मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में बुधवार (18 सितंबर) को रेलवे ट्रैक पर डेटोनेटर बरामद हुए थे। आशंका जताई गई थी कि ये डेटोनेटर उस ट्रेन को ब्लास्ट के साथ बेपटरी करने के लिए रखे गए थे, जिसमें अधिकतर भारतीय सेना के जवान व अधिकारी सफर कर रहे थे। अब इस मामले में पुलिस ने साबिर नाम के आरोपित को गिरफ्तार किया है। साबिर रेलवे का ही कर्मचारी है। इस करतूत के पीछे के मकसद की जाँच करवाई जा रही है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रेलवे के स्टाफ साबिर की गिरफ्तारी सोमवार (23 सितंबर 2024) को हुई है। उस से NIA (राष्ट्रीय जाँच एजेंसी), ATS और RPF पूछताछ कर रही है। डेटोनेटर को पटरी पर रखना कोई साजिश थी या शरारत इसकी भी पड़ताल करने में जाँच एजेंसियाँ जुटी हुई है। साबिर की गिरफ्तारी का संज्ञान रेल मंत्रालय ने भी लिया है। मंत्रालय की तरफ से भी जाँच के आदेश जारी किए गए हैं। मामला सेना से जुड़ा हुआ है इसलिए अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है।
वहीं इस मामले में सेंट्रल रेलवे के जनसम्पर्क अधिकारी डॉ स्वप्निल नीला का भी बयान सामने आया है। उन्होंने बताया कि बरामद डेटोनेटर रेलवे द्वारा ही प्रयोग में लाए जाते हैं लेकिन ये जहाँ मिले, वहाँ उनके होने का औचित्य नहीं था। बताते चलें कि डेटोनेटर अमूमन कोहरे या धुंध में ट्रेनों को रोकने के काम आते हैं। इनकी आवाज से ड्राइवर को अलर्ट जाता है और वो ट्रेन को रोकना शुरू कर देते हैं। ये डेटोनेटर स्टेशन मास्टर, की मैन और लोको पायलट आदि के पास उपलब्ध होते हैं।
बताते चलें कि यह घटना बुरहानपुर के नेपानगर इलाके की है। यहाँ के सागफाटा इलाके से 18 सितंबर को जम्मू कश्मीर से होते हुए आर्मी स्पेशन ट्रेन कर्नाटक की तरफ जा रही थी। अचानक ही ट्रैक पर विस्फोट होने लगे तो लोको पायलट ने ट्रेन रोक कर एक बड़े हादसे की आशंका को टाल दिया। मामले की सूचना उसी समय कंट्रोल रूम को दी गई थी जिसके बाद एजेंसियों ने जाँच शुरू कर दी थी।
जम्मू-कश्मीर में चल रहे विधानसभा चुनावों में इस समय कई पत्रकार ग्राउंड पर जाकर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। इस दौरान वो जनता से कुछ सवाल करते हैं और बदले में जो जवाब आता है वो उस व्यक्ति विशेष की निजी राय होती है। ‘द राजधर्म’ की रिपोर्टर अर्चना तिवारी भी इस समय ग्राउंड पर ही हैं। वह लगातार कश्मीरी वोटरों से बात करते हुए उनकी राय अपने दर्शकों तक पहुँचा रही हैं।
इस रिपोर्टिंग के दौरान कभी हँसी-मजाक करते हुए कभी गंभीर रहते हुए अर्चना अपने सवाल करती हैं और सामने वाला शख्स उसका जवाब देता है। हाल में इसी सवाल-जवाब के क्रम में अर्चना तिवारी से एक मुश्ताक नाम का इस्लामी कट्टरपंथी टकरा गया। उसने खुलेआम कैमरे पर बोला कि अगर हिंदू उनकी जमीन पर आएँगे, रहेंगे, शराब पीएँगे तो वो लोग हिंदुओं को मारेंगे। इसके साथ उसने वीडियो में ये भी साफ-साफ कहा कि अगर उनके क्षेत्र में हिंदू मंदिर बना तो उन्हें (मुसलमानों को) उसे जलाना ही पड़ेगा।
इस वीडियो के पब्लिक होने के बाद कइयों ने इसे साझा करते हुए अपनी चिंता जताई और सोचने लगे कि 90 के दशक में ऐसी ही मानसिकता से भरे लोग कश्मीर में रहे होंगे इसलिए पंडितों का नरसंहार हुआ। ये सोच गलत भी नहीं जान पड़ती।
जब एक शख्स खुलेआम कैमरे पर इस तरह की बातें कर रहा है, अपनी नफरत दिखा रहा है तो सोचने वाली बात है कि एक हिंदू के मन में और क्या आ सकता है? अर्चना तिवारी ने अपनी वीडियो में बार-बार उस मुश्ताक को समझाना चाहा कि वो हिंदू हैं और उन्हें जब समस्या नहीं होती कि मुस्लिम रहें तो फिर मुस्लिमों को क्या परेशानी है।
देखिए क्या मिसाल दे रहे हैं सेक्युलर भारत की मुश्ताक मिया..
