सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इंवेस्टिगेशन (सीबीआई) निदेशक पद के लिए सेलेक्शन पैनल की बैठक 24 जनवरी को होगी। इस बैठक में देश के अगले सीबीआई निदेशक के बारे में फ़ैसला लिया जाना है। अगले सीबीआई निदेशक की नियुक्ति होने तक अतिरिक्त निदेशक नागेश्वर राव को इस पद की जिम्मेदारी दी गई है। हालाँकि, आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक पद से हटाए जाने के बाद अंतरिम निदेशक के रूप में नागेश्वर राव की नियुक्ति को कॉमन कॉज नाम के एक एनजीओ ने कोर्ट में चुनौती दी है। इस मामले पर अगले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट में फ़ैसला होना है।
पूर्व सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा पर भष्टाचार के मामले में कई सारे आरोप लगे थे। उनपर लगाए गए आरोपों में नीरव मोदी मामला और विजय माल्या के केस भी शामिल था। आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार 26 दिसंबर 2018 को सीबीआई से एक ख़त के ज़रिए, इन मामलों से जुड़े हर दस्तावेज़ पेश करने को कहा गया था, ताकि पूरी जाँच को तार्किकता के धरातल पर सँभव किया जा सके।
आलोक वर्मा पर आरोप था कि उन्होंने नीरव मोदी के मामले में जाँच बिठाकर छानबीन कर अपराधियों को पकड़ने से ज्यादा मामला को रफ़ा-दफ़ा करने का प्रयास किया था। इसके बाद आलोक पर सी शिवशंकरन का मामला समेट कर उन्हें बचाने का भी आरोप था। बता दें कि सी शिवशंकरन पर IDBI बैंक के साथ 600 करोड़ रुपए के लोन फ्रॉड का आरोप है।
मोइन कुरैशी केस में भी आयोग की रिपोर्ट में आलोक वर्मा पर संदेह जताया गया कि उन्होंने सतीश साना से 2 करोड़ की रिश्वत ली थी। इस रिपोर्ट के सबूतों (circumstantial evidence) के आधार पर पूरा सच सामने आ सकता है, अगर कोर्ट के द्वारा जांच का आदेश मिले।
आईआरसीटीसी केस में भी आलोक वर्मा पर आरोप है। इस केस में उन्होंने संदिग्ध राकेश सक्सेना का नाम FIR से नाम हटवा दिया था। जिसके पीछे कारण बताया गया कि राकेश सक्सेना उनके करीबियों में से एक थे।
पशु तस्करी के मामले से भी आलोक अछूते नहीं हैं। इस मामले में भी उन पर कई आरोप लगे हैं, हालांकि इनकी अभी पुष्टि नहीं हुई है।
हरियाणा में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ चल रही जाँच में पुख़्ता सबूत के लिए समय और रिसोर्सेज की जरूरत पर आयोग ने बल दिया। हालाँकि आयोग का कहना है कि अगर इस पर उन्हें कोर्ट से जाँच का आदेश मिलेगा तो वो इसका निष्कर्ष दो हफ्तों में जरूर निकाल देंगे।
कुंभ हिन्दुओं का सबसे बड़ा समागम है। इतना बड़ा कि मुग़ल बादशाह और अंग्रेज़ी हुकूमत ने भी हमले और कर आदि लगाकर इस मेले को बंद करने के प्रयास किए थे। करोड़ों हिन्दुओं के इतने बड़े जमावड़े को आज भी विदेशी बुद्धिजीवी एक समुदाय के शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखते हैं जबकि कुंभ में आने वाले सभी सनातनधर्मी ही होते हैं जो बिना किसी निमंत्रण के इतनी बड़ी संख्या में एकत्रित होकर विविध प्रकार के शांतिपूर्वक अनुष्ठान करते हैं।
यह सुनने में अटपटा लगता है लेकिन कुंभ में हिन्दुओं के अतिरिक्त कुछ ऐसे भी लोग आते हैं जो या तो हिन्दू नहीं हैं या सनातन धर्म की अन्य शाखाओं को मानने वाले हैं। इनमें सिख, जैन, बौद्ध और कुछ मजहब विशेष के लोग भी हैं।
श्री नित्यानंद मिश्रा जी ने अपनी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक Kumbha: The Traditionally Modern Mela में लिखा है कि सिख, जैन, बौद्ध और सम्प्रदाय विशेष के अतिरिक्त ईसाई भी कुंभपर्व में अपनी आध्यात्मिक क्षुधा शांत करने आते हैं।
पुस्तक के अनुसार सिखों का निर्मल अखाड़ा कुंभ में स्नान करने जाता है। 2013 के प्रयागराज कुंभ में निर्मल अखाड़े ने शिविर लगाया था जिसमें गुरु ग्रन्थ साहिब की आरती की गई थी। यह दिखाता है कि सनातन के वृक्ष से उसकी डालें कितनी मजबूती से जुड़ी हुई हैं। श्री पंचायती अखाड़ा निर्मल हरिद्वार में स्थित है और इसमें लगभग 15,000 साधु सम्मिलित हैं।
निर्मल अखाड़े के साधु गुरु नानक जी को अपने सम्प्रदाय का प्रणेता मानते हैं। सन 1686 में गुरु गोबिंद सिंह जी ने 5 संतों को पेओंटा साहिब से काशी संस्कृत पढ़ने भेजा था। निर्मल अखाड़े के साधु इसी परंपरा को अपने समुदाय का आरंभ मानते हैं। 2013 प्रयाग और 2016 उज्जैन कुंभ में सिख समुदाय के कई लोग आए थे।
सिखों के अतिरिक्त जैन समुदाय के लोग भी 2016 के उज्जैन कुंभ में आए थे। 2016 के कुंभ में एक जैन साध्वी को जूना अखाड़ा का महामंडलेश्वर बनाया गया था। स्वामी अवधेशानंद गिरी ने साध्वी चन्दनप्रभा गिरी के कानों में मंत्र बोले और उन्हें महामंडेलश्वर बनाया। महामंडलेश्वर बनने के पश्चात जैन गुरु आचार्य तुलसी की शिष्या रहीं चंदनप्रभा गिरी ने नया नाम ‘चंदन प्रभानंद गिरी’ धारण किया। उज्जैन कुंभ में 1008 जैन जोड़ों ने एक साथ देवी पद्मावती की पूजा की थी।
