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गाजा पट्टी से आतंक की सरकार चला रहा था रावी मुश्तहा, इजरायल ने हवाई हमले में मार गिराया: हमास ने अपने लोगों से भी छिपाया राज

इजरायल ने गाजा पट्टी में इस्लामी आतंकी संगठन हमास की सरकार चलाने वाले रावी मुश्तहा को मार गिराने का ऐलान किया है। मुश्तहा के साथ हमास के दो और बड़े आतंकी मारे गए हैं। इजरायल ने यह हवाई हमला तीन माह पहले किया था। इसका खुलासा अब किया गया है।

इजरायली सेना ने एक बयान में बताया है कि इस हवाई हमले में उत्तरी गाजा का एक तहखाना निशाने पर था। इस हवाई हमले में मुश्तहा के साथ समेह अल सिराज और सामी औदेह को मार गिराया गया। रावी मुश्ताहा गाजा पट्टी का सर्वेसर्वा था। सिराज हमास का राजनीतिक ब्यूरो और हमास श्रम समिति के सुरक्षा पोर्टफोलियो का काम देखता था। औदेह दूसरे काम देखता था।

इजरायल के आधिकारिक बयान में बताया गया, “IDF और ISA की खुफिया जानकारी पर किए गए हमले के दौरान, इजरायली वायु सेना के लड़ाकू विमानों ने उत्तरी गाजा पट्टी में एक किलेबंद तहखाने में छिपे आतंकियों पर हमला किया और उन्हें मार गिराया। यह तहखाना हमास के कमांड और नियंत्रण केंद्र के रूप में काम करता था। इसके अंदर आतंकी शरण लेते थे।”

इसी बयान में इजरायल ने आगे बताया, “तहखाने पर हमले और आतंकियों के खात्मे के बाद भी हमास ने मुश्तहा की मौत की घोषणा नहीं की ,ताकि उसके आतंकियों का मनोबल ना गिरे।” बयान के अनुसार, रावी मुश्तहा हमास का एक प्रमुख एजेंट था, जिसका हमास सैनिकों की तैनाती पर सीधा प्रभाव था।

मुश्तहा गाजा पट्टी के भीतर नागरिक सरकार का नेतृत्व करता था और साथ ही आतंकी गतिवधियां चलाता रहता था। वह हमास के मुखिया याहया सिनवार का दायाँ हाथ था। मुश्तहा और याह्या सिनवार ने हमास का आतंकी ढाँचा बुना था। इन दोनों ने एक साथ इजरायली जेल में सजा काटी थी।

मुश्तहा को गाजा पट्टी में हमास के राजनीतिक ब्यूरो में सबसे वरिष्ठ माना जाता था। अक्टूबर, 2023 में इजरायल का गाजा से संघर्ष छिड़ने के बाद आतंकी अभियानों में शामिल होने के दौरान उसने हमास प्रशासन पर नागरिक नियंत्रण बनाए रखा। मुश्तहा सिनवार के करीबी विश्वासपात्रों में से एक था।

इससे कुछ ही दिन पहले इजरायल ने हिजबुल्लाह के मुखिया हसन नसरुल्लाह को मार गिराया था। उसे बेरुत में एक हवाई हमले में मारा गया था। इजरायल ने इसके अलावा हमास के एक बड़े आतंकी मोहम्मद दाईफ को भी जुलाई में मार गिराया था। इजरायल लगातार उसके दुश्मन आतंकी संगठनों का नेतृत्व खत्म करता जा रहा है।

इजरायल के इन हमलों के बीच ईरान ने भी उस पर मिसाइलें दागी हैं। ईरान के इन हमलों में कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि वह ईरान को माकूल जवाब देंगे। ईरान और इजरायल के बीच बढती अदावत के कारण मध्य एशिया में संकट और गहरा गया है।

इतना तो गिरगिट भी नहीं बदलता रंग, जितने विनेश फोगाट ने बदल लिए

ओलंपिक खेलों के बाद भारत आकर कॉन्ग्रेस ज्वाइन करने वाली विनेश फोगाट हरियाणा चुनावों के मध्य काफी चर्चा में हैं। अब तक लोग जहाँ उन्हें नारीशक्ति के रूप में कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर देख रहे थे। वहीं अब ये सवाल होने लगे हैं कि विनेश फोगाट राजनीति करने के लिए कितने सच और कितने झूठ बोल रही हैं।

एक के बाद एक विनेश फोगाट की वीडियो वायरल हो रही है जिसमें कॉन्ग्रेस की तारीफ करने के चक्कर में वो अलग-अलग दावे कर रही हैं और मोदी सरकार को लेकर विशुद्ध झूठ बोल रही हैं।

पहले तो उन्होंने एक जनसभा को संबोधित करते हुए ये कहा कि वो ओलंपिक में जाने का श्रेय अगर प्रियंका गाँधी को दें तो गलत नहीं होगा… उन्होंने ये क्या सोचकर कहा और कैसे प्रियंका गाँधी को श्रेय दिया जा सकता है ये तो नहीं पता, लेकिन लोग ये जानते हैं कि ओलंपिक तक विनेश को पहुँचाने के लिए मोदी सरकार ने कोई कसर नही छोड़ी थी।

ओलंपिक के बाद खुद खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने संसद में बताया था कि सरकार ने विनेश पर 70 लाख 45 हजार रुपए खर्च किए। उन्होंने कहा था कि विनेश को ट्रेनिंग के लिए विदेश भी भेजा गया था। क्या बिन इस समर्थन के विनेश का ओलंपिक जाना संभव था?

उस समय, इस पर सरकार ने कोई सफाई नहीं दी, उन्होंने बस अपने खिलाड़ी के लिए क्या किया इसकी एक जानकारी दी जो कोई भी सरकार देती…। इस पर भी एहसानफरामोश होकर विनेश ये बोलती दिखीं कि सरकार ने उन्हें ट्रेनिंग देकर या पैसे खर्च करके कोई एहसान नहीं किया ये सरकार का फर्ज था।

विनेश आज कॉन्ग्रेस ज्वाइन करके जिस प्रकार की राजनीति कर रही हैं अगर मोदी सरकार को ऐसी पॉलिटिक्स करनी होती तो फिर वो क्यों एक ऐसी खिलाड़ी को बढ़ावा देते जो चुनावों से ठीक पहले उनके खिलाफ माहौल बनाने का काम कर रही थीं…। मोदी सरकार ने राजनीति को किनारे रखकर विनेश के भीतर के खिलाड़ी को प्राथमिकता दी और उन्हें आगे बढ़ाया।

अगर बावजूद इस सच्चाई के, विनेश अब भी यही कहती हैं कि ओलंपिक के वक्त भी प्रियंका ही उनकी मददगार थीं तो क्या ये सवाल उठना नहीं बनता कि प्रियंका ने उनकी मदद किन मायनों में और कहाँ की? कैसे प्रियंका गाँधी की वजह से वो ओलंपिक में गईं?

