी विचारधारा के एक नेता का बयान जो सीपीएम जेनरल सेक्रेटरी विजयन थे, जिसने अपने पार्टी के लोगों को बंगाली कम्यूनिस्टों का तरीक़ा अपनाने को कहा था कि विरोधियों को ज़िंदा गाड़ दो नमक की बोरियों के साथ कि उनकी हड्डियाँ भी पुलिस को न मिले। इस एक वाक्य से भारत के दो कम्युनिस्ट शासित राज्य की सच्चाई बाहर आ जाती है। इन दोनों के राज्य में कितनी राजनैतिक हत्याएँ हुई हैं, वो गूगल कर लीजिए।

अब इस बात पर चर्चा कि मैंने इन्हें आईसिस के जिहादियों से क्यों जोड़ा। बहुत आसान है इन्हें ऐसा मानना। दोनों ही विचारधाराएँ आतंकी हैं, हिंसक हैं, और लोगों की जान लेना इन दोनों में जस्टिफाइड है। इस्लामी आतंकी कहते हैं कि मज़हब के नाम पर सारी मार-काट सही है, माओवंशी कामपंथी और लेनिन की नाजायज़ औलादें कहती हैं कि क्रांति की राह में जो भी आएगा निपटा दिया जाएगा।

दोनों के लिए फ़ंडिंग भी बाहर से ही आता है। अपहरण करके पैसा जुटाना दोनों का मुख्य काम रहा है। धमकी और वसूली से पैसा माँगना भारत में हर नक्सल प्रभावित क्षेत्र में एक मुख्य तरीक़ा रहा है। दोनों ही तरीक़ों में बाहरी देशों का खूब इन्वॉल्वमेंट है। दोनों ही तरीक़ों में पोलिटिकल हैंडलिंग और संरक्षण, अपने हितों को देखते हुए राष्ट्र या राज्य की सत्ता देती रही है।

एक तरफ लक्ष्य सबको एक ख़लीफ़ा के नीचे लाना है, दूसरी तरफ कम्यून है। एक तरफ इस्लाम मज़हब और मुस्लिम होना, अपने समाज और देश से बड़ी चीज है, दूसरी तरफ कम्यून के लिए समर्पण इतना प्रबल कि भारत और चीन लड़े तो भारतीय कम्युनिस्ट चीन के साथ खड़े दिखते हैं। विचारधारा सर्वोपरि हो जाती है, और उसके रास्ते में काफ़िर आए तो मारा जाता है, काटा जाता है, गोलियों से छलनी कर दिया जाता है, शांतिदूत बन कर बाज़ारों में फट जाता है या फिर सड़कों पर ट्रक चला कर लोगों को रौंद देता है।

दूसरी तरफ, कम्यून इतना सर्वोपरि हो जाता है कि सीआरपीएफ़ के जवानों को, स्कूली मास्टरों को, उन सरकारी लोगों को जिनके घर में वो अकेले कमाने वाले हों, बहुत गरीब तबके से आते हों, घेर कर मारने में ये एक बार सोचते भी नहीं। खुद घिर जाने पर बच्चों को ढाल बना कर बचते हैं, और अपने कम्यूनिस्ट कामरेड (कॉमरेड नहीं, कामरेड) की लाश में भी बम सिल देते हैं कि उसकी लाश में भी धमाका करके दो-चार और गरीब घरों के जवानों की बलि वामपंथ के नाम पर चढ़ जाए।

दोनों ही विचारधाराएँ, ख़ौफ़ और आतंक के आहार पर ज़िंदा हैं, और ये जिन लोगों की बेहतरी के सपने बेचते हैं, वो मुस्लिम इन इलाकों में सबसे बदतर जीवन जीता है, और वो गाँव वाले बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं। बात यह है कि अगर गाँव वाले तक सड़क, स्कूल, हॉस्पिटल पहुँच गए तो फिर इन वामपंथी आतंकवादी नरपिशाचों के जीवन का परपस, यानी लक्ष्य ही खत्म हो जाएगा। क्योंकि जेनएनयू जैसे संस्थानों में चलने वाली दारू की महफ़िलों में, गाँजे के ज्वाइंट फूँकते कामरेड ज्ञान तो बहुत बाँट देते हैं, शब्द तो बहुत जुटा लेते हैं, लेकिन इनकी निजी जिंदगी और इनके आदर्शों की बात में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है।

