भारतीय प्रशासनिक सेवा के टॉपर रहे शाह फ़ैसल के इस्तीफ़े ने सियासी माहौल में हलचल पैदा कर दी। फ़ैसल के इस्तीफ़ा दिए जाने के बाद से ही बयानबाज़ी का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। ज़ाहिर सी बात है कि एक आईएएस टॉपर का यह क़दम उठाना किसी को भी सोचने पर मजबूर कर सकता है, जिसपर सियासत होना लाज़मी है।
इस मुद्दे पर अब तक कई बयान सामने आ चुके हैं। इनमें पी चिदंबरम और उमर अब्दुल्ला जैसे बड़े नाम शामिल हैं। राजनीति से परे केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने शाह फ़ैसल के इस्तीफ़े की कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि फ़ैसल द्वारा इस्तीफ़ा देने का फ़ैसला उनके मज़बूत इरादों की कमी का संकेत है। यह इस्तीफ़ा, देश के प्रति उनके अविश्वास को व्यक्त करता है।
इसके अलावा उन्होंने कहा कि अगर विश्वास में कमी ना होती तो फ़ैसल इस तरह के फ़ैसले का रुख़ कभी ना करते बल्कि आतंकी गतिविधियों का पुरज़ोर विरोध करते। ऐसा संभव नहीं है कि देश आतंकी गतिविधियों से आपका बचाव भी करे और आप आतंकी को आतंकी कहने से परहेज़ करें।
सिंह के मुताबिक़ भारत देश एक सहिष्णु देश है, जो सभी नागरिकों को एकसमान अधिकार देता है, जिसमें अभिव्यक्ति की आज़ादी भी शामिल है। लोग भारत जैसे देश को एक सॉफ्ट टारगेट पाते हैं, शायद इसीलिए इस तरह की गतिविधियाँ फलीभूत होती हैं।
बता दें कि कश्मीर में हो रही मौतों के चलते आईएएस शाह फ़ैसल ने बुधवार (जनवरी 10, 2019) को अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। साथ ही यह बेतुका आरोप भी लगाया था कि क़रीब 20 करोड़ भारतीय मुस्लिम हिन्दुवादी ताक़तों के हाथों ग़ायब हो गए, हाशिये पर पहुँच गए और दोयम दर्ज़े के नागरिक बनकर रह गए।
फ़ैसल के इस्तीफ़ा देने के बाद से ऐसी अटकलें लगाई जा रहीं हैं कि वो उमर अब्दुल्ला की नैशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी से आगामी लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं। उमर अबदुल्ला ने ट्विटर के ज़रिये फ़ैसल के इस्तीफ़े का स्वागत भी किया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा शुरू किया गया ‘नमो ऐप’ आज एक बहुत बड़ा रूप ले चुका है। इसका विस्तार इतना हो गया है कि इस ऐप के ज़रिए 5 करोड़ से ज्यादा के उत्पाद बिक गए हैं।
नमो ऐप से बिक्री में आने वाला ये उछाल महज़ 5 महीनों के भीतर इतना बढ़ा है। इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार अभी तक इस ऐप के ज़रिए लगभग 15.75 लाख यूनिट उत्पाद बेचा जा चुका है।
इन उत्पादों में टोपी, नोटबुक, कॉफी मग, की-चेन जैसी चीज़ें शामिल हैं। इन्हीं चीज़ों की बिक्री से क्रमश: 2.64 करोड़, 56 लाख, 43 लाख, 37 लाख, 32 लाख और 38 लाख रुपए तक की कमाई हुई है। इस रिपोर्ट में अनुमान के तौर पर कहा गया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव आने की वज़ह से इस ऐप के ज़रिए बिक्री में तेज़ी आई है।
अनुराग ठाकुर ने हुडी पहनकर दिया चैलेंज
‘नमो ऐप’ से बिकने वाले उत्पादों में सबसे ज्यादा संख्या टी-शर्ट की है। बताया गया है कि इस खरीदारी में तेज़ी उस समय देखने को मिली, जब बीजेपी के सांसद अनुराग ठाकुर ने लोगों को ‘हुडी चैलेंज’ दिया। इस चैलेंज के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी और उत्तर प्रदेश के सीएम ने योगी आदित्यनाथ ने भी चुनौती को स्वीकारा और बढ़-चढ़ कर लोगों से अपील की कि वे ‘नमो ऐप’ का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करें और नमो ऐप के ज़रिए प्रोडक्ट खरीदने की भी अपील की।
आपको बता दें कि मोदी ऐप के सारे उत्पाद मुख्य रूप से तीन तरह से बाज़ारों में बेचे जा रहे हैं। पहला तरीका नमो ऐप है, दूसरा पेटीएम और अमेज़न के ज़रिए और तीसरा बीजेपी के दफ्तर से सीधा खरीदा जा सकता है। ऑनलाइन प्लैटफॉर्म पर मोदी के उत्पाद फ्लाईकार्ट के ज़रिए पहुँचाए जा रहे हैं। इस प्लैटफॉर्म के ज़रिए सामानों का उत्पादन करने का लाइसेंस भाजपा के ही पास है।
लगातार 15 सालों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दक्षित को दिल्ली कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। शीला इस पद पर अजय माकन की जगह लेंगी, जिन्होंने कुछ दिनों पहले इस्तीफ़ा दे दिया था। कहा जा रहा है कि उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफ़ा दिया था। विश्लेषकों का मानना है कि दिल्ली में कॉन्ग्रेस पार्टी चेहरे के आभाव से जूझ रही है, जिसके कारण नेतृत्व की सूई रह-सह कर शीला की तरफ़ ही घूम जाती है। शीला दीक्षित को दिल्ली प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी (DPCC) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। उनकी उम्र और सेहत की स्थिति को देखते हुए चार कार्यकारी अध्यक्ष भी नियुक्त किए गए हैं। डॉ. योगानंद शास्त्री, देवेन्द्र यादव, हारून यूसुफ़ और राजेश लिलोठिया को DPCC का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है।