इस झूठ की तरह विनेश का एक और झूठ सोशल मीडिया पर वायरल है। हाल में विनेश ने राजदीप सरदेसाई को इंटरव्यू देते हुए कहा कि भाजपा के किसी नेता ने उन्हें ओलंपिक के दौरान कॉल नहीं किया। वीडियो में उन्होंने ऐसे दिखाया जैसे मोदी सरकार उन्हें ओलंपिक के दौरान सपोर्ट नहीं कर रही थी। उनके साथ अन्य खिलाड़ियों से अलग बर्ताव कर रही थी…।

इस दावे की हकीकत को किसी पुराने उदाहरण के साथ गलत साबित करने की जरूरत नहीं है। विनेश ने द लल्लनटॉप को दिए बयान से ही खुद के इस झूठ का खंडन कर दिया। वीडियो में देख सकते हैं कि उन्होंने खुद कहा था कि ओलंपिक के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें फोन किया था लेकिन उन्होंने बात करने से मना कर दिया।

विनेश के मन में अगर राजनीति पहले से नहीं थी तो वो ऐसी स्थिति में एक ऐसे व्यक्ति का अनादर नहीं करतीं जो देश के प्रधानमंत्री हैं और उससे भी बड़ी बात उन्हें हौंसला देने के लिए उनसे बात करना चाहते थे…? उन्होंने पहले बात करने को नकारा और उसके बाद कॉन्ग्रेस ने इस हरकत को प्रमोट किया ।

विनेश के जब झूठ पकड़े गए.. फजीहत ज्यादा हुई तो क्या किया जाता… कॉन्ग्रेस ने उनकी एक वीडियो बनाई। वीडियो में उन्होंने बताया कि ओलंपिक खेल के बाद प्रधानमंत्री मोदी से बात करने के लिए उनके कमरे में कैमरे लगाए गए थे और उन्हें खुद अपने फोन से वीडियो नहीं बनाने दी जा रही थी, इसलिए उन्होंने बात करने से मना कर दिया।

विनेश जहाँ अपने हर बयान के साथ पक्ष बदल रही थीं वहीं उनकी पार्टी कॉन्ग्रेस इससे भी ज्यादा घिनौनी हरकत करने में लगी थी। उन्होंने अपनी वीडियो के थंबनेल से मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए उसमें ऐसे दिखाया जैसे मोदी सरकार ने रात भर विनेश फोगाट के बेडरूम से लेकर हर जगह पर कैमरे फिट करवा दिए थे और वो विनेश की रिकॉर्डिंग करना चाहते थे।

जब सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठाने लगे तो बड़ी चालाकी से उस थंबनेल को बदल दिया गया। हालाँकि स्क्रीनशॉट वायरल होने के चलते ये घटिया हरकत छिप नहीं पाई। देख सकते हैं कि विनेश की कही गई बातों को जनता तक पहुँचाने का तरीका कितना ज्यादा भ्रमित करने वाला है।

अजीब बात ये है कि कॉन्ग्रेस की इस हरकत पर विनेश फोगाट ने विरोध तक नहीं किया। राजनीति में आकर वह ये तक भूल गईं कि जिस मोदी सरकार पर वह इतने बड़े-बड़े लांछन लगा रही है। उस मोदी सरकार ने न केवल उनकी ट्रेनिंग को प्रमुखता से कराया बल्कि वित्तीय सहायता भी खी। इसके अलावा खेल क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 2016 में अर्जुन पुरस्कार और 2020 में ध्यानचंद खेल रत्न दिया।

इसके अलावा ओलंपिक में भी ट्रेनिंग, पर्सनल स्टाफ और वित्तीय सहायता से लेकर हर प्रकार की सहायता तब मिली जब भाजपा केंद्र और उनके गृह राज्य हरियाणा में सत्ता में थी। बावजूद इन सब सच्चाइयों के विनेश झूठ बोलने में जुटी हैं। उनकी बहन बबीता फोगाट खुद मानती हैं कि विनेश बदल गई हैं।

उन्होंने बताया कि जब विनेश के पिता का देहांत हुआ था तब उनके पिता यानी महावीर फोगाट ने उनकी दोबारा कुश्ती में वापसी कराई थी। मगर जब वो ओलंपिक से लौटीं तो उन्होंने अपने गुरु को धन्यवाद देना तो दूर, दीपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ रोड शो किया था जैसे हुड्डा ही उनके कोच हों।

गौरतलब है कि अपने ओलंपिक में डिस्क्वालिफाई होने को भी विनेश फोगाट ने हरियाणा चुनावों में एक बड़ा मुद्दा बना दिया है। भाजपा सरकार ने उनके सम्मान में उन्हें रजत विजेता की तरह हर सुविधा देने का ऐलान किया था लेकिन विनेश चुनावों के लिए जगह-जगह घूमकर ये दिखा रही हैं जैसे ओलंपिक में भी हारी वह मोदी सरकार के कारण ही थीं । जबकि, सच्चाई तो ये है कि मोदी सरकार ने उन्हें हराने क प्रयास नहीं बल्कि उन्हें विजेता साबित करवाने के लिए जी-जान लगाई थी। सरकार की तरफ से वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे को भेज विनेश के लिए अपील की गई थी, लेकिन वजन ज्यादा निकलने की वजह विनेश डिस्क्वालिफाई हुईं और अब वो उसी बात को भूल गई हैं। उनकी आँख पर सिर्फ राजनीति की पट्टी चढ़ गई हैं जो उन्हें आवाज उठाने का अर्थ सिर्फ मोदी सरकार का विरोध बता रही है।

सनातन रक्षा दल के अध्यक्ष गिरफ्तार, चला रहे थे साईं मूर्तियों को गंगा में प्रवाहित करने का अभियान: वाराणसी के 14 मंदिरों से हटाई जा चुकी है प्रतिमा, 60 की लिस्ट है तैयार

उत्तर प्रदेश के वाराणसी के मंदिरों से साईं की मूर्तियाँ हटाने वाले अजय शर्मा को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। बुधवार (2 अक्टूबर 2024) की रात 2 बजे अजय शर्मा मंदिरों से साईं की मूर्तियाँ हटाने के लिए घर से निकला था। इसकी सूचना मिलते ही सादी वर्दी में पुलिस पहुँची और रास्ते से ही उसे उठा लिया। उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।

DCP काशी गौरव बंसवाल ने बताया कि सनातन रक्षक दल के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा को शांतिभंग के आरोप में हिरासत में लिया गया। इस बीच, चौक स्थित आनंदमई मंदिर के पुजारी ने चौक थाने में अजय शर्मा के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। इसके बाद पुलिस ने धार्मिक परंपराओं, धार्मिक स्थलों या प्रतीकों के अपमान, शांतिभंग आदि के आरोपों में मुकदमा दर्ज करके उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