नित्यानंद मिश्रा जी ने अपनी पुस्तक में यूनिवर्सिटी ऑफ़ वॉटरलू के ईसाई प्रोफ़ेसर डैरल ब्रायंट के अनुभव के बारे में लिखा है। प्रो ब्रायंट ने कुंभ पर्व के बारे में अपने अनुभव बताते हुए लिखा, “संभवतः हिन्दुओं का कोई अन्य आयोजन इतना विराट नहीं होता जितना कुंभ मेला। एक ईसाई होने के बावजूद मैं इस धर्म को समझना चाहता हूँ। इस पर्व में सम्मिलित होने पर सभी ने मेरा स्वागत किया। कुंभ में सम्मिलित होकर मैंने उस धर्म को जानने की चेष्टा की जिसमें मेरी आस्था नहीं है। इस प्रयास में मैं हिन्दू तीर्थयात्रियों के आंतरिक विश्वास के बेहद करीब चला गया। जिस खुलेपन से हिन्दुओं ने मुझे सम्मिलित होने दिया उसके लिए मैं उनके प्रति आभारी हूँ।”
नित्यानंद मिश्रा जी ने अपनी पुस्तक में दो लोगों का उल्लेख किया है जो कुंभ में जाते हैं। आज़मगढ़ के शमीम अहमद 1983 से कुंभ में डुबकी लगाते रहे हैं। वे किसी आस्थावान हिन्दू की भाँति गंगाजल को अपने घर में रखते हैं। अनवर मोहम्मद ने कई वर्षों तक निरंजनी अखाड़े के स्नान के समय शहनाई बजाई थी। उन्हें 2013 कुंभ में निरंजनी अखाड़े ने साधु बनाकर सम्मिलित किया था।
वैसे तो बौद्ध मतावलंबी कुंभ में सम्मिलित नहीं होते किंतु शांतुम सेठ 2013 कुंभ में एक महीने के लिए भगवान बुद्ध की प्रेरणा से आए थे। उनका कहना था कि बुद्ध ने सदैव तीर्थयात्रा पर जाने का उपदेश दिया जिसे मानकर वह कुंभ में आए हैं। परम पावन दलाई लामा तेनज़िंग ग्यात्सो कई कुंभ मेलों में सम्मिलित हो चुके हैं। उन्होंने 2001 में प्रयाग कुंभ में माँ गंगा की आरती की थी।
इस प्रकार कुंभ केवल हिन्दुओं का नहीं बल्कि समूची मानव जाति के कल्याण पर्व के रूप में प्रतिष्ठित है।
डिस्क्लेमर:- प्रस्तुत लेख में सभी जानकारी नित्यानंद मिश्रा जी की 2019 में प्रकाशित पुस्तक Kumbha: The Traditionally Modern Mela (Bloomsbury Publishers) से ली गई हैं।
केंद्रीय कैबिनेट ने देश में 13 नए केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना को हरी झंडी दिखा दी है। कैबिनेट मंत्री पीयूष गोयल ने इसी विषय पर प्रेस कॉन्फ़्रेन्स के दौरान कहा कि सरकार ने इन विश्वविद्यालयों के निर्माण के लिए ₹3,639.32 करोड़ अप्रूव किया है। केंद्रीय मंत्री ने अपने बयान में यह भी कहा कि सरकार ने इन विश्वविद्यालयों को बनाने के लिए 36 महीने की समय-सीमा तय की है।
Coal & Railway Minister Piyush Goyal: Central Cabinet has given its approval for incurring an expenditure of Rs 3639.32 crore for 13 new central universities for recurring cost & creation of necessary infrastructure for completion of campuses. It’ll be completed within 36 months. pic.twitter.com/LNDaFeUGqY
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में युवाओं के लिए कई बड़े और महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में देश को आगे बढ़ाने के लिए मोदी सरकार के इसी तरह के फ़ैसले का उदाहरण इशान उदय, इशान विकाश व प्रगति जैसी स्कॉलरशिप योजनाएँ हैं। यही नहीं, सरकार उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नई एजुकेशन पॉलिसी लाने के लिए भी प्रतिबद्ध है।
ब्याज मुक्त स्टूडेंट लॉन के बजट को भी बढ़ाया गया
भाजपा सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर ने सितंबर 2018 में कहा था कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पढ़ाई करने वाले छात्रों को बिना ब्याज दिए जाने वाले कर्ज के बजट को ₹800 करोड़ से बढ़ाकर आगामी तीन साल में ₹2,200 करोड़ कर दिया जाएगा। जानकारी के लिए आपको बता दें कि जब केंद्र में मोदी के नेतृत्व में 2014 में सरकार बनी थी, तो उस समय उच्च शिक्षा के क्षेत्र में 4 से 5 लाख छात्रों को ब्याज मुक्त कर्ज देने के लिए ₹800 करोड़ का बजट होता था। जबकि, अब अगले तीन साल में इस बजट में ₹1,400 करोड़ बढ़ाकर ₹2,200 करोड़ रपए करने का लक्ष्य सरकार ने तय किया है।
शिक्षा में 10% आरक्षण कोटा लागू
मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने पिछले दिनों कहा कि देश भर के 40,000 कॉलेज व 900 यूनिवर्सिटी में इसी साल से सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए 10% आरक्षण कोटा लागू किया जाएगा। मंत्री ने अपने बयान में कहा कि छात्रों को सरकारी व ग़ैर-सरकारी, दोनों ही तरह के, संस्थानों में आरक्षण का लाभ मिलेगा। इसके आलावा मंत्री ने यह भी कहा कि वर्तमान कोटे में किसी तरह से छेड़छाड़ किए बिना 10% अतिरिक्त कोटा के ज़रिए इस कैटेगरी के छात्रों को आरक्षण का लाभ दिया जाएगा। प्रकाश जावड़ेकर ने यह भी कहा कि आरक्षण कोटा को लागू करने के लिए कॉलेज व यूनिवर्सिटी में 25% सीटों में भी वृद्धि की जाएगी।
