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‘पुलवामा के वीरों’ का मजाक: कॉन्ग्रेस के पूर्व CM के बेटे पर उड़ाए गए नोट, श्रद्धांजलि सभा का वीडियो Viral

पुलवामा आत्मघाती हमले की निंदा दुनिया भर में हो रही है। भारत इस ग़म से उबर भी नहीं पाया है कि कॉन्ग्रेस पार्टी की एक के बाद एक ओछी हरक़तें सामने आ रही हैं। कभी वो प्रधानमंत्री मोदी की फ़ोटों को ग़लत तरीक़े से प्रचारित और प्रसारित करते हैं तो कभी ग़लत संदेशों के माध्यम से केंद्र को घेरने की कोशिश करते हैं।

अगर बात करें ख़ुद कॉन्ग्रेस पार्टी की तो वो ख़ुद ऐसे कृत्यों को अंजाम देती है जिस पर कोई भी शर्मिंदा हो जाए। मामला उत्तराखंड का है जहाँ रुड़की में पुलवामा के वीरों को श्रद्धांजलि देने के कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम के दौरान एक वीडियो बनाया गया जो अब वायरल हो रहा है। इस वीडियो के वायरल होने के पीछे वजह है कि इसमें उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत के बेटे वीरेंद्र रावत पर नोटों की बरसात हो रही थी।

इस वीडियो के देखने के बाद आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कॉन्ग्रेस देश की जनता के साथ किस तरह का खिलवाड़ कर रही है। एक तरफ तो पीएम मोदी पर बेवजह तंज कसती नज़र आती है और दूसरी ही तरफ श्रद्धांजलि के लिए इकट्ठे हुए कॉन्ग्रेसी नोटों की बारिश कर रहे हैं।

बेहयाई की हद तो तब पार हो गई जब वीरेंद्र रावत ने कहा कि यह एक श्रद्धांजलि सभा है और इस सभा के माध्यम से 56 इंच वाले देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जगाना चाहते हैं।

बता दें कि श्रद्धांजलि के नाम पर इकट्ठे हुए इस वीडियो के वायरल होते ही लोगों ने इस पर तीखी प्रतिक्रियाएँ दर्ज की। कई लोग कॉन्ग्रेस के इस रवैये से आहत हैं। भले ही देश की जनता भोली-भाली हो लेकिन दु:ख की इस घड़ी में वो इस बात को बख़ूबी समझती है कि राजनीतिक गलियारे में कौन कितना पानी में है।

कॉन्ग्रेस की मनगढ़ंत अफ़वाहों और वास्तविकता के बीच जनता फ़र्क़ करना जान चुकी है। कॉन्ग्रेस के कई ऐसे दावे बेबुनियादी सिद्ध हो चुके हैं जहाँ अलग-अलग मुद्दों पर पीएम मोदी को घेरने की कोशिश की गई।

‘भारत माता की जय’ हमारा नारा, देश को सबसे आगे पहुँचाना लक्ष्य हमारा: नित्यानंद राय

नित्यानंद राय लोकसभा सांसद हैं। 2014 के चुनावों में इन्होंने बिहार की उजियारपुर संसदीय सीट से जीत हासिल की थी। बिहार की राजनीति में यह साल 2000 से ही विधायक के रूप में अपनी सशक्त भूमिका निभाते आए हैं। वर्तमान में यह बिहार भाजपा के अध्यक्ष हैं। राजनैतिक रूप से हमेशा सजग रहने वाले इस राज्य के मुखिया (सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर) से ऑपइंडिया ने की बातचीत। आइए जानते हैं लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र पार्टी की अपेक्षाएँ और विश्वास:

सवाल- आपके मुख्य प्रतिद्वंद्वी कौन हैं?
जवाब- कोई नहीं है, टक्कर में। मोदीजी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने और यहाँ नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने इतना काम किया है कि जनता हमें 40 की 40 सीटें जितवाएगी। यहाँ कोई हमारे आसपास भी नहीं है।

सवाल-फिर भी, राजद का तो दावा है ही!
जवाब- राजद का क्या दावा है? वहाँ तो कुनबे में ही घमासान है। आप देखिए, तेजप्रताप किस तरह की भाषा बोल रहे हैं। उनके माताजी-पिताजी के राज में ही बिहार अंधकार युग में चला गया। बड़ी मुश्किल से एनडीए इसे विकास के रास्ते पर लौटा कर लाया है।

तेजस्वी यादव जी पर क्या राय देनी है?
जवाब- अभी-अभी तो सारी दुनिया ने देखा ही कि उनके बंगले का हाल कितना न्यारा है। गुंडागर्दी और कानून से खिलवाड़ राजद के लिए नई बात नहीं है और तेजस्वी यादव इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। अभी देखा न आपने, आरजेडी के एक विधायक को नई दिल्ली के हवाई अड्डे पर ज़िंदा कारतूस के साथ पकड़ा गया है। उनको बताना चाहिए कि आखिर बिहार की जनता के पैसों की यह बर्बादी उन्होंने क्या सोच कर की है?

