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कुम्भ की धरा से योगी कैबिनेट का गंगा एक्सप्रेस-वे सहित अन्य योजनाओं का ऐलान

प्रयागराज कुम्भ में मंगलवार को पहली बार ऐसा हुआ है जब कुम्भ क्षेत्र में राज्य सरकार की कैबिनेट की बैठक हुई। इस दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ यूपी सरकार के सभी मंत्री मौजूद रहे।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुआई में कैबिनेट बैठक में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया जिनका ऐलान करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ से लेकर प्रयागराज तक गंगा एक्सप्रेस-वे बनाया जाएगा। यह 6 लेन का गंगा एक्सप्रेस-वे गंगा के किनारों के साथ आगे बढ़ेगा। इस एक्सप्रेस-वे को बनाने के लिए 36000 करोड़ रुपए के बजट को मंज़ूरी दी गई।

गंगा एक्सप्रेस-वे मेरठ, अमरोहा, बुलन्दशहर, बदायूँ, शाहजहाँपुर, फ़र्रुखाबाद, हरदोई, कन्नौज, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़ होते हुए प्रयागराज तक आएगा। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि ये एक्सप्रेस-वे दुनिया का सबसे लंबा एक्सप्रेस-वे होगा।

इसके अलावा फ़ैसला लिया गया है कि बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे का भी तेजी से निर्माण किया जाएगा, 270 किलोमीटर के इस एक्सप्रेस-वे के लिए लिए 8000 करोड़ रुपए से अधिक का आवंटन किया जाएगा। कैबिनेट मीटिंग में किसानों की आय को दोगुना करने के लिए भी किसान मंडी में प्रतिनिधित्व को लेकर कुछ अहम निर्णय लिए गए।

साथ ही, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सर्जिकल स्ट्राइक के ऊपर बनी फिल्म ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ को उत्तर प्रदेश में कर मुक्त कर दिया है। महर्षि भारद्वाज की नगरी प्रयागराज के आश्रम का भी सौंदर्यीकरण करने की घोषणा की गई। निषादराज की नगरी श्रृंगवेरपुर को भी विकसित करने का ऐलान किया गया।

कैबिनेट बैठक के बाद योगी आदित्यनाथ ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में इस बार कुम्भ का आयोजन भव्यतम है। मुख्यमंत्री ने इसके लिए प्रधानमंत्री का आभार व्यक्त किया। बता दें कि इस बार कुम्भ में दुनिया के 70 से अधिक देशों के लगे राष्ट्रध्वज, इसकी वैश्विक प्रतिष्ठा के प्रतिक हैं।

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी और निर्माणी अनी अखाड़े के प्रमुख महंत धर्मदास के साथ ही विभिन्न साधु-संतों के अलावा आम श्रद्धालुओं ने भी योगी सरकार के कुम्भ में कैबिनेट बैठक करने पर ख़ुशी का इज़हार किया है।

बजट में कटौती के बाद ₹52 करोड़ में तैयार होंगे बिहार मंत्रियों के लिए 20 बंगले

बिहार की राजधानी पटना में गर्दनीबाग इलाके में 20 मंत्रियों के बंगले ₹62 करोड़ में बनाए जाने थे। अब इन बंगलों की निर्माण राशि में सरकार ने कटौती की है। कटौती के बाद अब मंत्रियों के बंगलों का निर्माण ₹52 करोड़ में किया जाएगा।

सरकार द्वारा राशि में कटौती के बाद अब एक बंगले की निर्माण राशि 2.5 करोड़ होगी। राशि में 10 करोड़ की गिरावट के कारण भीतर के डिज़ाइन में भी परिवर्तन होगा। जिसके बाद इन बंगलों के निर्माण की प्रक्रिया चालू होगी।

बता दें कि गर्दनीबाग में बसने वाले टाउनशिप इलाके में न्यायाधीशों व मंत्रियों के 20 बंगले बनने हैं। वहीं अधिकारियों और तृतीय श्रेणी के कर्मियों के 700-700 आवास बनने हैं और चुतुर्थ ग्रेड कर्मियों के 400 सरकारी आवास बनने हैं। उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के बनने वाले बंगले का अब तक डिज़ाइन फाइनल नहीं हुआ है।

इसके साथ ही आपको बता दें कि टाउनशिप इलाके में अधिकारियों के जो 700 आवास बनने हैं उस पर ₹480 करोड़ का ख़र्चा आना है। इन आवास निर्माण के लिए टेंडर की प्रक्रिया पूरी हो रही है। इस इलाके में बने मास्टर प्लान में आवासीय भवनों के साथ व्यवसायिक क्षेत्र, आईटी पार्क, होटल, अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान आदि का भी निर्माण होना है।

इन सभी भवनों की संरचना में पटना के भूकंप को ध्यान रखते हुए सुरक्षात्मक मापदंडो का पालन होगा। प्रभात खबर में छपी रिपोर्ट के अनुसार, भवन निर्माण विभाग के सूत्र ने बताया कि पहले मंत्रियों के बंगलों के निर्माण में 52 करोड़ ख़र्च का अनुमान लगाया गया था। लेकिन, नए डिज़ाइनों के चलते इन पर दस करोड़ अधिक खर्च बढ़ने की सम्भावना थी। इसी अतिरिक्त बढ़े ख़र्च में कटौती करते हुए डिजाइन में परिवर्तन करने पर अभी निर्णय लिया जाना है।

दो साल में ₹6900 करोड़ की बेनामी संपत्ति आयकर विभाग द्वारा ज़ब्त

आयकर (IT) विभाग ने पिछले दो वर्षों में ₹6900 करोड़ की बेनामी संपत्ति ज़ब्त की है। एजेंसी ने कहा कि उसने बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम के तहत इतनी मूल्य की संपत्ति को कुर्क किया। एजेंसी ने इस संबंध में समाचार पत्रों को विज्ञापन भी दिए, जिसमें बताया गया है कि दोषियों को 7 साल तक की सज़ा हो सकती है। बता दें कि नए क़ानून के तहत जो कार्रवाई होगी, वह आयकर क़ानून, 1961 के अतिरिक्त होगी। देश में संशोधित बेनामी क़ानून 2016 में लागू हुआ था।

