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एक बेकार, नकारा विपक्ष लोकतंत्र को बर्बाद करने की क्षमता रखता है

चुनावी रैलियों में भाषाई आक्रमण का स्तर अपने नैसर्गिक अवनति की ओर ज्यामितीय अनुक्रमण कर रहा है। इसमें किसी एक पार्टी का हाथ नहीं है। इसमें ये तर्क भी बेकार है कि फ़लाँ पार्टी के नेता ज़्यादा बुरी बातें बोल रहे हैं, और यह भी कि ‘इसने यह बोला था, तब उसने वह बोला’। ये तर्क बेकार इसलिए हैं कि एक बात होती है नैतिकता की, उचित-अनुचित बातों की जिसमें आप कंडीशन्स नहीं लगा सकते।

कुछ बातें संदर्भरहित होने पर भी उचित या अनुचित होती हैं, उसके लिए आपको बैकग्राउंड में जाकर खोजने की आवश्यकता नहीं होती कि इस कारण से यह कहा गया। कारण जो भी रहे हों, पर सार्वजनिक जीवन में इस तरह की अमर्यादित भाषा ग़लत ही कही जाएगी, सही नहीं। यही कारण है कि इस भाषाई कीचड़ में एक ढेला मारने वाले भी खुद को पीड़ित बताकर सहानुभूति नहीं पा सकते। मतलब, मेरी सहानुभूति तो नहीं पा सकते, बाकी दुनिया तो स्विंग करती ही रहती है।

राजनीति समाजसेवा नहीं है। हमारा सामाजिक परिदृश्य, राष्ट्रीय नज़रिए से, आदर्श नहीं है। कानून तोड़नेवालों को हम अपने सर्किल में सम्मान देते पाए जाते हैं। पैसा लेकर वोट देने में हम हिचकते नहीं। अपनी जाति के नेता को, चोर ही सही, चुनावों में जिताने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। हमारा काम निकल रहा हो तो हम सक्षम होने पर पैसे देकर मोलभाव करने से भी नहीं कतराते।

ऐसे में ये उम्मीद करना कि जो हमारे बीच से, वार्ड कमिश्नर के चुनाव लड़ते हुए मुखिया बनकर, ज़िला पार्षद बनता है, विधायक बनता है, सांसद बनता है, मंत्री बनता है, प्रधानमंत्री बनता, वो व्यक्ति सत्ता पाने के लिए नकारात्मक या अनुचित कार्य नहीं करेगा, ये अपने आप को मूर्ख बनाने के लिए तैयार किया गया तर्क है।

औसतन, हर समाज में बड़ा हिस्सा किसी की बातों को सुनकर सही मान लेता है, छानबीन नहीं करता। उसने जो सुना, वही उसका सत्य हो जाता है। उसने जो पढ़ा उसे मान लेता है क्योंकि वो आलसी है, और अपने पूर्वग्रहों को संतुष्ट होता देखता है। सत्य वही होता है जो हम मान लेते हैं, वरना सत्य तो कुछ भी नहीं।

किसी को मानने में देर लगती है, किसी के लिए एक घंटे का भाषण काफी लगता है। औसत व्यक्ति की इसी आलसी प्रवृति का फायदा वो उठाते हैं जिन्हें बस तीस प्रतिशत वोट चाहिए सत्ता पाने के लिए। जो व्यक्ति कुछ भी कर पाने की स्थिति में होता है, जिसकी कुर्सी की छवि इतनी बड़ी होती है कि आधिकारिक रूप से नरसंहारों को संचालित करने के बावजूद उसे कुर्सी पर बैठने के कुछ ही समय में नोबेल शांति पुरस्कार मिल जाता है, क्या वैसे लोग आपकी मानसिकता और मानसिक क्षमता को एक्सप्लॉइट नहीं करेंगे?

क्या इतनी सीधी-सी बात, जो मैं लिख रहा हूँ जिसकी चुनाव में सबसे बड़ी जीत के नाम पर सेकेंड मॉनिटर होना है, वैसे लोग नहीं जानते जो किशोरावस्था से राजनीति को क़रीब से देख, समझ और जी रहे हैं? क्या इतनी सपाट बात, कि हमारे समाज के अधिकतर लोग औसत बुद्धि के वैसे लोग हैं जो चार भाषणों से हिल जाते हैं, ऐसे लोगों को पता नहीं होगी जिन्हें ये बात तक पता होती है कि किस जगह पर क्या बोलना है कि लोग वाह-वाह करने लगें?

अब राजनीति में मर्यादा शब्द और उसके मायनों का लोप हो गया है। इस शब्द की बात वही नेता करता है जिसे विक्टिम कार्ड खेलना हो। इस शब्द की बात करने लायक एक भी नेता नहीं है क्योंकि अगर वो इस शब्द के मायने समझता होता तो राजनीति त्याग देता या सार्वजनिक रूप से अपनी पार्टी की हर बुराई को सबके सामने लाता।

राजनैतिक मजबूरियों का कवच पहनकर किसी के पाप नहीं धुलते। अगर किसी प्रधानमंत्री के शसनकाल में घोटाले हुए, समझौतों में देश की सुरक्षा को नकारा गया, तो वो प्रधानमंत्री साक्षात दशरथपुत्र रामचंद्र ही क्यों न हों, पाप के भागीदार वो भी हैं। अगर किसी के राज में दंगे हुए, तो उस पाप का भागी वो इस बात के लिए हमेशा रहेगा कि वो उस राज्य का मुखिया था, भले ही उसने हाथ में मशाल न पकड़ी हो, या लाउडस्पीकर पर लोगों को काट देने के निर्देश न दे रहा हो।

रैलियों की भाषाओं का पतन होता रहेगा क्योंकि बात सत्य बोलने की, अपना अजेंडा बताने की, अपने मैनिफ़ेस्टो पर अमल करने की नहीं रही। बात वैसी होती रहेगी जिसे सोशल मीडिया का बुखार चढ़ सके। बात वैसी होती रहेगी जिससे मेनस्ट्रीम मीडिया बार-बार लूप में चलाता रहे। अब पार्टियों के लिए पीआर टीम होती है, डिजिटल मीडिया मैनेजमेंट के लिए लोगों का समूह लगातार काम करता रहता है।

इसीलिए, जब नेता को यह बात पता हो कि वो हर जगह देखा जा रहा है, सुना जा रहा है, नज़रों में है, तो वो ऐसे काम अवश्य ही करेगा जिससे वो चर्चा में रहे। चर्चा चाहे नकारात्मक बातों के लिए ही क्यों न हो, चर्चा तो है। गाली देने के लिए ही नाम लिया जा रहा है, लेकिन नाम तो लिया जा रहा है। ये योजना फलदायक है क्योंकि यहाँ लोग नकारात्मक बातों पर खुश हो जाते हैं।

जहाँ जनता ये सुनना चाहती है कि मोदी राहुल का मजाक उड़ा दे, और राहुल मोदी को कुछ कह दे, वहाँ आखिर नकारात्मक बातें क्योंकर कारगर नहीं होंगी? यहाँ जनता ये सुनने को व्याकुल रहती है कि चारों पकड़े गए चोरों का धर्म एक है, तो फिर उस बात को ये नेता क्यों नहीं भुनाएँगे? जहाँ लोग ये सुनने में गर्व का अनुभव करते हैं कि उनके धर्म के लोगों ने इतने धर्मस्थलों को तोड़कर, उनके अवशेषों को अपने धर्मस्थलों की सीढ़ियों में दफ़्न किया हुआ है, वहाँ के नेता इस बात को हवा क्यों नहीं देंगे?

विपक्ष का काम सत्ता से सवाल करना होता है। सवाल के दायरे में ‘मोदी का बाप कौन है’, नहीं आता। सवाल के दायरे में उस नेता को ‘कमीशन नाथ’ कहना नहीं आता जिसपर आरोप साबित नहीं हुए हैं। सवालों के दायरे में यह बात नहीं आती कि किसके कहने पर क्या हुआ जबकि आपके पास सिवाय उस बात को कहने के और कुछ सबूत नहीं हैं।

यह बात सच है कि जनता एक उन्माद को जीना चाहती है। जनता को आप घृणा का झुनझुना दे दीजिए, वो कुछ दिन के लिए सड़क, पानी, बिजली, घर, स्कूल, हॉस्पिटल की बात भूल जाती है। जनता को आप यह बात कह दीजिए कि उसकी माँ चोर है, उसके बाप का किसी को पता नहीं, जनता दो दिन उसी में निकाल लेती है। जनता को कहते रहिए कि इतने सालों में क्या नहीं हुआ, और जनता ये पूछना भूल जाएगी कि तुम्हारे कालखंड में क्या-क्या हुआ।

यह बात सच है कि तुलना हमेशा वर्तमान और भूत के संदर्भ में ही होती है। लेकिन तुलना को ही अपना हथियार बनाना एक तरह से योजनाबद्ध तरीके से शिकार करने जैसा है जिसमें जनता शिकार देखने में व्यस्त हो जाती है, और वो भूल जाती है कि जंगल के कानून हैं, वहाँ के संसाधनों का सही उपयोग होना चाहिए, पेड़ों का स्वास्थ्य सही होना चाहिए, नदियों को साफ़ होना चाहिए, हर तरह के पौधे की देखभाल होनी चाहिए।

कौतूहलप्रिय जनता मनोरंजनोन्मुखी होती है। उसका मनोरंजन करते रहिए, मुद्दों को वो भूल जाते हैं। यहीं पर सशक्त विपक्ष की भूमिका ज़रूरी होती है। यहीं पर विपक्ष जनता को थप्पड़ मारकर उस तंद्रा से बाहर लाता है। यहीं पर विपक्ष का काम होता है कि वो सत्ता की बातों की सीढ़ियाँ न चढ़े, बल्कि नई सीढ़ी बनाकर ऊपर से पूछे कि आख़िर जा कहाँ रही है सरकार?