इसी आरोप में साईं भक्तों ने भी अजय शर्मा के खिलाफ सिगरा थाने में तहरीर दी है। इससे पहले शर्मा के घरवालों ने आरोप लगाया था कि रात 2 बजे मैदागिन चौराहे से नीली कार से आए कुछ युवक उसे उठा ले गए। उसके दोनों मोबाइल नंबर ऑफ हैं। पुलिस कमिश्नर से साईं मंदिर के प्रबंधकों ने मुलाकात की। काशी के सभी 72 मंदिरों की सुरक्षा की माँग की है।

सनातन रक्षक दल ने 1 अक्टूबर को वाराणसी के 14 मंदिरों से साईं की मूर्तियाँ हटाई थीं। संस्थान का दावा है कि अभी 60 और मंदिरों की लिस्ट है। इधर, लखनऊ में भी अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने मंदिरों से साईं मूर्तियों को हटाने की माँग की है। महासभा का कहना है कि मंदिरों में साईं मूर्तियों को स्थान नहीं दिया जाएगा।

इस घटना के बाद महाराष्ट्र स्थित शिरडी साईं ट्रस्ट ने इस पर तत्काल रोक लगाने की माँग की। शिरडी साईं ट्रस्ट का कहना है, “हमने महाराष्ट्र सरकार से बात की है और उनसे कहा है कि यूपी सरकार से इस मसले पर बातचीत करे। मूर्तियाँ हटाने पर तत्काल रोक लगाई जाए। ऐसे कार्य से साईं भक्तों की भावना आहत हो रही है।” उसने कहा कि ऐसे 100 मंदिरों की सूची बनाई गई है।

इस घटना से पहले अजय शर्मा ने दैनिक भास्कर से कहा था कि काशी भगवान शिव की नगरी है। यहाँ साईं बाबा का कोई काम नहीं है। मूर्तियाँ हटाने का संकल्प 2 साल पहले लिया था। तभी अभियान का आगाज हुआ था। लोगों को जागरूक करने में इतना समय लगा। शर्मा ने कहा कि काशी खंड के सभी मंदिरों से साईं की मूर्तियों को हटाया जाएगा। अगर किसी को पूजा करनी है तो वह घर में करे।

बता दें कि केंद्रीय ब्राह्मण सभा के विरोध के बाद मूर्तियाँ हटाई गई थीं, जिसमें साईं की पूजा को सनातन धर्म विरोधी बताया गया था। मूर्तियाँ हटाने से पहले संबंधित मंदिरों की सहमति ली गई है और उन्हें विधि-विधान से गंगा में विसर्जित किया जा रहा है। जिन प्रमुख मंदिरों से साईं की प्रतिमाएँ हटाई गई हैं, उनमें बड़ा गणेश मंदिर, त्र्यंबकेश्वर मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर और पुरुषोत्तम मंदिर शामिल हैं।

जितना पैखाना, उतना देना होगा पैसा: हिमाचल प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार वसूलेगी सीवर टैक्स, कमाई बढ़ाने के लिए गाँवों में पानी की फ्री आपूर्ति बंद-शहरों में रेट बढ़ा

हिमाचल प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार अब लोगों पर टॉयलेट टैक्स भी लगाएगी। आर्थिक संकट में फंसे राज्य के राजस्व बढ़ाने को राज्य की सुक्खू सरकार ने यह फार्मूला निकाला है। राज्य सरकार शहरी इलाकों में हर घर से अब शौचालय पर टैक्स वसूलने जा रही है। इसकी दरें भी जारी कर दी गई हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के जल शक्ति विभाग ने हाल ही में फैसला लिया है कि अब राज्य के शहरी इलाकों में हर घर से सीवर टैक्स लिया जाएगा। जल शक्ति विभाग घरों में लगी प्रत्येक टॉयलेट सीट पर ₹25/माह का टैक्स लगाएगा। यानी एक घर में जितने शौचालय बने होंगे, उनसे उतना अधिक टैक्स वसूला जाएगा।

हिमाचल प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार का कहना है कि इससे उसके राजस्व में वृद्धि होगी। इसके अलावा पानी की दरों में भी कॉन्ग्रेस सरकार ने बदलाव किए हैं। उसने ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की मुफ्त आपूर्ति भी बंद कर दी है। अब ग्रामीण इलाकों में पानी लेने वालों को हर ₹100/माह देना होगा।

इसके अलावा शहरों में भी पानी की दरों में बदलाव किया गया है। सुक्खू सरकार ने गैर घरेलू पानी कनेक्शन के लिए और भी अधिक पानी की दरें रखी हैं। पानी की दरों के अलावा मेंटेनेंस चार्ज भी लगाया जाएगा। इन सबके जरिए सुक्खू सरकार अपना खजाना भरेगी।

हिमाचल प्रदेश में शौचालय पर टैक्स से पहले भी सुक्खू सरकार कमाई के जरिए बढ़ाने के लिए जनता पर बोझ बढ़ाती रही है। हाल ही में उसने राज्य में वाहनों की बिक्री पर ग्रीन टैक्स लगाया था। यह टैक्स वाहनों की खरीद के साथ लगेगा।

जहाँ एक ओर सरकार लोगों पर टैक्स का बोझ बढ़ाती जा रही है, वहीं दूसरी ओर उनको दिए जाने वाले फायदे भी घटाए जा रहे हैं। हाल ही में हिमाचल प्रदेश में आयकर भरने वालों को दी जाने वाली 125 यूनिट मुफ्त बिजली की योजना सुक्खू सरकार ने बंद कर दी थी। अब उसने उद्योगों को दी जाने वाली ₹1 की सब्सिडी भी बंद कर दिया है।

सुक्खू सरकार के अंतर्गत हिमाचल प्रदेश की आर्थिक हालत इतनी बिगड़ चुकी है कि वह सितम्बर माह में कर्मचारियों को तनख्वाह और पेंशन तक नहीं समय से दे पाया था। सुक्खू सरकार राज्य में कई रेवड़ी योजनाओं का ऐलान करके सत्ता में आई थी। इन पर भी काम नहीं हो पाया है।

आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया की है स्थिति

हिमाचल की बदहाल आर्थिक स्थिति इसके 2024-25 के बजट से समझी जा सकती है। वित्त वर्ष 2024-25 के लिए ₹58,444 करोड़ का बजट सुक्खू सरकार ने पेश किया था। इस बजट में भी सरकार का राजकोषीय घाटा (सरकार की आय और खर्चे के बीच का अंतर, जिसे कर्ज लेकर पूरा किया जाता है) ₹10,784 करोड़ है।