विज्ञापन में बेनामी सौदे करने वाले, बेनामदार (बेनामी संपत्ति के मालिक) और लाभार्थी (बेनामी संपत्ति ख़रीदने के लिए रुपए ख़र्च करने वाले)- इन तीनो को ही दोषियों की श्रेणी में रखा गया है। एजेंसी ने कहा कि दोषियों पर अभियोजन चला कर उन्हें सज़ा तो दिलाई जाएगी, साथ ही उनसे संपत्ति के बाज़ार मूल्य का 25 प्रतिशत ज़ुर्माना भी वसूल लिया जाएगा। बता दें कि लोग टैक्स से बचने के लिए अपनी चल-अचल संपत्ति को किसी और के नाम कर देते हैं- इस संपत्ति को बेनामी संपत्ति के रूप में जाना जाता है।

आयकर विभाग द्वारा ज़ारी किया गया विज्ञापन

इसके अलावा बेनामी सपत्तियों को लेकर जो गलत सूचना देते हैं और जो सही जानकारी छिपाते हैं- उसके लिए भी सज़ा और ज़ुर्माना का प्रावधान किया गया है। उन्हें 5 वर्ष तक की सज़ा के साथ-साथ संपत्ति के बाज़ार मूल्य का 10% ज़ुर्माना के रूप में वसूला जाएगा। आयकर विभाग ने जनता से भी एजेंसी का सहयोग करने का निवेदन किया है ताकि इस बुराई को ख़त्म किया जा सके। बता दें कि पहले वाले क़ानून के तहत सिर्फ़ तीन वर्ष की ही सज़ा हुआ करती थी। आईटी विभाग ने लोगों को आगाह किया है कि बेनामी संपत्ति को सरकार द्वारा ज़ब्त किया जा सकता है।

बता दें कि साल 2017-18 में आयकर विभाग ने अकेले कर्नाटक और गोवा क्षेत्र से ₹12,268 करोड़ के गुप्त आय और संपत्ति को पकड़ा है जो कि अपने आप में एक बड़ी सफलता मानी जा रही है। पिछले कुछ वर्षों में एजेंसी की सक्रियता का ही परिणाम है कि करदाताओं की संख्या में भारी उछाल आया है।

राजनैतिक फ़ैंसी ड्रेस मे अवतरित नया कलाकार

दूसरे दिन छगनलाल जी मिल गए। चेहरे पर भारतीय मतदाता जैसे आश्चर्य और असमंजस के भाव थे। हिंदी पाठकों वाले निर्धन, निरीह मुख पर चमत्कृत होने के भाव छगनलाल जी को आदर्श भारतीय मतदाता की छवि प्रदान करते थे जो मध्यवर्गीय भी हों और विवाहित भी।

वह उस वर्ग से आते थे जो हिंदी पढ़ता है और अपनी समस्याएँ अंग्रेज़ी लेखकों को टीवी पर प्राइम टाइम विचार विमर्श की विषय वस्तु बना कर प्रस्तुत करता है। जब अंग्रेज़ी लेखक और प्रवक्ता टीवी पर उसकी समस्या और एक-दूसरे का छीछालेदर कर रहे होते, वह ब्रुश लेकर बाथरूम मे दाँत माँजने घुस जाता है और उसकी पत्नी चैनल बदल देती है। उसे विश्वास होता है कि उसकी समस्या के निराकरण का सौभाग्य नहीं है, बुद्धिजीवियों के मनोरंजन का सुयोग है। मध्यवर्गीय भारतीय की समस्याएँ बुद्धिजीवियों का च्यूईंग गम है, जो उनके जबड़ों के स्वस्थ और चेहरे की त्वचा को युवा रखता है।

इसी निरुत्साह के भाव के साथ छगनलाल जी ने हमारी ओर प्रश्न उछाला, “बताइए, यह क्या बात हुई कि आदमी बैंगन बन कर आए?” हमने चुनावी मौसम में आदमी को बेवक़ूफ़ बनते हुए सुना था, ये बैंगन वाला एंगल हमारे लिए भी नया था। हम छगनलाल जी की इस विचित्र विडंबना से उसी निर्विकार भाव से निकल सकते थे जैसे ग़रीब किसानों की स्थिति पर टेसुए बहाता नेता, रात की फ्लाइट से नानी के दर्शन को विदेश निकल जाता है। पर व्यंग्य लेख़क का काम होता है फँसना, सो हम फँसे।

हमने कहा, “चुनाव मे लोग आज कल ब्राह्मण और मौलवी बन लेते हैं, यह बैंगन बनने की प्रथा कब शुरू हुई?”

छगनलाल गहरी साँस छोड़ते हुए बोले- “बेटे के स्कूल मे वार्षिकोत्सव है।”

हमने कहा कि, ये हर्ष का विषय है। देश की राजनीति भी अभी उत्साहित है। पत्रकारों के घोर आह्वान के बावजूद, हर चुनाव के समय ‘ऋतु वसंत आया’ पर मनोरम नृत्य प्रस्तुत करने के बाद कॉन्ग्रेस की ट्रेन आऊटर पर निर्विकार अंगद के पाँव की भाँति स्थापित है। बाहरहाल, निरुत्साहित सभागणों के उत्साह को बनाए रखने के लिए नई शटल चलाई गई है।

जिन्हें पुराने दरबार मे स्थान नहीं मिला उनके लिए नवनियुक्ति के अवसर ले कर सत्ता का नया केंद्र कॉन्ग्रेस मे प्रस्तुत हुआ। छूटे हुए चाटुकारों ने राष्ट्रीय कृषक की पत्नी और भारत रत्न प्रपौत्री में इंदिरा गाँधी की छवि सहसा देखी, चहुँ ओर प्रथम परिवार की जय-जयकार गुंजायमान हुई। बुद्धिजीवी टिटिहरियों ने संसार मे धर्म की रक्षा पर संतोष व्यक्त किया, निष्पक्ष पत्रकारों ने सामूहिक सोहर कोरस मे गा कर कॉन्ग्रेस के प्रथम परिवार की दूसरी प्रविष्टि का स्वागत किया।

