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हम रैली में कुर्सियाँ किराए पर लाते हैं और कॉन्ग्रेस वाले नेताओं को किराए पर: देवेंद्र फडणवीस

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने नांदेड़ में एक चुनावी सभा में MNS और कॉन्ग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि नेताओं को किराए पर लाने का श्रेय कॉन्ग्रेस के अशोक चव्हाण को जाता है, वे उन नेताओं को MNS (महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना) से ​​ला रहे हैं। MNS पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि MNS पहले ‘महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना’ थी फिर MNS ‘मतदाता नहीं सेना’ (Matdata Nahi Sena) बन गया और अब यह UNS “उम्मीदवार नहीं सेना” (Ummidwar Nahi Sena) बन गया है।

फडणवीस ने कॉन्ग्रेस को घेरते हुए कहा कि प्रदेश में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन के पक्ष में माहौल ऐसा है कि कॉन्ग्रेस के अशोक चव्हाण लोगों को रैलियों में लाने के लिए किराया दे रहे हैं। हम किराए पर मंच और कुर्सियाँ ​​लाते हैं, लेकिन अशोक चव्हाण की शुक्रवार की रैली में नेताओं को किराए पर लाना पड़ रहा है। पूरा माहौल NDA के पक्ष में है। महाराष्ट्र में NDA भारी सीटों से जीत दर्ज करेगी।

किस तरह हर दिन हम मौत की तरफ बढ़ रहे हैं, वजह प्रदूषण: रामनवमी पर पर्यावरण बचाने की सार्थक पहल

अप्रैल का महीना अपने कई खूबियों के कारण जाना जाता है। इनमे से एक है अप्रैल के महीने में अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को फूल (उल्लू) बनाना और दूसरी विषेशता है अप्रैल के महीने से मौसम का गर्म होना। अप्रैल के महीने में रामनवमी के अवसर पर अप्रैलकूल के नाम से एक कैम्पेन की शुरुआत की गई है।  जिसका मुख्य उद्देश्य अप्रैल के गर्म होते महीने को कूल बनाना है जिससे हमारा वातावरण और हमारी धरती कूल रह सके। जब हमारी धरती कूल रहेगी तभी इसपे रहने वाले जीव भी कूल रह सकेंगे।

रामनवमी के अवसर पर शुरू किए गए इस अप्रैलकूल कैम्पेन के तहत लोगों से अपील है  एक पौधा लगाने की और सोशल मीडिया (फेसबुक, व्हाट्सप्प, इंस्टाग्राम) पर अपने लगाए पौधे कि तस्वीर के साथ aprilcool टैग लाइन लगाकर अपने दोस्तों एवं रिश्तेदारों से शेयर करना की,  ठीक वैसे ही जैसे आप होली दिवाली या अन्य त्योहारों पर तस्वीरें शेयर करके करते हैं।

अप्रैलकूल कैम्पेन का महत्व इस मायने में भी बढ़ जाता है कि आज हमारा वातावरण इतना प्रदूषित हो गया है कि हम खुल कर साँस भी नहीं ले पाते, ऐसा लगता है कि हमारे घरों में विषैली गैसों की एक चादर फैली है जिसमे हम सभी जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। हम इंसानो का पूरा जीवन पूरी तरह से प्रकृति पर आश्रित है लेकिन हमें जीवन देने वाले वातावरण से हम सौतेला व्यवहार करते है जिसका परिणाम अब लगातार घातक साबित होता जा रहा है।

ऐसे माहौल में बागवानी फाउंडेशन की यह मुहीम राहत की खबर है। खासतौर से बड़े शहरों में जहाँ पेड़ लगाने की उतनी सहूलियत नहीं है। वहाँ यह सवाल लाज़मी है कि इतनी गर्मी में हम पौधे कैसे लगा सकते हैं वह तो गर्मी में मर जाएँगे। इस सन्दर्भ में बागवानी फाउंडेशन ने जवाब दिया है कि हम अभी इंडोर प्लांट्स लगा सकते हैं जो घर के अंदर रखे जाते हैं। ये पौधे बेस्ट एयर प्यूरीफायर भी होते हैं। इंडोर लगाने के लिए कुछ बेस्ट प्लांट्स हैं- मनी प्लांट, पीस लिली, स्नेक प्लांट, बम्बू पाम, स्पाइडर प्लांट्स इत्यादि।  ये पौधे न सिर्फ हवा को स्वच्छ करने में अन्य पौधों से ज्यादा सक्षम है, बल्कि यह हमारे घर की सुन्दरता को भी बढ़ाते हैं।

कहते हैं कि सम्भावनाओ से भरी ज़िन्दगी की डोर आती-जाती साँसों पर टिकी होती है और इन सांसों का आधार है, हरा-भरा वातावरण यानि  पर्यावरण। साँसों के माध्यम से हम जो कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं वो पौधे ग्रहण कर लेते हैं और उसके बदले में वो हमें देते हैं बेशकीमती ऑक्सीज़न।

एक अनुमान के अनुसार एक स्वस्थ पेड़ से 260 पौंड ऑक्सीज़न हर साल हमें मिलता है। इस तरह के दो पेड़ दो से तीन लोगों की ऑक्सीज़न की जरूरतों को पूरा करते हैं। यानी  जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है वैसे-वैसे हमारे लिए पौधे और बेहतर पर्यावरण की आवश्यकता भी बढ़ गयी है। हम सब पर्यावरण को अपने-अपने ढंग से जानते और समझते हैं। पर्यावरण यानि जो प्राकृतिक रूप से हमारे चारों तरफ है और पृथ्वी पर हमारे रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करता है।

हवा, जिसमें हम हर पल साँस लेते हैं। पानी, जिसे हम अपनी दिनचर्या में इस्तेमाल करते हैं। पौधे, जानवर और सभी जीवित चीजें सब पर्यावरण पर ही आश्रित हैं। स्वस्थ वातावरण प्रकृतिक संतुलन बनाए रखता है और साथ ही साथ पृथ्वी पर सभी जीवित चीजों को बढ़ने और विकसित होने में मदद करता है।

पर्यावरण मुख्य रूप से वायुमंडल, जलमंडल, स्थलमंडल और जीवमण्डल से मिलकर बना है। पर्यावरण हमारे लिए कई तरह से उपयोगी है। इससे हमें उद्योगों के लिए कच्चा माल मिलता है, नई दवाइयों के निर्माण और मेडिकल रिसर्च के लिए कई प्रकार की उपयोगी चीजें मिलती हैं। सौंदर्य और मनोरंजन जैसे जरूरतों को भी पूरा करने के लिए पर्यावरण कई स्तरों पर हमारे लिए सहायक है। पर्यावरण हमारी शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास में भी अहम् है। गौरवशाली परम्परा और अनूठी संस्कृति के देश भारत में पर्यावरण को  विशेष महत्व दिया गया है।

प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में पर्यावरण के अनेक घटकों जैसे वृक्षों को पूज्य मानकर उन्हें पूजा जाता है। जल, वायु ,अग्नि को भी पवित्र मानकर उनकी पूजा की जाती है। समुद्र और नदी को भी आराधना योग्य माना गया है। धरती को भी माँ का अमूल्य स्थान दिया गया है।

लम्बे समय से ही भारत में पर्यावरण के अलग अलग रूपों को उनके विशेष गुणों के कारण खास स्थान दिया गया है। समय के साथ पर्यावरण का संतुलन गड़बड़ा सा गया है। पर्यावरण के इस बिगड़ते स्वरुप के पीछे ढेर सारे कारण है। आधुनिक होते समाज में पर्यावरण की समस्या विकासशील राष्ट्रों की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की समस्या बन गयी है। सभी ऋतुएँ अपने अस्तित्व को खोती नज़र आ रही है। समय पर ठण्ड नहीं पड़ना, गर्मी में बहुत ज्यादा गर्मी, वर्षा का समय पर न आना या कहीं-कहीं बेमौसम अधिक वर्षा होना, कहीं अकाल की स्थिति पैदा होना। ये सब पर्यावरण में बदलाव का ही नतीजा है।  पर्यावरणीय समस्याओं से मनुष्य और दूसरे जीवधारियों को अपना सामान्य जीवन जीने में कठिनाई होने लगती है और कई बार जीवन-मरण का सवाल पैदा हो जाता है।

प्रदूषण भी एक पर्यावरणीय समस्या है जो आज एक विश्व-व्यापी समस्या बन गयी है। पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और इंसान सब उसकी चपेट में हैं। कारखानों बिजली घरों और मोटर वाहनों में खनिज ईंधनों का अंधाधुंध प्रयोग होता है, इनके जलने पर कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड आदि खतरनाक गैसें निकलती हैं जिससे धरती का तापमान बढ़ रहा है और मौसम में असामान्य बदलाव हो रहा है।

