प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) की ओर से रॉबर्ट वाड्रा को मनी लॉन्ड्रिंग केस में सम्मन किए जाने के बाद बीजेपी ने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधा। जिसके फौरन बाद कॉन्ग्रेस ने पलटवार करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमला बोला है।
कॉन्ग्रेस ने कहा कि बीजेपी ने रॉबर्ट वाड्रा पर कई मुद्दों को लेकर आरोप लगाया है, लेकिन आज तक कुछ भी साबित नहीं हो पाया। सीनियर कॉन्ग्रेस नेता संजय सिंह ने कहा, “आज ईडी के सामने रॉबर्ट वाड्रा पेश हुए, कल उनकी जगह मोदी हो सकते हैं।”
Sanjay Singh, Congress: Aaj Robert Vadra ka ho raha hai ED ke saamne, kal Modi ED ke saamne khade honge. https://t.co/0EdcAnjeHI
बता दें कि रॉबर्ट वाड्रा की ओर से अंतरिम जमानत के लिए कोर्ट जाने के बाद दिल्ली के एक कोर्ट ने उन्हें ईडी की जाँच में सहयोग करने को कहा है। यह केस लंदन में 12, ब्रायन्स्ट स्क्वायर में संपत्ति की ख़रीद में मनी लॉन्ड्रिंग के केस से जुड़ा हुआ है।
ईडी ने कोर्ट को यह बताया कि उन्हें इस बात की जानकारी है कि लंदन में वाड्रा की कई सम्पत्तियाँ हैं। इनमें शामिल दो घर पाँच और चार मिलियन के हैं जबकि छह अन्य फ्लैट्स और अन्य सम्पत्तियाँ भी हैं।
बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने यह आरोप लगाया कि वाड्रा को यूपी सरकार के दौरान 2008-09 के समय पेट्रोलियम और डिफेंस डील में मोटा फ़ायद हुआ। उन्होंने यह भी कहा “ वाड्रा ने रिश्वत के तौर पर मिले काले धन से करोड़ों संपत्ति बनाई है।”
ख़बर पुरानी है। एक फरवरी की। मीडिया भूल चुका है। सोशल मीडिया पर कभी कुछ आ जाता है, तो भले ही मीडिया कुछ देर के लिए चला दे, कुछ छाप दे वरना डिब्बा बंद। ख़बर है फाइटर प्लेन मिराज-2000 के क्रैश होने की और दो पायलटों के मौत की। इससे पहले कि हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) या भारतीय वायु सेना (IAF) की जाँच की ख़बर आए, आइए सुनते हैं फौज (खासकर एयर फोर्स) की कहानी।
खासकर एयरफोर्स इसलिए क्योंकि इससे मेरा नाता है – पेशेवर तौर पर तो नहीं लेकिन पारिवारिक तौर पर जरूर है। मेरे परिवार के एक बेहद करीबी (एकदम करीबी, लेकिन नाम नहीं बता पाऊँगा) हैं, जो पायलट हैं एयर फोर्स में। 18-19 साल का फ्लाइंग करियर है उनका। साल बताने का मकसद सीनियरिटी बताना कतई नहीं। मतलब यह है कि इतने साल किसी सिस्टम में रहने वाला बंदा उससे भली-भाँति वाकिफ़ होता है – अच्छाइयों से भी, बुराइयों से भी।
भगवान नहीं, मुक्के भरोसे फ्लाइंग
थोड़ा अटपटा है, लेकिन 16 आने सच। कैसे? कार तो देखी होगी आपने। उसके डैशबोर्ड में लगे 4-5 मीटर भी देखे होंगे। बस। इसी डैशबोर्ड को बड़ा कर दीजिए, मीटर 10-20 लगा दीजिए। एयरफोर्स के चॉपर या फाइटर प्लेन में पायलेट इन्हीं मीटरों के सहारे उड़ता है। इन्हीं में एक होता है – ऑल्टिमीटर। यह ऊँचाई बताने का काम करती है। सोचिए 10-20 हजार फीट की ऊँचाई पर अगर यह मीटर काम करना बंद कर दे तो क्या होगा? हाथ-पाँव फूल जाएँगे! और अगर लो-फ्लाइंग (2000 फीट से भी नीचे) के दौरान ऐसा हो तो? बाप-रे-बाप! लेकिन एयर फोर्स के पायलटों के लिए यह आम बात है। इतना आम कि जब भी ऐसा होता है, वो डैशबोर्ड पर मुक्का मारते हैं, ऑल्टिमीटर चलने लगता है। कभी एक मुक्के से तो कभी 2-4 मुक्के से।
रूस में इंद्र
2017 के आख़िर में भारतीय फौजें रूस गईं थीं। शहर का नाम था – व्लादिवोस्तो (Vladivostok)। 11 दिनों तक यहाँ भारत-रूस संयुक्त युद्धाभ्यास किया गया था। इस युद्धाभ्यास का नाम ही इंद्र (Indra-2017) था। इंद्र थल-जल-नभ तीनों सेनाओं का संयुक्त युद्धाभ्यास था। इंद्र का उद्देश्य था – शहरी आबादी में ISIS जैसे बड़े आतंकवादी संगठन के हमले को नाकाम करना। इसके लिए नकली तौर पर पूरा का पूरा एक शहर बसाया गया था, जिसे ISIS के नकली आतंकियों ने घेर लिया था।
भारतीय वायुसेना और रशियन वायुसेना दोनों को मिशन दिया गया – शहर से आतंकियों का सफाया। लेकिन नागरिक हितों की रक्षा के साथ-साथ। संयुक्त युद्धाभ्यास (डिफेंस डील के लेवल पर मैत्री देश हो तभी) में होता यह भी है कि आप मेरे साथ मेरे चॉपर में बैठ जाओ, मैं आपके साथ आपके चॉपर में बैठ जाऊँगा। ऐसा सिर्फ दोस्ती के लिए नहीं बल्कि तकनीक के साझा इस्तेमाल व समझ के लिए किया जाता है। इक्के-दुक्के मौकों को छोड़ दिया जाए तो भारत ने लगभग सारी मशीनें रूस से ही खरीदी हैं। मतलब जिस कंपनी, जिस मॉडल के चॉपर रशियन एयरफोर्स के पास था, वही चॉपर इंडियन एयरफोर्स के पास भी। यहीं से कहानी में ट्विस्ट है।
आर्मी के जवानों को उतारना हो या घायलों को रेस्क्यू करना, युद्ध के हालात ऊपर से शहरी आबादी में बिना हेलिपैड के चॉपर को उतारना बहुत कठिन काम होता है। यह कठिन काम रशियन एयरफोर्स के चॉपर ने बहुत ही कुशलता (मक्खन की तरह – यही शब्द थे मेरे करीबी के) से कर लिया। बिना किसी शोर-शराबे (चॉपर के अंदर) के। उसी कंपनी, उसी मॉडल के इंडियन एयरफोर्स के चॉपर ने जब यही काम किया तो नानी याद आ गई। चॉपर के अंदर इतना शोर-शराबा, जैसे ट्रैक्टर (उनके शब्द) चल रहा हो।
