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ट्विटर इंडिया को संसदीय पैनल ने नोटिस भेजकर लोगों के अभिव्यक्ति की आजादी के हनन पर जवाब माँगा

ट्विटर इंडिया को पार्लियामेंट्री बोर्ड की तरफ़ से सोशल मीडिया पर लोगों के अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने के लिए नोटिस भेजा है। पार्लियामेंट द्वारा भेजे गए इस नोटिस में ट्विटर इंडिया को 11 फरवरी 2019 को दोपहर 3 बजे बोर्ड के सामने पेश होने के लिए कहा गया है। इंफार्मेशन व टेक्नॉलाजी मामले पर अनुराग ठाकुर के नेतृत्व में गठित पार्लियामेंट्री कमिटि ने ट्विटर इंडिया को यह नोटिस भेजा है।

ट्विटर इंडिया पर अक्सर दक्षिणपंथी लेखकों के विरुद्ध एक पक्षपातपूर्ण रवैया रखने के आरोप लगते रहे हैं। विगत दिनों ट्विटर ने कुछ हैंडल्स को सिर्फ इस कारण से प्रतिबंधित कर दिया था क्योंकि वो दक्षिणपंथी विचारधारा रखते हैं। इसके विरोध में कुछ लोगों ने ट्विटर इंडिया कार्यालय के बाहर धरना प्रदर्शन भी किया था।

अक्सर ट्विटर ऐसे ट्विटर एकाउंट्स की या तो पोस्ट रीच को कम कर देता है या फिर उनके एकाउंट्स को सस्पेंड कर देता है, जो सरकार के समर्थन में लिखने के लिए जाने जाते हैं।

बिहार में 3 मार्च को मेट्रो की आधारशिला रख सकते हैं PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मार्च के महीने पटना मेट्रो रेल परियोजना की आधारशिला रख सकते हैं। इसके साथ ही बिहारवासियों के मेट्रो में सफर का सपना जल्द ही पूरा हो सकता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, भाजपा नेता सुरेश शर्मा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 3 मार्च को NDA की रैली में शामिल होंगे। इस दौरान प्रधानमंत्री द्वारा पटना मेट्रो रेल परियोजना की आधारशिला रखे जाने को लेकर सैद्धांतिक सहमति हो चुकी है, जिसके लिए ₹17,887.56 करोड़ की राशि मंजूर कर ली गई है।

सुरेश शर्मा ने कहा, “मेरे मन में यह विचार था, जो मैंने सोमवार को मुख्यमंत्री के साथ साझा किया, वह भी सहमत थे। मैंने विभागीय प्रधान सचिव चैतन्य प्रसाद से आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए कहा है, ताकि इस संबंध में एक प्रस्ताव को मंत्रिपरिषद मंजूरी दे सके।”

सुरेश शर्मा ने कहा, “हमें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री जब रैली को संबोधित करने के लिए अगले महीने यहाँ आएंगे, तब पटना मेट्रो रेल की आधारशिला रखेंगे।” पटना मेट्रो के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट को राज्य मंत्रिपरिषद ने पिछले साल अक्टूबर के महीने मंजूरी दे दी थी।

बिहार में NDA के घटक दल जदयू, भाजपा और लोजपा की प्रदेश इकाई ने हाल ही में कहा था कि लोकसभा चुनाव की घोषणा के पूर्व आयोजित इस रैली में गठबंधन के शीर्ष नेता हिस्सा लेंगे।

पटना मेट्रो के अंतर्गत 2 कॉरिडोर बनाए जाएँगे, पहला कॉरिडोर दानापुर से मीठापुर 16.94 किलोमीटर का होगा। दूसरा कॉरिडोर पटना जंक्शन से लेकर न्यू आईएसबीटी तक 14.45 किलोमीटर का होगा। पटना जंक्शन एक इंटरचेंज स्टेशन होगा, जहाँ लोग एक कॉरिडोर से उतरकर दूसरे कॉरिडोर के लिए मेट्रो पकड़ सकेंगे। इस जंक्शन पर एक स्टेशन अंडरग्राउंड, जबकि दूसरा एलीवेटेड होगा।

पत्रकारिता के समुदाय विशेष के लोगो! मोदी के वीडियो से जलता है बदन क्या?

आज एक ख़बर, या एक तरह की ख़बर, पत्रकारिता के यूजुअल सस्पैक्ट्स यानी छाती पीटो पत्रकारिता गिरोह के सदस्यों ने एक सुर में चलाई कि डल झील की बोट राइड में प्रधानमंत्री मोदी जो हाथ हिलाकर अभिवादन करते दिख रहे हैं, वो काल्पनिक है। किसी ने लिखा पहाड़ों को हाथ दिखा रहे हैं, किसी ने लिखा काल्पनिक लोगों को दिखा रहे हैं, कोई खोजो तो जानें कर रहा है, किसी ने कहा कि झील को हाथ दिखा रहे हैं…

लल्लनटॉप, फर्स्टपोस्ट, NDTV, The Telegraph, The Quint, News 18 आदि तमाम वेबसाइटों पर ये ख़बर खूब चलाई गई। ये सब हमारे दौर के ठीक-ठाक पढ़े जाने वाले वेबसाइटों में आते हैं। लेकिन पत्रकारिता का यह सम्प्रदाय विशेष पत्रकारिता के नाम पर मोदी के चश्मे के फ़्रेम से लेकर सोनिया गाँधी से ‘इंदिरा घर में खाना बनाती थी कि नहीं’ पूछने तक रायता फैलाता रहा है। इसीलिए, आश्चर्य नहीं होगा कि कल को ये और भी विचित्र बातें लिखने लगें। 

पहली बात तो यह है कि अगर एक भी व्यक्ति वहाँ है, चाहे वह वही कैमरामैन ही क्यों न हो जो वीडियो बना रहा है, तो भी मोदी ने अभिवादन किया तो इसमें समस्या क्या है? यहीं अगर मोदी चुप-चाप खड़े रहते तो पत्रकारिता के मानक स्तम्भ यह लिखते नज़र आते कि कश्मीर को ‘सॉफ़्ट टच’ की ज़रूरत है न कि मोदी के भावहीन चेहरे की। 

क्या यही गिरोह भूल गया है कि वो जो लिखता है उसे कोई पढ़ता है, स्क्रीन पर, न कि वो अपने आर्टिकल तभी लिखता है जब उसे सामने बैठकर पढ़नेवाला मिले? आज के दौर में जब आधिकारिक मीडिया कवरेज होती है, लाइव विडियो शेयर होता है तो क्या किसी राष्ट्र के प्रधानमंत्री को हाथ हिलाकर अभिवादन करते दिखाने में इतनी जासूसी करनी ज़रूरी है?

अगर वहाँ एक भी व्यक्ति था, चाहे वो कश्मीर का हो, या कहीं बाहर का, उसे देखकर मोदी ने अभिवादन किया तो इन पत्रकारों की देह में आग क्यों लग रही है? क्या ये मीडियावाले वहाँ मौजूद थे, और क्या ये बताएँगे कि वहाँ मोदी के अलावा और कोई था ही नहीं? अगर नहीं था तो विडियो किसने बनाया? ख़ैर, ये अब कुतर्क की तरफ़ जा रहा है, तो ज़्यादा नहीं करूँगा। फ़ैक्ट चेक वाले कहाँ हैं वैसे? किसी को कश्मीर भेजकर पूछ लेते कि मोदी किसको देख कर हाथ हिला रहे थे।

दूसरी बात यह है कि पत्रकारिता के इस ‘स्वर्णिम दौर’ में जब तैमूर की नैपी तक कवर की जाती हे, तो क्या और कोई ख़बर नहीं मिली गिरोह के लोगों को? इस ख़बर से समाज का क्या लाभ हो रहा है? ख़बर चलाने का कोई तो उद्देश्य होगा? या बस मज़े लेने की प्रवृत्ति है, तो आर्टिकल लिख रहे हैं, और ट्वीट एम्बेड कर रहे हैं? 

