Home Blog Page 6127

परमादरणीय रवीश कुमार! अपना ‘कारवाँ’ रोक दीजिए, आपको हिंदी पत्रकारिता का वास्ता

पिछले साल ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह पर झूठे आरोप लगाने के बाद जय शाह द्वारा दायर मानहानि याचिका पर न्यायलय की फटकार खा चुके ‘द वायर’ और जस्टिस लोया की मौत को संदिग्ध मानने की आशंका को सुप्रीम कोर्ट द्वारा नकारने के बावज़ूद उसे ‘साज़िश’ ठहराने के अथक प्रयास करने वाली ‘कारवाँ’ मैगज़ीन का हवाला देकर सत्यान्वेषी पत्रकार, यानि रवीश कुमार आदतानुसार एक बार फिर जनता के सामने सनसनी बनकर आए हैं।

इस बार ‘The D-Companies’ शीर्षक के साथ ‘कारवाँ’ ने  NSA अजीत डोभाल के बेटे पर आरोप लगाते हुए लिखा है, “NSA अजीत डोभाल के बेटे विवेक पर बड़ा खुलासा, कालेधन का कारोबार करने वाले देश में बनाई कंपनी”।

रवीश कुमार ने इस पत्रिका का ज़िक्र देते हुए अपने फ़ेसबुक पेज पर लिखा है, “डी-कंपनी का अभी तक दाऊद का गैंग ही होता था। भारत में एक और डी कंपनी आ गई है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और उनके बेटे विवेक और शौर्य के कारनामों को उजागर करने वाली ‘कारवाँ’ पत्रिका की रिपोर्ट में यही शीर्षक दिया गया है। साल दो साल पहले हिन्दी के चैनल दाऊद को भारत लाने के कई प्रोपेगैंडा प्रोग्राम करते थे। उसमें डोभाल को नायक की तरह पेश किया जाता था। किसने सोचा होगा कि 2019 की जनवरी में जज लोया की मौत पर 27 रिपोर्ट छापने वाली कैरवां पत्रिका डोभाल को डी-कंपनी का तमगा दे देगी।”

‘कारवाँ’ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि अजीत डोभाल के बेटे विवेक डोभाल की कंपनी में काम करने वाले कई अधिकारी शौर्य डोभाल की कंपनी में काम करते हैं। पत्रिका ने लिखा है कि इसका मतलब यह हुआ है कि कोई बहुत बड़ा फाइनेंशियल नेटवर्क चल रहा है और यह भी दावा किया गया है कि यह हेरफ़ेर नोटबंदी के बाद की गई है।

रवीश कुमार ने लिखा है, “कौशल श्रॉफ नाम के एक खोजी पत्रकार ने अमरीका, इंग्लैंड, सिंगापुर और केमैन आइलैंड से दस्तावेज़ जुटा कर डोभाल के बेटों की कंपनी का ख़ुलासा किया है। कारवाँ पत्रिका के अनुसार, “ये कंपनियाँ ‘हेज फंड’ और ‘ऑफशोर’ के दायरे में आती हैं। ‘टैक्स हेवन’ वाली जगहों में कंपनी खोलने का मतलब ही है कि संदिग्धता का प्रश्न आ जाता है और नैतिकता का भी।”

हालाँकि, इस बात की प्रामाणिकता पर अभी प्रश्न चिन्ह ही हैं। क्योंकि कारवाँ पत्रिका का सनसनीखेज ख़ुलासों का इतिहास अगर देखा जाए तो शायद ही उनका कोई दावा और आरोप कभी सच साबित हुआ हो। बताना चाहूँगा कि पिछली तमाम सनसनीखेज़ ख़बरों के अनुसार ही ‘कारवाँ’ पत्रिका का यह भी अभी तक एक नया सनसनी भरा शीर्षक मात्र ही है, लेकिन ख़ास बात यह है कि ‘द वायर‘ जैसे प्रोपैगेंडा-परस्त मीडिया गिरोहों और रवीश कुमार ने इसे हाथों-हाथ लेकर न्यायाधीश होने की अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर ली है।

कारवाँ पत्रिका के इस आरोप का ख़ुलासा होना अभी बाकी है। इस पत्रिका और इसके अन्य गिरोह का पिछला रिकॉर्ड देखकर ही इनकी विश्वसनीयता का मूल्यांकन किया जा सकता है और उनकी विश्वसनीयता के चलते यह अभी ख़बरों के बाज़ार में एक अफ़वाह से ज्यादा कुछ नहीं है। लेकिन बावज़ूद इसके, हिंदी पत्रकारिता के एक बड़े स्तम्भ (खोखले ही सही) माने जाने वाले रवीश कुमार की दिलचस्पी इस ख़बर में देखी गई है और उन्होंने इसे बहुत तत्परता से लिया भी है और अब इसके प्रचार में भी लगे हैं।

अपने पिछले तमाम एजेंडों में मोदी सरकार और उससे सम्बंधित पदाधिकारियों को नीचा दिखाने और अपमानित करने के तमाम नाकाम प्रयासों के बाद रवीश कुमार एक बार फिर से एक काल्पनिक वाकया लेकर जनता के सामने आए हैं। हर बार की तरह ही इस बार भी NDTV उनके लगाए गए आरोपों को उनके व्यक्तिगत मत होने का एक ‘डिस्क्लैमर’ अंत में लगा देता है। जिसका सीधा सा मतलब है कि यह एक और ‘ट्रायल बेस्ड’ एजेंडा है जिसका उद्देश्य सिर्फ़ और सिर्फ़ ऐसी अल्पकालीन क्षति पहुंचाना है जिसके दूरगामी नतीज़े निकल सकें। यानि, साँप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे।

रवीश के लेख के साथ NDTV वेबसाईट द्वारा दी गई सूचना

गौर करने की बात है कि अगर महाशय के पिछले 4 साल के रिकॉर्ड में देखें, तो रवीश कुमार ने ‘द वायर’, ‘स्क्रॉल’, ‘ऑल्ट’ और ‘कारवाँ’ जैसे तमाम फ़र्ज़ी ख़बरों द्वारा अपना नेटवर्क बनाने वाले मीडिया गिरोहों के कंधे पर बन्दूक रखकर सरकार के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा चलाने की भरपूर कोशिश में लगे हुए हैं, फिर चाहे उनके बाग़ों में बहार का प्रश्न हो या फिर हिंदी पत्रकारिता को ज़लील करने के उद्देश्य से लिखे गए उनके कुंठा से भरे हुए कटाक्ष।

