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बरेली में अवैध मस्जिद निर्माण को लेकर विवाद, पथराव के वीडियो वायरल: बीजेपी विधायक विरोध में बैठे धरने पर, भारी पुलिस बल तैनात

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के केला डांडी गाँव में हाल ही में अवैध मस्जिद निर्माण के चलते सांप्रदायिक तनाव फैल गया है। यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने गाँव के अंदर एक अवैध मस्जिद का निर्माण करना शुरू किया। यह मामला तब और बिगड़ गया जब अवैध निर्माण को लेकर हिंदू समाज के लोग सड़कों पर उतर आए और कथित तौर पर मस्जिद की दीवार का एक हिस्सा गिर गया। इस घटना के बाद पूरे गाँव में तनाव फैल गया और पुलिस को भारी संख्या में तैनात करना पड़ा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुस्लिम समुदाय के फिदा हुसैन और उनके भाई आरिफ ने आबादी के बीच अपना प्लॉट मस्जिद के लिए दान कर दिया। इसके बाद मुस्लिम समुदाय के लोगों ने उस प्लॉट पर दीवारें खड़ी कर दीं और वहां मस्जिद का निर्माण शुरू कर दिया। दीवारों पर मस्जिद की पेंटिंग कर दी गई और नमाज पढ़ी जाने लगी। लेकिन यह निर्माण बिना किसी सरकारी अनुमति के किया गया था, जो विवाद का मुख्य कारण बना।

हिंदू समुदाय के लोगों ने करीब तीन महीने पहले ही इस अवैध निर्माण को लेकर प्रशासन से शिकायत की थी। उस समय प्रशासन ने पुलिस की मौजूदगी में निर्माण कार्य रुकवा दिया था और उस स्थान पर ताला भी डलवा दिया था। हालाँकि, उसके बाद भी अवैध निर्माण को पूरी तरह से नहीं तुड़वाया गया, जिससे हिंदू समाज में नाराजगी बढ़ने लगी।

स्थिति तब और बिगड़ी जब कथित तौर पर शुक्रवार (27 सितंबर 2024) को हिंदू समाज के लोगों ने अवैध मस्जिद की दीवार का एक हिस्सा गिरा दिया। इस घटना के बाद पुलिस तुरंत मौके पर पहुँची और अपनी निगरानी में फिर से दीवार बनवा दी। यह कदम पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े करने वाला था, क्योंकि हिंदू समाज का आरोप था कि पुलिस मुस्लिम पक्ष के साथ मिलकर काम कर रही थी और अवैध निर्माण को बढ़ावा दे रही थी। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए हिंदू समाज के लोग फिर से सड़कों पर उतर आए और धरने पर बैठ गए।

विधायक डॉ. एमपी आर्या भी इस विवाद में सक्रिय रूप से शामिल हो गए। जब उन्हें इस मामले की जानकारी हुई, तो वह तुरंत गाँव पहुँचे और धरने पर बैठी महिलाओं के साथ शामिल हो गए। उन्होंने भी इस अवैध निर्माण को हटवाने की माँग की और पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर कड़ी आलोचना की। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए इस पूरे मामले की जानकारी दी और पुलिस के रवैये की आलोचना की।

इस विवाद के बाद पुलिस और प्रशासन हरकत में आए और गांव में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया। एसपी दक्षिणी मुकेश चंद्र मिश्रा ने इस मामले में कहा कि प्रशासन ने पहले भी मस्जिद के अवैध निर्माण को रुकवाने के लिए कदम उठाए थे। उन्होंने बताया कि मजिस्ट्रेट के आदेश पर पहले ही निर्माण कार्य को रुकवाया गया था, लेकिन हिंदू पक्ष का आरोप था कि वहां नमाज अदा की जा रही थी और यह निर्माण चोरी-छिपे फिर से शुरू किया गया था।

इस विवाद ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया जब दोनों समुदायों के बीच पथराव होने लगा। सोशल मीडिया पर इस पथराव की कई वीडियो वायरल हो गईं, जिनमें देखा जा सकता है कि दोनों पक्षों के लोग एक-दूसरे पर पत्थर फेंक रहे हैं। इस घटना के बाद इलाके में और तनाव फैल गया। पुलिस ने मौके पर तुरंत फायर ब्रिगेड की गाड़ी मंगवाई और छतों से फेंके जा रहे पत्थरों को रोकने के लिए सुरक्षा बढ़ाई गई।

पथराव के बाद पुलिस ने 12 लोगों को हिरासत में लिया। ये लोग मुख्य रूप से हिंदू समाज के थे, जिन पर अवैध निर्माण की दीवार गिराने का आरोप था। इस गिरफ्तारी ने हिंदू पक्ष के लोगों में और गुस्सा भर दिया, जिसके चलते उन्होंने विधायक एमपी आर्या के नेतृत्व में धरना देना शुरू कर दिया। धरने पर बैठे लोगों की मुख्य माँग यही थी कि पकड़े गए युवकों को बिना शर्त रिहा किया जाए और अवैध निर्माण को पूरी तरह से खत्म किया जाए। फिलहाल तनावपूर्ण हालात को देखते हुए गाँव में कई थानों की पुलिस और पीएससी बल तैनात किया गया।

फिलहाल गाँव में स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है। पुलिस बल की भारी तैनाती के बीच गाँव में शांति बनाए रखने की कोशिश की जा रही है। हालाँकि, दोनों समुदायों के बीच तनाव अभी भी बना हुआ है और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। विधायक एमपी आर्या और उनके समर्थकों का कहना है कि जब तक अवैध निर्माण पूरी तरह से हटाया नहीं जाता और पकड़े गए युवकों को रिहा नहीं किया जाता, तब तक वह अपना धरना जारी रखेंगे।

RG Kar अस्पताल में हुई डॉक्टर की रेप-हत्या का TMC के छात्र नेताओं ने उड़ाया मजाक: आलोचना के बाद पार्टी ने 2 को किया सस्पेंड, BJP ने कहा- ये अपमान से भी परे है

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की छात्र शाखा ‘तृणमूल छात्र परिषद’ ने शुक्रवार (27 सितंबर 2024) को अपने दो वरिष्ठ नेताओं को निलंबित कर दिया। प्रांतिक चक्रवर्ती और राजन्या हलधर ने कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में एक महिला ट्रेनी डॉक्टर की बलात्कार के बाद निर्मम हत्या पर एक लघु फिल्म बनाई थी।