विपक्ष जब सत्ता की बातों का जवाब देने में, उसके उठाए नकली मुद्दों पर चर्चा में उलझ जाती है, तब नुकसान होता है लोकतंत्र का। संविधान बचाओ रैली और कैम्पेन से संविधान नहीं बचता, उसे बचाने के लिए प्रखर और ज़िम्मेदार विपक्ष का होना ज़रूरी है। अगर एक दूसरे पर आक्षेप ही चलता रहेगा तो संविधान बचाओ रैली भी एक माजक बनकर रह जाएगी।

मजाक तो बनी हुई ही है क्योंकि जिनके बापों ने, नेताओं में व्यवस्थित तरीके से लूट मचाई है, वो ऐसी रैलियाँ करते नज़र आते हैं। इसलिए, जब विपक्ष और सत्ता दोनों ही अपने रास्ते छोड़कर कहीं और निकल ले, तो जनता का काम होता है उसके सामने भीड़ बनकर खड़े हो जाना।

इंदिरा गाँधी की मनमानी के कारण मात्र एक से डेढ़ लाख लोगों की भीड़ ने केन्द्र सरकार को मजबूर कर दिया झुकने के लिए। सिर्फ एक लाख लोगों ने! प्रतिशत निकालकर देख लीजिए। जनता को कोने में ठेलती सरकारें इस बात का फायदा उठाती है कि जनता उदासीन है, वो हर दिन अपनी ज़िंदगी काट लेना चाहती है, वही उसका उद्देश्य है।

इसलिए सत्ता ऐसी है, विपक्ष ऐसा है, समाज ऐसा है, और देश ऐसा है। अगर विपक्ष लगाम पकड़ना सीख जाए, और यह समझ ले कि उसका और सत्ता का एकल उद्देश्य सामाजिक विकास है, तभी एक पक्ष, दूसरे को भटकने से रोक सकता है। लेकिन वो समय, निकट भविष्य में नहीं आएगा क्योंकि चुनावों में अब खेल परसेप्शन मैनेजमेंट का हो गया है, वहाँ अगले दो-तीन चुनावों तक सुधार की संभावना नहीं है।

इसी परसेप्शन मैनेजमेंट के कारण मुद्दे गायब हो रहे हैं, और नेताओं को मुँह से माँ और बाप, पत्नी और पति की बातों हो रही हैं जैसे कि इन लोगों को सांसद और विधायक यही करने के लिए बनाया गया था कि हमें पता चले राहुल या मोदी का बाप कौन है। आप सोचिए कि इन बातों से किसको क्या मिल जाएगा? बस यही होगा कि जो जिस खेमे के हैं, वो खुश हो लेंगे, और बाउंड्री लाइन पर बैठे लोग खिन्न होकर किसी एक पार्टी को वोट दे देंगे।

इन सब बातों से सामाजिक विकास की गति धीमी होती है। चूँकि सरकार है तो बजट तो बनेगा ही। सड़कें तो बनेंगी ही, विकास के काम तो होते ही रहेंगे। लेकिन इसकी गति कैसी होगी, उसमें पैसा कितना लगेगा, वो किस गुणवत्ता का होगा, इसका निर्धारण एक ज़िम्मेदार विपक्ष कर सकता है। अगर विपक्ष इस बात पर फोकस्ड है कि किसने अपनी पत्नी से बात नहीं की, किसका बाप किसको छोड़कर चला गया, तो फिर चुनाव महज़ औपचारिक कार्यक्रम बनकर सिमट जाएँगे, जो होंगे ज़रूर पर उसका परिणाम कुछ भी नहीं होगा।

रामनवमी पर पश्चिम बंगाल में VHP को नहीं दी गई बाइक रैली की इजाज़त: कार्यकर्ताओं में रोष


पूरा देश आज रामनवमी का पर्व मना रहा है। पश्चिम बंगाल में भी रामनवमी की रैलियों के आयोजन की तैयारी चल रही थी। ये रैलियाँ 13 और 14 अप्रैल को होने वाली थी, लेकिन अब कोलकाता पुलिस ने VHP (विश्व हिन्दू परिषद) को रैली निकालने की इजाजत देने से मना कर दिया है। जानकारी के मुताबिक, संगठन के कार्यकर्ता बाइक रैली निकालने जा रहे थे, लेकिन इससे ठीक पहले ही कोलकाता पुलिस ने इस पर रोक लगा दी।

इसके साथ ही VHP कार्यकर्ताओं को ये हिदायत दी गई कि वो रैली के दौरान भगवान राम की सिर्फ एक ही तस्वीर का इस्तेमाल कर सकते हैं पुलिस की इजाजत न मिलने के बाद कार्यकर्ताओं ने राम की तस्वीर के साथ-साथ भगवा झंडा लेकर स्थानीय रैली निकालने की कोशिश की। रैली की इजाजत न मिलने से VHP कार्यकर्ताओं में काफी गुस्सा है। VHP ने राम नवमी पर पश्चिम बंगाल में भव्य आयोजन की तैयारी थी। कहा गया था कि इस बार संगठन के कार्यकर्ता राज्यभर में तकरीबन 700 रैलियाँ निकालेंगे। VHP ने इस साल जुलूस निकालने के दौरान हथियार के प्रदर्शन ना करने का आश्वासन भी दिया था।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक सौहार्द के बिगड़ने की खबरें अक्सर आती रहती हैं। त्योहारों के बीच सांप्रदायिक हिंसा की खबरें भी आती रहती हैं। पिछले साल पश्चिम बंगाल के आसनसोल में रामनवमी के दिन भड़की सांप्रदायिक हिंसा काफी चर्चा में रही थी। उस समय यह विवाद रामनवमी के जुलूस के दिन बजाए जा रहे गानों को लेकर हुआ था। पहले तो जुलूस पर पत्थरबाजी हुई थी और फिर एक गाड़ी को आग लगा दी गई थी।

कपिल मिश्रा का दिल्ली वालों के नाम खुला ख़त: केजरीवाल रच रहे पूर्ण राज्य के नाम पर षड्यंत्र

आज दिल्ली वालों के सामने एक बहुत बड़ा सवाल है कि दिल्ली देश की राजधानी रहेगी या हटा दी जाएगी?

दिल्ली का राजधानी का दर्जा ख़तम करवाने की साजिश और कोई नहीं बल्कि खुद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के द्वारा रची जा रही है। जी हाँ, दिल्ली सरकार ने ‘पूर्ण राज्य’ के नाम पर जो प्रस्ताव तैयार किया है उसमें स्पष्ट लिखा है कि केवल नई दिल्ली और चाणक्यपुरी को देश की राजधानी बनाया जाए और बाकि दिल्ली का राजधानी का दर्जा खत्म कर दिया जाए। ये दिल्ली वालों के साथ सबसे बड़ा धोखा और ग़द्दारी है।

आज दिल्ली के लगभग 90% निवासी किसी न किसी पूर्ण राज्य को छोड़कर ही दिल्ली में रहने आए हैं, भारत की राजधानी में रहने के लिए। बिहार, यूपी, पंजाब, राजस्थान, बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, असम देश का ऐसा कोई पूर्ण राज्य नहीं जहां से लोग दिल्ली ना आए हों। एक सपना लेकर- भारत की राजधानी में रहने का सपना। खुद केजरीवाल चुनाव लड़ने से एक हफ्ते पहले तक दिल्ली के वोटर तक नहीं थे, यूपी के वोटर थे। वो रहने वाले भी मूलतः हरियाणा के हैं।

आज उन्हें दिल्ली के बाहर से आने वाला हर आदमी दुश्मन लगने लगा है। क्या दिल्ली कभी पूर्ण राज्य बन सकती है? जी नहीं, जब तक दिल्ली देश की राजधानी हैं, ये कभी पूर्ण राज्य नहीं बन सकती। कभी भी नहीं। अगर कोई आपको ये कहता हैं कि दिल्ली पूर्ण राज्य बन जाएगी तो वो आपसे सफेद झूठ बोल रहा है, आपकी आंखों में धूल झोंक रहा है। दिल्ली देश की राजधानी थी, है और हमेशा रहेगी। किसी केजरीवाल की औकात नहीं है जो दिल्ली का राजधानी का दर्जा ख़तम कर सके।

‘पूर्ण राज्य’ – एक फ्रॉड स्कीम

पूर्ण राज्य एक फ्रॉड स्कीम है। जैसे पिछले चुनाव में एक फ्रॉड स्कीम आयी थी- जनलोकपाल की फ्रॉड स्कीम। चुनाव जीतने के बाद- कौन जनलोकपाल? कैसा जनलोकपाल? एक फ्रॉड आदमी की एक और फ्रॉड स्कीम- पूर्ण राज्य। केजरीवाल कहते हैं सात सांसद जिता दो, हम पूर्ण राज्य बना देंगे। पर ये नहीं बताते कि सात सांसद तो उनके पास पहले भी थे- चार लोकसभा में और तीन राज्यसभा में। अगर सात सांसदों से पूर्ण राज्य बनता हैं तो क्यों नहीं बन गया दिल्ली पूर्ण राज्य?