लालूजी ने अपनी यात्रा वेटनरी कॉलेज के चपरासी क्वार्टर से शुरू की और महलों तक पहुँच गए, फिलहाल जेल भुगत रहे हैं। तेजस्वी तो 26 वर्षों में 26 संपत्तियों के मालिक बन चुके थे, वह भी तब जबकि उनका कोई ज्ञात-अज्ञात धंधा भी नहीं है। यही बात जब मीडिया ने दिखा दी, तो वे उल्टा पत्रकार बंधुओं पर ही बरस पड़े कि वे उनके बेतुके बयान क्यों नहीं छापते हैं, उनके हसीन बंगले की तस्वीरें क्यों दिखा रहे हैं?

सवाल-कीर्ति आज़ाद, शत्रुघ्न सिन्हा और जीतनराम मांझी पर आपकी राय?
जवाब- (हंसते हैं)। देखिए, कीर्ति जी ने तो खुद ही अपना ढोल पीट दिया है। उन्होंने कांग्रेसी संस्कृति का सच भी सबको बताया है कि बूथ लूटने और लुटवाने वाले लोग हैं ये। साथ ही वे उन भाजपा कार्यकर्ताओं का भी अपमान कर रहे हैं, जिन्होंने पूरी मेहनत कर उनको जितवाया, उनके लिए काम किया।

जहाँ तक शत्रुघ्न सिन्हा जी की बात है, तो वे अब अप्रासंगिक हो चुके हैं। वे अब यू-टर्न लें या वी-टर्न, भाजपा किसी को भी मात्र टिकट के लिए इंटरटेन नहीं करती है। वे अगर सोच रहे हैं कि वापस आकर उनको टिकट मिल जाएगा, तो उनकी भूल है।

जीतनराम मांझी को राजद और कांग्रेस वाले समुचित सम्मान नहीं दे रहे हैं और इस वजह से मांझीजी की नाराजगी वाजिब है। उनको एनडीए में लौट जाना चाहिए।

सवाल-भाजपा ही क्यों?
जवाब- मैं इतिहास का छात्र रहा हूँ मेरा कॉलेज जीवन करीब-करीब ख़त्म हो रहा था और मैं इतिहास की दृष्टि से ना भी देखता तो मुझे चीज़ें अलग दिखती थीं। भारतीय जनता पार्टी की बैठकें जहाँ “भारत माता की जय” से शुरू होती थीं, वहीं दूसरी पार्टियों में कोई अपने वंश-परिवार का तो कोई व्यक्ति का नारा लगा रहा होता था।

भारत के प्रति पार्टी के दृष्टिकोण ने ही मुझे सबसे ज्यादा आकृष्ट किया। पुराने जनसंघ के दौर का चिंतन ही कहता है कि कोई घर बना है पक्के का और सामने झोपड़ी बनी है, तो महल का सम्मान हो और झोपड़ी को भी अवसर मिले। हम महल को तोड़ने की बात नहीं करते बल्कि झोपड़े को अवसर देने की बात करते हैं।

सवाल- बिहार में चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ा जाएगा?
जवाब- हम देश में चुनाव आदरणीय मोदी जी को लेकर लड़ रहे हैं और बिहार में हमारे नेता नीतीश कुमार जी हैं। देश भर के चुनावों के लिए हमारे पास नरेंद्र मोदी जी का नाम और काम है तो बिहार में नीतीश कुमार जी का विकास और भ्रष्टाचार मुक्त बिहार का नारा और उनका नेतृत्व है। राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ-साथ हम बिहार में नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में भी हैं।

सवाल- पुलवामा हमले पर पूरे देश में अभी आक्रोश का माहौल है, इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
जवाब- अभी हाल में जो घटना हुई पुलवामा में उसे लेकर बिहार में और पूरे देश में आक्रोश का माहौल है जो जायज़ भी है। भारत सबकुछ बर्दाश्त कर सकता है लेकिन जब भारत की सेना पर, देश के सम्मान, देश की संप्रभुता पर हमला होता है तो हर हिन्दुस्तानी अपनी पूरी शक्ति समेटकर एकजुट होकर सामने आता है। हमारे प्रधानमंत्री जी ने ये स्पष्ट कह दिया है कि सेना समय, तिथि और स्थान चुन ले और दोषियों पर उन्हें कार्रवाई करने की पूरी छूट है।