दोनों ही विचारधाराएँ आम जनता, गरीब, निर्दोष, निर्बल लोगों की लाशों के ख़ून से लाल और काले हो चुके झंडों के नीचे चलती हैं। दोनों के प्रवर्तकों ने भले ही मजहब और विचारों में ‘नशे’ आदि को नकारने की बात कही हो, लेकिन नशा और नशे में धुत्त आतंकी, इसी अफ़ीम को लोगों तक पहुँचा कर रिक्रूट करते हैं। नशा सिर्फ नशीली वस्तुओं का नहीं होता, नशा तो बातों का भी हो सकता है कि देखो वो दिन जब पूरा विश्व इस्लाम के झंडे तले होगा, देखो वो दिन जब पूरी दुनिया सर्वहारा के पैरों तले होगी।

किस जगह, किस नेता ने सर्वहारा को दुनिया दे दी? आईसिस के इस्लामी मूल्यों के तथाकथित रक्षक रात में महिलाओं का बलात्कार करते हैं, और दिन में कहते हैं बुर्क़ा पहन कर चलो, वरना दूसरे मर्द तुम्हें देख लेंगे। वैसे ही, लम्पट कामपंथी हास्यास्पद तरीके से लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करता है, और अपने विरोधियों को ज़िंदा दफ़नाने, बीच सड़क काट देने, और स्टेट मशीनरी का दुरुपयोग करके सैकड़ों लोगों को गायब करने से हिचकिचाता नहीं। इनकी नई पौध, लिंगलहरी कन्हैया बेगूसराय के कोरैय गाँव में विरोध का काला झंडा देखने पर अपने गुंडे छोड़ देता है और जो घर में घुस कर लोगों को पीटते हैं, सर फोड़ देते हैं।

इसलिए, जो ज़मीन पर है उसकी बात करते हैं। जो हो रहा है, उसकी ही बात होनी चाहिए। मार्क्स ने किस समाज की बात की थी, और उसके विचारों से प्रभावित तमाम राष्ट्र और नेता कैसे तानाशाह बन गए, उसे भी याद रखना ज़रूरी है। इस्लाम अगर शांति का मज़हब है, तो फिर उसके नाम पर जो हर दूसरे दिन लोगों को मारा जाता है, उस पर इस्लाम चुप कैसे है?

फिर मैं, किताब में क्या लिखा है, और कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो में कौन सी बात कही गई है, उससे क्या मतलब रखूँ? लिखा तो हमारी भी किताबों में बहुत कुछ था जिसमें इसी इस्लामी आतंक की आग लगा दी गई थी। कहने को तो जेएनयू में भी शिक्षा दी जाती है, और स्वतंत्रता है लेकिन वहाँ ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का नारा तो लगता है।

फिर कम्यूनिस्टों के सत्ता से विरोधियों को किसी भी क़ीमत पर हटाने और आईसिस के ख़िलाफ़त के लक्ष्य में कौन-सा अंतर है? दोनों ही रक्तरंजित विचारधाराएँ हैं। उसके लिए इनके मैनिफेस्टो और मार्क्स की दाढ़ी कितनी अच्छी थी पर मैं क्यों स्खलित होता रहूँ, मेरे लिए तो इनके झंडे का लाल रंग उन करोड़ों लोगों की सामूहिक हत्या का रंग है जो इस आतंकी नक्सल माओवादी लेनिनवादी कामपंथी विचार की बलि चढ़ गए।

इसलिए, जब मैं लिखता हूँ कि अब ऐसी क्रांतियों की प्रासंगिकता नहीं है, तब मैं यह कहना चाहता हूँ कि अब दुनिया से ज़ारशाही और राजाओं का चलन जा चुका है। अब सर्वहारा ही वोट कर के अपने नेता को चुनती है। अब सर्वहारा के ही सर पर कोई पार्टी छत ला रही है, कोई सिलिंडर दे रहा है, कोई बिजली पहुँचा रहा है, कोई सड़क, हॉस्पिटल, स्कूल।