समर्थकों ने दक्षिण के सिनेमा के स्टाईल मे हिंद की शेरनी, ग़रीबों की मसीहा के शिमला के बँगले से अवतरित होने के स्वागत मे पोस्टर छापे और विश्लेषकों ने लेख लिखे जिनके मूल भाव मे देवी ऐसे उत्साह के वातावरण मे जहाँ ईवीएम का क्रांतिकारी कॉन्ग्रेसी प्रेस कॉफ्रे़ंस दब चुका है, और राफ़ेल की चिड़िया दाना चुग कर उड़ चुकी है, यह बैंगन छगनलाल जी कहाँ से ले आए, मै समझ नहीं पाया।

दोबारा पूछने पर बोले- “बेटे को स्कूल मे फ़ैंसी ड्रेस मे बैंगन बनना है? यह भी कोई बात हुई? ऊपर से पिछले साल वो शर्मा जी का बेटा कुम्हड़ा बन कर प्रथम स्थान ले गया था। बहुत प्रेशर है पत्नी का कि, लड़के को इस बार फ़र्स्ट आना है।”

हमने उन्हे समझाया कि यह उनकी पत्नी की राजनीतिक परिपक्वता बताता है। भारतीय राजनीति इन्हीं दो मानकों पर आधारित है- फ़ैंसी ड्रेस और शर्मा जी का बेटा होने पर। आप क्या हैं वह आपकी वेष-भूषा तय करती है। जींस में हैं तो प्रायवेट सिटिज़न, साड़ी मे है तो राष्ट्र नेता। दूसरे यदि, आप शर्मा जी के बेटे हैं तो आपकी पैदाइश ही आपकी महानता का साक्ष्य है। जैसा अपने सर्वदा समसामयिक उपन्यास मे श्रीलाल शुक्ल जी रूप्पन बाबू को पाठकों के समय प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि रुप्पन बाबू नेता हैं क्योंकि उनके पिता भी नेता है।

महागठबंधन के तीसरे या चौथे मोर्चे के नेताओं ने हाल मे हुए कोलकाता सम्मेलन में योग्य शर्मा जी के योग्य औलादों को जनता के समक्ष, प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना प्रस्तुत किया तो घाघ, वृद्ध कॉन्ग्रेस ने सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च शर्मा पुत्री को मैदान मे उतार कर मास्टर स्ट्रोक खेला। सब शर्मा जी के बेटे मुँह बाए देखते रह गए। जल्द ही नेतोचित परिधान धारण कर के प्रियंका जी राष्ट्रोद्धार के पुनीत कार्य मे संलग्न होंगी और हमारी आशा है कि, श्री छगनलाल के पुत्र भी बैंगन बन कर प्रथम पुरस्कार प्राप्त करेंगे और शर्मा जी के पुत्र को परास्त करेंगे।

अस्त होती सभ्यता का सूर्य हैं सरस्वती पुत्र ‘पद्मश्री’ प्रीतम भरतवाण


प्रीतम भरतवाण का नाम सुनते ही उत्तराखंड लोक कला और संस्कृति की वो विरासत दिमाग में कौंधती है जो विलुप्ति के कगार पर खड़ी है। कारण है कि उत्तराखंड जैसा राज्य जो विभिन्न जनजातीय समाज और सभ्यताओं से मिलकर बना है, आज पलायन, बेरोज़गारी और प्रशासन की बेख़याली की मार झेल रहा है। उत्तराखंड राज्य को ‘देवभूमि’ के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन यहाँ का एक दूसरा सत्य अभाव और संसाधनहीनता भी है।

ऐसे समय में उत्तराखंड की सुदूर जगहों के रहने वाली ऐसी हस्ती और उसकी विद्या को ढूँढकर उसे पद्म श्री से गौरवान्वित करने का जो काम वर्तमान सरकार ने किया है, वो हर लिहाज़ से सराहनीय है।

इस गणतंत्र दिवस पर भारत सरकार ने चिरकालिक प्रथा से बाहर निकलकर ऐसे लोगों को चुनकर उन्हें सम्मान देने का काम किया है, जो अब तक किसी ना किसी कारण से नज़रअंदाज़ किए जा रहे थे। इसी क्रम में जो एक नाम पद्म श्री पुरुस्कार की श्रेणी में आया, वो है प्रीतम भरतवाण यानि उत्तराखंड गढ़वाल के मशहूर ‘जागर सम्राट’।

जिस उम्र में बच्चे अपने माँ-बाप की उँगली पकड़कर चलना सीखते हैं, उस उम्र में प्रीतम के हाथों ने ‘ढोल-दमाऊँ’ थामा था। उत्तराखंड के लोक संगीत और वाद्य यंत्रों को विलुप्ति के अंधेरे से विश्व पटल पर लाने का श्रेय आज निसंदेह इस सरस्वती पुत्र को जाता है।

‘डौर’ के साथ स्टेज पर प्रस्तुति देते हुए प्रीतम भरतवाण

देवताओं की इस धरती पर यदि सबसे पहले किसी को नमन किया जाना चाहिए तो वह यह ‘दास समुदाय’ है जिन्हे स्थानीय भाषा में ‘औजी’ कहा जाता है, जिनके आह्वान से ही किसी भी शुभ कार्य या समारोह में सर्वप्रथम देवी-देवताओं का स्मरण किया जाता है। सांस्कृतिक देवताओं के साथ ही उत्तराखंड में स्थानीय देवताओं का भी बहुत महत्त्व है, जिनके स्मरण के लिए ‘औजी’ ढोल-दमाऊँ के साथ ‘जागर’ आदि गाते हैं। गढ़वाल में प्रत्येक सुबह, 4-5 बजे के बीच, उठकर गाँव के औजी ढोल-दमाऊँ द्वारा ‘नौबत’ बजाते हैं और साँझ गोधूलि पर भी ढोल-दमाऊँ के ज़रिए देवताओं को प्रणाम करते हैं।