जब हमारे पत्रकार इतने खाली थे, तो कुछ और कर लेते, मोदी का हाथ देखकर इतने विचलित क्यों हो रहे हैं? ये किसी को सूचित करने का काम नहीं है, इसके अंदर एक घृणा की भावना है। वो भावना ही इस तरह की घटिया पत्रकारिता करने पर मजबूर करती है जहाँ किसने कौन सी साड़ी पहनी है, किसकी शक्ल किससे मिलती है, भाषण में कौन सा शब्द कितनी बार बोला, सीबीआई का डायरेक्टर शुक्ला क्यों है, मुसहर क्यों नहीं आदि आदि।

काम कर लो यार कुछ ढंग का! अपने चक्कर में मुझसे भी इस बर्बाद टॉपिक पर लेख लिखवा लिया! 

CRPF ने फिर पेश की मिसाल, अपने ही खून के प्यासे नक्सली की रक्तदान से बचाई जान

नक्सली और सीआरपीएफ जवानों के बीच गोलीबारी की घटनाएँ आए दिन सुनने को मिलती रहती हैं। जब कभी भी जंगलों में सुरक्षा बल के जवान और नक्सलियों के बीच गोलियाँ चलती है तो किसी न किसी का बेटा, पति या भाई ज़रूर मारा जाता है।

देश में हिंसा के सहारे परिवर्तन की चाह रखने वाले नक्सली आतंकी न सिर्फ देशद्रोही हैं बल्कि मानवीय मूल्यों के भी विरोधी हैं। 29 जनवरी 2019 को झारखंड के खूँटी जिले में सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच झड़प की एक ख़बर आई थी।

अमर उजाला ने अपने रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया है कि सीआरपीएफ की 209-कोबरा बटालियन और नक्सलियों के बीच जमकर फायरिंग हुई। दोनों ही तरफ़ से हुई गोलाबारी में पाँच नक्सली मारे गए जबकि दो घायल हो गए थे। दो में से एक घायल नक्सली का नाम सोमोपूर्ति है।

सोमोपूर्ति अपने साथी मृत नक्सली को उठाकर साथ ले जाना चाहता था, इसी दौरान उसे सीआरपीएफ की गोली लगी। सोमोपूर्ति को इलाज के लिए राँची के राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में भर्ती किया गया। अस्पताल में डॉक्टरों ने बताया कि इसे खून नहीं चढ़ाया गया तो इसकी मौत हो सकती है।

मौके पर नक्सली के जान पहचान का कोई भी व्यक्ति मौजूद नहीं था। इस समय बड़ा सवाल यह था कि खूंखार नक्सली की जान बचाने के लिए खून कौन देगा? ऐसे समय में सीआरपीएफ के कांस्टेबल राजकमल नक्सली की जान बचाने के लिए रक्तदान करने को तैयार हो गए।

जिन सीआरपीएफ के जवानों पर नक्सली सोमोपूर्ति ने कभी गोलियाँ चलाई होगी, उसी नक्सली की जान CRPF के राजकमल नाम के जवान ने अपना खून देकर बचा लिया।

इशरत मुनीर: कश्मीर के रखवाले मुस्लिमों की कहानी (भाग 1)

बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर रोंगटे खड़े करने वाला एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें आतंकवादी फेरन पहने एक मासूम लड़की की हत्या कर रहे हैं। दस सेकंड के इस वीडियो में लड़की हाथ जोड़े घुटनों बल बैठी है, तभी अचानक आतंकी उसके सर में 2 गोलियाँ मारते हैं। इस्लामिक स्टेट के तरीके से की गई इस बर्बरतापूर्ण हत्या का सच जब सामने आया तो पता चला कि कश्मीर के शोपियाँ में जिस लड़की की हत्या की गई उसका नाम इशरत मुनीर है।

दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा की 25 वर्षीया इशरत मुनीर का केवल एक ही ख्वाब था कि उसका कश्मीर पाकिस्तान पोषित आतंकवाद से आज़ाद हो, वहाँ शांति और खुशहाली हो। इसके लिए उसने खुद आतंकवाद से लड़ने की ठानी और आतंक के सफाए में सुरक्षाबलों का साथ दिया। इस राह में पल-पल मौत का ख़तरा था लेकिन इशरत के इरादे बुलंद थे।

हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन के आतंकियों के हाथों मारे जाने से पहले इशरत 15 आतंकवादियों को ढेर करवाने में सफल रही थी जिनमें अल-बद्र चीफ और A++ ग्रेड का आतंकी ज़ीनत-उल-इस्लाम भी शामिल था। लेकिन आखिरकार आतंकियों को इशरत के इरादों का भनक लग गयी और उन्होंने उसे 31 जनवरी को पुलवामा से अगवा कर लिया। आतंकियों ने इशरत को शोपियाँ में ड्रगाड के जंगलों में ले जाकर इस्लामिक स्टेट स्टाइल में उसकी हत्या करने का वीडियो भी बनाया।

इशरत मुनीर आतंकी ज़ीनत-उल-इस्लाम की ममेरी बहन थी। लिहाज़ा आतंकियों तक उसकी पहुँच आसान थी। धीरे-धीरे विश्वास जीतने के बाद इशरत इन आतंकियो के लिए ओवर-द -ग्राउंड-वर्कर के तौर पर काम करते हुए ज़रूरी सामान सप्लाई करती थी। साथ ही आतंकियों का संदेश दूसरे ओवर-ग्राउंड-वर्कर तक पहुंचाने का काम भी करती थी। इसलिए आतंकियों की लोकेशन की खबर इशरत के पास होती थी।

अपने मिशन के तहत इशरत ने आतंकियों पर पहला वार 1 अप्रैल 2018 को किया। इशरत की सटीक खबर पर कार्यवाही करते हुए शोपियाँ के ड्रगाड इलाके में सुरक्षा बलों ने आतंकियों पर धावा बोला और हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन के एक साथ 8 आतंकियों को मार गिराया। सुरक्षाबलों के लिए यह एक बड़ी कामयाबी थी। मारे जाने वालों में हिज़्ब-उल कमांडर इश्फ़ाक़ अहमद ठोकर, रईस अहमद ठोकर और ज़ुबैर तुर्रे जैसे आतंकी शामिल थे।

3 मई 2018 को इशरत ने सुरक्षाबलों को ज़ीनत-उल-इस्लाम की खबर दी जो कई सालों से आतंकी घटनाओं को अंजाम दे रहा था। वह शोपियाँ के तुर्कावानगाम गाँव में अपने 4 साथियों के साथ छिपा था। ज़ीनत पर सुरक्षाबलों ने धावा बोला लेकिन स्थानीय लोगों ने भारी पत्थरबाज़ी करनी शुरू कर दी जिसका फायदा उठाकर पाँच आतंकी भागने में कामयाब हो गए।

तुर्कावानगाम एनकाउंटर फेल होने के बाद इशरत को जान का ख़तरा बढ़ गया था लेकिन वह अपने मिशन से नहीं हटी। 4 अगस्त 2018 को इशरत की सूचना के आधार पर शोपियाँ में हिज़्ब-उल और अल-बद्र के 5 आतंकियों को घेर लिया गया। 12 घंटे चले इस ऑपरेशन में पाँचों आतंकी ढेर कर दिए गए। इस एनकाउंटर में हिज़्ब-उल कमांडर उमर मलिक भी मारा गया जो कि पुलिसकर्मियों की हत्या करने और हथियार छीनने के मामले में वांछित था।

