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सुप्रीम कोर्ट की कैंटीन में शाकाहार Vs मांसाहार: SCBA ने ‘गलत परंपरा’ का हवाला दे नवरात्रि मेन्यू बंद करवाया, विरोध में वकीलों ने ही खोला मोर्चा, कहा- भावनाएँ आहत हुई

नवरात्र के दौरान सुप्रीम कोर्ट कैंटीन में मांसाहारी भोजन परोसने के निर्णय के खिलाफ वकीलों के एक समूह ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) और सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCORA) को पत्र लिखा है। पत्र में कहा गया है कि बार के सदस्यों की भावनाओं को ध्यान में रखे बिना यह निर्णय लिया गया है।

अधिवक्ता रजत नायर द्वारा लिखे गए पत्र में कहा गया है कि यह निर्णय बार की ‘बहुलतावादी परंपराओं’ के अनुरूप नहीं था। यह असहिष्णुता और ‘एक दूसरे के प्रति सम्मान की कमी’ को दर्शाता है। इस विरोध का सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले कम-से-कम 133 वकीलों ने समर्थन किया है।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के वकीलों के एक समूह ने सुप्रीम कोर्ट कैंटीन के उस फैसले पर चिंता जताई थी जिसमें नौ दिनों तक चलने वाले नवरात्रि के त्योहार के दौरान मेनू को केवल नवरात्रि के खाने तक सीमित रखने का फैसला किया था। इसको लेकर उन्होंने विरोध किया था और कहा था कि इससे गलत परंपरा की शुरुआत होगी। विरोध के बाद शुक्रवार (4 अक्टूबर 2024) को फैसला वापस ले लिया गया।

नायर ने इस फैसले को वापस लेने के खिलाफ लिखे पत्र में कहा कि मांसाहारी भोजन की सेवा फिर से शुरू करने का फैसला SCBA के पदाधिकारियों के निर्देश पर लिया गया। नायर ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट को नवरात्रि के दौरान केवल गुरुवार और शुक्रवार को काम करना था। इसलिए मुख्य कैंटीन से इन दो दिनों के लिए नवरात्रि भोजन उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया था।

पत्र में कहा गया है, “मैं आपको पत्र लिखकर एससीबीए और एससीओआरए द्वारा नवरात्रि उत्सव के दौरान मांसाहारी खाद्य पदार्थों और प्याज/लहसुन युक्त खाद्य पदार्थों की सेवा के संबंध में हमारे बार के कुछ सम्मानित सदस्यों द्वारा लिखे गए दिनांक 3.10.2024 के पत्र के अनुसरण में की गई एकतरफा कार्रवाई के खिलाफ औपचारिक रूप से अपना कड़ा विरोध दर्ज कराना चाहता हूँ।”

उन्होंने अपने पत्र में आगे कहा, “अगर सुप्रीम कोर्ट परिसर में संचालित 6-7 कैंटीनों में से किसी एक को दो दिनों के लिए बार के सदस्यों को नवरात्रि का भोजन परोसने की अनुमति दी जाती तो कोई अपूरणीय क्षति या नुकसान नहीं होता। यह तब और भी अधिक होता जब अन्य कैंटीन पहले से ही अपने मेनू सूची में मांसाहारी भोजन और प्याज, लहसुन आदि युक्त भोजन परोस रहे थे।”

नायर ने आगे कहा, “हालाँकि, एससीबीए/एससीओआरए के पदाधिकारियों द्वारा बार के शेष सदस्यों से परामर्श किए बिना या उनकी भावनाओं पर विचार किए बिना एकतरफा कार्रवाई करने के उपरोक्त कृत्य ने मुझे इस संबंध में आधिकारिक रूप से अपना विरोध दर्ज कराने के लिए आपको पत्र लिखने के लिए बाध्य किया है, ताकि भविष्य में ऐसी असंगत घटनाएँ न हों।”

नदी पार कर भारत में घुसा बांग्लादेश का नवाब, रंगीला खातून से निकाह कर बिहार के अररिया में बस गया: पासपोर्ट बनवाने की कोशिश करते गिरफ्तार, आधार-वोटर कार्ड बन चुका था

बिहार के अररिया जिले में एक बांग्लादेशी नागरिक की गिरफ्तारी से इलाके में हलचल मच गई है। आरोपी नवाब (24 वर्ष), जो बांग्लादेश के चापा नवाबगंज जिले का निवासी है, ने तीन साल से अररिया के रामपुर कोदरकट्टी पंचायत के मरंगी टोला वार्ड 11 में अपनी पहचान छिपाकर एक स्थानीय महिला से निकाह कर लिया था और एक बच्ची का अब्बू भी बन चुका था।

अवैध दस्तावेज और फर्जी पहचान का खुलासा

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नवाब ने बांग्लादेश से अवैध रूप से भारत की सीमा पार की थी और यहाँ आकर आधार कार्ड, वोटर आईडी, और यहाँ तक कि भारतीय पासपोर्ट बनाने की कोशिश भी की थी।

उसकी पहचान तब खुली जब पासपोर्ट वेरिफिकेशन के दौरान स्थानीय मुखिया पम्मी देवी के पति राजेश सिंह ने उसके दस्तावेजों में गड़बड़ी पाई। वोटर आईडी में पिता की जगह पत्नी रंगीला खातून का नाम दर्ज होने से शक गहराया और कड़ाई से पूछताछ के बाद नवाब ने स्वीकार किया कि वह बांग्लादेश का नागरिक है और अवैध रूप से भारत में रह रहा है। नवाब के फर्जी दस्तावेज और अवैध गतिविधियों के खुलासे के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया

भारत में घुसपैठ आसान, महज 1000 रुपए में पार की सीमा

पूछताछ में नवाब ने यह खुलासा किया कि वह बांग्लादेश से करीब 500 से 1000 रुपये देकर नदी पार कर भारत आया था। सीमा पार करने के बाद वह सबसे पहले बिहार के कटिहार जिले के सेमापुर में अपनी मौसी के घर पर रुका। वहाँ कुछ दिन रहने के बाद उसने अररिया के रामपुर कोदरकट्टी पंचायत के मरंगी टोला वार्ड 11 में आकर एक स्थानीय महिला से निकाह कर लिया।

नवाब ने अपने भारतीय पहचान के लिए फर्जी दस्तावेज जैसे आधार कार्ड और वोटर आईडी बनवाए, जिसमें उसने अपने ससुर को अपना अब्बा दिखाया और बीवी का नाम मतदाता पहचान पत्र में दर्ज करा लिया। उसकी योजना पासपोर्ट बनवाकर बांग्लादेश वापस जाने की थी, ताकि वह कानूनी रूप से भारत और बांग्लादेश के बीच आ-जा सके। पासपोर्ट वेरिफिकेशन के दौरान ही उसकी असलियत सामने आई और उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

मुखिया की सतर्कता से खुला राज

नवाब की सच्चाई सामने आने के पीछे मुख्य भूमिका मुखिया पम्मी देवी और उनके पति की थी, जिन्होंने उसकी पहचान पर शक जताते हुए उसकी सूचना पुलिस को दी। इसके बाद पुलिस ने जाँच कर नवाब को गिरफ्तार कर लिया। इस घटना ने सीमावर्ती क्षेत्रों में बांग्लादेशी नागरिकों की घुसपैठ और उनकी अवैध गतिविधियों पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस और प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए आगे की जाँच शुरू कर दी है।

ईसाई बताते हैं जिसे फ्रांसिस जेवियर का अवशेष, बौद्धों के लिए वे आचार्य राहुल थेरो: जानिए क्या है विवाद, क्यों हो रही गोवा के चर्च में रखे शव के DNA टेस्ट की माँग

गोवा के नेता सुभाष वेलिंगकर द्वारा ईसाई संत फ्रांसिस जेवियर के अवशेषों के डीएनए परीक्षण कराने की माँग करने के बाद पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। प्रदर्शन को देखते हुए गोवा पुलिस ने शनिवार (5 अक्टूबर 2024) को कहा कि वेलिंगकर फरार हैं और उन्हें खोजने के लिए छापेमारी की जा रही है। विवाद की पीछे की वजह जानने से पहले आइए जानते हैं कि मामला क्यक है।