दर्जी एक, सैनिक अनेक
व्लादिवोस्तो जाने के लिए शायद कुछ स्पेशल कपड़ों या बैज़ (ठीक से याद नहीं) की ज़रूरत थी। एयरफोर्स के ऑफिसर-नॉन ऑफिसर मिलाकर लगभग 350 लोगों की टीम को वहाँ जाना था। ये 350 लोग भारत के अलग-अलग एयरबेस के थे। सबको दिल्ली आकर यहीं से जाना था। यह जरूरी होता है इतने बड़े स्तर पर किसी भी मूवमेंट के लिए। लेकिन यहाँ भी पेंच है। पेंच है लालफीताशाही का। इन सभी 350 लोगों को स्पेशल कपड़ा या बैज़ भी दिल्ली से ही इश्यू होना था। और ऐसा करने के लिए जिस ठेकेदार को यह काम दिया गया था, उसकी संख्या थी – एक। हुआ वही, जो होना था। कुछ को मिला, कुछ को ऐसे ही जाना पड़ा। बाद में किसी तरीके से उन्हें भेजा गया।
10-20-50-1000 रुपए के कपड़े से लेकर 1000-2000-50000 रुपए के ऑल्टिमीटर से लेकर 10-20-500 करोड़ रुपए के मशीन (चॉपर, फाइटर, मिसाइल, रडार कुछ भी) तक का उदाहरण क्यों? क्योंकि कभी स्क्वाड्रन लीडर समीर अबरोल मर जाता है। तो कभी स्क्वाड्रन लीडर सिध्दार्थ नेगी को भुला दिया जाएगा। उदाहरण इसलिए क्योंकि आपको मतलब हो या न हो, पार्टी आलाकमानों के बड्डे याद कराना नहीं भूलते नेता’जी’ लोग। उदाहरण इसलिए ताकि शहीद होने पर भी मेजर संदीप उन्नीकृष्णन को ‘कुत्ता भी घर पर नहीं जाएगा‘ न सुनना पड़े।
ऊपर के सारे उदाहरण इसलिए क्योंकि इसी देश में वजन बढ़ते रहने के बावजूद भूख हड़ताल कर रहे नेता’जी’ को मीडिया 10-20 दिन तक का कवरेज़ तक दे देता है। किसी छात्र नेता’जी’ को बेल मिली या नहीं, इस पर न जाने कितने प्राइम टाइम करते हुए देश की करोड़ों जनता का प्राइम टाइम ख़राब कर चुका है मीडिया। ऊपर के सारे उदाहरण इसलिए क्योंकि सिर्फ नेता ही भ्रष्ट हैं, यह संदेश न जाए। टॉप पर बैठा अधिकारी (जिसकी कलम में रक्षा सौदों से लेकर यूनिफॉर्म पहनने-पहनाने तक की ताकत होती है) भी इसी समाज का होता है, वो भी उतना ही भ्रष्ट हो सकता है, जितना हम और आप। इसलिए निशाने पर वो भी है। ये सारे उदाहरण इसलिए भी ताकि कुछ सुधार हो और फिर किसी सर्विंग ऑफिसर (लेफ्टिनेंट कर्नल संदीप अहलावत) को इतना तीखा न लिखना पड़े कि उसके कारण बताओ नोटिस जारी हो जाए।
IAF की समास्याएँ
राफ़ेल सुन-सुन कर कान पक चुके हैं तो यह जान लें कि इंडियन एयरफोर्स का अस्तित्व सिर्फ लड़ाकू विमानों के दम पर नहीं है। लड़ाकू विमान महत्वपूर्ण है, लेकिन यह सिर्फ एक हिस्सा भर है। चॉपर, ट्रांसपोर्ट विमान, बेसिक ट्रेनर एयरक्राफ्ट, इंटरमिडयरी जेट ट्रेनर, एडवांस्ड जेट ट्रेनर, मिड-एयर रिफ्यूलर, रडार इन सब से मिलकर इंडियन एयरफोर्स मजबूत होता है। अफसोस यह कि इन सभी को अपग्रेड करने का काम दशकों पीछे चल रहा है। विदेशी खरीद पर हमारी निर्भरता इसलिए क्योंकि HAL समय पर माँग (क्वॉलिटी से समझौता किए बिना) की पूर्ति करने में सक्षम अभी तक तो नहीं हो पाई है।
IAF में भी ‘जुगाड़’
इंटरमिडयरी जेट ट्रेनर (IJT) की ही बात करें तो HAL ने फेज़ आउट हो रहे HJT-16 किरन का अभी तक कोई विकल्प उपलब्ध नहीं कराया है। पिछले साल सीएजी ने एचएएल को इंटरमिडयरी जेट ट्रेनर डेवलप करने में 14 वर्षों की देरी पर जमकर क्लास लगाई थी। 14 साल की देरी! जी हाँ। लेकिन चल रहा है। एयरफोर्स के कैडेट ट्रेनिंग ले रहे हैं – कैसे? जुगाड़ से। यह मैं नहीं पूर्व एयर चीफ मार्शल अरुप राहा का कहना है। इंटरमिडयरी जेट ट्रेनर की कमी के कारण तीन स्टेज की ट्रेनिंग को घटाकर दो स्टेज की ट्रेनिंग कर दी गई है।
ट्रेनी पायलट पहले पिलैटस PC-7 टर्बो ट्रेनर (Pilatus PC-7 Turbo Trainer) के बाद डायरेक्ट एडवांस्ड जेट ट्रेनर हॉक (Advanced Jet Trainer Hawk) पर ट्रेनिंग ले रहे हैं। दुखद यह है कि पिलैटस PC-7 और एडवांस्ड जेट ट्रेनर हॉक – दोनों ही विदेशी प्रोडक्ट हैं। HAL ने इस स्तर पर भी कोई योगदान नहीं दिया है। बेसिक ट्रेनर HTT40 को डेवलप करने में भी HAL पाँच साल पीछे चल रहा है। और सब कुछ ठीक-ठाक रहने पर भी इसके 2021 तक फ्लाइंग सर्टिफिकेट मिलने की उम्मीद बहुत ही कम है।
तेजस से ‘तेज’ गायब
इंडियन एयरफोर्स तेजस को अपने बेड़े में शामिल करने को लेकर बहुत उत्सुक नहीं है। क्यों? क्योंकि इसके साथ तीन मुख्य समस्याएँ हैं – (i) उड़ान स्थिरता सिर्फ 1 घंटे की (ii) उड़ान की रेंज सिर्फ 400 किलोमीटर के रेडियस तक (iii) हथियार ढोने की क्षमता 3 टन। अब तुलना करते हैं इसी के समान विदेशी सिंगल-इंजन फाइटर प्लेन की। स्वीडिश ग्रिपेन-ई (Gripen-E) और अमेरिकन एफ-16 के हथियार ढोने की क्षमता तेजस से दोगुनी है जबकि उड़ान स्थिरता तीन गुनी है।
Holy दुधारू Cow
जिस तेजस को एयरफोर्स लगभग नकार चुकी है, उसके लिए HAL को रक्षा मंत्रालय से दिसंबर 2017 में 330 बिलियन (33,000 करोड़) रुपए की मंजूरी मिली थी। इतनी बड़ी रकम की मंजूरी इसलिए मिली थी ताकि 2020-21 से HAL हर साल 16 की संख्या (लगभग एक स्क्वाड्रन हर साल तैयार) में तेजस मार्क 1A का निर्माण कर एयरफोर्स को सौंप सके। जब तेजस मार्क 1 में ही इतनी देरी हो रही है, तो तेजस मार्क 1A का भविष्य क्या होगा, पता नहीं!