इशरत अब तक 13 आतंकियों को जहन्नुम का रास्ता दिखा चुकी थी, लेकिन उसका असली टारगेट 12 लाख का इनामी अल-बद्र चीफ ज़ीनत अभी ज़िंदा था। पिछले एनकाउंटर्स में वह बच निकलने में कामयाब हो गया था। लेकिन 13 जनवरी 2019 को कुलगाम ज़िले के कठपोरा इलाके में इशरत की सटीक सूचना के आधार पर सुरक्षाबलों ने ऐसा जाल बिछाया कि ज़ीनत-उल-इस्लाम भाग नहीं पाया।

ज़ीनत आईईडी एक्सपर्ट और आतंकियों के रिक्रूटमेंट का एक्सपर्ट था। ज़ीनत की मौत के साथ साउथ कश्मीर में आतंक का बहुत बड़ा किला ढहाने में कामयाबी मिली थी। लेकिन इसके बाद हिज़्ब-उल चीफ़ रियाज़ नाइकू को इशरत पर शक हो गया और उसने इस्लामिक कानून शरिया के तहत इशरत की हत्या कर दी।

अपनी मौत से पहले कश्मीर की बेटी इशरत मुनीर मिट्टी का क़र्ज़ अदा कर चुकी थी। कश्मीर को बचाने वालों में इशरत अकेली नहीं थी। सत्तर वर्षों से घाटी के राष्ट्रवादी मुस्लिमों ने कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंक को परास्त करने में भूमिका निभाई है। और जब भी आतंकियों को ऐसा लगा कि उनका प्रोपेगंडा फेल हो रहा है तब उन्होंने देशभक्त मुस्लिमों की सार्वजनिक हत्या कर ख़ौफ़ पैदा करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए।

मजे की बात यह कि कश्मीर के इन मुस्लिमों की बहादुरी और शहादत को या तो मेन स्ट्रीम मीडिया कवर नहीं करता या दुष्प्रचार के इरादे से गलत रिपोर्टिंग करता है।

कश्मीर के राष्ट्रवादी मुस्लिमों की आगे की कहानी अगले भाग में।

‘ऐसो लगतो है जईसे मास्टरस्ट्रोकन की झड़ी सी लग गई है’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने इस कार्यकाल में यह साबित कर दिया है कि वो हर हाल में जनता के नेता हैं और जब बात राजनीति की आए तो वो मैदान पर 360 डिग्री बल्लेबाजी भी करना जानते हैं। ‘राजनीतिज्ञों’ की तमाम संभावनाओं को इस 5 साल के कार्यकाल में अपने ‘मास्टरस्ट्रोक्स’ से नकार देने वाले नरेंद्र मोदी अब राजनीति में विरोधियों से बहुत आगे निकल चुके हैं। 

नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते ही देश की “सवा सौ करोड़” जनता, जिसमें समाज का हर तबका, यानी युवा, बुजुर्ग, गरीब, अमीर, अगड़ा, पिछड़ा, मध्यम वर्ग, किसान, कारोबारी, धर्म, मत, सम्प्रदाय आता है, के प्रति समर्पित होकर काम करने का वायदा किया था।

अपने काम करने के तरीकों से बहुमत की इस सरकार का पूरा फायदा उठाते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन 5 सालों में एक प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति का उदाहरण पेश किया है। साथ ही यह भी याद रखा जाना चाहिए कि उन्होंने कहा था कि वो 4 साल काम और पाँचवें साल राजनीति करेंगे।  

विपक्ष उनके ‘राजनीति करने’ के अलग-अलग आशय निकाल रहा था और उम्मीद कर रहा था कि पाँचवें साल में नरेंद्र मोदी सिर्फ चुनाव प्रचार और रैलियाँ ही करेंगे। लेकिन जिस तरह की घोषणाएँ और उपलब्धियाँ पिछले कुछ दिनों में मोदी सरकार ने हासिल की हैं, वो हर किसी के लिए चौंका देने वाली थी।

सामान्य वर्ग के गरीबों को रोज़गार और शिक्षा में 10% आरक्षण

इसी तरह का चौंकाने वाला कदम था सामान्य वर्ग के लोगों को आरक्षण के दायरे में ले आया। इस क़ानून के अंतर्गत सरकार को शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में सामान्य वर्ग के गरीबों को 10% आरक्षण का अधिकार होगा। यह 10% आरक्षण, मौजूदा 50% की सीमा के अतिरिक्त होगा। इसे लोकसभा एवं राज्यसभा- दोनों सदनों में पारित किया जा चुका है। इसके दोनों सदनों में पारित होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ऐतिहासिक बिल और सामाजिक न्याय की जीत बताया था।

5 लाख तक के दायरे को टैक्स मुक्त

बजट के भाषण में शुरुआती चरणों में टैक्स की बात करने के समय पीयूष गोयल ने छूट की कोई बात नहीं की। ट्विटर पर तब तक बवाल हो गया की मोदी सरकार ने दोबारा टैक्सदाताओं की उपेक्षा की है। लेकिन, विपक्ष को लगभग ट्रोल करते हुए स्पीच के अंत में जब घोषणा की तो विपक्ष सन्न रह गया। टैक्स छूट की सीमा ₹2.5 लाख से बढ़ाकर ₹5 लाख की गई। यानी अब आयकर की सीमा ₹5 लाख कर दी गई। 3 करोड़ लोगों को इससे फायदा होगा। एनडीए सरकार ने अपने अंतरिम बजट में आम लोगों को टैक्स में बड़ी रियायत दे दी है। लोकसभा चुनाव से पहले ये आम आदमी को सरकार की तरफ से बड़ा तोहफा है। सरकार आयकर छूट की सीमा ढाई से लाख रुपए से बढ़ाकर सीधे ₹5 लाख कर दिया है।

भगोड़ों की घरवापसी

कई सालों से देश में चाँदी लूट रहे कारोबारी जब अचानक देश छोड़कर जाने लगे तो मोदी सरकार ने तत्परता से भगोड़ा आर्थिक अपराधी विधेयक पास किया।

सरकार में जनता के विश्वास को हौंसला तब मिला, जब कल यानी सोमवार (फरवरी 04, 2019) को ब्रिटेन के गृह सचिव द्वारा भगोड़े विजय माल्या के प्रत्यर्पण को मंजूरी देने की ख़बरें सामने आई। उम्मीदें हैं कि जल्द ही विजय माल्या और ₹14 हजार करोड़ का PNB घोटाला कर, विदेश भागे हीरा कारोबारी नीरव मोदी और मेहुल चौकसी भारत की जेल में गुड़ और चना खाते हुए दिखेंगे। विजय माल्या के साथ ही अब भारत सरकार मेहुल चौकसी के प्रत्यर्पण पर जोर दे रही है।

अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआइपी हेलीकॉप्टर घोटाले मामले में दुबई में रहने वाले दो आरोपित राजीव सक्‍सेना और दीपक तलवार के भारत लाए जाने के बाद भाजपा ने आजकल राजनीतिक बढ़त बनाई है। ₹3600 करोड़ के इस घोटोले में भारत सरकार अभी इसके बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल को भारत ला कर पूछताछ कर रही है।

सर्जिकल स्ट्राइक

पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर भारतीय सेना द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक मोदी सरकार की ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जाएगी। विपक्ष और वामपंथी गिरोहों के लिए तो सर्जिकल स्ट्राइक 2 बार हुई, दूसरी बार तब जब, इसी घटना पर बनी फ़िल्म ‘उरी’ सुपरहिट साबित हुई।

सिंधु जल समझौता

उरी हमले के बाद सिंधु जल समझौते को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि खून और पानी साथ-साथ नहीं बह सकते हैं। पाकिस्तान में नई सरकार बनने के बाद भी भारत और पाकिस्तान के बीच पहली द्विपक्षीय वार्ता के रूप में सिंधु जल संधि को ही चुना गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अच्छे से जानते हैं कि भारत अगर इस समझौते को तोड़ देता है तो पाकिस्तान का हलक सूख जाएगा, इसलिए आतंकवाद के मुद्दे पर भारत सरकार के पास सिंधु जल समझौता पर आक्रामक रुख पाकिस्तान को सोचने पर मजबूर करता रहेगा।