सवाल- बिहार में अगर देखें तो गठबंधन में भाजपा की सीटें पिछली बार की जीती हुई सीटों से भी 5 कम हैं| क्या इसका कोई नुकसान झेलना पड़ेगा?
जवाब- राजनीति में जब व्यक्ति आता है तो कभी-कभी उसकी कुछ महत्वाकांक्षाएँ भी होती हैं। इच्छाएँ अगर पूरी ना हो तो थोड़ा कष्ट तो होता है, लेकिन भाजपा का कार्यकर्त्ता एक लक्ष्य के लिए काम करता है। हमारा लक्ष्य एक है, भारत को सबसे आगे पहुँचाना।

पैगंबर मुहम्मद पर विचार रखना नहीं है ईशनिंदा: मद्रास हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

मद्रास हाईकोर्ट ने शुक्रवार (फरवरी 22, 2019) को ईशनिंदा और किसी व्यक्ति के ज्ञान के आधार पर की गई धार्मिक विषयों पर टिप्पणी, के बीच फर्क को बताते हुए भारतीय जनता पार्टी के एक कार्यकर्ता को जमानत दे दी। कार्यकर्ता रंगास्वामी ने अपने एक फेसबुक पोस्ट में पैगंबर मुहम्मद के खिलाफ पिछले साल कथित रूप से ‘ईशनिंदा’ सम्बंधित लेख लिखा था।

49 वर्षीय भाजपा कार्यकर्ता को चेन्नई में चितलपक्कम पुलिस ने सोशल मीडिया के माध्यम से ‘घृणा’ फैलाने के आरोप में गिरफ्तार किया था। कल्याणसुंदरम रंगास्वामी पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट के द्वारा मुस्लिमों की भावनाओं को आहत किया है। रंगास्वामी पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने पैगंबर मुहम्मद पर कुछ टिप्पणी की थी। जैसे ही वह अहमदाबाद से चेन्नई पहुँचे, उन्हें ‘साइबर पुलिस’ ने पूछताछ के लिए पकड़ा और बाद में अदालत में पेश किया गया जहाँ से रंगास्वामी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

न्यायमूर्ति एन आनंद वेंकटेश ने रंगास्वामी द्वारा किए गए फेसबुक पोस्ट की समीक्षा करने के बाद कहा, “इस अदालत के विचार में, जमानत याचिकाकर्ता ने पैगंबर मुहम्मद और उनके परिवार के बारे में अपनी समझ के अनुसार प्रासंगिक इतिहास पढ़ने के बाद ही लिखा है। इसलिए वो इस शर्त पर जमानत के हकदार हैं कि वह जाँच में सहयोग करेंगे।”

ज्ञात हो कि यह ‘आपत्तिजनक पोस्ट’ वर्ष 2015 में लिखा गया था। यह मामला इस वजह से भी दिलचस्प है क्योंकि चितलपक्कम के उप-निरीक्षक डी सेल्वमणि ने इस ‘फेसबुक पोस्ट’ को संज्ञान में लिया था और अपने वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी थी। सेल्वमणि ने ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ को बताया, “मैंने फेसबुक पर उसकी खोज की और अपमानजनक टिप्पणियाँ पाईं, जो मैंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दिखाई, उन्होंने ही मुझे इस मामले में शिकायतकर्ता बनने के लिए कहा।”

इस बीच, MMK नेता एमएच जवाहिरुल्लाह ने कहा कि रंगास्वामी को 30 दिसंबर को पुलिस आयुक्त ने उनकी शिकायत के बाद गिरफ्तार किया था। जबकि सेल्वमणि और MMK नेता एमएच जवाहिरुल्लाह के बीच इस ‘आपत्तिजनक पोस्ट को संज्ञान’ में लिए जाने के ‘क्रेडिट’ को लेकर विवाद भी हुआ कि आखिर किसकी सक्रियता ने रंगास्वामी को एक फेसबुक पोस्ट के लिए गिरफ्तार कर जेल में बंद करवाया।

भाजपा कार्यकर्त्ता के खिलाफ मामला यह था कि पैगंबर मुहम्मद पर उनकी टिप्पणी से धार्मिक तनाव पैदा होगा और इस कारण दो धर्मों के बीच घृणा और दुर्भावना पैदा होगी। 21 फरवरी 2019 को, लगभग 19 दिनों तक कैद में रहने के बाद, रंगास्वामी को जमानत मिली।

रंगास्वामी के वकील ने अदालत में कहा कि भाजपा कार्यकर्ता ने पैगंबर मुहम्मद के खिलाफ कोई अपमानजनक या निंदनीय टिप्पणी नहीं की है। बल्कि उनका फेसबुक पोस्ट इतिहास पढ़ने, पैगंबर मुहम्मद और उनके परिवार की राय और समझ देने के बारे में था। उन्होंने तर्क दिया कि रंगास्वामी के ऐसा करने का अधिकार भारत के संविधान द्वारा दी गई स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के तहत सुरक्षित है।