अर्चना की बात सुन मुश्ताक एक बार नहीं, बार-बार यही दोहराता रहा कि वो मुसलमान है और उसे इस बात से प्रॉब्लम है कि कोई हिंदू मंदिर बने और हिंदू वहाँ पूजा पाठ करें।
मुश्ताक की वीडियो देखने के बाद जब कश्मीर में मुस्लिमों की कट्टर मानसिकता पर फिर सवाल उठने लगे तो इसे देख एक मुस्लिम महिला पत्रकार इससे बिदक गईं। महिला पत्रकार का नाम यास्मीन खान है। X पर मौजूद उनकी पब्लिक प्रोफाइल के बायो में लिखा है कि जामिया से पढ़ीं यास्मीन खान मुस्लिम मिरर, ग्रेटर कश्मीर, सलाम टीवी न्यूज, बतौर पत्रकार काम किया है और फिर ‘आवाज द वॉयस’ के लिए जम्मू-कश्मीर में रिपोर्ट कर रही हैं।
यास्मीन अर्चना तिवारी को पत्रकार नहीं मानतीं और चाहती हैं कि कश्मीर में ग्राउंड रिपोर्ट करने के लिए उन्हें जेल भेज दिया जाना चाहिए क्योंकि अर्चना की रिपोर्टिंग से कश्मीरियों का गलत चेहरा दुनिया के सामने आ रहा है। अपने ट्वीट में यास्मीन ने बिना अर्चना के नाम का उल्लेख करते हुए लिखा- “कश्मीर में एक व्यथित करने वाला प्रयास चल रहा है। एक यट्यूबर सड़कों पर उतरकर मासूम, कम-पढ़े लिखे लोगों से मंदिर, मस्जिद और शराब जैसे संवेदनशील मुद्दों पर उनकी विचार पूछ रही हैं। लोगों की समझ की कमी का फायदा उठाते हुए अपना नैरेटिव चला रही है। इससे हमारी कश्मीरियों को खतरा है। मेरा अनुरोध है कि श्रीनगर पुलिस ऐसे व्यक्तियों को गिरफ्तार करे और हमारे समुदाय को इस खतरे से बचाएँ।”
यास्मीन ने बड़ी चालाकी से अपने एक्स पर ये ट्वीट किया है। अपने ट्वीट में उन्होंने अर्चना का नाम तो नहीं लिखा लेकिन जो कंटेंट का विवरण उन्होंने दिया है उससे साफ है कि वो द राजधर्म वाली अर्चना तिवारी और मुश्ताक के बीच हुई बातचीत का ही जिक्र कर रही हैं। ट्वीट में वह हिंदुओं का मंदिर जलाने की बात खुलेआम कहने वाले मुश्ताक को मासूम कह रही है वहीं दूसरी ओर चुप-चाप उसकी बात सुनने वाली अर्चना तिवारी के लिए कश्मीर पुलिस को उकसा रही हैं कि वो उन्हें गिरफ्तार करें।
हैरानी की बात ये है कि इतनी अनुभवी पत्रकार होने के बावजूद यास्मीन सही गलत में फर्क नहीं समझ पा रहीं। अगर कोई उनके इस रवैये को देख उन्हें निष्पक्ष पत्रकार न कहकर मजहब के काम करने वाली पत्रकार कहे तो क्या गलत होगा?
वायरल वीडियो देखने पर साफ पता चलता है कि मुश्ताक से अर्चना ने बस ये सवाल किए थे कि भाजपा की किन बातों के कारण वो लोग उन्हें वोट नहीं देंगे… ये सवाल तो कोई घुमा फिराकर नहीं पूछा गया था। मगर, इस सीधे से सवाल का जवाब में अगर हिंदू घृणा दिखाई जाए…तो इसमें अर्चना की गलती क्या है और क्यों उन्हें गिरफ्तार किया जाए।
अपने ट्वीट पर तो उन्होंने कश्मीर में रिपोर्टिंग के दौरान उस कश्मीरी उमर की वीडियो भी डाली है जो भारतीय सेना के जवानों को हीरो समझता है, मानता है कि जवान देश की जनता के लिए शहीद होते हैं, जिसका फेवरेट क्रिकेटर विराट कोहली है।
उन्होंने उस बुजुर्ग व्यक्ति की भी वीडियो डाली है जो कहते हैं कि इतने सालों में अब कश्मीर में शांति दिखने लगी है।
अब इन लोगों की प्रतिक्रिया डालना अगर गलत नहीं है या उनसे पूछे सवाल गलत नहीं हैं तो फिर मुश्ताक से किए गए सवाल कैसे गलत हो सकते हैं या उस शख्स से किए गए सवाल कैसे गलत हो सकते हैं जो जवाब में बस ये बोले कि उन्हें हिंदू किसी कीमत पर नहीं चाहिए।
“हम मुस्लिम है हमे हिंदू राज नहीं चाहिए”
आज कश्मीर में पहली फेज की वोटिंग के दौरान मिले चाचा की सोच ने मुझे हैरान कर दिया ।
सवाल करना और जवाब पूछना… यही प्रक्रिया तो ग्राउंड पर रहते हुए हर पत्रकार फॉलो करता है। वो भी चुनावी रिपोर्टिंग के दौरान तो खासकर लोगों के मन टटोले जाते हैं कि उन्हें किस पार्टी का क्या काम पसंद है क्या नहीं। इसमें गिरफ्तारी की बात कैसे आ गईं?