इस बजट का बड़ा हिस्सा तो केवल पुराने कर्जा चुकाने और राज्य के कर्मचारियों की पेंशन और तनख्वाह देने में ही चला जाएगा। इस बजट में से ₹5479 करोड़ का खर्च पुराने कर्ज चुकाने, ₹6270 करोड़ का खर्च पुराने कर्ज का ब्याज देने में करेगी। यानी पुराने कर्जों के ही चक्कर बजट का लगभग 20% हिस्सा चला जाएगा।

इसके अलावा सुक्खू सरकार तनख्वाह और पेंशन पर ₹27,208 करोड़ खर्च करेगी। इस हिसाब से देखा जाए तो ₹38,957 का खर्च तो केवल कर्ज, ब्याज, तनख्वाह और पेंशन पर ही हो आएगा। यह कुल बजट का लगभग 66% है। अगर नए कर्ज को हटा दें तो यह हिमाचल के कुल बजट का 80% तक पहुँच जाता है। यानी राज्य को बाकी खर्चे करने की स्वतंत्रता ही नहीं है।

हिमाचल प्रदेश 2024-25 में लगभग ₹1200 करोड़ सब्सिडी पर भी खर्च करने वाला है। यह धनराशि सामान्य तौर पर छोटी लग सकती है, लेकिन आर्थिक संकट में फंसे हिमाचल के लिए यह भी भारी पड़ रही है। इस सब्सिडी में सबसे बड़ा खर्चा बिजली सब्सिडी का है।

जिस स्कूल का तारणहार बना अडानी फाउंडेशन, वहाँ संसाधन-गुणवत्ता पर काम कैथोलिक ननों को नहीं आया रास: कहा- नाम में से ‘माउंट कार्मेल’ निकालो

भारत स्थित दुनिया की प्रमुख कंपनी अडानी समूह ने अपनी NGO अडानी फाउंडेशन नाम के के माध्यम से महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में स्थित घुघुस में एक निजी क्रिश्चियन स्कूल का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया है। स्कूल शिक्षा विभाग ने राज्य के लगभग नौ स्कूलों के प्रबंधन के हस्तांतरण के लिए एक सरकारी संकल्प (जीआर) जारी किया है।

इसमें चंद्रपुर जिले के घुघुस में माउंट कार्मेल कॉन्वेंट स्कूल का प्रबंधन अडानी फाउंडेशन को सौंपना भी शामिल है। स्कूल स्व-वित्तपोषित है और यहाँ कक्षा 1 से 12 तक पढ़ाई होती है। सरकारी निर्णय में कहा गया है, “माउंट कार्मेल कॉन्वेंट हाई स्कूल का प्रबंधन अडानी फाउंडेशन को सौंपने का प्रस्ताव विचाराधीन था। नियम और शर्तों के साथ मंजूरी दी गई है।”

इसमें यह शर्त थी कि अडानी फाउंडेशन विद्यार्थियों की न्यूनतम संख्या की सीमा को नहीं बदल सकता है। इसके साथ उसे शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की पूरी जिम्मेदारी लेनी होगी। स्कूल की मंजूरी की शर्तों में कोई बदलाव नहीं होगा। आदेश में कहा गया है कि अडानी फाउंडेशन को स्कूल, शिक्षकों, गैर-शिक्षण कर्मचारियों और उनके वेतन आदि के संबंध में नियम-आदेशों का पालन करना होगा।

इसके अलावा, विद्यार्थियों से संबंधित नियम-आदेशों का भी पालन करना होगा। स्कूल शिक्षा विभाग ने अपने आदेश में यह चेतावनी भी दी है कि अगर उसे स्कूल चलाने और कर्मचारियों की सेवा शर्तों के उल्लंघन जैसे नियमों और विनियमों के उल्लंघन के बारे में कोई शिकायत मिलती है तो प्रबंधन के स्थानांतरण को रद्द करने का अधिकार सुरक्षित है।

उधर, अडानी फाउंडेशन ने कहा है कि ACC लिमिटेड के स्वामित्व वाले माउंट कार्मेल कॉन्वेंट सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्रबंधन का हस्तांतरण कार्मेल एजुकेशन सोसाइटी की इच्छा और निर्णय के अनुसार शुरू किया गया था। जून 2023 में एसीसी लिमिटेड ने कार्मेल एजुकेशन सोसाइटी के निर्णय को स्वीकार कर लिया और अडानी फाउंडेशन से स्कूल का प्रबंधन सँभालने का अनुरोध किया था।

दरअसल, इस स्कूल का निर्माण ACC लिमिटेड द्वारा अपने कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के तहत किया गया था। बता दें कि अडानी समूह एसीसी लिमिटेड का बहुमत शेयरधारक है। अडानी फाउंडेशन ने कहा कि स्कूल को बुनियादी ढाँचे में वृद्धि की सख्त जरूरत थी और इसके लिए प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। फाउंडेशन ने आधिकारिक तौर पर सितंबर 2024 में प्रबंधन ग्रहण किया।

अडानी फाउंडेशन द्वारा स्कूल का प्रबंधन सँभालने के बाद ‘कॉन्ग्रेगेशन ऑफ़ द मदर ऑफ़ कार्मेल (सीएमसी)’ से संबंधित ननों ने स्कूल छोड़ दिया। उन्होंने यह भी माँग की है कि स्कूल में अब ‘माउंट कार्मेल’ को हटा देना चाहिए। नहीं रखा जाना चाहिए। स्कूल की पूर्व प्रिंसिपल लीना ने कहा कि ननों ने स्कूल छोड़ने का फैसला किया, क्योंकि वे अडानी समूह के तहत काम नहीं करना चाहती थीं।

लीना ने कहा, “अडानी की प्राथमिकता व्यावसायिक हित हैं। उनकी नीति और हमारी नीति पूरी तरह से अलग है, इसलिए हम स्कूल छोड़ दिए।” साल 1972 से नन ने ACC के स्वामित्व वाले इस स्कूल का प्रबंधन किया है। इस ACC (Associated Cement Companies) लिमिटेड सीमेंट फैक्ट्री को अडानी समूह ने साल 2022 में स्विट्जरलैंड स्थित होलसिम से अधिग्रहण कर लिया था।

इसी साल यानी 2022 में ही लगभग 2,000 छात्रों वाले इस को-एड विद्यालय ने अपनी स्वर्ण जयंती मनाई थी। अब यह अडानी फाउंडेशन के अधीन है। बता दें कि अडानी फाउंडेशन की स्थापना साल 1996 में की गई थी। यह वर्तमान में 19 राज्यों के 6,769 गाँवों में काम करता है और नए भारत की उभरती जरूरतों को पूरा करना चाहता है।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन का केस अब सुप्रीम कोर्ट खुद देखेगा, हाई कोर्ट के आदेश पर रोक: तमिलनाडु पुलिस ने बटालियन भेज आश्रम की ली थी तलाशी