यह ऐतिहासिक निर्णय रंगास्वामी का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता प्रभाकरण के निम्न तर्कों पर कसा गया:

  • “धार्मिक विश्वास की बातों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को हमेशा से चुनौती मिलती रही है। लेकिन ऐसे भी मौके आए हैं जब ‘दा विंची कोड’ पुस्तक में ईसा मसीह पर सवाल उठाया गया है। ठीक इसी तरह से रामायण में सीता के ऊपर भी सवालिया लेख लिखे गए हैं। धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ लापरवाही भरा और अपमानजनक टिप्पणी करना गलत है लेकिन उससे संबंधित पूरे साहित्य / इतिहास को पढ़ने के बाद अपनी राय व्यक्त करना कहीं से भी गलत नहीं है।”
  • रंगास्वामी की ओर से पेश अधिवक्ता प्रभाकरण ने बहुत ही शानदार और धारदार ढंग अपने तर्क रखे। उन्होंने कोर्ट के सामने तर्क रखा कि अल्पसंख्यक समुदायों और उनसे संबंधित धर्मों (इस्लाम या ईसाई धर्म) की आलोचना पर सरकार हमेशा से कड़े रुख अपनाती रही है। जबकि हिंदू धर्म की आलोचना ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के तहत स्वीकार्य मानी जाती रही है।
  • अधिवक्ता प्रभाकरण ने स्पष्ट किया कि उनका तर्क हिंदू धर्म की आलोचना करने वालों को दंडित करने के लिए नहीं है। बल्कि भारत के संविधान में निहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कानून समानता के सिद्धांत पर होनी चाहिए। इसलिए किसी एक धर्म की आलोचना ‘ईशनिंदा’ नहीं होनी चाहिए, ठीक वैसे ही किसी दूसरे धर्म की आलोचना को भी क्रांतिकारी नहीं माना जाना चाहिए।

कोर्ट ने वरिष्ठ वकील की दलीलों से सहमति जताई और रंगास्वामी को जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि रंगास्वामी ने प्रासंगिक इतिहास पढ़ने के बाद ही पैगंबर मुहम्मद और उनके परिवार पर अपने विचार व्यक्त किए थे। न की उनके ख़िलाफ़ कोई अपमानजनक टिप्पणी की थी।

मद्रास हाई कोर्ट का यह निर्णय आज शायद कानून के नज़रिए से छोटा प्रतीत हो लेकिन ‘ईशनिंदा’ मामले या ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में समानता’ के नज़रिए से यह शायद भविष्य के लिए एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।


RJD नेता और पूर्व MLA व मंत्री को 5 साल की सज़ा, 22 साल पहले किया था ₹1.57 करोड़ का घोटाला

22 साल पुराने अलकतरा मामले में पूर्व RJD विधायक और बिहार के पूर्व पथ निर्माण मंत्री मोहम्मद इलियास हुसैन सहित सात अभियुक्तों को कोर्ट ने 5-5 साल की सज़ा सुनाई है। इस सज़ा के साथ ही इन पर ₹20 लाख का जुर्माना भी लगाया गया है।

इस मामले की सुनवाई सीबीआई के विशेष न्यायाधीश अनिल कुमार मिश्र ने की। इस मामले में जिन आरोपितों के नाम हैं, वह संयुक्त बिहार के पूर्व पथ निर्माण मंत्री मो. इलियास हुसैन, मंत्री के पीए शहाबुद्दीन बेग, चीफ़ इंजीनियर केदार पासवान, उपनिदेशक मुजतबा अहमद, कार्यपालक अभियंता रामानंद राम, सेक्शन पदाधिकारी शोभा सिन्हा और ट्रांसपोर्टर आपूर्तिकर्ता डीएन सिंह हैं।

अदालत ने 19 फरवरी को अभियोजन और बचाव पक्ष की ओर से दलीलें सुनने के बाद फ़ैसले के लिए तारीख तय की थी। इस मामले को सीबीआई ने साल 1997 में कांड संख्या-आरसी 2/97 में दर्ज किया था।

दरअसल, साल 1994 में रोड डिविजन द्वारा चतरा में सड़कों का निर्माण कार्य किया जा रहा था। जिसके लिए हल्दिया ऑयल रिफाइनरी कोलकाता से अलकतरा आने वाली थी। लेकिन कंपनी के साथ अपनी आपसी साठ-गाँठ बैठाकर मंत्री और इंजीनियरों ने सरकार को करोड़ों रुपयों का नुकसान पहुँचाया। जब इस मामले की सीबीआई जाँच शुरू हुई तो सबूत मिले कि 3,266 मीट्रिक टन अलकतरा अवैध ढंग से बेचा गया, जिसकी क़ीमत ₹1.57 करोड़ थी।