शीला की ताजपोशी के साथ ही राजनीतिक गलियारों में ये बहस तेज हो गई है कि आखिर दिल्ली में कॉन्ग्रेस की रणनीति क्या रहेगी। विश्लेषकों का मानना है कि शीला दीक्षित को पूर्वांचल का होने के कारण ये पद दिया गया है। उनका ब्राह्मण होना भी उनके पक्ष में जाता है। बता दें कि दिल्ली भाजपा की कमान संभाल रहे मनोज तिवारी भी पूर्वांचल से हैं और ब्राह्मण हैं। शीला दीक्षित को अध्यक्ष बनाने का एक कारण यह भी हो सकता है कि उनके चेहरे का इस्तेमाल कर कॉन्ग्रेस दिल्ली ईकाई में चल रहे राजनीतिक कलह को शांत करना चाहती है।
दिल्ली कॉन्ग्रेस में चल रहे कलह का आलम यह है कि अध्यक्ष पद के लिए कम से कम बीस दावेदार थे, जिनमें कई पूर्व सांसद, पूर्व मंत्री और अन्य बड़े नेता शामिल थे। दिल्ली की कद्दावर नेता शीला दीक्षित के सर्वमान्य चेहरे की ताजपोशी कर पार्टी ने इन सब पर लगाम लगा दिया है। कॉन्ग्रेस पार्टी अभी राज्य में आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बाद तीसरे नंबर पर है। राज्य में पार्टी का ना तो एक भी लोकसभा सांसद है और ना ही एक भी विधायक। ऐसे में, शीला दीक्षित के कंधे पर एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है। पार्टी को उम्मीद है कि उनके नेतृत्व में राज्य ईकाई के सारे नेता मिल कर काम करेंगे।
भाजपा के पास मनोज तिवारी के रूप में एक बड़े चेहरे के काट के तौर पर महाबल मिश्रा के नाम पर भी विचार चल रहा था। साथ ही दलित चेहरे के रूप में योगेश लालोठिया भी दावेदारी ठोक रहे थे। पंजाबी चेहरे के रूप में अरविंदर सिंह लवली और जाट चेहरे के रूप में योगानंद शास्त्री की भी इस पद पर नज़र थी लेकिन शीला दीक्षित का कद इन सब पर भारी पड़ गया। अनुभवी शीला दीक्षित देश में एकमात्र महिला मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने लगातार तीन बार किसी राज्य की सत्ता संभाली है। उसके बाद दीक्षित केरल की राज्यपाल भी रहीं।
कुछ महीनों पहले ही फ्रांस में शीला दीक्षित की हार्ट सर्जरी हुई थी और वो काफ़ी दिनों से बीमार भी थीं। बीते अप्रैल में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल उनका हालचाल लेने उनके निवास पर भी पहुंचे थे। वहीं अजय माकन के इस्तीफ़े के बाद ही शीला ने अपनी महत्वाकांक्षा ज़ाहिर करते हुए कहा था कि अगर आलाकमान उन्हें जिम्मेदारी सौंपता है, तो वह उसे निभाने के लिए तैयार हैं। साथ ही उन्होंने कहा था कि अगर आलाकमान का आदेश हो तो वह अपने प्रतिद्वंद्वी अरविन्द केरीवाल के लिए भी प्रचार करने को तैयार हैं।
आईआईटी मद्रास के वैज्ञानिकों ने एक बड़ी खोज की है। प्रोफेसर थलप्पिल प्रदीप और डॉ रजनीश कुमार के मार्गदर्शन में शोधकर्ताओं के समूह ने पता लगाया है कि मीथेन गैस क्लैथरेट हाइड्रेट के रूप में बेहद कम तापमान और दबाव की परिस्थिति में भी मौजूद हो सकती है। क्लैथरेट हाइड्रेट कार्बन डाइऑक्साइड या मीथेन जैसे तत्वों के अणु होते हैं जो कि जल के अणुओं के बीच क्रिस्टल के रूप में विद्यमान होते हैं।
ये उच्च दबाव और कम तापमान वाले स्थान जैसे साइबेरिया के ग्लेशियर में या समुद्रतल से सैकड़ों मीटर नीचे पाए जाते हैं। इस प्रकार के हाइड्रेट पदार्थ विशेष रूप से मीथेन के हाइड्रेट को भविष्य के ईंधन के रूप में देखा जा रहा है। कई राष्ट्र महासागरों की तलहटी से हाइड्रेट निकालने की तकनीक विकसित करने के प्रयास कर रहे हैं।
आईआईटी मद्रास के वैज्ञानिकों ने क्लैथरेट हाइड्रेट को निर्वात में, एक ट्रिलियन गुना कम वायुमंडलीय दबाव पर, माइनस 263 डिग्री तापमान पर लेबोरेटरी में निर्मित किया है। ऐसी परिस्थितियाँ सुदूर अंतरिक्ष में पाई जाती हैं। मीथेन अपने हाइड्रेट स्वरूप में ज्वलनशील गैसों का उत्पादन कर सकता है जिनका प्रयोग ईंधन के रूप में किया जा सकता है।
बेहद कम दबाव और लगभग शून्य केल्विन तापमान जैसी परिस्थितियों में हाइड्रेट का निर्माण होना एकदम अप्रत्याशित है। ऐसे में आईआईटी के वैज्ञानिकों द्वारा यह खोज करना उल्लेखनीय है। यह खोज अमेरिका के प्रोसीडिंग्स ऑफ़ नेशनल अकादमी ऑफ़ साइंस नामक प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित हुई है।
बेहद कम दबाव और लगभग शून्य केल्विन तापमान जैसी परिस्थितियों में हाइड्रेट का निर्माण होना एकदम अप्रत्याशित है। ऐसे में आईआईटी के वैज्ञानिकों द्वारा यह खोज करना उल्लेखनीय है। यह खोज अमेरिका के प्रोसीडिंग्स ऑफ़ नेशनल अकादमी ऑफ़ साइंस नामक प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित हुई है।