उत्तराखंड अपनी सभ्यता के अंतिम पड़ाव पर है-

एक समय था जब उत्तराखंड में सभ्यताओं का महाकुम्भ हुआ करता था। सभ्यताओं की सजीव प्रतिमा, यह राज्य, आज उपेक्षाओं के कारण एक त्रासदी से गुजर रहा है। त्रासदी यह है कि अवसरों की कमी और साधनों की कमी के कारण यह राज्य अपनी तमाम पिछली विरासतों से विमुख होकर पलायन के लिए मजबूर है। सबसे त्रासद अगर आज के समय में कुछ है तो वह यही ‘औजी वर्ग’ है। इस वर्ग के लिए ढोल सागर अपनी अगली पीढ़ियों तक पहुँचाना इसलिए चुनौती बन रहा है क्योंकि इस कार्य से उनका पेट नहीं भरता है। सरकार को चाहिए कि उन्हें संरक्षण देकर इस विधा को जीवित रखने का प्रयास करें।

प्रीतम भरतवाण इसी कारण सम्मान के पात्र बने हैं। एक ओर जहाँ गढ़वाल का औजी इस ढोल विद्या को हीन समझकर त्याग रहा था, उसी वक़्त प्रीतम भरतवाण ने अपनी विद्या को सरस्वती बनाकर एक अनोखी मिसाल क़ायम की है। प्रीतम भरतवाण ने इस विरासत को बेहद सादगी से प्रणाम कर ढोल को अपने गले में धारण कर ऐसा जूनून दिखाया कि आज वह देश-विदेशों में अपनी इस कला के लिए सम्मानित किए जा रहे हैं और एक बहुत बड़ा वर्ग उनका प्रशंसक है।

प्रीतम भरतवाण ने गढ़वाल की विलुप्त होती ढोल विधा को परिमार्जित कर समाज पर अनुग्रह किया है। अपने प्रोग्राम के दौरान भी संगीत गाते-बजाते उनका अंग-अंग थिरकता है। उनके दैवीय जागरों को सुनकर नास्तिकों के सर भी देवताओं के सम्मुख अवनत हो जाते हैं। वह सगुण और निर्गुण दोनों भक्तिधारा के उपासक हैं।

एशिया से यूरोप, अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, दुबई तक संगीत की ‘जागर’ विधा को पहुँचाने और सम्मान दिलाने का काम प्रीतम भरतवाण ने किया है। आज हालात यह हैं कि देश-विदेश में उनके अनेक शिष्य हैं। बचपन से ही प्रीतम के कण्ठ में सरस्वती जाग्रत रूप में विराजमान हैं, सरस्वती इन्हें सिद्धस्त हैं। अपने बचपन का स्मरण करते हुए प्रीतम भरतवाण ने बताया कि गाँव में जब भी जागर का कोई कार्यक्रम होता था सबसे पहले ‘पिर्ति’ को ही बुलाया जाता था।

स्टेज पर उनके ‘लाइव’ कार्यक्रम देखते और सुनते समय दर्शकों को अपने भीतर किसी दैवीय चेतना का अनुभव होता है और कई लोग दैवीय स्वर में झूमने लगते हैं। प्रीतम भरतवाण बेहद सौम्य व्यव्हार के विराट व्यक्तित्व के धनी पुरुष हैं, इनके व्यक्तित्व की खासियत है कि बचपन के ‘पिर्ति’ की विनम्रता अभी भी उनके व्यक्तित्व में ज्यों की त्यों विद्यमान है।

विरासत में मिली इस सभ्यता को अपने दादा और पिता की तरह ही श्री भरतवाण जी ने भी ढोल वादन को आगे बढ़ाया। मात्र 6 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने विरासत में मिले ढोल वादन और जागर गायन के अपने हुनर का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। उनके घर पर ढोल, डौर-थाली जैसे कई उत्तराखंडी वाद्य यंत्र हुआ करते थे। इसके साथ ही उनके घर में भी संगीत का मौहाल था। वह अपने पिता के साथ गाँव-घरों में गाए जाने वाले जागरों में संगत करने लगे।

लेकिन जागर प्रीतम भरतवाण के संगीत का सिर्फ़ एक पहलू है। अपने संगीत के माध्यम से उन्होंने पहाड़ के अनेक पहलुओं पर गीत लिखे और गाए हैं। ख़ासकर, लोक संगीत पर उनकी पकड़ बेहद मजबूत रही है। लोक जागर के अलावा उन्होंने पहाड़ के दुरूह जीवन का चित्रण करते और पहाड़ से पलायन का दर्द भी अपने गीतों के माध्यम से बयाँ किया है।

अपने बेहद प्रचिलित गीत ‘आज कुजणी किलैई, गौं की याद आणि चा’ में उन्होंने पहाड़ से दूर रहने वाले व्यक्ति की पीड़ा को रखा है। ‘हम कुसल छौं माजी दगड्यून दगड़ी’ गाना सीमा पर तैनात सेना के जवानों की मनोस्थिति पर लिखा और गाया है। इसके अलावा उन्होंने ‘घुट-घुट बाडुलि लगिगे’ जैसे ‘खुदेड़’ लोकगीत भी गाए हैं। ‘धनुली मेरु जिया लगिगे’ और ‘सुंदरा छोरी’ प्रेम मनुहार वाले गाने हैं।

भले ही उनकी पहचान ‘जागर सम्राट’ की है, लेकिन वे गायकी की हर विधा के धनी हैं। अनेक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय संस्थाएँ प्रीतम भरतवाण को सम्मानित कर चुकी हैं, फिर भी एक अटल तपस्वी की भाँति वे निर्विकार संगीत साधना में लीन हैं।

प्रीतम भरतवाण के प्रयासों का ही नतीजा है कि कभी ‘औजी’ या दास (ढोलवादक) समुदाय तक सीमित रहे जागर आज न केवल समाज के सभी वर्गों में सुने और गाए जाते हैं, बल्कि उन्हें पूरा सम्मान भी दिया जाता है। उनकी इन उपलब्धियों के लिए ही भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित करने का निर्णय लिया।

जागर’ क्या है?

