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बरखा जी, पीरियड्स को पाप और अपवित्रता से आप जोड़ रही हैं, सबरीमाला के अयप्पा नहीं!

बरखा एक सुंदर-सा नाम है जिसका अर्थ है वर्षा या बारिश। बारिश की प्रक्रिया बहुत ही रोचक होती है। धरती का पानी किसी भी रूप में हो, चाहे वो गंदा नाला हो, नदी हो, समुद्र हो, पोखर हो या झील, गर्मी के कारण वाष्प बनकर, तमाम गंदगी को त्यागकर अपने शुद्ध रूप में, आसमान में पहुँचता है। वहाँ शीतलता के कारण वो बादल बनता है, फिर वही पानी बनकर हम पर वापस बरसता है। ये होती है बरखा!

ये नाम मुझे इसलिए याद आया क्योंकि भारत की मशहूर पत्रकार हैं बरखा दत्त जो अमेरिका को बराबर याद दिलाती हैं कि हमने इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाया, तुम्हारे यहाँ आजतक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बनीं। ये बात उनके उस आर्टिकल में दिखी जिसे उन्होंने ट्विटर के माध्यम से शेयर किया है और कहा है कि आइए और असहमति जताइए।

इस आर्टिकल के शीर्षक से लेकर अंत तक कई जगह कॉन्सैप्चुअल ग़लतियाँ हैं, जो नहीं होनी चाहिए थी क्योंकि बरखा तो वो है जो तमाम प्रदूषणों को तज कर शुद्ध, शीतल जल बनकर आती है। यहाँ बरखा ने जो लिखा है वो मानसिक प्रदूषण का वैयक्तिकरण है क्योंकि लिखने वाले को इतनी मेहनत तो करनी चाहिए कि वो जिस विषय पर लिख रही है, उसके बारे में अपनी अवधारणाओं और पूर्वग्रहों से बाहर निकलकर कुछ सोचने की कोशिश करे!

बरखा दत्त ने ऐसा कुछ नहीं किया, बस पहले पैराग्राफ़ से एक गलत सोच को सार्वभौमिक सत्य और सनातन धर्म का निचोड़ मानकर ऐसे समाँ बाँधा कि लेफ़्ट-लिबरल आह-वाह करते पगला गए होंगे। वाशिंगटन पोस्ट के ‘ग्लोबल ओपिनियन’ स्तम्भ में शीर्षक से ही बरखा जी ने क्रिएटिविटी और अपनी नासमझी दोनों का परिचय दिया है। ‘स्टेन्स’ शब्द पर किया गया खेल रोचक ज़रूर है, लेकिन जैसा कि वोल्टेयर ने कहा है, ‘अ विटी सेईंग प्रूव्स नथिंग’, तो उस शब्द से साबित कुछ नहीं हुआ।

बरखा दत्त के विचारों के मूल में जो बात है, वो यहाँ आकर शुरु और ख़त्म हो जाती है कि “menstruation should not bar us from praying at a temple”। मतलब, माहवारी या पीरियड्स के लिए किसी भी महिला को मंदिरों में पूजा करने से रोका नहीं जाना चाहिए। ऊपर से यह कथन बिलकुल सही लगता है, तर्कसंगत भी कि आज के दौर में ऐसी बातों की कोई जगह कैसे है?

लेकिन बात ‘अ टेम्पल’ की नहीं है, बात है ‘द टेम्पल’ की। अंग्रेज़ी का थोड़ा बहुत ज्ञान मुझे भी है, इसलिए पता चल जाता है कि बुद्धिजीवी जो ढेला फेंक रहे हैं, वो कहाँ गिरेगा। एक अक्षर से आपने जेनरलाइज़ कर दिया कि महिलाओं को पीरियड्स के कारण पूजा करने से मंदिरों में रोकना ग़लत है, लेकिन आप यह तो बताइए कि कितने मंदिरों में, और क्यों?

आगे बरखा जी ने लिखा है कि ‘मायथोलॉजी के अनुसार’ स्वामी अयप्पा, जो कि वहाँ के देवता हैं, वो ‘एक बैचलर थे’ इसलिए उन्होंने नियम बनाए कि उनके यहाँ कौन आकर आशीर्वाद ले सकता है। बरखा जी, हम लोग एक विचित्र देश में रहते हैं। विचित्र इस कारण कि आप इस देवता के मंदिर में जाने का ढिंढोरा दुनिया भर में भारतीय महिलाओं के प्रोग्रेस पर धब्बे के रूप में दिखा सकती हैं, लेकिन आपको और धब्बे नहीं दिखते।

दूसरी विचित्र बात यह है कि इस देश में मंदिरों के देवी-देवता को ‘लीगल पर्सन’ का दर्जा मिला हुआ है। जैसे कि आपको शायद ज्ञात होगा, और आपने अनभिज्ञता में उसे ज़रूरी नहीं समझा हो, कि अयोध्या केस में ‘रामलला’ भी एक पार्टी है जिसे सुप्रीम कोर्ट तक स्वीकारती है। उसी तरह, अयप्पा स्वामी भी अपने परिसर में कौन आए, न आए उसी तरह डिसाइड कर सकते हैं जैसे कि आप, अपने घर के लिए करती हैं। घर तो छोड़िए, आपके टाइमलाइन पर कोई कुछ बोल देता है तो वो ट्रोल कह दिया जाता है।

आखिर मूर्ति और मंदिर को पत्थर से ज़्यादा क्यों मानते हैं हिन्दू?

जो लोग ईश्वर को मानते हैं, वो मंदिरों को मानते हैं, वो उन बातों को भी मानते हैं जो जानकार पुजारी या शास्त्र बताते हैं। जैसे कि हनुमान की उपासना महिलाएँ कर सकती हैं, पर आप उन्हें छू नहीं सकती। इसके पीछे तर्क यह है कि बजरंगबली की प्राण-प्रतिष्ठा किसी मंदिर या पूजाघर में होने के बाद उनमें उस देवता का एक अंश आ जाता है, और हमारे लिए पत्थर की मूर्ति देवता हो जाती है। जब आप मूर्ति को देवता मानते हैं, और प्राण-प्रतिष्ठा कराकर स्थापित करते हैं, तो आप यह नहीं कह सकते कि मैं तो नहीं मानती कि हनुमान को छूने से उनका ब्रह्मचर्य नष्ट हो जाएगा।

उसी तरह सबरीमाला में जो देवता हैं, उनकी प्रकृति ब्रह्मचारियों वाली है, और आप वहाँ, वहाँ के स्थापित नियमों के साथ छेड़-छाड़ करके जा रही हैं, तो आपको मनोवांछित फल नहीं मिलेगा। यहाँ आप सामाजिक व्यवस्थाजन्य जेंडर इक्वैलिटी की बात को ग़लत तरीके से समझने की कोशिश कर रहे हैं। क्योंकि अगर यहाँ स्त्रियों का जाना वर्जित नहीं रहा तो क्या मूर्ति के पास बैठकर मांसाहार सही होगा? वहाँ क्या जूठन फेंक सकते हैं? क्योंकि मांसाहार तो संविधान प्रदत्त अधिकार है कि हमारी जो इच्छा हो, हम खा सकते हैं। यहाँ मंदिर को आप एक स्थान मात्र नहीं, देवस्थान मानते हैं इसलिए आप उसके नियमों को भी मानते हैं कि यहाँ मांसाहार वर्जित है। कल को संवैधानिक अधिकारों के नाम पर मंदिर में मांस ले जाना भी सही कहा जाएगा क्योंकि बस स्टेशन में तो मना नहीं होता!

उसके बाद बरखा जी ने “institutional weaponization of bigotry against women” का ज़िक्र किया है जिसका मतलब उतना ही ख़तरनाक है जितनी अंग्रेज़ी के ये भारी-भरकम शब्द। कुल मिलाकर मैडम यह कह रही हैं कि व्यवस्थित तरीके से महिलाओं के साथ भेदभाव करने का हथियार तैयार कराया जा रहा है! जी! कल को इसी तर्क से पुरुषों के ट्वॉयलेट महिलाओं को न घुसने देने की बात भी व्यवस्थित तरीके से महिलाओं के साथ भेदभाव की संज्ञा दी जा सकती है? जब एबसर्ड बातें ही करनी हैं, तो ये भी सही!