यह प्रयोग करने के लिए वैज्ञानिकों ने लेबोरेटरी उपकरणों में ‘अल्ट्रा हाई वैक्यूम’ वातावरण निर्मित किया। अल्ट्रा हाई वैक्यूम वह स्थिति होती है जब चैम्बर में सौ नैनो पास्कल (दबाव की इकाई) से कम का दबाव बनाया जाता है। ऐसी परिस्थितियों में स्पेक्ट्रोस्कोपी का अध्ययन किया जाता है। स्पेक्ट्रोस्कोपी द्वारा हाइड्रेट का अध्ययन किया जाता है।
प्रोफेसर प्रदीप ने ऑपइंडिया से साझा किए अपने आधिकारिक बयान में इस खोज में बारे में विस्तार से लिखते हुए बताया कि सामान्य परिस्थितियों में स्पेक्ट्रोस्कोपिक परिवर्तन कुछ मिनटों अथवा घंटों के लिए ही देखा जाता है।
ज्वलनशील गैस हाइड्रेट पदार्थ
किन्तु इस प्रयोग में उन्होंने कई दिनों तक प्रतीक्षा की और प्रयोग को मॉनिटर करते रहे क्योंकि अंतरिक्ष में भी बर्फ और मीथेन लाखों करोड़ों वर्षों से छिपे हुए हैं। प्रयोग करने के तीन दिन बाद वैज्ञानिकों को सफलता मिली। डॉ रजनीश कुमार ने बताया कि हाइड्रेट के अणुओं के बीच कार्बन डाइऑक्साइड फँस जाती है और यदि हम ऐसी तकनीक विकसित कर पाए कि समुद्र की तलहटी में मौजूद हाइड्रेट कार्बन डाइऑक्साइड को सोख ले तो ग्लोबल वार्मिंग से निजात पाई जा सकती है।
केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने समाज के वंचितों के लिए कई सारे महत्वपूर्ण योजनाओं की शुरुआत की। इन्हीं योजनाओं में से एक आयुष्मान भारत योजना भी है। मोदी सरकार ने इस योजना को पंडित दिनदयाल उपाध्याय की जयंती पर 25 सितंबर 2018 को देश भर में लागू किया था।
इस योजना को लागू करने का मुख्य उद्देश्य देश के 10 करोड़ परिवार को 5 लाख रुपए का स्वास्थ्य बीमा देना है। इस योजना को केंद्र व राज्य दोनों ही सरकारों की मदद से चलाने की बात कही गई है। आयुष्मान भारत योजना में 40% राशि राज्य सरकार की तरफ से दिए जाने की बात कही गई है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आयुष्मान भारत योजना में यह रकम देने से इनकार कर दिया है।
ममता बनर्जी ने कहा, “पश्चिम बंगाल सरकार आयुष्मान भारत योजना में 40% की राशि नहीं देगी। यदि केंद्र सरकार इस योजना को बंगाल में लागू करना चाहती है तो स्कीम को चलाने के लिए पूरी राशि उन्हीं को देना होगा।”
ममता के इस फ़ैसले का सीधा असर बंगाल के गरीब लोगों पर पड़ेगा। यदि आयुष्मान भारत जैसी महत्वपूर्ण योजना बंगाल में नहीं लागू होती है तो वहां की आम जनता 5 लाख रुपए के स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी का लाभ नहीं उठा पाएँगे।
West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee on Ayushman Bharat Yojana: My state will not contribute 40% of the funds for the Ayushman scheme. Centre has to pay the full amount if Centre wants to run the scheme. pic.twitter.com/vCXM2vh25G
कॉन्ग्रेस ने आयुष्मान भारत योजना को बताया था जुमला
याद होना चाहिए कि आयुष्मान भारत को लेकर सरकार को काफी आलोचना का सामना भी करना पड़ा था। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने इसे एक जुमला बताया था। तमाम आलोचनाओं के बावजूद प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना यानि आयुष्मान भारत की सफलता से यह पता चलता है कि जैसे-जैसे लोगों में इस योजना को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, वैसे-वैसे लाभार्थियों की संख्या भी बढ़ रही है।
इस योजना के अंतर्गत आने वाले अस्पतालों की सूची में आधे से ज्यादा निजी अस्पतालों का होना यह बताता है कि ये योजना सिर्फ सरकारी अस्पतालों तक ही सीमित नहीं है। किसी भी जन कल्याणकारी योजना का जब तक अच्छे से प्रचार-प्रसार नहीं किया जाए और जनता तक उसकी पूरी जानकारी नहीं पहुंचाई जाए, तब तक उस योजना के सफल होने की उम्मीद नहीं रहती।
अब जब लोग आयुष्मान भारत को अपना रहे हैं तब ये कहा जा सकता है कि सरकार की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के सही असर दिखने शुरू हो गए हैं। यह एक लॉन्ग टर्म प्लान के आधार पर काम कर रहा है और अभी कई राज्यों में लागू भी नहीं हो पाया है।
देश का असंवेदनशील मीडिया तंत्र किस तरह से ख़बरों को विवादास्पद बनाकर पाठकों को गुमराह करता है, इसका एक और उदाहरण सामने आया है। कई दिनों से सोशल मीडिया पर बहस चल रही थी, जिसमें कहा जा रहा था कि सरकार आठवीं कक्षा तक हिंदी भाषा को अनिवार्य करने जा रही है।
आज सुबह (जनवरी 10, 2019) प्रसिद्ध अख़बार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपने सभी प्रिंट और e-संस्करणों में इस ख़बर को पहले पन्ने पर प्राथमिकता के साथ छाप दिया है, जिसमें उन्होंने मानव संसाधन विकास मंत्री जावड़ेकर से ‘बातचीत’ के बाद उनके बयान छापे हैं, जिसे लेकर ट्वीटर पर इसी एक हेडलाइन के साथ लोगों ने उग्र प्रतिक्रियाएँ दी हैं।