एक ओर जहाँ रवीश कुमार ने ही पत्रकारिता में ‘प्रोपेगेंडा’ और ‘गोदी मीडिया’ जैसे नामकरण कर लोगों को TV कम देखने और ज्यादा पढ़ने के लिए प्रेरित किया, वहीं दूसरी ओर सच्चाई यह रही है कि उनके पिछले तमाम लम्बे-लम्बे लेख और ब्लॉग, जो कि राजनीतिक विरोधाभासों के कारण पढ़ने और सुनने में अच्छे (सत्संगी प्रवृत्ति के) भी महसूस होते हैं, लिखे और प्रशंसकों ने उन्हें हाथों-हाथ खूब ‘व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी’ से लेकर सोशल मीडिया पर प्रचारित भी किया, एक तरफ से झूठे और प्रोपैगेंडा मात्र साबित होते आए हैं।

रवीश कुमार द्वारा चलाए गए पिछले कुछ किस्सों में जस्टिस लोया मर्डर केस ने लोगों का सबसे अधिक ध्यान बटोरा, जिस पर कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही फ़ैसला भी सुना चुका था। लेकिन अपनी ‘खोजी’ और सत्यान्वेषी प्रवृति से मजबूर रवीश कुमार ने उसमें भी नए मोड़ खोजने के भरसक प्रयास किए।

जय शाह मामला:

इसके बाद रवीश कुमार भाजपा पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह को लेकर न्यूज़ पोर्टल ‘द वायर’  के माध्यम से आरोप लगाते हैं कि उन्होंने ज़रूरत से ज्यादा धन कमाया है। जय अमित शाह ने संपत्ति की स्टोरी करने वाली ‘द वायर’ वेबसाइट के संपादक समेत 7 लोगों के खिलाफ अहमदाबाद कोर्ट में आपराधिक मानहानि का केस दायर कर दिया था।

जय शाह ने बयान देते हुए कहा था, “लोगों के मन में ऐसी छवि बनाने की कोशिश की गई कि मेरे व्यवसाय में सफलता मेरे पिता अमित शाह की राजनीतिक हैसियत की वजह से है। मेरा व्यवसाय पूरी तरह से कानून का पालन करता है, जो कि मेरे टैक्स रिकॉर्ड और बैंक ट्रांजेक्शन से पता चलता है।”

उस वक़्त सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ की 3 सदस्यीय खंडपीठ ने इस याचिका पर टिप्पणी की थी कि मीडिया को और अधिक जिम्मेदार होना चाहिए और वह किसी भी व्यक्ति के बारे में जो मन में आए नहीं लिख सकता है। प्रधान न्यायाधीश ने बार-बार यह दोहराया कि वह पेश मामले के संदर्भ में टिप्पणियाँ नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कई बार तो पत्रकार इस तरह से लिखते हैं, जो न्यायालय की अवमानना होता है।

तत्कालीन CJI दीपक मिश्रा ने कहा था, “मैंने कई बार बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में कहा है। हम मीडिया पर अंकुश लगाने नहीं जा रहे। मीडिया पर अंकुश लगाने का सवाल ही नहीं उठता, परन्तु प्रेस को और अधिक ज़िम्मेदार होना चाहिए।”

मानहानि मामले में न्यायलय ने न्यूज़ पोर्टल ‘द वायर’ की मानहानि के ख़िलाफ़ याचिका इस आधार पर निरस्त कर दी थी कि ‘गोल्डन टच ऑफ़ जय अमित शाह‘ शीर्षक से प्रकाशित लेख वास्तव में ‘मानहानिकारक’ है और निचली अदालत को इस मामले में आगे कार्यवाही करनी चाहिए।

जस्टिस लोया प्रकरण:

CBI के स्पेशल जज बीएच लोया की मौत की जाँच कराने की माँग करने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि इस मामले में कोई जाँच नहीं होगी, केस में कोई आधार नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि इस मामले के ज़रिए न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। साथ ही, जस्टिस लोया के बेटे अनुज ने मीडिया के सामने आकर स्पष्ट कहा था कि पिता की मौत को लेकर उन्हें किसी तरह का संदेह नहीं है और उनके परिवार का किसी पर आरोप भी नहीं है। अनुज ने ये भी कहा था कि वो इसे लेकर आगे किसी तरह की जाँच नहीं चाहते हैं।

फिर भी, सत्यान्वेषी पत्रकार को इसमें अपना व्यक्तिगत दृष्टिकोण डालने में कोई समस्या नहीं हुई। रवीश कुमार ने जज लोया के केस में हिंदी पत्रकारिता पर अपनी कुंठा निकालते हुए कहा कि हिंदी के अख़बार लोगों को कूड़ा परोस रहे हैं और उन्हें जस्टिस लोया की मौत पर ‘कारवाँ’ की रिपोर्ट पढ़नी चाहिए। रवीश कुमार ने कहा था, “कारवाँ के सच्चे और निडर पत्रकार कैसे जान पर खेल कर सच निकालते हैं, जज लोया की मौत की कहानी सुनकर आपका दिल दहल जाएगा।”

अब, जबकि जस्टिस लोया की मौत में किसी भी साज़िश को न्यायालय नकार चुका है, तो क्या आप स्पष्टीकरण देते हुए स्वीकार करेंगे कि हिंदी पत्रकारिता में अगर कोई कूड़ा परोस रहा है, तो वो कोई और नहीं बल्कि स्वयं आप हैं?

देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करते हुए जब आपके चैनल NDTV पर पठानकोट हमलों की कवरेज़ के दौरान संवेदनशील जानकारियाँ देने के आरोप में एक दिन का प्रतिबंध लगाया जाता है, तब आप अपनी ‘लप्रेक’ शैली का प्रयोग कर सवाल उठाते हैं कि ‘क्या बाग़ों में बहार है?’ आप इसे अघोषित आपातकाल ठहराते हैं और कहते हैं कि यह मीडिया की हत्या है।

क्या आदतानुसार बरगलाने वाले तथ्यों को लाकर लगातार ‘फ़ुट इन माउथ’ जैसे ज़ुमलों का शिकार होने के बावज़ूद रवीश कुमार को यह नहीं लगता है कि आज वो ख़ुद एक चलती-फिरती व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी बन चुके हैं? आज रवीश कुमार गोदी मीडिया के साथ-साथ ‘प्रोपैगेंडाबाज़’ और स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए आतंकवाद मात्र बनकर रह गए हैं। हालात ये हैं कि शायद दूसरों को टेलिविज़न कम देखने की सलाह देने वाले रविश कुमार खुद टेलिविज़न पर जासूसी और ‘साज़िशों’ से भरे धारावाहिक देखने के अभ्यस्त हो चुके हैं।