आयुष्मान योजना क्या सर्वहारा के लिए नहीं? गरीब किसानों के लिए तमाम योजनाएँ क्या सर्वाहारा के लिए नहीं? गाँवों की सड़कें क्या सर्वहारा के लिए नहीं? घरों में लटकते बल्ब क्या सर्वहारा के लिए नहीं? शौचालय की व्यवस्था और साफ होती गंगा क्या सर्वहारा के हिस्से नहीं आती? करोड़ों छतें क्या सर्वहारा के परिवार के लिए नहीं?

फिर ये कम्युनिस्ट लम्पट, कामांध कामरेड, लेनिन और माओ जैसे आतंकियों को अपना आदर्श मान कर किसका भला करने का लक्ष्य लिए चल रहे हैं? सर्वहारा की बात तो हर पार्टी कर रही है। कॉन्ग्रेस भी ‘गरीबी हटाओ’ ही कह रही है, भाजपा भी हर भारतीय पर 1,08,000 रूपए हर साल सब्सिडी या योजनाओं के नाम पर ख़र्च कर रही है। केजरीवाल, मायावती, अखिलेश, लालू, नायडू, ममता, कुमारस्वामी, योगी, मोदी सब तो ग़रीबों की ही बात कर रहे हैं।

फिर किस सर्वहारा को सत्ता दिलाने की योजना बना रहे हैं वामपंथी? मतलब साफ है कि ये सब चोर हैं, जिनका उद्देश्य कुछ और ही है। सर्वहारा को सत्ता किस वामपंथी या समाजवादी व्यक्ति ने दे दी, ये इतिहास जानता है। लालू जैसा सर्वहारा जब सत्ता में पहुँचा तो न सिर्फ अपने समय का सबसे बड़ा घोटाला किया बल्कि जानबूझकर शिक्षा से पूरी आबादी को वंचित रखा। कानून व्यवस्था की बर्बादी को चरम तक ले गया। बंगाल और केरल की बात पहले कर चुका हूँ।

इसलिए, ये जंगलों में छुप कर, अपने स्वार्थ के लिए, देश को तोड़ने, सरकारों को डीएस्टेबिलाइज करने, और दूसरी तरह के आतंकियों के लिए एक सपोर्ट सिस्टम बन कर खड़े हो रहे हैं। इनका उद्देश्य अब चिरकुटों वाला हो गया है जिसमें ये किसी गाँव वाले को वोट करने से रोक देते हैं तो खुश हो जाते हैं। आने वाले पाँच सालों में इनको कॉम्बिंग कर के जंगलों से घसीट कर निकाला जाएगा, और इस विचारधारा के ताबूत में अंतिम कीलें बहुत जल्द ठोकी जाएँगी। ज़रूरत थी एक सही तरह के सरकार की, जो आतंकी को आतंकी कहे, वामपंथी चरमपंथी उग्रवादी कह कर, उसे डाउनप्ले न करे।

वो सरकार आई तो ये सिमट गए, वो सरकार फिर आएगी, तो ये लाल सलाम कहाँ जाएँगे, ये कहने की आवश्यकता नहीं है।

कूड़े और बस अड्डे से 87 डेटोनेटर बरामद: आखिर कितनी बड़ी तबाही करना चाहते थे आतंकवादी!