फ्रंट पेज पर ही भ्रामक हेडलाइन के साथ ख़बर छापी गई है, और दावा किया गया है कि मानव संसाधन विकास (HRD )मंत्री प्रकाश जावडेकर के साथ बातचीत में मसौदा समिति की यह बात पता चली है‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के सभी संस्करणों में इस ख़बर को छापा गया हैचंडीगढ़ एवं अहमदाबाद के 10 जनवरी 2019 के अख़बारों में इस ख़बर को छापा गया हैद इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में प्रकाश जावडेकर के स्पष्टीकरण के बाद भी भ्रामक हेडलाइन को जारी रखा है
इस ख़बर का इतना प्रचार किया गया कि मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने आज सुबह (जनवरी 10, 2019) ही ट्वीट कर स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि नवीन शिक्षा नीति को लेकर गठित कमेटी ने अपने मसौदे (ड्राफ्ट) में किसी भी भाषा को अनिवार्य करने को लेकर कोई सिफ़ारिश शामिल नहीं की हैं उन्होंने कहा कि मीडिया के एक वर्ग द्वारा फैलाई जा रही भ्रामक ख़बरों की वजह से इस स्पष्टीकरण की जरूरत पड़ी है।
The Committee on New Education Policy in its draft report has not recommended making any language compulsory. This clarification is necessitated in the wake of mischievous and misleading report in a section of the media.@narendramodi@PMOIndia
इस भ्रामक खबर को समाचार पत्र की कटिंग के साथ ट्वीट कर ‘बीजद’ पार्टी सांसद तथागत सत्पथी ने भी ट्वीट कर के अपनी आक्रामक प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा है, “मैं किसी भी गलत भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहता हूँ, लेकिन मैं अपना इरादा एकदम स्पष्ट कर दूँ। जिन लोगों ने भी इस हास्यास्पद ‘नीति’ का मसौदा तैयार किया है, मैं इस नीति को उनके “बैकसाइड” में डाल देना चाहता हूँ। ये लोग सच्चे राष्ट्रद्रोही हैं। ये भारत देश को तोड़ना चाहते हैं। सभी भाषाओं के साथ एक समान व्यवहार कीजिए।”
Don’t wish to use bad language but let my intent be extremely clear. Want to shove this policy up their backsides, scumbags whosoever drafted this ridiculous ‘policy’! These are true anti nationals. They want to destroy India. Treat all languages equally. pic.twitter.com/N2ovOSO1Aa
DMK पार्टी प्रवक्ता ए सरवनन ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के वेब पेज की कटिंग को इस ख़बर के साथ ट्वीट कर के अपनी तीखी प्रतिक्रिया में सरकार को फ़ासीवादी बताया है। उन्होंने लिखा है, “यदि यह फ़ासीवादी भाजपा शासन 2019 में जारी रहा, तो वे भारत की विविधता को बर्बाद कर देंगे। हर बार जब भी सरकार इसे लागू करने की कोशिश करती है, हम इसका विरोध कर रहे हैं।” हालाँकि, केन्द्रीय मंत्री जावड़ेकर के स्पष्टीकरण को भी बाद में ए सरवनन ने रीट्वीट किया है।
मानव संसाधन एवं विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के ट्वीट करने के बाद भी ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपनी ख़बर को ‘Update’ कर हाईलाईट कर के ट्वीट को तो जोड़ लिया, लेकिन फिर भी भ्रामक हेडलाइन को बदलने की ज़रूरत शायद नहीं समझी गई।
केन्द्रीय मंत्री के ट्वीट के बाद अपनी वेबसाईट पर द इंडियन एक्सप्रेस ने स्पष्टीकरण ‘अपडेट’ कर के जोड़ा है
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने ही अपनी ख़बर में दिया है कि इस नई शिक्षा नीति (NEP) पर मसौदा (ड्राफ्ट) रिपोर्ट में कुछ प्रमुख सिफ़ारिशें हैं, जिनका उद्देश्य स्कूलों में शिक्षा की ‘भारत-केंद्रित’ और ‘वैज्ञानिक’ प्रणाली को लागू करना है। समिति ने 31 दिसंबर, 2018 को अपना कार्यकाल समाप्त होने से पहले पिछले महीने अपनी रिपोर्ट मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सौंप दी थी। सरकार को नीति के लिए अगला कदम तय करना अभी बाकी है, जिसमें इसे आगे के सुझावों और प्रतिक्रिया के लिए सार्वजनिक डोमेन में रखना भी शामिल है।
ये पहली बार नहीं है जब किसी समाचार पत्र ने गलत हेडलाइन के ज़रिए लोगों को गुमराह कर सरकार के ख़िलाफ़ उग्र होने पर मजबूर किया है। कुछ बड़े मीडिया ग्रुप्स ऐसे भी हैं जिन्होंने अक्सर अपने राजनितिक पूर्वग्रहों के कारण सरकार के ख़िलाफ़ पहले पन्ने पर बड़े अक्षरों में भड़काऊ और गलत ख़बरें छापी हैं। लेकिन पकड़े जाने पर अखबार के आख़िरी पन्नों में, बहुत ही छोटी सी जगह पर स्पष्टीकरण देकर मामले को भुला देना बेहतर समझा है। सवाल यह है कि जनता जिन बड़े नामों पर आँख मूँदकर अपनी सूचनाओं के लिए यकीन करती है, असल में वो अपने साक्ष्यों को लेकर कितने सजग, संवेदनशील और जवाबदेह हैं?