केरल नन बलात्कार मामले ने निराशाजनक मोड़ ले लिया है। रिपोर्ट के अनुसार, बिशप फ्रेंको मुलक्कल पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली पीड़ित नन का समर्थन करने वाली पाँच ननों में से चार को कुराविलंगद कॉन्वेंट (Kuravilangad convent) स्कूल छोड़ने के लिए कहा है। मिशनरीज ऑफ़ जीसस की तरफ़ से उन्हें यहाँ भेजा गया था। साफ़ है कि यह कार्यवाही, बलात्कार के आरोपी बिशप फ्रैंको के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन करने वाले ननों की सामूहिक ताकत को तोड़ने के लिए की गई है।
JUST IN: 4 nuns who spoke up against Bishop Franco forced out of Kerala convent. LISTEN IN as Vivek shares details pic.twitter.com/GnDk82C6fX
रिपोर्ट के अनुसार, चर्च बॉडी ने ननों को पंजाब, हरियाणा, ओडिशा और आंध्र प्रदेश राज्यों में स्थानांतरित करने का आदेश दिया है। जालंधर के बिशप फ्रैंको मुलक्कल पर 2014 में कुराविलंगड के एक गेस्टहाउस में और बाद में कई अवसरों पर केरल के एक 44 वर्षीय नन के बलात्कार करने के आरोप हैं।
केरल में फ्रांसिस्कन क्लेरिस्ट कांग्रेगेशन (FCC) के सुपीरियर जनरल सर एन जोसेफ (Sr. Ann Joseph FCC) ने लूसी कलपुरा नाम की नन को हुजूम से निकाल देने की धमकी दी है। ऐसी धमकी उन्हें केवल इसलिए मिली है क्योंकि वह रेप आरोपी बिशप फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ न्यूज़ चैनलों में बातचीत का हिस्सा बनती थी, गैर-ईसाई अखबारों में उनके लेख छपते थे और साथ ही उनपर कैथोलिक नेतृत्व के खिलाफ गलत आरोप लगाने का इल्ज़ाम है
मुलक्कल पर 2014 और 2016 के बीच जीसस मिशनरी की एक नर्स पर कई बार रेप करने का आरोप है। जिसके कारण वो अपनी बेल से पहले 3 हफ़्ते पाला की सब-जेल में भी गुज़ार कर आ चुके हैं। इसी मामले पर कुछ ननों के साथ मिलकर कलपुरा ने कोचिन के उच्च न्यायलय के परिसर में पिछले साल कई हफ्तों तक भूख हड़ताल की थी।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार कलपुरा को जो नोटिस प्राप्त हुआ है, उसमें लिखा हुआ है- “20 सितंबर से लेकर अभी तक तुम्हारे द्वारा किए गए काम बेहद शर्मसार करने वाले रहे जोकि चर्च को और FCC को नुकसान पहुँचा सकते हैं। तुम अपने से ऊपर पद पर आसित लोगों की अनुमति लिए बिना अरन्नाकुलम हाई कोर्ट गईं और SOS एक्शन काउन्सिल द्वारा किए 20 सितंबर 2018 के आंदोलन में भाग लिया। तुमने गैर-ईसाई अखबारों में और मंगलम (MANGALAM) और मध्यम्म(MADHYAMAM) जैसी साप्तिहिकी में भी लिखा, इसके अलावा समय (Samayam) को बिना किसी की अनुमति के तुमने इंटरव्यू भी दिया। फ़ेसबुक के ज़रिए और चैनलों की बातचीत का हिस्सा बनकर तुमने कैथोलिक नेतृत्व पर आरोप लगाया और साथ ही हमारे मूल्यों को भी गिराने की कोशिश की है। तुमने FCC की छवि बिगाड़ने का भी प्रयास किया है। तुम्हारा सोशल मीडिया पर बतौर धार्मिक सिस्टर होकर ऐसा प्रदर्शन बेहद शर्मनाक है।”
इंडियन एक्सप्रेस से हुई बातचीत में कलपुरा ने बताया कि उन्हें नहीं लगता कि कैथोलिक चर्च के नोटिस में जिन कार्यों का वर्णन हैं, उनमें से कुछ भी गलत है, उनका कहना है कि अगर उन्हें पहले पता होता कि वो लोग गलत हैं, तो वो कभी भी उनसे नहीं जुड़ती। उन्होंने कहा कि उन्हें इस मामले से संबंधित किसी भी प्रकार का कोई स्पष्टीकरण नहीं देना है। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि ये बदला लेने जैसा काम है।
लंदन के टाइम्स हायर एजुकेशन (टीएचई) द्वारा एक आँकड़ा जारी किया गया है, जिसमें इस साल प्रतिष्ठित ‘इमर्जिंग इकोनॉमीज़ यूनिवर्सिटी रैंकिंग’ में भारत के 49 संस्थानों को जगह मिली है। बता दें कि इन 49 में से 25 संस्थान शीर्ष 200 में जगह बनाने में भी सफल रहे हैं।
‘टाइम्स हायर एजुकेशन’ की रिपोर्ट में 2019 की सूची में सबसे अधिक जगह पाने वाला देश चीन रहा। चीन की ‘शिंगुआ यूनिवर्सिटी’ ने इसमें शीर्ष स्थान और सूची के शीर्ष पाँच में से चार संस्थान भी चीन के ही हैं। बता दें कि ‘टीएचई’ उच्च शिक्षा पर डेटा एकत्र करने, उनका विश्लेषण करने और उस पर विशेषज्ञता हासिल करने वाला एक वैश्विक संगठन है। ये हर साल अलग-अलग स्तरों पर शिक्षा जगत से जुड़ी कई रैंकिंग जारी करता है।
चारों महाद्वीपों के विश्वविद्यालयों को मिली जगह
सूची में भारत के भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) 14वें, जबकि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान IIT बॉम्बे 27वें नम्बर पर रहा। 2019 की रैंकिंग में चारों महाद्वीपों के 43 देशों के लगभग 450 विश्वविद्यालयों को इस सूची में जगह मिली है। वहीं अगर पिछले वर्ष की तुलना की जाए तो, पिछली बार से इस बार ज़्यादा विश्वविद्यालयों को शामिल किया गया है। पिछले साल इन विश्वविद्यालयों की संख्या 378 थी।
इस साल की तालिका में भारत के तेज़ी से प्रगति कर रहे कई नए संस्थानों को प्रवेश मिला है। वहीं कई आगे पीछे भी हुए हैं। संगठन के अनुसार भारत ने 2018 में 42 संस्थानों की तुलना में इस साल सूची में 49 विश्वविद्यालयों के जगह हासिल करने के साथ ‘टाइम्स हायर एजुकेशन इमर्जिंग इकोनॉमी यूनिवर्सिटी रैंकिंग’ में अपना प्रतिनिधित्व बढ़ाया है। शीर्ष 200 में भारत के 25 विश्वविद्यालय शामिल हैं। जिसमें IIT रुड़की, 21 स्थानों की लंबी छलाँग लगाकर शीर्ष 40 में जगह हासिल करने में सफल रहा, और अब वह 35वें स्थान पर पहुँच गया है।
