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रवीश जी, मोदी की खुन्नस बच्चों पर क्यों? लीजिए 15 कार्य गिनिए जो मोदी ने शिक्षा के लिए किए

हाल ही में पीएम मोदी ने ‘परीक्षा पे चर्चा’ के दूसरे संस्करण में परीक्षा के तनाव से जूझ रहे छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों का हौसला बढ़ाया। इस कार्यक्रम का पूरा उद्देश्य था कि जो छात्र बोर्ड की परीक्षा दे रहे हैं उनके भीतर से डर को ख़त्म किया जा सके। पीएम मोदी द्वारा इस कार्यक्रम में की गई पूरी बातचीत पर अभी देश में चर्चा हो ही रही थी कि ‘द वायर’ ने अपने एक आर्टिकल में मोदी जी के इस कदम पर सवालों की झड़ी लगा दी।

इस आर्टिकल का शीर्षक ही ऐसा है कि अगर कोई नया पाठक इसे पढ़े तो वो अपने मन में स्वयं ही सवाल खड़े करना शुरू कर देगा कि क्या वाकई पीएम मोदी ने सत्ता को संभालने के बाद देश में बिगड़ी शिक्षा व्यवस्था के लिए कुछ नहीं किया? वो पाठक इस बात पर बिलकुल भी गौर नहीं करेगा कि मोदी जी को सत्ता में आए सिर्फ साढ़े 4 साल हुए हैं और देश में शिक्षा व्यवस्था की हालात आज़ादी के बाद से ही चरमरा के साँसे भर रही है। यह बताने की मुझे जरूरत नहीं है कि देश में 2014 से पहले किस परिवार का राज रहा है।

इस आर्टिकल के शीर्षक में मोदी जी से सवाल किया गया है कि क्या उन्हें नहीं पता बच्चों के तनाव का कारण बोर्ड की परीक्षा नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था है। यह शीर्षक ही सोचिए कितना हास्यास्पद है- जिन मोदी जी को यह पता है कि आजकल कौन से ऑनलाइन गेम (PUB G) की वज़ह से बच्चों का ध्यान पढ़ाई से भटक रहा है, उन्हें शिक्षा व्यवस्था के बारे में नहीं पता होगा क्या?

वैसे यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इस लेख को लिखने वाले का नाम रवीश कुमार है। यह वही रवीश हैं जो सेकुलर देश में साँस लेने से घबराते हैं, जो अपने कार्यक्रम में बागों में बहार बताते हैं, और नए-नए तरीकों से, खोज-खोज कर केवल सरकार की आलोचना करने में व्यस्त रहते हैं। 2014 में बाद अचानक से ही वो पत्रकार कम समाजसेवी ज्यादा बनकर उभरते हैं। इस समाजसेवा में जुटकर रवीश अपने प्राइम टाइम में केवल उन विषयों पर ही बात करते हैं जिनपर कहीं बात न हो रही हो।

वो देश के कोनों-कोनों से सिर्फ़ उन तीन गाँवो की चर्चा करना अपने शो में नहीं भूलते हैं जिनमें अभी बिज़ली न पहुँची हो। या फिर, आज बजट की ही बात करें तो टैक्स छूट का दायरा बढ़ने पर उन्हें 3 करोड़ लोगों को मिली मदद नहीं दिखी, बल्कि उन्होंने अपना गणित लगाकर बता दिया, “2.5 लाख से 5 लाख होने पर कितना बचेगा? साल में लगभग 7500 टैक्स देते थे ऐसे लोग, महीना का लगभग 5-600 होता है, दिन के 10-12 रुपए। इस से किसको क्या मिलेगा पता नहीं।”

उन्हीं रवीश के आर्टिकल को पढ़कर लगता है मानो उन्होंने कभी ज़मीनी स्तर पर उतर के बोर्ड दे रहे बच्चों के प्रेशर के बारे में जानने की कोशिश नहीं की है। चूंकि मैं देश के क्रीमी माहौल में पढ़े-बढ़े बच्चों के बारे में नहीं जानती हूँ इसलिए मैं मध्य वर्गीय और ग़रीब बच्चों की मानसिकता और माहौल पर ही बात करुँगी।

अमूमन देखा जाता है कि हम लोग जिस माहौल में पढ़ते-बढ़ते हैं वहाँ पर बोर्ड परीक्षा को लेकर हमेशा से ही बच्चों को खौफ़ में रखा जाता है ताकि बच्चा बोर्ड परीक्षा के पड़ाव तक पहुँचते हुए किसी प्रकार की लापारवाही न बरते। फिर चाहे वो बच्चा क्लास का टॉपर ही क्यों न हो, बोर्ड परीक्षा के नाम से सिर-माथे पर पसीने सबके ही आता है। धड़कने उन अभिभावकों की भी बढ़ी रहती हैं जिनके बच्चे 99.99 प्रतिशत लेकर आते हैं और धड़कन उनकी भी बढ़ती है जिनके मार्जिन लाइन पर 33 प्रतिशत से पास होते हैं।

मोदी जी द्वारा की गई ‘परीक्षा पे चर्चा’ का उद्देश्य यह था कि बोर्ड परीक्षा के नाम से घबराई इन बढ़ी हुई धड़कनों को हौसला देकर शांत किया जा सके ताकि परीक्षा के लिए जाते समय उनपर किसी प्रकार का कोई दबाव न हो। इस कार्यक्रम का एक उद्देश्य उन अभिभावकों को विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ी कई संभावनाओं के बारे में बताना भी था जिनके अभाव में कई माता-पिता जबरन ही बच्चों डॉक्टर, इंजीनियर बनने के उद्देश्य से विज्ञान विषय की पढ़ाई में ढकेल देते हैं।

जानकारी के लिए बता दूँ कि भारत में हर 55 मिनट में एक विद्यार्थी आत्महत्या करता है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि भारत में तनाव को न तो मानसिक रोग (पागलपन नहीं) की तरह देखा जाता है, न ही, स्कूल-कॉलेज तो छोड़ ही दीजिए, दिल्ली जैसे शहरों में इसे लेकर कोई जागरुकता है। फिर, ऐसे में अगर प्रधानमंत्री इस विषय पर, बच्चों से बात करते हैं, उनके अभिभावकों और शिक्षकों को अपील करते हैं की तनाव को ठीक से हैंडल करें, तो इसमें बुराई क्या है? एक प्रधानमंत्री की पहुँच अगर इतनी है कि वो एक साथ लाखों विद्यार्थियों से जुड़ जाए, तो क्या रवीश जी यह चाहते हैं कि 10,000 बच्चे इस साल आत्महत्या कर लें, तब तक सरकार हर स्कूल में काउंसलर की वेकन्सी निकाले?