देश की राजधानी होने का मतलब क्या है? सोचिए दिल्ली में मेट्रो का सबसे बड़ा और बेहतरीन नेटवर्क क्यों हैं? क्योंकि दिल्ली देश की राजधानी है। देश का सबसे शानदार एयरपोर्ट क्यों हैं? कभी सोचा है कि केवल 50 किलोमीटर के अंदर आईआईटी, एम्स, पाँच विश्वविद्यालय, सैकड़ों कॉलेज, स्कूल, कई बड़े अस्पताल, बड़े-बड़े स्टेडियम, हजारों पार्क, सैकड़ों एतिहासिक इमारतें, थोक व्यापार का केंद्र, बड़ी बड़ी मार्केट ये सब क्यों और कैसे हैं दिल्ली में? क्योंकि दिल्ली देश की राजधानी है। अगर दिल्ली देश की राजधानी नहीं होती तो क्या ये सब दिल्ली में होता? जी नहीं, असंभव था।

बिना राजधानी के कैसी होगी दिल्ली की हालत? अब कल्पना कीजिये एक ऐसे राज्य की जो केवल 50-60 किलोमीटर बड़ा हो, जिसके पास ना अपना पानी हो, ना बिजली, ना कोई प्राकृतिक संसाधन और लगभग दो करोड़ की जनसंख्या। सोचिए क्या होगा ऐसे राज्य में ?

दिल्ली का राजधानी का दर्जा ख़तम होते ही कम से कम 30 लाख दिल्लीवाले तुरंत बेरोजगार हो जाएंगे, व्यापार, काम धंधा ठप्प हो जाएगा, पानी, खाने और रोजमर्रा की जरूरतों तक के लिए दंगे होने शुरू हो जाएंगे। अपराध, लूट और भयानक गरीबी के जाल में दिल्ली उलझ जाएगी।

क्यों चाहते हैं केजरीवाल दिल्ली की बर्बादी? क्योंकि जहां गरीबी और भुखमरी फैलती है वहाँ नक्सली और देशद्रोहियों को फैलना आसान होता है। केजरीवाल आज टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथ खुलकर खड़े हैं। उनकी जाँच होने से रोक रहे हैं। पूर्ण राज्य ना होने पर जब वो खुलकर नक्सलियों और देशद्रोहियों का साथ दे रहे हैं तो पूर्ण राज्य होने पर तो वो दिल्ली की हालत कश्मीर घाटी जैसी बना देंगे। दिल्ली को देशद्रोहियों और नक्सलियों का अड्डा बनाने की तैयारी में हैं केजरीवाल इसलिए दिल्ली की बर्बादी में ही उनका फायदा है।

सफेद झूठ हैं पूर्ण राज्य बनाने के वादे

आजकल हर बात पर केजरीवाल कहते हैं पूर्ण राज्य होता तो मैं सिंगापुर लंदन पेरिस बना देता, सबको रहने के लिए बंगला दे देता, सबको नौकरी दे देता। अपनी हर नाकामी, निक्कमेपन को छिपाने के लिए पूर्ण राज्य का बहाना। केजरीवाल कहते रहे कि पूर्ण राज्य नहीं होगा तो कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों का वादा पूरा नहीं कर सकता, महिला सुरक्षा नहीं कर सकता, पानी नहीं दे सकता, सड़क,अस्पताल नहीं बना सकता। केजरीवाल का मंतव्य यही था कि जिस तरह ‘ना नौ मन तेल होगा, ना राधा नाचेगी’ वैसे ही ना दिल्ली पूर्ण राज्य बनेगी ना केजरीवाल कोई काम करेगा।

अब समय आ गया ऐसे फ्रॉड इंसान को ये समझाने का कि हम दिल्ली वाले कौन हैं और फ्रॉड करने वाले लोगों का हम क्या हाल करते हैं। अगर कोई पूर्ण राज्य की बात करने आए तो ये समझ लेना वो राजधानी का दर्जा ख़तम करने की बात कर रहा है, नक्सलियों और देशद्रोहियों का अड्डा बनाने की बात कर रहा है, दिल्ली को बर्बाद करना चाहता है और जो हमारी दिल्ली को बर्बाद करने की बात करेगा उसका हम दिल्ली वाले क्या हाल करेंगे, ये बताने का समय आ गया है।

आइये इस चुनाव में इस फ्रॉड स्कीम बेचने वाले केजरीवाल का बंटाधार कर दें। कोई अगर पूर्ण राज्य के नाम पर वोट मांगने आए तो उसका स्वागत उसी की ‘झाड़ू’ से जोरदार तरीके से किया जाए। हमारे वोट की ताकत से हम अपनी दिल्ली भी बचा सकते हैं और अपना देश भी। दिल्ली हमेशा रहेगी देश की राजधानी, फ्रॉड केजरीवाल को याद दिलाएगी नानी।

आपका भाई- कपिल मिश्रा

अध्यक्ष ‘Buddhu’ रौल विंसी नेशनल इकोनॉमिक प्लानिंग एंड पॉलिसी में फेल है: सुब्रमण्यम स्वामी

चुनावी मौसम में भाजपा नेताओं की योग्यता और डिग्री को अक्सर मुद्दा बनाने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी का इस बार सुब्रमण्यम स्वामी से सामना हुआ है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की शैक्षणिक योग्यता को आधार बनाकर उन पर निशाना साधा है।

स्वामी ने शुक्रवार (अप्रैल 12, 2019) रात ट्वीट कर कहा, “बुद्धु के कैम्ब्रिज सर्टिफिकेट के मुताबिक उसका नाम रौल विंसी है। उन्होंने एम.फिल की पढ़ाई की है, लेकिन वो नेशनल इकोनॉमिक प्लानिंग एंड पॉलिसी में फेल हो गए थे।”

स्वामी ने दूसरे ट्वीट में लिखा है कि स्मृति ईरानी की डिग्री पर प्रश्न करने वाली कॉन्ग्रेस की भुलक्कड़ प्रवक्ता को पहले प्री-थीसिस में फेल अपने पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी पर विचार करते हुए हुए उनसे उनकी थीसिस और एग्जाम रिजल्ट माँगना चाहिए।

राहुल गाँधी की मम्मी सोनिया गाँधी की डिग्री भी है विवादित

स्वामी ने इसके सबूत के रूप में यूनिवर्सिटी द्वारा जारी दस्तावेज को भी ट्वीट किया है। राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी पहले भी गाँधी परिवार के सदस्यों की शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठाते रहे हैं। साल 2000 की शुरुआत में उन्होंने राहुल गाँधी की मम्मी सोनिया गाँधी की डिग्री को लेकर तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष से शिकायत की थी। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट से गलत जानकारी देने के आधार पर उनकी लोकसभा सदस्यता खत्म करने की गुहार लगाई थी।

दरअसल, स्वामी ने तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष मनोहर जोशी के पास सोनिया गाँधी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराकर कहा था, “लोकसभा पेज के ‘Who is who’ यानी ‘कौन क्या है’ सेक्शन में लिखा है कि सोनिया गाँधी ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में डिप्लोमा किया था। स्वामी के मुताबिक उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से इस बारे में जानकारी माँगी थी। इसके जवाब में यूनिवर्सिटी ने बताया कि सोनिया ने वहाँ कभी पढ़ाई ही नहीं की है।

स्वामी के मुताबिक, तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष ने शिकायत पर स्पष्टीकरण के लिए सोनिया गाँधी से पत्राचार किया था। तब सोनिया गाँधी के हवाले से जवाब आया था कि उन्होंने कैम्ब्रिज से डिग्री ली है, न कि कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से, लोकसभा पब्लिकेशन में यूनिवर्सिटी शब्द गलती से छप गया है।

माओवादियों ने ली BJP MLA समेत 5 लोगों की हत्या की जिम्मेदारी, प्रोपेगंडा युद्ध चरम पर

छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की दरभा डिविजन कमिटी ने मंगलवार (अप्रैल 09, 2019) को दंतेवाड़ा में हुए नक्सली हमले और भाजपा विधायक भीमा मंडावी की हत्या की जिम्मेदारी ली है। इस हमले में भाजपा विधायक और 4 पुलिसकर्मी मारे गए थे। प्रतिबंधित संगठन ने केंद्र सरकार पर कॉरपोरेट हाउसों को फायदा पहुँचाने के लिए बस्तर के प्राकृतिक संसाधनों की लूटखसोट करने और उन्हें कौड़ी के दाम पर बेचने का भी आरोप लगाया है।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के दरभा डिविजन कमिटी के सचिव साईंनाथ के नाम से बृहस्पतिवार को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में माओवादियों ने दावा किया है कि सुरक्षा के बीच में पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी ने जनता की मदद से इस हमले को अंजाम दिया था। 

भाकपा (माओवादी) द्वारा जारी बयान सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है। इसमें कहा गया है, “हमारे पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी ने 9 अप्रैल को हुए हमले को अंजाम दिया था। इसमें दंतेवाड़ा से भाजपा विधायक भीमा मंडावी और चार सुरक्षाकर्मी मारे गए थे। हम उनके चार हथियार भी उठा ले गए थे।”

इससे पहले पुलिस ने कहा था कि हमले के बाद से सुरक्षा कर्मियों के तीन हथियार गायब हैं, इनमें से दो राइफल हैं। दो पेज का बयान नक्सलियों के दंडकारण्य विशेष क्षेत्र की दरभा डिवीजन समिति के सचिव साईनाथ के नाम से जारी किया गया। इसने कई भीषण हमलों को अंजाम दिया है। इसमें बस्तर की झीरम घाटी में 25 मई 2013 का हमला भी शामिल है। इसमें छत्तीसगढ़ प्रदेश कॉन्ग्रेस के कई बड़े नेता मारे गए थे।

प्रेस विज्ञप्ति में माओवादियों ने कारतूस और हथियार की तस्वीर भी जारी की है। विज्ञप्ति में उन्होंने लिखा है कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सत्ता में आते ही अंधराष्ट्रवाद को बढ़ावा देते हुए जातिगत भेदभाव को उकसा रही है तथा आरएसएस के अजेंडे, हिंदू राष्ट्र स्थापना के लक्ष्य की ओर आक्रामक रूप से काम कर रही है। दरभा डिविजन कमिटी पर क्षेत्र में कई नक्सली घटनाओं को अंजाम देने का आरोप है।

नक्सल विरोधी अभियान के पुलिस उप महानिरीक्षक सुंदरराज पी ने कहा है कि पुलिस इस विज्ञप्ति की सत्यता की जाँच कर रही है। यह उनके प्रॉपेगैंडा का ही हिस्सा है। माओवादी संगठन को अपने कृत्य को सही ठहराने का कोई अधिकार नहीं है। 

कठुआ रेप पीड़िता के पिता के बैंक अकाउंट से लाखों गायब, शक़ इंसाफ़ माँगने वालों पर

साल 2018 में जम्मू कश्मीर के कठुआ जिले के एक गाँव में एक बच्ची रहस्यमय हालात में गायब हो गई। कुछ दिन बाद कुछ दरिंदों ने बच्ची के साथ दुष्कर्म कर उसकी हत्या कर दी। इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया, देश भर में खूब हंगामा हुआ। देश-विदेश के कुछ मीडिया व मानवाधिकारों के कथित कार्यकर्ताओं ने भी इस मुद्दे को खूब उछाला था। पीड़िता के न्याय को लेकर काफी सियासत हुई, राजनीतिक गलियारों से लेकर बॉलीवुड जगत की तमाम हस्तियों ने खूब सक्रियता दिखाई और पीड़िता को न्याय दिलाने में किसी तरह की दिक्कत न आए इसके लिए देश-विदेश से लाखों रुपए का चंदा भी इकट्ठा किया गया।

चंदे के लिए पीड़िता के पिता व परिवार के नाम पर संयुक्त रूप से जम्मू कश्मीर बैंक में खाता खुलवाया गया था। मगर जिस तरह से बीते एक साल के दौरान पीड़िता को न्याय के नाम पर सियासत करने वाले धीरे-धीरे लापता हुए, उसी तरह से उसके पिता के खाते से पैसे भी अज्ञात लोग गायब करते गए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, रेप पीड़िता को न्याय दिलाने के नाम पर जिन लोगों ने पैसे इकट्ठे किए थे, उसमें से किसी अज्ञात शख्स ने ₹10 लाख निकाल लिए हैं। ये प्रक्रिया जनवरी 2019 से ही चल रही है। अगर पीड़िता के पिता 10 अप्रैल को बैंक न जाते, तो उन्हें इसके बारे में पता भी नहीं चलता कि उनके बैंक अकाउंट से कोई पैसे गायब कर रहा है।

पीड़िता के पिता ने कहा कि किसी ने उनके ज्वॉइंट अकाउंट से ₹10 लाख से अधिक की राशि निकाल ली है जिसके बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है। बैंक स्टेटमेंट में लगातार निकासी दिखाई दे रही है और अब उनके खाते में केवल ₹35,000 बचे हैं। उन्होंंने कहा कि हमें बताया गया था कि दुनिया भर से ₹1 करोड़ का दान दिया गया था, लेकिन पता वो पैसे नहीं कहाँ गए। पीड़िता के पिता ने पासबुक दिखाते हुए आरोप लगाया है कि असलम खान नामक किसी आदमी ने इसी साल 11, 14, 15 व 18 जनवरी को चेक के जरिए दो-दो लाख रुपए निकाले हैं। उन्होंने बताया कि असलम को वो जानते हैं, वो एक दो बार उनके साथ बैंक भी गया था। उन्होंने जब इस बारे में उससे बात की, तो उसने उनके साथ बुरा बर्ताव किया जिसकी वजह से उन्हें इस बात का शक है कि ये काम शायद उसी ने किया हो।

इसके अलावा 21 और 22 जनवरी को भी बैंक से ₹4 लाख निकलवाए गए और इस बार भी पैसा परिवार की तरफ से नहीं बल्कि किसी नसीम नामक व्यक्ति ने चेक के जरिए निकला है। पीड़िता के पिता का कहना है कि वो तो अनपढ़ हैं और चेक पर भी अंगूठा ही लगाते हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि पैसा कैसे और कहाँं जा रहा है। इस मामले पर संबंधित बैंक अधिकारी का कहना है कि ऐसा लगता है कि पीड़ित परिवार के बारे में पूरी जानकारी रखने वाले ही किसी शख्स ने ऐसा किया है, क्योंकि ये राशि चेक के जरिए निकाली गई है और इस चेक पर तारीख के साथ-साथ अंगूठे का निशान और बाकी सारी औपचारिकताएँ पूरी की गईं थी, जिसकी वजह से उसे रोका नहीं जा सकता था और ये काम परिवार का कोई करीबी ही कर सकता है। बैंक अधिकारी ने कहा कि परिवार अगली सूचना तक चेक बुक को ब्लॉक करवा सकता है।

वहीं, पीड़िता के दादाजी का कहना है कि जो लोग न्याय की गुहार लगाने की दौड़ में सबसे होने का दावा करते थे अब वो उनका फोन कॉल भी नहीं उठाते हैं। यहाँ पर यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि कुछ तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं की तरफ से पीड़िता के परिवार को मदद या न्याय दिलाने का ढोंग रचा जा रहा था। कुछ लोग पीड़िता के न्याय के नाम पर अपनी जेब गर्म करना चाहते थे। पिछले दिनों एक ऑडियो क्लिप जारी हुआ था, जिसमें दो लोगों को बात करते हुए सुना गया था कि उन दोनों ने पीड़िता के नाम पर बड़ी रकम जमा कर ली है, जो कि कभी उस परिवार के पास नहीं जाएगी। इस ऑडियो में साफ हो गया था कि कुछ लोगों ने अपने हित को साधने के लिए ये पैंतरा आजमाया था।

पीड़िता के लिए न्याय के नाम पर धनराशि इकट्ठा करने वालों में से एक हैं जेएनयू की फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद। उन्होंने दावा किया था कि उनके द्वारा ₹40 लाख से अधिक की धनराशि जमा की गई थी और फिर बाद में उन्होंने यह भी कहा था कि वकील पैसे नहीं ले रहे हैं, तो इसलिए बलात्कार पीड़िता के परिवार को ₹10 लाख की राशि सौंपी जाएगी। मगर सच्चाई तो यही है कि पीड़िता के परिवार के हाथ में अब तक एक भी पैसा गया ही नहीं। शेहला इस बात को इंकार करते हुए कहती है कि उनके पास पैसे पहुँचने में देर इसलिए हुई क्योंकि पीड़ित परिवार के पास ज्वॉइंट अकाउंट और पैन कार्ड नहीं था।