‘जागर’ का अर्थ सामान्य शब्दों में ‘जागृत करना’ होता है। उत्तराखंड में ग्राम्य देवताओं का विशेष महत्त्व रहा है और उनकी पूजा की जाती है, जैसे नरसिंह, गंगनाथ, गोलु, भनरीया, काल्सण आदि। कुछ देवताओं को स्थानीय भाषा में ‘ग्राम्य देवता’ कहा जाता है। ग्राम्य देवता का अर्थ गाँव का देवता है। उत्तराखंड की जाति और जनजातियाँ इन्हीं देवताओं को जगाने हेतु ‘जागर’ लगाते हैँ। जागर में ‘जगरिया’ मुख्य पात्र होता है जो रामायण, महाभारत आदि धार्मिक ग्रंथों से होते हैं। इसी जागर मंचन (जैसे देवी/देवता ऊर्जा रूप में शरीर में आ गए हों) के साथ ही जिस देवता का आवाह्न करना होता है, उस देवता के चरित्र को स्थानीय भाषा में वर्णन करता है। ‘औजी’ ढोल-दमाऊँ बजाने के साथ-साथ जगरीया हुड्का (हुडुक) कहानी गाता है।

प्रीतम भरतवाण संक्षिप्त परिचय :

प्रीतम भरतवाण उत्तराखंड के टिहरी जिले के जौनपुर विकासखंड के सिला गाँव के रहने वाले हैं। इस संगीत सम्राट का जन्म और बचपन बहुत कठिनाई में गुजरा है । प्रीतम का जन्म एक ‘औजी’ परिवार में हुआ है, जिस कारण लोक संगीत उन्हे विरासत में मिला है।

वर्ष 2000 के बाद से उत्तराखंड राज्य की अलग से स्थापना के बाद कुछ हद तक यहाँ की दूरस्थ जाति-जनजातियों को पहचान मिलनी शुरू हुई। हालाँकि, एक सत्य यह भी है कि तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उत्तराखंड राज्य पलायन जैसे अभिशाप जीने के लिए मजबूर है, जब गाँव ही नहीं रहे तो सभ्यताएँ किस तरह से जीवित रहेंगी, यह वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती है।

प्रीतम भरतवाण के दादा और पिता भी जाने-माने ढोल वादक थे, जिन्होंने पूरा जीवन सरस्वती की साधना में लगाया। जागरों, लोकगीत और पंवाणों के ज्ञाता श्री भरतवाण जी को उत्तराखंड के लोक संगीत में  उल्लेखनीय योगदान देखते हुए विगत वर्ष उन्हें उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय (UOU) हल्द्वानी, कुमाऊँ ने (डॉक्ट्रेट) मानद उपाधि से गवर्नर के हाथों सम्मानित किया है।

प्रीतम की शुरूआती शिक्षा गाँव के पास ही एक विद्यालय में हुई। संगीत के प्रति रूझान और उनकी कला की पहचान सबसे पहले स्कूल में ‘रामी-बारौणी’ नाटक में बाल आवाज़ देने से हुई। उन्होंने मसूरी के एक नृत्य-नाटक में डांस किया, जिसके बाद स्कूल के शिक्षकों की उन पर नज़र पड़ी और वे उनका हुनर पहचान गए। इसके बाद तो उन्हें स्कूल के हर कार्यक्रम में गाने का मौका मिलने लगा। सबसे ख़ास बात यह रही कि मात्र 12 साल की उम्र में ही उन्होंने लोगों के सामने जागर गाना शुरू कर दिया था। उनके जीजाजी और चाचाजी से उन्हें जागर गाने के लिए प्रोत्साहित किया और वे उन्हें इसका पूरा श्रेय देते हैं।

उनकी सादगी का परिचय इसी बात से मिलता है कि जब उत्तराखंड के महामहिम राज्यपाल, श्रीमती बेबी रानी मौर्य द्वारा उन्हें मानद उपाधि भेंट की गई तो उनके शब्द थे, “मैं अपने पूर्वजों तथा जागर, पंवाणों, ढोल सागर, ढोल दमों, हुड़का, डौंर, थाली को एवं अपने सम्मानीय श्रोताओं, शुभचिंतकों, मार्गदर्शकों को कोटिशः नमन करता हूँ।”

उत्तराखंड की राज्यपाल द्वारा डॉक्ट्रेट उपाधि ग्रहण करते हुए लोकगायक प्रीतम भरतवाण

स्थानीय स्तर पर गायकी और ढोल वादन को सराहना मिली तो प्रीतम भरतवाण  ने 1988 में आकाशवाणी के लिए गाना शुरू कर दिया। 4 साल बाद उनका पहला ऑडियो एल्बम ‘रंगीली बौजी’ बाजार में आया, जिसे खूब पसंद किया गया। इसके बाद प्रीतम ने एक के बाद एक तौंसा बौ, पैंछि माया, सुबेर, सरूली, रौंस, तुम्हारी खुद, बाँद अमरावती जैसे सुपरहिट एलबम निकाले। अब तक 50 से अधिक एल्बम में वे 350 से ज्यादा गाने गा चुके हैं।

एक ‘लाइव’प्रोग्राम के दौरान प्रीतम भरतवाण

प्रीतम भरतवाण से पहले वर्ष 2017 में जागर को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए बसन्ती बिष्ट को भी पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। कई वर्षों से समाज और सरकारों की उपेक्षा और संसाधानों के अभाव से दास समुदाय ढोल और दमाऊँ बजाने से परहेज कर रहे थे। ऐसे मौके पर प्रीतम भरतवाण ने ढोल-दमाऊँ को बजाना शुरु किया और नई पहचान दिलाई। उम्मीद है कि भारत सरकार द्वारा उन्हें इस विधा के लिए पुरस्कृत करना औजी समुदाय के लिए प्रेरणा का कार्य करेगा और विलुप्त होती यह परम्परा एक बार फिर जीवित हो उठेगी।