बरखा दत्त को न तो हिन्दू धर्म के बारे में पता है, न ही वो ऐसी कोशिश करती दिखती हैं। क्योंकि मैंने कोशिश की तो मुझे वैसे लोग मिल गए जो इस पर शोध कर चुके हैं, या इस विषय की अच्छी समझ रखते हैं। हो सकता है वो बेकार ही लोग होते, जिन्हें बरखा दत्त समझ नहीं पाती, यही कह देतीं कि कुतर्की है, लेकिन कोशिश तो कर लेती! उन्होंने नहीं की।

क्या कहते हैं इस विषय पर जानकार

मैंने नितिन श्रीधर नाम के एक लेखक से बात की जिन्होंने सबरीमाला और पीरियड्स को लेकर एक पुस्तक लिखी है जिसमें तमाम समाजों और संस्कृतियों में इसकी अवधारणा को लेकर बात की गई है। उन्होंने बरखा दत्त के आर्टिकल को पढ़ने के बाद संक्षेप में यह कहा:

“बरखा दत्त का लेख सिर्फ़ इसलिए ग़लत नहीं है कि वो हिन्दू संस्कृति की इन बुनियादी बातों से अनभिज्ञ हैं जैसे कि मंदिर ऊर्जा का एक केन्द्र होता है, न कि घूमने-फिरने की जगह; या यह कि मंदिर में उस देवता का एक विशिष्ट तत्व और विशिष्ट ऊर्जा का वास होता है, जिसे सुरक्षित रखना ज़रूरी है; बल्कि इस स्तर पर भी उनके लेखन में समस्या है कि वो पश्चिमी संस्कृति के ईसाई मत में पीरियड्स को लेकर फैली भ्रांतियों को हिन्दू धर्म पर थोप रही हैं।

हिन्दू धर्म में माहवारी या पीरियड्स को ‘अशौच’ कहते हैं जिसका ‘नैतिक पतन’ से कोई वास्ता नहीं। ये किसी भी तरह से किसी पाप की तरफ़ इशारा नहीं करता। हिन्दू धर्म में अशौच का मतलब बस इतना है कि रजस्वला स्त्री ‘रजस्’ की ऊँची अवस्था को प्राप्त है। यहाँ ‘रज’ का तात्पर्य रक्त से है, और ‘रज’ को राजसिक ऊर्जा भी कहते हैं। ‘रज’ ही ‘रजोगुण’ भी है।

यही कारण है कि जब आप ‘रजस्’ की ऊँची अवस्था में होते हैं तो आप धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने या मंदिरों में जाने की स्थिति में नहीं होते। जब पीरियड्स के लिए ‘अशौच’ का प्रयोग होता है तो उसका मतलब बस यही है। पीरियड्स को अशुद्धता से जोड़ने की बात ईसाई मत में है जहाँ इसे ईव के पतन से जोड़कर देखा जाता है। उनके लिए पीरियड्स में होना पाप की स्थिति में होने जैसा है। ये हमारा दुर्भाग्य है कि भारतीय लोग पश्चिमी संस्कृति की इन बातों का अंधानुकरण करते हैं, और फिर उन्हें हिन्दू परम्पराओं के साथ मिलाकर कुछ का कुछ बना देते हैं।”

बरखा दत्त चाहतीं तो इसके दूसरे नज़रिए को देख पातीं क्योंकि वो एक पत्रकार हैं, राजनेता नहीं कि उन्हें विचारधारा के खूँटे में बँधे रहने की बाध्यता है। केरल के ही क़रीब छः मंदिर ऐसे हैं जहाँ पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। दुर्गा को सिंदूर सिर्फ़ महिलाएँ ही लगा सकती हैं। कामख्या मंदिर के बारे में मैं क्या लिखूँ जहाँ रजस्वला होती देवी की उपासना होती है क्योंकि बरखा दत्त की बुनियाद ही हिली हुई है जहाँ वो ‘अ टेंपल’ कहते हुए भारत के हर मंदिर में रजस्वला लड़की के जाने पर प्रतिबंध की बात ‘ग्लोबल ओपिनियन’ में रख रही हैं।

आर्टिकल का अंत झूठ और अनभिज्ञता की बुनियाद पर खड़े लेख के अंत होने के नैसर्गिक तरीक़े से ही होता है जहाँ वो कहती हैं कि औरतों की उपलब्धियों का जश्न मनाने की हर बात बेकार है अगर ये माना जाता रहे कि “female blood is a social blot” (स्त्री का ख़ून समाज पर लगा कलंक है)।

अपने आप को वो एक जगह नारीवादी भी बताती हैं जो कि कोई बुरा काम नहीं है लेकिन अगर वो नारीवाद को समझ पातीं तो उन्हें इस बात का अहसास होता कि नारीवाद, नारी के पुरुष बनने की कोशिश नहीं है, बल्कि नारीवाद नारियों को समान अवसर देने की बात है। साथ ही, कोई भी ‘वाद’ सामाजिक या धार्मिक दायरे से बाहर नहीं हो सकता क्योंकि हम इसी समाज का हिस्सा हैं, जो आप चाहें, या न चाहें, धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से चलता है।

जो मान्यताएँ ग़लत हैं, उन्हें हम नकारेंगे। कोई परम्परा है जो कि स्त्री की स्वतंत्रता का हनन करती है, तो उसका विरोध होना चाहिए लेकिन स्त्री की स्वतंत्रता का ये बिलकुल मतलब नहीं है कि आप ज़िद करके एक बड़ी जनसंख्या के धार्मिक अनुष्ठान को सिर्फ़ इसलिए भंग करने पर तुली हैं क्योंकि उसके कुछ नियम आपकी समझ से बाहर हैं।

अंत में, बरखा जी, मंदिर वो जाते हैं जिनकी आस्था है भगवान में। मंदिरों को पर्यटन स्थल की तरह देखने के लिए भी लोग जाते हैं, उस पर मनाही नहीं है। लेकिन किसी दूसरे की धार्मिक मान्यताओं का हनन सिर्फ़ इसलिए करना क्योंकि आप कर सकती हैं, सर्वथा अनुचित है। मैं चाहूँगा कि आप इस धर्म को समझने की कोशिश करें, कुछ जानकार लोगों से बात करें, अपने आप को अंतिम अथॉरिटी मानने की कुलबुलाहट पर नियंत्रण रखें और दूसरों को सुनने की कोशिश करें।

चूँकि आप गोमांस खा सकती हैं, तो क्या कल आप संविधान के मौलिक अधिकारों का हवाला देकर किसी मंदिर के गर्भगृह में बैठकर गोमांस खाएँगी? क्योंकि आपके तर्क के अनुसार आप ‘ग्लोबल ओपिनियन’ वाले स्तम्भ में यह भी लिख सकती हैं कि इक्कीसवीं सदी के भारत में मंदिरों में मन का भोजन खाने पर पाबंदी हैं। आपको शायद पता न हो, पर कुतर्क इसी को कहते हैं। आप अगर चाहें तो सबरीमाला पर अपने दस मिनट इस लेख पर दे सकती हैं, क्या पता नए आर्टिकल के लिए किसी ‘बिगट’ के कुछ शब्द आपको स्ट्राइक कर जाएँ!

कोशिकाओं में ऊर्जा स्रोत की खोज करने वाले महान वैज्ञानिक डॉ सुब्बाराव का भी आज है जन्मदिन

आज स्वामी विवेकानंद का जन्मदिवस है जो सदैव विज्ञान की वकालत करते थे और धर्म को भी एक प्रकार का विज्ञान मानते थे। दैवयोग से आज एक महान वैज्ञानिक डॉ येल्लाप्रगडा सुब्बाराव का भी जन्मदिन है जिनका नाम बहुत कम लोगों ने सुना है। सुब्बाराव का जन्म 12 जनवरी 1895 को तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के भीमावरम नगर में हुआ था। स्कूली शिक्षा के दौरान ही उनके परिजनों की मृत्यु हो जाने के कारण उन्होंने मैट्रिकुलेशन तीन साल में पास किया था। उसके बाद उनकी शिक्षा मित्रों के सहयोग से पूरी हुई।