‘Journalism of courage’ ( साहस की पत्रकारिता) जैसे ध्येयवाक्य रखने वाले मीडिया समूह का इस प्रकार से भ्रामक और गुमराह करने वाली ख़बरों को पहले पन्ने पर छापना वाकई में एक साहसिक कदम माना जाना चाहिए। भाषागत विविधता भारत जैसे विशाल सांस्कृतिक संपन्नता वाले देश का एक बेहद संवेदनशील मुद्दा रहा है, और समय-समय पर उत्तर भारत और दक्षिण भारत के लोगों में हिंदी भाषा को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। शायद इसी बात को भुनाने और घृणा की आग को हवा देने के लिए अखबार ने इस ख़बर को प्राथमिकता भी दी होगी।
मोदी सरकार के शिक्षा और नौकरियों में सामान्य वर्ग के गरीबों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने सम्बन्धी विधेयक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। ‘यूथ फॉर इक्वलिटी’ नामक NGO ने शीर्ष अदालत में विधेयक के ख़िलाफ़ याचिका दायर करते हुए कहा कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देना सुप्रीम कोर्ट के फैसले के ख़िलाफ़ है। इसके अलावे एनजीओ ने इस क़ानून को रद्द करने की भी मांग की है। गुरुवार (जनवरी 10, 2019) को दायर की गई इस याचिका में कहा गया है कि यह विधेयक संविधान के मूल फीचर के ख़िलाफ़ है और आरक्षण के लिए बनाए गए 50 प्रतिशत के दायरे को पार करता है।
‘यूथ फॉर इक्वलिटी’ और कौशल कान्त मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दाखिल की। इस याचिका में उन्होंने विधेयक के खिलाफ दलील देते हुए कहा कि अगर आर्थिक आधार पर आरक्षण मिलता भी है तो उसे केवल सामान्य वर्ग तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता है। बता दें कि इंदिरा साहनी वाले केस में अदालत ने ये फैसला सुनाया था कि केवल आर्थिक स्थिति आरक्षण का आधार नहीं बन सकती।
‘यूथ फॉर इक्वलिटी’ इस से पहले भी सुप्रीम कोर्ट में कई सारी याचिकाएँ दाखिल कर चुका है, जिनमें सरकार को लोकपाल गठित करने के लिए निर्देश देने सम्बन्धी याचिका भी शामिल है। वहीं डॉक्टर कौशल कान्त मिश्रा एक ऑर्थोपैडिक सर्जन हैं, जो पहले भी सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ चुके हैं। अपनी याचिका में उन्होंने कहा है कि इस बिल में आर्थिक स्थिति को ठीक से परिभाषित नहीं किया गया है।
ज्ञात हो कि नरेंद्र मोदी नीत केंद्र सरकार द्वारा लाए गए 124वें संविधान संशोधन बिल को लोकसभा और राज्यसभा ने बहुमत से पास कर दिया, जिसके बाद सामान्य श्रेणी के गरीबों को आरक्षण मिलने का रास्ता साफ़ हो गया है। इस संशोधन को संविधान के 15वें और 16वें अनुच्छेद के तहत किया गया है। ये पहला ऐसा विधेयक है, जिसमें आरक्षण के लिए जाति और धर्म की कोई शर्त नहीं रखी गई है बल्कि सिर्फ और सिर्फ किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को ही आरक्षण का आधार माना गया है।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के ताजा बयान से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि राज्य में कॉन्ग्रेस-जेडीएस (JDS) गठबंधन में सबकुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। अपनी पार्टी के विधायकों और विधान-पार्षदों की बैठक को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वे हर क्षेत्र में कॉन्ग्रेस के हस्तक्षेप के कारण एक मुख्यमंत्री नहीं बल्कि एक क्लर्क के तौर पर काम करने को मजबूर हैं। इस बैठक में कुमारस्वामी भावुक हो गए और गठबंधन को लेकर उनका दर्द छलक आया।
इस बैठक में कुमारस्वामी ने गठबंधन चलाने में उन्हें आ रही कठिनाइयों का भी जिक्र किया और कहा कि राज्य सरकार में गठबंधन साथी कॉन्ग्रेस के नेता उनसे हर काम अपने पक्ष में कराना चाहते हैं और मज़बूरन उनकी बात सुनने के अलावा उनके पास और कोई चारा नहीं है। उन्होंने खुद को बहुत दबाव में बताया और कहा कि कॉन्ग्रेस के नेता उन्हें अपने इशारों पर नचाना चाहते हैं।
साथ ही कुमारस्वामी ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि पार्टी उन पर कैबिनेट विस्तार करने के लिए भी दबाव बना रही है। उन्होंने कॉन्ग्रेस पर ‘बिग ब्रदर’ की तरह बर्ताव करने का भी आरोप मढ़ा। सीएम ने कहा कि कॉन्ग्रेस ने राज्य की सभी निगमों और बोर्ड्स में अध्यक्ष के रूप में अपने लोगों को बैठा दिया है।
कई लोगों का मानना है कि इस साल होने वाले आम चुनावों में JDS राज्य की एक तिहाई सीटों पर दावेदारी ठोकना चाहती है, जिसके कारण पार्टी द्वारा ऐसे बयान दे कर कॉन्ग्रेस पर दबाव बनाया जा रहा है। लेकिन खुद मुख्यमंत्री की तरफ से ऐसे बयानों का आना ये बताता है कि प्रदेश में गठबंधन सरकार के टिकने की सम्भावना बहुत ही कम है। बीते दिनों JDS अध्यक्ष एचडी देवेगौड़ा ने भी कहा था उनके बेटे कुमारस्वामी को गठबंधन सरकार चलाने के लिए काफी पीड़ा उठानी पड़ रही है और साथ ही उन्हें ये पीड़ा बर्दाश्त करने की सलाह भी दी थी।