इस अभियान के मुख्य कार्यकर्ताओं में से एक है तालिब हुसैन, जिसे बाद में बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया गया और जेल भेज दिया गया। और फिर वो महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी में शामिल हो गया। शेहला रशीद ने भी कश्मीर के पूर्व आईएएस अधिकारी शाह फ़ैसल के साथ राजनीति में शामिल होने का संकल्प लिया है, जिसने भारत को ‘रेपिस्तान’ कहा था।

बीते साल हुआ कठुआ गैंगरेप काफी चर्चा में आया था तो ऐसा लगा था कि नेताओं ने रेप पड़िता के परिवार के लिए आर्थिक मदद का पिटारा ही खोल दिया। कुछ कार्यकर्ताओं ने तो इनके लिए पैसे इकट्ठा करने की भी बात कही। और कुछ तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने ऐसा किया भी। मगर अब जो खबर सामने आ रही है, उससे यह सवाल उठना तो तय है कि आखिर बैंक अकाउंट से पैसे गए कहाँ? इस अभियान में मुख्य रूप से शेहला राशिद और तालिब हुसैन शामिल थे। इनमें से एक बलात्कारी है, तो दूसरी ऐसे लोगों के संपर्क में है, जिसने भारत को रेपिस्तान कहा था।

ये लोग समाजसेवा की मूरत बनकर लोगों के सामने आए थे। यहाँ पर एक बात खटकती है कि जो इंसान खुद बलात्कारी हो वो भला क्या किसी और बलात्कार पीड़िता के दर्द को समझेगा और उसके न्याय के लिए पैसे जुटाएगा। ऐसा माना जा रहा है कि इन लोगों ने सबकी नज़रों में आने के लिए पीड़िता के नाम पर पैसे तो जुटाए, लेकिन पीड़िता के परिवार के लिए नहीं, बल्कि अपने लिए। इसलिए तो पैसे जमा भी हुए अकाउंट में और गायब भी हो गए। इससे साफ जाहिर होता है कि इनके ही करीबियों ने इस घोखाधड़ी को अंजाम दिया है।

इनके लिए ये अभियान चलाना तो महज एक दिखावा था, इन्हें तो पीड़िता की आड़ में अपने लिए लोगों से पैसे लूटने थे। 23 दिसंबर 2018 तक बैंक अकाउंट में लगभग ₹23 लाख थे। जिसके बाद जनवरी से मार्च 2019 के बीच बिना पीड़िता के परिवार की जानकारी के बैंक से पैसे की निकासी की प्रक्रिया शुरू हुई और अब उसमें सिर्फ ₹35,000 हैं। एक पिता अपनी बच्ची को इंसाफ दिलाना चाहता है। ऐसे में इन लोगों ने जिस तरह का घटिया खेल खेला है, पीड़ित परिवार को बेहद तगड़ा झटका लगा है। वहीं जिन नेताओं ने परिवार से मदद की उम्मीद जताई थी, वो नेता भी अब सामने आते नहीं दिखाई दे रहे हैं।

नेहरू-इंदिरा पर बनी कोई घटिया फिल्म भी शानदार कही जाती, लेकिन शास्त्री की मृत्यु का सच इनकी चूलें हिला देगा

विवेक अग्निहोत्री के निर्देशन में बनी फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। फिल्म के रिलीज़ से पहले कॉन्ग्रेस कुछ ज़्यादा बेचैन थी और कॉन्ग्रेस समर्थित कुछ पत्रकार भी, दोनों का बेचैन होना स्वाभाविक था। रिलीज़ के दो-दिन पहले कॉन्ग्रेस ने पूरी कोशिश की कि फिल्म की रिलीज को रोक दिया जाए, विवेक अग्निहोत्री को लीगल नोटिस भी भेजा गया। लेकिन, तमाम विवादों को दरकिनार करते हुए फिल्म अब सिनेमा घरों में है। कॉन्ग्रेस की परेशानी की वजह फिल्म की कहानी थी। कहानी देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय मृत्यु की गुत्थी पर आधारित है।

विवेक रंजन अग्निहोत्री इससे पहले कई फिल्मे बना चुके हैं लेकिन इनकी फिल्म ‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम’ ने खासा ध्यान आकर्षित किया था। कई वामपंथी पत्रकार तो विवेक से तभी से चिढ़े हुए हैं। अब वो “द ताशकंद फाइल्स” के रूप में लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय मौत की कहानी लेकर आए हैं। ऐसी कहानी ऐसी जो भारत की सबसे बड़ी मिस्ट्री के कुछ राज़ पर्दे पर खोल रही है। कुछ बड़े सवाल हैं जो आज के युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं। बता दूँ कि भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत एक बेहद संजीदा मामला है जो आज तक हल नहीं हो पाया है। सवाल कई है, इस फिल्म के माध्यम से मनोरंजक अंदाज में उन रहस्यों की कई परतों को खोलने की कोशिश की गई है।

फिल्म में क्या है? लाल बहादुर शास्त्री के रहस्यमय मौत की पीछे के कारणों की पड़ताल में मैं नहीं जाना चाहूँगा। अभी प्रमुख मुद्दा ऐसे कई कूढ़मगज कॉन्ग्रेसी चाटुकार वामपंथी पत्रकार हैं जिन्होंने बिना फिल्म देखे ही अघोषित रूप से इस फिल्म का बहिष्कार किया और कुछ ने घोषित तौर पर भी अपने प्रोफेशन को धता बता फिल्म का दुष्प्रचार करने के लिए कमर कस ली है।

अभिव्यक्ति और कलात्मक स्वतंत्रता जैसे जुमलों का भयंकर दुरुपयोग करने में जिस गिरोह को महारत हासिल है वह किसी से छिपा नहीं है। लोकसभा चुनाव के दौरान इस वामपंथी गिरोह का नेक्सस कितना मजबूत है इसकी बानगी लगातार देखने को मिल रही है। कैसे ये पूरा गिरोह नैरेटिव गढ़ने में माहिर है। ये पूरा गिरोह छद्म आदर्शों की आड़ में एजेंडा सेटिंग, फेक न्यूज़ के साथ ही फेक माहौल गढ़ने में भी खुद को सिरमौर मानता है। ऐसा इस वजह से है कि इस गिरोह की पकड़ लेखन, साहित्य, फिल्म से लेकर लगभग हर क्षेत्र में है। जहाँ भी ये रहेंगे विचारधारा की चाशनी को बड़े-बड़े लफ्फबाजी में घोल कर पिलाने के बाद भी निष्पक्षता का चोला ओढ़े रहेंगे। इतना कुछ इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि आज एक बार फिर इनके रंग देख कर हैरान हूँ क्योंकि मुद्दा विवेक अग्निहोत्री की फिल्म “द ताशकंद फाइल्स” की रिलीज़ का है।

फिल्म सिनेमाघरों में आ चुकी है, फिल्म के प्रति दर्शकों का रेस्पॉन्स अच्छा है लेकिन वामपंथी फिल्म समीक्षक और कुछ फिल्म पत्रकारों को मिर्ची लगी हुई है। ये वही गिरोह है जो ताशकंद फाइल के रिलीज़ से पहले चाहता था कि फिल्म रिलीज़ ही न हो और अब ऐसी ख्वाहिश पाले बैठा है कि फिल्म फ्लॉप हो जाए। कुछ ने तो फिल्म का रिव्यु कर रेटिंग देने से भी इंकार कर दिया है।

शायद ये सभी वामपंथी मुर्गे इस भ्रम के शिकार हैं कि यदि बांग नहीं देंगे तो सूरज निकलेगा ही नहीं। ये शायद भूल रहे हैं कि ऐसा कहकर और करने से ये खुद अपनी भद्द पिटवा रहे हैं। कहाँ गई इनकी कलात्मक स्वतंत्रता या अभिव्यक्ति की रक्षा का संकल्प? खैर, निर्देशक ने अपनी अभिव्यक्ति कलाकारों के माध्यम से दर्शकों के सामने रख दी है, अब जनता को तय करने दीजिए कि फिल्म कैसी है। ये जो पूरा गिरोह, जो इस फिल्म की रेटिंग घटाने का अथक प्रयास कर अपने ही प्रोफेशन से बेईमानी पर उतर आया है।

कुछ तो इसे 0.5-1 की रेटिंग के बीच समेट कर अपनी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने में जुटे हैं तो कुछ ने सीधे-सीधे फिल्म की समीक्षा से ही इनकार कर दिया है। इसमें प्रमुख नाम हिंदुस्तान टाइम्स का पत्रकार राजा सेन है। राजा सेन ने फिल्म के रिव्यु से सीधे इनकार किया है। राजा की विवेक अग्निहोत्री से दुश्मनी जग ज़ाहिर है कि इससे पहले इन्होंने विवेक की फिल्म “बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम” की समीक्षा न करके विवेक अग्निहोत्री के राजनीतिक रुझान की समीक्षा में कई पेज काले किए थे।

