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‘पलानी मंदिर के पंचामृत में मर्दों को नपुंसक बनाने वाली दवाई’: दावे के बाद गिरफ्तार हुआ तमिल फिल्मों का निर्देशक मोहन जी, तमिलनाडु के मंत्री ने चेताया

तमिलनाडु में तमिल फिल्मों के मशहूर डायरेक्टर मोहन जी को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। मोहन जी पर आरोप है कि उन्होंने पलानी मंदिर के ‘पंचामृतम’ (मंदिर में दिया जाने वाला प्रसाद) में नपुंसकता लाने वाली दवा मिलाए जाने का दावा किया था। यह टिप्पणी उन्होंने एक यूट्यूब चैनल पर दिए इंटरव्यू में की थी, जहाँ वह तिरुपति लड्डू के विवाद पर चर्चा कर रहे थे।

मोहन जी का दावा और विवाद की शुरुआत

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मोहन जी, जो ‘द्रौपदी’, ‘रुद्रतांडवम’ और ‘बगासुरन’ जैसी फिल्मों के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने तिरुपति लड्डू के विवाद पर बोलने के दौरान कहा कि तमिलनाडु के मंदिरों में भी इसी तरह की घटनाएँ हुई हैं। उन्होंने यह आरोप लगाया कि पलानी मंदिर के पंचामृतम में एक बार नपुंसकता लाने वाली दवा मिलाई गई थी और इस खबर को छिपा दिया गया था।

मोहन जी ने कहा, “मैंने सुना था कि पुरुषों में नपुंसकता लाने वाली दवा पंचामृतम में मिलाई गई थी। इस खबर को छिपाया गया और उस पंचामृतम को नष्ट कर दिया गया।” उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में कोई स्पष्ट सफाई नहीं दी गई, और कुछ मंदिर के कर्मचारियों ने उन्हें बताया था कि गर्भनिरोधक गोलियाँ हिंदुओं पर हमला हैं।

तमिलनाडु सरकार की प्रतिक्रिया

तमिलनाडु के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के मंत्री सेकर बाबू ने मोहन जी के इस बयान की कड़ी निंदा की। उन्होंने ऐसे किसी भी आरोप को सिरे से खारिज किया और चेतावनी दी कि जो भी इस तरह की झूठी खबर फैलाएगा, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। मंत्री ने इसे मंदिर की छवि को धूमिल करने की कोशिश बताया और कहा कि सरकार इस मामले में किसी भी गलत जानकारी को बर्दाश्त नहीं करेगी।

त्रिची पुलिस की साइबर क्राइम इकाई ने मंगलवार (24 सितंबर 2024) को मोहन जी को गिरफ्तार कर लिया। उन पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने और झूठी जानकारी फैलाने का आरोप लगाया गया। गिरफ्तारी के बाद यह मामला और अधिक विवादित हो गया, खासकर उनके समर्थकों और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेताओं के बीच। बीजेपी नेता अश्वथामन ने मोहन जी की गिरफ्तारी को असंवैधानिक करार दिया और सरकार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि मोहन जी के परिवार को उनकी गिरफ्तारी की कोई औपचारिक सूचना नहीं दी गई और यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के खिलाफ है।

बीजेपी नेता अश्वथामन ने ट्वीट किया, “परिवार को यह नहीं बताया गया कि गिरफ्तारी का कारण क्या था और मामला क्या था। यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ है।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मोहन जी की गिरफ्तारी तमिलनाडु सरकार की धार्मिक असहिष्णुता को दर्शाती है और यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है। उनके अनुसार, राज्य सरकार अपने आलोचकों को दबाने के लिए ऐसे कदम उठा रही है और यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

दरअसल, मोहन जी आंध्र प्रदेश के तिरुपति मंदिर के प्रसाद में मिलावट के मामले पर बोल रहे थे। बता दें कि आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने एक लैब रिपोर्ट के हवाले से दावा किया था कि तिरुपति लड्डू बनाने में इस्तेमाल किए गए घी में पशु वसा और मछली के तेल के अंश पाए गए थे। लैब रिपोर्ट में कहा गया था कि घी के नमूने में “बीफ टैलो”, “लार्ड” (सूअर की चर्बी) और मछली के तेल के अंश मिले थे। यह रिपोर्ट वाईएसआरसीपी सरकार के दौरान के प्रसाद से जुड़ी थी और इस मामले ने आंध्र प्रदेश में धार्मिक और राजनीतिक विवाद को जन्म दिया था। मोहन जी ने इसी संदर्भ में तमिलनाडु के मंदिरों में भी इसी प्रकार की घटनाओं की ओर इशारा किया था।

इस घटना के बाद तमिलनाडु सरकार की आलोचना और तेज हो गई है। कई विपक्षी दलों और धार्मिक संगठनों ने सरकार पर हिंदू धार्मिक स्थलों की प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि सरकार उन लोगों को निशाना बना रही है जो धार्मिक स्थलों में हो रहे भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को उजागर करने की कोशिश कर रहे हैं। हालाँकि तमिलनाडु सरकार ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है और कहा है कि राज्य में सभी धार्मिक स्थलों का संचालन पारदर्शी तरीके से हो रहा है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी धार्मिक स्थल के खिलाफ कोई भी गलत या भ्रामक जानकारी फैलाने वाले लोगों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

मोहन जी की गिरफ्तारी और उनके द्वारा लगाए गए आरोपों ने तमिलनाडु सरकार और हिंदू धार्मिक स्थलों के प्रबंधन को लेकर एक नए विवाद को जन्म दिया है। जहाँ एक ओर सरकार इन आरोपों को खारिज कर रही है और सख्त कार्रवाई की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर भाजपा और मोहन जी के समर्थक इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बता रहे हैं। यह मामला अभी और तूल पकड़ सकता है, खासकर राज्य की राजनीतिक स्थिति को देखते हुए, जहाँ धर्म और राजनीति आपस में जुड़े हुए हैं।

खतना, नमाज, इस्लाम… कहानी 10 साल की उम्र में गायब हुए ‘सत्यम’ को कबाड़ी ‘समीर खान’ बनाने की, ब्रेनवॉश ऐसा कि अब अपने परिवार के साथ भी रहना नहीं चाहता

उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में शनिवार (14 सितंबर 2024) को धर्मान्तरण केस में नामजद राशिद नाम के आरोपित की पुलिस से मुठभेड़ हुई थी। इस मुठभेड़ में राशिद घायल हो गया था, जिसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। वह पिछले 19 वर्षों से फरार चल रहा था। राशिद 2005 में घर से लापता हुए हिन्दू बच्चे को इस्लाम कबूल करवाने का आरोपित है। उसके पास से अवैध हथियार और गोला-बारूद भी बरामद हुआ है। अब 30 साल के हो चुके सत्यम नाम के बच्चे को फिलहाल समीर खान बना दिया गया है। ऑपइंडिया से बात करते हुए सत्यम की माँ ने बताया कि उनके बेटे का ब्रेनवॉश इस हद कर तक कर दिया गया है कि वो अब अपने परिजनों के संग रहने को तैयार ही नहीं है।