पिछले सौ सालों में वायुमंडल का तापमान 3 से 6 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। लगातार बढ़ते तापमान से दोनों ध्रुवों पर बर्फ गलने लगेगी जिससे कई देशों की डूबने की सम्भावना बढ़ गयी है। इसके आलावा कुछ क्षेत्रों में सुखा पड़ेगा तो कई जगहों पर तूफ़ान आएगा और कहीं भरी वर्षा हो सकती है।

उद्योगों से निकलने वाली विषैली गैसों से वायु प्रदूषण कई गुना बढ़ गया है जिससे पर्यावरण और जीव-जंतुओं को भारी नुकसान पहुँच रहा है। एक अध्यन के अनुसार वायु प्रदुषण से केवल 36 शहरों में प्रतिवर्ष 52,7739 लोगों की अकाल मृत्यु हो जाती है। कोलकता , कानपुर तथा हैदराबाद में वायु प्रदूषण से होने वाली मृत्यु पिछले 3-4 सालों में दुगुनी हो गई है। एक अनुमान के अनुसार हमारे देश में प्रदूषण के कारण हर दिन करीब 150 लोग मरते हैं और सैकड़ों लोगों को फेफड़े और हृदय की जानलेवा बीमारी हो जाती है।

आपको जानकर आश्चर्य होगा की हवाई जहाज से सबसे अधिक प्रदुषण होता है। 46 हजार हेक्टेयर में फैले जंगल से जितना ऑक्सीजन निकलता है उतना एक दिन में एक हवाई जहाज द्वारा कार्बन-डाइऑक्साइड का उत्सर्जन वायुमंडल में हो जाता है। कोयला डीजल, पेट्रोल के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में दिनों-दिन वृद्धि हो रही है जिसके कारण रोज़ एक प्रजाति लुप्त हो रही है।

औद्योगिकीकरण और शहरीकरण से जुडी एक और समस्या है जल-प्रदूषण। भारत में ऐसी कई नदियाँ हैं जिनका जल अब अशुद्ध हो गया है। दूषित पानी पिने से ब्लड कैंसर, त्वचा कैंसर, हड्डी रोग , हृदय एवं गुर्दों की तकलीफें और पेट की अनेक बीमारियाँ हो रही हैं जिनसे हमारे देश में हजारों लोग हर साल मर रहे हैं। एक और पर्यावरणीय समस्या है वनों की कटाई। पूरे विश्व में प्रतिवर्ष 1.1 करोड़ हेक्टेयर वन काटा जा रहा है। अकेले भारत में प्रतिवर्ष 10 लाख हेक्टेयर वन कटा जा रहा है। वनों के विनाश के कारण वन्य जीव लुप्त हो रहे हैं।

पर्यावरण के बिगड़ते स्वरुप के पीछे एक और अहम् कारण हैं, रासायनिक उर्वरकों का जरुरत से ज्यादा प्रयोग। इसके लगातार प्रयोग से भूमि की उर्वरा-शक्ति लगातार घट रही है वहीं  कई बार तो ये भी देखा गया है कि इनके लगातार प्रयोग से भूमि बंजर भी हो जाती है। धरती सीमित है और जब भूमि ही अपनी उर्वरा शक्ति खो देगी तब भला हम हरे-भरे वातावरण की कल्पना कैसे कर सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया हुआ है।

इस समस्या से उबरने के लिए पूरी दुनिया को एक होने की जरुरत है, हम सब को अपने अपने स्तर पर कोशिश करते रहने की जरुरत है। हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने के पीछे भी यही मकसद है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक किया जा सके। लेकिन साल के किसी एक दिन को इस तरह की दिवस मनाकर हम इस विकराल समस्या को नही सुलझा सकते, इसके लिए पूरे वर्ष सतत प्रयास करते रहने की जरूरत है।

इसी को ध्यान में रखते हुए टीम बागवानी के डेडिकेटेड टीम ने अप्रैल में अप्रैल कूल से शुरुआत कर 5 जून तक लोगों में पेड़ लगाने के प्रति जागरूकता फ़ैलाने की मुहीम को तेज करने का निर्णय लिया है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रौढ़ शिक्षा विभाग के प्रांगण में इस टीम ने कई पौधे एक साथ लगाए और इनको एक खूबसूरत स्वरूप देने की पहल की। कुमार राम और विशाल कुमार गुप्ता नाम के इन दो युवकों ने इससे पहले भी कई दफा ऐसे पौधारोपण कार्यक्रम करके कई शिक्षकों और दूसरे युवाओं को प्रेरित करने का काम किया है। ऐसी सकारात्मक ऊर्जा से सराबोर युवाओं को सतत ऐसे कार्य करते रहने के लिए हम सभी को इन्हें प्रोत्साहित करने की जरूरत है।

कुछ उपायों को अमल में लाकर हम पर्यावरण के स्वरुप को बिगड़ने से बचा सकते हैं। युवा वर्ग आगे आकर सकारात्मक योगदान दे सकते हैं। सही मायनो में गो-ग्रीन कहने के लिए ही नही बल्कि करने में भी आसान है। आज के समय में पर्यावरण का ध्यान रखना हर किसी की जिम्मेदारी और अधिकार होना चाहिए और खासकर आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण का संरक्षण बहुत जरुरी है तो आइए एक शपथ लें की हम सब अपने अपने स्तर से पर्यावरण को बचाने की पूरी कोशिश करेंगे जिससे बनेगा हरा भरा वातावरण और खुशहाल पर्यावरण।

इस रामनवमी के अवसर पर फिलहाल अप्रैलकूल कैंपेन से जुड़े और अपने दोस्तों, रिश्तेदारों को भी जोड़ें क्योंकि कोई अकेला हमारे पर्यावरण को स्वच्छ एवं स्वस्थ नहीं कर सकता। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सभी का योगदान अनिवार्य है।

“धरती हो रही गर्म,
सासें होने लगी कम
आओ पेड़ लगाए हम……”      

J&K: कुरैशी वर्षों करता रहा बेटी का रेप, पीड़िता ने दे दी जान; चाचा अयूब भी करता है अपनी बेटी का रेप

कश्मीर घाटी के बांदीपोरा से एक वहशी पिता की शर्मनाक वारदात की कहानी सामने आयी है। बांदीपोरा के चल्लीवान गोजारपति आरामबाग एरिया में शनिवार (अप्रैल 13, 2019) को लड़की ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। बताया जा रहा है कि लड़की ने पिता वलायत कुरैशी द्वारा कई सालों से लगातार बलात्कार किए जाने पर शनिवार को आत्महत्या कर ली।

मृतक लड़की की बहन ने बताया कि उसके पिता पिछले कई सालों से उसके साथ बलात्कार कर रहे थे पर पिता द्वारा जान से मारे जाने की धमकी के डर से वह किसी को अपनी आपबीती नहीं बता पा रही थी। पुलिस ने बताया कि पीड़ित लड़की ने जहर खाकर आत्महत्या की। लड़की को अस्पताल में भरती कराया गया, लेकिन बचाया नहीं जा सका। आरोपित पिता (वलायत कुरैशी) को गिरफ्तार कर लिया गया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार पीड़ित लड़की का साथ उसके पिता वलायत कुरैशी अपनी बेटी के साथ कई सालों से लगातार बलात्कार कर रहा था। जिसकी वजह से वह मानसिक रूप से परेशान थी। लड़की को जब एहसास हुआ कि उसका पिता मानने वाला नहीं है, उसने छत से कूदकर जान देने की कोशिश की, लेकिन पड़ोसियों ने देख लिया और बचा लिया था। इसके बाद लड़की ने 2 दिन पहले थाने में रिपोर्ट भी दर्ज कराने की कोशिश की थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई। इन सभी घटनाक्रमों के बाद उसने उसने जहर खाकर खुदकुशी कर लेना ही बेहतर समझा।

पुलिस ने लड़की की लाश को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। पुलिस का दावा है कि आरोपित पिता के खिलाफ केस दर्ज कर उसको गिरफ्तार कर लिया गया है। जबकि स्थानीय पड़ोसी उसको फरार बता रहे हैं, इस घटना के बाद पूरे इलाके में जबरदस्त रोष है और वो आरोपी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

चाचा अयूब भी करता है अपनी बेटी से बलात्कार

पीड़िता की बहन का कहना है कि उसके चाचा अयूब कुरैशी भी अपनी बेटी के साथ बलात्कार करते थे। उसने कहा, “जब मेरे पिता को मेरे चाचा के बारे में पता चला, तो उन्होंने अपनी बेटी के साथ भी ऐसा ही करना शुरू कर दिया। वह पिता के सामने गिड़गिड़ाई लेकिन उन्होंने उसे जान से मारने की धमकी दी।”