तृणमूल छात्र परिषद ने इसे पार्टी विरोधी गतिविधि बताया है और इसके आरोप में दोनों में निलंबित कर दिया। चक्रवर्ती और हलधर ने आरजी कर मेडिकल कॉलेज की इस घटना पर बनाई लघु फिल्म का नाम ‘अगमनी, तिलोत्तोमादेर गल्पो’ (तिलोत्तोमा की कहानी) दिया है। यह मामला तब सामने आया, जब राजन्या हलधर ने सोशल मीडिया पर फिल्म का पोस्टर अपलोड किया।

राजन्य हलधर ने सोशल मीडिया पोस्टर के नीचे टैगलाइन दिया था, ‘आरजी कर घटना की पृष्ठभूमि में’। प्रांतिक चक्रवर्ती द्वारा निर्देशित यह फिल्म अगले महीने यानी अक्टूबर के पहले सप्ताह में रिलीज होने वाली है। परिषद के प्रदेश अध्यक्ष त्रिनकुर भट्टाचार्य ने नोटिस में कहा कि दोनों सदस्यों को निलंबित करने का निर्णय तब तक लागू रहेगा, जब तक पार्टी की अनुशासन समिति इस पर अंतिम निर्णय नहीं ले लेती।

तृणमूल छात्र परिषद की नोटिस में कहा गया है, “दोनों छात्र कार्यकर्ताओं ने पार्टी के अनुशासन का उल्लंघन किया है और जनता के बीच यह गलत धारणा बनाई कि टीएमसीपी फिल्म का प्रचार कर रही है।” इस बीच, प्रांतिक चक्रवर्ती ने दावा किया है कि इस फिल्म का आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल की घटना से कोई संबंध नहीं है।

इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए तृणमूल कॉन्ग्रेस के नेता कुणाल घोष ने कहा कि रचनात्मक क्षेत्र में हर किसी को व्यक्तिगत स्वतंत्रता है, लेकिन अगर कोई भी आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसी चौंकाने वाली एवं दुखद घटना का फायदा उठाकर अपनी फिल्म का प्रचार करने की कोशिश करेगा तो पार्टी उस पर कार्रवाई करेगी।

वहीं, बंगाल भाजपा ने इस फिल्म को लेकर निशाना साधते हुए कहा कि यह मृत डॉक्टर की स्मृति का घृणित अपमान है। भाजपा ने सोशल मीडिया साइट X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि टीएमसी ने एक मौत को सस्ते स्टंट में बदल दिया है। इससे साबित होता है कि उनके पास कोई शर्म, विवेक और न्याय के लिए सम्मान नहीं बचा है।

इससे पहले प्रांतिक ने कहा था, “मिथुन चक्रवर्ती ने सुमन घोष की ‘नोबेल चोर’ में काम किया था। सीबीआई अभी भी नोबेल पुरस्कार का पता नहीं लगा पाई है। क्या किसी ने फिल्म पर सवाल उठाया? राज चक्रवर्ती ने बरुन बिस्वास के जीवन पर ‘प्रोलॉय’ बनाई, हालांकि मामला अभी भी न्यायालय में विचाराधीन है।”

उन्होंने आगे कहा, “मेरी फिल्म में पूजा (दशहरा) से पहले सकारात्मक माहौल है। बलात्कार भारत के हर हिस्से में एक वास्तविकता है। मुझे खुशी है कि बंगाल इसके खिलाफ खड़ा हुआ। बंगाल में विरोध करने की हिम्मत और लोकतांत्रिक माहौल है। मेरी 12 मिनट की फिल्म विरोध, भावना और उम्मीद की कहानी है।”

राजन्या ने इस बात पर जोर दिया कि वह एक कलाकार के तौर पर इस परियोजना का हिस्सा थीं, न कि अपने राजनीतिक जुड़ाव के लिए। उन्होंने कहा, “हमने यह फिल्म एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के लिए बनाई है। मेरी किरदार ‘माँ’ एक डॉक्टर है, जिसका बलात्कार हुआ था। दर्शक उसे आरजी कर जूनियर डॉक्टर के रूप में देख सकते हैं। हालाँकि हमने ऐसा नहीं बताया है।”

आरजी कर जूनियर डॉक्टर से एक्टर बनीं किंजल नंदा ने कहा, “यह आंदोलन को कमजोर करने का एक बेशर्म प्रयास है। मैं पोस्टर में ‘आरजी कर घटना की पृष्ठभूमि पर आधारित’ लाइन के इस्तेमाल की निंदा करती हूँ। एक एक्टर के तौर पर मैं एक कलाकार की स्वतंत्रता का सम्मान करती हूँ, लेकिन यह एक क्रूर अपराध है और इसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में हो रही है।”

गाजियाबाद में धर्मांतरण गिरोह का भंडाफोड़, LLB छात्र समेत 4 गिरफ्तार: ऑपइंडिया की रिपोर्ट के बाद पुलिस ने की कार्रवाई, सैकड़ों लोगों को बना चुके हैं ईसाई

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में जबरन धर्मांतरण से जुड़ा एक संगीन मामला सामने आया है, जिसमें मोदीनगर इलाके से चार आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है। इसमें एक LLB छात्र भी शामिल है। इन आरोपितों ने अब तक सौ से अधिक लोगों का धर्मांतरण करवाया है, जिसमें वे लोगों को लालच, दबाव, और डर के आधार पर ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर करते थे। इससे पहले, इसी प्रकार की घटना नंदग्राम में भी सामने आई थी, जहाँ एक अन्य गिरोह ने लोगों को धर्मांतरण के लिए फुसलाया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मोदीनगर पुलिस ने इस मामले में चार आरोपितों को गिरफ्तार किया है, जिनमें आशु, पोलूस मसीह, पास्टर रासी बालियार, और छट्ठू कुमार शाह शामिल हैं। आशु, जो कि एक LLB का छात्र है, पर अपनी चाची संगीता पर जबरन धर्मांतरण का दबाव बनाने का आरोप है। आशु अपनी चाची और उनके पति पर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव डाल रहा था, और बीमारी के इलाज और अन्य सुविधाओं का लालच देकर उन्हें कन्वर्ट करने की कोशिश कर रहा था।