गोवा के ईसाई समुदाय का आरोप है कि वेलिंगकर द्वारा फ्रांसिस जेवियर के अवशेषों के डीएनए परीक्षण कराने की माँग करके उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई गई है। इसके साथ ही उनका यह भी कहना है कि इस तरह का बयान देकर सांप्रदायिक सद्भाव को भी नुकसान पहुँचाई गई है। पूर्व RSS नेता वेलिंगकर के खिलाफ गोवा भर में कम से कम आधा दर्जन शिकायतें दर्ज कराई गई हैं।

आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक क्रूज सिल्वा की शिकायत के आधार पर शुक्रवार (4 अक्टूबर) की रात उत्तरी गोवा के बिचोलिम पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी दर्ज की गई। वेलिंगकर पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 299 (किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के इरादे से दुर्भावनापूर्ण कार्य) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है।

एफआईआर के अनुसार, वेलिंगकर ने दुर्भावनापूर्ण इरादे से सेंट फ्रांसिस जेवियर के खिलाफ अपमानजनक भाषण दिया, जिससे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँची। सूत्रों का कहना है कि शुक्रवार (4 अक्टूबर) की रात पुलिस की एक टीम वेलिंगकर के घर गई थी, लेकिन वे वहाँ नहीं मिले। बता दें कि वेलिंगकर को साल 2016 में आरएसएस ने संगठन से निकाल दिया था।

वेलिंगकर की गिरफ्तारी की माँग को लेकर शुक्रवार (4 अक्टूबर 2024) को राज्य के कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन हुए। मडगाँव में 300 से अधिक लोग पुलिस स्टेशन के बाहर जमा हो गए। विरोध करने वाले लोगों में कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी के कई नेता भी शामिल थे। प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा।

वहीं, शनिवार (5 अक्टूबर 2024) को प्रदर्शनकारियों ने मडगाँव, अंजुना और ओल्ड गोवा में सड़कें जाम कीं। प्रदर्शनकारियों ने गोवा पुलिस को चेतावनी दी कि अगर आरोपित वेलिंगकर की जल्दी गिरफ्तारी नहीं हुई तो वे जुआरी पुल को जाम कर देंगे। प्रदर्शन को देखते हुए गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने लोगों से शांति बनाए रखने और सड़कें जाम नहीं करने की अपील की। ​​

प्रमोद सावंत ने कहा, “फादर बोलमैक्स के खिलाफ जो भी कार्रवाई की गई थी, वैसी ही कार्रवाई वेलिंगकर के खिलाफ भी की जाएगी।” दक्षिण गोवा के चिकालिम स्थित सेंट फ्रांसिस जेवियर चर्च के पादरी फादर बोलमैक्स परेरा पर पिछले साल छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में अपमानजनक टिप्पणी कर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने को लेकर एक मामला दर्ज किया गया था।

गोवा के संरक्षक फ्रांसिस जेवियर नहीं, परशुराम हैं: वेलिंगकर

इस सप्ताह की शुरुआत में सुभाष वेलिंगकर ने गोवा के संरक्षक कहे जाने वाले सेंट फ्रांसिस जेवियर के अवशेषों की डीएनए जाँच की माँग की थी। उन्होंने कहा कि सेंट जेवियर को ‘गोएंचो साईब’ (गोवा का संरक्षक) नहीं कहा जा सकता। इससे पहले साल 2022 में भी उन्होंने ऐसा ही बयान दिया था। उस वक्त भी उनके बयान का विरोध हुआ था।

साल 2022 में वेलिंगकर ने कहा था कि सेंट फ्रांसिस जेवियर को ‘गोएंचो साईब’ नहीं कहा जा सकता है। उन्होंने कहा था कि ‘द गोवा फाइल्स’ नामक एक अभियान शुरू किया जाएगा, ताकि जागरूकता पैदा की जा सके। सुभाष वेलिंगकर का कहना है कि गोएंचो साईब सेंट फ्रांसिस जेवियर नहीं, बल्कि हिंदुओं के पौराणिक भगवान परशुराम ‘गोएंचो साईब’ हैं।

बता दें कि सेंट फ्रांसिस जेवियर स्पेनिश जेशूइट मिशनरी थे। वे 1542 में गोवा पहुँचे थे। उस समय गोवा पुर्तगाल का उपनिवेश था। साल 1552 में चीन के ग्वांगडोंग प्रांत के तट पर स्थित सैन्सियन द्वीप पर उनकी मृत्यु हो गई थी। उनका अवशेष पुराने गोवा में ‘बेसिलिका ऑफ़ बॉम जीसस’ में रखे हैं। उनके अवशेषों की प्रदर्शनी 21 नवंबर 2024 से 5 जनवरी 2025 तक गोवा में आयोजित की जाएगी।

वेलिंगकर ने भी थाने में दी है शिकायत

वेलिंगकर ने गुरुवार (3 अक्टूबर 2024) को ओल्ड गोवा पुलिस स्टेशन में कुछ एक्टिविस्ट ग्रुप के खिलाफ शिकायत दी। अपनी शिकायत में उन्होंने कहा, “मैंने हाल ही में गोवा इंक्विजिशन के बारे में एक बयान दिया, जो गोवा के इतिहास का एक दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय है। यह पुर्तगाली शासन के दौरान हुआ था, जबकि इतिहास ईसाई धर्म के प्रसार में सेंट फ्रांसिस जेवियर के योगदान की बात करता है।”

उन्होंने आगे कहा, “यह समझना महत्वपूर्ण है कि गोवा इंक्विजिशन ने कई गैर-ईसाइयों के लिए आतंक का शासन बनाया। मैं नफरत और आतंक फैलाने वाले इनक्विजिशन की कार्रवाइयों और संतत्व की सच्ची भावना के बीच तुलना करता हूँ। मेरा मानना ​​है कि इतिहास को फिर से देखने, अतीत की कार्रवाइयों की जांच करने और संतत्व के सही अर्थ पर विचार करने का समय आ गया है।”

वेलिंगकर ने आगे कहा, “इंक्विजिशन के दौरान या किसी अन्य ऐतिहासिक अवधि में नफरत या उत्पीड़न को बढ़ावा देने वाले कार्यों को पवित्र नहीं माना जा सकता। यह बयान किसी धर्म को बदनाम करने के लिए नहीं, बल्कि उन ऐतिहासिक घटनाओं को उजागर करने के लिए दिया गया है, जिन्होंने अनगिनत गोवावासियों के अनुभवों को आकार दिया।”

सुभाष वेलिंगकर ने अपने बयान के पीछे बौद्ध समुदाय के लोगों की माँगों का भी तर्क दिया। उन्होंने कहा, “मेरे बयान लिखित इतिहास की बात करते हैं, न कि मेरे व्यक्तिगत विचारों की। श्रीलंका और विश्व भर के बौद्ध धर्मावलंबियों के बीच सेंट फ्रांसिस जेवियर के अवशेषों की पहचान सत्यापित करने के लिए डीएनए जाँ की माँग जोर पकड़ रही है।”

क्या है बौद्ध समुदाय के लोगों की माँग

श्रीलंका सहित दुनिया भर के बौद्ध गोवा के सेंट फ्रांसिस जेवियर की रखे गए अवशेषों की जाँच की माँग करते रहते हैं। उनका कहना है कि जिन अवशेषों को फ्रांसिस जेवियर का बताया जाता है, वह बौद्ध आचार्य राहुल थेरो के अवशेष हैं। साल 2014 में श्रीलंका के एक्विस्ट समूह ने भारत के मोदी सरकार और श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम महिंदा राजपक्षे को संबोधित एक खुला पत्र लिखा गया था।

दिसंबर 2014 को अपने पिटिशन में बौद्ध समुदाय के लोगों ने कहा था, “हम हस्ताक्षरकर्ता भारत और श्रीलंका तथा शेष विश्व के चिंतित और सही सोच वाले नागरिकों के रूप में आपसे अनुरोध करते हैं कि भारत के गोवा में एक चर्च में काँच के ताबूत में रखे एक शव के अवशेषों की वास्तविक पहचान के संबंध में लंबे समय से चले आ रहे विवाद को सुलझाने में कृपया हस्तक्षेप करें।”