वैसे भी, इस समय ये पूरा गिरोह बहुत सकते में हैं क्योंकि इनका कोई भी हथकंडा काम नहीं आ रहा। द ताशकंद फाइल्स ’देश के दूसरे प्रधानमंत्री, जय जवान जय किसान के प्रणेता लाल बहादुर शास्त्री की रहस्मयी मृत्यु के बारे में है। एक ऐसा रहस्य जिसने राष्ट्र को लंबे समय तक परेशान किया है और कुछ ऐसे चुभते सवाल जो सभी के ज़ेहन में थे लेकिन तब के किसी पत्रकार ने भारतीय राजनीति के पहले पारिवारिक राजवंश से पूछने की हिम्मत जुटा सका। और अब जब इस विमर्श को उठाया गया है तो ये पूरा गिरोह इस बात से आशंकित है कि फिल्म में ऐसा माहौल बनाया गया है कि नेहरू राजवंश की तत्कालीन मलिका इंदिरा सवालों के घेरे में आ जाएँगी।

वामपंथी बॉलीवुड गिरोह के एक दूसरे सैनिक असीम छाबड़ा ने फिल्म के पीआर एजेंट को जवाब दिया और कहा कि वह बिल्कुल भी फिल्म नहीं देखना चाहते हैं। छाबड़ा ने तो फिल्म देखने से इस अंदाज़ में इंकार किया जैसे अगर छाबड़ा नहीं गए तो दर्शक भी फिल्म से किनारा कर लेंगे। सिलसिला यही नहीं रुका राजीव मसंद और अनुपमा चोपड़ा जैसे फिल्म समीक्षकों ने भी विवेक अग्निहोत्री की फिल्म की समीक्षा करने से इनकार कर दिया है। यहाँ भी इन दोनों ने ऐसा करने के लिए कोई कारण नहीं दिया है, लेकिन लोग इनके कारणों से अच्छी तरह वाकिफ हैं। शायद इनकी घृणित विचारधारा ने ही इन्हें अपने पेशे के साथ विश्वासघात करने के लिए मजबूर किया होगा।

फिल्मों से करीबी सम्बन्ध रखने के कारण यह कह सकता हूँ कि फिल्म निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है। आज जो कुछ ये पूरा गिरोह कर रहा है, इसे हैंडल करना, किसी भी फिल्म निर्माता के लिए इतना आसान नहीं हो सकता है। ऑपइंडिया ने विवेक अग्निहोत्री से इस तरह के संगठित विरोध पर प्रतिक्रिया के लिए संपर्क किया।

क्या फिल्म उद्योग इस हद तक कुछ वामपंथी समीक्षकों शिकार हो सकता है?

उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं होता अगर मैंने जवाहरलाल नेहरू के बारे में कोई फिल्म बनाई होती”। अग्निहोत्री ने कहा उन्हें विशेष रूप से बॉलीवुड के एलीट क्लास द्वारा टारगेट किया जा रहा है क्योंकि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक रहे हैं।

यहाँ इस बात का जिक्र करना लाज़मी होगा कि बॉलीवुड एक एलीट क्लब की तरह है, जो वामपंथी राजनीतिक विचारधारा का गढ़ है, अगर कोई इन मठाधीशों वाली विचारधारा रखता है। अगर कोई उस खेमे का हिस्सा है जो पीएम मोदी को गाली देता है, तो वे अपने हैं, उन्हें ये पूरा गिरोह झाड़ पर चढ़ा के रखेगा। उसके किसी घटिया फिल्म के प्रचार में ये पूरा गिरोह एक साथ हुँआ-हुँआ करेगा और अगर कोई उन 900 लोगों का हिस्सा है जो प्रधानमंत्री और उनकी नीतियों का समर्थन करना चाहते हैं, तो इंडस्ट्री का यह गिरोह बहिष्कार और गाली तक का सहारा लेकर, परेशान करने की हर संभव कोशिश करता है। ये पूरा गिरोह असहिष्णुणता की सभी हदें पार करने के बाद भी इतना बड़ा हिप्पोक्रेट है कि दूसरे पर ही असहिष्णु होने का आरोप मढ़ नंगा हो सड़क पर भी निकल सकता है।

विवेक अग्निहोत्री ने इस गिरोह पर तंज करते हुए कहा कि यह ऐसे लोग हैं जो फिल्म उद्योग का राजनीतिकरण कर रहे हैं। हमने कभी किसी से नहीं पूछा कि वे एक मंदिर में ‘बिस्मिल्लाह’ क्यों गाएँगे और एक मस्जिद में ‘हरे राम हरे कृष्ण’ का जाप करते हुए गीत क्यों नहीं गाएँगे। यह सब उनके लिए मायने नहीं रखता है, लेकिन उद्योग के तथाकथित उदारवादियों के लिए, यह सिद्धांत हैं जो तय करता हैं कि किसी को फिल्में बनाने की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं।

ताशकंद फाइल लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय मौत के बारे में बात करती हैं। विवेक ने कहा कि उनसे नफरत करने में इन “उदारवादियों” ने लाल बहादुर शास्त्री से सिर्फ इसलिए नफरत करना शुरू कर दिया है क्योंकि वह राष्ट्रवाद के प्रतीक थे। एक ग्रामीण नेता जो नेहरू की तरह अंग्रेजी में बात नहीं कर सकते थे।

विवेक अग्निहोत्री ने आगे कहा, “क्यों उन्हें ताशकंद फाइल के साथ ही समस्या है? जबकि मद्रास कैफे राजीव गाँधी की मृत्यु पर आधारित होते हुए भी एक शानदार फिल्म थी। ये दोनों फिल्में एक ही शैली और विषय वस्तु की हैं। इन्हे मद्रास कैफे से समस्या नहीं है लेकिन द ताशकंद फाइल्स से है? क्योंकि पहली इनकी विचारधारा को आगे बढ़ाती है। जबकि ताशकंद फाइल कुछ ज़रूरी सवाल खड़े करती है।”

“अगर मैंने जय प्रकाश नारायण या इंदिरा गाँधी पर एक फिल्म बनाई होती, तो उन्हें बहुत अच्छा लगता। तब ये पूरा गिरोह इसे वैज्ञानिक टेम्परामेंट के साथ कला को आगे बढ़ाने का काम कहता। लेकिन वहीं अगर मैंने श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर फिल्म बनाई होती, तो वे मुझे मार डालते। बस यहाँ भी ये विरोध कर वही कर रहे हैं।”

आगे ‘अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के छद्म योद्धाओं’ की निंदा करते हुए, उन्होंने कहा कि लोगों का यह गिरोह केवल उनके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भाषण के विचार में विश्वास रखता है, जो सिर्फ इस गिरोह के हैं। जो लोग इनकी विचारधारा से अलग हटकर, जो सच है या वे जिस असहज सच को उठाना चाहते हैं। जो लोग इस बने-बनाए ढाँचे से विद्रोह करने की हिम्मत रखते हैं, इस गिरोह को सबक सिखाने-समझाने की हिम्मत रखते हैं उसे ये हतोत्साहित करते हैं।

आज जो कुछ भी हो रहा है और घृणा के जिस स्तर पर एक फिल्म को देखे बिना भी ये पूरा गिरोह लॉबिंग कर एक तरह से बहिष्कार करने की मुद्रा में है। किसी भी फिल्म के लिए यह चलन खतरनाक है। आज ये पूरा गिरोह विवेक अग्निहोत्री को मोदी समर्थक होने के लिए दंडित कर रहा है। इससे इसकी चाटुकारिता ही नहीं बल्कि नकली निष्पक्षता की भी कलई खुल रही है।

खैर जितना ये पूरा वामपंथी गिरोह फिल्म के दुष्प्रचार में लगा है उतना ही दर्शक और पाठक भी ऐसे गिरोहों को मुहतोड़ जवाब दे फिल्म का अपने स्तर पर प्रचार कर रहे हैं। फिल्म और अपने काम को तवज्जो देने वाले कई फिल्म समीक्षकों ने फिल्म को 5 में से 3-4 स्टार दिया है। जहाँ तक मुझे पता है फिल्म अच्छी है। इस देश के सबसे रहस्यमय मौत की गुत्थी से परदे हटाती है बिना किसी तरह के जजमेंट थोपे हुए। मौका निकालिए देख आइए, फिर लिखिए अपनी फिल्म समीक्षा, ऐसा करना इन वामपंथी छद्म सेक्युलरों के मुँह पर करारा तमाचा होगा। इन्हे भी पता चलेगा कि देश इन मुर्गों को यह एहसास दिलाने के लिए एकजुट है कि सूरज को तुम्हारे बांग देने से कुछ नहीं लेना-देना। भ्रम से बाहर निकलो मठाधीशी जाने वाली है।

‘मोदी को हम देश से बाहर निकालेंगे, मोदी बेचेगा चाय और पकौड़े’: अजमल ने फिर उगला ज़हर