डॉ येल्लाप्रगडा सुब्बाराव ने Adenosine Triphosphate (ATP) मॉलिक्यूल की कार्यप्रणाली का पता लगाया था जिससे कोशिकाओं को ऊर्जा मिलती है। हम हाई स्कूल में विज्ञान की पुस्तकों में पढ़ते हैं कि कोशिकाओं में ऊर्जा तब उत्पन्न होती है जब उसमें कार्बोहायड्रेट ऑक्सीजन के साथ जलता है। कोशिकाओं में माईटोकोन्ड्रिया होता है जहाँ यह ऊर्जा ATP मॉलिक्यूल के रूप में उत्पन्न होती है। हमारे शरीर की मांसपेशियाँ इस ऊर्जा की मदद से कार्य करती हैं। डॉ सुब्बाराव की यह खोज उन्हें डीएनए की खोज करने वाले वाटसन और क्रिक जैसे वैज्ञानिकों के समतुल्य ला खड़ा करती है।

परन्तु दुर्भाग्य से अधिकांश भारतीयों ने पाठ्यपुस्तकों में डॉ सुब्बाराव का नाम तक नहीं पढ़ा होगा। डॉ सुब्बाराव की प्रारंभिक अकादमिक पढ़ाई मद्रास मेडकल कॉलेज में हुई थी। सुब्बाराव राष्ट्रवादी विचारधारा के व्यक्ति थे और गाँधी के विचारों से प्रभावित होकर खादी का लैबकोट पहनते थे, इसीलिए अंग्रेज प्रोफेसर उनसे नाराज थे। पढ़ाई में अच्छा होने के बावजूद सुब्बाराव को MBBS के स्थान पर LMS की कमतर डिग्री दी गई थी जिसके कारण उन्हें मद्रास मेडिकल सर्विस में दाख़िला नहीं मिला था।

लक्ष्मीपति आयुर्वेदिक कॉलेज में एनाटोमी पढ़ाते हुए उनकी रुचि आयुर्वेद में बढ़ी और उन्होंने इस विषय पर काफ़ी रिसर्च भी किया। उनकी आगे की पढ़ाई का खर्च उनके होने वाले श्वसुर कस्तूरी सत्यनारायण मूर्ति ने वहन किया। बाद में जब वे हार्वर्ड पढ़ने गए तब भी उनके श्वसुर ने उनकी सहायता की। डॉ सुब्बाराव ने 1930 में पीएचडी की डिग्री अर्जित की थी।

उन दिनों अमेरिका में बाहर से आने वालों को सरलता से वीसा नहीं मिलता था। डॉ सुब्बाराव ‘फिज़िशियन’ बनकर अमेरिका गए और उन्होंने वहाँ उन्होंने सायरस फिस्के के साथ मिलकर ATP की खोज की। हमारे शरीर को जब ऊर्जा की आवश्यकता होती है तब वह ATP को Adenosine Diphosphate (ADP) में कन्वर्ट करता है। डॉ सुब्बाराव के शोध ने शरीर में मौजूद फॉस्फोरस के महत्व को समझाया था। उन्होंने विभिन्न प्रकार के एंटीबायोटिक पर भी काम किया था जिसके फलस्वरूप ऑरियोमाइसीन नामक शक्तिशाली एंटीबायोटिक बना।

डॉ सुब्बाराव ने कैंसर के इलाज के लिए मेथोरेक्सेट नामक केमिकल को भी सिन्थेसाइज़ किया था जिससे कीमोथेरेपी के लिए सबसे पहला एजेंट निर्मित हुआ। भारत के स्वतंत्र होने के एक वर्ष पश्चात ही 1948 में डॉ सुब्बाराव का देहांत हो गया था। उनके बारे में पत्रकार डोरोन एट्रिम ने लिखा था “आपने शायद डॉ सुब्बाराव का नाम नहीं सुना होगा जबकि वे इसलिए जिए ताकि आप जीवित रह सकें।”

शारदा घोटाले में नलिनी चिदंबरम पर CBI ने की चार्जशीट दायर

सीबीआई ने शारदा चिट फंड घोटाले के मामले में पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम की पत्नी नलिनी चिदंबरम पर चार्जशीट दायर की है। सीबीआई ने कहा है कि शारदा स्कैम में नलिनी चिदंबरम ने 2010 से 2012 के बीच 1.4 करोड़ रुपए लिए। उनके खिलाफ कोलकाता की अदालत में चार्जशीट दायर की गई है। नलिनी के खिलाफ शारदा कंपनियों के समूह के प्रॉपराइटर सुदीप्तो सेन के साथ मिल कर आपराधिक साजिश रचने, ठगी और रुपयों के गबन के आरोप भी लगाए गए हैं।

बता दें कि पश्चिम बंगाल में हुए करीब 2500 करोड़ के शारदा चिट फण्ड घोटाले का खुलासा 2013 में हुआ था। इस मामले को लेकर शारदा ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर एवं चेयरमैन सुदीप्तो सेन को गिरफ्तार भी किया गया था जिन पर फ्रॉड कर के रुपयों के गलत इस्तेमाल करने का मामला चलाया गया। उन्हें फरवरी 2014 में पश्चिम बंगाल की विधान नगर अदालत ने तीन साल की सज़ा सुनाई थी।

इसी घोटाले के मामले में ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के नेताओं के नाम भी सामने आए थे। सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री रहे मदन मित्रा से इस मामले में पूछताछ भी की थी। वो फिलहाल जमानत पर बाहर हैं।

अगर चिदंबरम परिवार की बात करें तो पी चिदंबरम पर एयरसेल-मैक्सिस मनी लॉन्डरिंग के मामले में ED ने उनके खिलाफ मामला दर्ज कराया था। फिलहाल जमानत पर बाहर चिदंबरम को अदालत द्वारा कई बार राहत प्रदान किया जा चुका है। ED भी उनसे अब तक चार बार पूछताछ कर चुकी है। वहीं पी चिदंबरम व नलिनी चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम पर भी आईएनएक्स मीडिया के लिए फॉरेन इन्वेस्टमेंट में अनियमितता बरतने का मामला चल रहा है। ED ने उन्हें पिछले वर्ष फरवरी में गिरफ़्तार भी किया था, जिसके बाद वो भी लगातार जमानत पर बाहर हैं।

आज (जनवरी 11, 2019) भी सीबीआई की विशेष अदालत ने पी चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति चिदंबरम की गिरफ़्तारी पर 1 फरवरी तक रोक लगा दी है। इस मामले में कॉन्ग्रेस के दो नेता- कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी वकील के तौर पर चिदंबरम पिता-पुत्र की तरफ से अदालत में पैरवी कर रहे हैं।

अब शारदा चिट फंड घोटाले में नलिनी चिदंबरम का नाम आने के बाद पूरे चिदंबरम परिवार की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

‘आ जाओ मोदी जी, वसुंधरा जी… सबको पेटी में पैक करके भेजूंगा; पत्थर का जवाब AK-47 से दूँगा’

राजस्थान के अलवर से बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के नेता जगत सिंह अपने एक बयान के चलते विवादों में आ गए हैं। समाचार एजेंसी एएनआई के हवाले से जारी किए गए वीडियो में बीएसपी नेता जगत सिंह ने सीधे प्रधानमंत्री मोदी, अशोक गहलोत और राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर निशाना साधा है। इस वीडियो में उन्होंने कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा “मैं पीछे नहीं हटूँगा भाईयों। गोली चलेगी तो पहली गोली मेरे सीने में लगेगी। पत्थर का जवाब AK-47 के साथ करता हूँ मैं। “

सिंह इतने पर भी नहीं रुके बल्कि उन्होंने बीजेपी को चेतावनी भरे अंदाज़ में कहा कि आ जाओ अशोक जी, आ जाओ मोदी जी, आ जाओ वसुंधरा जी, सबको पेटी में पैक करके भेजूंगा। ANI ने यह वीडियो बुधवार (जनवरी 9, 2019) को अपने ट्विटर हैंडल से शेयर किया था।

दरअसल, रामगढ़ विधानसभा से चुनाव लड़ रहे बीएसपी उम्मीदवार लक्ष्मण सिंह के निधन के चलते चुनाव रद्द करना पड़ा था। अब इस सीट पर आगामी 28 जनवरी को मतदान होगा, जिसके लिए बीएसपी ने जगत सिंह को प्रत्याशी घोषित किया है। ऐसा अंदेशा लगाया जा रहा है कि यह विवादित वीडियो नामांकन वाले दिन का है, जिसमें वो एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे।

आपको यह भी बताते चलें कि जगत सिंह जिनके तीखे बोल आज बीजेपी के ख़िलाफ़ हैं, वो कभी बीजेपी से विधायक थे। बीजेपी से उनका रिश्ता नया ना होकर 10 साल पुराना है, जो अब दुश्मनी में बदल गया है। बता दें कि दुश्मनी में बदले इस रिश्ते की बुनियाद उन्हें बीजेपी द्वारा टिकट ना दिया जाना था। जिसके चलते उनके बोल इस क़दर बिगड़ गए हैं।

बीजेपी पर अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर करने के लिए जगत सिंह ने जनसभा को संबोधित करने का रुख़ किया और वो सब बोल गए, जो उन्हें शोभा नहीं देता। अपने भड़काऊ भाषण में बीजेपी को टारगेट करके उन्होंने अपनी जिस भाषा का परिचय दिया, उससे साफ़ पता चलता है कि वो बीजेपी की छवि ख़राब करना चाहते हैं।

अपने पति के हत्यारों से भला सोनिया को इतनी सहानुभूति क्यों है?