आपकी बातों से भी ये तो नहीं लगता कि आप इस मुद्दे को लेकर चिंतित हैं। आपको हर समस्या का हल इन्हीं 4 सालों में चाहिए क्योंकि मोदी तो हवाई यात्रा में व्यस्त रहते हैं, और शिक्षा पर ध्यान नहीं देते। सारा ध्यान तो आप दे रहे हैं क्योंकि आपको ये पता है कि मोदी को कितने मिनट किस काम में देना चाहिए, किस में नहीं। आपके हिसाब से तो आदमी शौचालय बनवाकर उसमें नहीं जाता इसके लिए भी मोदी ज़िम्मेदार है क्योंकि उसको बाल्टी में पानी लेकर वहाँ खड़ा रहना चाहिए!

‘द वायर’ के इस आर्टिकल को पढ़कर बिलकुल भी हैरान होने वाली बात नहीं हैं। सराहना की जगह पीएम के हर कदम की आलोचना करने वाले यह लोग बेबुनियादी बातों को ही आधार बनाते है। पीएम से देश की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल करने वाले लोगों ने कभी इन सवालों को 2014 से पहले खड़ा करना उचित क्यों नहीं समझा। वह लोग जो पीएम के इस कदम पर सवाल खड़े कर रहे हैं कि उनके पास इस कार्यक्रम के लिए समय कहाँ से आया? उन्होंने कभी नेहरू पर सवाल नहीं खड़ा किया कि आख़िर देश के बारे में सोचने की जगह वो बच्चों के चाचा क्यों बन गए। उस समय कौन सी देश में शिक्षा की व्यवस्था इतनी अच्छी थी जो नेहरू बच्चों से बात करते पाए जाते थे।

खैर इन बातों से मैं यह साबित नहीं कर पाऊँगी, कि ऐसे आर्टिकलों से सिर्फ पीएम द्वारा किए गए कार्यों को न केवल छुपाने की कोशिश की जा रही है बल्कि उनकी छवि को भी धूमिल किया जा रहा है।

शिक्षा के क्षेत्र को बेहतर बनाने के लिए मोदी सरकार द्वारा उठाए गए कदम

-बता दें कि साल 2014 में सत्ता में आने के बाद लालकिले से अपने पहले संबोधन में 15 अगस्त को हर स्कूल में बालक-बालिकाओं के लिए अलग अलग शौचालय बनाने का वादा किया गया था जिसके बाद इस काम को करने का प्रयास निरंतर किया जा रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में शौचायल की बात करना इसलिए भी मैं ज़रूरी समझ रही हूं क्योंकि शौचालय एक बहुत बड़ी वजह है जिसकी वजह से कई लड़कियाँ अपनी पढ़ाई को बीच में ही छोड़ देती हैं। 2015 में आई एक खबर के अनुसार झारखंड के जमशेदपुर इलाके में शौचालय की कमी की वज़ह से 200 लड़कियों ने एक साथ न सिर्फ स्कूल को छोड़ा बल्कि पढ़ाई से भी अपना तोड़ लिया था।

-डिजिटल इंडिया का सपना सिर्फ उद्योगों को मद्देनज़र रख कर ही नहीं किया गया था बल्कि इसका क्रियान्वयन शिक्षा के क्षेत्र में भी हुआ। जिसका परिणाम ‘ई-पाठशाला’ है जिसमें दोषरहित अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराई गई हैं, यहाँ पर सभी पुस्तकें और अन्य अध्ययन सामग्रियाँ उपलब्ध हैं।

-इसके अलावा सरकार द्वारा शाला सिद्धि योजना साल 2015 में शुरू की गई। इस पोर्टल पर सभी स्कूल निर्धारित मापदंडों के आधार पर अपना-अपना मूल्याकंन करते हैं, जिसके रिकॉर्ड सभी के लिए उपलब्ध होता है।

-मिड-डे का शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान हैं। लेकिन इसके आँकड़ों में काफ़ी लंबे समय से गड़बड़ियाँ आ रही थी। लेकिन अब गड़बड़ियों को ई-पोर्टल और आधार नम्बर की मदद से काफी हद तक कम किया गया है। इसमें बजट से होने वाले धन आवंटन को वास्तविकता पर आधारित करने का प्रयास किया गया है। मंत्रालय के अनुसार आधार के चलते फर्जी नामों कमी आई।

-इसके अलावा सरकार ने बदलते समय में विज्ञान और गणित की प्रमुख भूमिका को देखते हुए इसमें अपेक्षित बदलाव किया है। जिसके बाद से सभी राज्यों के बोर्ड में NCERT के पाठ्यक्रम पर आधारित शिक्षा ही दी जाने लगी।

-आपको बता दें कि सरकार द्वारा लागू की गई इन प्रभावी नीतियों के चलते पहले के मुकाबले अब अधिक से अधिक बच्चे स्कूल जाने लगे हैं। U-Dise के अनुसार 2011 की जनगणना के अनुसार इस वर्ग के 20.78 करोड़ बच्चे थे जिनमें से 19.67 करोड़ बच्चों ने 2015-16 में देश के प्राइमरी स्कूलों की तरफ रुख किया।

इसके अलावा प्राइमरी से हाइयर प्राइमरी में एडमिशन लेने वाले बच्चों का औसत  2009-10 के 83.53 प्रतिशत से बढ़कर 2015-16 में 90.14 प्रतिशत हो गया है।

इसी दिशा में केंद्रीय विद्यालयों में ए़डमिशन के लिए ऑनलाइन फॉर्म भी उपलब्ध किए जाने लगे हैं।

‘द वायर’ के लेख में जहाँ शिक्षक और छात्रों के अनुपात को लेकर शिकायत है वो भी मोदी सरकार के राज बेहतर हुआ है। 2009-10 में 32 छात्रों पर एक शिक्षक थे, वह अनुपात 2015-16 में 24 छात्रों पर एक शिक्षक तक आ गया है। इसके अलावा रिक्‍त पदों को भरने के लिए लगभग 6,000 शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

इसके अलावा मोदी सरकार ने स्कूली शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा के लिए भी काफी प्रभावी कदम उठाए हैं लेकिन विरोधियों के सवाल न खत्म होंगे और न ही वो अपने पाठकों को बरगलाने से बाज आएँगे।

RUSA (राष्ट्रीय उच्च शिक्षा अभियान),मानव संसाधन विकास मंत्रालय की एक महत्वाकांक्षी योजनाएँ है जिसके तहत राज्यों के उच्चतर शिक्षण संस्थाओं की गुणवत्ता के स्तर को बढ़ाने की कोशिश हो रही है।