वेतन ₹69, सुरक्षा का खर्चा ₹156 करोड़: ज़ुकरबर्ग की ‘सादगी’ के क्या कहने

$1 (₹69) का सालाना वेतन लेने वाले फेसबुक के सीईओ मार्क ज़ुकरबर्ग अपनी सुरक्षा पर सवा दो करोड़ डॉलर (₹156 करोड़) से ज्यादा राशि खर्च करते हैं। 2018 में इतनी राशि के खर्च का खुलासा फ़ेसबुक द्वारा हाल में की गई नियामक फाइलिंग में किया गया।

प्राइवेट जेट के लिए ₹18 करोड़, बाकी का ‘बाकी सब’

समाचार एजेंसी रायटर्स में छपी एक खबर के अनुसार $26 लाख (₹18 करोड़) ज़ुकरबर्ग को यात्रा के दौरान प्राइवेट जेटों के प्रयोग पर भत्ते के रूप में दिए गए, जो कि उनकी सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं। बाकी के खर्चे के बारे में केवल इतनी जानकारी मिली है कि वह राशि ज़ुकरबर्ग और उनके परिवार की सुरक्षा के इंतजाम में खर्च हुई है।

2017 के मुकाबले तीन गुना खर्च, तीन साल से ‘$1’ से चल रहा आटा-दाल

पिछले एक साल में ज़ुकरबर्ग की सुरक्षा का खर्च एकाएक लगभग तीन गुना बढ़ गया है। पिछले साल उन्होंने सुरक्षा भत्ते के नाम पर कंपनी से $90 लाख (₹62 करोड़) लिए थे।

हैरानी की बात यह है कि पिछले तीन साल से वह फेसबुक से सीईओ के वेतन के तौर पर केवल $1 (₹69) का सालाना वेतन ले रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है कि जिस व्यक्ति को केवल अपनी जान सलामत रखने के लिए ₹150 करोड़ से ज्यादा चाहिए, वह ज़ाहिर तौर पर 70 रुपए में साल भर का खाना-रहना तो नहीं कर रहा होगा। तो बेहतर होगा कि ज़ुकरबर्ग अपने वेतन को ‘सांकेतिक’ कर दूसरे मार्गों से वही पैसा वाहवाही लूटने के बाद लेने की बजाय खुल कर मुनाफ़े में हिस्सा या वेतन लें।

यह सांकेतिक वेतन की virtue signalling कर नैतिक श्रेष्ठता के छद्म प्रतिमान खड़े वही करते हैं जिन्हें बाद में इस ‘कमाई’ को ‘कैश’ कराना होता है।

जब सोनिया गाँधी ने चुनाव में फर्जी कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी को कोर्ट में बताया था ‘टाइपिंग मिस्टेक’

लोकसभा चुनावों के बीच नेताओं की डिग्री और शैक्षणिक योग्यता एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। कॉन्ग्रेस पार्टी प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी ने केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की डिग्री को लेकर सोशल मीडिया पर कुछ प्रश्न उठाए। इसके बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं का सैलाब उमड़ पड़ा।

सबसे पहली प्रतिक्रिया भाजपा नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से आई। स्वामी ने कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी की ही डिग्री को कटघरे में रखकर कल रात ट्वीट करते हुए लिखा, “बुद्धु (राहुल गाँधी) के कैम्ब्रिज सर्टिफिकेट के मुताबिक उसका नाम रौल विंसी है। उन्होंने एम.फिल की पढ़ाई की है, लेकिन वो नेशनल इकोनॉमिक प्लानिंग एंड पॉलिसी में फेल हो गए थे।”

राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी पहले भी गाँधी परिवार के सदस्यों की शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठाते रहे हैं। इससे पहले स्वामी राहुल गाँधी की मम्मी सोनिया गाँधी की शैक्षणिक योग्यता पर से पर्दा उठा चुके हैं।

सोनिया की लोकसभा सदस्यता समाप्त होने तक आ गई थी बात

साल 2000 की शुरुआत में सुब्रमण्यम स्वामी ने तत्कालीन UPA अध्यक्ष सोनिया गाँधी की डिग्री को लेकर तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष से शिकायत की थी। साथ ही सुप्रीम कोर्ट में गलत जानकारी देने के आधार पर उनकी लोकसभा सदस्यता खत्म करने की गुहार लगाई थी। इसके बाद से सोनिया गाँधी की पढ़ाई और डिग्री को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

दरअसल, स्वामी ने तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष मनोहर जोशी के पास सोनिया गाँधी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराकर कहा था, “लोकसभा पेज के ‘Who is who’ यानी ‘कौन क्या है’ सेक्शन में लिखा है कि सोनिया गाँधी ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में डिप्लोमा किया था।

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने बताया था कि सोनिया गाँधी ने वहाँ कभी पढ़ाई नहीं की

स्वामी के मुताबिक उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से इस बारे में जानकारी माँगी थी। इसके जवाब में यूनिवर्सिटी ने बताया था कि सोनिया ने वहाँ कभी पढ़ाई ही नहीं की है। स्वामी ने बताया कि जब वह कैम्ब्रिज में लेक्चर देने गए थे, तब उन्होंने सोनिया के बारे में लोगों से पूछा कि वह कैसी स्टूडेंट थीं, तो जवाब में बताया गया कि ऐसी तो यहाँ कोई स्टूडेंट नहीं थीं।

सुब्रमण्यम स्वामी इसी मामले को लेकर वह कैम्ब्रिज अथॉरिटी से एक खत भी लिखवाकर लाए थे। सोनिया गाँधी द्वारा अपनी एजुकेशन को लेकर इलेक्शन एफिडेविट में झूठी जानकारी देने के मामले पर सुब्रमण्यम स्वामी कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी का खत लोकसभा में पेश भी किया था। जब लोकसभा स्पीकर ने सोनिया गाँधी से डिग्री को लेकर सवाल किया तो सोनिया ने इसे ‘टाइपिंग मिस्टेक’ (Typo Error) बताया था। स्वामी ने इस पर व्यंग्य करते हुए कहा था कि ऐसी टाइपिंग मिस्टेक करने वालों को गिनीज बुक में जगह देनी चाहिए।

तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष ने स्वामी की शिकायत पर स्पष्टीकरण के लिए सोनिया गाँधी से पत्राचार किया। उस वक्त सोनिया गाँधी के हवाले से जवाब दिया गया था कि उन्होंने ‘कैम्ब्रिज’ से डिग्री ली है न कि ‘कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी’ से। सोनिया गाँधी का कहना था कि लोकसभा पब्लिकेशन में यूनीवर्सिटी शब्द गलती से छप गया है।

स्मृति ईरानी को लेकर गरमाया है मुद्दा

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के चुनावी हलफनामे में बताई गई शैक्षिक योग्यता को लेकर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी विपक्ष के निशाने पर है। कॉन्ग्रेस ने स्मृति ईरानी पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए उनके इस्तीफे की माँग की है। इसके बाद स्वामी ने एक ट्वीट करते हुए कॉन्ग्रेस की बोलती बंद कर डाली जिसमें उन्होंने लिखा, “बुद्धू ने भी अपने नॉमिनेशन फॉर्म में गलत जानकारी देते हुए दावा किया है कि उसके पास एमफिल की डिग्री है। वह प्री-थीसिस एग्जाम में फेल था, इसलिए उसे थीसिस लिखने की इजाजत नहीं मिली। उसे कहो कि अपनी थीसिस पेश करे या फिर एग्जाम के नतीजे के सबूत दिखाए।”

कॉन्ग्रेस स्मृति ईरानी को लगातार निशाने पर रखते हुए उन पर हर तरह के आरोप लगाती नजर आती है। इस पर स्मृति ईरानी ने विपक्ष पर पलटवार करते हुए कहा कि भले ही उन्हें कितना भी अपमानित और प्रताड़ित किया जाता रहे, वह अमेठी के लिए और कॉन्ग्रेस के खिलाफ मेहनत से काम करती रहेंगी।

डिग्री के विवाद पर इससे पहले कॉन्ग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, ”समस्या यह नहीं है कि कोई कितना पढ़ा है, लेकिन जब इस देश की प्रजातांत्रिक प्रणाली को धोखा देकर, झूठ बोलकर जनता की आँख में धूल झोंकने की कोशिश की जाती है तो दिक्कत है।” सुरजेवाला अगर प्रजातांत्रिक प्रणाली के प्रति इतने संवेदनशील हैं, तो उन्हें पहले पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी जी से कैम्ब्रिज और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के बीच के अन्तर पर चर्चा करनी चाहिए।