इसमें कहा गया था, “श्रीलंका में विशेष रूप से बौद्ध लोगों के बीच यह व्यापक मान्यता है कि विचाराधीन शव श्रीलंका के एक अत्यंत सम्मानित साहित्यिक दिग्गज और विद्वान भिक्षु आचार्य वेन. थोटागामुवे श्री राहुला थेरो (1409-91) का है, जबकि कैथोलिकों को विश्वास दिलाया गया है कि यह फ्रांसिस जेवियर का शव है, जो एक विवादास्पद ईसाई जेसुइट मिशनरी था और उस पर कुख्यात गोवा इंक्विजिशन शुरू करके मानवता के खिलाफ अपराध करने का आरोप लगा था।”

पिटिशन में आगे कहा गया था, “हमारा मानना ​​है कि दोनों परिवारों के वंशजों का डीएनए परीक्षण या रक्त का नमूना की जाँच सदियों से चली आ रही बहसों और सिद्धांतों को संतोषजनक ढंग से समाप्त कर देगा। हमारी माँग है कि गोवा में पड़े शव को फ्रांस को लौटा दिया जाए और विवादास्पद अवशेषों को अब गोवा में न रखा जाए क्योंकि न तो गोवा और न ही भारत विदेशी देशों का उपनिवेश है।”

पिटिशन में कहा गया है कि गोवा को भारत ने 1961 में आजाद कराया था। वास्तव में गोवा इंक्विजिशन (पहली बार फ्रांसिस जेवियर द्वारा प्रस्तावित) के कोंकणी ईसाई पीड़ितों के वंशजों ने एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया है और भारत सरकार से भी अपील की है। इस संबंध में ऐतिहासिक डेटा और तथ्यात्मक तर्क के आधार लेख के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। इसलिए इसकी जाँच कराई जाए।

फ्रांसिस जेवियर के शव को लेकर श्रीलंकाई पत्रकार डब्ल्यू टीजेएस कविरत्ने ने फरवरी 2014 में एक लेख भी लिखा था। इस लेख में उन्होंने दावा किया था कि बौद्ध भिक्षुओं और श्रीलंकाई भक्तों के एक वर्ग का कहना है कि सेंट फ्रांसिस जेवियर के अवशेष 15वीं शताब्दी के बौद्ध भिक्षु श्री राहुला थेरो के हैं। हालाँकि, उन्होंने यह कहा था कि लोगों की इन विचारों की पुष्टि के लिए डीएनए परीक्षण जरूरी है।

ईसाइयों ने किया था जेवियर के अवशेषों की प्रदर्शनी का विरोध

साल 2014 में पहली बार गोवा के ईसाई समुदाय के लोगों ने फ्रांसिस जेवियर के अवशेषों के सार्वजनिक प्रदर्शन को लेकर विरोध किया गया था। जेवियर को एक संत और चमत्कारी व्यक्ति बताया जाता है। यह सार्वजनिक प्रदर्शनी पिछले 500 वर्षों में पहली प्रदर्शन होने वाला था। इसके लिए 22 नवंबर 2014 से 4 जनवरी 2015 तक गोवा तक समय प्रस्तावित किया गया था।

उस समय ईसाई समुदाय के एक वर्ग ने फ्रांसिस जेवियर के अत्याचारों के कोंकणी ईसाई पीड़ित नामक एक समूह बनाया था। उन्होंने इस प्रदर्शनी के खिलाफ आंदोलन करने की चेतावनी दी थी कि वे जेवियर के अत्याचारों के पीड़ितों के वंशज हैं। उनकी माँग थी कि जेवियर के शव को उनके गृह देश फ्रांस वापस भेजा दिया जाए। इस माँग को लेकर उन्होंने राष्ट्रव्यापी हस्ताक्षर अभियान भी शुरू किया था।

खुद को पीड़ितों के वंशज मानने वाले लोगों का कहना था कि गोवा में पुर्तगाली शासन समाप्त हुए 53 साल हो चुके हैं। इसलिए, भारत में जेवियर के शव को संरक्षित रखना भारत का अपमान है और इसे जल्द से जल्द पुर्तगाल भेजा जाना चाहिए। पीड़ितों ने गोवा सरकार और केंद्र सरकार से याचिका दायर करने की भी योजना बनाई थी।

भारत के बौद्ध संगठन भी DNA जाँच के पक्ष में

फ्रांसिस जेवियर और बौद्ध प्रबुद्ध राहुल थेरो के अवशेषों को लेकर जो विवाद जन्मा है, इसको लेकर भारत के बौद्ध समुदाय के लोग एवं संगठन भी DNA परीक्षण कराए जाने के पक्ष में हैं। उनका कहना है कि जिस बात को लेकर विवाद हो जाए, उसका वैज्ञानिक तरीके से परीक्षण करके समाधान निकालना ही शांति के पक्ष में है।

बिहार के बोधगया स्थित बौद्ध धर्म के सबसे प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में से एक महाबोधि मंदिर के प्रबंधन समिति के सदस्य धम्मा धीरू उर्फ प्रेमा फंते ने इस संबंध में ऑपइंडिया से बात की। उन्होंने कहा कि भारत के बौद्ध समुदाय के लोग भी चाहते हैं कि गोवा में संरक्षित कथित फ्रांसिस जेवियर के अवशेषों का परीक्षण कराया जाए।

प्रेमा भंते ने कहा कि राहुल थेरो बौद्ध धर्म के एक महान संत थे और उनके अवशेषों को लेकर जाँच की माँग की जा रही है तो इसे की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि देश के बौद्ध समुदाय के संगठन के बीच इसको लेकर राय-मशविरा किया जाएगा और इस संबंध में जरूरत पड़ी प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति को ज्ञापन भी सौंपा जाएगा।

कौन हैं बौद्ध धर्म के प्रसिद्ध संत राहुल थेरो

थोटागामुवे श्री राहुला थेरो श्रीलंका के साहित्य जगत में एक साहित्यिक दिग्गज थे। उन्होंने 1430 से 1440 की अवधि के दौरान बुद्धगज्जया, वुर्थमाला संदेसाया, परवी संदेसाया, सेलाहिनी संदेसाया, काव्यासेकराय, पंचिका प्रदीपया, बुद्दीपसदिनिया, गिरा संदेसाया, साकसकाडा और मावुलु संदेसाया जैसी प्रसिद्ध साहित्यिक रचनाएँ लिखीं।

राहुल थेरो का जन्म 9 जून 1409 को राजा पराक्रमबाहु 6वें के शासनकाल में हुआ था। वे सन 1429 में भिक्षु बने। इसके बाद उन्हें वच्चिश्वर के नाम से जाना जाता था। राहुल थेरो 6 भाषाओं में पारंगत थे और एक प्रतिष्ठित लेखक, अनुभवी ज्योतिषी और आयुर्वेदिक चिकित्सा में पारंगत थे। इन तीनों क्षेत्रों से लेकर आध्यात्म तक में उन्होंने कई प्रसिद्ध पुस्तकें लिखी हैं।

वे राजा पराक्रमबाहु द्वारा संगराजा का पद पाने वाले पहले भिक्खु बने। वह राजा विजयबाहु प्रथम द्वारा स्थापित अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित शिक्षा संस्थान थोटागामुवे विजयबा पिरिवेना के मुख्य पदाधिकारी और प्रधानाचार्य भी थे। विजयबा पिरिवेना और रथपथ विहार, दोनों को 1580 ईस्वी में थोम डीसूजा ने नष्ट कर दिया था। इसके कुछ ग्रेनाइट स्तंभ ही बचे थे। मंदिर का पुनर्निर्माण 1765 में वेन. पल्लट्टारा थेरो द्वारा किया गया था।

श्री राहुला थेरो का 27 सितंबर 1491 को 82 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद गाँव के लोग विजयबा पिरिवेना पहुँचे और उनके शरीर (बढ़ते बालों और नाखूनों के साथ) को सुरक्षा के लिए एल्पिटिया के पास अंबाना इंदुरुगिरी गुफा में रख दिया। ऐसा कहा जाता है कि राहुला थेरो ने एक औषधि (सिद्धलोक रस) का सेवन किया था, जिससे उनका शरीर वर्ष 4230 तक अपरिवर्तित रहा था।

उनके शरीर के इस अपरिवर्तन की बात उनकी मृत्यु से पहले ताँबे की शीट पर एक श्लोक में उकेरा गया था। जब पुर्तगाली श्रीलंका पहुँचे तो उन्होंने उनके शरीर को अपने कब्जे में ले लिया और उसे गोवा भेज दिया। कहा जाता है कि राहुल थेरो के शरीर को गोवा ले जानेे का काम ईसाई मिशनरी फ्रांसिस जेवियर को सौंपा गया था। यात्रा के दौरान फ्रांसिस जेवियर की समुद्र में मृत्यु हो गई और राहुल थेरो के शरीर को फ्रांसिस जेवियर का बता दिया गया।