ताज़ा बैठक में पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा ने कहा कि लोकसभा चुनावों तक वो गठबंधन के ख़िलाफ़ कोई कदम नहीं उठाएंगे। JDS सुप्रीमो ने कहा कि वो फ़िलहाल राज्य की आधा दर्जन सीटों को जीतने का लक्ष्य बना रहे हैं और गठबंधन के ख़िलाफ़ कोई भी कदम उठाने से पार्टी की सम्भावना खतरे में पड़ सकती है।
वहीं कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री ने कॉन्ग्रेस द्वारा शुरू की गई RTE योजना को भी बोगस बताया था। कुमारस्वामी ने कहा था कि RTE को सबको शिक्षा का अधिकार देने के लिए अस्तित्व में लाया गया था लेकिन अब यह निजी विद्यालयों के लिए ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने का जरिया बन रहा है और इसकी कीमत सरकारी स्कूलों को चुकानी पड़ रही है।
पीएम नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं के बारे में, उनके आलोचकों द्वारा कई बार उनका मज़ाक उड़ाया जाता है। उनके विदेश यात्राओं को देश के पैसे की बर्बादी कहकर सोशल मीडिया पर अक्सर हो-हल्ला मचाया जाता है। जबकि मोदी की विदेश यात्राएँ ज़्यादातर ‘मेक इन इंडिया’ प्रोग्राम को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाने के लिए होती हैं। उनके आलोचकों का यहाँ तक दावा है कि यात्राओं में बिना किसी ठोस लाभ के बहुत से पैसे खर्च किए जाते हैं।
29 दिसंबर 2018 को, द टेलीग्राफ ने प्रधानमंत्री को ‘एक्सीडेंटल टूरिस्ट’ कहते हुए एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी।
रिपोर्ट में, यह उल्लेख किया गया है कि प्रधानमंत्री की अब तक की विदेश यात्राओं में सरकारी ख़जाने से 2,021 करोड़ रुपए ख़र्च हुए हैं। रिपोर्ट में 2009-14 के अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी के बीच विदेशी यात्राओं के ख़र्चों की तुलना की गई है। जहाँ नरेंद्र मोदी ने 48 यात्राओं में 55 से अधिक देशों का दौरा किया, वहीं मनमोहन सिंह ने 38 यात्राओं में 33 देशों का दौरा किया, जिनकी लागत 1,346 करोड़ रुपए है।
रिपोर्ट में मोदी विरोधी पूर्वग्रह बहुत स्पष्ट है। रिपोर्ट में दो प्रधानमंत्रियों की विदेश यात्राओं के बारे में उपलब्ध आँकड़ों की तुलना करने का बेहद सतही काम किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के दौरान विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) में तेज वृद्धि हुई है, इस तथ्य की पूरी रिपोर्ट में अनदेखी की गई है।
इनकी तुलना में न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने खर्चों की तुलना बेहतर तरीके से किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर अपने विदेशी दौरों के लिए अनावश्यक आलोचना के घेरे में आते हैं। जबकि उनके पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह भी विदेशी दौरों में बहुत पीछे नहीं हैं, न सिर्फ़ यात्राओं की संख्या बल्कि उन पर होने वाले खर्चों में भी।
रिपोर्ट में ख़र्चों को ग्राफ़ के रूप में चित्रित किया गया है, जिसमें साफ़ देखा जा सकता है कि ख़र्च का बड़ा हिस्सा विमान के रखरखाव पर हुआ है। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के दौरान विमान के रखरखाव पर 1,583.18 करोड़ रुपए ख़र्च किए गए, जबकि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में विमान के रखरखाव पर 842.6 करोड़ रुपए। मनमोहन सिंह की विदेश यात्राओं के दौरान 446.59 करोड़ रुपए उड़ानों पर खर्च किए गए थे, जबकि नरेंद्र मोदी के लिए यह अब तक रु429.29 करोड़ है।
टेलीग्राफ के पक्षपाती रिपोर्ट ने, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला करने वालों को नया हथियार दे दिया है।
Shri Modiji has spend public money to the tune of RS 2100 crores on foreign trip. In no country head is incurring huge expenses . Modi government is missing public funds for their image building & other propaganda. Our PM is very frustrated person. He speaks lies. PM is corrupt
Mr. Modi has spent only INR 2021 Crore on his foreign trips as India’s prime minister, according to @ttindia. A very good headline: “Meet the accidental tourist. Modi’s foreign trip bill: Rs 2021 crore”. Where is the ‘vikas’ by the way? Or they now name it as LYNCHING?