एयरफोर्स डील में भ्रष्टाचार की बात करें तो यह राजनीतिक स्तर तक ही सीमित नहीं है। पूर्व एयर चीफ मार्शल एसपी त्यागी तक का नाम इन सबमें आ चुका है और सीबीआई द्वारा उनको गिरफ़्तारी भी किया जा चुका है। अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले में क्रिस्चियन मिशेल के बाद दीपक तलवार और राजीव सक्सेना की गिरफ़्तारी से भविष्य में और भी बड़े नामों के आने की उम्मीद है।
भारत दो तरफ से दुश्मन देशों से घिरा है। जिसमें चीन तो विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनने के रास्ते पर है, साथ ही वो अति-महत्वाकांक्षी भी है। ऐसे में फेज़ आउट होते मिग से घटती स्क्वाड्रन की संख्या चिंता का विषय होना चाहिए। फिर भी 126 MMRCA (Medium Multi-Role Combat Aircraft) डील, जिसे यूपीए के शासन काल में ‘मदर ऑफ ऑल डील’ तक कहा जाने लगा था, उसे अधर में लटका कर VVIP चॉपर डील पर तत्परता मेरे समझ से बाहर है।
जो जरूरी है, उसे टालते जाना! स्वदेशी लेकिन क्वॉलिटी पर खरा नहीं उतर पा रहा हो, जो समय पर प्रोडक्ट नहीं दे पा रहा हो, उस पर भरोसा करते जाना, उसके लिए बड़े-बड़े बजट पास करते जाना! जो जरूरी नहीं है, उसके लिए हड़बड़ी दिखाना! विदेशी कंपनियों से उस प्रोडक्ट को खरीदना! ये जितने भी विस्मयकारी चिन्ह लगाए गए हैं, ये मूलतः उस ओर इशारा कर रहे हैं कि कुछ नहीं, सबकुछ गड़बड़ है। सिस्टम के उलटफेर की जरूरत है।
मुज़फ़्फ़रनगर दंगे के 7 आरोपितों को अतिरिक्त जिला न्यायाधीश कोर्ट में दोषी करार दिया गया है। मुज़फ़्फ़रनगर के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश हिमांशु भटनागर ने इन सभी आरोपितों को दोषी करार देते हुए न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है। कोर्ट ने इस मामले में दोषियों को सजा सुनाने के लिए 8 फ़रवरी की तारीख तय की है।
मुज़फ़्फ़रनगर दंगे के इसी मामले में राज्य की योगी सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। सरकार की तरफ़ से स्पेशल सेक्रेटरी जेपी सिंह और अंडर सेक्रेटरी अरुण कुमार राय ने मुज़फ़्फ़रनगर के जिला मजिस्ट्रेट को पत्र लिखा है।
पत्र में मुजफ़्फरनगर दंगे से जुड़े 38 मामलों को वापस लेने के लिए सिफरिश की गई है। इन सभी 38 मामलों में लगभग 119 लोग अभियुक्त बनाए गए थे। सरकार की तरफ़ से कोर्ट को भेजे गए इस पत्र को राज्यपाल द्वारा मंजूरी दे दी गई है।
जानकारी के लिए आपको बता दें कि अगस्त 2013 में उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर के कवाल गाँव में दो संप्रदाय के बीच दंगा भड़क गया था।
इस दंगे में सचिन व गौरव नाम के दो लोगों की जानें गई थी। इन दोनों ही लोगों की जघन्य हत्या में सभी सात आरोपित शामिल थे। अतिरिक्त जिला न्यायाधिश ने जिन सात लोगों को दंगे के लिए दोषी बताया है वे सभी एक संप्रदाय विशेष से आते हैं।
इन सभी आरोपितों के नाम क्रमश: मुजस्सिम, मुजम्मिल, फ़ुरक़ान, नदीम, जहांगीर, अफ़जाल और इक़बाल हैं। इन सभी को कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने हिरासत में ले लिया है।
कवाला गाँव की इस घटना के बाद मुजफ़्फरनगर शहर और शामली में भी दो संप्रदाय के बीच दंगे हुए थे। इस दंगे में लगभग 60 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी, जबकि सैकड़ों लोग घायल हुए थे।
इस वीभत्स घटना में कुल 8 आरोपित थे, जिनमें एक आरोपित शहनवाज की मौत पहले ही हो चुकी है।
बुधवार (फरवरी 06, 2019) को सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा की मनी लांड्रिग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) दफ्तर में पूछताछ चलती रही। इस दौरान रॉबर्ट वाड्रा को ईडी दफ्तर छोड़ने के लिए प्रियंका गाँधी वाड्रा स्वयं गई थी। राजनीति में जिस परसेप्शन का महत्व होता है शायद कॉन्ग्रेस पार्टी उसे ही भुनाने में जुट गई है।
प्रियंका गाँधी वाड्रा ने इसके बाद कॉन्ग्रेस दफ्तर जाकर महासचिव का पद ग्रहण किया। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा, “रॉबर्ट वाड्रा से क्यों पूछताछ हो रही है, यह पूरी दुनिया जानती है, मैं अपने पति के साथ खड़ी हूँ। राहुल जी ने जो कार्यभार सौंपा है, उसके लिए मैं उनकी आभारी हूँ।”
यह पहला मौका है जब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के जीजा रॉबर्ट वाड्रा संदिग्ध वित्तीय लेन-देन के आपराधिक आरोपों के सिलसिले में किसी जाँच एजेंसी के समक्ष पेश हुए हैं। वाड्रा ने पहले इन आरोपों से इनकार किया था और कहा था कि राजनीतिक बदले के लिए उनके खिलाफ यह कार्रवाई की जा रही है। इसी दौरान, रॉबर्ट वाड्रा अपना चश्मा भूल गए थे, जिस वजह से पूछताछ देर से शुरू हो पाई।
ईडी का आरोप है कि फ्लैट अरोड़ा का नहीं, बल्कि वाड्रा का है।
रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ ये केस लंदन के 12 ब्रायंस्टन स्क्वायर पर स्थित एक संपत्ति की खरीद में धन शोधन से जुड़ा है। बताया जाता है कि 19 लाख पाउंड में ये संपत्ति खरीदी गई थी। जाँच एजेंसी ने अदालत को बताया था कि संजय भंडारी (हथियारों का व्यापारी, इस समय भगोड़ा) के खिलाफ आयकर विभाग काला धन अधिनियम एवं कर कानून के तहत जाँच कर रहा है। इसी कड़ी में मनोज अरोड़ा का नाम भी सामने आया।
हालाँकि, रॉबर्ट वाड्रा का कहना है कि उनका संजय भंडारी या उनके चचेरे भाई सुमित चढ्ढा-भावतोष से किसी तरह का लेना देना नहीं है, ये बात जरूर है कि वो मनोज अरोरा को जानते हैं। मनोज अरोड़ा उनका कर्मचारी रह चुका है। वाड्रा ने कहा कि ये गलत है कि उन्होंने या उनकी तरफ से मनोज अरोड़ा के लिए ईमेल लिखे गए थे।
क्या है पूरा मामला
वर्ष 2009 में एक पेट्रोलियम सौदे में रॉबर्ट वाड्रा की अहम भूमिका बताई जा रही है। इसकी जाँच की जा रही है। वहीं, एजेंसी को यह भी सूचना मिली है कि लंदन में कई प्रॉपर्टी रॉबर्ट वाड्रा से संबंधित हैं। इनमें 2 घर और 6 फ्लैट शामिल हैं। ईडी चाहती है कि वाड्रा आएँ और अपनी प्रॉपर्टी के बारे में जानकारी दें।
रॉबर्ट वाड्रा ने अपनी अग्रिम जमानत याचिका में आरोप लगाया है कि उनके खिलाफ अनुचित, दुर्भावनापूर्ण और अन्यायपूर्ण तरीके से कार्रवाई की जा रही है, जो राजनीति से प्रेरित है। वहीं, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अदालत में सवाल उठाया कि क्या एजेंसी को किसी राजनीतिक ब्रिगेड की जांच नहीं करनी चाहिए? क्या ऐसा करना राजनीतिक प्रतिशोध कहलाएगा?