JNU प्रकरण के बाद आपने किस तरह अपने प्राइम टाइम और ब्लॉग के माध्यम से दोनों भटके हुए युवाओं को सान्निध्य और सराहना दी, यह भी छुपा हुआ नहीं है। फिर भी आप इस बात पर आए दिन माथा पीटते हुए देखे जाते हैं कि TRP नहीं आ रही है और मोदी जी लोगों की छतों पर जाकर आपके चैनल वाली केबल काट रहे हैं।

आप इसके बाद कहते हैं कि छोड़िए इस हिंदी मीडिया को यह सब गोदी मीडिया है, ‘कारवाँ’ पर जाकर पढ़िए कि अमित शाह के लड़के ने कितना ‘माल’ बनाया है। फिर आपकी इस सनसनी को भी न्यायालय नकार देते हैं।

अब आप एक बार फिरसे उसी ‘कारवाँ’ मैगज़ीन का हवाला देकर NSA अजीत डोभाल के बेटे पर आरोप लगा रहे हैं और इस देश के रिसोर्सेज़ को एक बार फिर से दिशा भटकने पर मजबूर किया है। आप हाईलाईट करना चाह रहे हैं कि विवेक डोभाल इस देश के नागरिक नहीं हैं, लेकिन, अगर विवेक डोभाल भारत देश के नागरिक ही नहीं हैं तो फिर आप क्यों विदेशियों के मामले में सिर खपाते हैं? आपको तो जा कर ब्रिटेन के न्यायालय का दरवाजा खटखटाना चाहिए।

रवीश जी! यह किस प्रकार का दोमुँहापन है, जिसमें आप कभी सुप्रीम कोर्ट और संविधान को माई-बाप बताते हैं और जब वही न्यायालय आपके तमाम सनसनी की चासनी में डूबे ‘प्रोपैगेंडों’ को नकारते हुए आपके मुताबिक़ निर्णय नहीं सुनाते हैं, तब आप तमाम संस्थाओं पर सवाल खड़ा कर देते हैं, और संस्थाओं के बिके हुए होने के साथ ही ‘लोकतंत्र की हत्या’ जैसे मुहावरे इजाद करते हैं।

यही न्यायालय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगों के लिए क्लीन चिट देते हैं, जस्टिस लोया की मृत्यु पर निर्णय देते हैं और UPA सरकार में हुए घोटालों पर भी निर्णय देते हैं। लेकिन आप केवल अपने पसंदीदा निर्णयों पर ही नाराज़गी ज़ाहिर नहीं करते हैं, जबकि और निर्णयों पर आप बवाल खड़ा कर देते हैं।

आप तमाशा खड़ा कर देते हैं और दूसरे पत्रकारों को बेझिझक ‘दरबारी मीडिया’ की संज्ञा दे देते हैं। क्या यह सही समय नहीं आ गया है कि आप अपनी ‘सत्यान्वेषी जिज्ञासाओं’ को एकांत में हिमालय पर जा कर शांत करें और देश की संस्थाओं का समय ख़राब ना करें? आपको मानना चाहिए कि आपके ऊपर उन्माद सवार हो गया है।

स्वयं को ही निष्पक्ष और सही ठहराने का यह उन्माद देश-हित और ख़ासकर पत्रकारिता के लिए ज़हरीला साबित हो रहा है। लोगों ने ख़बरों पर विश्वास करना बंद कर दिया है और दर्शक इस उन्माद के कारण अफ़वाह और सनसनी-परस्त होता जा रहा है।

आप कूड़ा पेश करते हैं, लोगों और संस्थाओं का समय बर्बाद करते हैं, मुद्दों से भटकाते हैं, कोर्ट में हारते हैं। आपको चिंतन की आवश्यकता है, सत्य की खोज के लिए देश में कई और संस्थाएं हैं और वो अपना काम बहुत बेहतर तरीके से कर रहे हैं।

आपको पढ़ते ही राँझना फ़िल्म का एक डायलॉग दिमाग में गूँजता है, “साँप के फन से **** मत खुजाइये, वर्ना सैप्टिक हो जाएगा”। हो सके तो अपने इस प्रोपैगंडा के कारवाँ को रोक दीजिए, क्या पता बाग़ों में बहार आ जाए।

पत्रकार हत्या मामले में राम रहीम को मिली उम्रक़ैद की सज़ा

आख़िरकार, 17 सालों बाद दिवंगत पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के परिवार को न्याय मिला। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम (Gurmeet Ram Rahim) सहित सभी चारों आरोपितों को पत्रकार मर्डर केस में उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई है और सज़ा के साथ-साथ सभी दोषियों पर 50-50 हज़ार रुपए का ज़ुर्माना भी लगाया गया है।

पत्रकार रामचंद्र छत्रपति जिनकी 2002 में हत्या कर दी गई थी

अदालत में राम रहीम की पेशी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए सम्पन्न हुई थी क्योंकि उसे अदालत तक लाना पुलिस के लिए चुनौतियों भरा हो सकता था। पुलिस ने ऐसा करना तभी कर लिया था जब उसकी गिरफ़्तारी हुई थी। उस दौरान कई राज्यों में भड़की हिंसा के दौरान 38 लोग मारे गए थे और 250 से भी अधिक लोग घायल हुए थे। आज पूरी सुनवाई के दौरान राम रहीम जस्टिस जगदीप सिंह के सामने हाथ जोड़े खड़ा रहा।

बताया जाता है कि दो महिलाओं ने 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र लिख कर राम रहीम के ख़िलाफ़ बलात्कार के आरोप लगाए थे और अपनी जान जाने के डर से नाम, पता नहीं लिखा था। पीएमओ (प्रधानमंत्री कार्यालय) ने इसे गंभीरता से लेते हुए सीबीआई को इसकी जाँच सौंप दी थी। पत्रकार छत्रपति ने इस गुमनाम चिट्ठी को अपने अख़बार ‘पूरा सच’ में छाप दिया और यही उनकी हत्या का कारण भी बना। राम रहीम के ख़िलाफ़ लिखने के लिए उसके गुर्गों ने छत्रपति को कई बार धमकियाँ भी दी थी।

हरियाणा के रहने वाले जगदीप सिंह मृदुभाषी हैं और जमीन से जुड़े हुए हैं। अतिरिक्त ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश रह चुके सिंह को 2018 में सीबीआई कोर्ट का जज नियुक्त किया गया था। इस से पहले साध्वी बलात्कार मामले में भी राम रहीम के ख़िलाफ़ इनके द्वारा ही फ़ैसला सुनाया गया था। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के वकील रह चुके जगदीप सिंह तब सुर्ख़ियों में आए थे जब उन्होंने सड़क दुर्घटना में घायल चार लोगों को समय पर अस्पताल पहुँचा कर उनकी जान बचाई थी