‘टाइम्स हायर एजुकेशन’ के ग्लोबल रैंकिंग एडिटर एली बोथवेल ने कहा, “भारतीय संस्थानों में सफलता की अपार संभावनाएँ हैं – न केवल उभरते हुए मंच पर, बल्कि विश्व स्तर पर भी वे प्रगति कर रहे हैं।”
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रेस कॉन्फ़्रेन्स के दौरान राहुल गाँधी के फ़ैसलों पर जोरदार हमला किया है। मुख्यमंत्री ने अपने बयान में कहा कि राहुल भले ही भ्रष्टाचार को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करते हों, लेकिन बिहार में लालू यादव के मामले में उन्होंने चुप्पी साध ली था। यही नहीं उन्होंने अपने कॉन्फ़्रेन्स में यह भी कहा कि राहुल गाँधी राफ़ेल डील मामले पर खूब बोलते हैं, लेकिन नीरव मोदी, विजय माल्या और मेहुल चौकसी के मामले में कॉन्ग्रेस का सारा किया धरा हमारे सामने है। नीतीश कुमार ने आगे यह भी पूछा कि बिहार में जब राजद के लोग सरकार में रहकर प्रशासन को प्रभावित कर रहे थे तब राहुल गाँधी कहाँ गए थे?
नीतीश ने गठबंधन पर भी बयान दिया
मुख्यमंत्री ने अपने प्रेस कॉन्फ़्रेन्स के दौरान राजद, कॉन्ग्रेस व जदयू गठबंधन सरकार पर पूछे गए सवाल के जवाब में कहा कि तेजस्वी यादव के भ्रष्टाचार मामले में राहुल गाँधी के अक्षमता की वजह से उन्होंने सरकार से अलग होने का फ़ैसला लिया था। नीतीश कुमार ने कहा कि बिहार में कॉन्ग्रेस को 40 सीट दिलाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन इसके बावजूद राहुल गाँधी ने भ्रष्टाचार के मामले में कुछ भी नहीं बोला, यही नहीं राहुल ने इस मामले में नीतीश से मिलकर बात करना भी उचित नहीं समझा। नीतिश ने कहा कि राहुल ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा जिससे कि में गठबंधन में रहने या गठबंधन से अलग होने के बारे में दुबारा विचार कर सकूँ।
कुछ असहमतियों के बावजूद हम साथ हैं
नीतीश कुमार ने अपने प्रेस कॉन्फ़्रेन्स के दौरान यह भी कहा कि अयोध्या, धारा 370 व यूनिफॉर्म सीविल कोड आदि के मामले में हमारे बीच असहमति है, लेकिन इसके बावजूद हम दोनों पार्टी एक साथ हैं। नीतीश ने आगे यह भी कहा कि 1999 में भाजपा-जेडीयू ने मिलकर नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (NDA) बनाई है, काफ़ी हद तक हम एक दूसरे को कॉपरेट भी करते रहे हैं। प्रेस कॉन्फ़्रेन्स के दौरान नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में बताया कि अमित शाह के कहने पर ही उन्होंने प्रशांत किशोर को पार्टी में शामिल किया था।
भारत वह देश है जहाँ मीरा के गुरु संत रविदास हो सकते हैं। ये भी भारत ही है जहाँ बनारस जैसे पारम्परिक शहर में कबीर अपनी उलटबासियों में हिन्दू-मुस्लिम दोनों की कुरीतियों पर लताड़ते हैं।
आज कुम्भ अपने आप में समरसता की मिसाल है। और इसी समरसता की बानगी पेश करते हुए, संत कन्हैया प्रभुनंद गिरि को अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने पहले दलित महामंडलेश्वर की उपाधि दी है। कन्हैया प्रभु ने कुम्भ के पहले दिन मकर संक्रांति के शाही स्नान के दौरान संगम में डुबकी लगाई।
इस दौरान उन्होंने ऐसे दलित, एसटी और ओबीसी व्यक्तियों से घर वापसी की इच्छा जताई जिन्होंने शोषण के डर से सनातन धर्म छोड़कर बौद्ध, ईसाई या इस्लाम धर्म अपना लिया है, “वे वापस सनातन धर्म से जुड़ जाएँ। मैं उन्हें दिखाना चाहता हूँ कि कैसे जूना अखाड़े ने, न सिर्फ़ मुझे शामिल किया बल्कि महामंडलेश्वर की उपाधि भी दी है। कन्हैया प्रभुनंद को पिछले साल परम्परा के अनुसार जूना अखाड़े में शामिल किया गया था।”
बता दें कि, जूना अखाड़े में बड़ी संख्या में दलित जाति के पुरुष और महिला संत पहले से हैं। इनमें से आठ को महामंडलेश्वर की उपाधि भी दी गई है। जिनमें पाँच पुरुष और तीन महिला महामंडलेश्वर हैं।
महंत हरि गिरि के अनुसार, देश के अलग-अलग हिस्सों में जूना अखाड़े के लाखों संत हैं। हिमाचल प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, कनार्टक, महाराष्ट्र और नेपाल में सभी वर्गों को मिलाकर लगभग सवा लाख महिला संत हैं। इनमें से दलित और महादलित महिलाओं की संख्या पाँच सौ के आसपास है। कुम्भ में दलित महिला संतों की संख्या और बढ़ी है।
महामंडलेश्वर कन्हैया प्रभु ने एक दुखद घटना को याद करते हुए बताया, “साल 1999 में मैं उस वक्त चंडीगढ़ में था जहाँ सिख गुरुओं का एक समागम हो रहा था। जब उन्हें मेरी जाति मालूम चली तो उन्होंने मुझे प्रवेश द्वार पर ही खड़े रहने को कहा। मैं गुरुओं के पैर छूकर आशीर्वाद लेना चाहता था लेकिन उन्होंने कहा कि एक शूद्र को ऐसा करने की अनुमति नहीं है।”