कौन थे सेंट फ्रांसिस जेवियर

इसाई मिशनरी धर्म प्रचारक सेंट फ्रांसिस ज़ेवियर (Francis Xavier) पुर्तगाली काफिले के साथ वर्ष 1542 में भारत आया था। उसने भारत पहुँचकर ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार किया था। वह ‘सोसायटी ऑफ जीसस’ से जुड़ा था। इन्हीं सोसायटी ऑफ़ जीसस वालों को जेसुइट्स कहा जाता है।

सेंट फ्रांसिस जेवियर के आने के बाद 1559 तक गोवा में 350 से अधिक हिन्दू मंदिरों को बंद कर दिया गया था। इस दौरान हिन्दुओं के मूर्ति पूजा पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था। सारे प्रयास किए गए कि वह हिन्दू धर्म छोड़ कर ईसाईयत अपना लें। इसके बाद भी सेंट जेवियर ने देखा कि उसके हिन्दुओं के बलात धर्म परिवर्तन के प्रयास पूरी तरह से कामयाब नहीं हो रहे थे। 

उसे समय रहते यकीन होता गया कि सनातन धर्म की आस्था अक्षुण्ण है। यदि वह मंदिरों को नष्ट करता है तो लोग घरों में ही मंदिर बना लेते हैं। उसने देखा कि लोगों को धारदार हथियारों से काटने, उनके हाथ और गर्दन रेतने और असीम यातनाको देने के बाद भी फेनी (सस्ती शराब) और सनातन धर्म में से लोग सनातन धर्म को ही चुनते और मौत को गले लगा लेते।

निराश होकर जेवियर ने रोम के राजा को पत्र लिखा जिसमें उसने हिन्दुओं को एक अपवित्र जाति बताते हुए उन्हें झूठा और धोखेबाज लिखा उसने कहा कि उनकी मूर्तियाँ काली, बदसूरत और डरावनी होने के साथ ही तेल की गंध से सनी हुई होती हैं। इसके बाद हिन्दुओं पर यातनाओं का सबसे बुरा दौर आया। फ्रांसिस जेवियर ने गोवा का पूर्ण अधिग्रहण किया।

हिन्दुओं के दमन के लिए एक धार्मिक नीतियाँ बनाई और यीशु की कथित सत्ता में यकीन ना करने वाले ‘नॉन-बिलीवर्स’ को दंडित किया जाने लगा। इस घटना के बारे में लिखने वाले इतिहासकारों को भी सख्त यातनाएँ दी गईं। उन्हें या तो गर्म तेल में डालकर जलाया जाता या फिर जेल भेज दिया जाता। ऐसे ही कुछ लेखकों में फिलिपो ससेस्ती, चार्ल्स देलोन, क्लाउडियस बुकानन आदि के नाम शामिल थे।

इतिहास में पहली बार हिन्दू भागकर बड़े स्तर पर प्रवास करने को मजबूर हो गए। सेंट फ्रांसिस जेवियर ने मात्र भारत ही नहीं बल्कि मलय प्रायद्वीप, श्रीलंका, जापान और चीन तक में ईसाइयत का प्रचार करने गया था। उसकी चीन के द्वीप पर बुखार से मौत हो गई थी। बताते हैं कि उसने अपने जीवन में कम से कम 30,000 लोगों को ईसाई बनाया था।

सेंट फ्रांसिस जेवियर जिस सोसायटी ऑफ़ जीसस या ‘जेसुइट्स’ का हिस्सा था वह बड़े स्तर पर लोगों को गुलाम बनाते थे। जेसुइट्स ने अमेरिका में स्थानीय आदिवासियों को गुलाम बनाया था। उनके पास एक समय में 20,000 से अधिक गुलाम थे और उन्हें खेतों तथा अन्य कामों में लगाया जाता था। गुलामों को रखने, उन पर अत्याचार करने को कई बार सही भी बताया गया था। इसे ईसाईयत के विरुद्ध नहीं माना गया था।

मुस्लिम लड़की ने मुस्लिम लड़के से करवाई दोस्ती… फिर कॉलेज के सभी मुस्लिम लड़कों ने जबरन बनाए संबंध: रूस से लौटा ‘इंजीनियर’, एक हिंदू लड़की से लव जिहाद ने बनाया महंत यति नरसिंहानंद

डासना मंदिर के महंत यति नरसिंहानंद के खिलाफ शुक्रवार (4 अक्टूबर 2024) को भारत के कई हिस्सों में मुस्लिम भीड़ ने हिंसक प्रदर्शन किया। मुस्लिम भीड़ यति नरसिंहानंद को गुस्ताख़ बताते हुए अपने पैगंबर के अपमान का आरोप लगा रही थी। यति नरसिंहानंद इससे पहले भी कई बार अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहे हैं। मुस्लिम बहुल इलाके में मौजूद पौराणिक डासना मंदिर का महंत बनने से पहले यति नरसिंहानंद की पहचान इंजीनियर दीपक त्यागी के तौर पर हुआ करती थी। आइए जानते हैं कि कैसे एक इंजीनियर रहे दीपक ने भगवा धारण करके अपने जीवन को पूरी तरह से बदला।

रूस में पढ़ाई, लंदन में नौकरी

वर्तमान में महामंडलेश्वर की पदवी प्राप्त महंत यति नरसिंहानन्द की उम्र लगभग 55 वर्ष है। उनके पिता रक्षा मंत्रालय में नौकरी करते थे। रिटायरमेन्ट के बाद वो कॉन्ग्रेस से जुड़ गए थे। उन्होंने अपने बेटे दीपक की शुरूआती शिक्षा-दीक्षा मेरठ से करवाई। हालाँकि वो मूलतः बुलंदशहर के निवासी थे। बाद में उच्च शिक्षा के लिए दीपक त्यागी रूस गए। यहाँ वो मॉस्को सहित अन्य कई शहरों में रहे। रूस में उन्होंने ‘मॉस्को इंस्टिट्यूट ऑफ केमिकल मशीन बिल्डिंग’ से मास्टर्स की डिग्री ली।

उन्होंने बतौर इंजीनियर लम्बे समय तक कार्य किया। तब दीपक त्यागी को लंदन तक से नौकरी के ऑफर मिले। उन्होंने यहाँ मार्केटिंग टीम का भी नेतृत्व किया। यति नरसिंहानंद का यह भी दावा है कि वो इजरायल की भी यात्रा कर चुके हैं और साथ ही उन्हें 1992 में ‘ऑल यूरोप ओलम्पियाड’ में गणित से विजेता घोषित किया गया था। कई अलग-अलग देशों में रहते हुए लगभग 10 वर्षों के बाद साल 1997 में दीपक त्यागी भारत लौट आए।

राजनीति से रहा जुड़ाव

दीपक त्यागी (वर्तमान में यति नरसिंहानन्द) जब भारत लौटे तो उस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति में में समाजवादी पार्टी का बोलबाला हुआ करता था, तब यूपी के सबसे बड़े नेता मुलायम सिंह यादव माने जाते थे। दीपक त्यागी को एक बार समाजवादी पार्टी में यूथ विंग का अध्यक्ष पद ऑफर हुआ तो उन्होंने स्वीकार कर लिया। इस दौरान दीपक त्यागी के बहुत से मुस्लिम दोस्त भी बने। दीपक त्यागी के पूर्वज भी समाजवादी विचारधारा वाले थे।

भाजपा नेता के भाषणों से जगी हिंदुत्व में आस्था

यति नरसिंहानन्द ने कई बार खुले मंचों से भाजपा नेता बी एल शर्मा प्रेम (अब दिवंगत) को अपना गुरु बताया है। वो बताते हैं कि समाजवादी पार्टी का पदाधिकारी रहने के दौरान उनको कई बार बी एल शर्मा ‘प्रेम’ (बैकुंठ लाल शर्मा) के भाषण सुनने को मिला। उनके द्वारा रखे गए तथ्य और दिए जाने वाले सबूतों से दीपक त्यागी का झुकाव धीरे-धीर उनकी तरफ होने लगा। हालाँकि इसके बावजूद वो समाजवादी पार्टी से जुड़े रहे।