फ़िलहाल 51 वर्षीय राम रहीम रोहतक के एक जेल में 20 साल कारावास की सज़ा काट रहा है। उस पर उसके दो महिला अनुयायियों के साथ बलात्कार करने का आरोप है। 2002 में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के आरोप में अदालत ने उसके सहित तीन अन्य लोगों को दोषी ठहराया था। सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए उस समय भी उसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए ही अदालत में पेश किया गया था। आज उसकी सुनवाई से पहले ही पंचकूला अदालत परिसर से लेकर पूरे इलाक़े तक सुरक्षा काफी कड़ी कर दी गई थी।

प्रशांत भूषण बाबू, हुई गवा? करवा लियो बेइज्जती?

देश के संविधान में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को एक तरह से अंतिम सत्य माना गया है। लेकिन जब अंतिम सत्य पर ही संदेह के साथ सवाल खड़ा किया जाने लगेगा तो इस देश का क्या होगा?

इस तरह के दुष्प्रचार से कोर्ट के सम्मान को भी धक्का लगेगा। लेकिन यह अफ़सोस की बात है कि प्रशांत भूषण जैसे वरिष्ठ वकील सर्वोच्च न्यायालय के फै़सले पर संदेह करते हुए बेबुनियादी सवाल उठाते रहे हैं।

कोर्ट में कईयों बार जजों द्वारा फ़टकार लगाए जाने के बावजूद प्रशांत भूषण के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं देखने को मिला है। कोर्ट में प्रशांत भूषण इस तरह व्यवहार क्यों करते हैं? इस सवाल का सबसे बेहतर जवाब में मुझे एक कहावत याद आती है कि बच्चे और बूढ़े एक जैसे होते हैं।

दरअसल 16 जनवरी  को लोकपाल मामले में बहस के दौरान चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया ने प्रशांत भूषण को जमकर फटकार लगाई। चीफ जस्टिस ने प्रशांत भूषण नसीहत देते हुए चीजों को सकारात्मक तरीके से देखने की बात कही। लोकपाल मामले पर बहस के दौरान कोर्ट में जब प्रशांत भूषण ने सर्च कमिटी के उपर सवाल खड़ा किया तो चीफ़ जस्टिस ने तल्ख अंदाज में प्रशांत भूषण को ये जवाब दिया- “ऐसा लगता है आप जजों से भी ज्यादा जानते हैं।”

यह पहली बार नहीं हुआ जब कोर्ट में जजों से डाँट सुनने के बाद प्रशांत भूषण शांति से जाकर अपने सीट पर बैठ गए। ठीक उसी तरह जैसे डाँट पड़ने के बाद बच्चे शांत होकर घर के किसी कोने में दुबक जाते हैं।

इससे पहले भी नवंबर 2018 में जब राफ़ेल मामले पर कोर्ट में बहस चल रही थी, तो बीच में ही बच्चे की तरह बोलने के लिए खड़े होकर भूषण ने तीखी भाषा में जस्टिस से पूछा कि राफ़ेल की कीमत बताने से देश की सुरक्षा को आख़िर क्या नुकसान होगा?

प्रशांत भूषण के सवाल पूछने के इस अंदाज़ को देखकर सीजेआई ने चेतावनी देते हुए भूषण से कहा कि आपको जितना ज़रूरी हो, उतना ही बोलिए। सीजाआई के इस चेतावनी के बाद प्रशांत भूषण जाकर अपने सीट पर बैठ गए थे।

अपने संवैधानिक दायरे से बाहर जाकर कोर्ट के फैसले व न्यायपालिका के बारे में अनाप शनाप बयान देने की वजह से कई बार प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ कटेंप्ट ऑफ़ कोर्ट की याचिका भी दायर की गई है।

यही नहीं कोर्ट में प्रशांत भूषण के व्यवहार को देखते हुए वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने एक बार कहा था कि प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ अवमानना के केस चलना चाहिए। साल्वे ने अपने बयान में यह भी कहा था कि कोर्ट के वरिष्ठ जजों को भूषण को धक्के देकर कोर्ट से बाहर कर देना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल काउंसिल ब्राइबरी केस में प्रशांत भूषण के एनजीओ द्वारा दायर की गई याचिका को ख़ारिज करते हुए कहा था कि आपके ऊपर अवमानना का केस चलना चहिए। लेकिन कोर्ट अवमानना की केस नहीं चलाएगी क्योंकि आप इस लायक हैं ही नहीं। इसके बाद कोर्ट ने प्रशांत भूषण के एनजीओ पर झूठे मामले को हवा देने के लिए ₹25 लाख का जुर्माना लगाया था।  

प्रिय लम्पट बुद्धिजीवी गिरोह, भारत ने रोहिंग्या का ठेका नहीं ले रखा है

मोदी सरकार को लेकर शुरुआती समय से ही आलोचनाओं का हिस्सा बनाकर घेरा जाता रहा है, फिर चाहे वो देश के हित में ही क्यों न काम का रही हो। भारत में कुछ समय पहले तूल पकड़ने वाला रोहिंग्या लोगों से जुड़ा मामला भी इसी संगठित आलोचना का शिकार हो रहा है।

साल 2017 में अपने म्यांमार के दौरे के समय ही प्रधानमंत्री ने इस बात की घोषणा की थी कि वो रोहिंग्याओं के निर्वासन पर विचार कर रही है। इस बात पर विचार करने के दौरान ये नहीं तय किया गया था कि इन लोगों को म्यांमार भेजा जाएगा या फिर बांग्लादेश भेजा जाएगा, क्योंकि उस समय बांग्लादेश में पहले से ही लाखों की तादाद में रोहिंग्या शरणार्थी रह रहे थे और म्यांमार इन्हें स्वीकारने के लिए किसी भी हाल में तैयार नहीं था।

ऐसे में अब 2019 के शुरुआती महीने में निर्वासन के डर से क़रीब 1300 रोहिंग्या लोगों ने बांग्लादेश में पलायन किया है, जिसकी वजह से नई दिल्ली को और केंद्रीय सरकार को काफ़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। कई बुद्धिजीवियों ने मोदी सरकार द्वारा इस मामले पर विचार किए जाने को नकारात्मकता के साथ पेश करने का भी प्रयास किया है, अलज़लजीरा की वेबसाइट पर हाल ही में आई रिपोर्ट में SAHRDC के रवि नैय्यर ने बताया कि भारत में पिछले साल से रोहिंग्या वासियों के लिए रहना बेहद मुश्किल होता जा रहा है।