19 साल पहले गायब हुए सत्यम को बनाया गया समीर खान

यह मामला रामपुर जिले के थानाक्षेत्र शाहाबाद का है। यहाँ 13 सितंबर को मंजू देवी नाम की महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी। शिकायत में मंजू ने बताया है कि साल 2005 में उनका 10 वर्षीय बेटा सत्यम अचानक कहीं लापता हो गया था। तब पीड़िता ने इसकी शिकायत हापुड़ के पिलखुआ थाने में दर्ज करवाई थी। बच्चे के लापता होने की खबर अख़बार में भी प्रकाशित करवाई गई थी। काफी खोजबीन कर के मंजू ने पता लगाया कि उनका बेटा रामपुर जिले में राशिद के घर रहता है।

बच्चे को खोजते हुए मंजू देवी रामपुर पहुँची। यहाँ उनकी मुलाकात अपने बेटे से हुई। मंजू के बेटे ने यहाँ बताया कि 2005 में उसको पहले उनको दिल्ली ले जाया गया। वहाँ से बच्चे को कबाड़ी राशिद अपने साथ रामपुर ले आया। राशिद ने बच्चे को अपने साथ रखा और रुपए पैसे का लालच दे कर इस्लाम कबूल करवा दिया। कुछ दिनों बाद सत्यम का नाम बदल कर समीर खान रख दिया गया। एक नया आधार कार्ड भी बनवा दिया गया जिसमें समीर के अब्बा का नाम वाज़िद खान छाप दिया गया।

सत्यम की माँ का आरोप है कि उनके बेटे का खतना करवा दिया गया था और नमाज़ पढ़वाई जा रही थी। पीड़िता मंजू राय ने राशिद के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की थी। इस तहरीर पर पुलिस ने राशिद के खिलाफ नामजद FIR दर्ज कर लिया। उस पर उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म सम्परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। केस दर्ज होने की जानकारी मिलते ही राशिद फरार हो गया। पुलिस ने उसकी तलाश में दबिश देनी शुरू कर दी।

पुलिस पर भी राशिद ने बरसाईं गोलियाँ

13 सितंबर को राशिद के खिलाफ FIR दर्ज कर के पुलिस ने दबिश देनी शुरू कर दी थी। इस बीच अगले दिन 14 सितंबर को शाहाबाद थाने के SHO इंस्पेक्टर पंकज पंत अपने साथी पुलिसकर्मियों के साथ गश्त कर रहे थे। इसी दौरान उनको मुखबिर ने राशिद के एक खंडहर के पास छिपे होने की सूचना दी। पुलिस टीम इस सूचना पर बताए गए खंडहर की तरफ निकल पड़ी। सूचना सही पाई गई। राशिद खंडहर के पास मौजूद था।

पुलिस के मुताबिक पुलिस बल को अपनी तरफ बढ़ता देख राशिद भड़क गया। वह चीख कर बोला, “सालों पुलिस वालों, तुम भी आ गए। आज तुम्हारा भी काम तमाम करता हूँ।” इतना कह कर राशिद ने पुलिस पर गोलियाँ बरसानी शुरू कर दी। राशिद की फायरिंग से पुलिस ने खुद को बचाते हुए सरेंडर करने की चेतावनी दी। हालाँकि जब इस चेतावनी का उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा तो पुलिस ने जवाबी फायरिंग की। पुलिस की गोली चलने पर राशिद भागने लगा जिसे दौड़ा कर दबोच लिया गया।

राशिद की तलाशी में उसके पास से एक तमंचा और कारतूस बरामद हुए। पुलिस पर हमले के आरोप पर उस पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 109 के साथ आयुध अधिनियम के तहत एक और FIR दर्ज हुई है। पूछताछ में राशिद ने बताया कि वो फ़िलहाल दिल्ली के ओखला फेज 1 में रहता है। वह कीपैड फोन ले कर चलता था। पुलिस की पूछताछ में उसने सत्यम के धर्मान्तरण मामले में अपने ऊपर लगे आरोपों को कबूल किया है। फिलहाल राशिद को जेल भेज दिया गया है। ऑपइंडिया के पास पुलिस की FIR मौजूद है।

लापता नहीं हुआ मेरा बेटा, बल्कि रची गई थी साजिश

ऑपइंडिया ने इस मामले में मंजू देवी से सम्पर्क किया। मंजू देवी ने बताया कि उनको आशंका है कि 2005 में उनका बेटा खुद लापता नहीं हुआ था बल्कि उसे साजिशन गायब किया गया था। बचपन में ही सत्यम की संगति गलत हो जाने का दावा करते हुए मंजू ने बताया कि सबसे पहले उसे दिल्ली में लगभग 4 महीने रखा गया। यहाँ मुस्लिम समुदाय के लोगों ने उसे अपने रंग में ढाला और कबाड़ आदि बीनने के काम पर लगाया। बाद में सत्यम को रामपुर शाहाबाद में भेज दिया गया। रामपुर में सत्यम को राशिद के पास रखा गया।

मंजू देवी आगे बताती हैं कि राशिद ने सत्यम को नौकरों की तरह रख कर काम करवाए। यहीं पर उसे मुस्लिम बना दिया गया और खतना भी करवाया गया। थोड़े समय बाद सत्यम को शाहाबाद के ही रहने वाले वाज़िद खान के सुपुर्द कर दिया गया। वाज़िद ने सत्यम का समीर खान नाम से आधार कार्ड बनवाया और खुद को उसका अब्बा दिखा दिया। वाज़िद ने भी अपने पूरे परिवार को कमा कर खिलाने की जिम्मेदार सत्यम पर डाल दी। सत्यम कभी कबाड़ बीन कर तो कभी फेरी लगा कर वाज़िद के परिवार का पेट भरता रहा।

लौट आया था अपने परिवार में, पर फिर हुआ ब्रेनवॉश

मंजू देवी आते बताती हैं कि साल 2017 में ही उन्होंने अपने बेटे को खोज निकाला था। तब वो जैसे-तैसे रामपुर से मिन्नत कर के अपने बेटे को वापस हापुड़ ले आईं थीं। यहाँ सत्यम महज 2 से ढाई महीने के बीच रहा। सत्यम का नाम भी आधार कार्ड में बदलवा दिया गया। इस बीच कोई विक्की खान उसको लगातार कॉल कर के वापस लौटने के लिए ब्रेनवॉश करता रहा। इस ब्रेनवॉश का असर ये रहा कि सत्यम मंदिर जाने और पूजापाठ आदि से चिढ़ने लगा था। आखिरकार लगभग ढाई महीने बाद सत्यम फिर से अपना घर छोड़ कर रामपुर चला गया।