इस मामले पर झारखंड हाईकोर्ट ने इलियास की ज़मानत याचिका को ख़ारिज कर दिया था। साथ ही इलियास हुसैन की ज़मानत याचिका को ख़ारिज करते हुए न्यायमूर्ति आनंद सेन ने इसे भ्रष्टाचार का गंभीर मामला बताया था।

राजनीतिक बहस बनी जानलेवा: सपा कार्यकर्ता आपस में भिड़े, 1 की मौत

न्यूज़ चैनलों पर आम मुद्दों पर बहस होने के कार्यक्रम आम हैं। यह मुद्दे राजनीतिक भी हो सकते हैं और सामाजिक भी। टीवी पर बहस के कार्यक्रम में यदि किसी तरह का कोई विवाद उत्पन्न होता है तो उसे शांत करने का प्रयास किया जाता है, लेकिन कभी-कभी हालात इतने विपरीत हो जाते हैं कि बहस पर आधारित यह कार्यक्रम आपसी झगड़े का कारण बन जाते हैं।

ऐसा ही एक मामला यूपी के संत कबीर नगर का है, जहाँ शुक्रवार (22 फ़रवरी 2019) को एक न्यूज़ चैनल द्वारा आयोजित डिबेट के कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता आपस में भिड़ गए। इस दौरान माहौल इस क़दर बिगड़ा कि आपस में हाथापाई हुई और कुर्सियों को एक-दूसरे पर फेंका गया। इस अफ़रा-तफरी में भालचंद्र यादव समर्थकों के साथ मारपीट हुई और धनघटा विधानसभा क्षेत्र के पूर्व अध्यक्ष लाल बहादुर यादव का पैर टूट गया।

ख़बरों के अनुसार, कुर्सियों को एक-दूसरे पर फेंकने के दौरान वरिष्ठ ज़िला उपाध्यक्ष राजेश पांडेय भी घायल हो गए। कार्यक्रम स्थल से निकलकर राजेश पांडेय पार्टी के ज़िला कार्यालय पहुँचे, जहाँ कुछ देर बाद ही उनकी मृत्यु हो गई।

दरअसल, दोपहर क़रीब तीन बजे जूनियर हाईस्कूल परिसर में लोकसभा चुनाव में सीटों के बँटवारे पर एक बहस का आयोजन किया गया। इस बहस के कार्यक्रम में कई दलों के नेता मौजूद थे। चर्चा के दौरान सीटों के बँटवारे को लेकर सपा-बसपा के कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा आपत्ति की गई। इसके बाद सपा कार्यकर्ता आपस में मार-पीट करने लगे। जिलाध्यक्ष गौहर समेत बाक़ी के नेताओं ने मामले को किसी तरह शांत कराया।

CM ममता का बंगाल नरक से भी बदतर, मेरी आत्महत्या का कारण मुख्यमंत्री ही: IPS ऑफिसर

पश्चिम बंगाल कैडर के एक सेवानिवृत्त भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी, जिन्होंने इस सप्ताह के शुरू में आत्महत्या कर ली थी, उन्होंने सुसाइड नोट में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर उकसाए जाने का आरोप लगाया और आत्महत्या के लिए ममता बनर्जी को ज़िम्मेदार ठहराया।

1986 बैच के आईपीएस अधिकारी गौरव दत्त को 2010 में एक पुरुष कॉन्स्टेबल के यौन शोषण के आरोपों के बाद निलंबित कर दिया गया था। बता दें कि गौरव दत्त, 1939 बैच के पद्मश्री से सम्मानित आईपीएस अधिकारी गोपाल दत्त के बेटे थे। वो पिछले महीने ही सेवानिवृत हुए थे।


अपने सुसाइड नोट में दत्त ने ममता बनर्जी पर सिलसिलेवार उत्पीड़न का आरोप लगाया (साभार: द प्रिंट)

गौरव दत्त कथित तौर पर ख़ून से लथपथ अपने घर के पूल में मृत पाए गए थे। उनकी कलाई से ख़ून निकल रहा था, उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहाँ ख़ून के अधिक बहाव के कारण उनकी मृत्यु हो गई।

आईपीएस अधिकारी गौरव ने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि उनके सुसाइड करने के पीछे पश्चिम बंंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ज़िम्मेदार हैं।

इसके अलावा उन्होंने अपने नोट में लिखा कि जो भी बातें इस नोट लिखीं गईं हैं वो उन्होंने अपनी सही मानसिक स्थिति में लिखी।