सियाचिन के परमवीर: ऑपरेशन मेघदूत से लेकर अब तक की कहानी

जब हम और आप मौसम का मजा लेते हुए ठण्ड में गुनगुनी धूप में बैठ कर तिल गुड़ के लड्डू खा रहे होते हैं और हमारे बच्चे वर्जनाओं से मुक्त आकाश में खिलवाड़ की पतंग उड़ा रहे होते हैं तब देश की सरज़मीं के एक कोने में भारतीय सेना की सियाचिन ब्रिगेड के अफ़सर और जवान उत्सव मनाने की हमारी इसी स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।

ठण्ड उनके लिये भी होती है और हमारे लिये भी, बस अंतर होता है रंग का। हम गुलाबी ठण्ड में भी ठिठुरने लगते हैं और वे -55 डिग्री की काली ठण्ड में मुस्तैद होते हैं। ये कहानी है अदम्य शौर्य, साहस और उन अनगिनत बलिदानों की जिनके बारे में भारत सरकार भी आपको पूरी बात नहीं बताती।

सियाचिन एक ग्लेशियर है जिसका मतलब होता है एक बहुत बड़ा सा बर्फ का टुकड़ा जो धीरे धीरे पहाड़ से नीचे सरकता हुआ पिघलता है। सियाचिन ग्लेशियर 75 किमी लम्बा है और 23000 से 12000 फ़ीट ऊंची ढलान पर स्थित है। 10,000 वर्ग किमी का ये क्षेत्र सिंधु नदी को जीवित रखने में भी सहायक है क्योंकि जैसे जैसे ग्लेशियर पिघलता है उसका पानी नदी में मिल जाता है।

यदि आपने कभी कश्मीर का नक्शा देखा है तो आप ‘नियंत्रण रेखा’ से परिचित होंगे जिसे LoC कहा जाता है। द्रास कारगिल से होती हुई 759 किमी लम्बी नियंत्रण रेखा जब ऊपर पहुँचती है तो एक बिंदु को छूती है जिसे Point NJ9842 कहा जाता है। ये सियाचेन के त्रिकोणनुमा क्षेत्र का एक छोर है।

सन् 1949 के कराची समझौते और 1972 के शिमला समझौते में इस बात पर सहमति बनी कि इस बिंदु (NJ9842) के उत्तर में स्थित सियाचिन किसी भी प्रकार से मनुष्य के बसने लायक नहीं है इसलिए NJ9842 से ऊपर जाती हुई नियंत्रण रेखा त्रिकोण के दूसरे सिरे को छुएगी जिसे इंदिरा कोल कहा जाता है। समझौते में लिखा था ‘thence northward’, इन्हीं दो शब्दों के पीछे पाकिस्तान ने चाल चली। उत्तर की ओर जाने का अर्थ था कि LoC पहाड़ों से होकर जाएगी। लेकिन पाकिस्तान ने धोखे से यह समझाने की कोशिश की कि ‘thence northward’ का अर्थ LoC का घाटी से होकर जाना है।

Image Credit: Wikipedia. Not to scale.

जब 1975 में शेख अब्दुल्ला कश्मीर के मुख्यमंत्री थे तब कुछ जर्मन सिंधु नदी में राफ्टिंग करने के लिए जाना चाहते थे। इसके लिये अब्दुल्ला ने कर्नल नरेन्द्र कुमार को बुलाया। ये अभियान पूरा होने के बाद कर्नल कुमार ने 1977 में कंचनजंघा को फतह किया। तब तत्कालीन थलसेनाध्यक्ष टी एन रैना ने उन्हें High Altitude Warfare School का चार्ज सौंप दिया।

किस्मत से उसी वक़्त वही जर्मन पर्वतारोही उनसे मिले जिनके साथ उन्होंने सिंधु में राफ्टिंग की थी। इस बार वे सियाचिन से निकलने वाली नुब्रा नदी में राफ्टिंग के लिये आये थे। उनसे कर्नल कुमार को कुछ नक्शे मिले जो उन्होंने जर्मनों से कुछ पैसे देकर खरीद लिये थे। अमरीका में छपे इन नक्शों में नियंत्रण रेखा को NJ9842 के उत्तर में इंदिरा कोल तक न दिखा कर पूर्वोत्तर में कराकोरम पास तक दिखाया गया था। कराकोरम इस त्रिकोण का अंतिम छोर था और इसका मतलब था कि कोई हमारी ज़मीन को अपना बता रहा था।

वो पाकिस्तान था। इस तरह जो विवादित त्रिकोण बना वही दुनिया का सबसे ऊँचा और दुर्गम युद्ध स्थल है- सियाचिन। कर्नल नरेंद्र कुमार को एक टोही दल की कमान देकर 1978 में सियाचेन भेजा गया तो उन्होंने पाया की वहां पहले भी पर्वतारोही अभियान आ चुके हैं। उन्हें बोतल पैकेट सहित कई सामान मिले जिनसे ये बात पुख्ता हुई कि और कोई नहीं बल्कि पाकिस्तानी अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रहे थे।

सब कुछ विश्लेषण करने के बाद अपनी ज़मीन वापस पाने के लिये 13 अप्रैल 1984 को बाकायदा ऑपरेशन मेघदूत चलाया गया जिसकी नायक थे लेफ्टिनेंट जनरल प्रेम नाथ हून और लेफ्टिनेंट कर्नल डी के खन्ना। तब से हमारी सेनाएँ सियाचिन की रखवाली कर रही हैं। सियाचिन में दोनों तरफ की कई पोस्ट हैं जिन पर सैनिक तैनात रहते हैं। तीन साल बाद 18 अप्रैल 1987 को पाकिस्तानियों ने ‘क़ायद’ पोस्ट से हमला कर हमारे 2 जवानों को मार दिया था। इस पोस्ट का नाम उन्होंने क़ायदे आज़म के नाम पर रखा था।

इस पोस्ट को नेस्तनाबूद करने में सेकंड लेफ्टिनेंट राजीव ने प्राणों का बलिदान दिया था जिसके बाद इस ऑपरेशन को ही ऑपरेशन राजीव नाम दिया गया। इस ऑपरेशन में विजय दिलाने वाले नायब सूबेदार बाना सिंह को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया और पाकिस्तान से छीनी गयी उस पोस्ट का नामकरण ‘बाना टॉप’ कर दिया गया।

इस पर बेनज़ीर भुट्टो ने ज़िया-उल-हक़ को बुर्क़ा पहनने की नसीहत दे डाली थी। ऐसी कई कहानियां हैं वीरों की जो फिसलती बर्फ पर मशीन गन थामे दुश्मन की आँख पर नज़र रखते हैं। साल 2003 से होविट्ज़र तोपें शांत हैं। डॉ कलाम पहले राष्ट्रपति थे जो सियाचेन गए थे। कुछ पूर्वाग्रही सामरिक विशेषज्ञ सियाचिन को बर्फ में जारी बेमानी जंग मानते रहे हैं।

वहाँ चमड़ी काली पड़ जाती है और तरल जैसी चीज़ बड़ी मुश्किल से गले के नीचे उतरती है। हेलिकॉप्टर गर्मियों की बजाए सर्दियों में ज्यादा कुशलता से काम करते हैं। उपासना के लिये एक ‘ओपी बाबा’ का मन्दिर है जिसमें मनुष्य की प्रतिमा में देवता बसते हैं। बेस से ऊपर ग्लेशियर में जाने से पहले सिखाया जाता है- “पेट में रोटी, हाथ में सोंटी, चाल छोटी-छोटी” अर्थात पेट में भोजन भरपूर होना चाहिए, हाथ में स्टिक होनी चाहिए ताकि बर्फ पर पकड़ बनी रहे और छोटे-छोटे कदमों से चलना चाहिए।

कुछ अंतर्राष्ट्रीय संगठन वहां वैज्ञानिक प्रयोगों के लिये भी प्रयासरत हैं। सवाल उठाया जाता है कि सियाचिन के उस पार क्या है- आत्मरक्षा, शत्रु से दोस्ती या मानव हित? कुछ सामरिक चिंतक यह मानते रहे हैं कि भारत को सियाचिन पर से अपना दावा छोड़ देना चाहिए। लेकिन आज भारत विश्व शक्ति बनने की ओर अग्रसर है और हमारे वीर सैनिक सियाचिन पर काम करने के अभ्यस्त हो चुके हैं। आज हमें विश्व की सबसे ऊँचे युद्धस्थल पर सामरिक लाभ की स्थिति में हैं। ऐसे में कितनी भी दुर्गम परिस्थितियाँ हों हम अपनी ज़मीन नहीं छोड़ सकते। वास्तविकता यह है कि हमारी सैन्य उपस्थिति के कारण आज पाकिस्तान सियाचिन ग्लेशियर पर है ही नहीं। पाकिस्तान नीचे घाटी में है और इस कारण हमें सामरिक लाभ मिलता है।