श्री लंका में आतंकी संगठनों के मंसूबे कितने खतरनाक स्तर पर बढ़ गए हैं इसकी एक और बानगी आज देखने को मिली है। ईस्टर पर लगभग 300 के करीब लोगों की बम धमाकों में जान लेने के बाद उनकी योजना और भी हमले करने की थी।

पहले केवल 12, फिर कूड़े में 75 और

बैस्टियन मवाता के निजी बस अड्डे में यह डेटोनेटर पेटा की स्थानीय पुलिस ने बरामद किए हैं। उन्हें पहले तो केवल 12 डेटोनेटर बस स्टैंड के अन्दर से मिले (स्थानीय समय के अनुसार लगभग 1 बजे दोपहर के आसपास), पर फिर वहाँ पर पड़े कूड़े के ढेर को हटाने पर पुलिस ने 75 डेटोनेटर और बरामद किए। यह जानकारी मीडिया से बात करते हुए पुलिस के मीडिया प्रवक्ता एसपी रूवन गुणाशेखरा ने दी।

याद दिला दें कि कल सुबह ईस्टर की प्रार्थनाओं के बीच आतंकवादियों ने श्रीलंका में बम धमाके किए थे। गिरजाघरों और होटलों में हुए इन धमाकों करीब 300 लोग मारे गए थे और 500 घायल हुए थे। मरने वालों में 2 भारतीयों समेत लगभग 36 गैर-श्रीलंकाई नागरिक थे। उसके बाद से हाई-अलर्ट पर चल रहा श्रीलंका आज मध्यरात्रि से आपातकाल में चला जाएगा

नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली से मनोज तिवारी के ख़िलाफ़ शीला दीक्षित, कपिल सिब्बल का नाम ग़ायब

कॉन्ग्रेस ने अपने लोकसभा उम्मीदवारों की नई सूची जारी की है। पार्टी ने दिल्ली की छह सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम की घोषणा कर दी है। जहाँ दिल्ली कॉन्ग्रेस की वर्तमान अध्यक्ष शीला दीक्षित नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली से चुनाव लड़ेंगी, वहीं पूर्व अध्यक्ष अजय माकन को नई दिल्ली से उतारा गया है। कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा नई दिल्ली से क्रिकेटर गौतम गंभीर को उतार सकती है। चाँदनी चौक से पिछली बार कॉन्ग्रेस की तरफ़ से कपिल सिब्बल ने चुनाव लड़ा था। पिछले चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे सिब्बल को डॉक्टर हर्षवर्धन से मात मिली थी। दूसरे स्थान पर रहे आम आदमी प्रत्याशी आशुतोष भी इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे। अतः चाँदनी चौक से आप और कॉन्ग्रेस, दोनों के ही नए कैंडिडेट होंगे।

दिल्ली की 6 सीटों के लिए कॉन्ग्रेस प्रत्याशियों की सूची

चाँदनी चौक से सिब्बल की जगह जेपी अग्रवाल पर भरोसा जताया गया। जय प्रकाश अग्रवाल इससे पहले नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली से लोकसभा सांसद रह चुके हैं। 4 बार सांसद रह चुके अग्रवाल ने 1984 में अपना पहला लोकसभा चुनाव जीता था। नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली से शीला दीक्षित के उतरने के बाद अब यहाँ का मुक़ाबला दिलचस्प हो गया है। ये दो राष्ट्रीय पार्टियों के प्रदेश अध्यक्षों की लड़ाई होगी। दोनों ही ब्राह्मण हैं और दोनों ही पूर्वांचल से आते हैं। इस सीट पर पूर्वांचलवासियों की अच्छी-ख़ासी तादाद को देखते हुए कॉन्ग्रेस और भाजपा दोनों ने ही उपयुक्त चेहरे पर दाँव खेला है। दोनों में से किसी की भी हार होने उसकी पार्टी के लिए गँवारा नहीं होगा।

ईस्ट दिल्ली से अरविंदर सिंह लवली को उतारा गया है। दिल्ली कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष रहे अरविंदर सिंह लवली शीला दीक्षित की कैबिनेट में कई अहम मंत्रालय संभाल चुके हैं। बीच में उन्होंने कॉन्ग्रेस छोड़ दी थी और भाजपा में शामिल हो गए थे लकिन अब वो फिर से अपनी पुरानी पार्टी कॉन्ग्रेस में लौटे हैं और इनामस्वरूप उन्हें लोकसभा टिकट थमाया गया है। वेस्ट दिल्ली से महाबल मिश्रा को टिकट दिया गया है। हाल ही में उनके समर्थकों ने कॉन्ग्रेस मुख्यालय पर धरना देते हुए उन्हें टिकट देने की माँग की थी। समर्थकों ने हंगामा मचाते हुए मिश्रा को पूर्वांचल का चेहरा बताया था। कॉन्ग्रेस ने समर्थकों को नाराज़ न करते हुए उन्हें टिकट दे दिया।