कहीं अपने आपको कश्मीरी पत्रकार कहने वाली यास्मीन खान को अर्चना तिवारी से समस्या इसलिए हो रही है क्योंकि उनकी रिपोर्टिंग के जरिए कट्टरपंथ में सने लोग और उनकी हिंदू घृणा से लबरेज विचार सामने आ रहे है।
यास्मीन कहती हैं कि अर्चना कश्मीर के भोले-भाले लोगों अपने जाल में फँसा रही हैं और उनसे ऐसी बातें उगलवा रही हैं। उन्हें ये चिंता नहीं है कि कश्मीर के लोगों के मन में हिंदुओं के प्रति कितना जहर घुला हुआ है, उनकी समस्या ये है कि अगर कश्मीर के कट्टरपंथी मुस्लिम अगर ऐसी सोच रखे भी हुए हैं तो इसका पता दुनिया को नहीं चलना चाहिए ताकि यास्मीन जैसे लोग पत्थरबाजों को मासूम कहने वाला अपना जमकर नैरेटिव चला सकें।
इन लोगों की यसी मानसिकता वजह है कि ये आज भी बातें कश्मीर और कश्मीरियत की करते हैं लेकिन कश्मीर की भलाई के लिए हटाए गए आर्टिकल 370 के फैसले को नहीं पचा पाए हैं। उनकी इसी मंशा को परखते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अपने मेनिफेस्टो में घोषणा भी की है कि अगर उनकी सरकार आती है तो वो अनुच्छेद 370 को लेकर आएँगे। शायद यास्मीन जैसों को लगता है कि अनुच्छेद 370 आने के बाद दोबारा से उनका दौर आ जाएगा।
कोलकाता के आर जी कर मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर के साथ रेप और हत्या मामले में भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने विस्फोटक दावा किया है। अधिकारी ने कहा है कि पीड़िता डॉक्टर के पोस्टमार्टम के समय एक स्थानीय TMC नेता उसका चाचा बन कर पहुँच गया था और पोस्टमार्टम में जल्दी कर रहा था। सुवेंदु ने यह CBI पूछताछ से निकले डॉक्टर के हवाले से किया है।
सुवेंदु अधिकारी ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “आर जी कर मेडिकल कॉलेज में बलात्कार और हत्या की शिकार हुई जूनियर महिला डॉक्टर का पोस्टमार्टम करने वाली फॉरेंसिक टीम के सदस्य डॉक्टर अपूर्वा बिस्वास को CBI ने तलब किया था। पूछताछ के बाद बाहर निकलते समय उन्होंने पत्रकारों के सामने एक बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि वहाँ एक व्यक्ति था जो खुद को पीड़िता का चाचा बता रहा था और धमकी दे रहा था कि अगर पोस्टमार्टम दिन के अंत तक पूरा नहीं हुआ तो ‘खून की नदी’ बहा दी जाएगी।”
Forensic Doctor Apurba Biswas, who was a member of the team which conducted the post-mortem on the 31-year-old Junior Lady Doctor; raped and murdered at RG Kar Medical College, was summoned by the CBI. While leaving after the questioning, he made a explosive revelation to the… pic.twitter.com/XCrWYQ2gbV
सुवेंदु अधिकारी ने आगे बताया कि यह व्यक्ति TMC का पूर्व पार्षद है। उन्होंने लिखा, “यह व्यक्ति कौन है? यह व्यक्ति संजीब मुखर्जी है। वह पानीहाटी नगर पालिका के पूर्व CPIM पार्षद है, जो बाद में TMC में शामिल हो गया और पानीहाटी TMC विधायक निर्मल घोष का करीबी बन गया।”
सुवेंदु ने आरोप लगाया कि डॉक्टर के अंतिम संस्कार में जल्दबाजी बरती गई। उन्होंने यह भी कहा कि यहाँ के स्थानीय विधायक निर्मल घोष भी शमशान घाट में डॉक्टर के अंतिम संस्कार के समय मौजूद थे। अधिकारी ने कहा कि घोष को इसका आदेश CM ममता बनर्जी से मिला था।
सुवेंदु अधिकारी ने पीड़िता के अंतिम संस्कार की पर्ची भी पेश की और प्रश्न उठाया कि आखिर इस पर संजीब मुखर्जी के हस्ताक्षर क्यों हैं। उन्होंने बताया कि इसी पर्ची पर सोमनाथ डे नाम के एक आदमी के भी हस्ताक्षर हैं जिसका नाम सोमनाथ डे है। उन्होंने बताया कि इस इलाके में सोमनाथ डे नाम का एक और पूर्व TMC पार्षद है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि क्या दोनों एक ही हैं।
सुवेंदु अधिकारी ने डॉक्टर अपूर्ब बिस्वास का एक वीडियो भी साझा किया है। इसमें डॉक्टर बिस्वास बताते हैं कि अपने आप को पीड़िता का रिश्तेदार बताने वाला व्यक्ति डॉक्टरों और परिवार तक पर जल्दी पोस्टमार्टम का दबाव बना रहा था। डॉक्टर ने बताया कि वह पूर्व पार्षद हैं और मैं उनका नाम नहीं बता सकता। डॉक्टर ने यह भी कहा कि वह व्यक्ति उस इलाके का पूर्व पार्षद है जहाँ पीड़िता का परिवार रहता है। इसके बाद सुवेंदु अधिकारी ने यह आरोप लगाए।
इन आरोपों के बाद राज्य की ममता सरकार बैकफुट पर है। अभी इस मामले में कोई खंडन सामने नहीं है। यह भी साफ़ नहीं हुआ है कि संजीब मुखर्जी कौन है और क्या उसका सही में पीड़िता के परिवार से कोई रिश्ता है या फिर वह यहाँ प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा था।
गौरतलब है कि 9 अगस्त, 2024 को कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में एक जूनियर डॉक्टर की लाश मिली थी। डॉक्टर की हत्या से पहले उसके साथ रेप किया गया था और उसके साथ वीभत्सता हुई थी। इस मामले को पहले पुलिस और कॉलेज प्रशासन ने आत्महत्या बताने का प्रयास किया था। हालाँकि, परिवार के दबाव के चलते इसे हत्या के तौर पर जाँच हुई।
इस मामले में अब तक जाँच को प्रभावित करने, घटनास्थल से सबूत मिटाने, पीड़ित परिवार को पैसे की पेशकश करने समेत लापरवाही के आरोप सामने आ चुके हैं। अब इस नए आरोप को जाँच में क्या सामने आता है, इससे साबित होगा कि क्या अंतिम संस्कार में भी दखल दिया गया।
उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले में रविवार (22 सितंबर 2024) को मिल्कीपुर विधानसभा क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी अजीत प्रसाद के खिलाफ FIR दर्ज हुई है। अजीत प्रसाद फैज़ाबाद लोकसभा सीट से सपा सांसद अवधेश प्रसाद के बेटे हैं। यह मामला रवि तिवारी नाम नाम के युवक ने अपने अपहरण और मारपीट का आरोप लगा कर दर्ज करवाया है। यह झगड़ा एक जमीनी विवाद को ले कर हुआ था जिसमें अजीत प्रसाद के साथी शशिकांत राय व राजू यादव भी नामजद हैं। पुलिस द्वारा की जा रही में पीड़ित द्वारा लगाए गए आरोपों के सबूत पाए गए हैं। इस बीच, सपा सांसद अवधेश प्रसाद अपने बेटे के साथ खुल कर खड़े हो गए हैं।
पीड़ित रवि तिवारी ने अपनी शिकायत में अजीत प्रसाद को ‘राजनीतिक दबंग’ बताया है। उनकी FIR के अनुसार, 21 सितंबर 2024 को अजीत प्रसाद, शशिकांत राय, और राजू यादव 5 गाड़ियों में सवार होकर आए। उनके साथ 15-20 अन्य लोग भी थे। अजीत प्रसाद ने रवि तिवारी को एक बैंक के सामने से जबरदस्ती अपनी गाड़ी में बैठा लिया। इसके बाद, रवि को शहर के विभिन्न हिस्सों में घुमाया गया। इस दौरान अजीत प्रसाद ने पीड़ित के सिर पर पिस्टल तान दी और उसके साथ मारपीट की गई।
रवि तिवारी का आरोप है कि अजीत और उनके साथियों ने उनसे 1 लाख रुपये वापस लेने के लिए दबाव डाला और इस पूरी घटना का वीडियो भी बनाया। FIR के अनुसार, आरोपितों ने इस पैसे से संबंधित विवाद का निपटारा करने के लिए दबाव बनाया और मारपीट की।
सभी आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 140 (3), 115 (2), 191 (3) और 351 (3) के तहत कार्रवाई की गई है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। इन आरोपों पर अयोध्या के पुलिस अधीक्षक(सिटी) मधुबन कुमार सिंह का बयान सामने आया है। उन्होंने बताया कि CCTV फुटेज में पीड़ित द्वारा लगाए गए 5 गाड़ियों से आरोपितों के आने की पुष्टि हुई है। इसी वीडियो में यह भी सामने आया है कि आरोपित पीड़ित को अपने साथ ले गए थे।
वादी को बंधक बनाने व मारने पीटने के सम्बन्ध में प्राप्त तहरीर के आधार पर थाना को0 नगर पर पंजीकृत अभियोग के सन्दर्भ में की जा रही कार्यवाही के सम्बन्ध में पुलिस अधीक्षक नगर की बाईट। #UPPolicepic.twitter.com/KEOFTdhoZn
पुलिस अधीक्षक नगर ने आगे बताया कि जमीन संबंधी लगा गए आरोपों पर भी जाँच में प्रमाण जुटाए गए हैं। विक्रेता ने यह स्वीकार किया है कि उसने रवि तिवारी को अपनी जमीन बेची थी। पीड़ित का दावा है कि उसने शीतला प्रसाद नाम के एक व्यक्ति को उसकी जमीन खरीदने के नाम पर 1 लाख रुपए का एडवांस दिए थे। रवि का दावा है कि उन्होंने शीतला प्रसाद की जमीन को अजीत प्रसाद और लाल बहादुर नाम के नाम पर बैनामा कराने में मध्यस्थता की थी।
अवधेश प्रसाद की नजर में बेटा बेगुनाह
इस बीच सपा सांसद अवधेश प्रसाद खुल कर अपने बेटे के समर्थन में उतर गए हैं। उन्होंने अजीत प्रसाद पर लगे आरोपों को झूठा, भ्रामक और राजनीति से प्रेरित बताया है। अखिलेश यादव द्वारा खुद से अपने बेटे को टिकट दिए जाने का जिक्र करते हुए अवधेश प्रसाद ने भाजपा को डरा बताया। इसी दौरान उन्होंने यह भी दावा किया कि उनका बेटा बड़े वोटों के अंतराल से चुनाव जीतने जा रहा है।
#WATCH | Ayodhya, UP: On FIR registered against his son Ajit Prasad and others at Kotwali Nagar PS in Ayodhya for allegedly kidnapping a man, SP MP from Faizabad (Ayodhya) Awadhesh Prasad says, "The case is baseless and false. Elections will be held for Milkipur by-elections and… pic.twitter.com/c3FWLary2x
फ़िलहाल अभी तक इस मामले में किसी की भी गिरफ्तारी नहीं हो पाई है। आरोपितों के खिलाफ सबूत जुटाने व दबिश के लिए पुलिस टीमों का गठन कर दिया गया है। मामले में जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई की जा रही है। इस घटना ने अयोध्या की राजनीति में उथल-पुथल मचा दी है।
अयोध्या में सपा प्रत्याशी अजीत प्रसाद पर लगे ये गंभीर आरोप उनके चुनावी अभियान को बड़ा झटका दे सकते हैं। अपहरण, मारपीट और पिस्टल तानने जैसे गंभीर आरोपों के बीच पुलिस की जाँच जारी है। वहीं, सपा सांसद अवधेश प्रसाद ने अपने बेटे को निर्दोष बताया है और इसे राजनीति से प्रेरित साजिश करार दिया है। अब देखना यह होगा कि पुलिस जांच के बाद इस मामले में क्या नतीजा निकलता है और आरोपितों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।
गुजरात में डेडियापाड़ा के आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक चैतर वसावा के खिलाफ एक और मारपीट का मामला दर्ज किया गया है। यह शिकायत उनके बचपन के दोस्त और AAP कार्यकर्ता शांतिलाल वसावा ने की है। उन्होंने आरोप लगाया है कि लोकसभा चुनाव के दौरान विधायक और उनके समर्थकों ने होटल में खाने के बाद जब बिल माँगा गया, तो मारपीट की। डेडियापाड़ा पुलिस ने इस शिकायत पर चैतर वसावा और अन्य 21 व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।
क्या है पूरा मामला?