भारत मे लगातार औपचारिक गतिविधियों के नाम पर उनपर काग़ज़ी कार्रवाई से शोषण किया जा रहा है। उनका कहना है कि आँकड़ों के अनुसार जम्मू से त्रिपुरा और असम से पश्चिम बंगाल तक मे 200 से ज्यादा रोहिंग्या लोग ऐसे हैं जिन्हें पकड़ कर गिरफ़्तार किया गया है और सज़ा दी गई है। उनके अनुसार निर्वासन के डर से ही रोहिंग्या लोग बांग्लादेश की तरफ रुख़ कर रहे हैं, जहाँ पर पहले से ही लाखों के तादाद में शरणार्थी बसे हुए हैं।

अब सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत में अवैध ढंग से आए अप्रवासियों के लिए इतनी सहानुभूति दिखाने की उम्मीद आख़िर भारत से ही क्यों की जा रही है? जहाँ उत्तर-पूर्व में रह रहे 40 लाख अप्रवासियों के लिए पहले से ही नागरिकता क़ानून पर प्रक्रिया चालू हो, वहाँ पर और अलग से रोहिंग्या अप्रवासियों को देश मे रहने की अनुमति आख़िर क्यों दी जाए? 2017 के आँकड़ों के अनुसार भारत की जनसंख्या 1.339 बिलियन है, उस पर भी उनकी ज़रूरतों को न पूरा कर पाने का इल्ज़ाम अक्सर सरकार पर मढ़ दिया जाता है।

एक ओर तो भारत सरकार से नागरिकों के उत्थान की प्रक्रिया को और तेज़ करने की उम्मीद लगाई जाती है और वहीं दूसरी ही तरफ देशहित में सरकार के कड़े फ़ैसलों का विरोध भी जमकर किया जाता है। सवाल यह है कि भारत उन्हें क्यों रखे, किस आधार पर? बांग्लादेशियों के घुसपैठ से परेशान देश अभी भी नार्थ ईस्ट में स्थानीय नागरिकों से लगातार विरोध झेल रहा है। वहाँ एक तय योजना के अनुसार कुछ पार्टियों ने उन्हें वोट बैंक बनाने के लिए राशन और आधार कार्ड देकर बस्तियों में बसा दिया था, अब एक सरकार इन ग़ैरक़ानूनी लोगों को बाहर क्यों न करे?

बता दें कि भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रोहिंग्याओं को अवैध अप्रवासी बताते हुए उन्हें देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा बताया था। इस बात के पीछे सरकार का ये तर्क था कि म्यांमार के रोहिंग्या लोगों को भारत देश में रहने की अनुमति देने से हमारे अपने नागरिकों के हित काफी प्रभावित होंगे और देश में तनाव भी पैदा होगा।

इस मामले पर गृह मंत्रालय के अधिकारी मुकेश मित्तल ने अदालत को सौंपे गए जवाब में कहा था कि अदालत द्वारा सरकार को देश के व्यापक हितों में निर्णय लेने की अनुमति दी जानी चाहिए। उनका मत था कि कुछ रोहिंग्या, आंतकवादी समूहों से जुड़े हैं, जो जम्मू, दिल्ली, हैदराबाद और मेवात क्षेत्र में ज्यादा एक्टिव है, इन क्षेत्रों में इन लोगों की पहचान भी की गई है। इस मामले पर सरकार ने आशंका जताई थी कि कट्टरपंथी रोहिंग्या भारत में बौद्धों के ख़िलाफ़ भी हिंसा फैला सकते हैं।

ऐसी स्थिति में जब सरकार को रोहिंग्या घुसपैठियों पर संदेह हो, वह उन्हें भारत में रहने की अनुमति कैसे दे सकती है? क्या किसी और देश से इस प्रकार की उम्मीद की जा सकती है कि जहाँ आए दिन आतंकी हमलों की धमकी दी जा रही हो और फिर भी वह अपनी तरफ से कदम उठाने में सिर्फ इसलिए रुके क्योंकि राष्ट्रीय स्तर के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनके फ़ैसलों की आलोचना की जा रही है।

साल 2018 भारतीय सेना के लिए शानदार रहा, 250 आतंकी ढेर, 54 ज़िंदा धरे, 4 ने किया सरेंडर

भारतीय सेना के लिए साल 2018 उपलब्धियों से भरा रहा। टाइम्स नाउ के ट्विटर हैंडल से एक वीडियो शेयर किया गया है। इस वीडियो के माध्यम से उत्तरी सैन्य कमांडर रनबीर सिंह ने एक समारोह के आयोजन के दौरान पत्रकारों से मुख़ातिब होते हुए जानकारी दी कि साल 2018 भारतीय सेना के लिए उपलब्धियों भरा रहा क्योंकि पिछले साल हमारी सेना ने 250 आतंकवादियों को मार गिराया, 54 आतंकियों को ज़िंदा पकड़ा गया और 4 आतंकियों नें आत्मसमर्पण किया। आतंकवाद पर विराम लगाती यह सभी भारतीय गतिविधियाँ हमारी सेना के अदम्य साहस और क्षमता का परिचय है।

इसके अलावा उन्होंने कहा कि जो आतंकवादी हमारे देश में घुसपैठ की कोशिश करते थे और देश की जनता को डराने के लिए आतंक फैलाने की कोशिश करते थे, उनके नापाक इरादों को हमने पूरी तरह से तहस-नहस किया है।

देश की सरहद से जुड़ी इस जानकारी को साझा करते हुए कमांडर रनबीर सिंह ने पाकिस्तान की उन हरक़तों का भी ज़िक्र किया जिसका मुँहतोड़ जवाब भारत की ओर से दिया गया। जानकारी के मुताबिक यह समारोह जम्मू के पुंछ में आयोजित किया गया था।

आज भारतीय सीमा पर जो हालात हैं उसमें सेना के जवानों के बलिदान का भी योगदान है जिसे भुलाया नहीं जा सकता। इसके अलावा कमांडर सिंह ने बीते दो दिन पहले हुई पाकिस्तान की ओर से हुई आतंकी गतिविधि का भी ज़िक्र किया जिसमें भारतीय जवानों द्वारा 5 पाक सैनिकों को मार गिराया गया था।