इन दिनों भरतवाण जी पहाड़ी संस्कृति का झंडा अमेरिका में बुलंद कर रहे हैं। अपने अमेरिका प्रवास में वह ओहायो की सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी में अमेरिकियों को ढोल-दमाऊँ की बारिकियाँ सिखा रहे हैं।

किसानों को ₹6680 करोड़ का राहत पैकेजः मोदी सरकार ने दी स्वीकृति

मोदी सरकार ने किसानों को बजट से पहले बड़ा तोहफ़ा दिया है। सरकार ने चार राज्यों में किसानों के लिए ₹6680 करोड़ के राहत पैकेज को मंजूरी दे दी है। इसका लाभ आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसानों को मिलेगा। कुल रकम में से आंध्र प्रदेश के लिए ₹900 करोड़, गुजरात के लिए ₹130 करोड़, महाराष्ट्र के लिए ₹4700 करोड़ जबकि कर्नाटक के लिए ₹950 करोड़ का पैकेज दिया गया है।

बता दें की इन राज्यों में सूखे की समस्या से किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ा है, और अब सरकार के इस पैकेज से किसानों को राहत मिलने की आशा है। सरकार छोटे एवं सीमांत किसानों की आय में कमी की समस्या को समाप्त करने की हर संभव कोशिश कर रही है।

बजट में भी किसानों को मिल सकती है बड़ी राहत

बिचौलियों के चलते किसानों को काफ़ी नुकसान उठाना पड़ता है। तमाम कोशिशों के बावजूद भी उन्हें लाभ तो क्या लागत की रकम भी नहीं मिल पाती है। सरकार इसे लेकर गंभीर है। रिपोर्ट की मानें तो बजट में किसानों के खातों में डायरेक्ट कैश ट्रांसफर करने की योजना के बारे में विचार किया जा रहा है। इसके जरिए किसानों को अलग-अलग योजनाओं के जरिए सब्सिडी न देते हुए पूरा पैसा एक साथ सीधे उनके खाते में डाला जाएगा जो उनके लिए ज्यादा फायदेमंद साबित होगा। बता दें कि सरकार हर साल विभिन्न योजनाओं के तहत प्रत्येक किसान को सालाना ₹15,000 की सब्सिडी देती है।

FDI पर मोदी सरकार की उपलब्धिः 18% तक बढ़ा विदेश निवेश

विदेशी निवेश को लेकर गंभीर मोदी सरकार को एक और उपलब्धि हासिल हुई है। भारतीय रजर्व बैंक (RBI) ने रिपोर्ट जारी करते हुए बताया है कि भारत में वित्त वर्ष 2017-18 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में 18% बढ़ा है। अब निवेश की रकम बढ़कर ₹28.25 लाख करोड़ हो गई है। रिपोर्ट की मानें तो बीते वित्त-वर्ष के दौरान देश में सबसे ज्यादा निवेश मॉरीशस से 19.7% रहा।

आरबीआई के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017-18 में भारतीय प्रत्यक्ष निवेश कंपनियों की परिसंपत्तियों और विदेशी देनदारियों की गणना ₹4,33,300 करोड़ बढ़कर ₹28,24,600 करोड़ पहुँच गया, इसमें पिछले निवेशों का नया मूल्यांकन भी शामिल है।

बता दें कि, आरबीआई के मुताबिक हाल में 23,065 कंपनियों ने निवेश से जुड़े पूछे गए सवालों का जवाब दिया, जिसमें से 20,732 कंपनियों ने मार्च 2018 में अपनी बैलेंसशीट में एफडीआई या ओडीआई निवेश को दर्शाया है। इस दौरान भारतीय कंपनियों का विदेशों में निवेश (ओडीआई) 5% बढ़कर ₹5.28 लाख करोड़ हो गया।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में मॉरीशस (19.7%) के साथ पहले स्थान पर रहा। जबकि अन्य पर क्रमशः अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर और जापान का स्थान है। दूसरी तरफ भारतीय कंपनियों के विदेश में निवेश के मामले में 17.5% के साथ सिंगापुर सबसे प्रमुख स्थान रहा। विदेशी निवेशकों ने विनिर्माण क्षेत्र में सबसे अधिक निवेश किया। इसके अलावा सूचना एवं दूरसंचार सेवाओं, वित्तीय एवं बीमा गतिविधियाँ एफडीआई पाने वाले अन्य प्रमुख क्षेत्र रहे हैं।

क्या है एफडीआई?

जब कोई कंपनी दूसरे देश में निवेश करती है तो उसे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) कहा जाता है। ऐसे निवेश से निवेशकों को दूसरे देश की उस कंपनी के प्रबंधन में कुछ हिस्सा हासिल हो जाता है, जिसमें उसका पैसा लगता है। आमतौर पर किसी निवेश को (FDI) का दर्जा दिलाने के लिए कम-से-कम कंपनी में विदेशी निवेशक को 10% शेयर खरीदना पड़ता है।

दरअसल, यह सीधा और दीर्घावधि का निवेश होता है। बता दें कि वर्तमान सरकार ने रक्षा, दवाई, नागरिक उड्डयन एवं खाद्य सामग्री के क्षेत्र में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दे रखी है।

एफडीआई से देश को क्या होता है फ़ायदा

जब कोई कंपनी देश में निवेश करती है तो वह केवल आर्थिक लाभ नहीं पहुँचाती है बल्कि उसके साथ कई प्रकार के अप्रत्यक्ष लाभ होते हैं। जब वह किसी दूसरे देश में निवेश करती है तो पूँजी के साथ आधुनिक तकनीक भी देश में लाती हैं, जिससे देश को दोहरा लाभ मिलता है।

बता दें कि, आज अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों की अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का एक कारण एफडीआई भी है। विदेशी निवेश से उत्पादन के क्षेत्र में बेहतर तकनीक भी आती है, जिससे वाणिज्य एवं कृषि-उत्पाद का विकास होता है और रोज़गार के अवसर भी बढ़ते हैं।

‘परीक्षा पे चर्चा’ के दौरान PM ने विद्यार्थियों, अभिभावकों, शिक्षकों को दिए स्ट्रेस मैनेजमेंट टिप्स