पुलिस ने जब इस मामले की जाँच की, तो आरोप सही पाए गए और आरोपितों की गिरफ्तारी की गई। यह भी पता चला कि इस मामले में दिल्ली से फंडिंग की जा रही थी। पोलूस मसीह को दिल्ली के एक संगठन से हर महीने 3,000 रुपये की फंडिंग मिलती थी, और उसे धर्म के प्रचार के लिए अलग से पैसे भी दिए जाते थे।

गिरफ्तार आरोपितों ने कबूल किया कि वे अब तक सौ से अधिक लोगों का धर्मांतरण करवा चुके हैं। विशेषकर बीमारी से पीड़ित लोग और युवा, जिन्हें नौकरी और शादी का लालच दिया जाता था, उनके निशाने पर थे। इस गिरोह के तार दिल्ली के अलावा गौतमबुद्ध नगर और अन्य राज्यों से भी जुड़े हुए हैं।

नंदग्राम के सेवानगर में पहले सामने आई घटना में भी यही पैटर्न देखा गया था, जहाँ इंग्राहम स्कूल के पीटीआई और पादरी को गिरफ्तार किया गया था। उस मामले में भी सैकड़ों लोगों का धर्मांतरण करने की बात सामने आई थी, और पुलिस ने इस गिरोह के संबंध मुंबई और केरल से होने की आशंका जताई थी।

धर्मांतरण के इन मामलों की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) का गठन किया है। डीसीपी देहात सुरेंद्रनाथ तिवारी के अनुसार, नंदग्राम और मोदीनगर दोनों ही मामलों की जांच के लिए अलग-अलग एसआईटी बनाई गई हैं, जो डीसीपी के तहत काम करेंगी। पुलिस अब आरोपितों के बैंक खातों, मोबाइल डेटा और विदेशी फंडिंग के बारे में भी जानकारी जुटा रही है। इसके अलावा, जिन लोगों का धर्मांतरण करवाया गया है, उनकी भी जानकारी एकत्र की जा रही है।

चारों आरोपितों की गिरफ्तारी से पहले ऑपइंडिया ने इस मामले पर रिपोर्ट प्रकाशित की थी। उस रिपोर्ट में में पीड़िता संगीता ने अपने ससुराल वालों पर धर्मांतरण का दबाव बनाने का आरोप लगाया था। संगीता ने बताया कि उसके जेठ के बेटे आशु ने अपने परिवार के साथ ईसाई धर्म अपना लिया था और अब वह उसी पर भी धर्मांतरण का दबाव बना रहा था। जब संगीता और उसके पति ने इसका विरोध किया, तो उन पर मारपीट और धमकी दी गई। ऑपइंडिया ने इस रिपोर्ट में खासतौर पर बताया था कि संगीता के ससुराल वाले ईसाई पादरियों को बुलाकर उन्हें धर्मांतरण के लिए मजबूर कर रहे थे। इस रिपोर्ट के बाद पुलिस ने कार्रवाई की और चारों को गिरफ्तार कर लिया।

गाजियाबाद में धर्मांतरण के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। पहले नंदग्राम और अब मोदीनगर में पुलिस को बड़े पैमाने पर धर्मांतरण के सबूत मिले हैं। इन घटनाओं में आरोपितों ने लोगों को डर, लालच, और भ्रम के आधार पर ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया। पुलिस की जाँच में यह भी पता चला है कि इस तरह के गिरोह विदेशी फंडिंग के जरिए चलाए जा रहे हैं, और इन्हें दिल्ली, मुंबई, और अन्य राज्यों से समर्थन मिल रहा है। पुलिस का मानना है कि यह गिरोह न केवल गाजियाबाद में बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी सक्रिय हैं और इनके तार कई राज्यों से जुड़े हुए हैं।

इजरायल ने इस बार सीधे हिजबुल्लाह के हेडक्वार्टर पर किया धमाका, 6 की मौत, 91 घायल: चीफ नसरल्लाह की मौत की भी खबर उड़ी, आतंकी संगठन ने नकारा

इजरायल ने एक बार फिर से लेबनान में हमला किया। इस बार उनका निशाना सीधे बेरट स्थित हिजबुल्लाह का हेडक्वार्टर था। दावा किया गया कि इस हमले में हेडक्वार्टर के भीतर कोई नहीं बचा। वहीं कुछ रिपोर्ट ने बताया कि हमले में 6 लोग मरे हैं और 91 घायल हुए हैं।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स तो यह भी कह रही हैं कि इस हमले में हिजबुल्लाह के चीफ नसरल्लाह की मौत हो गई। हालाँकि हिजबुल्लाह संगठन ने खुद इस दावे से इनकार किया है।

बताया ये भी जा रहा कि इजराइली हमले में नसरल्लाह की बेटी और उसके भाई हाशिम सफी अल दीन की मौत हो गई है। हाशिम हिज्ब कार्यकारी परिषद का चीफ था। हालाँकि इन मौतों को लेकर अभी कहीं आधिकारिक पुष्टि नहीं है।

वहीं हमले से जुड़ी जो जानकारी इजरायल रक्ष बल ने दी है। उसमें बताया गया, “दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह की मिसाइल यूनिट के कमांडर मुहम्मद अली इस्माइल और उनके डिप्टी हुसैन अहमद इस्माइल को इजरायल द्वारा एक सटीक हवाई हमले में मार गिराया गया है। अली इस्माइल इजरायल राज्य के खिलाफ कई आतंकवादी हमलों को निर्देशित करने के लिए जिम्मेदार था, जिसमें बुधवार को इजरायली क्षेत्र की ओर रॉकेट दागना और मध्य इजरायल की ओर सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल का प्रक्षेपण शामिल था।”

इजरायल ने बताया कि हिजबुल्ला ने इजरायली नागरिकों को मारने के लिए 150,000 रॉकेट छोड़े थे। अब इजरायली सेना हिजबुल्लाह को मारकर सिर्फ इजरायल को बचा रही है। लेबनान के लोगों के साथ उनका कोई द्वेष नहीं है। उन्होंने बताया कि हिजबुल्लाह की मिसाइलें उनकी जमीन और समुद्र दोनों को निशाना बना रही है, लेकिन वह अपने नागरिकों को बचाने के लिए चाहे भूमि से हो, वायु से हो या समुद्र से हो हमेशा तत्पर हैं। आईडीएफ ने जानकारी दी कि वह खुफिया सूचना के आधार पर आतंकी संगठन के ठिकाने पर हमला कर रहे हैं। उन्होंने साफ कहा है कि हिजबुल्लाह को तबाह करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