सुप्रीम कोर्ट से सद्गुरु जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन को राहत मिली है। ईशा फाउंडेशन की जाँच वाले मद्रास हाई कोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। जिस मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने यह आदेश दिया था, उसे भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने पास स्थानांतरित कर लिया है।

सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने गुरुवार (3 सितम्बर, 2024) को इस मामले में सुनवाई की। यह याचिका ईशा फाउंडेशन की तरफ से दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया कि अब ईशा फाउंडेशन के कोयम्बटूर आश्रम पर कोई भी पुलिस कार्रवाई ना की जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी के साथ कहा कि मद्रास हाई कोर्ट ने जिस याचिका की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है, वह उसकी सुनवाई अब खुद करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इसी के साथ ही मद्रास हाई कोर्ट के निर्णय पर भी रोक लगा दी है। उसने कहा है कि मद्रास हाई कोर्ट में याचिका दायर करने वाले को सुप्रीम कोर्ट में हाजिर होना होगा।

ईशा फाउंडेशन को लेकर सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश उस पर इस सप्ताह दो दिन हुई पुलिस जाँच के बाद आया है। ईशा फाउंडेशन की जाँच का आदेश मद्रास हाई कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए दी थी। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि उसकी दो बेटियों को ईशा फाउंडेशन ने बंधक बना रखा है और उन्हें बाहर नहीं आने देता।

यह आरोप लगाया कि अंदर ऐसा खाना-पीना और दवाइयाँ दी जाती हैं जिनके कारण लोगों की बाकी क्षमताएँ कम हो जाती हैं। याचिका में यह आरोप भी लगाया गया कि उनकी दोनों बेटियों का आश्रम आने से पहले अच्छा करियर था और जीवन था। लेकिन आश्रम में जाने के बाद उनका करियर ठप हो गया और उन्हें संत बनने की तरफ धकेला गया।

याचिकाकर्ता का कहना था कि सद्गुरु जग्गी का आश्रम लोगों को अपना सामान्य जीवन छोड़ कर साधु बनने के लिए ब्रेनवाश करता है। यह भी आरोप लगाया कि इस दौरान लोगों को उनके परिवार से नहीं मिलने दिया जाता और उनका बाहरी दुनिया से सम्पर्क काट दिया जाता है।

मद्रास हाई कोर्ट ने इस दौरान कहा था, ”हम जानना चाहते हैं कि आखिर एक व्यक्ति जिसने अपनी बेटी की शादी कर दी और उसका जीवन अच्छी तरह से स्थापित कर दिया, वह दूसरों की बेटियों को सिर मुंडवाने और एकांत में जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित क्यों कर रहा है?”

मद्रास हाई कोर्ट ने इसके बादआधार पर प्रशासन को आदेश दिया था कि वह ईशा फाउंडेशन के आश्रम के भीतर जाँच करे और इसकी रिपोर्ट कोर्ट के सामने रखे। हाई कोर्ट ने इसी के साथ ईशा फाउंडेशन के विरुद्ध पहले दर्ज किए गए मामलों की जानकारी भी माँगी थी। इसी के बाद आश्रम के भीतर पुलिस पहुँची थी।

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई में वह दोनों महिलाएँ भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिग के जरिए पेश हुईं, जिनके पिता ने जबरदस्ती संत बनाए जाने और बंधक बनाए जाने का आरोप लगाया है। महिलाओं से CJI चंद्रचूड़ ने इस दौरान बात भी की। महिलाओं से बात करने के बाद उन्होंने यह आदेश पारित किया।

कोर्ट ने कहा, “न्यायालय ने दोनों महिलाओं से बातचीत की है। बातचीत के दौरान, दोनों ने बताया कि वह 24 और 27 वर्ष की आयु में आश्रम में आईं थी। उन्होंने कहा कि वे स्वेच्छा से रह रही हैं और वे आश्रम से बाहर आने-जाने के लिए स्वतंत्र हैं।”

कोर्ट ने आगे कहा, “पुलिस की मौजूदगी के बारे में दोनों का कहना है कि वह कल रात परिसर से चली गई, वह 2 दिन से वहीं मौजूद थी। दोनों का कहना है कि उनकी माँ ने करीब 8 साल पहले भी ऐसी ही याचिका दायर की थी, जिसमें पिता भी पेश हुए थे।” सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब ईशा फाउंडेशन के विरुद्ध हो रही कार्रवाई रुक गई है।

इंतजार करते-करते माता-पिता, पत्नी-पुत्र सबकी हो गई मौत… 56 साल बाद घर आया बलिदानी जवान का शव: पौत्र ने दी मुखाग्नि, मजदूरी कर जीवनयापन कर रहे परिजन

देश के लिए बलिदान होने वाले हर सैनिक के परिवार को अंतिम दर्शन के लिए शव का इंतजार होता है, लेकिन ये इंतजार हर बार पूरा हो जरूरी नहीं। कई दफा बलिदानी के परिवार को उनके शव की अंत्येष्टि करने का मौका भी नहीं मिलता। धीरे-धीरे उम्मीद टूट जाती है।

आईएएफ में तैनात मलखान सिंह के परिवार को भी यही लगा था जब 56 साल पहले 1968 में एक प्लेन क्रैश के बाद मलखान का कहीं कोई पता नहीं चला। 56 सालों में सबका इंतजार खत्म था, किसी ने सोचा भी नहीं था कि उस हादसे के 5 दशक बाद शव ससम्मान घर आएगा और उन्हें अंतिम संस्कार का मौका मिलेगा।

कुछ दिन पहले 30 सितंबर को ग्लेशियर में 56 साल बाद जब भारतीय वायुसेना के जवान मलखान सिंह का शव खोजा गया तो इसकी सूचना परिवार तक पहुँची। लोग समझ ही नहीं पाए कि वो इस खबर को सुन कैसी प्रतिक्रिया दें। उनकी एक पीढ़ी खत्म हो चुकी थी। पोते-पोती थे जिन्होंने सिर्फ मलखान सिंह की लोगों से कहानियाँ सुनी थीं।

उनके अलावा सबसे छोटा भाई था जिनकी आँख में ये खबर सुनते ही आंसू आ गए। उन्होंने बस यही कहा किसी को यकीन ही नहीं था ऐसा हो सकता है। ये शव कुछ साल पहले मिल गया होता तो शायद उनकी पत्नी और बेटे उनका अंतिम संस्कार कर पाते।

वहीं मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पोते गौतम और मनीष, जो मजदूरी करके अपना परिवार पालते हैं, उन्होंने कहा, “दादा को देखा तो नहीं है, लेकिन उन्हें दादा पर गर्व है। इस बात का संतोष है कि देश की खातिर दादा बलिदानी हुए और उनका अंतिम संस्कार विधि-विधान से परिवार के लोग कर पाएँगे।”