सामरिक बढ़त

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़े प्रतिद्वंदी बनकर उभर रहे चीन को मोदी सरकार लगातार कूटनीतिक मात देती आई है। इसका उदाहरण ओमान के दुकम और ईरान में चाबहार बंदरगाह पर चीन को पछाड़ते हुए भारत का अधिकार होना है।

प्रधानमंत्री नहीं, प्रधान सेवक

इनके अलावा भी ऐसे चौंका देने वाले निर्णय नरेंद्र मोदी ने लिए हैं, जो ये बताते उन्होंने जनता के मूड को अच्छे से ‘हैक’ कर लिया है। चाहे वो फैसला नोटबंदी का हो, चाहे पाकिस्तान के ख़िलाफ़ उनकी रणनीति हो या फिर हर नागरिक को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए उनका निजी बैंक खाते का विषय हो, इन सबसे नरेंद्र मोदी ने जो एक छवि बनाई है वो हर हाल में जनता के नेता की है।

ये छवि ऐसे नेता की है, जो तुष्टिकरण की राजनीति को दरकिनार कर कठोर निर्णय लेना जानता है। ये वो नेता है जो राजनीतिक फायदों को नकार कर दूरगामी फायदों के लिए वर्तमान में कष्ट उठा कर लोगों का दिल जीत सकता है। जनता जान चुकी है कि यह वास्तव में प्रधानमन्त्री नहीं बल्कि ‘प्रधान सेवक’ है।

लोकसभा में पेपर प्लेन, विधानसभा में पेपर बॉल: लेकिन लोकतंत्र की हत्या मोदी कर रहा है!

उत्तर प्रदेश के राज्यपाल ने जब बजट सत्र की शुरूआत के लिए दोनों सदनों के सदस्यों को संबोधित करने की कोशिश की तो विपक्ष के कुछ लोगों ने ‘राज्यपाल वापस जाओ’ के नारे लगाए और उनके ऊपर काग़ज़ की गेंद बनाकर उछाली। इससे पहले राफ़ेल पर चर्चा के दौरान विपक्ष ने संसद में पेपर के हवाई जहाज उड़ाए थे। 

लोकतंत्र की हत्या चिल्लाने वाले महागठबंधन के एक-एक नेता और पार्टी आजकल हर दिन नीचे गिरने के नए कीर्तिमान गढ़ते जा रहे हैं। आज की ख़बर यह है कि शाहनवाज़ हुसैन, शिवराज चौहान और योगी आदित्यनाथ को बंगाल में रैलियाँ करने की इजाज़त नहीं दी गई है। यह जानना भी ज़रूरी है कि जिस उत्तर प्रदेश में ‘राज्यपाल वापस जाओ’ के नारे ‘साइमन गो बैक’ की लाइन पर लग रहे हैं वहाँ लोकसभा की लगभग नब्बे प्रतिशत और विधानसभा की लगभग तीन चौथाई सीटों पर भारी बहुमत से लोगों ने भाजपा को चुना है।

दोनों चुनावों के बीच समय का ठीक-ठाक अंतर भी था। ऐसे में, सपा के नेताओं का हुड़दंग
यह दिखाता है कि क्यों मीडिया वाले इनसे जुड़ी घटनाओं को कवर करते वक्त ‘कार्यकर्ता’ की जगह ‘सपा के गुंडे’ का प्रयोग करते हैं। ये लोग लोकतंत्र, फ़ेडरल स्ट्रक्चर, संविधान और तमाम तरह की बातें करते हैं लेकिन सत्ता से दूर होने पर इनकी बिलबिलाहट इनसे हर वो कार्य पब्लिक में करवा रही है, जो किसी भी जन प्रतिनिधि को प्राइवेट स्पेस में भी नहीं करना चाहिए।

इसलिए, आजकल जब भी हम ‘लोकतंत्र की हत्या’ जैसे जुमले सुनते हैं तो लग जाता है कि या तो केजरीवाल को सपना आया होगा, या सीबीआई ने रेड मारी होगी, या ममता की नींद टूटी होगी या राहुल को याद आया होगा कि घोटाला हुआ नहीं, तो कुछ बोल देना चाहिए। ऐसे गंभीर शब्द अगर हर दूसरे दिन, टुच्ची बातों पर बोले जाते रहें तो इनकी गंभीरता खत्म हो जाएगी। 

यही हाल ‘आपातकाल आ गया’ वाले ‘भेड़िया आया’ कांड में हुआ है। किसी नेता पर जाँच बिठाने का मतलब आपातकाल है, किसी के राज्य के पुलिस अधिकारी को सीबीआई द्वारा बुलाना सुपर-आपातकाल है! हर वो घटना आपातकाल हो गई है जो किसी भी नेता को निजी स्तर पर भी प्रभावित कर रही हो। ये लोग कैसे भूल गए कि आपातकाल क्या था! 

चाणक्य का एक कथन था कि जब चोरों में खलबली मच जाए, तो समझो राजा अपना काम ठीक तरीके से कर रहा है। यही बात अब दिख रही है। सारे चोर एक साथ होकर मंच पर आ गए हैं, और एक व्यक्ति के पीछे लगातार झूठ बोलकर एक नैरेटिव तैयार करना चाह रहे हैं ताकि जनता उनके झाँसे में आ जाए। 

ऐसा नहीं है कि हर सरकार की हर नीति सही ही हो। हर सरकार में ख़ामियाँ होती हैं, लेकिन सरकार की हर बात में नकारात्मकता ढूँढकर, घोटाले मैनुफ़ैक्चर करना, आपातकाल की दुहाई देना और संसद जैसी पवित्र संस्थाओं में बेहूदगी के निम्न स्तर तक गिर जाना बताता है कि अब ये लोग कुछ भी कर सकते हैं! 

आप सोचिए कि विधानसभा या लोकसभा में ये लोग पेपर प्लेन और काग़ज़ की गेंद फेंक रहे हैं! ये लोग देश चलाने की बात करते हैं? यही लोग कभी ‘मर्यादा’ और ‘गरिमा’ की भी बातें करते नज़र आते हैं जो कि हास्यास्पद है। 

एक समय में सुप्रीम कोर्ट के डिसीजन को यह कहकर सर-आँखों पर बिठाना की लोकतंत्र में एक संस्था तो काम कर रही है, और फिर सीबीआई जैसी केन्द्रीय संस्था को अपने राज्यों में घुसने की अनुमति न देना, बताता है कि इनके लिए संस्थाओं का महत्व तभी तक है जब तक वो इनके मतलब के फ़ैसले सुनाए। वरना, सीबीआई को जाँच के लिए आन्ध्र प्रदेश या पश्चिम बंगाल में प्रदेश की सरकारों द्वारा घुसने की अनुमति न देना और क्या है? 

लोकतंत्र और फ़ेडरल स्ट्रक्चर की बात करनेवाली ममता बनर्जी आखिर भाजपा की रैलियाँ क्यों रोक रही है बंगाल में? अगर उनकी दलील साम्प्रदायिक तनाव बढ़ने से संबंधित है तो क्या प्रदेश की पुलिस घास छीलने के लिए है? या प्रदेश की पुलिस का काम ममता बनर्जी के इशारों पर सीबीआई के ही अफ़सरों को, जो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन करते हुए जाँच करने आए थे, गिरफ़्तार करना भर रह गया है?