भारतीय राजनीतिक इतिहास में 9 दिसंबर का दिन बेहद महत्वपूर्ण है। इसी दिन 200 साल के ब्रिटिश हुकूमत से आजादी के बाद देश के भावी-भविष्य के लिए संविधान सभा की पहली बैठक दिल्ली के कंस्टीट्यूशनल हॉल में हुई थी। और अब इसी दिन 9 दिसंबर 2018 को अपने जन्मदिन के मौके पर सोनिया ने डीएमके नेताओं से मिलकर कॉन्ग्रेस-डीएमके गठबंधन को लोकसभा चुनाव के लिए एक तरह से हरी झंडी दिखाई। ऐसा करके सोनिया ने एक ऐसे राजनीतिक दल के साथ गठबंधन किया है, जिस दल के नेता पर राजीव गाँधी हत्याकांड में शामिल होने का आरोप है।     

सोनिया गाँधी के 72वें जन्मदिन 9 दिसंबर 2018 के मौके पर राहुल गाँधी ने ट्वीट करके कुछ तस्वीर साझा की थी, इस तस्वीर में सोनिया गाँधी डीएमके के नेताओं से मिलते हुए दिख रही हैं। डीएमके नेता टीआर बालू, स्टालिन और ए राजा ने दिल्ली में सोनिया से मुलाकात करके शॉल ओढ़ाकर उन्हें जन्मदिन की बधाई दी। इसके साथ ही यह ज़ाहिर हो गया कि आने वाले चुनाव में कॉन्ग्रेस-डीएमके के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी। लेकिन राजनितिक बहस यहाँ आकर खत्म नहीं होती है, बल्कि यहाँ से शुरू होती है।

यह सोचने वाली बात है कि एक राजनीतिक पार्टी, जिसके नेताओं पर राजीव गाँधी हत्या का आरोप है, उस पार्टी के नेताओं से अपने जन्मदिन की सुबह सबसे पहले मिलकर सोनिया क्या संकेत देना चाहती है? क्या ऐसा करके सोनिया ने उस दल से दोस्ती कर ली है, जिसके उपर राजीव गाँधी के क़त्ल का इल्जाम है? इस सवाल का जवाब है, ‘हाँ, सोनिया ने अपने पति के हत्यारोपी से दोस्ती आज नहीं बल्कि एक दशक पहले ही कर ली थी।’ इस गठबंधन के बाद कई लोगों को हैरीनी हुई थी। लोगों की यह हैरानी जायज़ भी थी, क्योंकि राजीव सिर्फ़ सोनिया के पति नहीं बल्कि देश के प्रधानमंत्री भी थे।

जब राजीव की हत्या में डीएमके नेताओं का नाम आया

राजीव गाँधी की हत्या के बाद जाँच के लिए एक जैन कमीशन का गठन किया गया था। इस कमीशन को राजीव गाँधी हत्याकांड को सुलझाने की जिम्मेदारी दी गई थी। इस कमीशन ने अपने अंतरिम रिपोर्ट में इस बात को ज़ाहिर किया कि श्रीपेरेंबदूर में राजीव की हत्या करने वाले आतंकवादी, राज्य के डीएमके नेताओं के संपर्क में थे। जब यह घटना हुई तब राज्य में डीएमके की सरकार थी। ऐसे में रिपोर्ट में इस बात की चर्चा है कि कई डीएमके नेताओं को भी इस साज़िश की जानकारी थी।

हालाँकि, बाद में जब जैन कमीशन की रिपोर्ट आई तब केंद्र में आईके गुजराल साहब की सरकार थी। गुजराल सरकार में डीएमके गठबंधन दल के रूप में शामिल थी। ऐसे में इस बात की संभावना ज़ाहिर की गई कि सरकार ने जानबूझकर अंतरिम रिपोर्ट से उस हिस्से को अलग कर दिया जिसमें डीएमके उपर कार्रवाई करने की बात कही गई थी। तब कॉन्ग्रेस ने भी गठबंधन सरकार से डीएमके को बाहर करने की बात कही थी। जब कॉन्ग्रेस पार्टी की बात को गुजराल ने नज़रअंदाज़ कर दिया तो पार्टी ने सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था।

लेकिन आश्चर्च की बात यह है कि इसी डीएमके से सोनिया ने 2004 लोकसभा चुनाव में गठबंधन कर लिया। इस गठबंधन के पिछे सोनिया ने यह तर्क दिया था कि एक सांप्रदायिक पार्टी को हराने के लिए मैंने ऐसा किया है। लेकिन ऐसा करके अपने पति की मौत को अंजाम देने वाले डीएमके को भले ही सोनिया ने माफ़ कर दिया हो, परंतु उसी डीएमके ने 2G घोटाले की बात सामने आने के बाद अपने नेताओं को भ्रष्टाचार में फँसता देख समर्थन वापस ले लिया।

एक भ्रष्टाचारी को बचाने के लिए अपने पति की मौत को भूल जाने वाली सोनिया की डीएमके ने जरा भी परवाह नहीं की। इन सबके बावजूद एक बार फ़िर से मोदी सरकार को गिराने के लिए दोनों दलों ने पहले के किए-धरे पर मिट्टी डालकर गठबंधन कर लिया है।

जब करुणानिधि ने खुद प्रभाकरण को दोस्त बताया

भारतीय जाँच एजेंसी इस बात को ज़ाहिर कर चुकी है कि राजीव के मौत में लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण का हाथ था। प्रभाकरण ने इस घटना को अंजाम देने के लिए पूरी रणनीति तैयार की थी। देश के एक भावी युवा नेता को मारने के लिए कोई और नहीं बल्कि प्रभाकरण जिम्मेदार है, यह जानते हुए भी 2009 को अपने एक इंटरव्यू में करुणानिधि ने बताया कि प्रभाकरण उनके काफ़ी अच्छे दोस्त थे। ऐसा कहकर डीएमके नेता ने एक तरह से राजीव के हत्यारे से अपनी दोस्ती होने की बात को स्वीकार कर लिया। यह सोचने वाली बात है कि इतना सब कुछ होने के बावजूद  सोनिया के नेतृत्व वाले कॉन्ग्रेस ने करुणानिधि से हाथ मिलाना स्वीकर किया।

अपने पति के हत्यारे से दोस्ती कैसी?