शहीद मलखान सिंह का जन्म 18 जनवरी 1945 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के थाना नानौता क्षेत्र के फतेहपुर गाँव में हुआ था। जिस समय वह बलिदान हुए तब उनकी उम्र मात्र 23 साल थी। हादसे के बाद से ही उनका कोई पता नहीं चल पाया था। बाद में उनकी गर्भवती पत्नी की शादी मलखान सिंह के छोटे भाई चंद्रपाल सिंह से करवा दी गई थी। परिवार उनकी राह देखता रहा। आखिर तक मलखान सिंह को मृतक नहीं माना गया और परिवारजन उनका इंतजार करते रहे। कुछ समय बाद माता-पिता का देहांत हो गया, फिर पत्नी का, भाइयों का और फिर बेटे और बेटी का भी। अब उनके परिवार में सिर्फ छोटे भाई और पोते-पोती बचे हैं जिनकी मौजूद में उनका अंतिम संस्कार विधि विधान से हुआ।

56 साल पहले हुई दुर्घटना

बता दें कि साल 1968 में इंडियन एयर फोर्स का AN-12 विमान क्रैश हो गया था। दुर्घटना 7 फरवरी 1968 को हुई थी। उस दिन भारतीय सैनिकों को लेह ले जाने के लिए सेना का विमान उड़ा लेकिन ये रोहतांग दर्रे के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विमान में तब 102 सैनिक सवार थे। लगातार भारतीय सेना तभी से बलिदानी सैनिकों के शव खोजने का प्रयास कर रही थी।

बाद में 2003 में वाजपेई सरकार के कार्यकाल में सेना ने यहाँ पर सर्च अभियान शुरू किया था, जिसके बाद भारतीय सेना, खासकर डोगरा स्काउट्स ने सालों तक कई सर्च ऑपरेशन चलाए। डोगरा स्काउट्स ने 2005, 2006, 2013 और 2019 में शवों की छानबीन जारी रखी।

अधिकारियों ने बताया कि दुर्घटना स्थल की कठोर परिस्थितियों और चुनौतीपूर्ण भू-भाग के कारण 2019 तक केवल 5 शव बरामद किए गए थे और अब 30 सितंबर को 4 बलिदानियों का शव मिला है जिनमें एक मलखान सिंह का भी है। बताया जा रहा है कि बर्फ में रहने के कारण शव को नुकसान नहीं हुआ था। उनके शव के साथ केरल के थॉमस चेरियन का शव भी मिला है। वो भी उस समय मात्र 22 साल के थे। उनके परिवार ने भी सेना के प्रयासों के लिए उनका आभार व्यक्त किया है।

मृतसंग्रहणम्, ध्वजारोहणम्, स्नपनम्, चक्रस्नानम्… जानिए क्या है ब्रह्मोत्सवम्, क्या हैं इसके विधान: तिरुपति मंदिर में महाउत्सव की तैयारियाँ संपन्न, प्रतिदिन बनेंगे 72 लाख मोदकम्

तिरुपति मंदिर के प्रसाद लड्डू में जानवरों की चर्बी वाले घी को लेकर उठे विवाद के बीच वेंकटेश्वर मंदिर अब ब्रह्मोत्सव की तैयारी कर रहा है। यह त्योहार नौ दिनों तक चलेगा, जिसमें प्रतिदिन लगभग एक लाख भक्तों के आने की उम्मीद है। यह विशाल उत्सव 4 से 12 अक्टूबर तक आयोजित किया जाएगा। इससे पहले मंगलवार (1 अक्टूबर 2024) को मंदिर शुद्धिकरण का पारंपरिक अनुष्ठान किया गया।

मंदिर का प्रबंधन करने वाले तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) के कार्यकारी अधिकारी जे श्यामला राव ने बताया कि यह अनुष्ठान ‘कोइल अलवर तिरुमंजनम’ के नाम से मशहूर है। यह अनुष्ठान सभी प्रमुख त्योहारों से पहले साल में चार बार किया जाता है। ये त्योहार हैं तेलुगु उगादी, अनिवरा अस्थानम, वैकुंठ एकादशी और ब्रह्मोत्सवम।

अनुष्ठान के दौरान मंदिर परिसर, मूर्तियों और पूजा के बर्तनों को साफ किया जाता है। मंदिर की दीवारों, छतों और खंभों पर ‘परिमलम’ नामक एक विशेष सुगंधित मिश्रण लगाया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया सुबह 6 बजे से 10 बजे के बीच होती है। इस दौरान मुख्य देवता को सफेद आवरण से ढक दिया जाता है और सफाई पूरा होने के बाद इसे हटा जाता है। बाद में देवता को विशेष पूजा और नैवेद्यम अर्पित किए जाते हैं।

बताते चलें कि मंदिर में लड्डू बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले घी में जानवरों की चर्बी मिले होने की बात सामने आने के बाद TTD ने घी रखने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले टैंकों और भंडारण क्षेत्र में शुद्धिकरण अनुष्ठान कराया था। ये अनुष्ठान लड्डू और अन्य प्रसाद तैयार करने और रखने वाली जगह के साथ-साथ रसोई और प्रसाद रखने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली बर्तन के लिए किया गया था।

अधिकारियों ने बताया कि ‘पोटू’ के नाम से प्रसिद्ध रसोई में प्रतिदिन 65,000-80,000 तीर्थयात्रियों के लिए लगभग 3.5 लाख लड्डू तैयार किए जाते हैं। अब ब्रह्मोत्सव के दौरान प्रतिदिन कम से कम 8 लाख लड्डू बनाने की तैयारी की जा रही है। माना जा रहा है कि ब्रह्मोत्सव के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या प्रतिदिन लगभग एक लाख होने की उम्मीद है।

क्या होता है ब्रह्मोत्सव

ब्रह्मोत्सवम नौ दिनों तक चलने वाला एक उत्सव है। हर साल तिरुमाला तिरुपति श्री वेंकटेश्वर मंदिर में मनाया जाने वाले इस त्यौहार का नाम भगवान ब्रह्मा के नाम पर पड़ा है। कहा जाता है कि उन्होंने ने ही तिरुपति मंदिर में इस त्यौहार की शुरुआत की थी। इसलिए इसे ब्रह्मोत्सवम या ब्रह्मा का उत्सव कहा जाता है। इसे तिरुमाला के सभी त्यौहारों में सबसे पवित्र माना जाता है।

किंवदंती है कि भगवान ब्रह्मा ने पुष्करिणी नदी के पवित्र तट पर तिरुमाला तिरुपति मंदिर में श्री बालाजी की पूजा की थी और मानव जाति की रक्षा के लिए उनके प्रति आभार व्यक्त किया था। इस त्यौहार के दौरान बालाजी के नाम से प्रसिद्ध भगवान श्री वेंकटेश्वर की प्रतिमा को को विभिन्न रथों में सवार करके सड़कों पर घुमाया जाता है। इस दौरान लाखों लोग उनका आशीर्वाद लेने आते हैं।