जो खुद देता है आतंकवाद और नशे को बढ़ावा, वो हमें ज्ञान दे रहा: कश्मीर की तुलना फिलिस्तीन से करने पर भड़का भारत, UN में पाकिस्तानी PM को लताड़ा

कंगाली के कगार पर खड़े पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में एक बार फिर जम्मू-कश्मीर का राग अलापा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कश्मीर में भारत सरकार की कार्रवाई की आलोचना की है। इतना ही नहीं, उन्होंने जम्मू-कश्मीर की तुलना फिलिस्तीन से की है। इन आरोपों का मुँहतोड़ जवाब देते हुए भारत ने कहा कि आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी से चलने वाला मुल्क ज्ञान दे रहा है।

शहबाज शरीफ ने कहा, “फिलिस्तीन के लोगों की तरह जम्मू और कश्मीर के लोगों ने भी अपनी स्वतंत्रता और आत्म-निर्णय के अधिकार के लिए एक सदी तक संघर्ष किया है।” उन्होंने भारत पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों को लागू करने की प्रतिबद्धताओं से मुकरने का आरोप लगाया। इतना ही नहीं, इस्लामी प्रोपगेंडा फैलाने वाले ट्रॉल्स की तरह ही शहबाज शरीफ ने आरोप लगाए।

उन्होंने भारत पर न्यायेतर हत्याओं (एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग), क्षेत्र में लंबे समय तक कर्फ्यू लगाने और अन्य कठोर कार्रवाई करने का आरोप लगाया है। शरीफ ने कहा, “उपनिवेशवादी प्रोजेक्ट के तहत भारत कश्मीरी जमीनों और संपत्तियों को जब्त कर रहा है और मुस्लिम बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यक में बदलने की साजिश के तहत बाहरी लोगों को जम्मू और कश्मीर में बसा रहा है।”

शहबाज शरीफ ने यह आशंका जताई कि अगर पाकिस्तान किसी तरह का दुस्साहस करने की सोचता है तो भारत उसे छोड़ेगा नहीं है। भारत की बढ़ती सैन्य क्षमताओं के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारत के नेतृत्व ने ‘नियंत्रण रेखा पार करने की धमकी’ दी है। हालाँकि उन्होंने अपनी कमजोर छिपाते हुए कहा कि पाकिस्तान जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है।

शहबाज शरीफ ने इस्लामोफोबिया पर बहस वाले एक सेगमेंट में उन्होंने भारत में ‘हिंदू वर्चस्ववादी एजेंडे’ को इस मुद्दे की ‘सबसे भयावह अभिव्यक्ति’ बताया। उन्होंने आगे कहा कि इसका उद्देश्य भारतीय मुसलमानों को वश में करना और ‘भारत की इस्लामी विरासत को मिटाना’ है।

शहबाज शरीफ को जवाब देते हुए UNGA में भारतीय राजनयिक भाविका मंगलनंदन ने कहा, “आज इस सभा में दुर्भाग्य से एक हास्यास्पद घटना घटी। आतंकवाद, नशीले पदार्थों के व्यापार और अंतरराष्ट्रीय अपराध के लिए विश्व में बदनाम सेना द्वारा संचालित एक देश ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर हमला करने का दुस्साहस किया। मैं पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के भाषण में भारत के संदर्भ के बारे में बात कर रही हूँ।”

भाविका मंगलनंदन ने पाकिस्तान को आईना दिखाते हुए कहा, “जैसा कि दुनिया जानती है, पाकिस्तान ने लंबे समय से अपने पड़ोसियों के खिलाफ सीमा पार आतंकवाद को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। इसने हमारी संसद, हमारी वित्तीय राजधानी मुंबई, बाजारों और तीर्थस्थलों पर हमला किया है। यह सूची लंबी है। ऐसे देश के लिए कहीं भी हिंसा के बारे में बात करना सबसे बड़ा पाखंड है।”

उन्होंने कहा, “धांधली वाले चुनावों के इतिहास वाले मुल्क के लिए लोकतंत्र में राजनीतिक विकल्पों के बारे में बात करना और भी असाधारण है। सच्चाई यह है कि पाकिस्तान हमारे क्षेत्र पर नजर गड़ाए हुए है और भारत के अभिन्न अंग जम्मू और कश्मीर में चुनावों को बाधित करने के लिए लगातार आतंकवाद का इस्तेमाल करता रहा है। आतंकवाद के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता।”

आतंकवाद पर पाकिस्तान को लताड़ लगाते हुए भाविका मंगलनंदन ने कहा, “पाकिस्तान को यह समझना चाहिए कि भारत के खिलाफ सीमा पार आतंकवाद के परिणाम उसे निश्चित रूप से भुगतने होंगे। यह हास्यास्पद है कि एक राष्ट्र जिसने 1971 में नरसंहार किया और जो आज भी अपने अल्पसंख्यकों पर लगातार अत्याचार करता है, वह असहिष्णुता और भय के बारे में बोलने की हिम्मत करता है।”

उन्होंने कहा, “दुनिया खुद देख सकती है कि पाकिस्तान क्या है। हम एक ऐसे देश की बात कर रहे हैं जिसने लंबे समय तक ओसामा बिन लादेन को पनाह दी। एक ऐसा देश, जिसकी उंगलियों के निशान दुनिया भर में कई आतंकवादी घटनाओं पर हैं। हम जानते हैं कि पाकिस्तान सच्चाई का मुकाबला झूठ से करने की कोशिश करेगा। बार-बार दोहराने से कुछ नहीं बदलेगा। हमारा रुख स्पष्ट है।”

ओडिशा के भद्रक में सोशल मीडिया पोस्ट पर भड़की हिंसा, इस्लामी कट्टरपंथियों ने किया पथराव: बवाल के बाद इलाके में इंटरनेट बैन, 3 पुलिसकर्मियों समेत कई घायल