सन 2005 में डॉ मनमोहन सिंह सियाचेन का विसैन्यीकरण (demilitarization) कर उसे ‘माउंटेन ऑफ पीस’ बनाना चाहते थे। इसका खुलासा संजय बारु के अतिरिक्त श्याम सरन ने भी अपनी पुस्तक ‘How India Sees the World’ में किया है। गत वर्ष श्याम सरन के इस खुलासे पर विवाद हुआ था जिसके बाद पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल जे जे सिंह को स्पष्टीकरण देना पड़ा था। बहरहाल, जनरल सिंह के तर्कों को फिलहाल किनारे रखकर देखा जाए तो सियाचेन के विसैन्यीकरण का निर्णय अकेले भारतीय सेना तो ले नहीं सकती थी। मनमोहन सिंह और उनकी रणनीतिक टीम इस प्रकार के आत्मघाती निर्णयों के वास्तविक स्टेकहोल्डर्स थे।

सेकुलर मीडिया को माया में समावेशी दर्शन और योगी में विघटनकारी राजनीति नज़र आई

लोकसभा चुनाव की सरगर्मियाँ जैसे-जैसे बढ़ रही है, जनधार खो चुकी पार्टियों, लुटेरे-घोटालेबाज, सजायाफ्ता नेताओं, सत्ता के लिए देश को गिरवी रखने वाली पार्टियों और प्रोपेगेंडा पत्रकारों सभी की साँसे-ऊपर नीचे हो रही हैं। लोकसभा के चुनावी दौर में एक तरफ कॉन्ग्रेस से जहाँ लगभग सभी बची-खुची साख समेटने वाली पार्टियाँ किनारा करती नज़र आईं तो साथ ही महागठबंधन के महामिलावट की पोल भी खुलती चली गई। और अब पूरा महागठबंधन, जो सिर्फ मोदी विरोध में कुढ़ते नेताओं का जुटान था, तिनके की तरह बिखर गया।

गाँव में एक कहावत है “बहुते जोगी मठ उजाड़” अर्थात एक जगह जहाँ इतने प्रधानमंत्री गठबंधन करें, वहाँ इनके स्वार्थबंधन का तेल तो निकलना ही था और वह निकला भी। खैर अभी, इस लेख में मुख्य फोकस में मायावती हैं और उनका अपने भतीजे अखिलेश के साथ जनाधार बचाने की जद्दोजहद पर भी पड़ी धुन्ध साफ की जाएगी। साथ ही मायावती के “सर्व-समावेशी” कमेंट पर मीडिया के पाखंड पर भी ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा कि कैसे ये पूरा गिरोह लोकतंत्र की दुहाई देकर उसकी जड़ों में मट्ठा डालने पर आमादा है।

मायावती की रही-सही साख भी अब बची नहीं है इसमें कोई दो राय नहीं और अब जिस तरह उनके अपने ही उनसे किनारा कर रहे हैं उससे मायावती के बहुजन से लेकर सर्वजन की राजनीतिक धरातल भी खिसकती नज़र आ रही है। नफ़रत की राजनीति का बीज बोने वाली बसपा के सेफ वोटर भी अब कहीं और ठौर तलाश रहे हैं। क्योंकि वह अब जाति के नाम पर और ठगी के शिकार होने से बचने लगे हैं। जिसका अंदाजा मायावती को बखूबी है। इसलिए अब उनकी पूरी राजनीति खुद के कुनबे तक सिमट गई है।

यहाँ तक कि दलित राजनीति के दूसरे धड़े भी मायावती और उनकी पार्टी का साथ छोड़ रहे हैं क्योंकि उन्हें बसपा की डूबती नाव साफ दिखने लगी है। कभी बामसेफ की स्थापना कांशीराम ने की थी। बसपा की स्थापना के बाद कुछ चुनावों तक यह संगठन उसके लिए उसी तरह काम करता था, जैसे आरएसएस बीजेपी के लिए वैचारिक संगठन के रूप में काम करता है। हालाँकि, यह तुलना उतना सार्थक नहीं है, क्योंकि कभी भी RSS देश के ताने-बाने के विरोध में नहीं रहा, राष्ट्र सर्वोपरि होते हुए भी नफ़रत और घृणा को आरएसएस ने कभी भी बढ़ावा नहीं दिया। लेकिन कांशीराम ने अपनी राजनीतिक शुरुआत ही सवर्णों के खिलाफ अपमानजनक नारों के जरिए दलितों- पिछड़ों का ध्रुवीकरण करके सिर्फ उनका एकतरफा राजनीतिक लाभ उठाया। अब का बामसेफ तो इससे और आगे निकल गया है। वो सवर्णों में भी खासतौर से ब्राह्मणों को अपने निशाने पर लेने में घृणा और नफ़रत की सभी सीमाएँ लाँघ गया है।

बामसेफ ने बसपा से पूरी तरह किनारा कर लिया है, यहाँ तक कि बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम ने कह दिया, “उनके संगठन का मायावती और बसपा से कोई संबंध नहीं है और न ही लोकसभा चुनाव में कोई समर्थन। कांशीराम तक बसपा दलितों, बहुजनों के लिए काम कर रही थी, लेकिन जब से इसे मायावती ने हथिया लिया है तब से वो सर्वजन खासतौर पर ब्राह्मणजनों के लिए काम कर रही है। वो मिशन से भटक गई है। इसलिए उन्हें हमारा कोई समर्थन हो ही नहीं सकता।”

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार मेश्राम ने यह भी कहा, “हाथी के पागल होने की संभावना होती है। इससे पहले कि हाथी पागल हो जाए, उस पर अंकुश लगाने के लिए महावत बैठा देना चाहिए। वरना हाथी हमारे ऊपर ही चढ़ जाएगा। कांशीराम जी ने जो हाथी (बसपा) पैदा किया था वो अब पागल हो गया है। बसपा अब लक्ष्य से भटक चुकी है। कांशीराम जी के समय वाली बसपा और अब वाली बसपा में काफी अंतर है। इसलिए हम उसके साथ नहीं हैं।”

दलितों के वोट पर अपना सर्वाधिकार का दावा बसपा, बामसेफ और प्रकाश अम्बेदकर भी करते रहे हैं लेकिन अब बामसेफ ने खुद को दलितों का का मसीहा बताते हुए, अन्य पर दलित हितों की अनदेखी का आरोप लगाया। महाराष्ट्र में प्रकाश अम्बेदकर के समर्थन पर मेश्राम ने कहा, “बिल्कुल, उन्हें भी समर्थन नहीं होगा, क्योंकि वो आरएसएस के इशारे पर काम कर रहे हैं। इसका मेरे पास सबूत है।” हालाँकि, जहाँ कुछ न मिले वहाँ हर जगह बीजेपी-RSS पर आरोप मढ़कर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के उपक्रम से ज़्यादा यह और कुछ नहीं है।

देखा जाए तो बहुजन के हित की बात करने वाली लगभग सभी पार्टियाँ लगातार उनसे छल करती रहीं हैं, स्वहित और स्वार्थसिद्धि ही उनका अब मुख्य ध्येय रह गया है। जिस बीजेपी के ऊपर ये आरोप मढ़ते रहे वो सही मायने में सर्वजन हित के लिए काम करते हुए “सबका साथ, सबका विकास” के मूलमंत्र के साथ लगातार आगे बढ़ रही है। बीजेपी का जनाधार इन सभी विपक्षी पार्टियों के एकजुट होने और हर तिकड़म लगाने के बाद भी लगातार बढ़ता जा रहा है।

आज ये सभी पार्टियाँ अपना जनाधार इस कदर खो चुकी है कि मायावती ने संभावित हार के मद्देनज़र लोकसभा चुनाव लड़ने से ही इनकार कर दिया है। फिर भी मायावती की पार्टी इस लोकसभा-चुनाव में सपा के साथ गठबंधन कर अपने लिए बची-खुची सम्भावना तलाश रही है। पिछले दिनों बसपा महासचिव सतीश मिश्रा की समधन ने भी बीजेपी ज्वाइन कर लिया।

ऐसे में राजनीतिक संजीवनी तलाश रही बसपा ने आज रामनवमी के दिन योगी आदित्यनाथ के हिन्दुओं से वोटिंग अपील पर अपनी बौखलाहट प्रदर्शित करते हुए ये भूल गई कि कुछ दिन पहले ही उन्होंने मुस्लिमों से एक झुण्ड में सपा-बसपा को वोट देने की अपील की थी। ऐसा करके भी वो सेक्युलर थी। और मायावती के प्रतिक्रिया में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के वोटिंग अपील के साथ ही एक बार फिर इन छद्म सेक्युलरों और वामपंथी पक्षकारों को खतरा नज़र आने लगा। हालाँकि, उस समय मायावती के मुस्लिमों के अपील में किसी को ध्रुवीकरण नज़र नहीं आया। सबने अपनी ज़ुबान सील ली थी।