जब उनके पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह की तुलना में उड़ान के खर्च की बात आती है, तो पूरा मामला आँकड़ों से स्पष्ट हो जाता है। विमान के रखरखाव की लागत को छोड़कर, प्रधानमंत्री मोदी वास्तव में अधिक किफ़ायती रहे हैं। मनमोहन सिंह के लिए उड़ान का ख़र्च लगभग 11.75 करोड़ रुपए प्रति यात्रा जबकि नरेंद्र मोदी के लिए ये आँकड़ा लगभग 8.94 करोड़ रुपए है। स्पष्ट दिख रहा है, प्रधानमंत्री के लिए टेलीग्राफ की रिपोर्ट वास्तविक तथ्यों के बजाय पक्षपातपूर्ण राजनीतिक हितों से प्रेरित है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि नरेंद्र मोदी ने अधिक देशों का दौरा किया है और विदेशों में अधिक दिन बिताए हैं क्योंकि प्रधानमंत्री ने दुनिया में ‘ब्रांड इंडिया’ की मार्केटिंग करने और विश्व राजनीति में भारत की स्थिति को मजबूत करने पर ज़ोर दिया है। 2014 के चुनावों में जीत के बाद से ही कूटनीति एनडीए सरकार के लिए एक प्रमुख क्षेत्र रहा है। प्रधानमंत्री मोदी का विदेशी दौरा चीन की साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों को विफल करने के लिए उठाया गया एक महत्वपूर्ण क़दम है। ऐसी यात्राओं के कई बहुपक्षीय अनुसूचित फ़ायदे हैं, जिनके लिए प्रधानमंत्री विदेशी यात्राएँ करते हैं, चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में क्यों न हो।
जैसा कि हमने पहले बताया है, एनडीए सरकार विदेशी यात्राओं पर किए अपने ख़र्च पर व्यापक नज़र रखती है। 2014-15 से अब तक हर साल कैबिनेट मंत्रियों और राज्यों के मंत्रियों के ख़र्चों में तेजी से गिरावट आई है। पीएम मोदी ने लंबी उड़ानों के लिए केवल रात के समय यात्रा करने की प्रथा शुरू की थी, जो विदेशों में बिताए दिनों की संख्या को कम कर देता है और होटलों में ठहरने की अवधि में भी कटौती करता है।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए इंटरव्यू के बाद ऐसा लगता है, जैसे नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन एक ऐसे प्रतिभाशाली व्यक्ति हैं जो झूठ बोलने में, अस्पष्टता फैलाने में और डर का माहौल बनाने में महारथी हैं।
10 जनवरी को दिए टाइम्स ऑफ़ इंडिया के छोटे से इंटरव्यू में अमर्त्य सेन ने बहुत सारे मुद्दों पर बात की, जिसमें मोदी सरकार द्वारा गरीबों के लिए पास किए जाने वाला आरक्षण बिल का मुद्दा भी शामिल था। संविधान में 124वाँ संशोधन करके ये आरक्षण लोक सभा और राज्य सभा दोनों से पास किया गया ।
टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में अमर्त्य सेन ने ढेरों झूठ बोले। हैरान करने वाली बात है कि साक्षात्कार करने वाली पत्रकार ने उनकी किसी भी बात पर सवाल नहीं किए।
साक्षात्कार में अमर्त्य सेन ने कहा कि भाजपा द्वारा लाया गया ऊँची जाति वालों के लिए ये आरक्षण ‘अव्यवस्थित सोच’ (Muddled thinking) का नतीज़ा है, इसके साथ ही उन्होंने आशंका जताते हुए इसे गंभीर राजनैतिक और आर्थिक प्रतिघात का उदहारण बताया।
इसके बाद वो अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहने लगे कि ये आरक्षण बिल बीजेपी ने ऊँची जाति वालों के वोट पाने के लिए किया है।
इस इंटरव्यू की सबसे खास बात ये रही कि नोबेल पुरस्कार विजेता ने इस महत्वपूर्ण नीति पर दो-टूक अस्पष्टता को बनाए रखा। इस बिल को लेकर जब बार-बार ये बात कही जा रही है कि इस बिल का लाभ सामान्य कैटेगरी में आने वाले गरीब लोगों के लिए है। तो उसमें ऊँची जाति को बार बार क्यों हाईलाईट किया जा रहा है, जबकि बिल में ये शब्द तक नहीं लिखा गया है। आपको फिर बता दें कि इस बिल में उन लोगों को लाभ मिलेगा जो अभी सामान्य वर्ग से हैं और आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं या जिनके परिवार की सालाना आय ₹8 लाख से कम है।
इसके बाद राष्ट्रीय पंजीकरण और नागरिकता बिल पर बात करते हुए अमर्त्य सेन ने ज़ोर देकर कहा कि यह बिल मूल रूप से मुस्लिमों के ख़िलाफ़ है। उनकी मानें तो इस तरह का भेदभाव भारत के संविधान के आत्मा के भी ख़िलाफ़ है। न जाने क्यों अमर्त्य सेन इस बात को भूल रहे हैं कि NRC और नागरिकता बिल देश में असंवैधानिक तौर से घुसे लोगों की छँटाई करने के लिए हैं।
ध्यान रहें जब हम असंवैधानिक तौर से देश में घुसे लोगों के बारे में बात करते हैं तो इसमें केवल वो शामिल होते हैं जो बिना किसी वैध दस्तावेज़ के साथ देश में रह रहे हैं और देश के नागरिक भी नहीं हैं। बिल में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि किसी एक धर्म के व्यक्ति तो टार्गेट किया जाए।