NAAC: ये समिति मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत ये सर्वोच्च संस्था है जो देश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का मूल्याकंन करती है। पहले मूल्याकंन के लिए NAAC अपनी टीम भेजता था जो मौके पर मानदंडों को परखते थे। इसमें भ्रष्टाचार का बोलबाल था। इसको खत्म करके मोदी सरकार ने Self Assessment की प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया है। जो इस साल जुलाई से लागू होगी।

NIRF (नेशलन इंस्टीट्यूश्नल रैंकिंग फ्रेमवर्क): देश की उच्च शिक्षण संस्थाओं में गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए 2016 से इस रैंकिग सिस्टम को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया गया है। इस रैकिंग सिस्टम में देश के सभी कॉलेजों और विश्विघालयों की गुणवत्ता के निर्धारित मानदंडों के आधार पर रैंकिग की जाती है। ‘भारत रैंकिंग 2017’ में कुल 2,995 संस्थानों ने भाग लिया । इसके अंतर्गत 232 विश्वविद्यालय, 1024 प्रौद्योगिकी संस्थान, 546 प्रबंधन संस्थान, 318 फार्मेसी संस्थान तथा 637 सामान्य स्नातक महाविद्यालय शामिल हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में मोदी सरकार पर उंगली उठाने वालों के लिए जानना जरूरी है कि केंद्र सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता का स्तर ऊँचा करने के लिए, 7 IIT, 14 IIIT, एक नया NIT, 62 नए नवोदय विद्यालय और 103 से भी अधिक केन्द्रीय विद्यालय और खोले हैं।

ऊपर लिखी सब बातें हुईं केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए उन कदमों के बारे मे जो उन्होंने शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए किया है। अब दोबारा से वापस आते हैं उस लेख पर जिसकी वज़ह से इन बातों को लिखने की ज़रुरत पड़ी। इस लेख में कहा गया है कि जो कार्य देश के प्रधानमंत्री ने किया है उसे मानव संसाधन का कोई मंत्री भी कर सकता था। ठीक है, यह बात स्वीकार्य है कि यह कार्य मानव संसाधन मंत्री भी कर सकते थे। लेकिन, पीएम ने खुद यदि इसका ज़िम्मा उठाया तो इसमें क्या गुनाह है। मोदी इस समय देश के उस पद पर हैं जिसके लिए उन्हें जनता द्वारा चुना गया है। अगर वो खुद छात्रों को, अभिभावकों को सचेत करना चाहते हैं। तो इसमें उनके इस कदम पर इतने सवालों को क्यों उठाए जा रहा है।

रवीश जी, आप नहीं जानते है क्या कि परीक्षा के डर से हमारे समाज में कितने छात्र आत्महत्या कर रहे हैं। 2006 में आत्महत्या कर रहे छात्रों की संख्या 2016 तक आते-आते 9,500 हो गई। अगर ऐसे में देश का पीएम खुद बच्चों के तनाव को कम करने का प्रयास करें। तरह-तरह के क्षेत्रों में संभावना दिखाकर उन्हें उनका विस्तार करने का अवसर दे रहे हैं तो इसमें क्या गलत है। घर के बड़े के बोलने से ही एक बच्चा मान लेता है सही राह पर आ जाता है तो वह तो देश के प्रधानमंत्री हैं। देश का प्रधानमंत्री इस संवेदनशील मुद्दे पर बात करते हैं तो इसमें क्या बुराई है?

बजट 2019: जब संसद में गूँजा ‘हाउ इज़ द जोश?’

हाल ही में सर्जिकल स्ट्राइक पर बनी विक्‍की कौशल की फ़िल्‍म ‘उरी: द सर्जिकल स्‍ट्राइक’ बहुत चर्चा में है। कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने भी बजट भाषण के बीच में इस फ़िल्म का ज़िक्र कर बजट भाषण के माहौल में और उत्साह झोंक दिया। इसके साथ ही आज के बजट भाषण में ₹5 लाख तक की वार्षिक आय पर टैक्स में छूट देने की जैसे ही घोषणा हुई, संसद ‘मोदी-मोदी’ के नारों से गूँजने लगी।

दरअसल पीयूष गोयल मनोरंजन जगत के लिए लिए बजट में किए गए प्रावधान की जानकारी दे रहे थे। इसके साथ ही उन्होंने फ़िल्‍म की जमकर तारीफ़ की और एनडीए के सांसदों ने How’s the Josh के डायलॉग को दोहराया। पीयूष गोयल ने कहा, “मनोरंजन जगत से कई लोगों को रोज़गार मिलता है और हम सभी फ़िल्‍में देखते ही हैं।”

अपने बजट भाषण के अंत में जैसे ही पीयूष गोयल ने ₹5 लाख के दायरे को टैक्स मुक्त करने की घोषणा की, सांसदों ने उत्साह में ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगाना शुरू कर दिया।

यह बजट किसानों और माध्यम वर्ग को समर्पित है। कार्यवाहक वित्त मंत्री ने पीयूष गोयल ने कहा कि यह सरकार सैनिक, किसान, महिलाओं, स्वास्थ्य, रोज़गार जैसे विभिन्न मुद्दों के साथ ‘नए भारत’ के सपने को साकार करने के ले प्रतिबद्ध है।

बजट 2019: 1 लाख और ‘डिजिटल गाँव’ की योजना… 10 करोड़ नए लोग जुड़ेंगे इंटरनेट से

साल 2014 में सत्ता का कार्यभार संभालने के साथ ही मोदी सरकार ने देश को डिजिटल बनाने का एक सपना देखा था। परिणाम आज हम देख सकते हैं कि भारत अब दुनिया में मोबाइल डेटा का सर्वाधिक उपयोग करने वाला देश बन चुका है। सरकार का उद्देश्य है कि अब इस योजना के प्रभाव को और भी अधिक विस्तृत रूप दिया जाए ताकि छूटे हुए क्षेत्रों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग डिजिटल इंडिया से जुड़ सकें। इसी दिशा में आज (फरवरी 1, 2019) अंतरिम बजट को पेश करने के दौरान सरकार ने घोषणा की है कि आगामी पाँच वर्षों में 1 लाख गाँवों को डिजिटल किया जाएगा। उनका कहना है कि सरकार इस लक्ष्य को जन सुविधा केंद्रों का विस्तार करके हासिल करेगी।

संसद में कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने इस बात को कहा, “जन सुविधा केन्द्र गाँव में कनेक्टिविटी के साथ-साथ अपनी सेवाओं का विस्तार कर रहे हैं और डिजिटल ढाँचा भी तैयार कर रहे हैं, जिससे हमारे गाँव ‘डिजिटल गाँवों’ में बदल रहे हैं।” उन्होंने कहा कि 3 लाख से अधिक जन सुविधा केन्द्र लगभग 12 लाख लोगों को रोज़गार प्रदान करने के साथ-साथ नागरिकों को अनेक डिजिटल सेवाएं भी प्रदान कर रहे हैं।