सरहद पर आतंकी गतिविधियों पर विराम लगाने पर कमांडर सिंह ने कहा कि वर्ष 2018 सुरक्षाकर्मियों और भारतीय सेना के लिए बेहद शानदार रहा है। अपनी बात में उन्होंने पाकिस्तान को चेताने की भी भरपूर कोशिश की कि अब भारत पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देगा और आगे भी पाक हरक़तों को सबक सिखाते रहने की चेतावनी भी दी।

देश सकारात्मक विचार से ही आगे बढ़ता है: जेटली ने विपक्ष को दिखाई राह

अरूण जेटली इन दिनों इलाज के लिए अमेरिका गए हुए हैं। अमेरिका में गंभीर बीमारी के ईलाज के दौरान भी जेटली राजनीतिक रूप से बेहद सक्रिय हैं। अमेरिका से ही अरूण जेटली ने विपक्ष पर ब्लॉग वार किया है। अपने ब्लॉग में जेटली ने लिखा, “सकारात्मक मानसिकता वाले लोगों से ही कोई राष्ट्र आगे बढ़ता है। बात-बात पर विरोध करने वालों से कोई राष्ट्र आगे नहीं बढ़ता है।”

इसके आलावा अपने ब्लॉग में किसी का नाम लिए बगैर जेटली ने लिखा है कि देश के पॉलिटिकल सिस्टम में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनको लगता है, वो पैदा ही देश में राज करने के लिए हुए हैं।

अपने ब्लॉग के ज़रिए जेटली ने विरोधी मानसिकता वाले लोगों पर लोकतंत्र को बर्बाद करने का आरोप भी लगाया। अरूण जेटली ने भले ही अपने ब्लॉग में राहुल गाँधी या कॉन्ग्रेस पार्टी का नाम नहीं लिखा हो, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से जेटली ने अपने ब्लॉग के ज़रिए विपक्ष पर ही हमला किया है।

यहीं नहीं इस ब्लॉग के ज़रिए जेटली ने लेफ़्ट या अल्ट्रा लेफ़्ट विचारधारा से प्रभावित लोगों के बारे में लिखा कि यह लोग भाजपा सरकार के किसी अच्छे काम को भी स्वीकारना नहीं चाहते हैं। इसी तरह कुछ लोगों का समूह है जो सिर्फ सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार करने में लगे हुए हैं।

जब संसद में जेटली ने विपक्ष को दिया करारा जवाब

पिछले दिनों संसद की कार्यवाही के दौरान देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली पूरी रौ में दिखे थे। राफेल मुद्दे पर चर्चा के दौरान उन्होंने राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस के हर एक आरोपों और सवालों का जवाब तो दिया ही था, साथ ही विपक्षी पार्टी पर करारा हमला बोला था।

राफेल सौदे में विमानों की खरीद से लेकर ऑफ़सेट पार्टनर चुनने और जेपीसी की माँग तक, जेटली ने हर एक मुद्दे पर कई बातों को स्पष्ट किया और साथ ही कॉन्ग्रेस पर पलटवार भी करते रहे। पूरी बहस के दौरान कॉन्ग्रेस के सांसद कागज़ के हवाई जहाज उड़ाते रहे जिस से लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन काफी नाराज़ दिखी थी।

जब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी केंद्र सरकार पर आरोपों की झड़ी लगा रहे थे तब श्रीमती महाजन ने उन्हें टोकते हुए अनिल अम्बानी का नाम न लेने की सलाह दी और कहा कि जो सदन में नहीं हैं उनका नाम न लें।

कॉन्ग्रेस द्वारा राफेल की जांच के लिए जेपीसी के गठन की मांग को ठुकराते हुए जेटली ने कहा था:

“कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें स्वभाविक रूप से सच्चाई नापसंद होती है। उन्हें सिर्फ पैसे का गणित समझ में आता है, देश की सुरक्षा का नहीं। जेपीसी में संयुक्त संसदीय समिति नहीं हो सकती है, यह नीतिगत विषय नहीं है। यह मामला सौदे के सही होने के संबंध में है। उच्चतम न्यायलय में यह सही साबित हुआ है।”

राजस्थान की ही तर्ज़ पर मध्यप्रदेश में भी फ़र्ज़ी किसान घोटाला, कॉन्ग्रेस की मुश्किलें बढ़ीं

कॉन्ग्रेस ने किसानों की कर्ज़ माफ़ी के अपने चुनावी जुमले को जनता के बीच जमकर भुनाया, चुनाव से पहले भी और चुनाव के बाद भी। अब इसे कॉन्ग्रेस का चुनावी पैतरा कह लीजिए या फिर एक सोची-समझी रणनीति। इस रणनीति के तहत कॉन्ग्रेस ने भले ही तीन राज्यों (राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़) की सत्ता अपने हाथों ले ली हो, लेकिन उसकी असलियत अब धीरे-धीरे जगजाहिर हो रही है।

हाल ही में राजस्थान में फ़र्ज़ी कर्ज़ माफ़ी के आँकड़े सामने आए थे। जिससे यह साफ़ हो गया था कि कॉन्ग्रेस पार्टी का कर्ज़ माफ़ी का झूठ पकड़ा गया। जारी की गई सूची में उन किसानों के नाम शामिल थे जिन्होंने कभी बैंक से लोन लिया ही नहीं था।

ऐसा ही एक मामला मध्यप्रदेश सरकार में भी देखने को मिला है जिसका असर कॉन्ग्रेस सरकार पर यक़ीनन देखने को मिलेगा। ख़बरों के मुताबिक मध्यप्रदेश में कर्ज़ माफ़ी की घोषणा के बाद वहाँ के किसानों ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि जब कर्ज़ लिया ही नहीं तो माफ़ी कैसी।

मध्यप्रदेश के ग्वालियर में किसानों का कर्ज़ माफ़ी की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही विवादों में छा गई है। दरअसल हुआ यूँ कि कर्ज़ माफ़ी के लिए जब समितियों की तरफ से पंचायत पर कर्ज़दारों की सूची लिस्ट जारी की तो उनमें जिन किसानों के नाम शामिल थे, उन्होंने ऐसा कोई कर्ज़ लिया ही नहीं था जिसकी माफ़ी से वे ख़ुश हो सकें।

इसके बाद उन किसानों ने ज़िले की सहकारी केंद्रीय बैंक की शाखा व समितियों पर जाकर कर्ज़ लेने संबंधी आपत्ति दर्ज़ कराई, साथ ही इस बात पर भी ज़ोर दिया कि जब उन्होंने बैंक से कोई कर्ज़ ही नहीं लिया तो फिर उनका नाम ऐसी किसी सूची में कैसे शामिल हो सकता है, जिसके लिए कर्ज़ माफ़ी का प्रावधान किया जा रहा है। बता दें कि किसानों को फसल के लिए ऋण साख सहकारी समीतियों द्वारा ही दिया जाता है।