यही वो ममता बनर्जी हैं जिन्होंने मुहर्रम और दुर्गा विसर्जन के एक ही दिन होने पर दुर्गा विसर्जन को रोकने का आदेश जारी किया था। तब, कोर्ट ने फटकार लगाई थी कि कानून व्यवस्था सरकार का ज़िम्मा है, और ममता लगातार एक सम्प्रदाय के तुष्टीकरण में लगी रहती हैं। इसी ममता ने ‘हथियारों’ के साथ होनेवाली धार्मिक यात्राओं (रामनवमी, दुर्गा विसर्जन आदि) पर यह कहा था कि उनके राज्य में ये नहीं होगा, जबकि वहीं सम्प्रदाय विशेष ऐसी यात्राएँ अपने त्योहारों पर खूब निकालता है। 

फिर जब ममता को लगने लगा कि प्रदेश के हिन्दू नाराज हो रहे हैं तो उन्होंने पिछले साल दुर्गा पूजा पंडालों को सरकारी सहयोग राशि देने की बात की। और, हो न हो, यही कारण है कि भाजपा की रैलियाँ रोकी जा रही हैं क्योंकि इनके यूनाइटेड अपोज़िशन रैली में तमाम दिग्गजों के होने के बावजूद भीड़ नहीं जुट पाई थी। 

कुमारस्वामी अपने क्लर्क होने की दुहाई देते हैं तो उनके पिता बेटे की इस हालत पर रोने लगते हैं। मध्य प्रदेश और राजस्थान में किसानों की कर्ज़माफ़ी के नाम पर तेरह रुपए बाँटने की नौटंकी और जिन्होंने कर्ज़ लिया नहीं, उनके नाम पर पैसे जारी होना बताता है कि ये चाहे कितना भी जनेऊ पहन लें, इनकी नीयत चोरों वाली ही रहेगी। 

कॉन्ग्रेस अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है, और इसी कारण छोटे क्षेत्रीय पार्टियों को बिना माँगे समर्थन देने को हर जगह तैयार दिखती है। सपा-बसपा पुराने कांड भुलाकर एक हो रहे हैं। चंद्रबाबू नायडू सीबीआई से डरे दिख रहे हैं जैसे कि सीबीआई सबूत पैदा कर लेगी और उसी सुप्रीम कोर्ट में उनको न्याय नहीं मिलेगा जहाँ कई बार ‘लोकतंत्र की जीत’ के नारे वो लगा चुके हैं। 

कुल मिलाकर, इस स्तर का छिछलापन महागठबंधन की सोच और सत्ता को पाने की लालसा में वर्तमान सरकारों के परेशान करने के अलावा और कुछ भी नहीं दिखता। सोशल मीडिया के कारण ऐसी ख़बरें जनता तक भी पहुँचती हैं, और अब वो भी समझते हैं कि कौन आदमी क्या चाहता है। 

जब केजरीवाल, फ़ारूक़पुत्र उमर अब्दुल्ला, लालूपुत्र तेजस्वी, मुलायमपुत्र अखिलेश, मायावती, ममता, नायडू, देवगौड़ानंदन कुमारस्वामी एक साथ किसी की भी निंदा करें तो सामान्य बुद्धि यही कहती है कि वो कार्य पूर्णतः सही हो रहा होगा। 

ये अवसरवादियों का गिरोह है, जो पूर्णतः अव्यवस्थित है। स्वार्थसिद्धी के अलावा इनका और कोई विजन नहीं दिखता। लोग लालू के साथ मिलकर बिहार की स्थिति सुधारने की बात करते हैं। लोग चार साल पहले ममता को चिटफ़ंड घोटाले में चार साल पहले घेर रहे थे, आज उसी की जाँच होने पर उसे फासीवाद और लोकतंत्र पर हमला बता रहे हैं। इंटरनेट के दौर में चीज़ों को अपने टाइमलाइन से तो डिलीट कर सकते हैं, लेकिन पब्लिक के स्क्रीनशॉट से नहीं। यहाँ अब हर सच घूमफिर कर वापस आ ही जाता है।

जब हर वार खाली जा रहा है, तो बेहूदगी का दाँव बचा दिखता है। इसलिए मर्यादा की बात करने वाले ‘चौकीदार चोर है’ से लेकर स्वयं राफ़ेल पर चर्चा बुलाकर, पेपर प्लेन उड़ाते दिखते हैं। इसीलिए, तीन चौथाई बहुमत वाली सरकार के राज्यपाल का स्वागत ‘वापस’ जाने के नारों से होता है। इसीलिए, लालू में मसीहाई की तासीर नज़र आती है। इसीलिए, मायावती बुआ हो जाती है। 

रैली हम रोकेंगे, चॉपर हम उतरने नहीं देंगे, सीबीआई को गिरफ़्तार हम करेंगे, संसद में प्लेन हम फेंकेंगे, विधानसभा में काग़ज़ की गेंद हम चलाएँगे, हिन्दुओं की यात्राएँ और विसर्जन हम रोकेंगे, लेकिन लोकतंत्र की हत्या तो मोदी कर रहा है! 

निर्मम, बर्बर, अलोकतांत्रिक, भ्रष्ट ममता बनर्जी से बंगाल को मुक्त कराने का समय आ गया है: योगी

पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रतिबन्ध, धरना-प्रदर्शन की सियासत के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पश्चिम बंगाल में रैली पर रोक के बावजूद झारखण्ड के रास्ते बंगाल के पुरुलिया पहुँच गए।

इससे पहले पुरुलिया में ममता बनर्जी सरकार द्वारा हेलिकॉप्‍टर के लैंडिंग की अनुमति नहीं देने पर यूपी के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने ट्वीट कर ममता सरकार पर जमकर निशाना साधा था।

सीएम योगी ने कहा, “मुझे अत्यंत दुःख है कि गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की कर्मभूमि, हमारा बंगाल, आज ममता बनर्जी और उनकी सरकार की अराजकता तथा गुंडागर्दी से पीड़ित है। अब समय है कि बंगाल को एक सशक्त लोकतांत्रिक आंदोलन के माध्यम से संविधान की रक्षा हेतु इस सरकार से मुक्त किया जाए। मैं आज पुरुलिया में आप सबके बीच इस आंदोलन की ध्वजा लेकर भ्रष्टाचारियों के गठबंधन के लिए चुनौती बनकर खड़ा होउँगा।”

पुरुलिया में जनसभा को संबोधित करते हुए योगी ने कहा कि वेस्ट बंगाल में अराजक, अलोकतांत्रिक, असंवैधानिक टीएमसी की सरकार है।

पुरुलिया में जनसभा को संबोधित करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, “डेढ़ साल पहले इसी बंगाल में शारदीय नवरात्रि की दुर्गापूजा और मोहर्रम का कार्यक्रम एक साथ देश में पड़ा था। ममता सरकार ने मोहर्रम के कार्यक्रम को मंजूरी दी थी और दूर्गापूजा के कार्य में रोक लगाने का काम किया था।” मुख्यमंत्री योगी ने आगे कहा, “ममता ने कहा कि यूपी संभल नहीं रहा है। मैं कहना चाहता हूँ  कि यूपी बहुत अच्छे ढंग से संभल रहा है। जिस दिन बीजेपी की सरकार बंगाल में आएगी टीएमसी के गुंडे अपने गले में तख्ती लटकाकर वैसे ही घूमेंगे जैसे उत्तर प्रदेश में एसपी-बीएसपी के गुंडे अपने गले में तख्ती लटकाकर चलते हैं और कहते हैं कि हमें बख्श दो, हम किसी के साथ अन्याय नहीं करेंगे।”