मंजू देवी बताती हैं कि इसके बाद उन्होंने अपने बेटे को वापस पाने की बहुत कोशिश की लेकिन वो नाकाम रहीं। पीड़िता के एक और बेटा है जो सत्यम से छोटा है। मंजू देवी के पति मेहनत मजदूरी कर के परिवार पालते हैं। खुद मंजू भी एक प्राइवेट स्कूल में काम कर के अपने परिवार के लिए चार पैसे जुटाती हैं। इसी पैसे से वो अपने दूसरे बेटे की पढ़ाई आदि करवा रहीं हैं। मंजू चाहती हैं कि उनके बेटे के धर्मान्तरण में शामिल सिर्फ राशिद ही नहीं बल्कि दिल्ली से रामपुर तक प्रकाश में आए सभी आरोपितों पर एक्शन हो।

परिवार के साथ रहने को तैयार नहीं सत्यम

मंजू देवी ने हमको आगे बताया कि भले ही राशिद जेल चला गया है लेकिन उनको सत्यम वापस नहीं मिल पाया। पुलिस के आगे सत्यम ने उनको माँ मानने से ही इंकार कर दिया। सत्यम ने खुद को मुस्लिम बताते हुए कहा कि उसको हिन्दू धर्म में आस्था नहीं बची है। पुलिस के आगे कोई भी मुस्लिम सत्यम पर अपना दावा करने नहीं आया। मंजू देवी के मुताबिक उनके बेटे को मुस्लिमों द्वारा वर्तमान समय में साजिशन उत्तराखंड एक रुद्रपुर कहीं शिफ्ट कर दिया गया है।

मंजू ने हमको आगे बताया कि भले ही उनका बेटा उन्हें दोबारा वापस न मिले पर वो मुस्लिम मत छोड़ कर अपने मूल धर्म में वापस लौट आए। उन्होंने कहा कि अगर वो कहीं गौशाला में गायों की सेवा करे, किसी मठ या मंदिर का पुजारी बन जाए या किसी हिन्दू अधिकारी/व्यापारी के घर नौकरी करने लगे तो उन्हें बहुत सुकून मिलेगा। मंजू ने प्रशासन के साथ हिन्दू संगठनों से भी उम्मीद जताई है कि वो उनके बेटे को मुस्लिम मत से बाहर निकालने में मदद करें।

पीड़िता ने अपने परिवार की सुरक्षा भी खतरे में होने की बात कहते हुए भविष्य में चरमपंथियों द्वारा किसी अनहोनी की भी आशंका जाता है। अंत में वो फूट-फूट कर रोने लगीं और कहा कि कुछ साजिशकर्ताओं ने उनके परिवार को बर्बाद कर दिया। मंजू को यह भी चिंता है कि इस विवाद से उनके छोटे बेटे की शादी-ब्याह में दिक्कत पेश आ सकती है। फ़िलहाल पुलिस पूरे मामले की जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई कर रही है।

कर्नाटक में अब उर्दू तुष्टिकरण: आँगनबाड़ी शिक्षक बहाली के आदेश पर विवाद, भाजपा बोली- निजाम और टीपू का सपना पूरा कर रही कॉन्ग्रेस

कर्नाटक के चिकमंगलुरू जिले के भीतर आँगनबाड़ी शिक्षक बनने के लिए उर्दू जानना जरूरी कर दिया गया है, यह आरोप भाजपा ने राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार पर लगाया है। भाजपा ने कहा है कि कॉन्ग्रेस में निजाम की आत्मा घुस गई है क्योंकि वह भी कन्नड़ के विरुद्ध था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कॉन्ग्रेस सरकार ने हाल ही में एक आदेश में कहा है कि चिकमंगलुरु जिले के मुडिगिरी में आँगनबाड़ी में शिक्षक पद पर आवेदन करने वालों को उर्दू जरूर आनी चाहिए। यह आदेश राज्य के महिला और बाल कल्याण एवं विकास विभाग (DCW) ने दिया है।

विभाग ने कहा कि जिस इलाके में स्थानीय जनसंख्या में अल्पसंख्यकों का हिस्सा 25% से अधिक है वहाँ शिक्षकों को कन्नड़ के साथ ही अल्पसंख्यकों की भाषा जाननी होगी। मुडिगिरी में मुस्लिम जनसंख्या 31% है इसलिए यहाँ उर्दू जानने वाले शिक्षकों की भर्ती करने का निर्णय लिया गया है। कॉन्ग्रेस इस निर्णय के बाद बैकफुट पर है।

भाजपा कॉन्ग्रेस पर इस निर्णय के बाद तुष्टिकरण का आरोप लगा रही है। भाजपा ने इस फैसले पर कहा, “कन्नड़ जमीन पर उर्दू का बोलबाला है, कॉन्ग्रेस सरकार के महिला एवं बाल कल्याण विभाग ने चिकमंगलूर जिले के मुडिगिरी में आँगनबाड़ी शिक्षकों की नियुक्ति के लिए उर्दू अनिवार्य करने के लिए आधिकारिक आदेश जारी किया है। सीएम सिद्दारमैया और मंत्री लक्ष्मी हेब्बलकर इस बात को जान लीजिए, मुडिगिरी कर्नाटक में है, कन्नड़ कर्नाटक की आधिकारिक भाषा है, तब आखिर उर्दू अनिवार्य क्यों है, जवाब दीजिए।”

कर्नाटक के दक्षिणी कन्नड़ से सांसद नलिन कुमार कटील ने भी इस पर हमला बोला। उन्होंने लिखा, “कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार का आँगनबाड़ी शिक्षिका की नौकरी पाने के लिए उर्दू भाषा को अनिवार्य करना निंदनीय है। आँगनबाड़ी शिक्षकों की भर्ती में मुस्लिम समुदाय को खुश करने और केवल उन्हें ही नौकरी देने के लिए पिछले दरवाजे से की गई कोशिश एक बार फिर कॉन्ग्रेस की नीति को उजागर कर रही है।”

भाजपा नेता CT रवि ने इस पर कहा, “निजाम ने भी हैदरबाद और कर्नाटक में कन्नड़ पढ़ाने पर रोक लगा दी थी और उर्दू को बढ़ावा देने का प्रयास किया था, अब कॉन्ग्रेस में निजाम की आत्मा घुस गई है। टीपू सुल्तान ने भी यहाँ फ़ारसी भाषा थोपने की कोशिश की थी। आज कॉन्ग्रेस टीपू और निजाम के सपने को पूरा करने में लगी है।”

बताया गया है कि मुडिगिरी के स्थानीय शिक्षा विभाग ने भी इस मामले में अपनी आपत्ति जताई है। कॉन्ग्रेस सरकार की तरफ से इस मामले में अभी कोई स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। इस बीच भाजपा भाषाई मुद्दे को लेकर लगातार हमलावर है।

तिरुपति बालाजी प्रसाद में चर्बी: 189 साल पहले रची गई साजिश का नतीजा, आज भी भोग रहा हिंदू समाज

गुरुकुल पद्धति को तहस-नहस कर कॉन्वेंट शिक्षा पद्धति की नींव रखा था लॉर्ड मैकाले ने। क्यों उसने ऐसा किया था, यह इतिहास की बात है। वर्तमान में भी उसका कितना असर पड़ रहा है, यह सीखने-समझने की जरूरत है। उसके द्वारा लिखे पत्रों से इस बात का खुलासा होता है कि अपनी शिक्षा पद्धति के माध्यम से वह कौन से विष बीज बो रहा था भारतीय समाज में, जिनकी फसल निकट भविष्य में आनी ही थी, वो आज दिख भी रही है।