दत्त के सुसाइड नोट की पुष्टि उनकी पत्नी श्रेयांशी दत्त ने भी की है कि यह बात सच है कि यह सुसाइड नोट उनके पति द्वारा ही लिखा गया है।

उन्होंने कहा, “मेरे पति की आत्महत्या की वजह वो सभी यातनाएँ और अपमान हैं जिसके लिए पश्चिम बंगाल की सरकार ज़िम्मेदार है।” इसके अलावा श्रेयांशी ने कहा कि उनके पति पिछले 10 वर्षों से परेशान थे।

दत्त की पत्नी ने कहा, “मैं अकेली हूँ और अब तबाह हो गई हूँ। सब कुछ ख़त्म हो गया है… सरकार ने मेरे पति की जान ले ली है।”

ममता बनर्जी ने 10 साल तक सिलसिलेवार उत्पीड़न किया

गौरव दत्त ने अपने सुसाइड नोट में इस बात का ज़िक्र किया कि सीएम ने मेरे 2 लंबित कार्यवाही [sic] मामलों को बंद करने से इनकार कर दिया था। एक केस की फाइल पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जानबूझकर गुम कर दी गई। दूसरे केस में किसी भी भ्रष्टाचार के आरोप की पुष्टि नहीं की जा सकी। “यहाँ तक ​​कि महानिदेशक [DG] ने भी सीएम से अनुरोध किया, लेकिन उन्होंने इन मामलों को बंद करने से साफ़ इनकार कर दिया।

सुसाइड नोट में साफ लिखा है कि पश्चिम बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उन्हें 10 साल से प्रताड़ित कर रही हैं। दत्त ने यह स्पष्ट किया कि ममता बनर्जी के इसी एकतरफा बदले की भावना से वो आहत हो गए थे, जिससे उनका उनका मनोबल टूट गया।

अपने सुसाइड नोट में दत्त ने इस बात को भी उजागर किया कि उनके रिटायरमेंट के बाद उन्हें मिलने वाली पेंशन भी राज्य सरकार द्वारा रोक दी गई थी। इसी बात से वो इतना आहत हुए कि सुसाइड जैसा क़दम उठाना पड़ा।

पश्चिम बंगाल सरकार ने क्रूरता और बदले की हद पार कर दी

दत्त ने यह भी आरोप लगाया कि बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी का इतना ख़ौफ़ था कि सत्तारूढ़ दल के बदला लेने के डर से राज्य में किसी ने भी उनसे इस पर कोई बात नहीं की।

उन्होंने कहा, “पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के डर से अधिकारी इतने विवश है कि किसी को प्रतिनियुक्ति पर भी जाने की अनुमति नहीं है। यहाँ बंगाल में एक ख़ौफ़ की स्थिति है।”

“पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री द्वारा बनाई गई यह दहशत का माहौल नरक से भी बदतर है जिसका कोई अंत नज़र नहीं आता।”

अपने सुसाइड नोट में दत्त ने आईपीएस अधिकारियों के बीच एकजुटता की कमी के बारे में भी बताते हुए लिखा, “आईपीएस बिरादरी ऐसी है कि अगर सरकार किसी को व्यक्तिगत रूप से तिरस्कृत या अपमानित करती है, तो बाक़ी के सभी अधिकारी सरकार के तलुए चाटते हुए दिखते हैं और सरकार द्वारा तिरस्कृत और अपमानित अधिकारी के साथ गली के कुत्तों जैसा व्यवहार करते हैं।”

‘सम्मान से जी नहीं सकता, तो सम्मान के साथ मरना बेहतर’

अपने सुसाइट नोट में, दत्त ने यह उम्मीद जताई है कि उनकी आत्महत्या “बंगाल और भारत के अन्य हिस्सों में ईमानदार अधिकारियों की वास्तविक समस्याओं को उजागर करेगी।”

उन्होंने लिखा कि उनके जैसे ईमानदार अधिकारी को दु:खी करने, प्रताड़ित करने, उन्हें बेघर करने और घुटन की हद तक अपमानित करने से पहले सरकार शायद अब दो बार सोचेगी।

“… अगर कोई सम्मान के साथ जी नहीं सकता, तो सम्मान के साथ मरना बेहतर है।”

नकल माफियाओं पर कसा शिकंजा, 9 दिन में 6 लाख छात्रों ने छोड़ी UP बोर्ड परीक्षा

यूपी में नकल माफियाओं पर शिकंजा कसने के बाद बोर्ड की परीक्षाओं में बैठने वाले छात्रों के आँकड़ों में काफ़ी ज्यादा फर्क देखने को मिला है। 2017 में जहाँ बाहरी छात्रों की संख्या 1.15 लाख थी वह 2018 में 1.12 लाख हुई और 2019 में इन छात्रों की संख्या केवल 6300 ही रह गई है।