ये देखने की बात है कि किस तरह नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री पाठकों को अलग, लेकिन तथ्यात्मक तौर पर गलत, नज़रिया देकर बरगलाना चाहते हैं। वो सरकार की बेवजह आलोचना करने में इतने अस्त-व्यस्त हैं कि उन्हें इस बात से भी भान नहीं हैं कि जो देश के नागरिक नहीं हैं उन्हें ग़ैरक़ानूनी रूप से देश में रहने का कोई अधिकार नहीं है।
भारतीय संविधान में हमेशा से भारत के हर नागरिक को समानता का अधिकार है, चाहे फिर वो किसी भी जाति का हो, रंग का हो, पंथ का हो या फिर किसी भी धर्म का हो। लेकिन, किसी को ये अधिकार नहीं है कि वो सरकार पर इस बात का बात का दबाव बनाए कि वो अप्रवासियों को भी देश में अवैध ढंग से रहने की अनुमति दें। अमर्त्य सेन जैसे लोग देश की सुरक्षा पर बार-बार सरकार से सवाल करते हैं, और जब सरकार देश की सुरक्षा के लिए फ़ैसला लेती है, तो ऐसे ही लोग सरकीर की आलोचना भी करते हैं ।
इस मामले पर, और सेन साहब के कथनों पर, ग़ौर किया जाए तो मालूम पड़ेगा कि किस तरह धर्म को आधार बना कर कानून व्यवस्था की ओर मोड़ना सिर्फ इसलिए किया जा रहा है, ताकि इससे राजनैतिक बदलाव आ सकें और जिस पार्टी का वो समर्थन करना चाहते हैं वो उनकी इस तरह मदद कर पाएं।
असहिष्णुता का रोना-गाना आज भी है चालू
अमर्त्य सेन के इस साक्षात्कार के ज़रिए एक बात और पता चली कि असहिष्णुता का रोना रोने वालों का विलाप अब भी ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। उनका कहना कि अगर आप हिन्दू या फिर ईसाई हैं तो आपको टिप्पणी करने का अधिकार होता है लेकिन अगर आप कहें कि आप मुस्लिम हैं तो आपको ये अधिकार नहीं हैं। अमर्त्य के अनुसार संविधान की आत्मा पर ये बहुत हिंसात्मक हमला है। इसके बाद उन्होंने नसीरुद्दीन शाह के मत का भी जिक्र किया।
इंटरव्यू के एक हिस्से का स्क्रीनशॉट
कमाल की बात तो है कि अमर्त्य सेन भूल रहे हैं कि नसीरुद्दीन शाह को भारतीय लोगों द्वारा ही अपनाया गया था, जिनके बारे में आज वो इस तरह की बात करते हैं। आज वो जब भी बात करते हैं तो लगता है जैसे देश की छवि को धूमिल करने का प्रयास कर रहे हों। यहाँ तक नसीरुद्दीन शाह नक्सलियों की भी तरफदारी करते हैं जिनका मकसद देश के टुकड़े-टुकड़े करना है। इससे भी ज़्यादा अजीब बात तो ये है कि नसीरुद्दीन शाह ने कभी भी उन मुस्लिम गाय व्यापारियों का साथ नहीं दिया है जिनपर मुस्लिम तस्करों द्वारा हमला किया गया। अब नसीरुद्दीन शाह के सामने आए बयान तो यही बताते हैं कि उनका एजेंडा सिर्फ राजनैतिक है और उनका मुस्लिमों या सामान्य नागरिकों से कोई सरोकार नहीं हैं।
इससे पहले भी अमर्त्य सेन ने असहिष्णुता का मुद्दा कई बार उठाया है। 2014 में लोकसभा चुनावों से कुछ दिन पहले 30 अप्रैल 2014 को उनका दावा था कि अल्पसंख्यकों के पास बहुत सी वज़हें हैं, जिसके कारण वो मोदी से डरते हैं। इस तरह के बयानों का उस समय आना जब लोकसभा के चुनाव नज़दीक हों साफ दर्शाता है कि वो व्यावहारिक स्तर पर एक निश्चित व्यक्ति के ख़िलाफ़ कैम्पेनिंग कर रहे हैं। इनसे ये भी पता चलता है कि अमर्त्य सेन ईमानदार बुद्धिजीवी होने से ज्यादा राजनीति से प्रभावित हैं।
जबसे कॉन्ग्रेस की सरकार ने तीन राज्यों में किसान कर्ज़माफ़ी की घोषणा की है तबसे अर्थशास्त्री उसी बात पर अपने बुद्धिजीवी होने का (यानि आपके पास शब्द हों तो आप कुछ भी साबित कर सकते हैं) प्रमाण दिए जा रहे हैं। एक तरफ जहाँ ये बात है कि किसानों की कर्ज़माफ़ी से देश में महँगाई बढ़ती है वहीं पर उनका कहना है कि ‘हो सकता है कर्ज़माफ़ी से दिक्कतें आती है, लेकिन ये बात भी बिलकुल सच है कि इससे कई फ़ायदे भी हैं।’
एक अर्थशास्त्री होने के तौर पर अमर्त्य सेन से इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि वो इन बातों पर बात करते हुए उस चीजों पर भी ग़ौर करें, जिनपर काम करने पर कॉन्ग्रेस लगातार फ़ेल हो रही है, जिसके कारण अनेकों किसान आत्महत्या कर रहे हैं। कर्नाटक में केवल 800 ही ऐसे किसान हैं, जिन्हें लाभ मिला है। इसके अलावा अमर्त्य सेन ने कभी इस बात पर भी ध्यान नहीं किया कि कई किसानों को आज भी दुबारा से भुगतान करने के नोटिस आ रहे हैं और ऐसा ही मध्य प्रदेश में भी लगातार हो रहा है।
अमर्त्य सेन द्वारा किया गया हर कार्य और बयान इस बात को दर्शाता है कि मोदी को वोट नहीं देने के लिए वो अपने पाठकों से ठीक उसी तरह अपील कर रहें हैं जैसा उन्होंने 2014 में किया था।