यह कितना आश्चर्य की बात है कि राजनीतिक नफ़ा-नुकसान को देखते हुए एक महिला नेता उस पार्टी के साथ मंच साझा करने लगती है, जिसने कभी उसके पति की मौत का ताना-बाना बुना था। यही नहीं इससे भी अधिक आश्चर्य की बात यह है कि सोनिया ने अपनी बेटी को पिता के हत्यारे से मिलने के लिए जेल भेजा। प्रियंका ने यह कहकर लोगों को चौंका दिया कि वह अपने पिता के हत्यारों को माफ़ करना चाहती है। ऐसा करते हुए प्रियंका ने ज़रा भी नहीं सोचा कि वो भारतीय कानून व्यवस्था से आगे निकल रही हैं।  किसी हत्यारे की सज़ा क्या होगी इस फ़ैसले का अधिकार प्रियंका नहीं बल्कि देश के न्यायपालिका का होता है।

2019 में भाजपा को वोट न देने के पक्ष में 5 भयंकर (और ठोस) तर्क – (नंबर फ़ोर विल ब्लो योर माइंड)

तर्क १ – राहुल गाँधी शायद चुप हो जाएँ और ध्वनि प्रदूषण कम करें

एक समय था जब राहुल गाँधी जी अधिकतर समय ननिहाल वगैरह घूम लिया करते थे और साल में चार बार नज़र आते थे जब मनमोहन जी को उनकी औकात दिखाने की ज़रूरत दिखाई देती थी। पर अब उनको दिन में चार बार नज़र आना पड़ता है रफ़ाल-रफ़ाल जपने, ऊपर से जिस मज़दूर के मुँह पर पहले ऑर्डिनेंस फाड़ के फेंका करते थे, अब उसके बर्थडे पे जबरदस्ती मुँह में केक ठूसना पड़ता है। तीन-चार साल तो राहुल जी ने आलू की फैक्ट्री, मक्डोनल्ड का ढाबा, कोका कोला शिकंजी जैसी भसड़ मचा कर थोड़ा मनोरंजन भी किया, पर अब वो भी नहीं कर रहे।

राहुल जी अगर प्रधानमंत्री बन जाये तो उसका फ़ायदा ये भी है की आपको आपके खुदके शहर गाँव मोहल्ले में बना मोबाइल भी मिल जायेगा। हालाँकि, सुतिया गाँव के लोग शायद ‘MADE IN SUTIYA’ फ़ोन न चाहें। पर रिस्क यह भी है कि अगर राहुल जी ने हर गली में मोबाइल फ़ैक्ट्री नहीं दिए तो हम सबको खुद अपने फ़ोन पे “MADE IN SUTIYA” लेबल लगाना पड़ सकता है।

तर्क २ – अपनी विफलताओं के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराने का मौका फिर से मिल पाए

जब से मोदी जी आए हैं सरकार लूट खसोट छोड़ के काम में लग गई है। जब ससुरी सरकार अपना काम करने लगेगी तो आम आदमी के पास भी काम करने के आलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं बचता। अब आपकी बात तो मैं नहीं कर सकता पर मैं पुराने वक़्त ज़रूर याद करने लगा हूँ, जब सरकार इतनी निक्कम्मी थी कि किसी भी विषय के लिए उसको गालियाँ दी जा सकती थी। ऐसा करने पर कोई आपको शक की निगाहों से भी नहीं देखता था बल्कि सुनने वाले अपनी तरफ से चार गाली और जोड़ देते थे। सरकार ऐसी होनी चाहिए कि आम आदमी जब रात को थका-हारा घर आए तो कोई हो जिससे गाली दिया जा सके बे-रोकटोक। ये काम कांग्रेस 70 साल से कर रही है और भाजपा इसमें कॉन्ग्रेस को पछाड़ नहीं सकती।

तर्क ३ – लिबरल वामपंथी अख़बार में वही चार घिसी-पिटी ख़बरें बंद हों और नया मसाला आये

हिन्दू-मुस्लिम, दलित, रफ़ाल से मुक्ति मिले। पहले तो कुछ तैमूर बाबा की न्यूज़ फिर भी आ जाती थी मन बहलाने को, पर जैसे इलेक्शन पास आ रहें हैं तैमूर तक को बेरहम पत्रकारों ने अपने पन्नो से निकाल फेका है। मोदी जी जाएँ तो फिर कुछ वरायटी आए। सोनिया जी क्या खाती हैं, क्या पकाती हैं, किस मंत्री पर आक्रोशित हैं, आदि महत्वपूर्ण ख़बरों के बिना जीवन सूना-सूना हो चला है।

तर्क ४ – कुछ बड़े आतंकवादी हमले हों और पाकिस्तान को पकिस्तानियत दिखने का मौक़ा मिले

अगर जैसे चल रहा है वैसे चलता रहा तो जल्द पाकिस्तान खुद भूल जायेगा की उसके अस्तित्व का मक़सद क्या है। साँप का डसना, कुत्ते का भौंकना, केजरीवाल का पगलाना और पाकिस्तान का आतंकवाद करना प्रकृति का नियम है और इसमें अड़ंगा डालना पाप है। राहुल जी इस बात को समझते हैं। राहुल जी सत्ता में आएँगे तो उनका दिया हुआ मैसेज कि ‘हर हमले को हम रोक नहीं सकते’ पाकिस्तान को हौसला देगा की इस तरफ कोई है जो उसकी वेदना समझता है।

तर्क ५ – हम किसी लिस्ट में तो विश्व में अव्वल दर्जा पा सकें

मोदी जी चाहे जो कर ले, भारत कितनी भी तेज गति से अपनी अर्थ-व्यवस्था को आगे बढ़ा ले, कभी इथियोपिया जैसे छोटे देशों की गति से ज़्यादा तेज़ नहीं बढ़ेगा। हो सकता है इस साल भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थ-व्यवस्था बन जाये पर फिर भी तीसरा ही रहेगा।

पर भारत दो लिस्टों में अव्वल आ सकता है, अगर मोदी जी जाएँ और कॉन्ग्रेस आ जाए।

अगर कॉन्ग्रेस वापस आ जाए तो वो इस्लामी देशों से आबादी भर-भर के भारत ला सकती है। इस से हम जल्द ही चीन को आबादी के मामले में पीछे छोड़ देंगे। अगर मोदी जी रहे तो रोहिंग्या, बांग्लादेशी तो वापस भेजे ही जाएँगे बल्कि हो सकता है, आबादी को काबू करने के लिए क़ानून भी ले आएँ। ऐसा हुआ तो भारत किसी चीज़ में अव्वल नहीं आ पाएगा। भारत को कम से कम एक जगह तो अव्वल लाने के लिए मोदी जी का जाना ज़रूरी है।

दूसरा लिस्ट जहाँ हम तुरंत एक नंबर पे हो सकते हैं, वो है घोटाला। कॉन्ग्रेस और सेक्युलर बंधुओं की घोटाला करने की क्षमता पे तो बस UNESCO की मोहर लगना बाकी है वरना भारतवासी तो नाज़ करते आएँ है इनकी इस कला पर 70 साल से।

लगे हाथों, एक और बोनस लिस्ट दिए देता हूँ जहाँ हमारी शान बढ़ जाये अगर मोदी जी जाएँ और राहुल जी आएँ।

ऐसा हुआ तो भारत दुनिया का पहला और एक मात्र देश होगा जिसके प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री बनने के पहले कभी कुछ करने में समय व्यर्थ नहीं किया, सीधा प्रधानमंत्री बने। अंग्रेज़ी में इसे ‘क्लैरिटी ऑफ़ पर्पस’ कहते हैं। मतलब पैदा होने के पहले से तय था कि देश हमारे बाप का ही है तो क्यों अपना और दूसरों का समय व्यर्थ करें कुछ काम करके! इस से पूरी दुनिया में मैसेज जायेगा की सोच में क्लैरिटी होनी चाहिए।

अगर अब भी आप सहमत नहीं होंगे कि मोदी जी को हटाना चाहिए तो आप ज़रूर घनघोर संघी मानसिकता से पीड़ित हैं। JNU जाकर इलाज कराइए। और जो सहमत हो गए उनको सलाम। और राहुल जी को वोट न करना हो तो NOTA ही दबा आएँ, कुल्हाड़ी पैर पर उतनी ही ज़ोर से पड़ेगी और न्यूट्रल का ठप्पा भी बरकरार रहेगा।

जय हिन्द! जय NOTA!