यूपी में बोर्ड की परीक्षाएँ शुरू हो चुकी हैं। शिक्षा विभाग की सख्ती के कारण नकल माफियाओं ने परीक्षा से दूरी बनाई हुई हैं। परिणाम, अबतक दसवीं और बाहरवीं के क़रीब 6 लाख से ज्यादा छात्र परीक्षा छोड़ चुके हैं। यूपी बोर्ड की 10वीं और 12वीं की परीक्षाएँ 7 फरवरी से शुरू होकर 2 मार्च को खत्म होने वाली हैं।

यूपी बोर्ड सचिव नीना श्रीवास्तव का कहना है कि पहले के मुकाबले इस साल नेपाल और आसपास के कई राज्यों से होने वाले पंजीकरण में कमी आई है। उनका कहना है कि ये लोग नकल के कारण यहाँ पर आते थे, लेकिन सख़्ती होने की वजह से इन छात्रों की संख्या में भारी गिरावट हुई।

इस साल यूपी बोर्ड परीक्षा के लिए कुल 58,06,922 छात्रों ने अपना पंजीकरण कराया था। इनमें 10वीं के ही 31,95,603 छात्र हैं। और परीक्षा छोड़ने वाले अधिकतर छात्र भी 10वीं के ही हैं।

बता दें कि पिछले कुछ वर्षों में नकल के इतिहास को देखते हुए 21 फीसदी परीक्षा केंद्रों को संवेदनशील और अतिसंवेदनशील घोषित किया गया था। इस साल परीक्षा विभाग की कड़ी निगरानी, उत्तर प्रदेश एसटीएफ के कड़े पहरे और बारकोड कॉपियों के बावजूद भी शुरूआती 9 दिनों में ही क़रीब 252 नकल करने वाले पकड़े गए हैँ।

ऑपइंडिया फैक्ट चेक: इस सप्ताह के मीडिया प्रपंच

इस सप्ताह के वो झूठ जो स्क्रॉल, रॉयटर्स से लेकर राजदीप सरदेसाई, राहुल गाँधी और कविता कृष्णन ने फैलाई। देखें इस वीडियो में कैसे किया गया हर एक झूठ का पर्दाफाश:

अलगाववादी नेता यासीन मलिक गिरफ्तार, 35-ए पर SC में होगी सुनवाई

जम्मू-कश्मीर लिबरल फ्रंट के अध्यक्ष यासीन मलिक को बीते शुक्रवार (फरवरी 22, 2019) की रात मायसूमा स्थित आवास से हिरासत में लिया । इसके बाद यासीन को पहले कोठीबाग ले जाया गया और फिर वहाँ से सेंट्रल जेल में भेज दिया गया। खबरें हैं कि आज (फरवरी 23,2019) यासीन को राज्य से बाहर भी भेजा जा सकता है।

पुलिस को आशंका है कि पुलवामा हमले के बाद अलगाववादी कश्मीर के माहौल को और भी खराब कर सकते हैं। इसलिए एहतियात बरतते हुए यासीन को गिरफ्तार किया गया है। हालाँकि अभी किसी अन्य नेता को हिरासत में लिए जाने की ख़बर सामने नहीं आई है। इसके अलावा प्राप्त जानकारी के अनुसार अनुच्छेद 35-ए पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार (फरवरी 25, 2019) को सुनवाई शुरू होगी।

पुलवामा हमले के बाद सरकार ने अलगाववादी नेताओं के ख़िलाफ़ सख्त रुख अपनाते हुए घाटी के 18 हुर्रियत नेताओं और 155 राजनीतिज्ञों से सुरक्षा वापस ले ली थी। इन अलगाववादी नेताओं में मौलवी अब्बास अंसारी, एसएएस गिलानी, यासीन मलिक, सलीम गिलानी, शाहिद उल इस्लाम, जफर अकबर भट, अगा सैयद मौसवी, नईम अहमद खान, फारुख अहमद किचलू, मसरूर अब्बास अंसारी, अब्दुल गनी शाह, अगा सैयद अब्दुल हुसैन, मोहम्मद मुसादिक भट और मुख्तार अहमद वजा के नाम भी शामिल हैं। इनकी सुरक्षा के लिए सौ से ज्यादा गाड़ियाँ और 1000 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था।

हमले के बाद से श्रीनगर में कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुलिस सुरक्षा के कड़े प्रबंध कर रही है। इसी दिशा में एक सप्ताह के बाद यह कार्रवाई की गई है। बता दें कि कल शुक्रवार को मलिक ने सरकार द्वारा अलगाववादी नेताओं को दी सुरक्षा को झूठा करार दिया था। यासीन ने कहा था कि पिछले 30 साल से उन्हें कोई सुरक्षा नहीं मिली है, ऐसे में जब सुरक्षा मिली ही नहीं है तो वह किस वापसी की बात कर रहे हैं।

यासीन ने एक तरफ जहाँ सुरक्षा वापस लेने वाले फैसले को बेईमानी बताया है वहीं पर सैयद अली शाह गिलानी ने सुरक्षा वापस लेने वाली खबर को बेहद हास्यास्पद बताया।

क्या है 35-ए, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में शुरू होगी सुनवाई?