पीयूष गोयल ने बताया कि अब पूरी दुनिया में भारत एक ऐसा देश है, जहाँ सबसे सस्ते मोबाइल टैरिफ उपलब्ध हैं। उन्होंने बजट पेश करते समय इस बात की जानकारी भी दी कि पिछले 5 वर्षों में मोबाइल डेटा के मासिक इस्तेमाल में 50 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। आपको बता दें कि इस समय भारत में डेटा और वॉयस कॉल्स की कीमतें सम्भवत: पूरे विश्व में सबसे कम है।

ऐसे में 1 लाख गाँवो को डिजीटल करने का सपना अगर आने वाले पाँच सालों में वाकई सच होता है तो सरकार के साथ देश के लिए भी यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। एक लाख गाँवों को डिजिटल इंडिया का हिस्सा बनाने का सपना न केवल पिछड़े लोगों को तकनीक से जोड़ेगा बल्कि रोज़गार की संभावनाओं को भी विस्तार देगा। हम अगर एक गाँव में औसतन 1000 ग्रामीणों (असल में लगभग 1250 ग्रामीण) को भी लेकर सोचें तो आने वाले पाँच साल में करीब 10 करोड़ लोग डिजिटल इंडिया से जुड़ेंगे और तकनीक की मदद से स्वयं ही खुद के लिए अवसरों को खोज़ पाएँगे।

सरकार द्वारा लिया गया यह फ़ैसला बेहद सराहनीय योग्य है, क्योंकि इस योजना से पहले ही देश के नागरिकों को कई फायदे पहुँच चुके हैं। मोदी सरकार के नेतृत्व में आधार कार्ड के माध्यम से देश के 121.9 करोड़ निवासियों को डिजिटल पहचान मिली है। जिसमें 30 नवम्बर 2018 तक के आंकड़ों में 99% वयस्क शामिल हैं। इस योजना के बढ़ते हुए प्रभावों के कारण देश की अर्थव्यवथा में भी बड़ा बदलाव आया है। तकनीक से भागने वाले लोग भी आज पैसों का लेन-देन ऑनलाइन से करने लगे हैं। ये सरकार द्वारा शुरू की गई इस योजना की उपलब्धि ही है कि ‘भीम ऐप’ और ‘आधार कार्ड’ को वैश्विक स्तर पर पहचान मिली है।

बीते 4 सालों में डिजिटल रास्ता अपनाकर लोगों ने इन आँकड़ों को काफी उछाला है। एक तरफ 2014-15 में जहाँ मात्र ₹316 करोड़ के ट्रान्जेक्शन हुए थे, वहीं 2017-2018 में यह आँकड़ा ₹2,071 करोड़ तक पहुँच गया। इसके अलावा ‘डिजिटल इंडिया’ की दिशा में ‘डिजी लॉकर’ नाम की ऐप भी लॉन्च की गई। इसमें आप अपने आधार नंबर से ही सभी ज़रूरी काग़ज़ात निकाल सकते हैं, चाहे वो दसवीं की मार्कशीट ही क्यों न हो। जिन काग़ज़ात के खो जाने पर हमें संस्थानों के चक्कर लगाने पड़ते थे, आज वो सब इंटरनेट के ज़रिए मात्र आधार नंबर से पाए जा सकते हैं।

बजट को पेश करते हुए पीयूष गोयल ने मेक इन इंडिया के प्रभावों के बारे में भी बात की। उन्होंने कहा कि मेक इन इंडिया के अंतर्गत भारत मोबाइल के पुर्जों को बनाने वाली कंपनी के साथ नई ऊँचाईंयों पर पहुँच रहा है। एक समय में जहाँ देश में मोबाइल पुर्जों की निर्माता संख्या सिर्फ दो थी, वो पहले से बढ़कर अब 286 हो गई है। जिसकी वज़ह से रोज़गार के अवसर प्रदान हुए हैं।

बजट में हुई MEME आयोग के लिए विशेष फंड की घोषणा

आज के बजट में हुई एक के बाद एक घोषणाओं से अगर आप नाराज़ हैं तो ये ख़बर पढ़ लीजिए मित्रों। देश में युवाओं के MEME (जिसे मीम कहते हैं) के प्रति रूचि को देखते हुए अलग से MEME आयोग बनाने की घोषणा कर डाली है। मोदी जी का कहना है कि अब देश का युवा PUBG तो खेलेगा ही साथ में सरकारी MEME आयोग में रेजिस्ट्रेशन करवा कर आधिकारिक रूप से MEME बना और देख भी सकेगा। मोदी जी ने स्पष्ट किया कि इसके लिए मित्रों को आधार की जरूरत नहीं पड़ेगी।

उभरते हुए कहानीकार वामपंथी लम्पट समुदाय में आज बजट के बाद एक निराशा की लहर देखी गई है, क्योंकि लोगों का मानना है कि आज के इस अंतरिम बजट से मोदी जी ने लहरिया लूटकर मामला एकदम इकतरफ़ा कर दिया है।

आइए देखते हैं क्या रही बजट के दौरान नेताओं और जनता की प्रतिक्रिया:

पीयूष गोयल कैबिनेट द्वारा अंतरिम बजट स्वीकार कर लिए जाने के बाद एकदम जोश में दिखे।
लेकिन अंतरिम बजट भाषण शुरू होते ही राहुल गाँधी मानो सोच रहे हों कि
फ़िक्र-ए-आशियाँ, हर ख़िज़ाँ में की, आशियाँ जला हर बहार में
राष्ट्रीय कामधेनु आयोग का एलान करते ही गौ-भक्त पीयूष गोयल साहब शरमा ही गए, जबकि योगी जी सब देख रहे हैं।
अपने बजट भाषण के दौरान पीयूष गोयल ने कहा, “हमारी सेना हमारा सम्मान है” और मोदी जी मेज थपथपाने से खुद को रोक नहीं पाए। उन्होंने कहा, “एक ही तो लहरिया है गोयल जी, कितनी बार लूटोगे?”
इस पूरे भाषण के दौरान एक शख्सियत है जो शान्ति से भाषण सुनती रही, खोज सको तो खोज लो।  
5 लाख रुपए सालाना आय वालों को टैक्स राहत देने की बात सुनते ही खड़गे साहब की नींद टूटी और शायद कहने लगे “यो गई भैंस पानी में”
इस घोषणा के बाद संसद में ‘मोदी-मोदी’ के नारों से सांसदों ने हल्ला ही काट दिया, इसी बात पर फूट-फूट कर हँस पड़े मोदी जी।
संसद के इस ”लाइट मोड” पर आदरणीय स्पीकर मैम भी मुस्कुरा पड़ीं।
गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने बजट के बाद इस बात की ही निंदा कर डाली कि ये बजट इतना शानदार है कि उन्हें कहीं भी कड़ी निंदा करने का मौका नहीं मिला।
बजट पर चिंता व्यक्त करते हुए जातिवाचक पत्रकार।