सीएम योगी ने कहा, “जिस धरती ने विपरीत परिस्थितियों में देश को संबल दिया था। आप सब जानते हैं कि ये बंगाल की ही धरती है जिसमें रामकृष्ण परमहंस जी ने आध्यात्मिक साधना के दम पर लोगों को नया संबल दिया था। स्वामी विवेकानंदजी ने पूरी दुनिया के अंदर रहने वाले हिंदुओं को कहा था कि गर्व से कहो हम हिंदू हैं। यह भाव पैदा करने वाली धरती है। स्वामी विवेकानंद जी ने दुनिया के अंदर रहनेवाले भारत वासियों से कहा था कि अपने धर्म और संस्कृति पर गौरव की अनुभूति करो। यह वही बंगाल की धरती है, जिसने इस देश को गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर के द्वारा राष्ट्रगान दिया।”

योगी आदित्यनाथ ने बंगाल की जनता को सम्बोधित करते हुए आगे कहा, “मुझे आश्चर्य होता है कि बंगाल की धरती तो वास्तव में भारतीय जनता पार्टी की धरती होनी चाहिए क्योंकि बीजेपी पूर्ण जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसी बंगाल की धरती की देन थे। आपने बंगाल के अंदर एक निर्मम, एक बर्बर, एक अलोकतांत्रिक, एक भ्रष्ट ममता बनर्जी के नेतृत्ववाली टीएमसी सरकार के खिलाफ जो मोर्चा लिया, मैं इसके लिए आप सभी का हृदय से अभिनंदन करता हूं।”

योगी ने कहा, “मोदी सरकार द्वारा दिया गया ग़रीबों के मकान का पैसा टीएमसी की सरकार और टीएमसी के गुंडे खा जाते हैं। यहाँ की सरकार भ्रष्ट है। आपने देखा होगा कि कैसे बंगाल के अंदर यहाँ की मुख्यमंत्री शारदा चिटफंड घोटाले के एक भ्रष्ट अधिकारी को बचाने का काम कर रही हैं। आज भी सुप्रीम कोर्ट में कहा गया है कि जिस भ्रष्ट अधिकारी को बचाने का काम ममता बनर्जी कर रही थीं, उन्हें सीबीआई के पास जाना चाहिए। यहाँ नहीं, शिलॉन्ग में जाकर हाजिरी लगाएँ और सीबीआई कोर्ट में राज को खोलें कि शारदा चिटफंड घोटाले में कौन-कौन लोग जिम्मेदार हैं। एक प्रदेश की मुख्यमंत्री धरना देने के लिए बैठ जाएँ  लोकतंत्र में इससे निंदनीय कार्य नहीं हो सकता है।”

पुरुलिया पहुँचने से पहले सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि वेस्ट बंगाल सरकार अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक गतिविधियों में उलझी हुई है। उन्होंने कहा, “अपनी इन गतिविधियों को छिपाने के लिए वह बंगाल में मुझ जैसे ‘संन्यासी’ और ‘योगी’ को बंगाल में कदम नहीं रखने दे रही हैं।”

बता दें कि पुरुलिया के एसपी आकाश मघारिया ने कहा था कि जमीनी स्‍तर पर तथ्‍यों और आँकड़ों को देखते हुए योगी आदित्यनाथ को रैली की अनुमति नहीं दी गई थी। इससे पहले मध्‍य प्रदेश के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान ने भी कहा था कि उन्‍हें बेहरामपुर में रैली की अनुमति नहीं दी जा रही है। इस बीच बीजेपी नेता शाहनवाज हुसैन को भी रैली से रोका गया था।

सेकुलर भारत के राष्ट्रपति भवन में ‘मुग़ल गार्डन’: ग़ुलामी के प्रतीकों पर गर्व करने वाली अकेली प्रजाति

ख़बर आई कि कल से राष्ट्रपति भवन परिसर का ‘मुग़ल गार्डन’ आम जनता के लिए खोल दिया जाएगा। हर साल ये ख़बर आती है, लोग घूमने जाते हैं, राष्ट्रपति जी स्वयं इसे जनता के लिए खोलते हैं। सवाल यह आता है कि जिस देश में केन्द्रीय विद्यालय में संस्कृत प्रार्थना पर सुप्रीम कोर्ट पहुँच जाते हैं लोग, उस देश में आतंकी मुग़लों के नाम पर गार्डन क्यों है?

क्योंकि जहाँ तक इनका इतिहास रहा है, इनके गार्डन तो ख़ून से सने रहे हैं, फिर इन्हें गार्डन और फूल किस कारण दिया जा रहा है? दूसरी बात यह है कि जिस समय हिन्दी नाम से लेकर, संस्कृत प्रार्थना और नेताओं के दिवाली मनाने तक को साम्प्रदायिक क़रार दिया जा रहा है, उस समय इन आतंकियों के नाम पर ये गार्डन है ही क्यों? गार्डन का नाम ‘कलाम गार्डन’ कर दो जो कि एक आदर्श नागरिक थे, भारत रत्न थे। आक्रांताओं के नाम पर गार्डन! 

अब यह न कहा जाए कि ये उद्यान मुग़ल स्टाइल में हैं इसलिए इसका नाम ऐसा है। बात यह है कि आतंकियों, लुटेरों, बलात्कारियों, हत्यारों, नरसंहारकों, मूर्तिभंजकों, आतताइयों, धर्मांध अत्याचारियों आदि के नाम से कुछ भी है ही क्यों इस देश में? अगर इस देश के एक तबके को वन्दे मातरम में मूर्ति दिखती है, और संस्कृत प्रार्थना में हिन्दू धर्म, तो जिन लाखों लोगों को काटकर, हज़ारों मंदिरों को तोड़कर, लूटपाट और आगजनी करते हुए इन आतंकियों का शासन चला, उनके नाम के जश्न मनाएँ?

दिल्ली सल्तनत, मुग़ल वंश और ब्रिटिश राज पर दसियों पन्ने इतिहास की किताबों में पढ़ाने और सारे प्रतियोगी परीक्षाओं में उनके गुणगान, महानता और मानवीय छूटों के बखान को दिमाग में ड्रिल कर घुसवाने वाली प्रजाति भारतीय कही जाती है। बहुत ही सहजता से कुल तीन पन्नों में आपको गुप्त वंश, मौर्य वंश, चोल, पांड्य, चेर, सातवाहन आदि को पैराग्राफ़ दे-देकर समेट दिया जाता है। बताया जाता है कि 200 साल तक ग़ुलाम बनाकर रखने वाले, हम पर बलात्कार करने वाले और तलवार की नोक परधर्म परिवर्तन कराने वाले आतंकी शासकों के साम्राज्य में सूर्यास्त नहीं होता था और फलाना आदमी कितना महान था! 

बलात्कारियों, हत्यारों और नरसंहारों को अंजाम देने वालों के नाम पर हमने सड़कें बनवाई हैं। नालंदा के विश्वविद्यालय में छः फ़ीट लम्बी घास उग रही है, और उसे तबाह करने वाले के नाम पर बगल ही में शहर बसा हुआ है! बोधगया के मंदिरों की हालत बदतर होती जा रही है, हिन्दू मंदिरों से आने वाले दान का नियंत्रण मंदिरों के पास नहीं, और वहीं इस्लामी आक्रांताओं के ख़ूनी साम्राज्य की गवाही देती इमारतों के संरक्षण में सरकारें करोड़ों ख़र्च करती रहती हैं। 

लालक़िला से आज़ादी का झंडा फहराया जाता है। क्या हुआ जो तुम्हारी दस-बीस पीढ़ी पहले हुई औरतों का बलात्कार किया गया? क्या हुआ जो तुम्हारे पूर्वजों को हज़ारों की संख्या में काटा गया? क्या हुआ जो तुम्हारे सारे संसाधन लूट कर कोई ले जाता रहा? अरे उन्होंने यहाँ से वहाँ तक राज किया! अरे उन्होंने ताजमहल बनवाया, लालक़िले बवनाए, क्रिकेट दिया, अंग्रेज़ी भाषा दी, उर्दू दी… और हाँ नाला-नाली तहज़ीब भी! वही तहज़ीब जिसका भार एक ही तरफ़ के लोग उठाते रहते हैं, और दूसरी तरफ़ के बहुत लोगों के लिए देश असहिष्णु हो गया है।

एक संसद भवन तो हम बनवा न सके, कहाँ से ग़ुलामी मानसिकता से बाहर आ पाएँगे! तुम्हारे सैनिकों को मरने विश्वयुद्ध में भेज दिया और दिल्ली में बना दी इंडिया गेट, लिख दिए गए नाम शहीदों के और तुमसे इस ग़ुलामी के प्रतीक को ध्वस्त करना न हुआ। तुमसे किसी नए स्मारक पर उनका नाम स्थानांतरित न हुआ। तुमने जॉर्ज पंचम की मूर्ति को संभालकर बुराड़ी में रखा हुआ है ताकि हमें याद रहे कि हमें कितनी ख़ूबसूरती से लूटा गया! 