जानकारी के मुताबिक़, ज़िला सहकारी बैंक की चीनौर शाखा उर्वा सोसायटी का घोटाला सबसे अधिक चर्चित रहा। क़रीब 1,143 किसानों के नाम फ़र्ज़ी ऋण वितरित किया गया जिससे बैंक को लगभग साढ़े पांच करोड़ रुपए का चूना लगा। इस संबंध में जब पूर्व विधायक बृजेंद्र तिवारी ने एक किसान की जाँच कराई तो पता चला कि ऐसे 300 किसानों के पते ही फर्ज़ी थे। बाक़ी किसानों के पास जाकर पाया कि उन्होंने किसान संबंधी कोई कर्ज़ लिया ही नहीं।

ऐसे में यही सवाल उठता है कि कर्ज़ माफ़ी से जुड़ा यह विवाद अभी और कितने फ़र्ज़ी घोटाले को सामने लाएगा। यह देखना तो फ़िलहाल बाक़ी है, लेकिन उम्मीद यह की जा सकती है कि जल्द ही इस तरह के कर्ज़ माफ़ी के सभी प्रकरणों का जल्द ही पर्दाफ़ाश होगा।

NIA ने पंजाब और उत्तर प्रदेश में की छापेमारी; ISIS से प्रेरित मॉड्यूल होने का शक

गुरुवार को NIA ने उत्तर प्रदेश और पंजाब में सात स्थानों पर छापेमारी की। एजेंसी को शक था कि जहाँ रेड की गई उन स्थानों का लिंक ISIS के आतंकी मॉड्यूल से हो सकता है। कुछ दिन पहले ही एजेंसी ने हापुड़ से 24 वर्षीय मोहम्मद अबसार को गिरफ्तार किया था।

NIA ने कहा कि यह जाँच हरकत-उल-हरब-ए-इस्लाम नामक आतंकी संगठन के गिरफ्तार आतंकियों से पूछताछ के बाद की गई। एजेंसी का मानना है कि यह संगठन ISIS से प्रेरित है।

आपको याद होना चाहिए कि 26 दिसम्बर को एक बड़ी सफलता हासिल करते हुए एनआईए ने आतंकी संगठन आईएस से जुड़े एक रैकेट का पर्दाफाश कर दस लोगों को दिल्ली और यूपी से गिरफ्तार किया था। गिरफ्तार आतंकियों में एक मौलवी भी शामिल था। इस छापेमारी में बड़ी तादाद में गोला-बारूद और सिम कार्ड्स जब्त किये गए थे। ये सभी जगह-जगह बम विस्फोट और बड़े नेताओं को निशाना बनाने की तैयारी कर रहे थे। इस सफल ऑपरेशन के बाद एनआईए ने बयान देते हुए कहा था:

“10 संदिग्ध आतंकियों को गिरफ्तार किया गया है। वो सभी आतंकी हमले की साजिश रचने के उन्नत चरण में थे। जो चीजें जब्त की है उसमे देश में बने राकेट लांचर और 12 पिस्तौल शामिल हैं। उनकी योजना 100 से ज्यादा बम तैयार करने की थी जिसका आतंकी हमलों में इस्तेमाल किया जा सके।”

हेलो Quint, शरीरिक बीमारी तो ठीक हो सकती है, मानसिक बीमारी का क्या करें?

‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ या फिर Freedom Of Expression (FOE) एक ऐसा अस्त्र बन गया है, जिसका इस्तेमाल कश्मीर के अलगाववादी कर रहे हैं, वर्जिन लड़कियों को सीलबंद बोतल बताने वाले कर रहे हैं, भारत के टुकड़े होने का नारा लगाने वाले कर रहे हैं और हिन्दू देवी-देवताओं पर अश्लील फ़िल्म बनाने वाले कर रहे हैं। इस ज़मात ने इसे एक ऐसे हथियार के तौर पर प्रयोग करना सीख लिया है जिस से वो अपने साथ-साथ अपने देश का भी नुकसान कर रहे हैं। अब इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने किसी के मरने की दुआ करने को भी FOE से जोड़ा है।

इस गैंग की असंवेदनशीलता और मानसिक बीमारी के बारे में जानना हो तो उन्होंने कई बार इसे प्रदर्शित किया है। अगर हम उन सब की बात करने लगें तो ये ‘शेष सहस मुख सकहि न गाई’ वाली कहानी हो जाएगी, इसीलिए हमारा फ़ोकस यहाँ ताजा मानसिक रोगी स्तुति मिश्रा पर ही होगा।

The Quint की पत्रकार स्तुति मिश्रा ने अगर भाजपाध्यक्ष अमित शाह का मज़ाक बनाया होता तो शायद चल जाता। अगर उन्होंने अमित शाह की राजनीति की आलोचना की होती तो वह भी स्वीकार्य था। लेकिन उन्होंने अमित शाह की बीमारी का सिर्फ़ मजाक ही नहीं बनाया, अपितु उनके मरने की दुआ भी माँगी है। इस से पहले कि हम FOE के इन तथाकथित ठेकेदारों की मानसिक बीमारी का विश्लेषण करें, आइए एक नज़र पूरे घटनाक्रम पर डालते हैं और समझते हैं कि आख़िर हुआ क्या?

बुधवार (जनवरी 16, 2019) को अमित शाह ने एक ट्वीट के माध्यम से अपनी बीमारी की जानकारी दी। भाजपा अध्यक्ष अभी स्वाइन फ़्लू से जूझ रहे हैं और AIIMS में उनका उपचार चल रहा है। उन्होंने अपने ट्वीट में लोगों से प्रेम और शुभकामनाओं की अपेक्षा करते हुए ईश्वर को भी याद किया।

इस सरल और सौम्य भाषा पर भी जो ज़हर की उलटी करे- वो लिबरल। असंवेदनशीलता की सारी हदें पार करते हुए जनता द्वारा चुने गए राजनेता के मरने की कामना करे- वो लिबरल। वैचारिक मतभेद के नाम पर राष्ट्रद्रोह पर उतर आए- वो लिबरल। और इसी लिबरलपना का नया मानदंड स्थापित किया है The Quint की पत्रकार स्तुति मिश्रा ने। उन्होंने अमित शाह की बीमारी पर चुटकी लेते हुए कहा:

लोग स्वाइन फ़्लू होने से मर जाते हैं, है ना?