ब्रह्मोत्सव उत्सव के दौरान श्रद्धालु गहन एवं दिव्य आनंद का अनुभव करते हैं। इसे वे ‘वैकुंठ अनुभव’ कहते हैं। ब्रह्मोत्सव के शुरू होने से पहले भगवान श्री वेंकटेश्वर के मंदिर की धार्मिक ग्रंथों में दिए गए दिशा-निर्देशों के अनुसार सफाई की जाती है। मंदिर परिसर और उसके आस-पास के क्षेत्र को फूलों और आम के पत्तों से सजाया जाता है। इस प्रक्रिया को आलय शुद्धि और अलंकारम (सजावट) कहा जाता है।

ब्रह्मोत्सव के पहले दिन से एक दिन पहले मृतसंग्रहणम (मिट्टी इकट्ठा करने की प्रक्रिया) की जाती है। मंदिर के अधिकारी विश्वक्सेन, अनंत, सुदर्शन और गरुड़ जैसे देवताओं से प्रार्थना करते हैं। वे धरती माता से भी प्रार्थना करते हैं और थोड़ी मात्रा में मिट्टी इकट्ठा करते हैं, जिसके साथ अंकुरार्पण अनुष्ठान किया जाता है। इसमें मिट्टी को एक कमरे में फैलाया जाता है और उसमें नौ प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। यह समृद्धि, उर्वरता और प्रचुरता का प्रतीक है।

ध्वजारोहणम से ब्रह्मोत्सव की आधिकारिक शुरुआत होती है। यह मंदिर परिसर के अंदर नादिमी पाडी कविली के पास ध्वजा स्तम्भ पर फहराया जाता है। मंदिर के अधिकारी पुजारियों द्वारा वैदिक मंत्रों के बीच गरुड़ की तस्वीर वाला ध्वज फहराते हैं। कहा जाता है कि ब्रह्मा, इंद्र, यम, अग्नि, कुबेर और वायुदेव जैसे देवताओं तथा वसिष्ठ और विश्वामित्र जैसे ऋषियों को आमंत्रित करने के लिए गरुण देवलोक जाते हैं।

भगवान को अलग-अलग वाहनों पर तिरुमाला की सड़कों पर जुलूस के रूप में ले जाया जाता है। प्रत्येक वाहन का अपना महत्व है, और वह अपने तरीके से भगवान का संदेश देता है। ब्रह्मोत्सव के दौरान भगवान को शोभायात्रा में घुमाने के बाद मुख्य मंदिर में उनका दरबार लगाया जाता है। इसके बाद भगवान को स्नपनम की प्रक्रिया शुरू की जाती है। इसे उत्सवनंतर स्नपनम भी कहा जाता है।

स्नपनम के तहत भगवान को हर्बल पानी से स्नान कराया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे शोभायात्रा के दौरान भगवान को होने वाली थकान और तनाव से राहत मिलती है। इसके बाद मंदिर के पुजारी भगवान को नैवेद्यम चढ़ाते हैं। फिर चूर्णाभिषेकम प्रक्रिया में भगवान और उनकी पत्नियों को चंदन के चूर्ण से अभिषेक करने के बाद स्नान कराया जाता है।

यह ब्रह्मोत्सव के नौवें दिन की सुबह किया जाता है। इसके बाद भगवान को तिरुमाला की सड़कों पर जुलूस के रूप में ले जाया जाता है। मंदिर के पुजारी भगवान के लिए इस्तेमाल किए गए चंदन के चूर्ण को भक्तों में वितरित करते हैं। ऐसा माना जाता है कि चंदन के चूर्ण में व्यक्ति के मार्ग से आने वाली बाधाओं को दूर करने की शक्ति होती है।

चक्रस्नानम अनुष्ठान यज्ञ के बाद स्नान अनुष्ठान के समान है। ब्रह्मोत्सव के अंतिम दिन की सुबह भगवान, उनकी पत्नियाँ और श्री सुदर्शनचक्र को स्वामी पुष्करिणी में स्नान कराया जाता है। भक्त श्री सुदर्शनचक्र के साथ स्वामी पुष्करिणी में भी स्नान कर सकते हैं। इसे बहुत पवित्र अनुष्ठान माना जाता है और भक्त इस अनुष्ठान में धर्म, जाति या पंथ से परे भाग लेते हैं।

ब्रह्मोत्सव के अंतिम दिन ऋषियों और देवताओं को देवलोक में विदा करने की रस्म को देवतोद्वासनाम कहा जाता है। यह दैनिक अर्चना के बाद किया जाता है। उत्सव के आयोजन के लिए भगवान ब्रह्मा की प्रशंसा की जाती है और मंदिर के पुजारी और अधिकारी उनका सम्मान करते हैं। ब्रह्मोत्सव के अंतिम दिन की शाम को ध्वज को नीचे उतार दिया जाता है।

दिल्ली में क्यों लगी 163, कालकाजी मंदिर के पुजारी को क्यों जाना पड़ा सुप्रीम कोर्ट: BNSS की उस धारा के बारे में जानिए सब कुछ जो रामलीला में बन रहा था अड़ंगा

दिल्ली के कालकाजी मंदिर के पुजारी ने सुप्रीम कोर्ट में रामलीला आयोजन में लगने वाले अड़ंगे को लेकर याचिका डाली है। पुजारी ने कहा है कि उनके इलाके में लोगों के इकट्ठा होने पर दिल्ली पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत रोक लगाई है, इसके कारण रामलीला का आयोजन नहीं हो पाएगा। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में केंद्र सरकार ने बताया है कि उसने यह आदेश वापस ले लिए हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मानस नमन सेवा समिति के सचिव और कालकाजी मंदिर के पुजारी सुनील ने यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के समक्ष डाली है। पुजारी सुनील ने कहा है कि उनकी समिति दिल्ली के चिराग इलाके में प्रति वर्ष रामलीला का आयोजन करती है।

उन्होंने कहा है कि इस बार दिल्ली पुलिस ने 30 सितम्बर, 2023 से लेकर 5 अक्टूबर तक दिल्ली के भीतर धरना प्रदर्शन समेत ऐसे सभी आयोजनों पर रोक लगाई है। इसी के अंतर्गत 5 या उससे अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगा दी गई है। याचिका में कहा गया है कि इसी कारण रामलीला आयोजित करने में भी समस्या आने वाली है।