लव जिहाद की एक घटना ने बना दिया नरसिंहानंद

दीपक त्यागी के यति नरसिंहानंद बनने के पीछे लव जिहाद की एक घटना ने बहुत अहम रोल अदा किया। वह घटना शम्भू दयाल कॉलेज में पढ़ने वाली त्यागी समाज की एक लड़की से जुड़ी है जिसने तब रो-रो कर उनको (यति नरसिंहानंद) अपनी पीड़ा बताई थी। पीड़िता ने उन्हें बताया था कि एक मुस्लिम सहेली ने उसकी जान-पहचान अपने मजहब के लड़के से करवा दी थी। दोस्ती के ही दौरान मुस्लिम युवक ने पीड़िता के साथ अपने कुछ फोटो और वीडियो बना डाले थे। इसी फोटो व वीडियो को दिखाकर पीड़िता को कई मुस्लिम युवकों से संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया था।

तब पीड़िता ने दीपक त्यागी को यह भी बताया कि उसके मुस्लिम साथी ने उसको न सिर्फ अपने दोस्तों बल्कि कई नेताओं और यहाँ तक कि प्रिंसिपल तक के आगे परोसा था। लड़की ने दीपक त्यागी पर भी आरोप लगाया कि उनको चुप रहने के लिए कुछ न कुछ लालच दिया गया होगा। यहीं से दीपक त्यागी के मन को आघात लगा और वो हिंदुत्व की तरफ झुकते चले गए। उनको बी एल शर्मा प्रेम के दावों का सबूत जैसा मिल गया और वो दीपक त्यागी से यति नरसिंहानंद बन गए।

हिन्दुओं को जोड़ने के लिए चलाया ‘अजगर’ अभियान

जिस समय दीपक त्यागी ने खुद को यति नरसिंहानंद के रूप में ढाला तब उन्होंने हिंदू समाज को तोड़ने के लिए राजनैतिक लोगों द्वारा की जा रही साजिशों को समझना शुरू किया। उन्होंने पाया कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में हिंदू धर्म की 4 जातियों के बीच लड़ाने की सबसे अधिक साजिश होती है। ये जातियाँ यादव, जाट, गुर्जर और राजपूत थीं। आरोप है कि तब अलग-अलग जातियों के अपने-अपने नेता थे जो एक दूसरे के खिलाफ वैमन्सयता फैला कर मुस्लिम वोट बैंक को साधते थे।

यति नरसिंहानंद ने इन चारों जातियों को जोड़ने के लिए एक अभियान चलाया था जिसका नाम उन्होंने ‘अजगर’ दिया था। अजगर एक शॉर्ट फॉर्म था जिसका पूरा नाम अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत था। यति नरसिंहानंद ने पश्चिम उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में अजगर सभाएँ करवाईं। इन सभाओं में सभी जातियों को एक दूसरे का पूरक बनने और हिंदुत्व के लिए खड़े होने का संकल्प दिलवाया जाता था। इन्हीं सभाओं में यति नरसिंहानंद मुस्लिमों को देश और हिंदू धर्म के लिए खतरा बताते हुए जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने की वकालत करते थे।

डासना मंदिर को चुना स्थाई ठिकाना

अपने एक इंटरव्यू में यति नरसिंहानंद ने ऑपइंडिया को बताया था कि हिन्दुओं को जागृत करने के लिए उनको एक स्थाई ठिकाने की जरूरत थी। आखिरकार उन्होंने मुस्लिम बहुल इलाके डासना में मौजूद शक्तिपीठ देवी मंदिर को चुना। वहाँ जाने से पहले ही उनको पता चला था कि उनसे पहले भी कई संतों और महंतों की मंदिर में हत्या की जा चुकी थी। मंदिर में डकैती डालकर कई बार लूट भी हो चुकी थी।

यति नरसिंहानंद बताते हैं कि दशकों पहले ही उस मंदिर पर मुस्लिम आबादी कब्ज़ा करने की कगार पर थी लेकिन उन्होंने ऐसा न होने देने का संकल्प लिया। इसी संकल्प के साथ वो डासना मंदिर के पुजारी बन गए और बाद में महंत। ताजा घटनाक्रम से पहले भी उन पर मंदिर में कई बार हमले की कोशिश की जा चुकी है। हालाँकि उन्होंने किसी डर या दबाव में मंदिर छोड़ने से साफ इंकार कर दिया।

घर में ‘दरबार’ लगाता है मौलवी शान अहमद, हिंदू महिलाओं को मुस्लिम बना करवाता है खिदमत: पुलिस के पास पहुँची पीड़िता, बताया- शैतान का डर दिखा करवाता है धर्मांतरण

उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर जिले के बरेसर थाना क्षेत्र में मौलवी शान अहमद पर एक महिला ने गंभीर आरोप लगाए हैं, जिसमें धर्म परिवर्तन, अश्लील हरकतें और जान से मारने की धमकियाँ शामिल हैं। यह मामला तब सामने आया जब बलिया के नरही थाना क्षेत्र की एक महिला ने मौलवी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। महिला का आरोप है कि मौलवी ने झाड़-फूंक और शैतानी ताकत से मुक्ति दिलाने का झाँसा देकर न केवल उसके साथ यौन उत्पीड़न की कोशिश की, बल्कि उसे इस्लाम कबूल करने के लिए भी मजबूर किया।

धर्म परिवर्तन और अश्लील हरकतों का आरोप

पीड़िता का कहना है कि उसके ससुराल पक्ष के लोग मौलवी शान अहमद के दरबार में विश्वास रखते थे। ससुरालियों ने मौलवी को अपने घर बुलाकर कहा कि उनके परिवार में परेशानियाँ हैं और उसकी बहू पर शैतानी ताकतों का साया है। मौलवी ने परिवार को यह विश्वास दिलाया कि महिला के शैतान के प्रभाव से छुटकारा पाने के लिए उसे मौलवी के दरबार में लाना जरूरी है। इसके बाद मार्च 2024 में महिला को उसके पति ने मौलवी के पास ले जाया।

महिला के अनुसार, मौलवी ने झाड़-फूँक करने के नाम पर उसे अपने किले जैसे मकान में ले जाकर उसके साथ अश्लील हरकतें कीं और जब उसने इसका विरोध किया तो मौलवी ने उस पर इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाया। मौलवी ने हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अपशब्द कहे और उसे इस्लामी रीतियों को अपनाने के लिए कहा। महिला का आरोप है कि जब उसने मौलवी की बातों को मानने से इंकार किया, तो मौलवी ने जान से मारने की धमकी दी।

महिला ने शिकायत में यह भी बताया कि जब उसने मौलवी की अश्लील हरकतों का विरोध किया, तो मौलवी ने धमकी दी कि अगर उसने इस्लाम कबूल नहीं किया, तो वह उसके पूरे परिवार को खत्म कर देगा। मौलवी का कहना था कि उसके पास शैतानी ताकतें हैं, जिनके जरिए वह किसी भी व्यक्ति को नुकसान पहुँचा सकता है। इस धमकी के कारण महिला भयभीत हो गई और किसी तरह अपनी जान बचाकर वहाँ से भाग निकली।

धर्म परिवर्तन के और भी मामले

महिला का यह भी आरोप है कि मौलवी शान अहमद ने करीब 10-12 हिंदू लड़कियों और महिलाओं को मुस्लिम बनाकर अपनी खिदमत करवाता था। इन महिलाओं को आर्थिक और मानसिक रूप से कमजोर बनाकर, मौलवी उन्हें इस्लामी रीतियों को अपनाने के लिए मजबूर करता है। झाड़-फूँक और शैतानी ताकतों के नाम पर वह महिलाओं को अपने कब्जे में रखता और उनके साथ अनैतिक कार्य करता है।

महिला की शिकायत के आधार पर गाज़ीपुर पुलिस ने मौलवी के खिलाफ गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया है। पुलिस अधीक्षक डॉ. ईरज राजा ने कहा कि मामले की गहन जाँच की जा रही है और मौलवी के खिलाफ सभी सबूतों को एकत्रित किया जा रहा है। फिलहाल मौलवी फरार है, लेकिन पुलिस ने उसकी गिरफ्तारी के लिए तलाशी अभियान शुरू कर दिया है।