प्रियंका गाँधी वाड्रा की भूमिका
माना जा रहा है कि रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ जो माहौल बना था, प्रियंका गाँधी के इस कदम ने उस माहौल को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्तमान में मीडिया का सारा केंद्र अब प्रियंका गाँधी वाड्रा पर केंद्रित हो गया है। अगर वह रॉबर्ट वाड्रा के साथ नहीं जातीं, उसके अलग निहितार्थ निकाले जाते। कहा जाता कि रॉबर्ट वाड्रा के साथ उनका परिवार नहीं है, जबकि भारतीय समाज में परिवार को काफी महत्व दिया जाता है। भारतीय परम्परा में अक्सर देखा जाता है कि पत्नी हर हाल में पति का साथ देती है। प्रियंका गाँधी वाड्रा ने रॉबर्ट वाड्रा को ईडी तक छोड़ और ये कहकर राजनीतिक संदेश दिया है कि “मैं अपने पति के साथ खड़ी हूँ।”
आज सुबह कॉन्ग्रेस कार्यालय से हटाए गए थे रॉबर्ट वाड्रा के पोस्टर
आज सुबह ही कॉन्ग्रेस कार्यालय के बाहर लगे प्रियंका-रॉबर्ट के पोस्टर को एनडीएमसी द्वारा हटवाया गया। कुछ लोगों का मानना है कि कॉन्ग्रेस ने ही बदनामी के डर से पोस्टरों को हटवाया, क्योंकि ईडी दफ्तर में आज ही वाड्रा से पूछताछ होनी तय थी।
अब देखना यह है कि प्रवर्तन निदेशालय अगली बार रॉबर्ट वाड्रा को पूछताछ के लिए कब बुलाता है। क्या ये तारीख 2019 के चुनावों के बाद आएगी या, तब आएगी, जब प्रियंका गाँधी वाड्रा उत्तर प्रदेश के दौरे पर हों।
चुनावी सीजन में कुछ भी कहा जाना और पर्याय निकालना आम बात होती है इसलिए अभी यह देखना बाकी है कि रॉबर्ट वाड्रा के केस में प्रियंका गाँधी वाड्रा की भूमिका क्या रहने वाली है।
कुछ दिन पहले पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पुलिस ने कोलकाता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार को बचाने के लिए सीबीआई अधिकारियों को बंधक बनाने की शर्मनाक हरकत की। इस घटना से न केवल केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो जैसी उच्च स्तरीय जाँच एजेंसी की छवि धूमिल करने का प्रयास किया गया बल्कि राज्य और केंद्र के मध्य अविश्वास की स्थिति उत्पन्न हुई। किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए ऐसी परिस्थिति उसके संघीय ढाँचे के लिए बेहद ख़तरनाक साबित हो सकती है।
राजीव कुमार को कई बार समन भेजा जा चुका था जिसके बाद सीबीआई की टीम उनसे पूछताछ करने गई थी लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार ने सारी लोकतांत्रिक शुचिता को दरकिनार कर सीबीआई का मजाक बना कर रख दिया। ध्यातव्य है कि सीबीआई को तीन प्रकार से केस सुपुर्द किए जाते हैं।
एक तो तब जब राज्य सरकार की पुलिस किसी केस को सुलझाने में असफल होती है तब राज्य सरकार केंद्र से सीबीआई जाँच करवाने का आग्रह करती है। दूसरा तरीका है कि केंद्र सरकार स्वयं किसी महत्वपूर्ण केस की जाँच सीबीआई से करवाना चाहे तो करवा सकती है। इन दोनों परिस्थितियों के अतिरिक्त हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट सीबीआई जाँच के आदेश दे सकते हैं।
जब सीबीआई को राज्य से किसी केस की जाँच की अनुमति मिल जाती है तब उसे उस राज्य में पुलिस के अधिकार मिल जाते हैं। इसी अधिकार के चलते सीबीआई राजीव कुमार से पूछताछ करने गई थी। संविधान केंद्र सरकार को यह अधिकार भी देता है कि यदि किसी राज्य में संकट उत्पन्न हो तो केंद्र हस्तक्षेप कर सकता है।
कानून व्यवस्था मुख्य रूप से राज्य के जिम्मे है किंतु यदि राज्य की स्थिति बिगड़ जाए और कोर्ट सीबीआई जाँच का आदेश दे तो सीबीआई कोर्ट का आदेश मानने को बाध्य है। इस दृष्टि से हज़ारों करोड़ों रुपए के चिट फंड घोटाले (जिनसे लाखों लोग प्रभावित हुए) से संबंधित केस की छानबीन सीबीआई से करवाना केंद्र सरकार का दायित्व है। इस कार्य में बाधा उत्पन्न करना या तो भ्रष्टाचार को समर्थन देने जैसा है, या फिर राज्य का अपनी जनता की पीड़ा से मुँह मोड़ने जैसा।
हालाँकि, सीबीआई की छवि पहली बार धूमिल नहीं हुई है। कुछ महीने पहले सीबीआई के दो वरिष्ठ अधिकारियों के बीच चली तनातनी का तमाशा देश ने देखा। एक दूसरे के ऊपर आरोप प्रत्यारोप करते हुए निदेशक आलोक वर्मा और सेकंड इन कमांड राकेश अस्थाना ने सीबीआई जैसे संस्थान की अच्छी खासी फ़ज़ीहत करवाई। सरकार ने दोनों को छुट्टी पर भेजा जिसके बाद मामला कोर्ट में गया। इन सबके बीच 25 अक्टूबर 2018 को एक विचित्र खबर आई कि इंटेलिजेंस ब्यूरो के 4 अधिकारी आलोक वर्मा के घर के बाहर ‘पकड़े’ गए।
अर्थात अभी तक तो एक ही एजेंसी ‘तोता’ उपनाम लेकर बदनाम थी लेकिन आईबी के अधिकारियों को जिस प्रकार सड़क पर घसीटा गया था उससे यह स्पष्ट हो गया कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के अधीन काम करने वाली केंद्रीय एजेंसियों की वास्तव में क्या स्थिति है।
आंतरिक और बाह्य सुरक्षा
एजेंसियों का कार्यक्षेत्र समझने के लिए देश के सुरक्षा ढाँचे को समझना ज़रूरी है। सुरक्षा के मुख्यतः दो प्रकार हैं- आंतरिक और बाह्य। बाह्य सुरक्षा सशस्त्र सेनाओं के जिम्मे है जबकि आंतरिक सुरक्षा का दायित्व गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करने वाली एजेंसियाँ संभालती हैं जिनमें सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फ़ोर्स कहलाने वाले बल भी सम्मिलित हैं।