याचिका में कहा गया कि दशहरा और नवरात्रि आने वाले हैं और दिल्ली पुलिस की रोक ऐसे त्योहारों और धार्मिक समारोहों पर बंधन लगाएगी। याचिका में माँग की गई थी कि सुप्रीम कोर्ट इस संबंध में दिल्ली पुलिस के आदेश पर अपना निर्णय सुनाए।

याचिकाकर्ता ने कहा कि दिल्ली पुलिस का आदेश दिल्लीवासियों के मन में डर भर रहा है। यह भी कहा गया कि इससे दिल्ली में रहने वाले लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं को लेकर चिंतित हैं। याचिकाकर्ता ने दिल्ली पुलिस पर आरोप लगाया कि वह जिम्मेदारी से बच रही है।

इस मामले में गुरुवार (5 अक्टूबर, 2024) को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई में केंद्र सरकार ने जवाब दाखिल किया है। केंद्र सरकार ने कहा कि दिल्ली पुलिस उसके अंतर्गत आती है और उसने यह आदेश वापस ले लिया है। कोर्ट को इस विषय में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जानकारी दी है।

गौरतलब है कि 30 सितम्बर, 2024 को दिल्ली पुलिस ने एक आदेश पारित करते हुए राजधानी के नई दिल्ली, उत्तर और मध्य जिले के भीतर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू कर दी थी। दिल्ली पुलिस ने कहा था कि वक्फ बिल, दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव और बाकी स्थितियों के कारण दिल्ली का माहौल संवेदनशील है।

क्या है BNSS की धारा 163?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धरा 163 के तहत जिला मजिस्ट्रेट या फिर राज्य सरकार आगामी खतरे को भाँपते हुए सामान्य गतिविधियों पर रोक लगा सकती है। इसके अंतर्गत लोगों को एक जगह इकट्ठा होने, उनके धरना प्रदर्शन में भाग लेने या ऐसी अन्य गतिविधि से रोका जा सकता है। यदि कोई इस व्यवस्था का उल्लंघन करता है तो पुलिस उस पर कार्रवाई कर सकती है। पुरानी व्यवस्था में भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत यह धारा 144 कही जाती थी। नई व्यवस्था के तहत यह BNSS की धारा 163 बनाई गई है।

प्यार का दिखावा, धोखे से शादी, फिर धर्मांतरण… मुस्लिम करते हैं हिंदू महिलाओं को टारगेट: लव जिहाद का पूरा गेम अदालत ने समझाया, विस्तार से पढ़िए आदेश

बीते दिनों बरेली में लव जिहाद के एक मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट का जो फैसला आया वो अब हर जगह चर्चा में है। कोर्ट ने ‘आनंद’ बनकर हिंदू महिला के साथ रेप और उसे गर्भवती करने वाले मोहम्मद आलिम को सजा सुनाते हुए देश में चल रहे धर्मांतरण के खेल से लेकर विदेशी साजिश तक पर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की।

कोर्ट ने माना कि केस की सुनवाई और सारे गवाहों की दलील के बाद साफ है कि मोहम्मद आलिम का प्रकरण लव जिहाद के माध्यम से अवैध धर्मांतरण का मामला है। इसके बाद कोर्ट के आदेश में लव जिहाद की परिभाषा बताते हुए कहा गया

-लव जिहाद में मुस्लिम पुरूष हिंदू महिलाओं को निशाना बनाते हैं। वो पहले उनसे प्यार का दिखावा करते हैं, उनसे धोखे से शादी करते हैं, फिर धर्मांतरण का दबाव बनाते हैं… जैसा कि मोहम्मद आलिम ने किया।

-कोर्ट ने कहा- लव जिहाद का उद्देश्य हिंदुस्तान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय साजिश है जिसमें एक मजहब के अराजक तत्व जनसांख्यिकी युद्ध के जरिए वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं।

-आसान शब्दों में कहें तो लव जिहाद मुस्लिम पुरुषों पर गैर मुस्लिम समुदायों से जुड़ी महिलाओं को इस्लाम धर्म में परिवर्तित करना है। इस दौरान प्रेम का ढोंग करके उन्हें फँसाया जाता हैं।

-अदालत ने कहा कि लव जिहाद के लिए बड़ी मात्रा में पैसा चाहिए होता है इसलिए लव जिहाद में विदेशी फंडिंग से इंकार भी नहीं हो सकता।

-कोर्ट ने कहा जबरदस्ती, लालच देकर या झूठ बोलकर धर्मांतरण कराने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता। चाहे किसी भी धर्म का व्यक्ति हो, उसे अवैध-धर्मांतरण का अधिकार प्राप्त नहीं है।

-यदि बलपूर्वक, झूठ बोलकर, धोखाधड़ी करके या जबरदस्ती या लालच देकर किसी को अवैध रूप से धर्मांतरित करवाया जाता है, तो निश्चित रूप से उत्तर-प्रदेश विधि विरूद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 के तहत कार्यवाही की जानी चाहिए, चाहे वह व्यक्ति कोई भी क्यों न हो।

-लव जिहाद के माध्यम से अवैध धर्मांतरण किसी अन्य बड़े उद्देश्यों की पूर्ति हेतु कराया जाता है। यदि समय रहते भारत सरकार के द्वारा लव जिहाद के माध्यम से अवैध धर्मांतरण पर रोक नहीं लगाई गई तो भविष्य में इसके गंभीर परिणाम देश को भुगतने होंगे

भारत में पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे हालात पैदा करने के लिए हिंदू लड़कियों को प्रेम में फँसाकर उनका अवैध धर्मांतरण करने का अपराध एक विरोधी गिरोह द्वारा बड़े पैमाने पर कराया जा रहा है।

-कोर्ट के आदेश में कहा गया कि गैर मुस्लिमों के कमजोर वर्ग के लोगों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा ओबीसी आदि समुदाय के लोगों, महिलाओं व बच्चों को निशाना बनाया जाता है। उनका ब्रेन वॉश करके तथा उनके धर्म की बुराई करके, देवी-देवताओं के संबंध में अपमानजनक टिप्पणी करके तथा मनोवैज्ञानिक दबाव डालकर व विभिन्न प्रकार के लालच जैसे विवाह, नौकरी आदि का प्रलोभन देकर उनका अवैध धर्मान्तरण कराया जा रहा है।

-कोर्ट ने कहा कि अवैध धर्मांतरण के प्रकरण को हल्के में नहीं लिया जा सकता है। अवैध धर्मांतरण देश की एकता, अखंडता एवं संप्रभुता के लिए खतरा है। भारत का संविधान भले ही सभी लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार एवं संरक्षण देता है लेकिन अगर इसकी आड़ में दूसरे धर्मों के अस्तित्व को लालच देकर, असमायक दबाव या अन्य माध्यमों का प्रयोग करके दुष्प्रभावित किया जाएगा तो निश्तिक रूप से अन्य सभी धर्मों के संरक्षण का हनन होगा।