ऊपर के वीडियो में, मायावती को स्पष्ट सुना जा सकता है कि वह मुस्लिम समुदाय से अपनी टिप्पणी और अपील पर चुनाव आयोग से माफी नहीं माँगेगी। वह यह भी सुनिश्चित करते हुए मुस्लिम समुदाय को यह स्पष्ट कर रही हैं कि वह अपनी टिप्पणी पर कायम है और उन्हें इस पर कोई अफसोस नहीं है।

एक तरफ जहाँ मायावती मुस्लिम समुदाय से अपनी अपील पर अड़ी हुई हैं, वहीं उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को आड़े हाथों लेने के लिए ट्विटर का सहारा लिया कि वे ’अली’ और ‘बजरंगबली’ के बीच मतदाताओं को बाँट रहे हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ ने मुस्लिम वोटों की माँग और एकतरफा ध्रुवीकरण पर यह टिप्पणी की थी कि उनका कहना है कि केवल मुस्लिम ही उन्हें वोट दें, तो भाजपा हिंदुओं को एकजुट करना चाहेगी।

यहाँ दिलचस्प बात यह है कि मोदी, बीजेपी और योगी से घृणा की हद तक नफ़रत करने वाले इस गिरोह ने मायावती के मुस्लिम एकजुटता वाली टिप्पणी को बायपास करते हुए वामपंथी मीडिया गिरोह योगी आदित्यनाथ के अपील में साम्प्रदायिकता से लेकर और भी न जाने कौन-कौन से एंगल ढूँढ लाई है। जो यह दिखाता है कि कैसे पीएम मोदी को हराने के लिए लुटियंस मीडिया का बहुसंख्यक प्रोपेगेंडा अभियान अपना सब कुछ दाँव पर लगा चुका है। खैर अब तो जनता भी मीडिया के इन नमूनों के खूब मजे ले रही है। जिससे इन्हें मिर्ची लग रही है।

पता नहीं ये सभी मीडिया गिरोह कौन सा डोज लेते हैं कि एक तरफ बामसेफ से लेकर अपना जनाधार खो चुकी मायावती की यह अपील कि ‘मुस्लिम कॉन्ग्रेस को वोट न देकर अपना एक मुस्त वोट बसपा-सपा गठबंधन को दें।’ इसमें इन मीडिया गिरोहों को, न लोकतंत्र की हत्या नज़र आई, न विघटनकारी राजनीति दिखी बल्कि मायावती के बयान में इस गिरोह को समावेशी अवधारणा नज़र आ गई। जबकि मायावती के बयान पर योगी आदित्यनाथ की टिप्पणी विभाजनकारी-विघटनकारी हो गई। इस पूरे गिरोह को एक बार फिर लोकतंत्र खतरे में नज़र आने लगा। सब अपने बिलों से निकलकर उछल-कूद मचाने लगे।

यह बिलबिलाहट जनाधार खो चुकी लुटेरी पार्टियों और चाटुकार पक्षकारों का सामूहिक रुदन है। जब तक यह सर्वजन के हित की बात नहीं करेंगे, जबतक ये प्रोपेगेंडा को निष्पक्षता के लिफाफे में लपेट कर जनता को धोखा देते रहेंगे, तब तक इनका भला नहीं होने वाला। अब जनता जाग चुकी है, धोखे से न नेता को वोट मिलने वाला है और न ही पक्षकारों को रीडर या दर्शक।

राहुल सांकृत्यायन और सदरुद्दीन एनी: साहित्यकार की कलम भविष्य भी लिख देती है

वो बताते हैं कि अपने जीवन में उन्होंने दो स्वतंत्रताओं को सबसे अधिक महसूस किया है। जिनमें से एक वो थी जब कि बयालिस साल की उम्र में पचहत्तर बेंत खाकर अमीर की जेल में पड़े, उन्हें वहाँ से छुड़ाया गया और दूसरी उससे छत्तीस वर्ष और पहले छः साल की उम्र में, जब कि उन्हें मकतब न जाने की इजाजत मिल गयी। कह नहीं सकता, दोनों में से किसको उन्होंने ज्यादा पसंद किया।

ताज़िकिस्तान के ख्यातिप्राप्त लेखक सदरुद्दीन एनी अपने बारे में बताते हैं, “छह साल की अवस्था में माँ-बाप मुझे मस्जिद के मकतब में ले गए। मकतब का फर्श केवल 9 गुणा 6 वर्ग गज का था। उसे लकड़ी के कटघरे से नौ भागों में बाँट दिया गया था। विद्यार्थी इन्हीं कठघरों में ढोबों की तरह बैठते और मुल्ला का डंडा उनके सिर पर रहता था। विद्यार्थी बिना समझे ही कुरान की आयतों को जोर-जोर से दोहराया करते थे।”

ज़ाहिर है ऐसी जगह से आजादी मिलना एनी को पसंद आया था। सवाल ये है कि ताज़िकिस्तान के एक लेखक का जिक्र भारत में क्यों किया जाए? उनकी याद इसलिए आती है क्योंकि राहुल सांकृत्यायन का जन्मदिन हाल ही में बीता है। कई भाषाओं के जानकार राहुल सांकृत्यायन को उनकी लिखी ‘वोल्गा से गंगा तक’ के लिए अक्सर याद किया जाता है। उनके किए अनुवाद की बात कम की जाती है। ‘दाखुंदा’ का उन्होंने सीधा अनुवाद नहीं किया था, किताब की शुरुआत में लिखा है कि ये ‘रूपांतर’ है।

माना जा सकता है कि राहुल सांकृत्यायन ने सदरुद्दीन एनी की किताब के भावों को हिंदी में उतारा है, शब्दों को पकड़ने की कोशिश नहीं की। वैसे अगर दाखुंदा का शाब्दिक अर्थ देखें तो ये मोटे तौर पर पहाड़ी जैसा अर्थ लिए हुए है। जैसे हिंदी में ‘देहाती’ कहने पर सिर्फ ग्रामीण का बोध नहीं होता, उसमें ‘गंवार’, मूर्ख, नासमझ, या दुनियादारी से अनभिज्ञ वाला भाव भी होता है, वैसे ही दाखुंदा कहना भी पहाड़ी के साथ-साथ बेवकूफ कहना हो जाता है। ये किताब यादगार नाम के ‘दाखुंदा’ और गुलनार नाम की लड़की की कहानी है।

बुखारा और ताज़िकिस्तान से जुड़े होने के कारण इसे मध्य एशिया की कहानी कह सकते हैं। ये आजाद होने की एक लड़ाई पर आधारित है, इसलिए इसे क्रांति का महत्वपूर्ण दस्तावेज भी कह सकते हैं। बौद्ध मत के अध्ययन में त्रिपिटकाचार्य के स्तर तक पहुँच चुके राहुल सांकृत्यायन अपने शुरूआती दौर में हिन्दुओं की उपासना पद्धतियाँ देखने निकले थे, और अंतिम दौर में वो वामपंथी थे। उन्हें रूसी कम्युनिस्ट क्रांति जैसी योजना से एक इस्लामिक सत्ता की पराजय पर लिखी गयी किताब पसंद आई होगी। शायद इसीलिए उन्होंने इसका रूपांतरण किया।

ये कहानी एक नायक, एक नायिका, किसी खलनायक, थोड़े से विछोह और फिर मिलन की सीधी सी कहानी नहीं है। हिन्दी सिनेमा के राजकपूर वाली श्री 420 जैसी फिल्मों के नायक जैसा ही इस किताब का दाखुंदा भी मुश्किलें झेलता रहता है, मगर चतुर-चालाक, या सीधे शब्दों में कहें तो धूर्त नहीं बनता। कई कठिनाइयों के बाद भी अपना चरित्र ना छोड़ना ही दाखुंदा को नायक बना देता है। दूसरी तरफ जो गुलनार है, उसे जबरदस्ती झेलनी पड़ती है, कई शादियाँ कर चुके लोगों की रखैल जैसा भी उसे जीना पड़ता है, लेकिन ये भी यादगार को नहीं भूलती।