मैकाले लिखता है कि आने वाले वक्त में भारतीय समाज शरीर से हिन्दुस्तानी होगा लेकिन आत्मा उसकी एक अंग्रेज की होगी। आज वही सब परिलक्षित होता दिखाई दे रहा है।

सनातन आस्था के सबसे बड़े केन्द्र तिरुपति बालाजी के प्रसादम् में गाय और सुअर की चर्बी की मिलावट का मामला बेहद निंदनीय और गहरा षड्यंत्र है। यह सनातन आस्था पर गहरी चोट करता है। बड़ी चिंता का विषय लेकिन यह है कि ऐसे घृणित मामले पर समाज के उस बड़े तबके से विरोध के जो स्वर उठने चाहिए थे, वह नज़र नहीं आते।

ऐसे ही मसले पर इतिहास में हिंदू समाज की क्या प्रतिक्रिया थी, वह जानने लायक है। 1857 में एक अफ़वाह उठी थी (जिसके पुख़्ता प्रमाण नहीं हैं) कि अंग्रेज कारतूसों में चर्बी मिलाते थे। इस एक अफवाह पर पूरी क्रान्ति की ज्वाला भड़क उठी थी। तब की क्रान्ति की तुलना वर्तमान मामले से कर लेते हैं। तिरुपति बालाजी प्रसादम् में चर्बी वाली बात लैब टेस्टिंग में प्रमाणित हो चुकी है। बावजूद इसके एक सन्नाटा पसरा है हिंदू समाज में।

सेकुलरिजम का रोग, नेताओं से अधिक पॉलिटिकल करेक्टनेस का भूत शायद हिंदू समाज पर हद से ज्यादा हावी है। अफसोस यह कि इस समाज को चुनाव भी नहीं लड़ना है। फिर भी विदेशी शिक्षा के संंस्कार शायद इस कदर घर कर चुके हैं कि हम गंभीर से गंभीर मामले का भी सरलीकरण करने के अभ्यासी हो चुके हैं।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह हमारे पूर्वजों का पौरुष और बलिदान ही था कि गुरु गोविन्द सिंह जैसे तपस्वियों ने अपने दो पुत्रों को बलि वेदी पर जाते हुए भी धर्म नहीं बदला। वंदा वैरागी को उनके पुत्र का सीना चीरकर उसके धड़कते हृदय को खाने पर मजबूर किया लेकिन फिर भी उन्होंने मतांतरण स्वीकार नहीं किया। ऐसे बलिदानियों के बदौलत ही आज भी यह समाज सनातन है!

एक समाज के तौर पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज कई तरह के खतरों की आहट है। आज के समय में भी ताड़का और पूतना की राक्षसी वृत्तियाँ निगलना चाहती हैं हमको। एक का औज़ार हथियार है और दूसरे का प्यार। फिलहाल पूतना वक्ष में विष लपेटकर निकली है मातृत्व के दिखावे के साथ।

वक्त है अभी चेत जाने का। विरोधी स्वर बुलंद करने का। अन्यथा आने वाला वक्त यह अवसर भी छीन लेगा। सेकुलरिज्म का रोग दीमक बन कर खा रहा है। अब सेकुलर नहीं, मुखर होने की माँग कर रहा वक्त आपसे और हमसे। यहाँ रूसी विचारक लियोन ट्रॉट्स्की का विचार  प्रसंगिक है:

“You may not be interested in war, but war is interested in you.”

मतलब समाज में कुछ सड़-गल रहा हो, कुछ अनैतिक हो रहा हो… और आप यह सोच कर बैठ जाएँ कि उसका प्रभाव आप तक नहीं होगा, यह मूर्खतापूर्ण है। आपके इर्द-गिर्द जो भी हो रहा है, आप उसकी चपेट में परोक्ष या प्रत्यक्ष तौर पर आएँगे ही, यह निश्चित है। 

आप भले ही किसी से जलन न रखें, उन्हें नुक़सान न पहुँचाएँ, लेकिन कुछ विचार धाराएँ हैं, जो आप पर आघात करने को आतुर हैं। इसीलिए हों सावधान, रहें सतर्क… और सबसे जरूरी – रहें एकजुट!

UP में खाने-पीने की हर दुकान पर लिखना होगा नाम, कर्मचारियों का होगा पुलिस वेरिफिकेशन: योगी सरकार का आदेश, ‘थूक और मूत जिहाद’ पर छिड़ी हुई है बहस

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खाद्य सुरक्षा को लेकर सख्त कदम उठाए हैं। हाल ही में हुई बैठक में उन्होंने निर्देश दिया कि खाने-पीने की वस्तुओं में मिलावट करने वाले लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। इस क्रम में सभी रेस्तराँ और ढाबों के कर्मचारियों का पुलिस वेरिफिकेशन अनिवार्य होगा।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जूस, दाल और रोटी जैसी खाद्य सामग्रियों में मानव अपशिष्ट मिलाने की घटनाओं को अत्यंत वीभत्स बताया। बता दें कि हाल ही में सामने आए घटनाओं के बाद, जिसमें जूस, दाल और रोटी जैसी खान-पान की वस्तुओं में थूक और पेशाब मिलाने के वीभत्स मामले सामने आए, सरकार ने तत्काल और सख्त कार्रवाई की दिशा में कदम उठाए हैं।

योगी आदित्यनाथ की सरकार ने इस संदर्भ में एक उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की, जिसमें मिलावटखोरों और खाद्य सामग्री में गंदगी मिलाने वालों के खिलाफ ठोस नीतियाँ बनाई गईं। इन नीतियों का उद्देश्य सिर्फ दंड देना नहीं है, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कठोर कदम उठाना है।

पुलिस वेरिफिकेशन और नाम डिस्प्ले अनिवार्य

योगी सरकार का सबसे बड़ा कदम यह है कि अब राज्य में सभी रेस्तराँ, ढाबों और खाने-पीने के प्रतिष्ठानों में काम करने वाले कर्मचारियों का पुलिस वेरिफिकेशन अनिवार्य कर दिया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी संदिग्ध व्यक्ति इन प्रतिष्ठानों में काम न कर सके, जिससे ग्राहकों की सुरक्षा और भरोसे को मजबूत किया जा सके। इसके अलावा, हर प्रतिष्ठान के मालिक और प्रबंधकों को अपने नाम और पते प्रमुखता से डिस्प्ले करने का निर्देश दिया गया है।

यह निर्देश इस बात को सुनिश्चित करेगा कि प्रतिष्ठान संचालकों की जिम्मेदारी बढ़ेगी और कोई भी अनियमितता या मिलावट की घटना होने पर उन्हें तुरंत पकड़ा जा सके। सरकार का यह कदम एक स्पष्ट संदेश देता है कि अब किसी भी प्रकार की गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