बजट 2019: वो पाँच बड़ी बातें जो आपको पता होनी चाहिए

संसद में शुक्रवार को कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने अंतरिम बजट 2019 पेश किया। सरकार द्वारा पेश किए गए इस बजट में ‘सबका साथ सबका विकास’ की मूल भावना का ख़याल रखा गया। यही वजह है कि सरकार ने किसानों, ग्रामीणों, महिलाओं और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए कई बड़ी घोषणा की। ऐसे में बजट 2019 से जुड़ी वो पाँच बातें जिसके बारे में आपको पता होनी चाहिए।

भ्रष्टाचार के विरुद्ध कदम

रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता के नए युग का सूत्रपात करते हुए सरकार ने कई कदम उठाए हैं। वित्त मंत्री ने रियल एस्टेट (नियमन और विकास) अधिनियम, 2016 (रेरा) तथा बेनामी लेनदेन (निषेध) अधिनियम का उदाहरण दिया।

उन्होंने कहा कि भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018 ने उन आर्थिक अपराधियों की परिसंपत्तियों को ज़ब्त करने और उनका निपटारा करने में सहायता प्रदान की है जो देश के न्यायाधिकार से बच निकलते हैं। उन्होंने कहा कि कोयला जैसे प्राकृतिक संसाधनों तथा स्पेक्ट्रम नीलामी की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया गया है।

स्वच्छता

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा शुभारंभ किए गए स्वच्छता मिशन की उपलब्धियों को रेखांकित करते हुए श्री गोयल ने कहा कि देश ने 98% ग्रामीण स्वच्छता कवरेज का लक्ष्य हासिल किया है। 5.45 लाख गांवों को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया गया है।

ईडब्ल्यूएस आरक्षण

आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिए शैक्षणिक संस्थानों तथा सरकारी नौकरियों में 10% आरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए सरकार 25% (लगभग 2 लाख) अतिरिक्त सीटों की व्यवस्था करेगी। अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/ अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए वर्तमान आरक्षित व्यवस्था पर जिसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

ग़रीबों के लिए अनाज

वित्त मंत्री ने कहा कि ग़रीबों तथा मध्यम वर्ग के परिवारों को सस्ते दर पर अनाज उपलब्ध कराने के लिए 2018-19 में 1,70,000 करोड़ रुपए ख़र्च हुए हैं। 2019-20 के बजट अनुमान महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के लिए 60 हजार करोड़ रुपए की धनराशि का आवंटन किया गया है।

राजकोषीय घाटे और मुद्रास्फीति में कमी

बजट के दौरान गोयल ने कहा कि 2011-12 के 5.8% तथा 2012-13 के 4.9% की उच्च दर की तुलना में राजकोषीय घाटे को 2018-19 के संशोधित अनुमानों के अनुसार 3.4% पर लाया गया है।

वर्तमान सरकार के कामकाज़ के बारे में जानकारी देते हुए गोयल ने कहा कि औसत मुद्रास्फीति की दर 2000-2014 में 10.1% थी जो कम होकर 4.6% हो गई है। दिसंबर 2018 में मुद्रास्फीति केवल 2.19% थी।

वित्त मंत्री ने कहा कि इस वर्ष चालू खाता घाटा जीडीपी के केवल 2.5% रहने की संभावना है। 6 वर्ष पहले यह केवल 5.6% था। श्री गोयल ने कहा कि मजबूत मूलभूत घटकों तथा स्थिर नियामक व्यवस्था के कारण देश में पिछले 5 वर्षों के दौरान 239 बिलियन डॉलर का विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) हुआ है। उन्होंने कहा कि संरचनात्मक कर सुधार के मामले में वस्तु एवं सेवाकर एक मील का पत्थर है।

बजट 2019: ग़रीब, अति पिछड़े, घुमंतू, अर्ध-घुमंतू जातियों के लिए भी खुले विकास के द्वार

मोदी सरकार ने सबका साथ, सबका विकास के जिस नारे के साथ देश की जनता की सेवा का प्रण लिया था, वह लगातार उनके विज़न और कार्यप्रणाली में नज़र आता रहा। पिछले 72 साल के कामों पर अगर नज़र दौड़ाई जाए तो पिछले पाँच सालों में देश के सर्वाधिक वंचित वर्गों के लिए ज़मीनी स्तर पर मोदी के कार्यों ने उन सभी को लाभ पहुँचाया जो अभी तक सत्ताधारियों के लिए सिर्फ़ वोट बैंक बने हुए थे। जिन्हें कई सरकारों ने सिर्फ़ सब्ज़बाग दिखाए।

जिन बुनियादी मुद्दों को लोग काम करने लायक भी नहीं समझते थें। उन पर मोदी सरकार ने विशेष ध्यान देते हुए सबसे पहले स्वच्छता अभियान शुरू किया जिससे न सिर्फ़ साफ़-सफ़ाई के प्रति जागरूगता बढ़ी बल्कि सफ़ाई कर्मियों का भी जीवन स्तर सुधरा, उन्हें सुविधाएँ दी गई, सफ़ाई के तौर-तरीक़ों का भी उन्नयन किया गया।

आज संसद में अंतरिम बजट 2019-20 पेश करते हुए कार्यवाहक वित्तमंत्री पीयूष गोयल ने पुनः उस संकल्प को दोहराते हुए घुमन्तू जातियों के लिए योजनाओं की घोषणा करते हुए कहा कि सरकार देश के सबसे वंचित वर्ग तक पहुँचने के लिए प्रतिबद्ध है। इसमें, गैर-अधिसूचित, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदायों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

घुमन्तू जातियाँ ऐसा वर्ग है जिनके बारे में कोई भी आधिकारिक आँकड़ा मौज़ूद नहीं था। बता दें कि घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदाय जीवन यापन के लिए एक जगह से दूसरी जगह भटकते रहते हैं। मोदी सरकार की वंचितों के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण देते हुए आज वित्तमंत्री गोयल ने याद दिलाया कि इन समुदायों तक विकास व कल्याण कार्यक्रम नहीं पहुँच पा रहे थे और ये निरंतर विकास कार्यक्रमों के लाभ से छूट रहे थे।

सबसे पहले रेनके आयोग और आईडेट आयोग ने इन समुदायों की पहचान का काम किया और इन समुदायों की सूची बनाई है।