ओडिशा के भद्रक जिले में एक विवादित सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर स्थिति तनावपूर्ण हो गई है। इस घटना में कट्टरपंथी मुस्लिमों की भीड़ ने पुलिस पर भी जमकर पत्थरबाजी की है, जिसमें तीन वरिष्ठ पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं। भद्रक में स्थिति इतनी बिगड़ गई है कि एसडीएम ने आदेश जारी कर हर तरह के इंटरनेट पर पाबंदी लगा दी है। फिलहाल पूरे इलाके में भारी सुरक्षा बलों की तैनाती कर दी गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये घटना पुरुना बाजार थाना इलाके की है। यहाँ घटना की शुरुआत तब हुई, जब एक स्थानीय व्यक्ति द्वारा सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई सामग्री को कट्टरपंथी मुस्लिमों ने आपत्तिजनक बताया। इसके बाद कट्टरपंथियों ने रैली आयोजित की और भीड़ इकट्ठी की। उन्होंने नारेबाजी करते हुए सड़क को जाम कर दिया, और पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया।

भद्रक जिले में कचेरी बाजार-पुरुनाबाजार को जोड़ने वाले संथिया पुल पर हिंसक प्रदर्शन देखते ही देखते बढ़ गया, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। इसके अलावा, कई इलाकों में तनाव और अफवाहें फैलने लगीं। इस बीच, इलाके में दो समुदाय के बीच बनी तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए 7 प्लाटून पुलिस बल तैनात किया गया है। प्रशासन ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की।

हालाँकि, इस्लामी कट्टरपंथियों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा था, जिससे प्रशासन को कड़ी कार्रवाई करनी पड़ी। भद्रक जिले में बढ़ते तनाव के बीच पुलिस ने अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की है। हालात को देखते हुए जिला प्रशासन ने धारा 163 के तहत कार्रवाई की है, जिसमें हिंसा फैलाने वाले दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की बात कही गई है। धारा 163 के तहत प्रशासन को किसी भी व्यक्ति पर कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार होता है, यदि वह सामाजिक या धार्मिक उन्माद फैलाने का दोषी पाया जाता है।

पूर्वी रेंज के DIG सत्यजीत नाइक ने बताया, हमने स्थिति को नियंत्रित करने और इलाके में शांति बनाए रखने के लिए पुरुना बाजार इलाके में BNSS की धारा 163 लागू कर दी है। सुरक्षा बल की तैनाती की गई है जो इलाके में फ्लैग मार्च कर रहे हैं। इलाके में नाकाबंदी भी की जा रही है… FIR दर्ज़ कर ली गई है और दोषियों की पहचान कर ली गई है। दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

साल 2017 में एक महीने तक जारी रहा था कर्फ्यू

बता दें कि साल 2017 में भद्रक जिला सांप्रदायिक दंगों की चपेट में आ चुका है। उस समय हुई हिंसा में सैकड़ों दुकानों, मकानों को जला दिया गया था, जिससे करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ था। भद्रक जिले में 1 महीने तक कर्फ्यू लगाया गया था। वो दंगे भी इसी पुरुना बाजार इलाके में हुए थे, जिसमें इस्लामी कट्टरपंथियों ने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ जैसे नारे लगाए थे। फिलहाल प्रशासन की कोशिश है कि हालात जल्द से जल्द सामान्य हो जाएँ, लेकिन इस्लामी कट्टरपंथियों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा है। वहीं, हिंसा में शामिल दोषियों की पहचान की जा रही है, और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

केरल वक्फ बोर्ड ने 3 गाँवों की 400 एकड़ जमीन पर ठोका दावा, 600 परिवारों पर मंडराया संकट: विरोध में उतरा चर्च, कानून में जल्द बदलाव के लिए केंद्र से किया आग्रह

केरल में कोच्चि के उपनगरीय इलाकों मुनम्बम और चेराई गाँवों 400 एकड़ जमीन को लेकर गंभीर विवाद उभर आया है, जहाँ लगभग 600 परिवारों की जमीन पर वक्फ बोर्ड ने अवैध दावा कर दिया है। यह मामला धीरे-धीरे राज्य की सीमाओं को पार कर अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। इस विवाद में मुख्य रूप से मुनम्बम, चेराई, और पल्लिकाल द्वीप के इलाके शामिल हैं, जो कई दशकों से इन परिवारों की संपत्ति रही है। अब यह इलाका वक्फ बोर्ड की नज़र में है, जिससे इन परिवारों को अपनी जमीन खोने का डर सताने लगा है।

वक्फ बोर्ड का दावा और विरोध की शुरुआत

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब पाँच साल पहले साल 2019 वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि मुनम्बम, चेराई और पल्लिकाल के इलाके उनकी संपत्ति हैं। यह इलाका न केवल केरल के 600 से अधिक परिवारों का घर है, बल्कि यहाँ विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं, जिनके पास 1989 से जमीन के वैध कागजात हैं। इसके बावजूद, वक्फ बोर्ड ने इस इलाके पर अपना दावा ठोक दिया। इन परिवारों ने अपनी जमीन को वैध रूप से खरीदा था, लेकिन अब उन्हें जबरन खाली करने के आदेश दिए जा रहे हैं, जो उनके संवैधानिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है।

केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल (KCBC) और सायरो-मालाबार पब्लिक अफेयर्स कमीशन (SMPAC) ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए लोकसभा सचिवालय के सामने रखा है। दोनों संगठनों ने सरकार से वक्फ कानूनों में संशोधन की मांग की है, ताकि इस प्रकार के अवैध दावे भविष्य में न हों। इन संगठनों के प्रमुखों कार्डिनल बासेलियोस क्लेमिस और आर्कबिशप मार एंड्रूज़ थाझाथ ने अपने पत्रों में कहा, “किसी भी नागरिक के संपत्ति के अधिकार और गरिमा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। यह समिति की जिम्मेदारी है कि वह कानून को निष्पक्ष और न्यायपूर्ण तरीके से लागू करे।”

साल 1902 तक जाती है विवाद की जड़

विवाद की जड़ 1902 में जाती है, जब त्रावणकोर के राजा ने गुजरात से आए एक किसान अब्दुल सत्तार मूसा हाजी सेठ को 404 एकड़ जमीन और 60 एकड़ जल क्षेत्र पट्टे पर दिया था। उस समय, यह जमीन मछुआरों के लिए अलग रखी गई थी, जो वहाँ कई वर्षों से रह रहे थे। 1948 में सेठ के उत्तराधिकारी सिद्दीक सेठ ने यह जमीन पंजीकृत करवा ली थी। इस जमीन का एक बड़ा हिस्सा समुद्री कटाव के कारण खो गया, और 1934 की भारी बारिश ने पांडरा समुद्र किनारे की जमीन को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। लेकिन सिद्दीक सेठ द्वारा पंजीकृत जमीन में मछुआरों के रहने वाले इलाके भी शामिल हो गए।