शिकायतकर्ता शांतिलाल वसावा एक होटल में मैनेजर थे और लोकसभा चुनाव के दौरान AAP के कार्यकर्ता अक्सर वहाँ भोजन करते थे। शांतिलाल का कहना है कि चुनाव के बाद होटल का बिल बचा हुआ था, जिसकी वसूली के लिए उन्होंने विधायक से संपर्क किया। जब बिल की माँग की गई, तो चैतर वसावा और उनके समर्थक घर आकर मारपीट करने लगे।
शांतिलाल ने बताया कि उन्होंने लोकसभा चुनाव में AAP के लिए काम किया था और चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए होटल में खाने की व्यवस्था की थी। उन्होंने बताया कि चुनाव के दौरान 50,000 रुपये का खर्च हुआ, जिसमें से 30,000 रुपये नगद और 20,000 रुपये ऑनलाइन दिए गए थे। हालाँकि, बाद में होटल का कुल बिल 1,28,720 रुपये का बना, जिसमें से कुछ राशि अभी भी बकाया है।
विधायक से संपर्क करने पर मिली धमकी
शांतिलाल ने आरोप लगाया कि जब उन्होंने बाकी बकाया राशि के लिए विधायक से संपर्क किया, तो विधायक ने फोन उठाना बंद कर दिया। बाद में उन्होंने एक अनजान नंबर से विधायक को कॉल किया और फिर से पैसे की माँग की। इस पर विधायक गुस्से में आ गए और फोन काट दिया। इसके बाद, 16 सितंबर को चैतर वसावा और उनके समर्थक शांतिलाल के घर पहुँचे और उनसे मारपीट की।
एफआईआर में क्या है आरोप?
एफआईआर के अनुसार, 16 सितंबर की शाम को चैतर वसावा और उनके समर्थकों ने शांतिलाल के घर जाकर उनसे मारपीट की। आरोप है कि विधायक और उनके समर्थकों ने न केवल शांतिलाल को गालियाँ दीं, बल्कि जान से मारने की धमकी भी दी। इस घटना के बाद शांतिलाल ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शांतिलाल की शिकायत पर डेडियापाड़ा पुलिस ने 21 सितंबर को चैतर वसावा और उनके सहयोगियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। उन पर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत दंगे और अन्य अपराधों का आरोप लगाया गया है। हालाँकि, अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। पुलिस का कहना है कि मामले की जाँच चल रही है।
शांतिलाल ने बताया कि वह भी AAP के सक्रिय कार्यकर्ता हैं और उन्होंने विधायक के लिए कई बार काम किया है। उन्होंने यह भी बताया कि होटल मालिक ने बिल की बची हुई राशि उनके वेतन से काट ली, जिसके बाद उनकी नौकरी भी चली गई। शांतिलाल का आरोप है कि जब उन्होंने पैसे की माँग की, तो उन्हें धमकाया गया और उनके साथ मारपीट की गई।
शांतिलाल ने कहा कि वह भी आदिवासी समुदाय से आते हैं और उन्हें न्याय चाहिए। उन्होंने बताया कि जब चैतर वसावा जेल में थे, तब भी उन्होंने उनका साथ दिया था। उन्होंने कहा कि वह पार्टी के लिए निष्ठापूर्वक काम करते रहे हैं, लेकिन उनके साथ अन्याय किया गया है। इस मामले में AAP विधायक चैतर वसावा का पक्ष जानने की कोशिश की गई, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका।
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों से संबंधित यौन सामग्री (चाइल्ड पोर्न) को रखना या उसे कहीं भेजना अपराध माना है। सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय देते हुए मद्रास हाई कोर्ट का वह निर्णय पलटा है जिसमें बच्चों से जुड़ी यौन सामग्री रखना अपराध नहीं माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसी के साथ ही इस प्रकार की सामग्री के नामकरण को लेकर भी कुछ आदेश दिए हैं।
चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने इस मामले की सुनवाई करते हुए सोमवार (23 सितम्बर, 2024) को यह निर्णय सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपने फोन या अन्य किसी डिजिटल उपकरण में चाइल्ड पोर्न को रखना, उसको नष्ट ना करना या उसके बारे में एजेंसियों को सूचित ना करना अपराध की श्रेणी में आएगा।
रखना, भेजना और बेचना सब अपराध
कोर्ट ने कहा कि चाइल्ड पोर्न रखना या उसे डिलीट ना करना अपराध तब माना जाएगा जब इसे रखने वाले की मंशा इसे आगे प्रसारित करने की हो। कोर्ट ने कहा कि व्यक्ति की मंशा उस समय के हालात तय करेंगे। यह POCSO एक्ट की धारा 15(1) के तहत अपराध माना जाएगा। कोर्ट ने POCSO के तहत अपराध मानने को लेकर दो और धाराओं के नियम तय किए।
इसके अलावा कोर्ट ने कहा कि अपने डिवाइस पर चाइल्ड पोर्न रखने के साथ उसे लोगों में बाँटना, कहीं भेजना या फिर ऐसे ही काम में मदद करना भी अपराध माना जाएगा। कोर्ट ने इसे POCSO की धारा 15(2) के तहत अपराध माना है। यहाँ तक कि इस तरह की सामग्री को किसी को दिखाना भी अपराध के तहत आएगा।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी सामग्री पैसा कमाने या किसी तरह के लाभ लेने के लिए रखना भी अपराध माना जाएगा। यदि यह आरोप सिद्ध होता है तो इसमें इस बात की जरूरत नहीं होगी कि इससे कोई लाभ हुआ या नहीं। कोर्ट ने इसे POCSO की धारा 15(3) के तहत अपराध माना है।
इंटरनेट पर देखना भी जुर्म
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी के डिवाइस पर इस तरह का चाइल्ड पोर्न रखा ना गया हो लेकिन अगर इसे कोई इंटरनेट पर देखता है तो यह भी अपराध है। कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट पर ऐसी सामग्री देखना, इसे आगे भेजना और इसको बाँटना अपराध कहा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट पर देखना भी इसे अपने डिजिटल डिवाइस पर रखने के बराबर माना जाएगा। कोर्ट ने इसे POCSO की धारा 15 के तहत अपराध बताया है।
‘चाइल्ड पोर्न’ शब्द पर आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि ‘चाइल्ड पोर्न’ शब्द को देश भर के कोर्ट ना उपयोग करें। कोर्ट ने कहा कि पोर्न शब्द दो वयस्कों के बीच सहमति से बने सम्बन्धों की वीडियो को दर्शाता है। बच्चों के विषय में यह नहीं कहा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चाइल्ड पोर्न शब्द का उपयोग बच्चों के पीड़ित होने का प्रभाव कम करता है।