सीसीटीवी कैमरे और सफाई पर सख्त नज़र

सरकार ने हर रेस्तराँ और ढाबे में सीसीटीवी कैमरे लगाने का निर्देश भी दिया है। यह केवल ग्राहकों की सुरक्षा के लिए नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करने के लिए है कि खाने की तैयारियों में किसी भी प्रकार की अशुद्धता न हो। हर प्रतिष्ठान के हर कोने को सीसीटीवी से कवर किया जाएगा, ताकि खाद्य सामग्री की गुणवत्ता और साफ-सफाई पर नजर रखी जा सके। इसके अलावा, हर कर्मचारी को मास्क और ग्लव्स पहनना अनिवार्य कर दिया गया है।

यह सुनिश्चित करना सरकार का मुख्य उद्देश्य है कि कोई भी कर्मचारी, चाहे वह शेफ हो या वेटर, बिना उचित साफ-सफाई के भोजन को न छू सके। इस प्रकार के निर्देश यह स्पष्ट करते हैं कि अब ग्राहकों के स्वास्थ्य और भोजन की शुद्धता से किसी भी प्रकार का खिलवाड़ नहीं किया जाएगा।

खाद्य सुरक्षा कानूनों में संशोधन

योगी सरकार सिर्फ दिशा-निर्देश जारी करने पर ही नहीं रुकी, बल्कि उन्होंने यह भी निर्देश दिया है कि खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम (Food Safety and Standards Act) में आवश्यकतानुसार संशोधन किए जाएं। इसका उद्देश्य नियमों को और सख्त बनाना है, ताकि भविष्य में कोई भी खाद्य सामग्री में मिलावट न कर सके।

साथ ही, इन नियमों के उल्लंघन पर तुरंत और कड़ी कार्रवाई की जाएगी। ऐसे प्रतिष्ठानों को सील करने के साथ ही उन पर भारी जुर्माना भी लगाया जाएगा। सरकार का यह कदम पूरी तरह से जनता के स्वास्थ्य और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।

मिलावटखोरों में डर पैदा करना जरूरी

उत्तर प्रदेश सरकार का यह सख्त कदम उन मिलावटखोरों और धोखेबाजों के लिए एक कड़ा संदेश है जो खाद्य पदार्थों में गंदगी मिलाकर आम जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अब राज्य में ऐसी किसी भी प्रकार की गतिविधि को सहन नहीं किया जाएगा। जो भी व्यक्ति या प्रतिष्ठान खाने-पीने की वस्तुओं में गंदगी मिलाने की कोशिश करेगा, उसे कानूनी रूप से भारी सजा दी जाएगी।

मिलावट करने वालों के खिलाफ अब सरकार ने ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई है। हाल ही में, जब कुछ घटनाओं में जूस में थूकने और खाने में अपशिष्ट मिलाने की घटनाएँ सामने आईं, तो सरकार ने तुरंत कार्रवाई की और दोषियों के खिलाफ कठोर कदम उठाए।

सुप्रीम कोर्ट में चुनौती का जवाब

सरकार के इस कदम के पहले भी जब कांवड़ यात्रा के दौरान इसी प्रकार के दिशा-निर्देश जारी किए गए थे, तब यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट ने उस वक्त इन निर्देशों पर अंतरिम रोक लगा दी थी, लेकिन इस बार योगी सरकार ने पूरी तैयारी के साथ यह निर्देश जारी किए हैं।

सरकार ने कोर्ट में यह स्पष्ट कर दिया था कि यह निर्देश केवल कांवड़ यात्रा की सुरक्षा और शांति बनाए रखने के लिए जारी किए गए थे। लेकिन अब जब मिलावट और गंदगी मिलाने के कई मामले सामने आ चुके हैं, सरकार ने यह सुनिश्चित कर लिया है कि ऐसे कड़े निर्देश अब पूरे प्रदेश में लागू होंगे।

जनता की सुरक्षा सर्वोपरि

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि राज्य की जनता की सुरक्षा और स्वास्थ्य के साथ कोई भी खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। अब समय आ गया है कि राज्य में मिलावटखोरी और खाद्य सामग्री में गंदगी मिलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने यह साबित कर दिया है कि वह राज्य की जनता के स्वास्थ्य और सुरक्षा के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। इन कड़े कदमों के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि अब कोई भी व्यक्ति या प्रतिष्ठान खाने-पीने की वस्तुओं में मिलावट कर जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ नहीं कर सकेगा।

योगी सरकार के इन सख्त कदमों के बाद अब राज्य में मिलावटखोरों और गंदगी फैलाने वालों के लिए जगह नहीं बची है। सरकार का उद्देश्य केवल कानून लागू करना नहीं है, बल्कि एक साफ-सुथरे और सुरक्षित खाद्य वातावरण का निर्माण करना है। अब समय आ गया है कि ऐसे सभी प्रतिष्ठान और लोग जो इन कड़े नियमों का उल्लंघन करेंगे, उन्हें अपने कृत्यों का परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।

‘पैगंबर मुहम्मद न लिखना जानते थे, न पढ़ना… कुरान लिखने में कई गलती हुई वो अब तक ठीक नहीं किया गया’: मौलाना का ही सिर माँग रहे मुस्लिम कट्टरपंथी

पाकिस्तानी मौलाना तारिक मसूद पर इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद और कुरान के अपमान के आरोप लगे हैं। तारिक मसूद के एक बयान पर इस्लामी कट्टरपंथी भड़क गए हैं। वह मसूद के खिलाफ ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगा रहे हैं। तारिक मसूद के माफी माँगने के बाद भी मामला शांत नहीं हो रहा। मौलाना तारिक मसूद इससे पहले भी कई बार विवादित बयान दे चुका है।

मौलाना तारिक मसूद का हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ। इस वीडियो में मौलाना मसूद ने कथित तौर पर एक सभा में इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद की शैक्षणिक स्थिति पर टिप्पणी की। मौलाना तारिक मसूद ने कहा, “हमारे नबी के बारे में पूरी उम्मत का मानना है कि ना वो लिखना जानते थे ना पढ़ना। वह उम्मी (अरबी में इसका अर्थ अशिक्षित या ऐसे आदमी से होता है जो लिखना ना जानता हो) थे। कुरान कहता है कि पैगम्बर जो कुरान पेश कर रहे हैं, उसका एक इनके दाएँ हाथ ने नहीं लफ्ज लिखा है।”

आगे तारिक मसूद ने कहा, “जैसे ही कोई नई आयत बनती तो किसी को बुला रहे हैं, भाई लिखो। हमारे नबी ने जब कुरान लिखवाया, चूँकि आप लिखना-पढ़ना नहीं जानते थे तो कई बार लिखने वालों से कुरान में व्याकरण की गलती हुई। हमारे नबी ने उसको सही नहीं करवाया, आपको नहीं पता चला कि ये व्याकरण के रूप से गलत है, वो आज तक चला आ रहा है।”