“लेकिन जूना अखाड़े ने आज मुझे जो सम्मान दिया है मैं उससे अभिभूत हूँ। अब मैं ऐसे पद पर हूँ। आज मेरे सम्मान में सभी जातियों के लोग मेरे आगे झुकते हैं। एक तरह से मैं अब एक धार्मिक नेता हूँ और अपने ही समुदाय की इस जातिगत मानसिकता के खिलाफ लड़ता रहूँगा।”
उन्होंने कहा, “मेरे लिए उस पल को बयाँ कर पाना बहुत मुश्किल है जब मुझे शाही स्नान के लिए रथ पर बिठाया जा रहा था। मेरे आसपास सभी श्रद्धालु ढोल की धुन पर नाच रहे थे। मस्त-मगन थे। मेरा समुदाय काफी समय तक ऐसे सम्मान से दूर रहा है। और आज जूना अखाड़ा ने मुझे जो गौरव दिया है वो इस परंपरा में ही संभव है। उन्होंने बताया कि कभी दसवीं के बाद वह संस्कृत पढ़ना चाहते हैं लेकिन अनुसूचित जाति से होने की वजह से उन्हें इजाज़त नहीं मिली। तब मैं अपने गुरु जगतगुरु पंचनंदी महाराज की शरण में आया। जिन्होंने मुझे शिक्षा दी और मंदिर का पुजारी बनाया।”
हिंदू धर्म में जहाँ देवी-देवताओं का महत्व किसी गुणगान का मोहताज़ नहीं है, वहीं दूसरी ओर कुछ विदेशी कंपनियाँ देवी-देवाओं के फोटो का गलत प्रयोग करके हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने का काम कर रही हैं।
दरअसल आज-कल सोशल मीडिया पर ‘ब्रुकवेल यूनियन’ नाम की ऑस्ट्रेलियन कंपनी का कारनामा सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। सोशल मीडिया पर भगवान गणेश की तस्वीर के साथ एक बियर की बोतल शेयर की जा रही है। वायरल विज्ञापन के अनुसार ये कंपनी कोई नया ड्रिंक लाने जा रही है, जिसपर भगवान गणेश की फोटो है।
इससे पहले भी 2013 में एक ऐसा ही मामला सामने आया था, जिसमें ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स (सिडनी) की ये कंपनी बियर की बोतलों पर गणेश और लक्ष्मी की तस्वीर इस्तेमाल करने को लेकर विवादों में रह चुकी है। बता दें कि उस समय कंपनी ने बोतल पर देवी लक्ष्मी की तस्वीर में सिर गणेश का कर दिया था। बोतल पर गाय और ‘माता के शेर’ को भी छापा गया था।
वहीं मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लोगों ने कंपनी के खिलाफ नाराज़गी ज़ाहिर की है। जिसके बाद विवाद बढ़ता देख बियर कंपनी ने एक बयान एक बयान जारी करके भारतीय समुदाय के लोगों से माफ़ी माँगी है। और जल्द बोतलों की नई डिज़ाइन तैयार करने की बात कही है।
सिख दंगों में आरोपित कॉन्ग्रेस नेता जगदीश टाइटलर को दिल्ली में कॉन्ग्रेस के एक कार्यक्रम में पहली पंक्ति में बैठे देखा गया। इस कार्यक्रम की फोटो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही लोगों ने कॉन्ग्रेस को कटघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया। बता दें कि टाइटलर 1984 सिख दंगों के प्रमुख आरोपितों में से एक हैं। फरवरी 2018 में दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें टाइटलर 100 सिखों की हत्या करने की बात कबूलते नजर आ रहे हैं। हाल ही में अदालत ने 1984 सिख दंगों के मामले में एक अन्य कॉन्ग्रेस नेता सज्जन कुमार को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई है।
जगदीष टाइटलर हाल के दिनों में कॉन्ग्रेस के औपचारिक समारोहों से गायब रहे हैं और सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी बहुत कम दिखते हैं। लेकिन आज (जनवरी 16, 2019) वह दिल्ली कॉन्ग्रेस की नवनियुक्त अध्यक्षा शीला दीक्षित के पद संभालने के औपचारिक कार्यक्रम में उपस्थित रहे। केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर ने कॉन्ग्रेस के कार्यक्रम में टाइटलर की मौज़ूदगी को लेकर राहुल गाँधी पर निशाना साधते हुए कहा:
“पहले उनके परिवार ने जो किया, राहुल गाँधी उसी परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। यह साफ़ तौर पर दर्शाता है कि उनके मन में सिखों की भावनाओं के लिए कोई क़द्र नहीं है।”
Harsimrat Kaur Badal, Akali Dal on Jagdish Tytler present at Congress event in Delhi: What his family did earlier, Rahul ji is just continuing with that tradition. It clearly shows that they have no respect for sentiments of Sikhs. pic.twitter.com/jAI1cJl2X9
दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तेजिंदर बग्गा ने भी कड़ा विरोध दर्ज़ कराते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने जगदीश टाइटलर को इस कार्यक्रम में बुला कर सिखों के घावों पर नमक रगड़ने का काम किया है।
Congress again rubbed Salt into wounds of Sikhs by Inviting Sikh Murderer Jagdish Tytler into event of Shiela Dixit pic.twitter.com/IvobwO6mBj
समाचार एजेंसी ANI ने जब जगदीश टाइटलर से सज्जन कुमार की सज़ा के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि जब अदालत ने फ़ैसला दे ही दिया है तो अब कोई क्या कह सकता है? उन्होंने आगे कहा:
“आपलोग इस दंगे को लेकर मेरा नाम भी लेते हैं। क्यों? क्या कोई FIR है? क्या कोई केस है? नहीं। फिर आप मेरा नाम क्यों लेते हैं? बस किसी ने कुछ कह दिया और आपने इसे मान लिया?”