यदि संपूर्ण सुरक्षा ढाँचे की कल्पना एक मनुष्य के रूप में की जाए तो हम देखेंगे की सशस्त्र सेनाएँ इस मनुष्य के पाँव हैं जो सीमाएँ लाँघने में सक्षम हैं, राज्य सरकारों की पुलिस और केंद्रीय पुलिस बल इस मनुष्य के हाथ हैं जो एक दायरे के अंदर ही काम कर सकते हैं लेकिन इंटेलिजेंस या गुप्तचर विभाग इस सुरक्षा रूपी मनुष्य का दिमाग है जो दूर तक सोच सकता है और भविष्य के खतरों को भाँप सकता है।
जहाँ जाँच एजेंसियाँ वारदात होने के बाद काम करती हैं वहीं इंटेलिजेंस एजेंसियाँ अपराध होने से पहले उसके घटित होने की संभावनाओं पर निगरानी रखती हैं। सीबीआई और आईबी के कार्यक्षेत्र में यह मूल अंतर है। आईबी को पब्लिक आर्डर और आंतरिक सुरक्षा संबंधी सूचनाएँ गुप्त रूप से इकट्ठा करने की ज़िम्मेदारी दी गई है जिसके अंतर्गत उसे संवेदनशील स्थानों पर निगरानी रखनी होती है। किंतु आलोक वर्मा प्रकरण में आईबी की कार्यशैली पर ही सवाल खड़े किए गए।
सीबीआई और आईबी दोनों की फ़ज़ीहत होने का एक ही कारण है। वह यह कि दोनों एजेंसियों को संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं हैं और इन दोनों की वैधानिक स्थिति भी स्पष्ट नहीं है। जहाँ सीबीआई अपनी उत्पत्ति का स्रोत दिल्ली पुलिस स्पेशल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट (1946) बताती है वहीं आईबी किसी भी कानून द्वारा स्थापित एजेंसी नहीं है। नवंबर 2013 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने सीबीआई को ‘असंवैधानिक’ घोषित कर दिया था। इससे पहले 2012 में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने आईबी के वैधानिक दर्ज़े पर सवाल खड़े किए थे।
हालाँकि द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया था कि सीबीआई को DSPE एक्ट से मुक्त कर एक पृथक सीबीआई एक्ट के अंतर्गत स्थापित किया जाना चाहिए लेकिन अभी तक इस पर अमल नहीं किया गया है।
अमरीका और हमारे सुरक्षा प्रणाली में यही मौलिक भेद है। अमरीका ने 1947 में National Security Act पास कर एक्सटर्नल इंटेलिजेंस एजेंसी सीआईए बनाई और आंतरिक सुरक्षा के लिए एफबीआई को तमाम ऐसे वैधानिक अधिकार दिए जिससे वह कॉउंटर इंटेलीजेंस और आपराधिक जाँच दोनों कार्य करती है।
हमें भी स्वतंत्रता के बाद ऐसी ही स्वायत्तता प्राप्त आंतरिक सुरक्षा एजेंसी बनानी थी जो इंटेलिजेंस एकत्र करना और आपराधिक जाँच दोनों कर सके क्योंकि इंटेलिजेंस और ‘इन्वेस्टिगेशन’ एक दूसरे से गहराई तक जुड़े हुए पहलू हैं। भ्रष्टाचार और संगठित अपराध से लेकर आतंकवाद तक आज सभी प्रकार के अपराधों के तार आपस में जुड़े होते हैं। कई बार एजेंसियों में बेहतर तालमेल न होने के कारण जाँच प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होती है।
एक समय सीबीआई का निदेशक केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) नियुक्त करता था। भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच करने में आज भी CVC को सीबीआई से अधिक अधिकार प्राप्त हैं। लेकिन CVC के पास फुल टाइम चीफ़ विजिलेंस अफसर नहीं हैं जो सीबीआई की तरह जाँच कर सकें। और सीबीआई को राज्य में पुलिस के अधिकार देने के बावजूद हथियार नहीं दिए जाते। इससे यह पता चलता है कि जिस एजेंसी के पास अधिकार हैं उसके पास दायित्व नहीं है और जिसके पास दायित्व है उसे अधिकार नहीं दिए गए।
देश की अन्य एजेंसियों की वैधानिकता की बात करें तो 2017 में एक मजेदार बात हुई थी। देश के किसी भी कानून में एक इंटेलिजेंस एजेंसी का कार्यक्षेत्र परिभाषित नहीं है फिर भी 2017 में नेशनल टेक्निकल रिसर्च आर्गेनाइजेशन (NTRO) के कर्मचारियों को Intelligence Organisations (Restriction of Rights) Act, 1985 के अधीन लाकर यूनियन बनाने से रोक दिया गया था।
आतंकवाद से लड़ने के लिए हड़बड़ी में कानून लाकर बनाई गई जाँच एजेंसी एनआईए का दायरा भी सीमित ही है। आज आवश्यकता है एक ऐसी एजेंसी की जो आंतरिक सुरक्षा, भ्रष्टाचार की जाँच, इंटेलिजेंस एकत्र करना और आतंकवाद इन सभी ज़िम्मेदारियों को पूर्ण स्वायत्ता के साथ संभाल सके।
जब कॉन्ग्रेस की तरफ़ से प्रियंका गाँधी के राजनीति में आने की बात का ऐलान हुआ था, तब सारी मीडिया ने उनके नाक की सीधाई से लेकर बालों के पेंचोखम तक पर लेख लिखे। उस समय का समझ में आता है क्योंकि उस समय प्रियंका गाँधी कॉन्ग्रेस के अंतिम तीर की तरह तरकश से बाहर निकाली गई थी। लेकिन, कल शाम जो हुआ, और आज जो होता रहा, वो भारतीय मीडिया के ‘स्वर्णिम दौर’ की अलग गाथा है।
काफ़ी दुःखद है कि तैमूर अली खान को भरे बाल्यावस्था में मीडिया ने, एक तरह से इस्तेमाल कर, छोड़ दिया। जब वो हाथ हिलाकर अभिवादन करना सीख ही रहा था कि मीडिया राम मंदिर, कन्हैया, बजट, सीबीआई और ममता जैसे बेकार के मुद्दों पर ध्यान लगाने लगी। वो तो अच्छा है कि तैमूर अभी बहुत छोटा है वरना वो इस उपेक्षा को बर्दाश्त कर पाता या नहीं, ये कहना मुश्किल है।
24 घंटे चलने वाले चैनलों और लाइव ब्लॉग चलाने वाले वेबसाइटों के सामने भी कंटेंट के न होने पर बड़ी दिक्कत हो जाती है। ऐसे में प्रियंका से जुड़ी काम की ख़बर मिल नहीं रही थी तो न्यूज़-18 की पल्लवी घोष कॉन्ग्रेस मुख्यालय पहुँच गई और उभरते हुए तमाम पत्रकारों के लिए एक मिसाल के तौर पर प्रियंका गाँधी के नए ऑफिस के दरवाज़े और नेम प्लेट की रिपोर्टिंग करने लगीं।