दुनिया के इतिहास में एक तो पाकिस्तान है जो गौरी, गजनी जैसे लुटेरों को सेलिब्रेट करता है क्योंकि वो मजहब विशेष के थे। इस्लामी होना काफी है, भले ही वो बलात्कारी हों, तुम्हारी माँओं का बलात्कार किया, उनके बापों के सर पर तलवार रखकर इस्लाम कबूल करवाया, लेकिन उसने भारत में आतंक मचाया तो वो पाकिस्तान के हीरो हैं। ख़ैर, पाकिस्तान की बात तो अलग ही है। 

बाकी देशों के इतिहास देख लीजिए, जिनके लोगों में थोड़ी सी भी शर्म थी, थोड़ा भी गौरव था अपने इतिहास और संस्कृति को लेकर, उन सबने आज़ादी पाते ही सबसे पहले आक्रांताओं के सारे चिह्न मिटाए। हमारे लिए वो ज़रूरी नहीं था क्योंकि हमारे नेता लोग अंग्रेज़ों के संसद से राज चलाने तक के लिए राज़ी थे। हमारे लिए ज़रूरी था कि हमें मालिकों ने अंग्रेज़ी दी। हमने मुग़लों के स्मारकों को नहीं तोड़ा क्योंकि यहाँ के समुदाय विशेष के वो आदर्श हो गए थे और ऐसे लुटेरों के चिह्न हमारा ‘समृद्ध इतिहास’ हो गए। 

हमने हर विदेशी को ऐसे देखा मानो हम गरीबी, बीमारी, और भुखमरी से मर रहे थे, फिर वो आए और हमें खाने को दिया, पढ़ना सिखाया, काम करना सिखाया और उसके बदले में फीस भी नहीं ली। जब हम सभ्य हो गए तो वो चले गए। इस्लामी आतंकियों के नाम पर सड़के, गाँव, ज़िले और नगरों के नाम क्यों हैं, ये मेरी समझ से बाहर है। चाहे वो शाहजहाँ हो, बाबर हो, अकबर हो, ऐबक हो, रज़िया हो या कोई और। वो चोर, बलात्कारी, लुटेरे और आतंकी थे, उनकी निशानियाँ हम क्यों ढो रहे हैं, मेरी समझ के बाहर हैं। 

‘उन्होंने क्या किया’ से पहले ये जानना ज़रूरी है कि उन्हें वैसा करने के लिए बुलाया किसने था? लुटेरों का झुंड आता है, तुम्हारी बहनों के साथ बलात्कार करता है, तुम्हारे परिवार को नमाज़ी बनाता है, और तुम बाद में उसे खाना देते हो, उसके पाँव दबाते हो। वो मरता है तो तुम्हारे बच्चे उसके बच्चों के पाँव दबाते हैं। फिर उनके बच्चे उनके बच्चों के… ये किस तरह की मानसिकता है? 

लोग ये भूल गए हैं कि भले ही उनका धर्म आज कुछ भी है, लेकिन स्वेच्छा से भी धर्म बदलने के बावजूद वो उन आतंकी शासकों को कैसे भला कह सकते हैं जिनका मूल उद्देश्य लूट और हत्या थी। वो ये कैसे भूल जाते हैं कि हर मंदिर को तोड़ने वाले लुटेरों की फ़ौज को जस्टिफाय नहीं किया जा सकता। 

अंग्रेज़ गए तथा अपनी सत्ता और लूट को व्यवस्थित बनाकर चलाने के लिए उन्होंने जो ढाँचे बनाए थे उन्हें हम उनका महान योगदान समझकर पूजते हैं। लोग कहते पाए जाते हैं कि उन्होंने रेल दी, डाक दिया, कई बिल्डिंगें दी… क्या हमने माँगी थी? या हम मर रहे थे उनके बिना? उनके बाप-दादा जब कुल्हाड़ी लेकर लड़ रहे थे, उससे दो हज़ार साल पहले यहाँ लोकतंत्र भी था, दर्शन भी था, विकेन्द्रीकरण से चलने वाली व्यवस्था भी थी, शिक्षित और समृद्ध समाज भी था। उन्होंने कुछ नहीं दिया। हजारों भाषाओं वाली ज़मीन पर अंग्रेज़ी लाना कोई उपहार नहीं, ग़ुलाम मानसिकता को बरक़रार रखने की सोच है। 

बाबर हर जगह से दुत्कारा और भगाया हुआ इस्लामी आतंकी लुटेरा था, जिसके पास कहीं जाने को नहीं था। वो अगर कहीं जा सकता तो गजनी-गौरी-शाह-खान की तरह समान लूटकर वापस चला जाता। यहाँ रुकना उसका चुनाव नहीं, मजबूरी थी। सेक्स किया तो बच्चे भी हुए, और उनके पास भी घर नहीं था कि वापस कहीं जाते। बाकी का काम यहाँ के राजाओं ने एक दूसरे की मदद न करके कर दी। और हम उनके नाम से सड़कें बनवाकर इस बात पर उलझे हैं कि वो रहमदिल था कि नहीं! 

ये इतिहास कोई भव्य नहीं है कि उसे संरक्षित किया जाए। ब्रिटेन अपनी लूट और नरसंहारों की दास्तान अपनी किताबों में नहीं पढ़ाता। उनके बच्चों को पता भी नहीं कि चर्चिल ने पचास लाख लोगों को बंगाल में अकाल ‘लाकर’ में मार दिया, जबकि वो गेहूँ भारत से निकालकर युद्ध की तैयारी का बफ़र स्टॉक तैयार कर रहा था। लेकिन हमने लालक़िला बचाया हुआ है, संसद भवन बचाकर रखा हुआ है, लुटयन ज़ोन में होने पर गर्व महसूस करते हैं। 

तुम ग्रीक नस्ल नहीं हो, तुम रोमन नहीं हो कि तुम्हारे लोगों ने बाहर जाकर साम्राज्य बढ़ाया तो उनकी मूर्तियाँ चौराहों पर लगाकर, उनके नाम सड़कें, शहर और नगरों पर लगा दिया। तुमने अपने लुटेरों, हत्यारों और बलात्कारियों के नाम अपने चारों तरफ़ ऐसे लगा रखे हैं मानो वो न होते तो तुम्हारी ज़िंदगी बेकार होती। 

ऐसे हर चिह्न को मिटाना ज़रूरी है जो एक प्रतीक के रूप में हमारी आँखों के सामने है। ये काम पंद्रह अगस्त 1947 को शुरु होना चाहिए था और हर भारतीय को ग़ुलामी की हर इमारत, किले और प्रतीकों को ध्वस्त करते रहना चाहिए था। हमारी संसद किसी टेंट में चल सकती थी, तिरपाल खींचकर संविधान समिति संविधान बना लेती। लेकिन वो नहीं हुआ, उसके उलट आज़ादी का पहला भाषण हमने औपनिवेशिक भाषा में दिया जबकि अट्ठाइस भाषाएँ उपलब्ध थीं चुनने के लिए। 