वहीं शिरोमणि अकाली दल के नेता और दिल्ली के विधायक मनजिंदर सिरसा ने एक वीडियो ट्वीट करते हुए लिखा कि 1984 सिख नरसंहार के गवाहों को डराने के लिए कॉन्ग्रेस द्वारा यह एक बड़ा और स्पष्ट संदेश है।
“We stand in support of Tytler… Don’t you dare testify against him”
बता दें कि भारत सरकार द्वारा गठित नानावती आयोग की रिपोर्ट में यह कहा गया था कि 1984 सिख दंगों में जगदीश टाइटलर के ख़िलाफ़ ‘विश्वसनीय सबूत’ मिले हैं। दिसंबर 2008 में सीबीआई की दो सदस्यीय टीम को दो प्रत्यक्षदर्शी, जसबीर सिंह और सुरिंदर सिंह के बयान दर्ज करने के लिए न्यूयॉर्क भेजा गया था। दोनों गवाहों ने कहा था कि उन्होंने दंगों के दौरान जगदीश टाइटलर को एक भीड़ का नेतृत्व करते देखा। हालाँकि सुरक्षा कारणों का हवाला देकर दोनों प्रत्यक्षदर्शियों ने भारत आने से इनकार कर दिया था।
चार वर्ष पहले हम सबने शहीद कर्नल एमएन रॉय की आँसुओं में भीगी हुई बेटी को पुलवामा में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हुए पिता को ‘सैल्युट’ कर पुष्प अर्पित करते हुए देखा था। 11 वर्ष की अल्का रॉय ने इसे ‘वॉर क्राई’ कहा था। पिता को आख़िरी विदाई देती और रो रही बिटिया के इन शब्दों ने वहाँ मौजूद सैनिकों और देशभर के लोगों को झकझोरने के साथ लोगों के अंदर जुनून का पैदा कर दिया था। सेना एक ऐसी संस्था है जिसके लिए पूरा देश एक साथ उठ खड़ा हो जाता है।
शहीद एमएन रॉय को श्रद्धांजलि देते हुए उनकी बेटी अल्का रॉय
कश्मीर में पाकिस्तानी और लोकल आतंकियों द्वारा सेना और सुरक्षा बलों पर हमले होते रहे हैं। ऐसा ही एक हमला उरी में हुआ था। 2016 में जम्मू-कश्मीर के उरी सेक्टर में पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा भारतीय सेना के स्थानीय मुख्यालय पर हुए हमले पर आधारित यह फ़िल्म अब सिनेमाघरों में दर्शकों के सामने है। आदित्य धर के निर्देशन में बनी वार फ़िल्म ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ महज़ एक आम वॉर फ़िल्म नहीं बल्कि भारतीय सेना के शौर्य और साहस की अमर गाथा के रूप में उभरकर सामने आई है। जिसे देशभर के दर्शकों का बहुत प्यार और स्नेह मिल रहा है।
एक आम नागरिक होने के नाते दर्शक सिर्फ सेना के प्रयासों को सराह सकता है, उनके भाव को महसूस कर उसके ज़ेहन में सिहरन पैदा हो सकती है। लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है कि यहीं पर मौज़ूद एक ऐसा बड़ा वर्ग पैदा हो चुका है जिसे भारतीय सेना के जज़्बों में भी राजनीति ढूँढ लेने में में गर्व महसूस होता है।
सोशल मीडिया से लेकर कुछ मीडिया समूहों में चर्चा हैं कि फ़िल्म राजनीति से प्रेरित है और इसकी रिलीज़ की टाइमिंग पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। जबकि दर्शकों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि यदि मीडिया का यह गिरोह भारतीय सेना द्वारा आतंकवादियों को उनके घरों में घुसकर सबक सिखाने के इस हौसले की सराहना नहीं कर सकता है, तो कम से कम वह इतना तो कर ही सकता है कि सेना के जज़्बे को ‘प्रोपेगेंडा’ ठहराने की मशक्कत ना करे।
पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर देखा गया कि यही माओवंशियों का गिरोह “आर्मी वहाँ बॉर्डर पर है और तुम यहाँ…” जैसे मुहावरे बनाकर भारतीय सेना का उपहास करता है।
माओवंशियों के इस गिरोह को समझने के लिए अगर थोड़ा ‘फ्लैशबैक’ में जाएँ तो हमें देखने को मिलता है कि वर्ष 2014 में रिलीज़ हुई विशाल भरद्वाज के निर्देशन में बनी ‘हैदर’ फ़िल्म ने चर्चा के बाज़ार को गर्म किया था। यदि हम इस फ़िल्म के बारे में इन्हीं लोगों का मत देखें तो उन्हें यह फ़िल्म कश्मीर में ‘सेना द्वारा पीड़ित समाज’ की वास्तविक तस्वीर नज़र आती है, जबकि ‘उरी’ फ़िल्म उन्हें एक राजनीतिक प्रोपेगेंडा मात्र नज़र आ रही है।
हैदर फ़िल्म पर इस तथाकथित ‘लिबरल’ वर्ग के विश्लेषकों का मानना था कि कश्मीर पर ज़्यादातर फ़िल्में वहाँ के असल मुद्दों को दिखाने में विफल रही हैं जबकि हैदर फ़िल्म ने इस खालीपन को भरा है। अंग्रेज़ी अख़बार ‘द हिन्दू’ ने हैदर फ़िल्म पर लिखा था, “फ़िल्म में इससे कोई इनकार नहीं है कि कश्मीर में लापता लोगों की सामूहिक कब्रें मिली हैं।”
द गार्डियन में जैसन बर्क ने लिखा था कि ‘हैदर’ में भारतीय सेना के कैंपों में प्रताड़ित करने और भारतीय अधिकारियों द्वारा मानवाधिकारों के हनन के दूसरे तरह के मामलों को दिखाया गया है। भारद्वाज के साहसिक चित्रण को आलोचकों एवं उनके प्रशंसकों ने काफ़ी पसंद किया है। वहीं ‘फ़र्स्टपोस्ट’ ने लिखा था, “कश्मीर की असुविधाजनक राजनीति को दिखाना एक बड़ी चुनौती है, और वो भी तब जब यह मुद्दा कश्मीर की जनता और भारत के बीच तनाव के केंद्र में रहा है।”