महाबल मिश्रा का मुक़ाबला भाजपा के प्रवेश सिंह वर्मा से होगा। पूर्व केंद्रीय मंत्री और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा ने पिछले आम चुनाव में रिकॉर्ड 2,68,586 वोटों से जीत दर्ज की थी। ये दिल्ली आम चुनाव में जीत का सबसे बड़ा अंतर था। प्रवेश ने इसका श्रेय अपने पिता द्वारा किए गए कार्यों और मोदी लहर को दिया था। नॉर्थ-वेस्ट दिल्ली से कॉन्ग्रेस द्वारा राजेश लिलोठिया पर भरोसा जताया गया है। आम आदमी पार्टी से गठबंधन के विरोधी रहे लिलोठिया दिल्ली कॉन्ग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं।

बता दें कि कल रविवार (अप्रैल 21, 2019) को ही भाजपा ने भी दिल्ली की 4 सीटों के लिए प्रत्याशियों के नामों का ऐलान किया था। भाजपा की सूची में मनोज तिवारी, प्रवेश वर्मा, डॉक्टर हर्षवर्धन और रमेश बिधुरी को जगह मिली है। वहीं इंदौर से 8 बार लगातार जीत चुकीं सुमित्रा महाजन ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है।

VIDEO: तेजस्वी की रैली में लोगों ने लगाए ‘मोदी-मोदी’ के नारे, कहा ‘यहाँ तो जहाज देखने आए हैं’

बिहार में पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव की रैली में आए लोगों ने ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगाए। दरअसल, तेजस्वी की रैली में अच्छी-ख़ासी भीड़ थी लेकिन जब लोगों से पूछा गया कि क्या वे राजद समर्थक हैं, तो उन्होंने कहा कि वो तो बस ‘जहाज’ देखने आए हैं। जहाज से उनका तात्पर्य नेताओं के हेलीकॉप्टर से था। लोगों ने कहा कि चूँकि ‘सब कुछ मोदी ने किया है’, इसी लिए वो मोदी को ही वोट करेंगे। सभा में उपस्थित किशोरों व अन्य युवाओं ने भी मोदी को वोट करने की बात कही। इसके बाद सभी ‘मोदी-मोदी’ के नारे भी लगाने लगे। नीचे इंडिया टीवी के एंकर सुशांत सिन्हा द्वारा शेयर किए गए वीडियो में आप देख सकते हैं कि कैसे तेजस्वी की रैली में आए लोग मोदी के गुण गाए जा रहे हैं।

सुशांत सिन्हा ने राजद पर चुटकी लेते हुए कहा कि लोग शूटिंग किसी और फ़िल्म की देख रहे हैं और टिकट किसी और फ़िल्म का ही ख़रीद रहे हैं। बता दें कि बिहार में राजग के ख़िलाफ़ कॉन्ग्रेस, राजद, रालोसपा, हम और वीआईपी ने महागठबंधन बनाया है। बग़ावत झेल रही कॉन्ग्रेस की हालत वैसे भी यहाँ पस्त नज़र आ रही है। पारिवारिक विवादों से घिरे यादव परिवार में भी सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। लालू यादव जेल में हैं। ऐसे में राजद नेताओं का कुनबा लगभग बिखरने के कगार पर है।

वहीं दूसरी तरफ़ नीतीश-मोदी के चेहरे के साथ राजग पूरे दम-खम से चुनावी समर में उतर चुका है। स्टार प्रचारक लगातार उड़ान भर रहे हैं। प्रधानमंत्री की भी रैलियाँ हुई हैं। अमित शाह ने कहा है कि इस बार राजग बिहार में 2014 से ज्यादा सीटें जीतेगा।