AIUDF (ऑल इंडिया यूनाईटिड डेमोक्रेटिक फंड) पार्टी के प्रमुख बदरूद्दीन अजमल ने पीएम मोदी को लेकर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की है। उन्होंने असम के चिरांग में कहा कि जितने भी मोदी विरोधी गठबंधन है, वो सभी मिलकर मोदी को देश से बाहर निकालेंगे, जिसके बाद मोदी कहीं न कहीं जाकर चाय की दुकान चलाएगा और साथ में पकौड़े भी बेचेगा। आए दिन राजनीति में बयानबाजी का स्तर काफी नीचे गिरता जा रहा है और समूचा विपक्ष जिस तरह की बयानबाजी कर राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहा है, उससे ऐसा लग रहा है जैसे वो भाजपा सरकार से कम मोदी से अधिक बौखलाया हो। उनका निशाना कोई पार्टी नहीं बल्कि प्रधानमंत्री मोदी हैं। वैसे बदरूद्दीन अजमल का विवादों से पुराना नाता रहा है और ये भाजपा और कॉन्ग्रेस दोनों को ही अपनी विरोधी पार्टी बताते हैं।

गौरतलब है कि अभी कुछ दिन पहले ही AIUDF के प्रत्याशियों के खिलााफ कॉन्ग्रेस द्वारा अपनी पार्टी के उम्मीदवार खड़े करने पर बदरूद्दीन ने कॉन्ग्रेस पर विश्वासघात का आरोप लगाया था। बदरूद्दीन ने असम प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी पर आरोप लगाया था कि वो AIUDF को खत्म करने की कोशिश कर रही है। उनका कहना था कि कॉन्ग्रेस का मकसद AIUDF को खत्म करना है। कॉन्ग्रेस के मुस्लिम नेता नहीं चाहते हैं कि कॉन्ग्रेस और AIUDF में गठबंधन हो, क्योंकि अगर ऐसा होता है तो उनका राजनैतिक भविष्य हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।

अजमल ने कहा था कि अगर भाजपा उनकी पहली दुश्मन है, तो वहीं कॉन्ग्रेस दूसरी नंबर की दुश्मन है। उनका कहना था कि उन्होंने ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर सीटों का त्याग किया था, उनकी कॉन्ग्रेस को मदद करने की कोई मंशा नहीं थी। बदरूद्दीन का कहना है कि उन्होंने यह निर्णय असम की भाषा, संस्कृति, पहचान और हर परिप्रेक्ष्य को देखकर लिया था। वो चाहते थे कि कॉन्ग्रेस भी उन तीनों सीटों पर अपने प्रत्याशी न उतारकर उनकी तरह त्याग करे इससे वो तीन सीटों पर तो कॉन्ग्रेस 7 सीटों पर और भाजपा को मुश्किल से 2 सीटें मिलती।

इसके साथ ही बदरूद्दीन ने कॉन्ग्रेस की कठोरता पर प्रहार करते हुए कहा था कि कॉन्ग्रेस अपने रवैये के कारण ही हिंदू इलाकों में जीरो हैं। उनकी मानें तो राज्य में कॉन्ग्रेस पूरी तरह से मुस्लिम आधारित पार्टी है क्योंकि पार्टी में 25 में से 15 विधायक अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। इसके साथ ही अजमल का आरोप है कि कॉन्ग्रेस पार्टी वोटों के लिए मुस्लिम को बेवकूफ बनाकर ब्लैकमेल कर रही है। उनकी मानें तो दशकों से समुदाय विशेष के वोट का इस्तेमाल करके, अब कॉन्ग्रेस को AIUDF जैसी पार्टी से डर लग रहा है कि कहीं उनके वोट न छिन जाएँ।

भक्त का भगवान हो जाना ही रामनवमी का वास्तविक संदेश है, और विजय का मंत्र भी

रामनवमी के साथ ही चैत्र नवरात्र का समापन हो जाता है। चैत्र माह की शुक्‍ल पक्ष की नवमी को मध्याह्न के समय पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्‍न में राजा दशरथ के यहाँ भगवान श्रीराम का जन्‍म हुआ था। यही वजह है कि इस दिन को राम नवमी के नाम से जाना जाता है। रामनवमी के दिन माँ दुर्गा के नौवें रूप सिद्धिदात्री की पूजा के साथ मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की पूजा का भी विधान है।

इससे पहले कि राम के व्यक्तित्व के कुछ विशेष पहलुओं पर बात करें, कुछ मूलभूत बातें जैसे कि हिन्‍दू कैलेंडर के अनुसार रामनवमी हर साल चैत्र माह की शुक्‍ल पक्ष की नवमी को मनाई जाती है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह पर्व हर साल मार्च या अप्रैल महीने में आता है। इस बार राम नवमी दो दिन मनाई जाएगी। विक्रमी संवत के अनुसार 13 अप्रैल को 11:40 तक अष्टमी है उसके बाद नवमी तिथि लग जाएगी। पंडितों के अनुसार इस बार रामनवमी दो दिन अर्थात 13 और 14 अप्रैल को मनाई जाएगी।

सनातन धर्म में रामनवमी का विशेष महत्‍व है। इसी दिन भगवान विष्‍णु ने अयोध्‍या के राजा दशरथ की पहली पत्‍नी कौशल्‍या की कोख से भगवान राम के रूप में मनुष्‍य योनि में जन्‍म लिया था। हिन्‍दू धर्म की मान्‍यताओं में भगवान राम को सृष्टि के पालनहार श्री विष्‍णु का सातवाँ अवतार माना गया है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने बनारस के तुलसीघाट पर जिस राम चरित मानस की रचना की थी, उसका आरंभ भी राम के जन्मदिवस अर्थात रामनवमी को ही हुआ था।

रामकथा पर लगभग 1000 से भी ज़्यादा प्राप्त ग्रन्थ हैं। इनमें वाल्मीकि रामायण को आधार माना जाता है। राम की लगभग सम्पूर्ण गाथा इस महाकाव्य में है। आज रामनवमी के अवसर पर श्रीराम के व्यक्तित्व की कुछ मूलभूत बातों पर गौर करते हैं जिन्हे अगर हमने ठीक से समझ लिया तो आज रामनवमी मनाने का यह एक नया अंदाज होगा। वैसे भी सनातन में हर भक्त की भगवान हो जाने की पूरी सम्भावना व्यक्त की गई है।

चलिए, रामायण में घटी एक सुंदर घटना का जिक्र कर रहा हूँ। इससे पहले राम के जीवन में बहुत सी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ घटित हो चुकी थीं। जैसे पिता की आज्ञा पालन के लिए उन्हें अपने राज्य से बाहर 14 वर्ष के लिए वनवास जाना पड़ा था। जंगल का जीवन आसान नहीं होता, ज़ाहिर है उन्हें एक मुश्किल जीवन जीना पड़ा होगा। फिर उनकी पत्नी सीता का रावण ने हरण कर लिया। प्रेम और चिंता से भरे राम दक्षिण भारत पहुँचे, एक सेना तैयार की, और लंका पहुँच कर युद्ध लड़ा, रावण पर विजय प्राप्त की। एक तरह से इस युद्ध में रावण का समूल नाश हो गया।

इतनी कहानी तो आप सभी को पता है और ये भी कि रावण के दस सिर थे। रावण को मारने के लिए, राम को सभी दस सिर काटने पड़े। सवाल यहाँ यह भी हो सकता है कि एक व्यक्ति के दस सिर भला कैसे संभव हैं। इसके कई जवाब हैं अभी के लिए आप इतना समझिए कि चूँकि पहले लिपि नहीं थी, ऐसे में जो भी पहली भाषा विकसित हुई होगी वह चित्रात्मक होगी। क्योंकि चित्रों के माध्यम से कुछ भी व्यक्त करना आसान रहा होगा। इस मत के कई प्रमाण हैं। बाकी दस सिरों पर आगे बात होगी।

योगवशिष्ठ में ये कथा आती है, रावण से युद्ध जीतने के बाद राम बोले, “मैं हिमालय जाकर प्रायश्चित करना चाहता हूँ, क्योंकि मैंने एक गलत काम किया है। मैंने एक ऐसे मनुष्य को मार दिया जो महान शिव भक्त था, एक विद्वान था, एक महान राजा था और दानवीर भी था।” यह सुनकर सबको बहुत आश्चर्य हुआ। कहते हैं कि राम के भाई लक्ष्मण बोले, “आप यह क्या कह रहे हैं? उसने आपकी पत्नी का हरण किया था। फिर प्रायश्चित क्यों?” राम बोले, “उसके दस सिरों में एक सिर ऐसा था जिसमें बहुत ज्ञान था, पवित्रता और भक्ति थी। उस सिर को काटने का पश्चाताप है मुझे।”

इस कथा का सार यह है कि हर किसी के दस या ज्यादा सिर होते हैं। हमारा सिर अलग-अलग प्रवृत्तियों का जन्मस्थान है जिनसे हमारा पूरा कृतित्व और व्यक्तित्व निर्धारित होता है। जैसे एक दिन, हमारा सिर लालच से भरा होता है, दूसरे दिन ईर्ष्या से फिर किसी दिन नफरत, प्रेम, कामनाएँ, सुंदर या फिर कुरूपता से या अनेक अन्य तरह की दुर्भावनाओं से, ये सारे विचार सिर में ही तो अपनी जड़ें जमाते हैं, वहीं से अपनी सत्ता चलाते हैं। या फिर हो सकता है कि एक ही दिन में कोई ऐसी सभी भावनाओं से गुजरता हो।