तारिक मसूद ने इसके बाद कुरान की कुछ आयतों के उदाहरण दिए जिनमें वह मानते हैं कि गलतियाँ हैं। मसूद ने इसके बाद कहा कि इन गलतियों को कोई सुधार नहीं पाया क्योंकि अल्लाह ने बता दिया कि नबी उम्मी थे। इसने बताया कि हमने कुरान की हिफाजत की है।

तारिक मसूद के इस बयान पर पाकिस्तान में विवाद हो गया। उन पर कई अन्य मौलानाओं और आम लोगों ने आरोप लगाया कि उन्होंने पैगम्बर और कुरान का अपमान किया है। लोगों ने कहा कि तारिक मसूद ने उन पर टिप्पणी करके एक सीमारेखा पार कर दी है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उनके खिलाफ कई संगठनों ने कार्रवाई की माँग की।

तारिक मसूद का यह बयान वायरल होने के बाद उन्हें जान के लाले पड़ गए हैं। तारिक मसूद ने इसको लेकर माफ़ी भी माँगी है। तारिक मसूद ने एक वीडियो जारी करके कहा है कि वह अपने शब्द वापस ले रहे हैं और उनसे गलती हुई है। मौलाना तारिक मसूद ने कुरान का हवाला देकर माफ़ी माँगी है।

उन्होंने पिछले 48 घंटों में कई बार माफी माँगी है। उन्होंने ट्विटर पर भी एक बयान जारी किया है। मसूद ने कहा है कि वह नबी के अपमान के बारे में सोच तक नहीं सकते हैं।

माफ़ी के बाद भी तारिक मसूद के खिलाफ मामला ठंडा नहीं हो रहा है। लोग उनके ही पुराने बयानों को उनके खिलाफ उपयोग में ला रहे हैं। इन बयानों में मौलाना तारिक खुद ईशनिंदा करने वालों के खिलाफ कड़े कानून बनाने की माँग कर रहे हैं। एक और वीडियो में उन्हें ईशनिंदा करने वाले को मारने की वकालत करते तक सुना गया। इस वीडियो में वह कहते हैं कि अगर आप किसी को पैगम्बर मुहम्मद का अपमान करते सुने तो उसे मौत के घाट उतार दें।

मौलाना तारिक मसूद इससे पहले निकाह पर दिए बयानों को लेकर चर्चा में रहा है। पाकिस्तान में मौलाना तारिक मसूद पर ईशनिंदा का आरोप ऐसे समय में लगा है जब पिछले ही कुछ दिनों में दो लोगों की इन्हीं आरोपों पर हत्या हो चुकी है। पाकिस्तान में हाल ही में एक व्यक्ति को एक पुलिसवाले ने ही पुलिस हिरासत में मार दिया था।

उस व्यक्ति पर ईशनिंदा का आरोप था। वहीं एक और मामले में एक डॉक्टर को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया। पुलिस ने कहा कि ईशनिंदा का आरोपित भागने का प्रयास कर रहा था, इसके बाद उसे मार दिया गया। पाकिस्तान में इन सभी पुलिस वालों का सम्मान किया गया।

इजरायल के एयर स्ट्राइक के बाद लेबनान छोड़कर भाग रहे लोग, हिजबुल्लाह के 1600 ठिकानों पर हमले: 492 की मौत, पेजर-वॉकी टॉकी ब्लास्ट के बाद डायरेक्ट अटैक

इजरायल ने इस्लामी आतंकी संगठन हिजबुल्लाह आतंकियों के पेजर में धमाका करने के बाद अब सीधे हमले चालू कर दिए हैं। इजरायल ने लेबनान के भीतर हिजबुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाया है और उसके हथियारों को भी नष्ट कर दिया है। इजरायल के इस हमले में अब तक 400 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इजरायल ने सोमवार (23 सितम्बर, 2024) को लेबनान के भीतर कई हमले किए। इजरायल ने लेबनान के भीतर 1600 से अधिक ठिकानों को निशाना बनाया। यह सभी हिजबुल्लाह की पनाहगाह थे। इजरायल ने यह हमले उन ठिकानों पर किए जहाँ हिजबुल्लाह ने रॉकेट, मिसाइल और ड्रोन छुपा रखे थे।

लेबनान ने कहा कि इजरायल के इन हमलों में 490 से अधिक लोगों की मौत हो गई जबकि 1600 से अधिक लोग घायल हुए। हिजबुल्लाह पर इजरायल के हमलों के कारण बड़ी संख्या में लोग इन इलाकों को छोड़ गए जहाँ हिजबुल्लाह के ठिकाने हैं। बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर गाड़ियाँ लेकर भागते हुए दिखे।

इजरायल ने उन घरों की फोटो भी जारी की जिन पर हमला किया गया। इजरायल द्वारा जारी की गई फोटो में एक घर के भीतर मिसाइल रखी दिखती है। इजरायल ने कहा कि उसने हमला इसलिए किया क्योंकि हिजबुल्लाह पर उस पर हमले की तैयारी कर रहा था।

इजरायली सुरक्षा बलों के प्रवक्ता डेनियल हगारी ने कहा कि हिजबुल्लाह उत्तरी इजरायल में वह करने का प्रयास कर रहा था जो हमास ने अक्टूबर, 2023 में दक्षिणी इजरायल में किया था। इजरायल ने कहा कि हिजबुल्लाह इजरायली लोगों का नरसंहार करने की तैयारी में था।

इजरायल ने यह भी बताया कि उसने बेरुत के भीतर हमला तब किया जब हिजबुल्लाह के कमांडर एक हमले की तैयारी में जुटे हुए थे। इजरायल के इस हमले के बाद लेबनान के भीतर अफरा तफरी का माहौल है। कई ऐसी वीडियो सामने आई हैं जिनमें धुआँ उठता दिखता है।

हिजबुल्लाह ने भी इस हमले के जवाब में इजरायल के भीतर हमले किए हैं। हिजबुल्लाह ने इजरायल के भीतर लगभग 50 रॉकेट छोड़े हैं। हिजबुल्लाह ने इजरायल के भीतर रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया है। हिजबुल्लाह और इजरायल के बीच लड़ाई के कारण बेरुत में हवाई सेवाएं भी बंद हो गई हैं। इससे पहले इजरायल ने पेजर हमले भी किए थे।

गौरतलब है कि 7 अक्टूबर, 2023 को इस्लामी आतंकी संगठन हमास ने इजरायल पर हमला कर दिया था। इस हमले में 1000 से अधिक लोग मारे गए थे। हिजबुल्लाह ने इस हमले का समर्थन किया था और लेबनान की तरफ से इजरायल को निशाना बनाया था। अब इजरायल हिजबुल्लाह पर कहर बरपा रहा है।

UP में 96 बीघा जमीन वक्फ बोर्ड से मुक्त: मंदिर के पास है भूमि, लेकिन 70 साल से अलाउद्दीन खिलजी के नाम पर कर रखा था कब्जा; अब सरकार के नाम हुई

उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी जिले में हाल ही में एक बड़ा भूमि विवाद सुलझाया गया, जिसमें प्रशासन ने 96 बीघा जमीन को वक्फ बोर्ड के कब्जे से मुक्त करवा लिया। यह जमीन हिन्दुओं के एक प्रसिद्ध और पौराणिक धर्मस्थल, कड़ा धाम मंदिर के पास स्थित थी। भूमि विवाद कई दशकों से चला आ रहा था, जिसमें जमीन पर कब्जा अलाउद्दीन खिलजी के नाम पर दावा किया गया था।

इस प्रकरण में कोर्ट की सुनवाई और कानूनी प्रक्रियाओं के बाद अंततः प्रशासन ने जमीन को ग्राम समाज के नाम पर दर्ज कर दिया। इस फैसले के बाद शासकीय अधिवक्ता ने शासन को 4 बिंदुओं पर सुझाव भेजा है। इसमें से अधिकतर सुझावों को शासन ने स्वीकार भी कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामला कौशाम्बी जिले के कड़ा धाम इलाके का है। कड़ा धाम हिन्दुओं का एक प्रसिद्ध और पौराणिक धर्मस्थल है। इसी मंदिर के पास 96 बीघे जमीन पर लम्बे समय से विवाद था। मुस्लिम समुदाय के लोग इस पर कब्ज़ा जमाए हुए थे। एक स्थानीय निवासी सैयद नियाज अशरफ अली विवादित जमीन को अलाउद्दीन खिलजी के समय से जोड़ कर बयानबाजी करते थे। बकौल नियाज अशरफ वह भूमि अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में ख्वाजा कड़क शाह के नाम से माफीनामा पर दर्ज है।

नियाज अशरफ ने 1945 में दीवानी अदालत में मुकदमा दायर किया, जिसमें उन्होंने जमीन को वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज करने की माँग की। हालाँकि, लम्बी सुनवाई के बाद अदालत ने इस दावे को खारिज कर दिया और जमीन को वक्फ संपत्ति मानने से इंकार कर दिया। इसके बाद, 1952 में इस जमीन को आधिकारिक तौर पर ग्राम समाज के नाम पर दर्ज कर दिया गया।

करीब 24 साल की खामोशी के बाद, 1974 में नियाज अशरफ ने फिर से अदालत का दरवाजा खटखटाया। इस बार भी अदालत ने सुनवाई के बाद जमीन को वक्फ संपत्ति मानने से इंकार कर दिया। यह दूसरा मौका था जब नियाज अशरफ का दावा खारिज कर दिया गया।

अदालत में 2 बार हारने के बावजूद नियाज़ ने हार नहीं मानी और वो कोशिशों में लगे रहे। साल 1979 में तत्कालीन चकबंदी अधिकारी ने इस जमीन को वक्फ की संपत्ति घोषित कर दिया। चकबंदी अधिकारी के फैसले से नाखुश कई स्थानीय निवासियों ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने कौशाम्बी जिले के अपर जिला मजिस्ट्रेट (ADM न्यायिक) को मामले की सुनवाई करने का आदेश दिया। सुनवाई के दौरान एडीएम ने दोनों पक्षों से सबूत तलब किए।

आखिरकार मजिस्ट्रेट ने जमीन के वक्फ संपत्ति होने वाले दावों को निराधार पाया। वक्फ बोर्ड इस केस में कोई भी ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया। आखिरकार 2 दिसंबर 2022 को एडीएम (न्यायिक) ने वक्फ द्वारा काबिज़ इस भूमि को ग्राम सभा में दर्ज करने का आदेश दे दिया था।

इस आदेश के बाद भी कानूनी औपचारिकताएँ पूरी करने में प्रशासन को लगभग डेढ़ साल का समय लगा। अंततः 2024 में प्रशासन ने सभी प्रक्रियाओं को पूरा कर लिया और जमीन को वक्फ बोर्ड के कब्जे से मुक्त करवा दिया। इस फैसले के बाद, जमीन अब आधिकारिक तौर पर ग्राम समाज के नाम पर दर्ज हो गई है।

इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद, कौशाम्बी के जिला शासकीय अधिवक्ता शिवमूर्ति द्विवेदी ने उत्तर प्रदेश शासन को एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में उन्होंने जमीन को वक्फ बोर्ड के कब्जे से मुक्त कराने की पुष्टि की और शासन को कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी भेजे। उनके अधिकांश सुझावों को शासन ने स्वीकार कर लिया है।

इस प्रकरण की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि वक्फ बोर्ड ने इस भूमि पर कब्जा बनाए रखने के लिए बार-बार अदालत का सहारा लिया, लेकिन हर बार उन्हें असफलता का सामना करना पड़ा। 1945 में पहला मुकदमा दायर किया गया, जिसमें अदालत ने भूमि को वक्फ संपत्ति मानने से इंकार कर दिया। इसके बाद 1974 में फिर से मामला उठाया गया और फिर से वक्फ बोर्ड की हार हुई। बावजूद इसके, 1979 में चकबंदी अधिकारी ने इसे वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया, लेकिन स्थानीय निवासियों के विरोध के बाद यह निर्णय भी पलट दिया गया और अंतत: ये जमीन खाली करा ली गई है।

कड़ा धाम का धार्मिक महत्व

कड़ा धाम हिन्दुओं के लिए एक पवित्र स्थल है, जो प्राचीन काल से धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता प्राप्त है। इस मंदिर में हर साल लाखों भक्त आते हैं और यह क्षेत्र धार्मिक पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र है। इसलिए, मंदिर के पास स्थित भूमि को लेकर विवाद ने न केवल कानूनी बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी हासिल किया।

कौशाम्बी जिले में 96 बीघा जमीन के विवाद को सुलझाना प्रशासन के लिए एक बड़ी जीत मानी जा रही है। यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण से भी इसका बड़ा प्रभाव है। वक्फ बोर्ड की लगातार हार और जमीन को ग्राम समाज के नाम पर दर्ज किए जाने से यह स्पष्ट हो गया है कि न्यायालय ने सभी तथ्यों और प्रमाणों की गहन जांच के बाद निष्पक्ष निर्णय लिया।

अब तिरुपति के प्रसाद में तंबाकू मिलने का दावा, महिला भक्त का Video वायरल: ‘बीफ वाले लड्डू’ को लेकर पहले से ही विवादों में है मंदिर

तिरुपति के प्रसिद्ध श्री वेंकटेश्वर मंदिर के एक भक्त ने दावा किया है कि उन्हें प्रसाद के रूप में मिले लड्डू में तंबाकू मिला है। यह घटना उस समय सामने आई है जब लड्डुओं में पशुओं की चर्बी पाए जाने के बाद से आंध्र प्रदेश में एक बड़ा राजनीतिक विवाद छिड़ा हुआ है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, खम्मम जिले की रहने वाली डोंथु पद्मावती 19 सितंबर 2024 को तिरुपति मंदिर गई थी। उनका दावा है कि उन्हें प्रसाद के रूप में मिले लड्डू में कागज में लिपटा तंबाकू मिला। डोंथु पद्मावती ने बताया कि 19 सितंबर 2024 को तिरुपति मंदिर की यात्रा के बाद जब वह लड्डू अपने परिवार और पड़ोसियों में बाँटने जा रही थीं, तब उन्होंने लड्डू के अंदर छोटे कागज में लिपटा तंबाकू पाया।