गौ-भक्त केजरीवाल, क्या से क्या हो गए देखते देखते

देश को पिछले एक-दो साल में जितने गौ-भक्त मिले हैं, इतने आज़ादी के 60 साल बाद तक कभी नहीं मिले थे। गौ भक्तों की श्रेणी में आज एक और नाम जुड़ गया है। ये नाम कोई और नहीं बल्कि देश के पहले ऐसे मुख्यमंत्री का है, जिन्होंने अपने कई प्रत्याशियों की ज़मानत ज़ब्त करवाने से कई सौ साल पहले घोषणा कर दी थी कि वो ‘अलग किस्म की राजनीति’ करेंगे। हालात ये हुए कि दिल्ली में चुनाव प्रचार के पहले ही दौर में वो खुद को ‘पीड़ित बनिया’ बता गए।

जब भी केजरीवाल जी को ऐसी अलग किस्म की राजनीति करते हुए देखता हूँ तो मुझे क्रान्ति के शुरुआती दिनों में चंदा माँगकर ‘वॉलंटियर्स’ जोड़ने वाले वो भोले-भाले युवक याद आते हैं, जो कह रहे थे कि उन्होंने अपनी तनख्वाह का फ़लाना प्रतिशत आम आदमी पार्टी को दे दिया है। तभी दूसरा वॉलंटियर एक सत्संगी लेख लिखता हुआ मिलता था, जिसमें वो बताता था कि कैसे वो अपने कॉलेज से मिलने वाली स्कॉलरशिप आम आदमी पार्टी को देने के बाद ‘हल्का’ महसूस कर रहा था। भैया, हल्का ही महसूस करना था तो ‘पेट-सफ़ा’ ले लेते, बेकार में राजू श्रीवास्तव पीला कोट पहनकर सुबह शाम टेलीविज़न पर उसकी मार्केटिंग कर रहा है, जबकि वो अपने खाली समय में फ़ेसबुक पर लोगों को गाली दे सकता था।

देश की जनता बहुत समय से परेशान थी कि जब उनके क्रांतिकारी नेता अरविन्द केजरीवाल हाथों में पेचकस-प्लास लेकर बिजली नहीं बना रहे हैं, ना ही उनके फिल्मों के रिव्यु आ रहे हैं, तो वो मुख्यमंत्री होकर आखिरकार आजकल अपना कौन सा फ़र्ज़ निभा रहे हैं?

जवाब आज ही आम आदमी पार्टी द्वारा जारी किए गए एक विडियो में आ चुका है। मित्रों, केजरीवाल बाबू गौ माता को धुप-अगरबत्ती लगा रहे हैं, मैंने देखा कि विडियो में जिस गाय माता को वो आरती की थाली घुमा रहे हैं और तिलक लगा रहे हैं, वो केजरीवाल जी की गौभक्ति के कारण बहुत तंदुरुस्त हो गई है। मने कहाँ योगी जी असल गौसेवक होने का वादा करते रहे और कहाँ केजरीवाल जी ने यहाँ भी बाज़ी मार डाली।

ये गौभक्ति का निर्णय शायद केजरीवाल जी ने ट्विटर पर लोगों से जनादेश लेकर ही किया है। वो ट्वीट कर के जनता की राय पूछ भी चुके हैं कि क्या दिल्ली की जनता भी यही चाहती है की गाय की सेवा की जाए? जवाब शायद “हाँ” ही था

दोस्तों, देश में आस्था का सैलाब आ चुका है। अब बस मोदी जी ही ऐसे इंसान रह गए हैं जो हिन्दुओं के लाख चाहने के बावज़ूद भी हिन्दुओं के तुष्टिकरण के लिए कुछ कर नहीं रहे हैं। वरना तो 48 वर्ष के युवा द्वारा जनेऊ धारण कर लिया जा चुका है, पहली रोटी गाय माता को खिलाई जाने लगी है। लिबरल-फेमिनाज़ी महिलाओं में मंदिरों में प्रवेश के लिए होड़ मची हुई है, कुछ तो सुबह 3 बजे उठकर मंदिर में घुसी जा रही हैं। जबकि किसी कट्टर हिन्दू शेर से अगर आप पूछेंगे कि वो आख़िरी बार कब नहा-धोकर ब्रह्म मुहूर्त में मंदिर में भगवान के दर्शन करने गया था तो उसे यही याद करने में हफ्ता लग जाएगा कि वो आखिरी बार 10 बजे से पहले भी कब उठा था?

लेकिन आस्था का माहौल टाईट है, रोज सुबह उठकर सबसे पहले नाश्ते के साथ पित्रसत्ता और लंच में ब्राह्मणवाद को कोसने वाली फेमिनाज़ियों को भी अगर आप कह देंगे कि बहन आजकल मंदिर जाकर कॉन्ट्रोवर्सी हो रही है, तो वो भी बिना पिंक कलर के खरगोश के मुँह वाले ज़ुराब पहने ही दौड़ लगाकर झट से मंदिर में जाकर खड़ी हो जाएगी।

लेकिन अभी तो चुनाव आने में कुछ और महीने बाकी हैं। अभी मैं उम्मीद लेकर चल रहा हूँ कि देश में गाय माता खूब फूलेंगी-फलेंगी। आख़िरी बार गौ-माताओं का स्वर्णिम काल तब आया था जब मामले की नज़ाकत को भांपते हुए एक समाजवादी नेता ने बैलों को और एक लौह महिला ने गाय और बछड़े को अपनी पार्टी का चिन्ह घोषित कर दिया था। ये बात अलग है कि जरुरत पड़ने पर उसी कॉन्ग्रेस ने केरल में वामपंथियों के साथ मिलकर गाय को काटकर जबरदस्त प्रदर्शनी लगाकर उत्सव भी मनाया।

तो भैया, ये गाय माता हैं, बच्चों का बड़े से बड़ा अपराध भी क्षमा कर देना माता का स्वभाव होता है। इसलिए जितना हो सके चुनावों से पहले अपराध कर डालिए। जनता तो सब देख ही रही है।

छत्तीसगढ़ की कॉन्ग्रेस सरकार ने CBI से छीना राज्य में छापा मारने का अधिकार

पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश के बाद अब छत्तीसगढ़ में भी सीबीआई से अनुमति के बिना राज्या में रेड करने का अधिकार ले लिया गया है। इस बात की जानकारी अधिकारियों ने गुरूवार (जनवरी 10, 2019) को दी।

राज्य के मुख्यमंत्री ने यह निर्णय दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान अधिनियम 1946 की धारा 6 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए लिया गया है।

छत्तीसगढ़ से पहले आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में ये नियम पहले से ही लागू है। न्यूज़ 18 के अनुसार उन्हें ये जानकारी मुख्यमंत्री भूपेश बाघेल के सेक्रेट्री गौरव द्विवेदी से प्राप्त हुई है।

एक अधिकारिक बयान का हवाला देते हुए अधिकारियों ने बताया है कि सीएम भूपेश बाघेल की नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय और कार्मिक मंत्रालय (Ministry of Personnel) से सीबीआई को राज्य में कोई भी नया मामला दाखिल नहीं करने का निर्देश देने की माँग करते हुए पत्र लिखा है।

इसके साथ ही अधिकारियों का ये भी कहना है कि वर्ष 2001 में छत्तीसगढ़ सरकार ने सीबीआई को जांच करने की सामान्य सहमति दी थी। छत्तीसगढ़ के अलावा आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल ने अपने राज्य में जाँच करने और रेड मारने को दी गई सहमति पिछले साल ही वापस ले ली थी।

दिल्ली में कार्मिक मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि इस तरह सहमति वापस लेने से सीबीआई के पास पहले से चल रही जाँच के मामलों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

जानकारी के लिए बता दें कि इतना बड़ा कदम तभी उठाया गया है जब प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले एक पैनल ने सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा को पद से हटाकर नागरिक रक्षा, अग्निशमन सेवा, और  होमगार्ड्स महानिदेशक के पद पर नियुक्त किया है। बता दें कि केंद्रीय सतर्कता आयोग की एक रिपोर्ट में आलोक पर भ्रष्टाचार के मामले पर आरोप लगा था।

फैजल! कब खून खौलेगा रे तेरा?

यह कहानी फ़िल्मी नहीं है। धनबाद के वासेपुर की तो बिल्कुल भी नहीं। यह कहानी है बर्फ के वादियों से। वहीं से, जहाँ हिरोइनें शिफ़ॉन की साड़ियों में होती हैं लेकिन हीरो स्वेटर और लेदर जैकेट में! यह कहानी है एक बच्चे की। कहानी में एक माँ भी है। माँ जो हम सबकी होती है… अफ़सोस हम माँ के उतने नहीं हो पाते हैं 🙁

तो पेशे-ख़िदमत है माँ और उसके ‘शेरदिल’ बेटे की कहानी

मई का महीना था। मौसम ख़ुशगवार था। तभी तेज़ आवाज़ आई – बेटा हुआ है। माँ के आँसू छलक गए, खुशी के आँसू। बेटे के हर लात, हर मुक्के, हर ज़िद और बदमाशी को माँ झेलती रही। क्योंकि यह माँ का फ़र्ज़ था। दिन-ब-दिन बेटा बड़ा होता गया। और बड़ी होती गईं उसकी शैतानियाँ। जहाँ-तहाँ सूसू-पॉटी से लेकर पेड़-पौधों तक को उसने नेस्तानाबूद किया, माँ ने सब झेला… सिर्फ इसलिए क्योंकि वह माँ थी।

अब वो किशोरावस्था में पहुँच गया। सूसू-पॉटी जैसी शैतानियाँ अब वो बंद कमरे में करने लगा। गिल्ली-डंडा, क्रिकेट, कबड्डी अब उसके अड्डे थे – शैतानियों के अड्डे। इनके आगे वो अपनी माँ को माँ नहीं समझता था। कभी माँ से नहीं पूछता कि उसकी इच्छा क्या है… शायद ज़रूरत भी महसूस नहीं की उसने। लेकिन माँ ने कभी भी उसे अपनी छाँव से दूर नहीं किया। उसके नैसर्गिक गुणों से उसे वंचित नहीं किया। चाहती तो कर सकती थी लेकिन माँ भला ऐसा क्यों सोचे!