कोर्ट ने कह़ा, “लोगों को इस तथ्य के प्रति भी सचेत रहना चाहिए कि ‘चाइल्ड पोर्नोग्राफ़ी’ शब्द एक ग़लत नाम है जो अपराध की गंभीरता को बताने में विफल है। यह पहचानना महत्वपूर्ण है कि पारंपरिक रूप से ‘चाइल्ड पोर्नोग्राफ़ी’ कहे जाने वाले प्रत्येक मामले में वास्तव में एक बच्चे का दुराचार शामिल होता है। ‘चाइल्ड पोर्नोग्राफ़ी’ शब्द के उपयोग से अपराध को महत्वहीन किया जा सकता है, क्योंकि पोर्नोग्राफ़ी तो अक्सर वयस्कों के बीच सहमति से किया गया कार्य माना जाता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने चाइल्ड पोर्न की जगह चाइल्ड सेक्सुअल एक्स्प्लोईटेटिव एंड अब्युजिव मैटेरिअल (CSEAM) शब्द उपयोग करने का आदेश दिया है। देश भर के कोर्टों को यह शब्द अपने निर्णयों को आदेश में करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ” CSEAM शब्द सही रूप से बच्चे के शोषण और दुर्व्यवहार पर जोर देता है। यह ऐसे कृत्य की आपराधिक प्रकृति पर गंभीर और मजबूत प्रतिक्रिया की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।”
मद्रास हाई कोर्ट का पलटा निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने ‘चाइल्ड पोर्न’ या बच्चों से जुड़ी पोर्न सामग्री पर दिए इस निर्णय में मद्रास हाई कोर्ट के हालिया निर्णय को पलट दिया है। मद्रास हाई कोर्ट ने जनवरी, 2024 में दिए गए निर्णय में कहा था किचाइल्ड पॉर्न डाउनलोड करना और इसे प्राइवेट में देखना POCSO और IT के तहत अपराध नहीं है।
यह मामला 28 साल के व्यक्ति से जुड़ा था, उसके ऊपर चाइल्ड पॉर्न डाउनलोड करने और इसे देखने पर POCSO और IT एक्ट पुलिस ने लगाया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरोपित ने प्राइवेट में ये सब किया, बिना किसी पर कोई प्रभाव डाले हुए। जज ने कहा कि यदि वो कंटेंट बाँटने लगता, तब इन एक्ट्स के तहत उस पर धाराएँ लगाई जा सकती हैं।
कोर्ट ने इस व्यक्ति के खिलाफ इन दोनों धाराओं में दर्ज किया गया मामला भी रद्द कर दिया था। मद्रास हाई कोर्ट ने कहा था कि पोर्न देखना वर्तमान समय में शराब-सिगरेट पीने जैसी बीमारी बन चुकी है जिसे सामाजिक तौर सही किए जाने की जरूरत है।
मद्रास हाई कोर्ट के इस फैसले के विरुद्ध बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले के NGO ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। NGO ने माँग की थी कि मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला पलट दिया जाए। इस मामले में हुई सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस कृत्य को अपराध माना और मद्रास हाई कोर्ट का निर्णय पलट दिया।
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने मार्च 2024 में तमिल फिल्म प्रोड्यूसर व द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) के पूर्व पदाधिकारी जफर सादिक को गिरफ्तार किया था। तब उन पर 2000 करोड़ रुपयों से अधिक मूल्य की ड्रग्स तस्करी का आरोप लगा था। अब सामने आ रही जानकारी के मुताबिक जफर सादिक ने 3 देशों में 6 मीट्रिक टन (6 हजार किलो) स्यूडोएफेड्रिन की तस्करी की थी। यह तस्करी पिछले 11 वर्षों से की जा रही थी। तस्करी के ये पैसे सादिक ने 4 तमिल फिल्मों में भी लगाए थे।
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) जफर सादिक के खिलाफ अदालत में एक मजबूत केस बना रही है। जाँच के दौरान पता चला है कि जफर सादिक ड्रग्स की तस्करी में साल 2013 से एक्टिव था। वह खासतौर पर स्यूडोफेड्राइन नामक ड्रग्स की तस्करी में शामिल था। यह तस्करी ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और मलेशिया में की जाती थी। इस एक दशक से अधिक समय के दौरान जफर सादिक ने लगभग 6 मीट्रिक टन (6000 किलो) स्यूडोफेड्राइन की तस्करी की।
बीते तीन सालों में ही जफर सादिक ने 3500 किलो ड्रग्स की तस्करी की, जिसकी कीमत लगभग 2000 करोड़ रुपए है। उससे पहले उसने करीब 2500 ड्रग्स की तस्करी की थी। इस तरह से जफर सादिक ने 3,428.57 करोड़ रुपए के ड्रग्स की तस्करी की।
एक अनुमान के मुताबिक सादिक द्वारा तस्करी की गई इस ड्रग्स की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमत हजारों करोड़ में है। सादिक के खिलाफ सबूत जुटाने में लगी NCB को व्हाट्सएप पर भेजे गए वॉयस नोट्स भी मिले हैं। इसी के साथ ऑस्ट्रेलिया की फर्जी कंपनियों के IP एड्रेस व बैंको के CCTV फुटेज भी जब्त किए गए हैं। ड्रग्स की तस्करी के लिए सादिक कार्गो का इस्तेमाल करता था। तस्करी के पैसों से सादिक ने न सिर्फ तमाम सम्पत्तियाँ बनाईं बल्कि 4 तमिल फिल्मों में भी निवेश किया था।
इन खुलासों के बाद अब NCB के एक सीनियर अधिकारी ने भारत में बन रहे अवैध रसायनों की बढ़ती मात्रा पर चिंता जताई है। NCB जल्द ही रसायन बनाने वाली तमाम कंपनियों पर निगरानी तेज कर सकता है। ऐसी तमाम कंपनियों की लिस्ट बनाई जा रही है जो रसायन बनाती हैं।
बताते चलें कि ड्रग्स तस्करी रैकेट के कथित सरगना जफर सादिक को नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने 9 मार्च 2024 को जयपुर से गिरफ्तार किया था। उसके नेटवर्क का भंडाफोड़ फरवरी महीने में ही हो गया था जब दिल्ली में हुई छापेमारी के दौरान स्यूडोफेड्राइन नामक ड्रग्स बरामद हुआ था। गिरफ्तारी के पहले वह 15 दिनों तक फरार रहा था। जफर सादिक DMK का पदाधिकारी रहा है। उसकी कई तस्वीरें स्टालिन और उनके बेटे उदयनिधि के साथ सोशल मीडिया पर वायरल हैं।
क्या है स्यूडोएफेड्रिन
स्यूडोएफेड्रिन मूल रूप से दवाएँ बनाने के काम आती है। इस से बनने वाली दवा साँस लेने में तकलीफ और नींद न आने की बीमारी से परेशान लोगों के लिए अक्सर कारगर साबित होती है। दुनिया के कई देश इस ड्रग्स का इस्तेमाल दवाएँ बनाने में करते हैं। हालाँकि कुछ लोग इस ड्रग्स का दुरूपयोग नशे के लिए करते हैं। इसके दुरूपयोग की वजह से एलर्जी, हाँफना ब्लड प्रेशर अनियमित होना, धड़कने जोर-जोर से चलना और शरीर में थकान आदि लक्षण दिखाई देने लगते हैं। स्यूडोएफेड्रिन की बिना सरकारी अनुमति के खरीद-फरोख्त कानूनी तौर पर अपराध है।
कौन है जफर सादिक?