सवाल यह है कि जब यही सिनेमा भारतीय सेना पर मानवाधिकारों के हनन का दोषारोपण करता है तब इस विशेष वर्ग को सिनेमा में ‘निर्वाण’ और ‘देशभक्ति’ नज़र आती है, लेकिन जब यही सिनेमा उरी जैसी फ़िल्म बनाकर भारतीय सेना के साहस और शौर्य का चित्रण करता है, तब इस वर्ग पर मानो तुषारापात हो जाता है और ये वर्ग बदहवास स्थिति में बयान देना शुरू कर देता है। यह देखना भी एक मज़ेदार पहलू है कि इस गिरोह को कब और किन विषयों पर आपत्ति और सहानुभूति होती है।
भारतीय सेना द्वारा ‘आतंकवादियों के मानवाधिकारों का हनन’ करने पर इस गिरोह को पीड़ा होती है, इनके हिमायती वकील रात 12 बजे इनकी फाँसी रुकवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं। जम्मू-कश्मीर में जब एक अलगाववादी पत्थरबाज़ फारूक अहमद डार, जिसके नाम में उसका मज़हब नहीं खोजा जाना चाहिए, को मेजर गोगोई जीप के आगे बाँधकर सबक सिखाते हैं तब इन्हें कष्ट होता है।
यही समूह इसके बाद मेजर गोगोई को अपमानित करने के लिए एक ऐसा वाकया बनाकर पेश करते हैं, जिसकी जाँच होने से पहले ही यह वर्ग न्यायाधीश की भूमिका निभाकर उनके व्यक्तिगत मामले में टाँग अड़ाकर उनके चरित्र पर सवाल लगाना शुरू कर देता है। वामपंथी मीडिया समूह ने भी भरसक प्रयास किए ताकि मेजर गोगोई के चरित्र पर प्रश्नचिन्ह लगया जा सके। हालाँकि, बाद में Opindia द्वारा इस मामले की समीक्षा से पता चला था कि यह मेजर गोगोई का बेहद व्यक्तिगत मामला था।
इसी बीच कारगिल शहीद कैप्टन मनदीप सिंह की बेटी और लेडी श्रीराम कॉलेज की 20 वर्षीय छात्रा गुरमेहर कौर को इसी प्रोपेगेंडा-परस्त मीडिया द्वारा राष्ट्रीय सनसनी बनाकर पेश किया गया। इस गिरोह ने गुरमेहर कौर के पिता की शहादत को भुनाने तक का प्रयास किया। कुछ समय पहले ही गुरमेहर कौर एक तख्ती लिए नज़र आई थीं, जिस पर लिखा था, “मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं बल्कि युद्ध ने मारा”।
इस पर पूर्व क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग समेत कई लोगों ने उनके इस नज़रिये को लेकर उन पर कटाक्ष किया था। सहवाग ने ट्वीटर पर एक तख्ती पकड़े हुए अपनी एक तस्वीर साझा की थी, जिस पर उन्होंने लिखा था, “मैंने दो तिहरे शतक नहीं मारे, मेरे बल्ले ने मारे”। इस बुद्धिजीवी वर्ग ने इसके बाद वीरेंद्र सहवाग को सोशल मीडिया पर ‘ट्रोल’ किया और सहवाग को अपनी बात रखने के लिए माफ़ी माँगने तक के लिए मज़बूर किया। प्रश्न यह है कि क्या इस देश में इस वर्ग के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी, मानवाधिकार और स्वतंत्रता सिर्फ इकतरफ़ा काम करते हैं?
जब बात सैनिकों के मानवाधिकारों की आती है, जिन्हें रोजाना जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी पत्थरबाज़ों, उग्रवादियों, चरमपंथियों की हिंसा, आतंकवाद की आती है, तब यह वर्ग तख्तियाँ नहीं पकड़ता।
जब आतंकवादियों ने जम्मू के अखनूर में राजपुताना राइफल्स में तैनात 22 साल के लेफ्टिनेंट फ़ैयाज़ का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी थी, तब यही समूह कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता है और ना ही भारतीय सेना के मानवाधिकारों और सुरक्षा को लेकर चिंतित नज़र आता है।
जब भी किसी फ़िल्म पर कोई विवाद होता है तो बचाव पक्ष बयान देकर पल्ला झाड़ लेता है कि फ़िल्म सिर्फ मनोरंजन के लिए बनाई गई है और फ़िल्मों का काम समाज-सुधार करना नहीं है। वहीं जब फ़िल्म को हिट करवाना हो तो आप समाज सुधारक की भूमिका में आ जाते हैं। कुछ ‘विचारक’ कहते हैं, फ़िल्म का मुद्दा समाज से नहीं उठाया गया था, जैसा कि हैदर फ़िल्म के विवाद के वक़्त बताया जाने लगा था कि यह मात्र शेक्सपीयर के ‘हेमलेट’ से प्रेरित है।
अपनी फ़िल्मों से अधिक से अधिक कमाई लेकर आने के लिए प्रसिद्द ‘मिस्टर परफ़ेक्शनिस्ट ख़ान’ यानि आमिर ख़ान जब ‘तारे ज़मीन पर’ जैसी फ़िल्म बनाते हैं, तब वो यह कहते हैं कि फ़िल्में समाज को प्रभावित करती हैं और यह बदलाव भी लाती हैं, लेकिन ‘PK’ फ़िल्म के बाद बयान देते हैं कि फ़िल्म का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन होता है।
इस मामले सवाल यह है कि जब फ़िल्म समाज के लिए नहीं है या यह हमारे समाज से नहीं उठाई गई है तो फिर मनोरंजन के लिए आप मंगल ग्रह का विषय क्यों नहीं उठाते या फिर अगर हमारे समाज के लिए यह फ़िल्म नहीं है तो क्या यह फ़िल्म मंगल ग्रह के प्राणियों के लिए बनाई जा रही है?