पल्लवी घोष जी ने जानकारी दी कि दीवार पर लगा ‘गाँधी’ वाला नेमप्लेट बाक़ी नेमप्लेटों से कैसे अलग है
इसमें बहुत कुछ सीखने लायक है। जैसे कि, खलिहर होने पर खुद को कैसे व्यस्त रखा जाए; पार्टी में अपनी पहुँच बनाने के लिए किस स्तर तक जाया जाए; जहाँ ख़बर न हो, लेकिन एक्सक्लूसिव का आदेश हो तो क्या किया जाए आदि। इससे नए पत्रकार ये सीख ले सकते हैं कि जब प्रियंका के बाल, साड़ी, नाक और मुस्कुराहट से लेकर उनके दुर्गावतार और मोदी-मर्दनी की बातें खप चुकी हों तो आप एक दीवार पर लगे नेमप्लेट पर भी कैमरा ले जा सकते हैं।
Congress General Secretary for Uttar Pradesh east Priyanka Gandhi Vadra at the Congress Headquarters in Delhi. pic.twitter.com/e4yjVFRa3g
उसके बाद प्रियंका ने कार्यभार संभाला, गेट खोला, कुर्सी पर बैठीं, फिर हाथ बढ़ाकर क़लम निकाला, किसी को देखकर मुस्कुराई (मुस्कुराते हुए दाँत दिखे जो कि इंदिरा गाँधी जैसे थे), दो लोगों से बात की, फिर सर झुकाकर काम करने लगीं, जैसी खबरें चलीं जो कि तैमूर से मीडिया के प्रेम से 19-20 ही है।
बिहार का युवा आज भी किसी मेट्रो सिटी के दफ्तर में बैठ कर लालू राज को याद करता होगा तो सिहर जाता होगा, औरों का पता नहीं लेकिन मैं तो सिहर ही जाता हूँ। नब्बे के दशक में जन्मा लड़का कभी नहीं चाहेगा कि लालू का वो समय दोबारा बिहार देखे, कल्पना मात्र ही मुझे भयभीत कर देती है।
बिहार ने वो समय देखा है जब माँ-बाप बच्चों को शाम के बाद घर से नहीं निकलने देते थे, हर वक़्त ये चिंता रहती थी कि पता नहीं कब कौन किडनैप हो जाएगा, लालू के समय अपहरण का ऐसा बाज़ार बना जिसने बहुतों के घर से चिराग छीन लिए और जिनके बचे उनको उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी थी।
बिहारियों ने फिर 2005 में लालू राज के सूरज को अस्त किया और नीतीश कुमार के हाथों में कमान सौंपी, वो नीतीश कुमार जो कभी लालू के साथ हुआ करते थे, वो नीतीश जो लालू के साथ बाद में भी आए और वो नीतीश जो अभी फिर से लालू के विरोधी हैं।
सत्ता और राजनीति के खेल में समीकरण बनते-बिगड़ते रहे लेकिन नीतीश जब से सत्ता में आए हैं, बिहार में क़ानून को सख़्ती से लागू करने में कामयाब रहे। लालू के राज में आपराधिक उगाही के बाज़ार और अपहरण एक इंडस्ट्री का रूप अख़्तियार कर चुकी थी, उसको नीतीश ने सत्ता हाथ में आते ही जड़ से खत्म कर दिया।
बिहार पुलिस के आँकडों के हिसाब से बिहार में क्राइम की स्थिति वर्तमान समय में और लालू राज के आख़िरी के पाँच सालों में कैसी थी, इसी को लेकर यह रिपोर्ट लिखी गई है। आँकड़ों के हिसाब से बिहार में, लालू के राज की तुलना में अभी अपराध पर बहुत हद तक लगाम लगी है, 2001-05 के बीच कुल मिलाकर जहाँ 18,189 हत्याएँ बिहार में हुई थी, वहीं 2014-18 के बीच हत्याओं के आँकड़ों में 25% की गिरावट देखी गई है।
इसी तरह लूट और रोड डकैती के मामले में नीतीश सरकार में क्रमशः 55% और 43% की गिरावट आई है। सरकारी आँकड़ों की मदद से लालू राज और वर्तमान समय में जो तुलना की गई है उसे आप नीचे ग्राफ में देख सकते हैं।
अपराध
लालू राज
(2001-05)
नीतीश राज
(2014-18)
% बदलाव
हत्या
18189
14697
-24%
डकैती
12124
7812
-55%
दंगे
42387
59888
29%
फिरौती के लिए अपहरण
1778
240
-641%
बलात्कार
4461
5774
23%
रोड पर डकैती
1267
888
-43%
लालू के समय में फिरौती के लिए अपहरण राज्य भर में सबसे बड़े आतंक का रुप ले चुका था। नीतीश के हाथ में सत्ता आने के बाद अपहरण के मामलों में अप्रत्याशित कमी देखने को मिली।
2001-05 में जहाँ 1778 अपहरण हुए, यानी हर साल 356 , मतलब हर दिन एक अपहरण, वहीं इस सरकार में 2014-18 के बीच, अपहरण के आँकड़ों में 641% की कमी आई है। पिछले पाँच सालों में बिहार में ‘फिरौती के लिए अपहरण’ के सिर्फ़ 240 मामले प्रकाश में आए हैं।
इससे पहले कि आप नीतीश सरकार की पीठ थपथपाएँ, आँकड़े आपका हाथ पकड़ लेंगे क्योंकि आँकड़ों के हिसाब से नीतीश सरकार बलात्कार और दंगे जैसे अपराधों पर लगाम लगाने में पूरी तरह से विफल साबित हुई है।
बलात्कार के मामलों में जहाँ 23% की वृद्धि देखी गयी है, वहीं दंगों की घटनाओं में 29% की वृद्धि सरकार के लिए चिंता का सबब बन सकती है। इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता है कि दंगो में विपक्षी दलों की भूमिका भी रहती है, लेकिन जब प्रशासन आपके पास है तो ये तर्क बहुत कमजोर लगते हैं।
नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के 2016 के आँकड़ों की माने तो पूरे देश में महिलाओं के प्रति अपराधों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, आँकड़ों के मुताबिक, प्रति घंटे देश में 39 महिलाओं पर अत्याचार हो रहे है, जो कि एक चिंताजनक स्थिति है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2015 में जहाँ 34,651 बलात्कार के मामले रिपोर्ट हुए वहीं 2016 में ये आँकड़ा बढ़ कर 38,947 तक पहुँच गया।
नीचे के ग्राफ्स के माध्यम से दोनों सरकारों के कार्यकाल को क्राइम के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। इससे आपको ये बात साफ़ हो जाएगी कि बिहार में कितनी बहार है?