पीयूष गोयल ने कहा कि नीति आयोग के तहत एक समिति का गठन किया जाएगा जिसका काम गैर-अधिसूचित, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू को औपचारिक रूप से वर्गीकृत करना होगा।

पीयूष गोयल ने मोदी सरकार की मंशा को स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत एक कल्याण विकास बोर्ड का भी गठन किया जाएगा। जिसका उद्देश्य गैर-अधिसूचित, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदायों के कल्याण और विकास कार्यक्रमों को कार्यान्वित करना होगा। बोर्ड ऐसे समुदायों तक पहुँच के लिए विशेष रणनीतियाँ बनाना और कार्यान्वित करना भी सुनिश्चित करेगा।

जिस तरह से मोदी सरकार ऐसे वर्गों के प्रति अपना विज़न प्रस्तुत कर रही है उससे आस बँधी है। इससे पहले जिस तरह से मोदी सरकार ने धुंएँ में काम करती माँओं को राहत देते हुए उज्जवला योजना के माध्यम से ग़रीब से ग़रीब और वंचित वर्गों तक मुफ़्त गैस सिलिंडर कनेक्शन और कम दाम पर उनका वितरण सुनिश्चित कर लाभ पहुँचाया वो भी अपने आप में एक मिसाल है।

शौचालय, इससे पहले किसी सरकार ने गंभीरता से नहीं सोचा था कि ये भी बुनियादी ज़रूरत का हिस्सा है। आज घर-घर में शौचालय की सुविधा से माताओं-बहनों को जो राहत मिली है वह तो काबिले तारीफ़ है ही, साथ ही पर्यावरण और साफ़-सफ़ाई के प्रति बढ़ती जागरूकता ने ग़रीबों-वंचितों के स्वास्थ्य में भी हुए सार्थक परिवर्तन को परिलक्षित किया है।

सरकार ने ग़रीबों के स्वास्थ्य के प्रति सजगता का प्रमाण देते हुए जन आरोग्य योजना के माध्यम से उनकी स्वास्थ्य देखभाल भी सुनिश्चित की। मात्र 4 महीने में ही इस योजना का लाभ इतना व्यापक रहा कि इसके दूरगामी संभावनाओं के लिए बिल गेट्स ने भी मोदी सरकार की तारीफ़ की थी।

हाल ही में पद्म पुरस्कारों की घोषणा में भी मोदी सरकार के दृष्टिकोण की झलक देखने को मिली, जहाँ ऐसे पुरस्कार लम्बे समय तक भाई-भतीजावाद या संपन्न वर्गों की अमानत रहें, वहीं मोदी सरकार के कार्यकाल में पद्म पुरस्कार की गरिमा भी पुनः लौट आई, कहीं गुमनाम किसान चाची को ये सम्मान प्राप्त हुआ तो कहीं चाय की आमदनी से ग़रीबों के लिए मुफ़्त स्कूल चलाने वाले डी प्रकाश राव को।

बजट 2019: जानिए आपको क्या मिला!

संसद में कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने आज बजट 2019 पेश किया। ऐसा अक्सर होता है कि सोशल मीडिया पर बजट पर दिख रहे ढ़ेर सारे ख़बरों के बीच अपने काम की ख़बर आपको नहीं मिलती है, या फ़िर बजट से जुड़ी ख़बरों की पेचीदगी की वजह से ख़बर को आप समझ नहीं पाते हैं। ऐसे में सीधे तौर पर जानिए कि इस बजट के ज़रिए आमलोगों के लिए या फ़िर आपके लिए सरकार ने क्या बड़ी घोषणा की है।

– यदि आप 15 हजार या इससे कम कमाते हैं तो हर महीने आपको 100 रूपए जमा करना होगा, 60 साल की उम्र के बाद आपको 3 हजार रूपए प्रतिमाह पेंशन दिए जाएंगे

– यदि आप खेती किसानी से लगे हुए हैं तो सरकार की तरफ़ से आपको किसान क्रेडिट कार्ड उपलब्ध कराए जाएँगे

– यदि आप किसी कंपनी में काम करते हैं तो अब मौत के बाद आपको 2.5 लाख रूपए की बजाय 6 लाख रूपए मुआवजा

– यदि आपकी सैलरी 21 हजार रूपए तक है तो आपको हर हाल में कंपनी के द्वारा बोनस मिलेगा

– यदि आप किसान हैं और फ़सल उपजाने के साथ ही साथ आप पशुपालन या मत्स्य पालन के लिए कर्ज ले रहे हैं तो आपको 2 फ़ीसदी ब्याज में छूट मिलेगी

– यदि आपके पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन का मालिकाना हक है तो आपको 6 हजार रूपए हर साल मदद दी जाएगी

– यदि अब तक आपके घर बिजली नहीं पहुँची है तो सौभाग्य योजना के तहत मुफ्त बिजली कनेक्शन आपको दी जाएगी।

– यदि आप महिला हैं और नौकरी कर रही हैं तो अब आपको 26 सप्ताह मैटरनिटी लीव दी जाएगी

-यदि आप किसी तरह के आपदा का शिकार हुए हैं तो और आपने किसी बैंक से कर्ज़ ले रखा है तो आपको ब्याज में 5 फीसदी की छूट दी जाएगी

सबरीमाला कोई पब्लिक प्लेस नहीं, हिन्दुओं का पवित्र स्थल: संघ प्रमुख के बयान के मायने

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने प्रयागराज कुंभ में आयोजित धर्म संसद में सबरीमाला मुद्दे को लेकर केरल सरकार पर निशाना साधा। संघ प्रमुख ने कहा कि सबरीमाला मंदिर कोई सार्वजनिक जगह नहीं है बल्कि एक सम्प्रदाय विशेष का स्थल है। उन्होंने केरल की वामपंथी सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि हिन्दुओं के सम्मान एवं भावनाओं को आहत करते हुए श्रीलंका से महिलाओं को लाकर सबरीमाला मंदिर में घुसाया गया। सरसंघचालक ने कहा:

“कोर्ट ने कहा महिला अगर प्रवेश चाहती है तो करने देना चाहिए। अगर किसी को रोका जाता है तो उसको सुरक्षा देकर जहाँ से अब दर्शन करते हैं वहाँ से ले जाना चाहिए। लेकिन कोई जाना नहीं चाह रहा है इसलिए श्रीलंका से लाकर इनको पिछले दरवाजे से घुसाया जा रहा है।”