ताज़िकिस्तान की ये लड़ाई, काफी कुछ वैसी ही थी, जैसी अभी हाल में अफगानिस्तान में चलती रही। एक तरफ कट्टरपंथी जमातें थीं और दूसरी तरफ आम लोग। जब लड़ाई में गोलियाँ चलनी बंद हो जाती हैं, तथाकथित शांति स्थापित हो जाती है, तब भी लड़ाई ख़त्म नहीं होती। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हारने के बाद भी कट्टरपंथी अपनी सोच को नहीं बदलते बस उपरी चोला बदलकर, नकाब ओढ़कर सामने आ जाते हैं। दाखुंदा का अंत भी कोई अंत नहीं, एक शुरुआत ही है। अंतिम पन्ने पर समझ आ जाता है कि यहाँ से एक और लड़ाई शुरू होगी।

सौ साल पहले के दौर और आज के दौर में अंतर देखें तो ये लगता है कि अब लड़ाइयाँ उतनी हिंसक नहीं होती। किसी ने ये नहीं सोचा कि हो सकता है कि उस ख़ास कट्टरपंथी मजहबी सोच से लड़ना पड़े तो हिंसा हो, आमतौर पर ऐसा होता नहीं दिखता। दूसरे देश जैसे ईरान, इराक, अफगानिस्तान, सीरिया में ऐसे हिंसक आन्दोलन कोई बड़ी बात तो नहीं। हमने शायद विदेशों की घटनाओं की ओर से आँख मूंदकर कबूतरों वाली शान्ति को गले लगा रखा है। कई बार कहा जाता है कि साहित्यकार की कलम भविष्य भी लिख जाती है।

‘दाखुंदा’ पढ़ने का मौका मिले तो सोचियेगा, इतिहास का दस्तावेज सामने पड़ा है, या भविष्य का कोई डरावना सच? ये भी सोचियेगा कि राहुल सांकृत्यायन को अनेकों भाषाओं का जानकार बताते वक्त उनके इस रूपान्तर पर चुप्पी क्यों है? फ़िलहाल सोचने पर जीएसटी भी तो नहीं लगता न!

एक बेकार, नकारा विपक्ष लोकतंत्र को बर्बाद करने की क्षमता रखता है

चुनावी रैलियों में भाषाई आक्रमण का स्तर अपने नैसर्गिक अवनति की ओर ज्यामितीय अनुक्रमण कर रहा है। इसमें किसी एक पार्टी का हाथ नहीं है। इसमें ये तर्क भी बेकार है कि फ़लाँ पार्टी के नेता ज़्यादा बुरी बातें बोल रहे हैं, और यह भी कि ‘इसने यह बोला था, तब उसने वह बोला’। ये तर्क बेकार इसलिए हैं कि एक बात होती है नैतिकता की, उचित-अनुचित बातों की जिसमें आप कंडीशन्स नहीं लगा सकते।

कुछ बातें संदर्भरहित होने पर भी उचित या अनुचित होती हैं, उसके लिए आपको बैकग्राउंड में जाकर खोजने की आवश्यकता नहीं होती कि इस कारण से यह कहा गया। कारण जो भी रहे हों, पर सार्वजनिक जीवन में इस तरह की अमर्यादित भाषा ग़लत ही कही जाएगी, सही नहीं। यही कारण है कि इस भाषाई कीचड़ में एक ढेला मारने वाले भी खुद को पीड़ित बताकर सहानुभूति नहीं पा सकते। मतलब, मेरी सहानुभूति तो नहीं पा सकते, बाकी दुनिया तो स्विंग करती ही रहती है।

राजनीति समाजसेवा नहीं है। हमारा सामाजिक परिदृश्य, राष्ट्रीय नज़रिए से, आदर्श नहीं है। कानून तोड़नेवालों को हम अपने सर्किल में सम्मान देते पाए जाते हैं। पैसा लेकर वोट देने में हम हिचकते नहीं। अपनी जाति के नेता को, चोर ही सही, चुनावों में जिताने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। हमारा काम निकल रहा हो तो हम सक्षम होने पर पैसे देकर मोलभाव करने से भी नहीं कतराते।

ऐसे में ये उम्मीद करना कि जो हमारे बीच से, वार्ड कमिश्नर के चुनाव लड़ते हुए मुखिया बनकर, ज़िला पार्षद बनता है, विधायक बनता है, सांसद बनता है, मंत्री बनता है, प्रधानमंत्री बनता, वो व्यक्ति सत्ता पाने के लिए नकारात्मक या अनुचित कार्य नहीं करेगा, ये अपने आप को मूर्ख बनाने के लिए तैयार किया गया तर्क है।

औसतन, हर समाज में बड़ा हिस्सा किसी की बातों को सुनकर सही मान लेता है, छानबीन नहीं करता। उसने जो सुना, वही उसका सत्य हो जाता है। उसने जो पढ़ा उसे मान लेता है क्योंकि वो आलसी है, और अपने पूर्वग्रहों को संतुष्ट होता देखता है। सत्य वही होता है जो हम मान लेते हैं, वरना सत्य तो कुछ भी नहीं।

किसी को मानने में देर लगती है, किसी के लिए एक घंटे का भाषण काफी लगता है। औसत व्यक्ति की इसी आलसी प्रवृति का फायदा वो उठाते हैं जिन्हें बस तीस प्रतिशत वोट चाहिए सत्ता पाने के लिए। जो व्यक्ति कुछ भी कर पाने की स्थिति में होता है, जिसकी कुर्सी की छवि इतनी बड़ी होती है कि आधिकारिक रूप से नरसंहारों को संचालित करने के बावजूद उसे कुर्सी पर बैठने के कुछ ही समय में नोबेल शांति पुरस्कार मिल जाता है, क्या वैसे लोग आपकी मानसिकता और मानसिक क्षमता को एक्सप्लॉइट नहीं करेंगे?

क्या इतनी सीधी-सी बात, जो मैं लिख रहा हूँ जिसकी चुनाव में सबसे बड़ी जीत के नाम पर सेकेंड मॉनिटर होना है, वैसे लोग नहीं जानते जो किशोरावस्था से राजनीति को क़रीब से देख, समझ और जी रहे हैं? क्या इतनी सपाट बात, कि हमारे समाज के अधिकतर लोग औसत बुद्धि के वैसे लोग हैं जो चार भाषणों से हिल जाते हैं, ऐसे लोगों को पता नहीं होगी जिन्हें ये बात तक पता होती है कि किस जगह पर क्या बोलना है कि लोग वाह-वाह करने लगें?

अब राजनीति में मर्यादा शब्द और उसके मायनों का लोप हो गया है। इस शब्द की बात वही नेता करता है जिसे विक्टिम कार्ड खेलना हो। इस शब्द की बात करने लायक एक भी नेता नहीं है क्योंकि अगर वो इस शब्द के मायने समझता होता तो राजनीति त्याग देता या सार्वजनिक रूप से अपनी पार्टी की हर बुराई को सबके सामने लाता।

राजनैतिक मजबूरियों का कवच पहनकर किसी के पाप नहीं धुलते। अगर किसी प्रधानमंत्री के शसनकाल में घोटाले हुए, समझौतों में देश की सुरक्षा को नकारा गया, तो वो प्रधानमंत्री साक्षात दशरथपुत्र रामचंद्र ही क्यों न हों, पाप के भागीदार वो भी हैं। अगर किसी के राज में दंगे हुए, तो उस पाप का भागी वो इस बात के लिए हमेशा रहेगा कि वो उस राज्य का मुखिया था, भले ही उसने हाथ में मशाल न पकड़ी हो, या लाउडस्पीकर पर लोगों को काट देने के निर्देश न दे रहा हो।

रैलियों की भाषाओं का पतन होता रहेगा क्योंकि बात सत्य बोलने की, अपना अजेंडा बताने की, अपने मैनिफ़ेस्टो पर अमल करने की नहीं रही। बात वैसी होती रहेगी जिसे सोशल मीडिया का बुखार चढ़ सके। बात वैसी होती रहेगी जिससे मेनस्ट्रीम मीडिया बार-बार लूप में चलाता रहे। अब पार्टियों के लिए पीआर टीम होती है, डिजिटल मीडिया मैनेजमेंट के लिए लोगों का समूह लगातार काम करता रहता है।

इसीलिए, जब नेता को यह बात पता हो कि वो हर जगह देखा जा रहा है, सुना जा रहा है, नज़रों में है, तो वो ऐसे काम अवश्य ही करेगा जिससे वो चर्चा में रहे। चर्चा चाहे नकारात्मक बातों के लिए ही क्यों न हो, चर्चा तो है। गाली देने के लिए ही नाम लिया जा रहा है, लेकिन नाम तो लिया जा रहा है। ये योजना फलदायक है क्योंकि यहाँ लोग नकारात्मक बातों पर खुश हो जाते हैं।

जहाँ जनता ये सुनना चाहती है कि मोदी राहुल का मजाक उड़ा दे, और राहुल मोदी को कुछ कह दे, वहाँ आखिर नकारात्मक बातें क्योंकर कारगर नहीं होंगी? यहाँ जनता ये सुनने को व्याकुल रहती है कि चारों पकड़े गए चोरों का धर्म एक है, तो फिर उस बात को ये नेता क्यों नहीं भुनाएँगे? जहाँ लोग ये सुनने में गर्व का अनुभव करते हैं कि उनके धर्म के लोगों ने इतने धर्मस्थलों को तोड़कर, उनके अवशेषों को अपने धर्मस्थलों की सीढ़ियों में दफ़्न किया हुआ है, वहाँ के नेता इस बात को हवा क्यों नहीं देंगे?