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मिलकर अलीगढ़ और बुलंदशहर में रैली की। सभा को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कॉन्ग्रेस और ममता बनर्जी दोनों पर जोरदार हमला किया है।
अमित शाह ने कहा “ममता दीदी, आपको क्या लगता है कि आप ऐसे भाजपा कार्यकर्ताओं को रोक लोगी, हमारी सरकार बनने से रोक लोगी। हम भी भाजपा के कार्यकर्ता हैं, आपकी सरकार की ईंट से ईंट बजा देंगे।”
ममता दीदी, आपको क्या लगता है कि आप ऐसे भाजपा कार्यकर्ताओं को रोक लोगी, हमारी सरकार बनने से रोक लोगी। हम भी भाजपा के कार्यकर्ता हैं, आपकी सरकार की ईंट से ईंट बजा देंगे।
इसके अलावा अमित शाह ने जनसभा को संबोधित करते हुए यह भी कहा कि बंगाल में मोदी जी के नेतृत्व में में 23 सीटों पर कमल खिलना तय है। बुलंदशहर और अलीगढ़ में जनसभा को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कुछ महत्वपूर्ण बातें कहीं –
सबका साथ-सबका विकास’ के मंत्र के साथ मोदी सरकार देश को आगे बढ़ाने का काम कर रही है।
नरेन्द्र मोदी जी की सरकार द्वारा लाए बजट में 5 लाख तक की सालाना आय वालों को इनकम टैक्स में पूरी छूट देने का काम किया गया है।
मैं आज साफ कहना चाहता हूँ कि भाजपा उसी स्थान पर जल्द से जल्द भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए पूर्ण रूप से कटिबद्ध है।
आज महिलाओं से छेड़छाड़ करने वालों को उल्टा लटकाकर सीधा करने का काम योगी जी की सरकार ने किया है।
योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद प्रदेश में 50 हजार करोड़ रुपए से अधिक गन्ने का भुगतान किया गया है।
लोकतंत्र में अगर प्रतिभा हो, क्षमता हो, देश को आगे ले जाने की ललक हो तो हर एक को अपना स्थान ऊपर ले जाने का अधिकार है और उसका जीता जागता उदाहरण हमारे प्रधानमंत्री मोदी हैं।
मोदी जी की सरकार ने देश को सुरक्षीत करने के साथ ही साथ 129 जन कल्याणकारी योजनाओं से गरीबों का कल्याण किया है।
भारतीय राज्यों में कई ऐसे मुख्यमंत्री हुए हैं, जो अपनी प्रशासनिक क्षमता और जनता से सीधा संवाद के लिए जाने जाते हैं। आज के समय में जब कई मुख्यमंत्रियों और पूर्व मुख्यमंत्रियों पर भ्रष्टाचार सहित कई मामले चल रहे हैं, ऐसे में एक ऐसे सीएम भी हैं जो चुप-चाप, बिना पब्लिसिटी के अपना कार्य कर रहे हैं। यूँ तो राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी में कई बड़े नेता हैं, लेकिन एक चेहरा ऐसा भी है जो देश के सबसे अमीर राज्य (सर्वाधिक GDP) के शासन को संभाल कर अपनी कुशल प्रशासनिक क्षमता का परिचय दे रहा है।
ये हैं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस। जब महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हो रहे थे, तब भाजपा ने अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार का नाम घोषित नहीं किया था। लेकिन एक नारा ख़ूब चल रहा था जिसने महाराष्ट्र का मूड पहले ही बता दिया था। वो नारा था- ‘दिल्ली में नरेंद्र, मुंबई में देवेंद्र’। मृदुभाषी देवेंद्र फडणवीस अपने सहज व्यवहार से किसी का भी दिल जीत लेते हैं। राहुल गाँधी से एक महीने छोटे फडणवीस ने राजनीति की सीढ़ियाँ एक-एक कर चढ़ी है, अपने बलबूते।
कभी नागपुर के मेयर रहे फडणवीस भारतीय इतिहास में दूसरे सबसे युवा मेयर थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने जिस तरह से अपनी क्षमता का परिचय दिया है, उस से सभी नेताओं को सीखना चाहिए। महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य रहा है जहाँ ‘बाहरी बनाम स्थानीय’ के नाम पर तरह-तरह के बवाल फैलाए जाते रहे हैं। मुंबई आतंकवाद का निशाना रहा है। ऐसे में, फडणवीस ने बिना कोई सख्त कार्रवाई किए राज्य में हुए सभी बवालों, आन्दोलनों, विरोध प्रदर्शनों और हिंसा की अन्य वारदातों को चुटकी में काबू किया है।
फडणवीस के व्यवहार के आगे हारे अन्ना
अन्ना हजारे 2015 से लेकर अब तक महाराष्ट्र में कई बार अनशन का ऐलान कर चुके हैं। कभी भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर तो कभी ‘वन रैंक वन पेंशन (OROP)’ को लेकर लेकिन जब-जब उनके अनशन की ख़बर आई, मुख्यमंत्री फडणवीस ने व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप कर उनका अनशन पर पानी फेर दिया। अन्ना को हमेशा झुकना पड़ा और अपने अनशन की योजना को त्यागना पड़ा। हाल ही में अन्ना लोकपाल की माँग लेकर फिर से अनशन पर बैठे। शिवसेना ने मुख्यमंत्री फडणवीस से अनुरोध किया कि वह अन्ना की स्वास्थ्य की चिंता करें।
दिन-रात अपने एसी दफ़्तर में बैठ कर फाइलों पर हस्ताक्षर करने वाले और वाले मुख्यमंत्रियों की लिस्ट में फडणवीस का नाम नहीं आता है। न ही वे अपने राज्य को छोड़ कर दूसरे-तीसरे राज्यों में घूमते रहते हैं। उन्हें उनके राज्य में हो रही हलचल की ख़बर रहती है, तभी स्थिति की गंभीरता को भाँपते हुए वे पहुँच गए रालेगण सिद्धि। उनके साथ कुछ केंद्रीय एवं राज्यमंत्री भी थे। न सिर्फ उनके आश्वासन के बाद अन्ना ने सात दिनों का अपना अनशन तोड़ा, बल्कि यह भी कहा कि वो सरकार से पूरी तरह संतुष्ट हैं।
रालेगण सिद्धि पहुँच सीएम ने अन्ना का अनशन तुड़वाया।
अन्ना ने सीएम फडणवीस के साथ 6 घंटे तक गहन बैठक की। उनकी हर एक बात को ध्यान से सुना, उन्हें स्थितियों से अवगत कराया और उनकी माँगों पर विचार भी किया। मृदुभाषी फडणवीस ने अनशन स्थल पर पहुँच अपने हाथों से जूस पिला कर अन्ना का अनशन तुड़वाया।
इसकी तुलना अगर हम यूपीए काल से करें तो बाबा रामदेव के साथ हुआ वाक़या याद आ जाता है। जिस तरह से कॉन्ग्रेस सरकार ने आधी रात को बाबा और उनके अनुयायियों को प्रताड़ित किया, उन्हें गिरफ़्तार किया, मारा-पीटा। इसी तरह अन्ना के अनशन को भी 2011 में कुचलने की कोशिश की। अन्ना को जेल में डाल दिया गया। लेकिन फडणवीस यूपीए काल के बड़े-बड़े मंत्रियों से कहीं ज़्यादा क़ाबिल हैं। उन्हें अन्ना को वश में करने का तरीका पता है। इसके लिए बल और छल नहीं, अच्छे व्यवहार और कुशल क्षमता की ज़रूरत होती है।
मराठा आंदोलन को सरलता से नियंत्रित किया
जुलाई 2018 में जब मराठा आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा तब महाराष्ट्र के कई इलाक़ों में जबरदस्त हिंसा भड़क गई। ये आंदोलन हाथ से बहार जा सकता था, जैसा पहले भी कई बार हो चुका है। लेकिन, समय रहते फडणवीस ने महारष्ट्र स्टेट बैकवर्ड क्लास आयोग की बैठक बुलाई और आरक्षण संबंधी माँगों पर विचार-विमर्श किया। एक स्पेशल पैनल की रिपोर्ट के बाद सीएम ने कुछ शर्तों के साथ शिक्षा एवं नौकरियों में मराठों के लिए आरक्षण की घोषणा कर पूरे राज्य का दिल जीत लिया।