आमतौर पर एग्जाम फ़रवरी और मार्च के महीने में ही होते हैं और जैसे ही ये महीने क़रीब आते हैं, दसवीं और बाहरवीं की परीक्षा देने वाले छात्रों के साथ अभिभावकों की भी धड़कनें तेज़ होने लगती हैं। ऐसे में ज़रूरत होती है कि कोई उनका डर दूर कर हौसला बढ़ाए। आज प्रधानमंत्री ने बच्चों से परीक्षा पर चर्चा कर उनका और उनके अभिभावकों का भी डर दूर करने की कोशिश की।

पीएम मोदी वैसे तो ‘मन की बात’ के माध्यम से छात्र-छात्राओं को हमेशा से ही प्रेरित करते रहें हैं। लेकिन आज उन्होंने देश की राजधानी में ‘परीक्षा पे चर्चा’ के दूसरे संस्करण में लगभग 2000 विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों के साथ संवाद किया।

जैसा कि हम जानते हैं बोर्ड की परीक्षा में अब दो महीने से भी कम समय बचा है। ऐसे में प्रधानमंत्री ने बच्चों के साथ बात करते हुए उन्हें बताया और समझाया कि किस तरह से परीक्षा के प्रेशर को ख़ुद को बाहर निकालकर बेहतरीन प्रदर्शन किया जा सकता है।

तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित हुए इस समारोह पहली बार देश के अलग-अलग हिस्सों से आए छात्रों के साथ उनके अभिभावकों ने भाग लिया। इस समारोह में 24 राज्यों और संघ शासित प्रदेशों से प्रतिभागी शामिल हुए। मानव संसाधन विकास मंत्रालय अनुसार इस समारोह देश के अलग-अलग राज्यों से क़रीब 675 छात्रों के साथ दिल्ली के स्कूलों के हज़ारों बच्चे भी शामिल हुए थे।

उन्होंने इस चर्चा में कई छात्रों के सवालों का लाइव ज़वाब भी दिया। उन्होंने इस चर्चा में बच्चों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए विचारों की स्पष्टता और दृढ़ विश्वास की आवश्यकता होती है। आज देश में अवसर की कमी नहीं, भारत व्यापक संभावनाओं से भरा है।

भारत ने जापान को स्टील उत्पादन में पछाड़कर हासिल की दूसरी रैंक

भारत ने जापान को पीछे छोड़ते हुए स्टील उत्पादन में दूसरी रैंक हासिल कर ली है। जबकि चीन कच्चे इस्पात का उत्पादन करने के मामले में 51% शेयर के साथ पहले स्थान पर बना हुआ है। वर्ल्ड स्टील एसोसिएशन (वर्ल्ड स्टील) ने नई रिपोर्ट साझा करते हुए इसकी जानकारी दी।

रिपोर्ट की मानें तो, चीन का कच्चा इस्पात उत्पादन 2018 में 6.6% बढ़कर 928.3 मिलियन टन पर पहुँच गया है। जबकि, 2017 में यह 870.9 मीट्रिक टन था। उत्पादन के मामले में चीन का हिस्सा 2017 में 50.3% था, जो अब बढ़कर 51.3% हो गया।


जापान से आगे निकला भारत

रिपोर्ट की माने तो भारत का कच्चे इस्पात का उत्पादन 2018 में 4.9% बढ़कर 10.65 करोड़ टन रहा, जो 2017 में 10.15 करोड़ टन था। जापान का उत्पादन इस दौरान 0.3% घटकर 10.43 करोड़ टन पर रह गया, जिसके चलते भारत दूसरे स्थान पर पहुँच गया। रिपोर्ट में जानकारी दी गई है कि, 2018 में वैश्विक इस्पात उत्पादन 4.6% बढ़कर 180.86 करोड़ टन रहा, जो 2017 में 172.98 करोड़ टन था।

बता दें कि, टॉप 10 इस्पात उत्पादक देशों में अमेरिका 8.67 करोड़ टन के साथ चौथे स्थान पर है। वहीं दक्षिण कोरिया (7.25 करोड़ टन के साथ) 5वें, रूस (7.17 करोड़ टन के साथ) 6वें, जर्मनी (4.24 करोड़ टन के साथ) 7वें, तुर्की (3.73 करोड़ टन के साथ) 8वें, ब्राजील (3.47 करोड़ टन के साथ) 9वें और ईरान (2.5 करोड़ टन के साथ) 10वें स्थान पर आता है।

जावेद अख़्तर : स्क्रिप्ट-राइटर और गीतकार से लेकर ट्रोल तक का सफ़र

जावेद अख़्तर- एक ऐसा नाम, जिसने कई ऐतिहासिक बॉलीवुड फ़िल्मों की स्क्रिप्ट, कहानी और स्क्रीनप्ले लिखा। एक ऐसा नाम, जिसने सलीम खान के साथ जोड़ी बना कर अमिताभ बच्चन की सफलता को नया आयाम दिया, महानायक के सुपरस्टारडम को विस्तार दिया। एक ऐसा नाम, जिसने अपनी कालजयी लेखनी से फ़िल्मी गानों में अर्थ डाले- दर्द, दवा, ज़िंदगी लेकर युद्ध, शांति और प्यार तक को शब्दों के जाल में बुन कर आवाम तक पहुँचाने का काम किया। लेकिन, अब समय बदल गया है। जावेद अख़्तर ने एक बार फिर से अपना रोल बदल लिया है।

फ़िल्मों के स्क्रिप्ट लिखने से अपने करियर की शुरुआत करने वाले अख़्तर ने बाद में गीतकार की भूमिका चुनी और सफल हुए। नवंबर 2009 में उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया गया। संसद में उनकी उपस्थिति मात्र 53% रही जो 78% के राष्ट्रीय औसत से काफ़ी कम रही। आज ट्विटर पर हर एक बहस में जबरन कूद कर अपनी ही इज्ज़त उछालने वाले अख़्तर ने अपने 6 वर्ष के संसदीय कार्यकाल में एक भी प्रश्न नहीं पूछे। इसके बाद अब वह ताज़ा किरदार में आ गए हैं। उन्होंने अपने लिए सोशल मीडिया ट्रोल की भूमिका ढूँढ ली है।