पद्मावती ने कहा, “जैसे ही मैं लड्डू बाँटने जा रही थी, मैं यह देखकर दंग रह गई कि उसमें तंबाकू के टुकड़े कागज में लिपटे हुए थे। प्रसाद को पवित्र माना जाता है, और उसमें ऐसी मिलावट होना दिल दहला देने वाला है।”

यह खुलासा तिरुपति के लाखों भक्तों के बीच गहरी चिंता का विषय बन गया है। इससे पहले भी लड्डुओं में इस्तेमाल किए गए घी में पशुओं की चर्जी मिलने के आरोपों ने आंध्र प्रदेश में राजनीतिक माहौल गरमा दिया था। तिरुपति के लड्डू, जो भक्तों के लिए श्रद्धा और पवित्रता का प्रतीक माने जाते हैं, इन विवादों के बाद उनकी शुद्धता पर सवाल उठने लगे हैं। तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD), जो मंदिर का प्रबंधन करता है, के गुणवत्ता नियंत्रण उपायों पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं। हालाँकि बाद में प्रसाद की शुद्धता बहाल कर दी गई।

क्या है विवाद?

यह विवाद तब बढ़ा जब आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने हाल ही में दावा किया कि पिछले जगन मोहन रेड्डी सरकार के दौरान तिरुपति मंदिर में प्रसाद के रूप में दिए गए लड्डुओं में घटिया सामग्री, जिसमें पशु वसा भी शामिल थी, पाई गई। नायडू ने गुजरात की एक निजी लैब की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि लड्डुओं में “बीफ टैलो” (गाय की चर्बी), “लार्ड” (सूअर की चर्बी) और मछली का तेल मिला हुआ था। इस दावे ने पूरे राज्य में हलचल मचा दी।

हालाँकि, पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी ने इन आरोपों का खंडन किया और कहा कि उनके शासनकाल में ऐसा कोई उल्लंघन नहीं हुआ। रेड्डी ने नायडू पर भगवान के नाम पर राजनीति करने का आरोप लगाते हुए उन्हें “आदतन झूठा” बताया। इस पूरे विवाद के कारण तिरुपति मंदिर के भक्तों में भ्रम और चिंता का माहौल है, और यह घटना लड्डू की शुद्धता और धार्मिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

‘चंद पैसों की नौकरी के लिए अपना धर्म भ्रष्ट नहीं करूँगा’: अयोध्या की कोका-कोला फैक्ट्री में हिंदू कर्मचारियों को कलावा काटने को किया मजबूर, Video वायरल पर होने ‘खाद्य सुरक्षा’ का बहाना

उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले में स्थित कोका-कोला की फैक्ट्री ‘अमृत बॉटलर्स’ का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में एक सुरक्षा गार्ड पर फैक्ट्री में काम करने वाले हिंदू कर्मचारियों के कलावे काटने का आरोप लगाया जा रहा है।

यह मामला सोमवार (23 सितंबर 2024) को सामने आया और इसे लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। वीडियो में देखा जा सकता है कि गार्ड कर्मचारियों के हाथों में बंधे कलावे काटते हुए नजर आ रहा है। इसके चलते फैक्ट्री प्रबंधन पर धार्मिक भावनाओं के अपमान का आरोप लग रहा है।

यह घटना अयोध्या जिले के थानाक्षेत्र पूरा कलंदर स्थित कोका-कोला की फैक्ट्री में घटी। वीडियो में दिखाया गया है कि कई कर्मचारियों के हाथों से गार्ड ने कलावे काट दिए। कलावा, जिसे हिंदू धर्म में धार्मिक पहचान और आस्था का प्रतीक माना जाता है, को काटे जाने से वहाँ के कर्मचारियों में रोष फैल गया। वीडियो में कर्मचारियों और गार्ड के बीच हुई बहस को भी देखा जा सकता है, जिसमें कर्मचारियों ने अपने धार्मिक अधिकारों के उल्लंघन की बात की है।

वहीं, वीडियो में कलावा काटते दिख रहे सिक्योरिटी गार्ड ने जवाब दिया कि “ऊपर से ऑर्डर आता है, जिसका वो पालन करता है।” इस बीच लोगों ने सुपरवाइजर को बुलाने की बात कही। सुपरवाइजर के आने के बावजूद समाधान नहीं निकला। वीडियो बनाने वाले एक व्यक्ति ने गुस्से में कहा, “जहाँ हिन्दू धर्म का अपमान हो रहा हो, वहाँ मुझे काम ही नहीं करना। मैं चंद पैसों के लिए अपना धर्म भ्रष्ट नहीं कर सकता।” उन्होंने यह भी साफ किया कि वे नौकरी छोड़ने को भी तैयार हैं लेकिन अपने धार्मिक प्रतीकों का अनादर नहीं सहेंगे।

जैसे ही यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, फैक्ट्री प्रबंधन को सफाई देने के लिए सामने आना पड़ा। फैक्ट्री के जनसंपर्क अधिकारी अर्जुन दास ने मीडिया से बातचीत में कहा कि कलावा काटने का आदेश गुणवत्ता बनाए रखने के लिए दिया गया था। उन्होंने बताया कि फैक्ट्री में स्वच्छता और सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन किया जाता है, ताकि उत्पाद में किसी प्रकार की अशुद्धि न आए।

अर्जुन दास के अनुसार, यदि कलावा या कोई धागा गलती से बोतल में चला जाता है, तो यह कम्पनी के लिए हानिकारक साबित हो सकता है। फैक्ट्री के अधिकारियों ने यह भी दावा किया है कि इस वीडियो को वायरल कर संस्थान की बदनामी करने की कोशिश की गई है। अर्जुन दास का कहना है कि इस वीडियो के पीछे कुछ लोग हैं जो कंपनी की छवि को नुकसान पहुँचाना चाहते हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि इस नियम के तहत कर्मचारियों को घड़ी, अंगूठी, और अन्य पहनावे भी हटाने पड़ते हैं। लेकिन कर्मचारियों का कहना था कि सिर्फ उन लोगों का सामान हटाया जाए जो सीधे तौर पर मशीनों के पास काम करते हैं, सभी कर्मचारियों पर यह नियम लागू करना उचित नहीं है।

विवाद बढ़ता देख फैक्ट्री प्रबंधन ने तुरंत कार्रवाई करते हुए सुरक्षा गार्ड को बर्खास्त कर दिया। फैक्ट्री के मुख्य सुरक्षा अधिकारी सच्चिदानंद तिवारी ने कहा कि वे खुद सनातनी हैं और कंपनी में सभी धर्मों का पूरा सम्मान किया जाता है। उन्होंने कहा कि यह घटना गलतफहमी की वजह से बढ़ी है और इसका उद्देश्य किसी भी धर्म का अपमान नहीं था। फिलहाल, अब तक इस मामले में किसी प्रकार की पुलिस कार्रवाई नहीं की गई है।