मराठा आरक्षण आंदोलन काफ़ी व्यापक था
इसके बाद एससी, एसटी कोटे के मुद्दे को उठा कर उन्हें घेरने की कोशिश की गई लेकिन अपने आरक्षण वाले निर्णय में वर्तमान कोटा सिस्टम से छेड़छाड़ न करने की बात कह उन्होंने अपने विरोधियों को चारों खाने चित कर दिया। मुख्यमंत्री ने अहमदनगर की एक रैली में जैसे ही कहा– ‘आप 1 दिसंबर की तैयारी कीजिए’, जनता ख़ुशी से झूम उठी। फडणवीस का आरक्षण अलग था, क्योंकि 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने भी आरक्षण की घोषणा की थी, लेकिन फिर भी स्थिति जस की तस रही।
भले ही फडणवीस बाल ठाकरे, राज ठाकरे, शरद पवार, विलासराव देशमुख, प्रमोद महाजन या गोपीनाथ मुंडे जैसे दिग्गज महाराष्ट्रीय नेताओं के बराबर प्रसिद्धि नहीं रखते हों, लेकिन उनके हर एक महत्वपूर्ण निर्णय के बाद उनकी लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ता ही चला जा रहा है।
हंगामेबाज़ गठबंधन साथी के साथ एक स्थिर सरकार
शिवसेना और उसके नेताओं का व्यवहार किसी से छुपा नहीं है। पार्टी कहने को तो महाराष्ट्र में सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा है, लेकिन कोई भी ऐसा दिन नहीं जाता है, जब उसके नेता भाजपा के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी न करते हों। एक भी ऐसा सप्ताह नहीं जाता, जब सामना में मोदी और भाजपा के विरोध में लेख नहीं छापते हों। लेकिन फडणवीस के पास शिवसेना को भी क़ाबू में करने का मंत्र है, एक कुशल प्रशासक होने के साथ ही वह एक कुशल राजनीतिज्ञ भी हैं।
शिवसेना भी उनकी बढ़ती लोकप्रियता को समझती है। इसीलिए शिवसेना राष्ट्रीय स्तर पर तो मोदी के ख़िलाफ़ ख़ूब बोलती है, लेकिन महाराष्ट्र में फडणवीस पर सीधे हमले नहीं करती। मुख्यमंत्री देवेंद्र ने शिवसेना का ऐसा तोड़ ढूंढा, जिस से हर कोई उनकी बुद्धि का कायल हो जाए। जनवरी 2019 में हुई एक कैबिनेट बैठक में शिवसेना के संस्थापक स्वर्गीय बाल ठाकरे की याद में एक मेमोरियल बनाने का निर्णय लिया गया। इतना ही नहीं, उसके लिए तुरंत ₹100 करोड़ का बजट भी ज़ारी कर दिया गया।
बकल ठाकरे मेमोरियल की घोषणा कर देवेंद्र ने उद्धव को चित कर दिया
मुंबई के दादर स्थित शिवजी पार्क में जब मेमोरियल के लिए ‘गणेश पूजन’ और ‘भूमि पूजन’ हुआ, तब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और मुख्यमंत्री फडणवीस ने एक मंच से जनता का अभिवादन किया। फडणवीस के इस दाँव से चित शिवसेना के पास उनका समर्थन करने के अलावा और कोई चारा न बचा।
किसान आंदोलन को एक झटके में किया क़ाबू
महाराष्ट्र के किसान आंदोलन ने इतना बड़ा रूप ले लिया था कि राष्ट्रीय मीडिया ने भी उसे ख़ूब कवर किया। जब 35,000 गुस्साए किसान 200 किलोमीटर की पदयात्रा के बाद झंडा लेकर प्रदर्शन करते हुए मुंबई के आज़ाद मैदान पहुँचे, तब बड़े-बड़े पंडितों को भी लगा था कि हालात अब बेक़ाबू हो चुके हैं। लेकिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बिना बल प्रयोग के इस आंदोलन को ऐसे क़ाबू में किया, जिस ने बड़े-बड़ों को अचंभित कर दिया।
सीएम ने बस भेज कर किसानों को चढ़ने का अनुरोध किया लेकिन वे नहीं माने। उसके बाद मुख्यमंत्री स्वयं किसानों के बीच गए और उन्होंने उनकी माँगों को सुना। 20,000 किसानों से मुलाक़ात करने के बाद फडणवीस ने उन्हें उनकी माँगो को पूरा करने का सिर्फ़ लिखित आश्वासन ही नहीं दिया, बल्कि इसके लिए समय-सीमा भी तय कर दी। क़र्ज़माफ़ी और सूखे के कारण रहत पैकेज की माँग कर रहे किसानों ने उनसे मिलने के बाद अपने प्रदर्शन को विराम दे दिया।
ऐसा नहीं था कि फडणवीस अचानक उनसे मिले और सबकुछ ठीक हो गया। दरअसल, फडणवीस की नज़र पहले से ही इस आंदोलन के जड़ पर थी। किसानों को अपने ही ख़िलाफ़ आंदोलन के लिए सरकारी बस मुहैया करना, एक मंत्री को पहले ही भेज कर स्थिति को नियंत्रित करना- बिना पब्लिसिटी के फडणवीस ने एक बार में एक क़दम चलते हुए सबकुछ सही कर दिया, बिना क़र्ज़माफ़ी की घोषणा किए।
कहा जा सकता है कि भाजपा में एक ऐसे नए संकटमोचक का उदय हुआ है, जो ढोल पीटना नहीं जानता, अपने गुणगानों का बखान करना नहीं जानता, तेज़ आवाज में नहीं बोलता, लेकिन फिर भी जनता उसकी भाषा समझती है और वो जनता की। वो राष्ट्रीय मीडिया में ज़्यादा नहीं आते और न ही उनके बयान चर्चा का विषय बनते हैं- उनका व्यक्तित्व ही उन्हें लोकप्रियता दिलाता है।
देश के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण अक्सर कोर्ट के फैसलों पर सवाल खड़े करते रहते हैं। भूषण के इसी व्यवहार की वजह से कई बार कोर्ट के अंदर भी न्यायाधीशों ने डाँट कर उन्हें कम बोलने की हिदायत दी है। इसके अलावा कई मामलों में कोर्ट द्वारा उन्हें अवमानना नोटिस भी भेजा गया है।
एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई मामले में कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी करने की वजह से प्रशांत भूषण को तीन हफ्ते में जवाब देने के लिए कहा है। दरअसल एम. नागेश्वर राव को सीबीआई के अंतरिम निदेशक बनाए जाने के मामले को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज दिया गया था।
Supreme Court issues notice to advocate Prashant Bhushan on contempt plea filed by Attorney General KK Venugopal and Centre that Bhushan in his tweets said that AG Venugopal ‘wilfully&deliberately’ made false statement in a case pending in court. Next date of hearing is March 7.
इस मामले में कोर्ट ने राव की नियुक्ति को बरकरार रखते हुए कहा था कि नीतिगत मामले में राव कोई फैसला नहीं ले पाएँगे। सीबीआई के अंतरिम निदेशक मामले में कोर्ट के इस फैसले पर ट्वीट करके प्रशांत भूषण ने अपनी नराजगी जताई थी।
इसके बाद केंद्र सरकार और अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने प्रशांत भूषण के खिलाफ़ अवमानना की याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर की थी। कोर्ट ने इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रशांत भूषण को तीन सप्ताह के अंदर मामले में जवाब देने के लिए कहा है।