खैर, लड़का जवान हुआ। अपने नैसर्गिक गुणों के दम पर लड़के ने मेडिकल कॉलेज में एडमिशन पा लिया। माँ बहुत खुश थी। आज फिर उसके आँसू छलके थे, खुशी के आँसू। यहाँ उसकी बदमाशियों का पोस्टमॉर्टम हो गया। एक से बढ़कर एक सीनियरों ने उसकी कह के ली। न जाने कितनों को उसे तोहफ़ा क़ुबूल करवाना पड़ा। अब उसे माँ की याद आने लगी। माँ तो ठहरी माँ! उसका कलेज़ा पसीज़ गया। हिम्मत दी, हौसलाफ़ज़ाई की। लौंडे ने मेडिकल का किला फ़तेह कर लिया।

मेडिकल कॉलेज के पिंजरे से निकल बदमाशियों का स्केलटन फिर से तन कर खड़ा हो गया। लेकिन अब उसे बड़ा मैदान चाहिए था। बदमाशियों का कैनवास बड़ा था, तो दिलासा भी बड़ा होना था। माँ से बड़ा कौन! माँ फिर उसके साथ खड़ी थी। बड़े जतन से बेटे के नैसर्गिक गुणों पर माँ ने फिर से धार चढ़ाई। और चाहिए ही क्या… IAS में जीत इतनी बड़ी हुई कि इलाका धुआँ-धुआँ हो गया। हर तरफ़ हज़रात-हज़रात-हज़रात का शोर! शोर में माँ को फिर से भूल गया बेटा… अफ़सोस!

A Wednesday को इस्तीफ़ा दिया, Friday को फुटुरे (Future) बताने को

10-11 बरस बीत गए। बेटे को फिर से माँ की ‘याद’ आई। क्योंकि उसकी बदमाशियाँ अब किसी सरहद की मोहताज़ नहीं रहना चाहती थीं। उसने IAS से इस्तीफ़ा दे दिया। क्योंकि A Wednesday (जनवरी 9, 2019) को उसे माँ की ‘सेवा’ करनी है। लेकिन नहीं… मौसम थम के बरसने को तैयार ही नहीं, आख़िर Friday को अपनी ‘महबूबा’ ‘उमर’ के पास जाएँ कैसे फैजल साहब! माँ और मौसम के बीच मौसम ने बाज़ी मार ली।

Friday को ‘महबूबा’ से ‘उमर’ का नहीं हुआ मिलन, क्योंकि मौसम बन गया विलन!

तेज़ आवाज़ आई। माँ की तेज़ आवाज़। धरती माँ की धिक्कार भरी आवाज़ -फैजल! सेना और कश्मीर पुलिस के जवानों की मौत के वक्त तू गांज़ा मार के कहां पड़ा था रे फैजल? कब बनाएगा इनके लिए तू पॉलिसी फैजलवा? बर्फ-पानी-पत्थर से सेना का खून नहीं जमता, अल्लाह के सबसे पाक दिन Friday को तेरा खून कैसे जम गया रे फैजलवा? कब खून खौलेगा रे तेरा?

35-A का वह पहलू जिसका भार उठाते जम्मू-कश्मीर में दलितों की पीढ़ियाँ खप गईं

अबुल फ़ज़्ल ने ‘आइन-ए-अक़बरी’ में लिखा है कि कश्मीर के सबसे इज़्ज़तदार लोग वे ऋषि हैं जो रिवाज़ों से बँधे नहीं हैं फिर भी ईश्वर के सच्चे पुजारी हैं। ये ऋषि किसी अन्य मत या पंथ को गाली नहीं देते और न ही किसी से कुछ माँगते हैं बल्कि वे तो राहगीरों के लिए मार्ग पर फल देने वाले वृक्ष लगाते हैं।

प्राचीनकाल में ऐसे ऋषि केवल कश्मीर में ही नहीं बल्कि समूचे भारत में थे। जैसा कि भाषा विज्ञान के ख्यातिप्राप्त प्रोफेसर कपिल कपूर कहते हैं, “ऋषिगण अपने जमाने के ‘इंटेलेक्चुअल’ हुआ करते थे। इसमें संशय नहीं कि समाज को दिशा दिखाने के साथ ही ये ऋषि सामाजिक बुराइयों की सफाई भी करते रहते थे।”

ऋषि परंपरा में सर्वाधिक प्रसिद्ध आदिकवि महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी। यह विडंबना ही है कि वाल्मीकि को अपना मानने वाला और खुद को उनके नाम से संबोधित करने वाला ‘वाल्मीकि समुदाय’ आज भी मैला ढोने का घृणित काम करने को विवश है। दलित वर्ग के वाल्मीकि समुदाय के लोग भारत में हर जगह रहते हैं और चूहड़ा, भंगी, मेहतर आदि नामों से भी जाने जाते हैं। हमारे आसपास प्रायः वाल्मीकि समुदाय के लोग सीवर में गहरे उतरकर सफ़ाई करते दिख जाएँगे जिन्हें नगरपालिका अस्थाई रूप से सफ़ाई कर्मचारी के तौर पर वेतन देती है

वाल्मीकि समुदाय तथा अन्य दलित वर्गों को संविधान और समय-समय पर लागू किए गए क़ानूनों द्वारा अनेक प्रकार के अधिकार प्राप्त हैं। सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 में छुआछूत करने वालों को दंड के प्रावधान हैं। सन 1993 और 2013 में आये अन्य कानूनों में यह प्रावधान किया गया कि स्थानीय प्रशासन सर्वे कर यह सुनिश्चित करेगा कि सूखे पाखाने न बनें जहाँ हाथों से मानव मल-मूत्र की सफ़ाई करनी पड़े।

जो व्यक्ति इस प्रकार के कार्यों में लिप्त हैं उनके पुनर्वास और मैला ढोने का काम छुड़ा कर दूसरे सम्मानित रोजगार देने का प्रावधान भी किया गया है। दलितों के उत्थान के लिए देश में न जाने कितने आंदोलन हुए, कमीशन और क़ानून बने जिनकी कोई गिनती नहीं है। लेकिन जम्मू कश्मीर राज्य में 1957 से रह रहे वाल्मीकि समुदाय की पीड़ा ऐसी है जिससे देश आज भी अनभिज्ञ है। इसका एक कारण यह भी है कि शेष भारत में दलितों के लिए जो कानून बने हैं वे जम्मू कश्मीर के वाल्मीकि समुदाय के लोगों पर लागू नहीं होते।

यह कहानी आरंभ होती है सन 1957 में जब जम्मू-कश्मीर के सफ़ाई कर्मचारी कई महीनों के लिए हड़ताल पर चले गए थे। तब जम्मू कश्मीर राज्य सरकार के हाथ पाँव फूल गए थे क्योंकि पूरे राज्य में विशेषकर जम्मू और श्रीनगर में कूड़े-कचरे और मानव मल-मूत्र का अंबार लग गया था। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री बक्शी ग़ुलाम मुहम्मद ने कैबिनेट की मीटिंग बुलाई और तय किया कि दूसरे राज्यों से सफ़ाई कर्मचारी बुलाकर उन्हें जम्मू कश्मीर में नौकरी दी जाएगी।

चूँकि निकटतम राज्य पंजाब था इसलिए वहाँ के गुरदासपुर और अमृतसर ज़िले से लगभग 272 सफ़ाई कर्मचारी बुलाए गए और उन्हें जम्मू डिवीज़न में बसाया गया। जम्मू कश्मीर राज्य में उन सभी वाल्मीकि समुदाय के लोगों को बसाने के साथ ही उनके साथ संवैधानिक छल किया गया।