1950 में सिद्दीक सेठ ने यह जमीन फरोख कॉलेज को उपहार स्वरूप दे दी, लेकिन शर्त यह थी कि कॉलेज केवल शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए ही इसका उपयोग करेगा। अगर कभी कॉलेज बंद हो जाता है, तो जमीन वापस सेठ के वंशजों को लौटाई जाएगी। लेकिन दस्तावेजों में गलती से या जानबूझकर ‘वक्फ’ शब्द लिख दिया गया, जिससे अब यह विवाद खड़ा हो गया है।

वक्फ बोर्ड ने साल 2019 में किया जमीनों पर दावा

हालाँकि, वक्फ बोर्ड ने पहली बार 2019 में इस जमीन पर दावा किया, जब उन्होंने कहा कि यह जमीन वक्फ संपत्ति है। लेकिन इस दावे से पहले किसी भी कानूनी प्रक्रिया के तहत स्थानीय निवासियों को कोई जानकारी नहीं दी गई थी। KCBC के सोशल हार्मनी और विजिलेंस कमीशन के सचिव फ्र. माइकल पुलिकल ने बताया, “पहले ही निवासियों ने इस जमीन पर अपने अधिकार प्रमाण पत्र तालुक कार्यालय से प्राप्त कर लिए थे, जिससे उन्हें बिजली और पानी जैसी सुविधाएँ प्राप्त होती थीं। लेकिन अचानक वक्फ बोर्ड का दावा उनके लिए संकट बन गया।”

इस मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। 27 सितंबर को मुनम्बम के वंची स्क्वायर में एक बड़े प्रदर्शन का आयोजन किया गया, जिसमें सैकड़ों लोग शामिल हुए। इसके साथ ही, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस विवाद में चर्च और स्थानीय निवासियों का समर्थन करने की घोषणा की है। बीजेपी नेता शौन जॉर्ज ने कहा, “मुनम्बम भू-समरक्षण समिति द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन को हमारी पार्टी का पूरा समर्थन रहेगा।”

बीजेपी का कहना है कि यह मामला केवल जमीन के अधिकारों का नहीं है, बल्कि इससे बड़ी साजिश का हिस्सा है, जिसमें ‘चरमपंथी’ तत्वों का हाथ हो सकता है। बीजेपी जिला अध्यक्ष के.एस. शैजू और प्रवक्ता के.वी.एस. हरिदास ने कहा कि यह मुद्दा न केवल स्थानीय निवासियों का है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर इसे उठाया जाना चाहिए। पार्टी ने यह भी माँग की कि वक्फ बोर्ड द्वारा किए गए दावे की जाँच होनी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि इसमें किन-किन चरमपंथी तत्वों की भूमिका है।

बीजेपी की राज्य इकाई ने केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल और सायरो-मालाबार चर्च द्वारा वक्फ एक्ट संशोधन के समर्थन का स्वागत किया है। बीजेपी नेताओं ने कहा कि यह मामला केवल ईसाई समुदाय का नहीं है, बल्कि इससे अन्य धर्मों के लोग भी प्रभावित हो सकते हैं। पार्टी ने संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) और वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) से भी इस पर अपना रुख स्पष्ट करने की माँग की है।

इस विवाद को लेकर राजनीतिक और धार्मिक संगठनों के बीच एक अनूठा गठजोड़ बनता दिख रहा है। बीजेपी के नेताओं का मानना है कि अगर वक्फ एक्ट में उचित संशोधन नहीं किया गया, तो इससे भविष्य में और भी कई ऐसे विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। दूसरी ओर, चर्च और ईसाई संगठन भी इस मुद्दे पर सक्रिय हो गए हैं, जिससे यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर गर्म हो चुका है।

दिल्ली में बीजेपी नेता अनूप एंटनी जोसफ ने कहा, “आज जब पूरे देश में वक्फ बिल पर चर्चा हो रही है, तो लोगों को यह जानना जरूरी है कि केरल में 600 से ज्यादा परिवारों के साथ बड़ा अन्याय हो रहा है।”

जैसे-जैसे यह मामला गरमा रहा है, राज्य और केंद्र सरकार दोनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है कि वे इस विवाद का समाधान निकालें। एक तरफ, बीजेपी और चर्च की एकजुटता ने इस मामले को नया आयाम दिया है, वहीं दूसरी ओर, स्थानीय निवासियों का भविष्य अधर में लटक गया है। वक्फ बोर्ड और स्थानीय प्रशासन के बीच संवादहीनता ने इस विवाद को और जटिल बना दिया है। वक्फ एक्ट में संशोधन की माँग जोर पकड़ रही है, और यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस पर क्या कदम उठाती है।

मंदिर में घुसकर हमला किया, शिवलिंग तोड़कर नाली में फेंका: हिमाचल प्रदेश के गुस्साए हिंदुओं ने निकाला विरोध प्रदर्शन, बाजार कराया बंद

हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा में हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुँचाई गई है। काँगड़ा में एक मंदिर में स्थापित शिवलिंग को अज्ञात शरारती तत्वों ने तोड़ कर नाले में फेंक दिया। इस घटना के सामने आने के बाद से माहौल गरमाया हुआ है और हिन्दू संगठन इस मलमे में कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कांगड़ा के नगरोटा बगवां में गाँधी मैदान के पास एक छोटा मंदिर बना हुआ है। इसमें एक शिवलिंग स्थापित किया गया है, यह शिवलिंग शुक्रवार (27 सितम्बर, 2024) की सुबह क्षतिग्रस्त पाया गाया। शिवलिंग को उसके अरघे से निकाल दिया गया था।

लोगों ने तलाश की तो शिवलिंग का ऊपरी हिस्सा नाले में पड़ा मिला। इसके बाद यहाँ पर पहुँचे श्रद्धालु भड़क गए। लोगों ने पुलिस बुला ली। हिन्दू संगठनों को जब यह सूचना मिली तो वह भी यहाँ पहुँच गए। हिन्दू संगठनों ने माँग की कि तुरंत मंदिर क्षतिग्रस्त करने वालो को पकड़ा जाए।