  • दूसरे राज्य का कोई भी व्यक्ति जम्मू-कश्मीर का स्थाई निवासी नहीं बन सकता है।
  • जम्मू-कश्मीर के बाहर का कोई भी व्यक्ति यहाँ पर अचल संपत्ति नहीं खरीद सकता।
  • इस राज्य की लड़की अगर किसी बाहरी लड़के से शादी करती है, तो उसके सारे प्राप्त अधिकार समाप्त कर दिए जाएँगे।
  • राज्य में रहते हुए जिनके पास स्थायी निवास प्रमाणपत्र नहीं हैं, वे लोकसभा चुनाव में मतदान कर सकते हैं लेकिन स्थानीय निकाय चुनाव में वोट नहीं कर सकते हैं।
  • इस अनुच्छेद के तहत यहाँ का नागरिक सिर्फ़ वहीं माना जाता है जो 14 मई 1954 से पहले के 10 वर्षों से राज्य में रह रहा हो या फिर इस बीच में यहाँ उसकी पहले से कोई संपत्ति हो।

फैक्ट चेक: केंद्रीय मंत्री अल्फोंस ने नहीं ली शहीद के ताबूत के साथ सेल्फी, कॉन्ग्रेस ने फैलाया था झूठ

पुलवामा आतंकी हमले के बाद कॉन्ग्रेस आई टी सेल दिन-रात भाजपा सरकार को घेरने के लिए झूठी ख़बरों का सहारा लेता दिख रहा है। कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने बृहस्पतिवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि केंद्रीय पर्यटन राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) के जे अल्‍फोंस ने अंतिम संस्कार से पहले शहीद के पार्थिव शरीर के साथ सेल्फी ली। कॉन्ग्रेस नेता ने मीडिया को बुलाकर एक तस्वीर भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाई, जिसे सुरजेवाला ने अल्फोंस की सेल्फी बताया।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुरजेवाला ने कहा, “मोदी जी के पर्यटन मंत्री ने तो बेशर्मी की सब हदें तोड़ डालीं, सेल्फी विद ​डेड बॉडी ऑफ ए शहीद। क्या इससे भी ज्यादा दर्दनाक कोई बात हो सकती है और शर्मसार करने वाली?”

अल्फोंस की वास्तविक तस्वीर में देखा जा सकता है कि अल्फोंस के दोनों हाथ नीचे हैं, जबकि कॉन्ग्रेस की समस्या थी कि यह सेल्फ़ी ले रहे थे। कॉन्ग्रेस ने अपने झूठे दावे को हवा देने के लिए तस्वीर को क्रॉप कर इस तरह से मीडिया के सामने रखा जैसे यह अल्फोंस द्वारा ली गई सेल्फ़ी हो। सुरजेवाला ने तस्वीर से एक हाथ गायब किया है क्रॉपिंग के द्वारा ताकि लगे कि वो सेल्फी है। जबकि हक़ीक़त ये है कि तस्वीरों से यह साफ होता है कि वायरल हो रही अल्फोंस की तस्वीर सेल्फी नहीं बल्कि मीडिया के कैमरे से खींची गई तस्वीर है।

लगातार प्रयासरत रहने के बावजूद भी भाजपा सरकार के खिलाफ सुबूत जुटाने में नाकाम रहने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है और उलजुलूल हथकंडे अपना रही है। कभी यह पार्टी अपनी रैली में भीड़ जुटाने के लिए फोटोशॉप का सहारा लेती नजर आ रही है तो कभी तस्वीरों को क्रॉप कर पूरी मीडिया में झूठ की खेती कर रही है। राफेल डील से लेकर सेल्फ़ी प्रकरण तक, सब जगह कॉन्ग्रेस के दावे झूठे साबित होते आ रहे हैं।

एक पार्टी, जिसका अध्यक्ष राहुल गाँधी स्वयं झूठ के कारोबार में लिप्त है उन पार्टी प्रवकता से और क्या उम्मीद की जा सकती है।पार्टी का दिनों-दिन गिरता हुआ यह स्तर ही चुनाव के बाद अपनी हार के लिए EVM को दोषी ठहराता है।