हिन्दू महिलाएँ जानतीं हैं परम्पराओं का सम्मान करना

भागवत का यह बयान विचारणीय है। संघ प्रमुख ने वही बात कही है, जिस से हर एक हिन्दू और भारतीय परम्पराओं का सम्मान करने वाला व्यक्ति सहमत होगा। उन्होंने कहा कि हिन्दू महिलाएँ सबरीमाला मंदिर में नहीं जाना चाहती। उनका यह बयान निश्चित ही रेहाना फातिमा और मैरी स्वीटी जैसी महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश करने के परिपेक्ष्य में है। संघ प्रमुख की सोच यह है कि हिन्दू महिलाएँ अपने ही पूर्वजों द्वारा सदियों पहले बनाए गए परम्पराओं का सम्मान करना जानती है, और उसे तोड़ना नहीं चाहती।

अक्टूबर 2018 में 46 वर्षीय मैरी स्वीटी ने सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने का प्रयास किया था लेकिन श्रद्धालुओं के विरोध के कारन उन्हें वापस लौटना पड़ा था। ईसाई संप्रदाय से आने वाली मैरी स्वीटी के एक हिन्दू मंदिर में जबरन प्रवेश को लेकर सवाल भी खड़े किए गए थे। इसी तरह, उसी महीने रेहाना फ़ातिमा ने भी मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश की थी। मैरी ने तो यहाँ तक कहा था कि उनके अंदर कोई दैवीय शक्ति है जो उन्हें सबरीमाला की तरफ खींच रही है।

संघ प्रमुख का यह कहना कि हिन्दू महिलाएँ सबरीमाला के नियम-क़ानून का पालन करना चाहती है, इन्ही ख़बरों के परिपेक्ष्य में हो सकता है। अन्य सम्प्रदायों की महिलाओं का अचानक से एक हिन्दू मंदिर के प्रति प्रेम जग जाना उनके इस बयान के पृष्ठभूमि को दर्शाता है। इसी तरह एक 46 वर्षीय श्रीलंकन महिला ने भी सबरीमाला में प्रवेश किया था। संघ प्रमुख ने इसी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि श्रीलंका से महिलाओं को लाकर मंदिर में घुसाया जा रहा है।

जस्टिस इंदु मल्होत्रा के निर्णय से अलग नहीं है संघ प्रमुख का बयान

संघ प्रमुख का बयान इस मुद्दे को लेकर जस्टिस इंदु मल्होत्रा के असहमति वाले निर्णय से मिलता-जुलता है। आपको याद होगा कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में पाँच सदस्यीय पीठ ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश करने की इजाज़त दे दी थी। 4-1 के बहुमत वाले निर्णय में जस्टिस इंदु मल्होत्रा एकमात्र सदस्य थीं, जिन्होंने बहुमत के ख़िलाफ़ निर्णय (Dissenting Voice) दिया था। ग़ौरतलब है कि वह उस पीठ की एकमात्र महिला सदस्य भी थीं। उन्होंने कहा था:

“देश में पंथनिरपेक्ष माहौल बनाये रखने के लिये गहराई तक धार्मिक आस्थाओं से जुड़े विषयों के साथ छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए। सामाजिक कुरीतियों से इतर यह तय करना अदालत का काम नहीं है कि कौन सी धार्मिक परंपराएँ खत्म की जाएँ। भगवान अय्यप्पा के श्रद्धालुओं के पूजा करने के अधिकार के साथ समानता के अधिकार का टकराव हो रहा है। इस मामले में मुद्दा सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं है। इसका अन्य धार्मिक स्थलों पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।”

अगर मोहन भागवत के बयानों की जस्टिस इंदु मल्होत्रा के बहुमत के विपरीत दिए गए निर्णय से तुलना करें तो पता चलता है कि दोनों के बयान काफ़ी मिलते-जुलते हैं। जस्टिस मल्होत्रा का कहना था कि इसका प्रभाव अन्य धार्मिक स्थलों पर भी पड़ेगा। उनका यह डर बेवज़ह नहीं था। कुछ दिनों पहले ही प्रज्ञा प्रवाह के संयोजक जे नंदकुमार ने भी इसी प्रकार का डर जताते हुए कहा था कि अगर इस साजिश को सीमा से परे ले जाया गया तो देश के अन्य मंदिर और उनकी पूजा प्रणाली भी इस से अछूते नहीं रहेंगे।

वामपंथी ताक़तों पर प्रहार

संघ प्रमुख ने वामपंथी ताक़तों पर करारा प्रहार करते हुए JNU प्रकरण व ऐसे अन्य घटनाओं की तरफ भी इशारा किया। उन्होंने कहा:

“भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह बोलने वाले साथ मिलकर हमारे समाज में महिला-पुरुष में भेदभाव की बात लोगों के दिमाग में फैलने का काम कर रहे हैं। यह कपट है। राजनीतिक विवाद के कारण समाज को तोड़कर वोटों की कटाई करने वाले लोग ऐसा कर रहे हैं।”

ज्ञात हो कि केरल में वामपंथी पार्टी CPI (M) की ही सरकार है। केरल की लगभग सभी विपक्षी पार्टियाँ श्रद्धालुओं के साथ कड़ी नज़र आ रही हैं। कॉन्ग्रेस पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर पर भले ही अदालत के निर्णय का स्वागत किया हो लेकिन पार्टी की राज्य ईकाई शुरुआत से ही केरल सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा रही है। राहुल गाँधी का बयान इस मामले में भी बदलता ही रहा है और हाल के बयानों में उन्होंने श्रद्धालुओं का समर्थन भी किया था। भाजपा की बात करें तो, पार्टी और उसके तमाम बड़े नेता एकमत से श्रद्धालुओं की वकालत करते रहे हैं।

संघ प्रमुख के बयान से उनका सन्देश साफ़ झलकता है। उनके बयान का सीधा अर्थ यह है कि राजनीति और वोटों के खेल के लिए हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। उनका मामना है कि ऐसे सदियों पुराने परंपरा पर किसी भी प्रकार का निर्णय लेने से पहले जान-भावनाओं का ख़्याल रखा जाना चाहिए।

यह पूरे भारत की लड़ाई है

केरल के श्रद्धालुओं को मोहन भागवत ने यह सन्देश भी देने की कोशिश की है कि उनकी इस लड़ाई में पूरा देश उनके साथ है, वो अलग-थलग नहीं हैं। भगवान अयप्पा को पूरे भारत द्वारा पूजे जाने की बात कह कर उन्होंने केरल के लोगों को ढाढस बंधाया है कि उनकी लड़ाई राष्ट्रीय स्तर की है, एक ही मंदिर, राज्य या सम्प्रदाय तक सीमित नहीं है। संघ प्रमुख का कि ‘सम्पूर्ण भारत के नागरिकों को वस्तुस्थिति से अवगत कराया जाएगा’, यह दिखता है कि संघ इस मामले में कमर कस चुका है।