जैसे ही कोई किसी को ईर्ष्या के एक पल में देखता हैं, तो वह निष्कर्ष निकाल लेता हैं कि वो ईर्ष्यालु है। अगर कोई किसी को लालच के एक पल में देखता हैं, तो तुरंत निष्कर्ष निकाल लेता है कि वह लालची है। पर असल में, यह सब अलग-अलग समय पर, सभी में अलग-अलग सिरों के काम करने की वजह से होता है। हम सभी में कम-से-कम एक सिर प्रेम, सुंदरता, उदारता और करुणा का होता है। जो गलती लोग करते हैं वो यह है कि एक गुण या अवगुण की पहचान करने की जगह हम उस व्यक्ति की बुराई करते हैं।

यहाँ, राम के पश्चाताप का अर्थ है कि राम कहना चाहते थे, कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि रावण ने कितने बुरे काम किए हैं, उसमें एक आयाम ऐसा था जो कि जबरदस्त संभावनाओं से भरा था। सनातन में जो भी कथाएँ हैं, उन सभी कथाओं का एक गूढ़ अर्थ भी है। अगर हम उसे समझ जाएँ तो जीवन जीने का पूरा अंदाज़ ही बदल जाए, यूँ ही किसी कथा को पीढ़ी दर पीढ़ी हज़ारों सालों से आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है।

जैसे यहाँ है, किसी व्यक्ति में छिपे अवगुण की बुराई करें उस व्यक्ति की नहीं। राम को जिसने भी समझा, अनुभूत किया, वह उसमे एक नए आयाम में प्रकट हुए चाहे वह कबीर के राम हों या रामानुजन के राम, भगवान राम ने सदैव अपने आत्मसात करने वाले के व्यक्तित्व को एक नई ऊँचाई दी। गाँधी ने भी जब राम को अपनाया तो महात्मा कहलाए।

साधारण से नियम के पालन के भी कई दूरगामी परिणाम हैं। जब भी हमें किसी में कुछ गलत दिखे, तो हम उस अवगुण की बुराई करें न कि उस व्यक्ति की। अगर हम अपने जीवन में इस विवेक को शामिल कर लेते हैं तो हम निश्चित रूप से अपने कई बोझों से मुक्ति पा लेंगे। जब हम दूसरों के साथ ऐसा करेंगे तो यक़ीनन हमारे साथ भी ऐसा होगा।

राम की कहानी में प्रेम की पीड़ा भी है और प्रेम की पराकाष्ठा भी। अक्सर कहा जाता है कि ‘प्रेम एक ऐसे पुरुष और स्त्री के बीच होता है जो एक दूसरे को नहीं जानते।’ ये तभी सही हो सकता है जब कोई एक सारहीन, आलोचनात्मक या फिर नासमझी भरा जीवन जीता है। कायदे से होना तो यह चाहिए कि जितना हम किसी को जानते हैं, उतना ही अधिक प्रेम और करुणा हममें जागनी चाहिए। जब हम उनके सभी संघर्ष जान जाते हैं, तो हम समझ जाते हैं कि वे भी हमारी ही तरह मनुष्य हैं।

राम ने ऐसे मनुष्य को मारने का प्रायश्चित किया जिसने उनकी पत्नी का हरण किया था, और कई सारे बुरे काम किए थे। फिर भी राम ने रावण के उस एक सिर को पहचाना जो कि सुंदर था। राम एक जबरदस्त बोध वाले मनुष्य हैं, जिन्होंने अपने जीवन की उच्चतर सम्भावना को जीया और इसीलिए वह मानवता के आदर्श होकर पूजनीय हुए, उनकी पूजा की जाती है। माना कि वे अपने जीवन में कई सारी चीज़ों में विफल हुए, पर उनकी विफलता ने कभी उनके बोध और गुणों को नहीं बदला। जीवन ने उनके साथ चाहे जो भी किया, वे हमेशा उससे ऊपर रहे।

आज रामनवमी के अवसर पर जब राजनीतिक बयानबाजी की बिसात बिछी है, राजनेताओं में गिरने की होड़ मची है तो आज राम-राज्य और राम ज़्यादा प्रासंगिक हो जाते हैं। राम के व्यक्तित्व का ये उदाहरण यदि हम याद रखें। सोचिए, अगर व्यक्ति की बुराई करने के बजाए गुणों को पहचानने की समझ है तो उसके जीवन में दैवीय गुणों अर्थात जीवन के उच्चतर आयामों का समावेश क्यों नहीं होगा।

कहते हैं कि गुलाब के पौधे में गुलाब से ज्यादा काँटे होते हैं। पर हम फिर भी उसे गुलाब का पौधा कहते हैं, काँटे का नहीं, क्योंकि हम सुंदरता को देखते हैं। जीवन के उच्चतर आयाम को। आम के पेड़ में आम से ज्यादा पत्ते होते हैं, पर हम फिर भी उसे आम का पेड़ कहते हैं क्योंकि हम फलों की मिठास को देखते हैं।

ऐसे ही हर मनुष्य में मिठास की कम-से-कम एक बूँद तो होगी ही। फिर हम उसे क्यों नहीं देख पाते? जरा सोचिए अगर राम को ठीक से समझ जाएँ तो भी जीवन की गुणवत्ता में आमूल परिवर्तन संभव है। कल्पना कीजिए अगर हर किसी के साथ हम ऐसा ही करें। ऐसे लोग जिन्हें हम भयानक समझने की भूल करते हैं, उनमें भी मिठास की एक बूँद को भी यदि पहचानने में हम सफल हो जाएँ तो निश्चित रूप से हमारी मिठास को पहचानने की काबिलियत हमारे भी व्यक्तित्व को ऊपर उठाएगी। उसकी मिठास हमारे व्यक्तित्व में भी झलकेगी। राम हो जाने की संभावना को चरितार्थ करने की दशा में यह एक बड़ा कदम होगा।

इसका यह मतलब भी नहीं कि कोई अपनी आंखें मूँद अन्धे हो जाए। हम पेड़ में पत्ते देखते हैं, पेड़ में काँटे देखते हैं पर हम फूलों और फलों का होना भी स्वीकारते हैं। बस एक सार्थक और आनंददायक जीवन जीने की इतनी ही मर्यादा है जिसके पालन की जरुरत है। फिर हमें मर्यादा पुरुषोत्तम होने से कोई नहीं रोक सकता। तो क्यों न सनातन की इस सबसे बड़ी सीख को जीवन का हिस्सा बनाएँ। आज रामनवमी के दिन से ही राम को अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बनाएँ, फिर जीवन चाहे जिस पथ पर ले जाए विजय हमारी होगी। राम के वंशज होने के कारण हमें यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए।

‘दीदी’ के सिलीगुड़ी में नहीं मिली कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के हेलिकॉप्टर को उतरने की इजाजत

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की 14 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में होने वाली रैली पर विवादों का साया छाया रहा। सिलीगुड़ी पुलिस ने राहुल गाँधी के हेलीकॉप्टर को लैंडिंग की मंजूरी नहीं दी है। सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पुलिस ने हेलीकॉप्टर लैंडिंग से मना किया है।

देश में लोकसभा चुनाव 2019 का प्रचार चरम पर है। सभी नेता देश भर में घूम-घूम कर रैली कर रहे हैं। इस बीच पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के हेलिकॉप्टर को उतरने की अनुमति नहीं मिली है। रिपोर्ट्स के अनुसार, स्थानीय प्रशासन ने उनके हेलिकॉप्टर को उतरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है।

कॉन्ग्रेस ने बताया इसे ममता बनर्जी की राजनीतिक चाल

इससे पहले भी पश्चिम बंगाल में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विमान को उतरने की अनुमति नहीं मिली थी। कॉन्ग्रेस नेता इसे ममता बनर्जी की राजनीतिक चाल बता रहे हैं। कुछ दिन पहले ही राहुल गाँधी ने ममता बनर्जी के एक बयान पर पलटवार किया था। ममता बनर्जी ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाया था कि कॉन्ग्रेस भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर नहीं लड़ रही है।

राहुल गाँधी ने तंज कसते हुए कहा था, “ममता बनर्जी ने केंद्र में मंत्री पद पाने के लिए कभी न कभी बीजेपी से समझौता किया था और अब ममता बनर्जी पूछ रही हैं कि हम बीजेपी के खिलाफ सच में नहीं लड़ रहे हैं।”

पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 42 सीटें हैं। यहाँ सभी 7 चरणों में मतदान होना है। बृहस्पतिवार (अप्रैल 11, 2019) को पश्चिम बंगाल की 2 सीटों पर प्रथम चरण का मतदान हुआ। लोगों ने बढ़-चढ़कर मतदान में हिस्सा लिया और मतदान प्रतिशत करीब 81% रहा।