पुलिस ने इस घटना को बेहद गंभीरता से लिया है, खासकर उस समय जब उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। पुलिस यह सुनिश्चित कर रही है कि मामले की जाँच निष्पक्ष और त्वरित रूप से हो ताकि दोषी को जल्द से जल्द सजा दिलाई जा सके।

17000 फीट की ऊँचाई पर 17 किमी पैदल चले ‘डोगरा स्काउट्स’ के जवान, ग्लेशियर में खुदाई… जानिए UP के मलखान सिंह से लेकर केरल के थॉमस चेरियन का शव 56 साल बाद कैसे आया घर

56 साल बाद भारतीय वायुसेना के 4 बलिदानियों का शव उनके घर लौटा तो उनका ससम्मान अंतिम संस्कार हो पाया। इन बलिदानियों में एक नाम केरल के थॉमस चेरियन का भी था। 22 साल के चेरियन 1968 में हुए विमान हादसे के बाद गायब हुए थे। उसके बाद उनके परिवार को उनकी किसी भी तरह की सूचना का इंतजार था, लेकिन ये इंतजार 56 साल बाद खत्म हुआ।

भारतीय सेना के डोगरा स्काउट्स ने 30 सितंबर को सियाचिन ग्लेशियर से जब बलिदानियों के शव निकाले तो उसमें यूपी के सिपाही मलखान सिंह, सिपाही नारायण सिंह और मुंशी के शव के साथ थॉमस चेरियन का भी शव था। बाद में इन सबकी पहचान करके इन्हें इनके गृह नगर पहुँचाया गया और इनके परिजनों ने अपने मुताबिक शरीर का अंतिम संस्कार कर एक संतुष्टि जाहिर की। लेकिन, बलिदानियों को ये सम्मान दिलाने के लिए डोगरा स्काउट्स ने कितना संघर्ष किया इससे लोग अंजान हैं।

आइए जानते हैं किस तरह बलिदानियों का शव पहुंचाने के लिए काम किया गया

भारतीय वायुसेना के बलिदानियों के पार्थिव शरीर को उनके अपनों तक पहुँचाने के लिए डोगरा स्काउट्स के जवानों ने कड़ाके की ठंड में मेहनत की।

ऑन मनोरमा की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय वायुसेना के विमान का दुर्घटनास्थल ग्लेशियर से घिरे पर्वतमाला पर 14500 से 17000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। इस जगह तक पहुँचने में बहुत के रास्ते में तमाम दरारे आती है लेकिन डोगरा स्काउट्स ने योजना बनाकर इस खोज को सार्थक किया। उन्होंने रेको रडार तकनीक का प्रयोग किया जो 20 मीटर गहराई तक बर्फ में दबी धातु और वस्तुओं को पता लगाने में सक्षम होती है। इसके अलावा इलाके का मैप ड्रोन से खींची गई तस्वीरों से बनाया गया।

अधिकारी बताते हैं कि जब उन्होंने सब योजना के तहत काम शुरू किया तो मैन्युअल खुदाई के दौरान रडार सिग्नल मिले जिसके परिणामस्वरूप विमान का मलबा मिलने लगा। इसके बाद आगे अभियान जारी रखा गया तो अवशेष बरामद हुए। इसके बाद जवानों ने दुर्गम इलाकों को पार किया और 17 किलोमीटर तक पैदल चलकर शव वाहन की मदद से, फिर हवाई मार्ग से गृहनगर लेकर गए।

इन पार्थिव शरीरों को ढूँढने के मामले पर कर्नल पलरिया ने कहा कि वह दशकों से खोए सैनियों को ढूँढने के लिए अपना अभियान चला रहे हैं। इस योजना को इसलिए बनाया गया है ताकि बलिदान सैनिकों को वह सैन्य सम्मान मिले जिसके वे हकदार हैं।

1968 में हुआ विमान क्रैश

बता दें कि साल 1968 में इंडियन एयर फोर्स का AN-12 विमान क्रैश हो गया था। दुर्घटना 7 फरवरी 1968 को हुई थी। उस दिन भारतीय सैनिकों को लेह ले जाने के लिए सेना का विमान उड़ा लेकिन ये रोहतांग दर्रे के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विमान में तब 102 सैनिक सवार थे। लगातार भारतीय सेना तभी से बलिदानी सैनिकों के शव खोजने का प्रयास कर रही थी।

बाद में 2003 में वाजपेई सरकार के कार्यकाल में सेना ने यहाँ पर सर्च अभियान शुरू किया था, जिसके बाद भारतीय सेना, खासकर डोगरा स्काउट्स ने सालों तक कई सर्च ऑपरेशन चलाए। डोगरा स्काउट्स ने 2005, 2006, 2013 और 2019 में शवों की छानबीन जारी रखी।

उत्तर प्रदेश में रेलवे को निशाना बनाने की साजिश: साबरमती एक्सप्रेस के सामने फेंकी साइकिल, पातालकोट एक्सप्रेस के इंजन में फँसी ट्रैक पर रखी लोहे की छड़

उत्तर प्रदेश में हाल ही में रेलवे को निशाना बनाकर की जा रही घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों को चौकस कर दिया है। रेलवे ट्रैक पर जानबूझकर सरिया, लकड़ी, सिलेंडर, साइकिल फेंकने जैसी घटनाएँ गहरी साजिश का संकेत दे रही हैं। ललितपुर से लेकर संत कबीर नगर और कानपुर से लेकर मध्य प्रदेश तक ऐसी कई वारदातें सामने आ चुकी हैं। ताजे मामले में ट्रेन के सामने साइकिल फेंककर नुकसान पहुँचाने की कोशिश की गई है, तो एक अन्य मामले में ट्रेन के सामने सरिया रख दिया गया।

संतकबीर नगर: साबरमती एक्सप्रेस को बनाया निशाना

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, संतकबीर नगर में एक साइकिल साबरमती एक्सप्रेस के सामने फेंकी गई, जिससे ट्रेन का इंजन क्षतिग्रस्त हो गया। लोको पायलट ने इमरजेंसी ब्रेक लगाकर ट्रेन को तुरंत रोका, लेकिन इंजन में साइकिल फँस गई। रेल पुलिस के अनुसार शनिवार की सुबह करीब 6:30 बजे सुबह गोरखपुर से लखनऊ की ओर जा रही साबरमती एक्सप्रेस खलीलाबाद के पुराना आरटीओ कार्यालय के पास से गुजर रही थी। इस दौरान अज्ञात व्यक्ति ट्रेन के आगे साइकिल फेंककर भाग निकला। ट्रेन में फंसी साइकिल देख चालक ने सात सौ मीटर आगे जाकर ट्रेन रोक कर क्षतिग्रस्त हुई साइकिल निकाली। इसके बाद ट्रेन आगे रवाना हुई।

एसपी सत्यजीत गुप्ता सहित कोतवाली के साथ कई थानों के एसएचओ मौके पर पहुँचे। साथ ही जीआरपी के एसओ, सीओ, आरपीएफ के अधिकारी घटना स्थल के आस पास साइकिल फेंकने वाले की तलाश कर रहे हैं। हालाँकि इस घटना में किसी प्रकार की जनहानि नहीं हुई, लेकिन यह घटना रेलवे की सुरक्षा पर सवाल खड़ा करती है। यह घटना स्पष्ट करती है कि रेलवे के सुरक्षा तंत्र को और मजबूत करने की आवश्यकता है। पुलिस ने इसे बच्चों की शरारत मानकर जाँच की, लेकिन इससे बड़ी साजिश की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

ललितपुर: लोहे की छड़ से पातालकोट एक्सप्रेस को पलटाने की साजिश

ललितपुर में पातालकोट एक्सप्रेस के साथ भी एक गंभीर घटना घटी, जब ट्रैक पर रखी गई लोहे की छड़ ट्रेन के इंजन में फंस गई। ट्रेन संख्‍या 14624 पातालकोट एक्‍सप्रेस के इंजन में लोहे की सरिया फंस गई. जिससे चिंगारी निकलने लगी। गेटमैन की सूचना पर ट्रेन के लोको पायलट ने इमरजेंसी ब्रेक लगाकर बड़ी दुर्घटना होने से बचा लिया। पुलिस की जाँच में पता चला कि युवक सत्यम यादव ने रेलवे की कंस्ट्रक्शन साइट से छड़ चुराई थी और भागते समय ट्रेन के डर से इसे ट्रैक पर छोड़ दिया। इस घटना ने रेलवे की सुरक्षा में चूक को उजागर किया है और यह संकेत देती है कि ऐसी घटनाएँ सुरक्षा के बड़े खतरे का हिस्सा हो सकती हैं।

वारदातों के पीछे का मकसद क्या?