संघ प्रमुख की सोच यह है कि अभी भी भारत के अधिकतर हिस्सों में ऐसे लोग हैं, जो सबरीमाला को केवल एक राज्य या मंदिर की समस्या समझते हैं। उनका कहना है कि हिन्दू सगठनों ने पूरे देश को इस से अवगत कराने की बात कह इस मुद्दे को पूरी तरह राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की तैयारी का संकेत दिया है। सार यह है कि अयप्पा किसी पंथ विशेष के देवता नहीं हैं, सम्पूर्ण हिन्दू समाज के हैं। सबरीमाला मंदिर समस्या सिर्फ एक मंदिर की नहीं है, अन्य धार्मिक स्थलों पर भी इसके परिणाम होंगे। और अंत में, यह मुट्ठी भर श्रद्धालुओं की लड़ाई नहीं है, पूरे देश के हिन्दुओं की है।

बजट 2019: PM मोदी ने वीडियो में दी प्रतिक्रिया, कहा यह है #BudgetForNewIndia

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पीयूष गोयल द्वारा प्रस्तुत बजट 2019 को नए भारत का बजट कहते हुए कहा कि यह बजट हर भारतीय नागरिक के लिए है। उन्होंने ट्विटर पर वीडियो जारी करते हुए बजट पर अपनी राय रखी:

बजट 2019: टैक्स जमा करने की प्रक्रिया को सरकार ने बनाया आसान

भाजपा सरकार की तरफ़ से अंतरिम बजट को पेश करते हुए कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने टैक्स जमा करने वालों के लिए कई बड़ी घोषणाओं का ऐलान किया है। अपने भाषण के दौरान गोयल ने एक कविता पढ़ी जिसकी पंक्ति है- ‘एक पाँव रखता हूँ, हजार राहें फूट पड़ती हैं।’ गोयल की यह पंक्ति काफ़ी हद तक भाजपा सरकार के लिए सटीक लगती है। ऐसा इसलिए क्योंकि केंद्र में सरकार बनने के बाद नोटबंदी, जीएसटी जैसे बड़े फै़सले लेने के बाद मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को उम्मीद से अधिक सफ़लता मिली है। सरकार के इन सभी फ़ैसलों का जैसे-जैसे परिणाम आता गया, इन मुद्दों पर विपक्ष की बोलती बंद हो गई।

केंद्र सरकार ने टैक्स की सीमा को 2.5 लाख रूपए से बढ़ाकर पाँच लाख रूपए कर दिया है। इस तरह सरकार के इस फ़ैसले से बड़ी संख्या में देश के मध्यम वर्ग के लोगों को राहत मिलेगी।

वित्त मंत्री ने अपने भाषण में यह भी बताया कि टैक्स ज़मा करना पहले की तुलना में अब अधिक आसान बनाया जाएगा। सरकार ने बताया कि टैक्स अफ़सर की भूमिका अब ख़त्म की जाएगी। टैक्स से जुड़ी हर तरह की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए सभी समस्याओं का ऑनलाइन समाधान किया जाएगा।

बजट पेश करते हुए गोयल ने यह भी कहा कि अगले दो साल में आईटीआर वेरिफिकेशन तुरंत ऑनलाइन किया जा सकेगा। इसमें किसी टैक्स अफसर की भूमिका नहीं होगी। आगे चलकर स्क्रूटनी के लिए भी दफ्तर नहीं जाना होगा। टैक्स अफसर कौन है और टैक्स देने वाला कौन है, यह दोनों को पता नहीं चल पाएगा।

इस तरह यह प्रक्रिया ऑनलाइन होने के बाद दो प्रमुख फ़ायदे होंगे- पहला फ़ायदा तो यह होगा कि टैक्स देने वाले लोगों को किसी दफ़्तर का चक्कर नहीं लगाना होगा, जबकि टैक्स जमा करने की पूरी प्रक्रिया भी आसानी से ऑनलाइन निपटाया जा सकेगा। इसके अलावा दूसरा सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि ऑनलाइन प्रक्रिया होने की वजह से भ्रष्टाचार को रोका जा सकेगा।  

गोयल ने सदन में टैक्स से जुड़ी जानकारी को साझा करते हुए कहा कि 99.54 प्रतिशत इनकम टैक्स रिटर्न्स को बिना किसी छानबीन के मंजूर किया गया है। अब 24 घंटे में सभी इनकम टैक्स रिटर्न प्रोसेस होंगे और तुरंत रिफंड दिए जाएंगे।

यही नहीं अपने बजट भाषण में पीयूष गोयल ने यह भी कहा कि टैक्स कलेक्शन 2014 में 6.38 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 12 लख करोड़ रुपए हुआ है। इसके अलावा 6.85 करोड़ इनकम टैक्स रिटर्न फाइल हुए हैं।

जीएसटी लागू होने के बाद निश्चित रूप से लोगों को टैक्स जमा करने के दौरान कुछ मुश्किलों का सामाना करना पड़ा। नई टैक्स प्रक्रिया की वजह से मध्यम वर्ग के लोगों को चार्टर्ड अकाउंटेंट और वकीलों के पास चक्कर लगाना पड़ता था। इस तरह टैक्स जमा करने के लिए लोगों को काफ़ी समय व पैसा इंवेस्ट करना होता था।

देश में आर्थिक बदलाव की इस नई प्रक्रिया को आदतों में लाना लोगों के लिए थोड़ा मुश्किल भी था। इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि लंबे समय से लोगों को टैक्स डिपार्टमेंट के सुस्त काम-काज की आदत लग गई थी। ऐसे में टैक्स सिस्टम के खामियों का फ़ायदा उठाकर टैक्स चोरी करना पहले की तुलना में अधिक मुश्किल हो गया। लोगों के लिए हर हाल में किसी भी तरह के आय को जीएसटी पर दिखाना अनिवार्य हो गया।

ऐसे में जो नई व्यवस्था आई उसको लेकर लोगों की परेशानी उचित ही थी। लेकिन जल्द ही टैक्स जमा करने के लिए रजिस्टर्ड करने वाले लोगों की संख्या में काफ़ी वृद्धि देखने को मिली।

यही वजह था कि जीएसटी लागू होने के बाद जुलाई 2018 तक एक करोड़ लोगों ने इसके लिए पंजीकरण तो कराया, लेकिन 50 फ़ीसदी लोग अभी टैक्स नहीं दे रहे थे। इन लोगों द्वारा पैसा नहीं जमा करने के पीछे जीएसटी तकनीक एक बड़ा मुद्दा था।

सरकार ने इस तकनीक को आसान बनाने के लिए पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया। इस तरह अब टैक्स जमा करने वालों को न तो किसी कर्मचारी के चक्कर लगाने होंगे और न ही किसी की जेब गर्म करनी होगी।