उरी फ़िल्म में भारतीय सेना के शौर्य और पराक्रम को जब कुछ मीडिया समूह झुठला पाने में असफल हुए तो उन्होंने फ़िल्म की समीक्षा कर अपनी तसल्ली कर डाली है, लेकिन ऑप-इंडिया के साथ पढ़िए उरी फ़िल्म की समीक्षा, जो है एकदम ‘राइट’।
उरी फ़िल्म की एकदम ‘राइट’ समीक्षा
ख़ैर, भारतीय सेना द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक पर बनी उरी फ़िल्म देखते वक़्त आप उसी जज़्बात और रोमाँच का अनुभव करते हैं। फ़िल्म में डायरेक्टर आदित्य धर दर्शकों को रोमांचित करने में सफल रहते हैं। फ़िल्म की कहानी पर अधिक लिखना ठीक नहीं है, क्योंकि सभी जानते हैं कि फ़िल्म में क्या देखने को मिलने वाला है। यहीं पर डायरेक्टर की चुनौती शुरू होती है। एक ऐसी कहानी जिससे ‘सरप्राइज़ एलिमेंट’ गायब हो, उससे दर्शकों को बाँधे रखने में आदित्य कामयाब रहे हैं।
फ़िल्म का मजबूत पक्ष इसका अलग-अलग भागों में बँटा होना है। इससे दर्शक समझ सकता है कि सर्जिकल स्ट्राइक कोई खेल नहीं था जिसे आसानी से अंजाम दिया गया हो। इसके पीछे पुराने ऑपरेशन में शामिल सेना के जवान, ख़ुफ़िया एजेंसियों के बीच का तालमेल और जबरदस्त रणनीतिक सूझबूझ, शामिल रहे हैं। सेना के जवानों के परिवारों की सुरक्षा भी सरकार और ख़ुफ़िया एजेंसियों की जिम्मेदारी होती है, ये भी देखने को मिलता है।
फ़िल्म के सभी किरदार अपने रोल में फिट हैं। टीवी धारावाहिक ‘देवों के देव महादेव’ से चर्चित मोहित रैना के किरदार से दर्शक ‘कनेक्टेड’ फील करते हैं और चाहते हैं कि वे स्क्रीन पर और अधिक दिखें। NSA अजीत डोभाल के किरदार में परेश रावल खूब जमे हैं, और साबित किया है कि ‘बाबुभैया’ गुजरात में जितने परेश ‘भाई’ रावल हैं, उतने ही वो पहाड़ी अजीत डोभाल ‘भैजी’ का किरदार भी बखूबी निभा सकते हैं। यामी गौतम के कैरियर में उनका यह अभिनय ‘निख़ार’ लेकर आ सकता है।
विकी कौशल के कंधों पर फ़िल्म टिकी है और एक जाँबाज़ भारतीय सैनिक के रूप में जँचते हैं। मसान फ़िल्म में उनके अभिनय ने ही बता दिया था कि वे बॉलीवुड में लंबी पारी खेलने आए हैं। फ़िल्म में मौजूद अन्य राजनीतिक चरित्रों को पहचानना दर्शकों के लिए अधिक मुश्किल नहीं है।
फ़िल्म में लड़ाई के दृश्य हों या भावुकता के क्षण, दर्शक स्क्रीन से अपनी नजरें हटाना नहीं चाहते हैं। फ़िल्म की कसावट का ही कमाल है कि आप इंटरवल में भी थिएटर से बाहर नहीं निकलना चाहते। लड़ाई के दृश्य और VFX लाजवाब हैं। विशेष रूप से अंत में भारतीय वायु सेना का जवाबी हमला रोमांचित करता है।
फ़िल्म का संगीत इसका मजबूत पक्ष है। लड़ाई के दृश्यों में संगीत का आरोह-अवरोह और कभी अचानक से छा जाने वाली ख़ामोशी आपके रोमांच को बनाए रखती है। गोलियों के चलने की आवाजें तो सब ने बहुत सुनी होंगी, लेकिन खाली होती राइफलों के खाली कारतूसों के गिरने की आवाजें आपको अपने पैरों के पास महसूस होती हैं।
अभी तक यदि आपने फ़िल्म नहीं देखी है, तो ज़रूर देखने जाइए। बॉलीवुड में सार्थक और तकनीकी रूप से सुदृढ़ फिल्में (विशेषतः वॉर आधारित) बहुत कम बनती हैं। शहीदों की याद में ही सही, सिनेमा तक हो आइए। आप निराश नहीं होंगे।
तो मित्रो! बात सिर्फ़ इतनी-सी है कि उरी फ़िल्म को लेकर जिनमें खलबली मची है, उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक के होने पर भी सवाल उठाए थे और साक्ष्य माँगे थे। तो अपना दिन बनाइए, सिनेमा हॉल पहुँचिए, बुलंद आवाज में राष्ट्रगान गा कर अपने और पड़ोसी के रोंगटे खड़े कर आइए और फ़िल्म देख कर हमें बताइएगा जरूर कि, ‘हाऊ इज़ द जोश?’