विपक्ष का काम सत्ता से सवाल करना होता है। सवाल के दायरे में ‘मोदी का बाप कौन है’, नहीं आता। सवाल के दायरे में उस नेता को ‘कमीशन नाथ’ कहना नहीं आता जिसपर आरोप साबित नहीं हुए हैं। सवालों के दायरे में यह बात नहीं आती कि किसके कहने पर क्या हुआ जबकि आपके पास सिवाय उस बात को कहने के और कुछ सबूत नहीं हैं।

यह बात सच है कि जनता एक उन्माद को जीना चाहती है। जनता को आप घृणा का झुनझुना दे दीजिए, वो कुछ दिन के लिए सड़क, पानी, बिजली, घर, स्कूल, हॉस्पिटल की बात भूल जाती है। जनता को आप यह बात कह दीजिए कि उसकी माँ चोर है, उसके बाप का किसी को पता नहीं, जनता दो दिन उसी में निकाल लेती है। जनता को कहते रहिए कि इतने सालों में क्या नहीं हुआ, और जनता ये पूछना भूल जाएगी कि तुम्हारे कालखंड में क्या-क्या हुआ।

यह बात सच है कि तुलना हमेशा वर्तमान और भूत के संदर्भ में ही होती है। लेकिन तुलना को ही अपना हथियार बनाना एक तरह से योजनाबद्ध तरीके से शिकार करने जैसा है जिसमें जनता शिकार देखने में व्यस्त हो जाती है, और वो भूल जाती है कि जंगल के कानून हैं, वहाँ के संसाधनों का सही उपयोग होना चाहिए, पेड़ों का स्वास्थ्य सही होना चाहिए, नदियों को साफ़ होना चाहिए, हर तरह के पौधे की देखभाल होनी चाहिए।

कौतूहलप्रिय जनता मनोरंजनोन्मुखी होती है। उसका मनोरंजन करते रहिए, मुद्दों को वो भूल जाते हैं। यहीं पर सशक्त विपक्ष की भूमिका ज़रूरी होती है। यहीं पर विपक्ष जनता को थप्पड़ मारकर उस तंद्रा से बाहर लाता है। यहीं पर विपक्ष का काम होता है कि वो सत्ता की बातों की सीढ़ियाँ न चढ़े, बल्कि नई सीढ़ी बनाकर ऊपर से पूछे कि आख़िर जा कहाँ रही है सरकार?

विपक्ष जब सत्ता की बातों का जवाब देने में, उसके उठाए नकली मुद्दों पर चर्चा में उलझ जाती है, तब नुकसान होता है लोकतंत्र का। संविधान बचाओ रैली और कैम्पेन से संविधान नहीं बचता, उसे बचाने के लिए प्रखर और ज़िम्मेदार विपक्ष का होना ज़रूरी है। अगर एक दूसरे पर आक्षेप ही चलता रहेगा तो संविधान बचाओ रैली भी एक माजक बनकर रह जाएगी।

मजाक तो बनी हुई ही है क्योंकि जिनके बापों ने, नेताओं में व्यवस्थित तरीके से लूट मचाई है, वो ऐसी रैलियाँ करते नज़र आते हैं। इसलिए, जब विपक्ष और सत्ता दोनों ही अपने रास्ते छोड़कर कहीं और निकल ले, तो जनता का काम होता है उसके सामने भीड़ बनकर खड़े हो जाना।

इंदिरा गाँधी की मनमानी के कारण मात्र एक से डेढ़ लाख लोगों की भीड़ ने केन्द्र सरकार को मजबूर कर दिया झुकने के लिए। सिर्फ एक लाख लोगों ने! प्रतिशत निकालकर देख लीजिए। जनता को कोने में ठेलती सरकारें इस बात का फायदा उठाती है कि जनता उदासीन है, वो हर दिन अपनी ज़िंदगी काट लेना चाहती है, वही उसका उद्देश्य है।

इसलिए सत्ता ऐसी है, विपक्ष ऐसा है, समाज ऐसा है, और देश ऐसा है। अगर विपक्ष लगाम पकड़ना सीख जाए, और यह समझ ले कि उसका और सत्ता का एकल उद्देश्य सामाजिक विकास है, तभी एक पक्ष, दूसरे को भटकने से रोक सकता है। लेकिन वो समय, निकट भविष्य में नहीं आएगा क्योंकि चुनावों में अब खेल परसेप्शन मैनेजमेंट का हो गया है, वहाँ अगले दो-तीन चुनावों तक सुधार की संभावना नहीं है।

इसी परसेप्शन मैनेजमेंट के कारण मुद्दे गायब हो रहे हैं, और नेताओं को मुँह से माँ और बाप, पत्नी और पति की बातों हो रही हैं जैसे कि इन लोगों को सांसद और विधायक यही करने के लिए बनाया गया था कि हमें पता चले राहुल या मोदी का बाप कौन है। आप सोचिए कि इन बातों से किसको क्या मिल जाएगा? बस यही होगा कि जो जिस खेमे के हैं, वो खुश हो लेंगे, और बाउंड्री लाइन पर बैठे लोग खिन्न होकर किसी एक पार्टी को वोट दे देंगे।

इन सब बातों से सामाजिक विकास की गति धीमी होती है। चूँकि सरकार है तो बजट तो बनेगा ही। सड़कें तो बनेंगी ही, विकास के काम तो होते ही रहेंगे। लेकिन इसकी गति कैसी होगी, उसमें पैसा कितना लगेगा, वो किस गुणवत्ता का होगा, इसका निर्धारण एक ज़िम्मेदार विपक्ष कर सकता है। अगर विपक्ष इस बात पर फोकस्ड है कि किसने अपनी पत्नी से बात नहीं की, किसका बाप किसको छोड़कर चला गया, तो फिर चुनाव महज़ औपचारिक कार्यक्रम बनकर सिमट जाएँगे, जो होंगे ज़रूर पर उसका परिणाम कुछ भी नहीं होगा।

रामनवमी पर पश्चिम बंगाल में VHP को नहीं दी गई बाइक रैली की इजाज़त: कार्यकर्ताओं में रोष


पूरा देश आज रामनवमी का पर्व मना रहा है। पश्चिम बंगाल में भी रामनवमी की रैलियों के आयोजन की तैयारी चल रही थी। ये रैलियाँ 13 और 14 अप्रैल को होने वाली थी, लेकिन अब कोलकाता पुलिस ने VHP (विश्व हिन्दू परिषद) को रैली निकालने की इजाजत देने से मना कर दिया है। जानकारी के मुताबिक, संगठन के कार्यकर्ता बाइक रैली निकालने जा रहे थे, लेकिन इससे ठीक पहले ही कोलकाता पुलिस ने इस पर रोक लगा दी।

इसके साथ ही VHP कार्यकर्ताओं को ये हिदायत दी गई कि वो रैली के दौरान भगवान राम की सिर्फ एक ही तस्वीर का इस्तेमाल कर सकते हैं पुलिस की इजाजत न मिलने के बाद कार्यकर्ताओं ने राम की तस्वीर के साथ-साथ भगवा झंडा लेकर स्थानीय रैली निकालने की कोशिश की। रैली की इजाजत न मिलने से VHP कार्यकर्ताओं में काफी गुस्सा है। VHP ने राम नवमी पर पश्चिम बंगाल में भव्य आयोजन की तैयारी थी। कहा गया था कि इस बार संगठन के कार्यकर्ता राज्यभर में तकरीबन 700 रैलियाँ निकालेंगे। VHP ने इस साल जुलूस निकालने के दौरान हथियार के प्रदर्शन ना करने का आश्वासन भी दिया था।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक सौहार्द के बिगड़ने की खबरें अक्सर आती रहती हैं। त्योहारों के बीच सांप्रदायिक हिंसा की खबरें भी आती रहती हैं। पिछले साल पश्चिम बंगाल के आसनसोल में रामनवमी के दिन भड़की सांप्रदायिक हिंसा काफी चर्चा में रही थी। उस समय यह विवाद रामनवमी के जुलूस के दिन बजाए जा रहे गानों को लेकर हुआ था। पहले तो जुलूस पर पत्थरबाजी हुई थी और फिर एक गाड़ी को आग लगा दी गई थी।