रेलवे को निशाना बनाकर की जा रही इन घटनाओं का मकसद केवल शरारत नहीं हो सकता। यह घटनाएँ आतंकी साजिशों का हिस्सा भी हो सकती हैं, जिनका मकसद भारत को बड़ा नुकसान पहुँचाना हो सकता है। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह जरूरी है कि वे इन वारदातों के पीछे के असली मकसद को समझें और इसके अनुसार कार्रवाई करें।

अमरावती से हरिद्वार तक ‘सिर तन से जुदा’ गैंग का उपद्रव, कहीं पुलिस पर हमला-कहीं भगवाधारी का फूँका पुतला: बोले बीजेपी MLA- डासना मंदिर पर हमला करने वालों का एनकाउंटर हो

डासना देवी मंदिर के महंत यति नरसिंहानन्द को गुस्ताख़ करार देते हुए मुस्लिम भीड़ ने शुक्रवार (4 अक्टूबर 2024) को देश के कई हिस्सों में हिंसा की। इसमें UP के बुलंदशहर और गाजियाबाद, महाराष्ट्र का अमरावती और उत्तराखंड का हरिद्वार शामिल हैं। अमरावती में भीड़ द्वारा थाने पर किए गए हमले में कई पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं। कई सरकारी वाहनों को तोड़ डाला गया है।

अमरवती में कई पुलिसकर्मी घायल

जुमे की नमाज़ के बाद हुए हिंसक प्रदर्शनों में सबसे अधिक प्रभावित महाराष्ट्र का अमरावती रहा। यहाँ के नागपुरी गेट पुलिस स्टेशन पर शुक्रवार रात लगभग 8:30 पर मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग पहुँचे। इन्होंने यति नरसिंहानंद के खिलाफ शिकायती पत्र देकर केस दर्ज करने की माँग शुरू कर दी। पुलिस ने इस शिकायत पर FIR दर्ज कर ली।

अभी पुलिस जरूरी कार्रवाई कर ही रही थी कि हजारों की तादाद में पहुँची मुस्लिम भीड़ ने थाने को घेर लिया और उन्मादी नारे लगाने लगी। पुलिसकर्मी भीड़ को समझाने की कोशिश ही कर रहे थे कि अचानक पत्थरबाजी शुरू हो गई। इस पथराव के चलते कुल 21 पुलिसकर्मी घायल हो गए। हालात काबू करने के लिए अतिरिक्त फ़ोर्स को बुलाया गया।

फोर्स के आने तक हमलावर भीड़ ने पुलिस के 10 वाहनों को तोड़ डाला। बाद में पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर किया। इस मामले में पुलिस ने 1200 उपद्रवियों पर केस दर्ज कर लिया है। कुछ हमलावरों को भी चिन्हित किया गया है। इन सभी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 299, 302 और 197 के तहत कार्रवाई की गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, CCTV फुटेज और अन्य माध्यमों से हमलावरों की पहचान की जा रही है। अब तक 26 हमलावरों को चिन्हित कर लिया गया है। इलाके में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) लागू कर दी गई है। इसके तहत 5 या उससे अधिक लोगों के जुटने पर रोक लगा दी गई है।

हरिद्वार में अल्लाह हु अकबर के नारे

मज़हबी उन्माद की लम्बी श्रृंखला की चपेट में उत्तराखंड का हरिद्वार भी आया। यहाँ दिन में यति नरसिंहानंद पर एक्शन की माँग की आड़ में जुटी मुस्लिम भीड़ ने भगवा वस्त्र का पुतला बनाया और इस पुतले को आग के हवाले करद दिया। इस दौरान जमकर नारेबाजी भी की गई। इसी के साथ रात में एक अन्य मुस्लिम भीड़ ने चौराहे पर जुटकर नारेबाजी की।

इस नारेबाजी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में दिख रहा है कि मुस्लिम भीड़ ‘अल्लाह हु अकबर’ जैसे भड़काऊ नारे के साथ-साथ ‘सिर तन से जुदा’ के नारे भी लगा रही है। यह नारेबाजी पुलिस के सामने ही की गई है। वीडियो में दिख रहा है कि पुलिसकर्मी भीड़ की ओर से लौटते दिख रहे हैं।

सहारनपुर में भी पुलिस चौकी पर हमले का प्रयास

गुस्ताखी की आड़ में हो रहे सिलसिलेवार उपद्रवों की लिस्ट में अब उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले का नाम भी जुड़ गया है। यहाँ के कोतवाली देहात क्षेत्र में शेखपुर कदीम पुलिस चौकी पर 6 अक्टूबर (रविवार) को एक मुस्लिम भीड़ यति नरसिंहानंद के खिलाफ ज्ञापन देने पहुँची थी। पुलिस इस ज्ञापन पर कार्रवाई कर ही रही थी कि अचानक भीड़ में शामिल कुछ लोगों ने हिंसा करनी शुरू कर दी। भीड़ द्वारा नारेबाजी की गई और पुलिस चौकी पर उपद्रव का प्रयास हुआ।

भीड़ की हिंसा का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। पुलिस ने फ़ौरन ही बल प्रयोग कर के हिंसक हो चुकी भीड़ को तितर-बितर किया। सहारनपुर जिले के पुलिस अधीक्षक नगर ने बताया कि केस दर्ज कर के जरूरी कानूनी कार्रवाई की जा रही है। कुछ हमलावरों को चिन्हित भी कर लिया गया है जिनकी तलाश में दबिश दी जा रही है। फ़िलहाल मौके पर हालात सामान्य बताए जा रहे हैं।

मंदिर पर हमला करने वालों का एनकाउंटर हो

उधर, गाजियाबाद में डासना मंदिर पर उन्मादी भीड़ के हमले के बाद आसपास के लोगों में आक्रोश पनप रहा है। शनिवार (5 अक्टूबर) को लोनी से भाजपा विधायक नन्द किशोर गुर्जर मंदिर पहुँचे। उन्होंने हमलावरों का एनकाउंटर करने की माँग की। भाजपा MLA ने कहा कि बेहतर होता कि हमले के दौरान पुलिस लाठीचार्ज के बजाय गोलियाँ बरसातीं।

नंद किशोर के मुताबिक, नरसिंहानंद का बयान दुनिया भर में में हो रहे हिन्दुओं के साथ इस्लामी अत्याचारों की वजह से आया है। मंदिर घेरने को उन्होंने सनातन और हिन्दुओं की आस्था पर हमला बताया। विधायक का दावा है कि हमले में अधिकतर लोग बाहरी थे। नंदकिशोर ने कहा, “यहाँ का मुसलमान तो भगवान राम को मानने वाला है। ये बेचारे को बलत्कार से बचने के लिए मुस्लिम बन गए।”

9 साल की हिंदू बच्ची से 55 साल के निसार कुरैशी ने किया बलात्कार, मोहल्ले में फल बेचता था: UP पुलिस ने दबोचा

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में 55 साल के निसार कुरैशी पर 9 साल की एक हिन्दू बच्ची से बलात्कार करने का आरोप लगा है। पुलिस ने इस मामले में केस दर्ज करके निसार कुरैशी को गिरफ्तार कर लिया है। उस पर पॉक्सो एक्ट सहित अन्य धाराओं में कार्रवाई की गई है। आरोपित निसार मोहल्ले में ठेला लगाकर फल बेचा करता था। घटना गुरुवार (3 अक्टूबर 2024) की है।

जिले के ढेबरुआ थाना क्षेत्र के बढ़नी बाजार में 9 साल की बच्ची अपने परिवार के साथ रहती है। बच्ची बेहद गरीब परिवार की है, जिसका पिता रिक्शा चलाकर परिजनों का भरण-पोषण करता है। बच्ची के पिता ने 3 अक्टूबर को थाने में तहरीर देकर बताया कि उसकी बेटी रोते हुए आई तो उसने इसकी वजह पूछा। तब बच्ची ने बताया कि निसार कुरैशी ने उसके साथ रेप किया है।