The Quint के पत्रकार का असंवेदनशील ट्वीट

ये सवाल नहीं है। ये कटाक्ष भी नहीं है। ये मज़ाक तो निश्चित ही नहीं है। ये मानसिक असंतुलन की निशानी है। ये एक ऐसी बीमारी की निशानी है जिसका उपचार किसी अस्पताल या डॉक्टर के पास नही है। स्तुति मिश्रा महिला हैं, पत्रकार हैं, ट्विटर पर उनके हज़ारों फॉलोवर्स हैं- इसका अर्थ ये हुआ कि सार्वजनिक तौर पर उनसे एक ऐसे व्यवहार की अपेक्षा की जाती है जिस से दूसरे भी कुछ सीख सकें। लेकिन उन्होंने एक बीमारी को लेकर दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पार्टी के अध्यक्ष के मरने की कामना की। क्या स्तुति मिश्रा और उनके गैंग के लोग लोकतंत्र का अर्थ भी समझते हैं?

क़रीब नौ करोड़ सदस्यों वाली पार्टी का जो मुखिया है- उसका सम्मान करना है लोकतंत्र। अपने विचारों को दूसरों पर जबरदस्ती थोपने की बजाए अपने राजनीतिक और वैचारिक प्रतिद्वंदियों के विचारों का सम्मान करना है लोकतंत्र। जिसने सत्ताधारी पार्टी को वोट भी न दिया हो उसके भी भलाई के लिए काम करना है लोकतंत्र। लेकिन स्तुति और उनके गैंग को लोकतंत्र की समझ कहाँ? अरे, कम से कम अमित शाह की मरने की दुआ कर ही रहीं हैं तो अपने घर में करें, अपने ख़ुदा से करें। सार्वजनिक तौर पर अपनी घिनौनी सोच, बीमार मानसिकता और घोर असंवेदनशीलता का प्रदर्शन करने से मिलता क्या है इन्हें? पब्लिसिटी?

अगर इस गैंग को पब्लिसिटी ही पानी है तो उनसे अच्छे तो ओम प्रकाश मिश्रा और ढिनचक पूजा हैं जिन्होंने उलटे-सीधे गाने गा कर करोड़ों व्यूज़ बटोरें और पब्लिसिटी पाई लेकिन स्तुति की तरह किसी बीमारी का मज़ाक नहीं उड़ाया, किसी के मरने की कामना नहीं की। कल ही एक ख़बर आई थी जिस में कहा गया था कि अकेले राजस्थान में इस साल स्वाइन फ़्लू के हजार से अधिक केस आ चुके हैं, क्या स्तुति तब भी यही सोचेंगी कि स्वाइन फ़्लू से तो लोग मर जाते हैं न? तो फिर क्या राजस्थान के हज़ार लोग मर जाएँ स्तुति और उनके गैंग को खुश करने के लिए?

पूरे भारत में स्वाइन फ़्लू के सात हज़ार के क़रीब केस आ चुके हैं। क्या स्तुति की क्षुधा तब बुझेगी जब सारे मारे जाएँ? सात हजार मौतों से स्तुति की भूख-प्यास शांत होगी या उनकी मानसिक रोग में सुधार आएगा? उनका मानना है कि स्वाइन फ़्लू में लोगों को मरना ही चाहिए, तो क्या कभी उनके अपने परिवार में किसी को ये बीमारी हो जाए (हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि ऐसा कभी न हो), तो भी क्या स्तुति तब भी यही सोचेंगी कि स्वाइन फ़्लू से तो लोग मर जाते हैं न?

बात फिर रह-सह कर वहीं आ जाती है- अमित शाह की बीमारी ठीक हो जाएगी क्योंकि उनकी पार्टी के करोड़ों लोगों के साथ-साथ देश के अन्य लोगों की दुआएँ भी उनके साथ है, सिवाए स्तुति गैंग के मानसिक रोगियों के। जमानत पर बाहर सोनिया गाँधी और भ्रष्टाचार की सजा भुगत रहे लालू की भी अच्छी स्वास्थ्य की कामना करते हुए, हम भारत सरकार से यह अनुरोध करेंगे कि शारीरिक रोगियों के साथ-साथ स्तुति जैसे मानसिक रोगियों के लिए भी कोई अस्पताल खोला जाए ताकि उनका सही उपचार हो सके। न हो सके तो कम से कम CIP, काँके (रांची) में ही इनके लिए एक अलग सेल की व्यवस्था की जाए।

असम सरकार समुदाय, जमीन और आधार की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है: सर्वानंद सोनोवाल

असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने भोगाली बिहु नाम से आयोजित होने वाले एक त्योहार के दौरान कहा कि उनकी सरकार राज्य की जनता के समुदाय, जमीन और आधार की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। इस कार्यक्रम के दौरान अपने बयान में मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि आम लोगों की सुरक्षा से किसी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा।

उन्होंने कहा, “मिट्टी के लाल होने के नाते लोगों को आश्वस्त करता हूँ कि लोगों को डरने की कोई ज़रूरत नहीं है।” जानकारी के लिए बता दें कि घुसपैठियों को देश से बाहर करने के लिए संसद में भाजपा सरकार द्वारा लाए गए नागरिकता संशोधन बिल के ख़िलाफ़ कई सारे समाजिक संगठन असम में विरोध कर रहे हैं।

नागरिकता बिल 2016 क्या है?

2016 में नागरिकता अधिनियम 1955 में बदलाव किया गया है। इस विधेयक का नाम नागरिकता अधिनियम 2016 दिया गया है। इस बिल के मुताबिक भारत के पड़ोसी देश अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैन, पारसियों और ईसाइयों को बिना वैध दस्तावेज के भारतीय नागरिकता देने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके साथ ही 24 मार्च 1971 के बाद देश में प्रवेश करने वाले घुसपैठियों को देश से बाहर कर दिया जाएगा। इस कानून को बनाने का मुख्य उद्देश्य यह है कि बिना सरकारी वैध कागज के कोई पड़ोसी मुल्क के लोग भारत में नहीं रह सकते हैं।

विवाद की वजह

सदन में  इस बिल को पास होते ही एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स) अपने आप ही प्रभावहीन हो जाएगा। कांग्रेस ने इस बिल को 1985 के असम समझौते के ख़िलाफ़ बताकर ख़ारिज किया है। इस समय एनआरसी बनने की प्रक्रिया जारी है। ऐसे में यदि सदन में यह बिल पास हो जाता है, तो देश के सुरक्षा के ख्याल से बेहतर होगा।