हिन्दू संगठनों ने यहाँ मंदिर के साथ ही पुलिस प्रशासन के सामने प्रदर्शन किया। वहीं मौके पर पहुँची पुलिस ने टूटे शिवलिंग को कब्जे में लेकर आसपास के CCTV खंगालने चालू कर दिए हैं। पुलिस अभी शिवलिंग तोड़ने वाले को खोज नहीं पाई है।

हिन्दू संगठनों के साथ ही यहाँ का व्यापारी वर्ग भी सड़कों पर उतर आया। नगरोटा का बाजार भी बंद कर दिया गया। उधर पुलिस माहौल शांत करवाने में जुटी है। पुलिस ने कहा है कि रात में जो भी गाड़ियाँ यहाँ से निकली हैं उनको चिन्हित किया जा रहा है।

हिमाचल प्रदेश में यह घटना ऐसे समय हुई है जब पहले ही लोग अवैध मस्जिद और बाहरी घुसपैठ को लेकर गुस्साए हुए हैं। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में संजौली मस्जिद से लेकर चालू हुआ विवाद राज्य के अन्य हिस्सों में भी पहुँच चुका है। लोगो ने मंडी और बाकी जगहों पर अवैध मस्जिद के खिलाफ प्रदर्शन किया है।

चायनीज खतरे से लड़ना, अमेरिका पर निर्भरता कम, Asian NATO का कॉन्सेप्ट: जानें कौन हैं जापान के नए प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा

विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश में नेतृत्व बदलने जा रहा है। जापान को जल्द नया प्रधानमंत्री मिलेगा। लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) के वरिष्ठ नेता और रक्षा मंत्री, कृषि मंत्री जैसे महत्वपूर्ण ओहदों को संभाल चुके शिगेरू इशिबा जापान के नए प्रधानमंत्री बन रहे हैं। 67 वर्षीय इशिबा, फुमियो किशिदा की जगह लेंगे। 

इशिबा को ऐसे समय में चुना गया है जब जापान, चीन की बढ़ती ताकत को रोकने और साथ ही आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा है। किशिदा को ऐसे व्यक्ति के तौर पर जाना गया है जो जापान को और मजबूत देश बनाने के पक्ष में हैं। किशिदा की पहचान LDP के भीतर गहरी भूराजनीतिक समझ रखने वाला समझा जाता है। 

कौन हैं शिगेरू इशिबा?

शिगेरू इशिबा जापान की राजधानी टोक्यो के रहने वाले हैं। वह बीते लगभग 4 दशकों से राजनीति में हैं। शिगेरू पिछले 38 सालों से सांसद हैं। 67 साल के शिगेरू इशिबा को किताबें पढ़ने का शौक है। उन्होंने हाल ही में बताया कि वह दिन में तीन किताबें पढ़ते हैं। इसके अलावा शिगेरू को खिलौना मॉडल बनाने का भी शौक है। उनकी कुछ तस्वीरें भी वायरल हुई हैं, इनमें वह जहाज और गाड़ियों के मॉडल के साथ नजर आ रहे हैं। 

शिगेरू इशिबा एक ईसाई हैं। वह इसे खुले तौर पर बताते हैं। वह पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे और फुमियो किशिदा के आलोचक रहे है। शिगेरू इशिबा के पिता भी जापान की राजनीति में सक्रिय थे। वह भी सांसद रहे थे। शिगेरू इशिबा को लेकर माना जाता है कि उन्हें पार्टी में अधिक लोग पसंद नहीं करते। ऐसा उनके स्पष्टवादी रवैये के चलते है। 

लंबा राजनीतिक जीवन

शिगेरू इशिबा बीते 38 सालों से जापान की संसद में सदस्य हैं। वह टोत्तोरी संसदीय सीट से 12 बार चुनाव जीत चुके हैं। शिगेरू इशिबा LDP के महासचिव, जापान में जनसंख्या में गिरावट पर काबू पाने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को सक्रिय करने के प्रभारी मंत्री, राष्ट्रीय सामरिक क्षेत्रों के राज्य मंत्री, कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन मंत्री, और रक्षा मंत्री रहे हैं। शिगेरू जब पहली बार सांसद बने थे, तब वह जापान के सबसे युवा सांसद थे। शिगेरू इशिबा ने जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे को भी चुनौती दी है।

कैसे जीता पार्टी का द्वंद? 

12 बार सांसद रह चुके शिगेरू इशिबा को प्रधानमंत्री पद पाने के लिए अपनी पार्टी LDP में लम्बी दौड़ जीतनी पड़ी है। फुमियो किशिदा के प्रधानमंत्री पद छोड़ने के ऐलान के बाद पार्टी के भीतर चालू हुए द्वन्द में इशिबा के सामने 9 उम्मीदवार और थे। उनकी सबसे प्रबल प्रतिद्वंद्वी जापान की आर्थिक मामलों की मंत्री सनाए तकाईची थीं। 

सनाए तकाईची अगर जीततीं तो वह जापान की पहली महिला प्रधानमंत्री होतीं। इशिबा इससे पहले 4 बार और प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल होने का प्रयास कर चुके हैं, लेकिन असफल रहे हैं। इस बार उनका पांसा पलट गया और वह जीत गए। इशिबा पर LDP का विश्वास जनता में बढ़ाने का जिम्मा आ गया है। 

‘एशिया का नाटो’ बनाने की वकालत

शिगेरू इशिबा के प्रधानमंत्री बनने से सबसे अधिक प्रभाव जापान के सामरिक माहौल पर पड़ने वाला है। इशिबा ऐसे व्यक्ति के तौर पर जाने जाते रहे हैं जो जापान को और शक्तिशाली सैन्य ताकत बनाने की वकालत करते आए हैं। इशिबा एशिया के भीतर उन देशों का सैन्य सहयोगी संगठन बनाना चाहते हैं जो चीन के खतरे को लेकर आशंकित हैं।

इशिबा की इस सोच को ‘एशियन नाटो’ का नाम दिया गया है। गौरतलब है कि नाटो को अमेरिका ने सोवियत संघ का मुकाबला करने के लिए बनाया था। शिगेरू इशिबा का कहना है कि जापान को अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करनी चाहिए।