जफर सादिक एक तमिल फिल्म प्रोड्यूसर हैं, जिन्होंने JSM Pictures के तहत तीन फिल्में बनाई हैं: “Iraivan Miga Periyavan,” “Maayavalai,” और “Mangai।” एक नई फिल्म “VR07” भी आने वाली है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) का आरोप है कि सादिक ने ड्रग्स की तस्करी से मिले पैसे का इस्तेमाल फिल्म “Mangai” की प्रोडक्शन के लिए किया।
जफर सादिक का नाम द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) से भी जुड़ा है, जिससे उसकी गिरफ्तारी ने पार्टी की छवि को प्रभावित किया है। उसकी कहानी ने ये दिखाया है कि ड्रग्स के कारोबार में कितना बड़ा जाल फैला हुआ है। मार्च 2024 में NCB ने जब सादिक को गिरफ्तार किया, यह पता चला कि उसने 6000 किलो स्यूडोएफेड्रिन की तस्करी की थी, जिसकी कीमत हजारों करोड़ रुपये है। उसकी गतिविधियाँ ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और मलेशिया में फैली थीं।
राजस्थान के अलवर जिले में 5 साल की एक नाबालिग बच्ची से रेप किए जाने का मामला सामने आया है। दुष्कर्म का आरोप एक मस्जिद के मौलवी पर लगा है जिसका नाम असजद खान है। असजद ने पीड़िता को टॉफी देने के बहाने मस्जिद के अंदर बुलाया था। घटना रविवार (22 सितंबर 2024) की है। पुलिस ने मौलवी को गिरफ्तार कर लिया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना अलवर जिले के थानाक्षेत्र राजगढ़ की है। यहाँ रविवार को 5 साल की बच्ची की माँ ने पुलिस में तहरीर दी है। तहरीर में बताया गया है कि उनके घर के सामने ही एक मस्जिद है। रविवार की सुबह बच्ची घर के बाहर इसी मस्जिद के पास खेल रही थी, तब अन्य परिजन घर के अंदर थे। इसी दौरान मस्जिद के अंदर से मौलवी असजद खान ने बच्ची को टॉफी खिलाने के बहाने अंदर बुलाया। आरोप है कि मस्जिद में मौलवी पीड़िता से रेप की कोशिश करने लगा।
बच्ची दर्द से चीखने लगी तो यह आवाज उनकी माँ तक पहुँची। पीड़िता की माँ मस्जिद में पहुँची तो वहाँ मौलवी उनकी बेटी से बलात्कार कर रहा था। पीड़िता की माँ को देखते ही मौलवी वहाँ से भाग निकला। बच्ची को इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया हैं। हालत फ़िलहाल स्थिर बताई जा रही है। इधर पीड़िता की माँ ने पुलिस में तहरीर देते हुए मौलवी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की। अपने खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई की भनक लगते ही असजद खान फरार हो गया।
मौलवी असजद खान मूल रुप से राजस्थान के भरतपुर का रहने वाला है। वह अलवर की इस मस्जिद में पिछले 2 वर्षों से रह रहा है। पुलिस ने असजद खान के खिलाफ पॉक्सो एक्ट सहित भारतीय न्याय संहिता (BNS) की अन्य धाराओं में FIR दर्ज कर ली। आरोपित की तलाश के लिए टीमों का गठन किया गया और छापेमारी शुरू की गई। आखिरकार पुलिस को सफलता मिली और 22 सितंबर (रविवार) को ही मौलवी असजद खान को दबोच लिया गया। पुलिस इस मामले में जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई कर रही है।
अहमदाबाद के इतिहासकार और लेखक रिजवान कादरी ने कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी को एक पत्र लिखकर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से संबंधित निजी दस्तावेजों की वापसी, उनकी प्रतियाँ या उनके डिजिटल एक्सेस की माँग की है। इन दस्तावेजों में नेहरू और जयप्रकाश नारायण, एडविना माउंटबेटन, अल्बर्ट आइंस्टीन, अरुणा आसफ अली, विजया लक्ष्मी पंडित और बाबू जगजीवन राम के बीच हुए पत्राचार शामिल हैं। कादरी, जो प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय सोसायटी (PMML) के सदस्य हैं, ने इस मामले को उठाते हुए इन दस्तावेजों को सार्वजनिक शोध और ऐतिहासिक अध्ययन के लिए आवश्यक बताया है।
कादरी ने अपने पत्र में लिखा कि इन दस्तावेजों का ऐतिहासिक महत्व अत्यधिक है, और इन तक पहुँच सुनिश्चित करना जरूरी है ताकि देश के इतिहास को समग्रता से समझा जा सके। उनका कहना है कि इन कागजातों तक पहुँच होने से भारत के स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रीय निर्माण और भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस की महत्वपूर्ण जानकारी हासिल की जा सकेगी। उनके अनुसार, गाँधी जी के लेखन को व्यवस्थित रूप से दस्तावेज किया गया है, लेकिन सरदार पटेल के योगदान को लेकर इतने व्यापक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए नेहरू और उनके पिता मोतीलाल नेहरू द्वारा छोड़े गए दस्तावेज बेहद महत्वपूर्ण हैं।