ये सब बताता है कि हमारे नेताओं की मानसिकता कैसी थी। जो इस देश की दिशा बदल सकते थे, स्वाभिमान का दौर ला सकते थे, उन्होंने अंग्रेज़ों और मुग़ल आतंकियों के घरों में रहकर नए देश की दिशा तय की। उन्होंने उनके कानून रखे, उनकी इमारतें रखीं, और उन्हीं की भाषा में हमारे देश का आने वाला भविष्य लिखा। 

मेरी इच्छा है कि ये तमाम इमारतें गिरा दी जाएँ, ये सारे चिह्न मिटा दिए जाएँ जो हम पर हुए हमलों की याद दिलाते हैं। मेरी इच्छा है कि ये तमाम नाम आतंकियों की तरह पढ़े जाएँ न कि क़ाबिल शासकों की तरह। इनके कुकृत्यों का ज़िक्र हो किताबों में न कि ‘ढिमका-ए-इलाही’ मज़हब का। इन्हें ‘मुग़ल सल्तनत’ नहीं, ‘मुग़लिया आतंकियों के हमले का दौर’ मानकर पढ़ाया जाए, और उन तमाम नामों को सामने लाया जाए जिन्होंने लगातार इनके ख़िलाफ़ आवाज़ें उठाईं। 

जिसे ‘भारत का इतिहास’ कहकर उपन्यास रूप में पढ़ाया जाता है, वो इतिहास नहीं, इतिहास पर किया गया हमला है। उसमें किसी भी तरह की सकारात्मकता ढूँढना ये बताता है कि हम एक कायर और पराश्रित नस्ल हैं जिसके पास न तो स्वाभिमान है, न ये क्षमता कि वो अपने सही इतिहास को जान सके, और गलत को ठीक कर सके। 

पुरुलिया की धरती से योगी ने ममता की अराजकता को ललकारा

ममता बनर्जी के अराजक व्यवहार से राजनीतिक हलचल बढ़ती जा रही है। लगातार एक के बाद एक बीजेपी के स्टार नेताओं की रैलियों पर ममता बनर्जी रोक लगाती जा रही हैं जिससे पश्चिम बंगाल में बीजेपी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच राजनीतिक घमासान और तेज हो गया है।

पहले पश्चिम बंगाल सरकार ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पुरुलिया में रैली की इजाजत नहीं दी। जबकि बीजेपी के अनुसार योगी जी पुरुलिया में रैली के लिए राँची के बोकारो से सड़क मार्ग से निकल चुके हैं। इस बीच पुरुलिया के एसपी ने का भी बयान है कि अगर योगी आदित्‍यनाथ यहाँ रैली करते हैं, तो उन पर कार्रवाई की जाएगी।

ममता बनर्जी यहीं नहीं रुकी उन्होंने दो हाथ और आगे बढ़ाते हुए बीजेपी नेता शाहनवाज हुसैन और एमपी के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज चौहान को भी पश्चिम बंगाल में रैली करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हुसैन मुर्शिदाबाद और शिवराज सिंह बेहरामपुर में रैली करना चाहते थे।

इससे पहले भी योगी को पश्चिम बंगाल में रैली से रोका गया था तो उन्होंने फोन से ही रैली की थी। हालाँकि उस पर मचे बवाल के बाद ममता बनर्जी ने दावा किया था कि उन्‍होंने योगी की रैली पर कोई रोक नहीं लगाई है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पुरुलिया के एसपी आकाश मघारिया ने बयान दिया कि जमीनी स्‍तर पर तथ्‍यों और आँकड़ों को देखते हुए योगी आदित्यनाथ को रैली की अनुमति नहीं दी गई है।

इससे पहले मध्‍य प्रदेश के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि उन्‍हें बेहरामपुर में रैली की अनुमति नहीं दी जा रही है। बीजेपी के नेता शाहनवाज हुसैन का भी रास्‍ता रोका गया था।

इससे पहले पुरुलिया में हेलिकॉप्‍टर के लैंडिंग की अनुमति नहीं मिलने पर यूपी के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने ट्वीट कर ममता सरकार को लोकतंत्र याद दिलाया था।

सीएम योगी ने कहा, “मुझे अत्यंत दुःख है कि गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की कर्मभूमि, हमारा बंगाल, आज ममता बनर्जी और उनकी सरकार की अराजकता तथा गुंडागर्दी से पीड़ित है। अब समय है कि बंगाल को एक सशक्त लोकतांत्रिक आंदोलन के माध्यम से संविधान की रक्षा हेतु इस सरकार से मुक्त किया जाए। मैं आज पुरुलिया में आप सबके बीच इस आंदोलन की ध्वजा लेकर भ्रष्टाचारियों के गठबंधन के लिए चुनौती बनकर खड़ा होऊँगा।”

इसके ज़वाब में ममता बनर्जी ने कहा योगी की रैली पर कोई रोक नहीं है। ममता ने कहा, “योगी आदित्यनाथ को रैली करने दो। अपना यूपी तो संभाल नहीं पा रहे हैं, पुलिसवाले मारे जा रहे हैं, मॉब लिंचिंग हो रही है लेकिन वह यहाँ बंगाल घूम रहे हैं। उनसे कहिए पहले अपना राज्‍य संभालें।”

ममता के इस बयान के बाद योगी आदित्‍यनाथ ने ट्वीट कर एक बार फिर ममता बनर्जी पर हमला बोला।

सीएम योगी ने कहा, “राजनीतिक हिंसा में बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या करवाने वाली, ग़रीबों को लूटने वाले भ्रष्टाचारी लोगों के साथ खड़े होने वाली तथा अराजकता की भेंट चढ़े पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बौखला गई हैं। पंचायत चुनाव में पश्चिम बंगाल में भारी हिंसा हुई थी। सैकड़ों लोग मारे गए थे लेकिन उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव में कोई हिंसा नहीं हुई।”

उन्‍होंने कहा, “जब से उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार आई है तब से कोई दंगा नहीं हुआ। कोई मॉब लिंचिंग नहीं हुई। कोई राजनीतिक हिंसा में हत्या नहीं हो रही है। पीएम मोदी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश विकास की नई यात्रा पर निकल चुका है। इसलिए आप उत्तर प्रदेश की चिंता छोड़िए और बंगाल पर ध्यान दीजिए।”

बता दें कि ममता बनर्जी और सीबीआई के मुद्दे पर केंद्र सरकार से चल रहे विवाद के बीच योगी आदित्यनाथ मंगलवार को पश्चिम बंगाल पहुंच रहे हैं।

पुरुलिया में सीएम योगी की रैली है लेकिन ममता सरकार ने उनके हेलिकॉप्टर को उतरने की इजाजत नहीं दी है। अब एसपी ने कहा है कि रैली की अनुमति नहीं दी गई है। ऐसे में सीएम योगी ने झारखंड के रास्ते पश्चिम बंगाल जाने के लिए निकल चुके हैं।

इस बीच, मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान ने भी ममता को निशाने पर लिया है। उन्होंने कहा, “सभी राजनीतिक दल अपने विचार जनता के सामने रखते हैं। ममता बनर्जी को किस बात का डर है? बेहरामपुर में मेरी भी कल एक रैली है लेकिन मुझे पता चला है कि मेरे हेलिकॉप्टर को लैंडिंग और रैली को इजाजत नहीं दी गई है।”

योगी जी ने आज सुबह कहा था मैं पुरुलिया पहुँच कर लोकतंत्र की रक्षा के लिए परमहंस की धरती से क्रांति का शंखनाद करूँगा।

और अब झारखण्ड के रास्ते पुरुलिया पहुँच कर योगी जी जनता को सम्बोधित कर रहे हैं।