निसार बच्ची को एक सरकारी स्कूल के पीछे ले जाकर उसके साथ रेप किया। पुलिस ने पीड़िता का बयान दर्ज कर लिया है। रेप के कारण तबीयत बिगड़ने के बाद पीड़ित बच्ची को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। वहीं, बच्ची की काउंसिलिंग करवाई गई। कहा जा रहा है कि निसार ने पीड़िता के साथ पहले भी छेड़खानी की थी।

पुलिस ने निसार कुरैशी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 65(2) और पॉक्सो एक्ट के सेक्शन 5 (ड)/6 के तहत FIR दर्ज की है। ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है। निसार कुरैशी को जैसे ही जानकारी मिली कि उसके खिलाफ थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई है तो वह फरार हो गया। इसके बाद पुलिस ने उसे दबोचने के लिए टीम गठित कर दिया।

आरोपित मोहम्मद निसार कुरैशी की गिरफ्तारी के लिए टीम ने छापेमारी शुरू कर दी। आखिरकार शुक्रवार (4 अक्टूबर 2024) को निसार कुरैशी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उसकी गिरफ्तारी एक नहर के पास से हुई। वह कहीं भागने की फिराक में लगा हुआ था। पुलिस ने आरोपित को जेल भेज दिया है। मामले में पुलिस द्वारा जाँच व अन्य जरूरी कार्रवाई की जा रही है।

‘हम ड्यूटी पर जाएँगे, लेकिन कुछ भी नहीं खाएँगे’: बंगाल में जूनियर डॉक्टरों ने शुरू किया आमरण अनशन, कहा- ममता बनर्जी की सरकार ने पूरा नहीं किया वादा

पश्चिम बंगाल के कोलकाता में जूनियर डॉक्टर्स की ओर से शुरू किए गए आमरण अनशन ने एक बार फिर से राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं और डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरजी कर मेडिकल कॉलेज में 9 अगस्त को एक महिला ट्रेनी डॉक्टर के साथ हुए बलात्कार और उसकी हत्या के खिलाफ जूनियर डॉक्टर्स न्याय की माँग कर रहे हैं। यह मामला अब राज्य सरकार के लिए सिरदर्द बन चुका है, क्योंकि डॉक्टर्स का गुस्सा शाँत होने का नाम नहीं ले रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जूनियर डॉक्टर्स का आरोप है कि राज्य सरकार उनकी माँगों को लगातार नजरअंदाज कर रही है। डॉक्टरों ने 21 सितंबर को 42 दिनों के लंबे विरोध प्रदर्शन को समाप्त किया था, जब सरकार ने उनकी माँगों पर बातचीत करने का वादा किया था। इसके बाद डॉक्टर्स ने अपनी ड्यूटी पर लौटने का निर्णय लिया, लेकिन शनिवार (05 अक्टूबर 2024) शाम को उन्होंने आमरण अनशन शुरू कर दिया।

उनकी माँगें हैं—आरजी कर मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर की बलात्कार और हत्या की घटना पर त्वरित न्याय हो, स्वास्थ्य सचिव नारायण स्वरूप निगम को हटाया जाए, सभी अस्पतालों में सुरक्षा उपाय मजबूत किए जाएँ, और चिकित्सा संस्थानों में बुनियादी सुविधाओं में सुधार हो। उनकी सबसे महत्वपूर्ण माँग यह है कि अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में केंद्रीयकृत रेफरल प्रणाली लागू की जाए, ताकि अस्पतालों में बेड और इलाज की सुविधाओं की उपलब्धता पारदर्शी तरीके से सुनिश्चित हो सके।

डेडलाइन खत्म, अनशन शुरू

शुक्रवार (4 अक्टूबर 2024) को धर्मतला स्थित डोरीना क्रॉसिंग पर धरने पर बैठे डॉक्टर्स ने राज्य सरकार को अपनी माँगें पूरी करने के लिए 24 घंटे की डेडलाइन दी थी, लेकिन जब सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो उन्होंने शनिवार (05 अक्टूबर 2024) की शाम को अनशन शुरू कर दिया।

जूनियर डॉक्टर्स की ओर से जारी बयान में कहा गया, “हमने सरकार को 24 घंटे का समय दिया था, लेकिन हमारी माँगें पूरी नहीं की गईं। अब तक छह डॉक्टर्स ने आमरण अनशन शुरू किया है। हम ड्यूटी पर जाएँगे, लेकिन कुछ भी नहीं खाएँगे। अगर किसी डॉक्टर की तबियत बिगड़ती है, तो इसके लिए सरकार जिम्मेदार होगी।”

अनशन पर बैठीं डॉक्टर सायंतनी घोष हाजरा ने कहा, “जब तक हमारी मानवीय माँगों को पूरा नहीं किया जाता, हम यहाँ से नहीं हटेंगे। ‘अभया’ के साथ जो हुआ, वह किसी के साथ भी हो सकता था। यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि अब और ‘अभया’ न हों। हम भूख हड़ताल पर हैं, लेकिन वहीं दूसरी ओर हम देख रहे हैं कि एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार और हत्या हो गई… 9 अगस्त के बाद भी कई मामले सामने आए हैं, फिर भी सिर्फ हम छह लोग यहाँ अनशन पर बैठे हैं, जबकि बाकी डॉक्टर्स नवरात्रि के दौरान अपनी ड्यूटी पर लौट चुके हैं।”

जूनियर डॉक्टर्स का यह बयान राज्य सरकार के स्वास्थ्य तंत्र पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। वे अस्पतालों में मौजूदा बुनियादी सुविधाओं की कमी, जैसे सीसीटीवी कैमरों की अनुपस्थिति, ऑन-कॉल रूम की हालत और सुरक्षा की घोर लापरवाही पर भी रोष जता रहे हैं।

डॉक्टरों का यह भी आरोप है कि कोलकाता पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया और उन्हें धरनास्थल पर मंच लगाने की अनुमति नहीं दी। पुलिस का दावा था कि यह इलाका ट्रैफिक के लिए अहम है, जिससे ट्रैफिक में दिक्कत हो सकती है। जिसके बाद डॉक्टरों ने पुलिस पर अपने अधिकारों का हनन करने का भी आरोप लगाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को लगाई थी फटकार

आरजी कर अस्पताल में हुई इस घटना के बाद देशभर में डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर एक बड़ी बहस शुरू हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्य सरकार की सुस्त प्रगति पर कड़ी आपत्ति जताई है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर 15 अक्टूबर तक अस्पतालों में सुरक्षा उपायों में सुधार नहीं किया गया तो सरकार को सख्त कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा, “पश्चिम बंगाल के अस्पतालों में सुरक्षा के उपाय बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रहे हैं। अब तक सिर्फ 22% सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। आखिर क्यों 50% से अधिक काम किसी भी क्षेत्र में पूरा नहीं हुआ है?” सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को अस्पतालों में बुनियादी सुरक्षा सुविधाओं, जैसे सीसीटीवी कैमरे, ड्यूटी रूम और शौचालय, को प्राथमिकता से लागू करने के निर्देश दिए हैं।

इससे पहले, कोलकाता हाईकोर्ट ने इस मामले की जाँच केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी थी। अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार को डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त निर्देश दिए थे। इसके अलावा, एक राष्ट्रीय टास्क फोर्स गठित करने और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) की तैनाती का आदेश भी दिया गया था। कोर्ट ने राज्य सरकार से इस मामले में उठाए गए कदमों पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया था। अब यह मामला CBI की जांच के दायरे में है, जो डॉक्टर के साथ हुई इस भयावह घटना की पूरी सच्चाई को उजागर करेगी।

डॉक्टरों की लंबी लड़ाई जारी

डॉक्टर्स के संघर्ष का यह सिलसिला तभी शुरू हुआ जब 31 वर्षीय महिला डॉक्टर की बलात्कार और हत्या की खबर ने पूरे देश को हिला दिया था। जूनियर डॉक्टरों ने इसे अपनी सुरक्षा के खिलाफ एक चेतावनी के रूप में लिया और पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन किया। सुप्रीम कोर्ट ने भी डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर राज्य सरकार की सुस्ती पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। जूनियर डॉक्टर्स का कहना है कि अगर समय पर सुरक्षा उपाय होते, तो यह घटना रोकी जा सकती थी।

डॉक्टरों की हड़ताल और आमरण अनशन के बाद से राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। पश्चिम बंगाल के जूनियर डॉक्टर्स फ्रंट ने प्रेस रिलीज जारी कर कहा है कि डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में राज्य सरकार विफल रही है।