जावेद अख़्तर ट्विटर पर लोगों से ऐसे लड़ते हैं, जैसे वह सेलिब्रिटी न होकर कोई सड़क छाप रंगदार हों। जावेद अख़्तर की सोच कल भी वही थी, आज भी वही है। जब-जब भाजपा की सरकार आती है, उनके अंदर का विद्रोही कीड़ा कुलबुलाने लगता है और फिर जावेद साहब उलूलजलूल बयानों की शरण में उतर आते हैं। ट्विटर ट्रोल के किरदार में फ़िट बैठ रहे जावेद अख़्तर की सोच को समझने के लिए हमें 2002 में जाना होगा जब देश में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार चल रही थी।

उस दौरान जावेद अख़्तर की भाषा वही थी जो आजकल सक्रिय तथाकथित लिबरल और सेक्युलर लोगों की है। उस दौरान जावेद अख़्तर ने एक साक्षात्कार में कहा था कि राजनीतिक विरोधियों, असंतुष्टों और अल्पसंख्यकों को हाशिये पर रखने के प्रयास किए जा रहे हैं। यही वही भाषा है जो कश्मीरी UPSC टॉपर शाह फ़ैसल बोलते हैं। उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा देते वक़्त कहा कि हिंदुत्व ताक़तों से 20 करोड़ मुस्लिमों को हाशिये पर भेज दिया है। जब-जब भाजपा की सरकार आती है- यह राग इतनी बार आलापा जाता है कि आपके कान ख़राब हो जाएँ।

उसी इंटरव्यू में जावेद अख़्तर ने बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद को आतंकवादी संगठन बताया था। अब जावेद अख़्तर के इतिहास से उनके वर्तमान पर आते हैं। हमें यह देखना होगा कि सोशल मीडिया में वह जिस तरह की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, क्या उन्होंने ऐसी भाषा अपनी लिखी फिल्मों या गानों में प्रोग की है क्या? जावेद अख़्तर ने ऑपइंडिया अंग्रेजी की सम्पादक नुपुर शर्मा से बहस करते ट्विटर पर लिखा:

“जब भी ये नफ़रत की सौदाग़र मुझे कोई असभ्य सन्देश भेजेगी, मैं भी जवाब में एक असभ्य लेकिन अधिक मज़ाकिया प्रत्युत्तर के साथ वापस आऊँगा।”

जावेद अख़्तर के लिए उनके ट्वीट में व्याकरण की त्रुटियाँ निकालना ‘असभ्य’ है, वो भी उस ट्वीट में, जिसमे वह ख़ुद बहसबाज़ी में तल्लीन होकर सामनेवाले की मानसिकता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहे हों। इतना ही नहीं, ट्विटर ट्रोल की हर एक परिभाषा में फ़िट बैठने के लिए शायद उन्होंने कोई ख़ास प्रशिक्षण ले रखा है। अपने-आप को नास्तिक कहने वाले जावेद अख़्तर को जब इस बात की याद दिलाई गई कि केवल भारतीय धर्मों में नास्तिकों के लिए स्थान है, तो वह बिफ़र उठे। उन्हें बस यह सवाल पूछा गया था कि इस्लाम में नास्तिकों के साथ क्या किया जाता है? इस बात पर उन्होंने मज़ाक बनाते हुए दाभोलकर, पनसारे और कलबुर्गी का नाम लिया।

किसी की व्यक्तिगत राय अलग हो सकती है। यह तब तक स्वीकार्य है, जब तक वह राय व्यक्तिगत रहे, उसे किसी पर जबरन थोपने की कोशिशें न की जाए। जावेद अख़्तर हर उस व्यक्ति से लड़ पड़ते हैं जो उनकी विचारधारा, बयानों और सोच से मतभेद प्रकट करता है।

पिछले वर्ष अप्रैल में उन्होंने राष्ट्रीय जाँच एजेंसी NIA को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया था। मक्का मस्ज़िद मामले में NIA पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा था कि एजेंसी के पास विधर्मी विवाहों की जाँच करने के लिए दुनियाभर का समय है।

जावेद अख़्तर एक ऐसे ट्विटर ट्रोल के रूप में विकसित होकर उभरे हैं कि अगर हम उनके सारे ऐसे ट्वीट्स की पड़ताल करने बैठ जाएँ तो इस पर पूरी की पूरी पुस्तक लिखी जा सके। इसीलिए उसके ट्वीट्स से ज़्यादा उनकी दिन पर दिन विकृत होती जा रही मानसिकता, संकुचित होती जा रही सोच और फूहड़ होते जा रहे बयानों की चर्चा करना उचित रहेगा।

जावेद अख़्तर को जिस सरकार के कार्यकाल में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होता नज़र आ रहा था, उसी सरकार द्वारा उन्हें 1999 में पद्म श्री से नवाज़ा गया था। उसी सरकार के कार्यकाल में उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले। यह विरोधाभाषी है। 1971 से ही फ़िल्मों में सक्रिय अख़्तर को क़रीब 30 वर्ष बाद पहली बार पद्म पुरस्कार मिला, उसी पार्टी के कार्यकाल में, जिसके सत्ता में आते वो एक ट्रोल का रूप धारण कर लेते हैं।

जावेद अख़्तर से उनकी लिखी फ़िल्मों और गानों का फैन उनसे यही विनती करेगा कि कृपया एक ट्रोल की तरह व्यवहार करना बंद कर दें। आप सोशल मीडिया पर सक्रिय रहें, ख़ूब वाद-विवाद करें, संसद में जो मौका अपना गँवाया था, उसे ट्विटर पर धरे रखें। लेकिन, जो भाषा आप अपने गीतों में इस्तेमाल करते रहे है, जो भाषा आपकी लेखनी में झलकती है- उसी शालीन भाषा का उपयोग करें। गली के आवारा बदमाशों वाली भाषा आपको शोभा नहीं देती।