इशिबा का कहना है कि जापान की सेना अकेले ही किसी देश से भिड़ने में सक्षम होनी चाहिए। वह चीनी मामलों पर कड़ा रुख मानने वाले माने जाते हैं। अमेरिका पर निर्भरता कम करने की बात के कारण अमेरिका भी उनको लेकर थोड़ा आशंकित है।

शिगेरू इशिबा जापान में घटती जन्म दर को लेकर मुखर रहे हैं। वह लगातार जापान की बूढ़ी होती जनसंख्या के कारण काम करने वालों की कम संख्या को लेकर चिंतित रहे हैं। वह जापान के अन्य सामाजिक मुद्दों पर भी बोलते रहे हैं।

जबलपुर में गायत्री मंदिर की जमीन पर बनी मस्जिद तोड़ने पहुँचे हिंदू संगठन, प्रशासन को दिया 10 दिन का अल्टीमेटम: कड़ी सुरक्षा के बीच स्थिति तनावपूर्ण

मध्य प्रदेश के जबलपुर के राँझी इलाके में गायत्री मंदिर की जमीन पर अवैध मस्जिद के निर्माण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। गुरुवार (26 सितंबर 2024) को विश्व हिंदू परिषद (VHP) और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने इलाके में पहुँचकर मस्जिद तोड़ने की माँग उठाई। इन संगठनों का आरोप है कि मस्जिद गायत्री बाल मंदिर की जमीन पर अवैध रूप से बनाई गई है, जिसके खिलाफ पिछले कई सालों से विरोध जारी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अवैध मस्जिद के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंदूवादी कार्यकर्ताओं ने जमकर नारेबाजी की और प्रशासन से तुरंत कार्रवाई की माँग की। उनका दावा है कि मस्जिद के निर्माण से पहले भी वे प्रशासन को इस संबंध में शिकायत कर चुके हैं। उन्होंने प्रशासन को 10 दिन का अल्टीमेटम दिया है, जिसमें कहा गया है कि यदि मस्जिद को नहीं हटाया गया, तो वे खुद इस मस्जिद को गिरा देंगे।

इस मस्जिद को लेकर विवाद नया नहीं है। हिंदू संगठनों का कहना है कि 2021 से ही इस मसले पर विरोध चल रहा है। 12 जून 2021 को कलेक्ट्रेट में ज्ञापन सौंपा गया था, जिसमें दस्तावेज और खसरा नंबरों का हवाला देते हुए कहा गया था कि मस्जिद का निर्माण अवैध रूप से किया जा रहा है। इसके बाद 27 जुलाई 2021 को एक बड़ा प्रदर्शन हुआ था। हालाँकि, प्रशासन ने तब कोई ठोस कार्रवाई नहीं की, और मस्जिद का निर्माण चलता रहा।

इसके बाद, 2021 में तत्कालीन एसडीएम ऋषभ जैन ने मस्जिद निर्माण पर रोक लगा दी थी, लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि इसके बावजूद मस्जिद का निर्माण चोरी-छिपे चलता रहा। वे बताते हैं कि लोग बाहर से आते हैं और मस्जिद में ठहरते हैं, जिससे इलाके में कानून व्यवस्था को खतरा पैदा हो रहा है। इसके अलावा, रोहिंग्या मुसलमानों की उपस्थिति को भी लेकर सवाल उठाए गए हैं। हिंदू संगठनों का दावा है कि इस इलाके में रोहिंग्या की गतिविधियाँ बढ़ी हैं, जिनके पास स्थानीय पहचान पत्र भी नहीं हैं, और इसके चलते अपराध भी बढ़ रहा है।

स्थानीय प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। पुलिस और प्रशासन की टीमें मौके पर तैनात कर दी गई हैं ताकि स्थिति नियंत्रण में रहे। कई थानों के पुलिस बल को बुलाकर मस्जिद के आसपास की सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। मस्जिद के पास के सभी मार्गों को सील कर दिया गया है ताकि किसी भी अप्रिय घटना से बचा जा सके। प्रशासन की ओर से इस मुद्दे पर जाँच का आश्वासन दिया गया है।

एएसपी प्रदीप शेनडे ने बताया कि एसडीएम को ज्ञापन दिया गया है और जाँच के बाद कार्रवाई की जाएगी। एसडीएम ने कहा है कि वे मस्जिद के निर्माण से संबंधित सभी दस्तावेजों की जाँच करेंगे और उस आधार पर निर्णय लिया जाएगा।

हालाँकि, हिंदू संगठनों का कहना है कि प्रशासन ने इससे पहले भी कई बार आश्वासन दिया था, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। हिंदू संगठनों के विरोध के बीच मस्जिद की स्थिति पर सरकार और प्रशासन के कदमों पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। यह आरोप भी लगाया गया है कि मस्जिद को बिजली और पानी की सरकारी सुविधाएँ भी दी जा रही हैं, जबकि इसके निर्माण के दस्तावेज संदिग्ध हैं। संगठनों ने इस पर भी आपत्ति जताई है और कहा है कि सरकारी सुविधाएँ अवैध निर्माण को कैसे मुहैया कराई जा सकती हैं।

विवादित स्थल पर तनाव बढ़ने के बाद प्रशासनिक अधिकारियों के बीच चर्चाएँ हो रही हैं। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच कई बार तनाव की स्थिति बनी, लेकिन बड़े पैमाने पर हिंसा की कोई खबर नहीं है। हिंदू संगठनों का कहना है कि यह मामला केवल जमीन के कब्जे का नहीं है, बल्कि इसके पीछे धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। उनका कहना है कि अयोध्या, काशी, और मथुरा जैसे स्थानों पर भी इसी तरह के अवैध कब्जे हुए थे, और यहाँ भी वही स्थिति उत्पन्न हो रही है।

इस मसले पर 21 मार्च 2023 को भी एक बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ था, जिसमें संगठन ने प्रशासन से मस्जिद गिराने की माँग की थी। उस समय भी प्रशासन ने जाँच का आश्वासन दिया था, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अब एक बार फिर हिंदू संगठन मस्जिद को गिराने की माँग पर अड़े हुए हैं, और स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। अब आखिरी बार प्रदर्शनकारियों ने एसडीएम कार्यालय में ज्ञापन सौंपा है और स्पष्ट किया है कि यदि 10 दिनों के भीतर मस्जिद नहीं तोड़ी गई, तो वे खुद इसे गिरा देंगे।