दरसअल जम्मू-कश्मीर राज्य भारत की स्वतंत्रता के समय से ही कुछ मुट्ठी भर नेताओं के स्वार्थ का शिकार हुआ जिसका परिणाम आज वहाँ रह रहा प्रत्येक व्यक्ति भुगत रहा है। इसकी शुरुआत तब हुई जब शेख अब्दुल्ला से मित्रता रखने वाले जवाहरलाल नेहरू ने संविधान बनने के अंतिम दिनों में गोपालस्वामी आयंगर के ज़रिये अनुच्छेद 370 को संविधान में जुड़वा दिया।

अनुच्छेद 370 यह कहता है कि भारतीय संविधान एक बार में पूर्ण रूप से जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू नहीं होगा। भारतीय संविधान के सभी अनुच्छेद और अन्य कानूनी प्रावधान एक-एक कर के राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक आदेश के रूप में जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू करवाए गए। अनुच्छेद 370 में यह प्रावधान है कि भारत के राष्ट्रपति जम्मू-कश्मीर राज्य से सलाह लेकर समय-समय पर संविधान के अनुच्छेद राज्य में लागू करवाते रहेंगे।

इसी क्रम में 14 मई 1954 को एक ऐसा संवैधानिक आदेश भारत के राष्ट्रपति द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू करवाया गया जिसने भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ दिया। इस अनुच्छेद को 35-A के नाम से जाना जाता है। इसी अनुच्छेद के कारण आज जम्मू-कश्मीर में वाल्मीकि समुदाय समेत कई समुदाय के लोग पीड़ित हैं।

अनुच्छेद 35-A जम्मू-कश्मीर राज्य को यह निर्णय लेने का अधिकार देता है कि राज्य के स्थाई निवासी कौन होंगे। अर्थात यह राज्य तय करेगा कि स्थाई निवास प्रमाण पत्र किसको देना है और किसे नहीं। जम्मू-कश्मीर राज्य को जब यह अधिकार दिया गया तब तक राज्य का संविधान भी नहीं बना था। बाद में राज्य का संविधान बनते ही उसमें यह लिख दिया गया कि जम्मू-कश्मीर के स्थाई निवासी का दर्ज़ा उन्हें ही दिया जाएगा जो 1944 या उसके पहले से राज्य में रह रहे हैं।  

लेकिन वाल्मीकि समाज के लोग तो 1957 में पंजाब से लाकर बसाए गए थे इसलिए आजतक उन्हें जम्मू-कश्मीर का स्थाई निवासी नहीं माना गया और उन्हें स्थाई निवास प्रमाण पत्र- जिसे PRC कहा जाता है- नहीं दिया गया। राज्य सरकार ने वाल्मीकि समुदाय के लोगों को अपने यहाँ रोजगार देने के लिए नियमों में परिवर्तन कर यह लिख दिया कि इन्हें केवल ‘सफ़ाई कर्मचारी’ के रूप में ही अस्थाई रूप से रहने का अधिकार और नौकरी दी जाएगी। इस प्रकार जब इस समुदाय का कोई बच्चा जन्म लेता है तो उसके माथे पर वैधानिक रूप से ‘दलित’ लिखा होता है। वह बड़ा होकर चाहे कितनी भी पढ़ाई कर ले उसे जम्मू-कश्मीर राज्य में सफ़ाई कर्मचारी की नौकरी ही मिल सकती है।

वाल्मीकि समुदाय के लोगों के पास स्थाई निवास प्रमाण पत्र न होने से वे राज्य में स्थाई रूप से न तो बस सकते हैं न ही संपत्ति खरीद सकते हैं। उनके बच्चों को राज्य सरकार द्वारा छात्रवृत्ति भी नहीं मिल सकती। यही नहीं PRC के अभाव में वाल्मीकि समुदाय के बच्चों को राज्य सरकार के इंजीनियरिंग, मेडिकल या किसी अन्य टेक्निकल कोर्स के कॉलेजों में दाख़िला नहीं मिल सकता।     

जम्मू-कश्मीर राज्य में 1957 में आए वाल्मीकि समुदाय के 272 लोगों के वंशजों की संख्या आज बढ़कर हज़ारों में हो गई है लेकिन वे उसी अस्थाई रूप से एक के ऊपर एक बने कई तलों में बने बसेरों में रहते हैं जो आज से 60 वर्ष पहले जम्मू-कश्मीर राज्य ने उन्हें रहने के लिए दिए थे क्योंकि राज्य सरकार उन्हें मकान बनवाकर रहने की अनुमति नहीं देती। स्थाई निवास प्रमाण पत्र न होने से वाल्मीकि समुदाय के लोग लोकसभा चुनाव में तो मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं किंतु विधानसभा चुनावों में वोट नहीं डाल सकते।

हालत ये हो चुकी है कि आज जब पूरे देश में दलित उत्थान की बातें होती हैं तब जम्मू-कश्मीर में रह रहे वाल्मीकि समुदाय के लड़के-लड़कियाँ स्कूली शिक्षा के आगे पढ़ाई ही नहीं करना चाहते। उनका कहना है कि जब पढ़-लिख कर सफ़ाई कर्मचारी ही बनना है तब पढ़ने से क्या फ़ायदा? इस समुदाय की लड़कियाँ जम्मू-कश्मीर राज्य के बाहर जाकर विवाह कर रही हैं क्योंकि वे अपनी जाति के कम पढ़े लिखे सफाई कर्मचारी की नौकरी करने वाले युवाओं से विवाह नहीं करना चाहतीं। ऐसे में वाल्मीकि समुदाय के लड़कों को विवाह के लिए लड़कियाँ नहीं मिल रहीं।

आज जब शेष भारत में ऐसा माहौल है कि एक जाति सूचक शब्द बोलने पर सजा हो जाती है तब जम्मू-कश्मीर राज्य वाल्मीकि समुदाय को जाति प्रमाण पत्र तक जारी नहीं करता जिससे इस समुदाय के लोगों को अनुसूचित जातियों के लिए बनाए गए विशेष प्रावधानों और सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रहना पड़ता है। यही नहीं 2015 में एकलव्य नामक एक लड़के के प्रमाण पत्र पर जम्मू-कश्मीर राज्य के सरकारी कर्मचारी ने जाति सूचक शब्द लिखा और उस कर्मचारी पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। जाति प्रमाण पत्र न होने से एक प्रकार से अनुसूचित जातियों में जम्मू-कश्मीर के वाल्मीकि समुदाय की गिनती ही नहीं होती।

मीडिया में भी जम्मू-कश्मीर के वाल्मीकि समुदाय की कवरेज नहीं के बराबर है। मैला ढोने की कुप्रथा पर भाषा सिंह ने एक बहुचर्चित पुस्तक लिखी ‘Unseen: The Truth About Indian Manual Scavengers’ जिसमें उन्होंने जम्मू-कश्मीर की उन जातियों के बारे में लिखा जो यह घृणित कार्य आज भी करने को विवश हैं किन्तु भाषा सिंह ने अपनी पुस्तक में वाल्मीकि समुदाय के बारे में एक शब्द भी नहीं लिखा।

इस तरह जम्मू-कश्मीर में संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का खुल्लमखुल्ला मखौल उड़ाया जा रहा है और इसकी जड़ में है अनुच्छेद 35-A जिसे गलत तरीके से संविधान में जोड़ा गया था। इस अनुच्छेद को संविधान में जोड़ने की प्रक्रिया ही अपने आप में असंवैधानिक थी। संविधान संशोधन की प्रक्रिया अनुच्छेद 368 में दी गई है जिसके अनुसार संविधान में कोई भी अनुच्छेद जोड़ने के लिए संसद में संविधान संशोधन बिल लाया जाता है। परन्तु अनुच्छेद 35-A कभी संसद से पास नहीं हुआ।   

जब इसे हस्ताक्षर के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के पास भेजा गया था तब उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से पूछा था कि क्या मैं यह असंवैधानिक कार्य कर सकता हूँ। इस पर नेहरू ने उनसे कहा था कि हम इस मामले पर अनौपचारिक रूप से चर्चा करेंगे। ख़ास बात यह है कि यह संवाद भी औपचारिक रूप से किया गया था। आज उच्चतम न्यायालय में 35-A पर एक दो नहीं बल्कि पाँच याचिकाएँ लंबित हैं किंतु न्यायाधीशों को इन पर निर्णय देने का समय नहीं मिल रहा।