कादरी ने पत्र में कहा कि नेहरू परिवार के प्रतिनिधि के रूप में सोनिया गाँधी द्वारा कुछ निजी दस्तावेज 2008 में वापस ले लिए गए थे। ये दस्तावेज 51 बॉक्सों में थे और इनमें से कुछ को निजी और सरकारी दस्तावेजों के रूप में वर्गीकृत किया गया था। कादरी ने इन दस्तावेजों को PMML में वापस लाने या उनकी प्रतियां उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है ताकि वे शोधकर्ताओं और आम जनता के लिए उपलब्ध हो सकें। उन्होंने कहा कि अगर ये दस्तावेज वापस नहीं किए जा सकते, तो उनका डिजिटलाइजेशन किया जा सकता है ताकि उन्हें बिना नुकसान पहुँचाए संरक्षित रखा जा सके।
कादरी ने सुझाव दिया है कि वह दो योग्य सहायकों की मदद से इन दस्तावेजों को स्कैन कर सकते हैं ताकि वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से व्यवस्थित और सुरक्षित रहें। उन्होंने कहा कि वह इस प्रक्रिया के खर्चे को वहन करने के लिए तैयार हैं और इस बात का ध्यान रखेंगे कि दस्तावेजों की समयरेखा में कोई छेड़छाड़ न हो।
#WATCH | Ahmedabad, Gujarat: Rizwan Kadri, historian & author and one of the members of the Prime Ministers’ Museum and Library (PMML) Society (formerly Nehru Memorial Museum and Library, or NMML), writes a letter to the Congress leader Sonia Gandhi asking her to either return… pic.twitter.com/Y6XR1nobfZ
इस मामले पर सोनिया गाँधी की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालाँकि, कादरी ने अपने पत्र में आशा जताई है कि यह मांग राष्ट्रीय हित और इतिहास के सही अध्ययन के लिए की गई है, और इसे स्वीकार किया जाएगा। उन्होंने कहा कि नेहरू के योगदान का निष्पक्ष और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त अध्ययन किया जाना चाहिए, ताकि उनकी भूमिका को सही परिप्रेक्ष्य में समझा जा सके।
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, इन दस्तावेजों की वापसी का मामला पहली बार फरवरी 2023 में PMML की वार्षिक बैठक में उठाया गया था। यह बैठक रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई थी, जिसमें यह चर्चा हुई थी कि सोनिया गाँधी द्वारा 2008 में 51 बॉक्स वापस लिए गए थे। इन दस्तावेजों में नेहरू और एडविना माउंटबेटन के बीच हुए पत्राचार भी शामिल थे, जिनके बारे में कई बार सवाल उठाए गए हैं। कुछ सदस्यों ने इस बात पर भी जोर दिया है कि इन पत्रों को वापस लाया जाए और यह सुनिश्चित करने के लिए फॉरेंसिक ऑडिट की मांग की है कि कोई महत्वपूर्ण दस्तावेज गायब न हों।
कादरी का कहना है कि इतिहासकारों को नेहरू, गाँधी और पटेल के योगदान को सही ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में अध्ययन करने का मौका मिलना चाहिए। उन्होंने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया कि सोनिया गाँधी द्वारा किए गए दस्तावेजों की वापसी अच्छे इरादों से की गई थी ताकि इनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। हालाँकि, अब समय आ गया है कि इन दस्तावेजों तक पहुँच प्रदान की जाए ताकि राष्ट्र के इतिहास का व्यापक अध्ययन हो सके।
कादरी ने यह भी सुझाव दिया कि अगर सोनिया गाँधी इन दस्तावेजों को वापस नहीं करना चाहतीं, तो वह उनकी प्रतियाँ उपलब्ध करा सकती हैं। इससे दस्तावेज सुरक्षित भी रहेंगे और साथ ही शोधकर्ताओं को उनका उपयोग करने का अवसर मिलेगा। उन्होंने कहा कि वह इस प्रक्रिया में पूरी मदद करने के लिए तैयार हैं और उम्मीद करते हैं कि सोनिया गाँधी इस पर सकारात्मक रुख अपनाएँगी।
यह मामला न केवल नेहरू के व्यक्तिगत दस्तावेजों की वापसी का है, बल्कि इससे जुड़ा एक बड़ा सवाल यह भी है कि ऐतिहासिक दस्तावेजों तक पहुँच कैसे सुनिश्चित की जाए ताकि राष्ट्र के इतिहास का सही ढंग से अध्ययन हो सके। कादरी जैसे इतिहासकारों का कहना है कि इन दस्तावेजों का महत्व इतना अधिक है कि इन्हें सिर्फ एक परिवार की निजी संपत्ति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इन्हें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना राष्ट्रीय हित में है, और इस दिशा में उचित कदम उठाए जाने चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वर्तमान में अमेरिका की यात्रा पर हैं। उनकी इस बहुउद्देशीय यात्रा की शुरुआत अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन के साथ मिलने शुरू हुई। बायडेन ने पीएम मोदी को अपने डेलावेयर स्थित घर पर बुलाया था। पीएम मोदी के अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलने से पहले अमेरिकी रक्षा विभाग से जुड़े अधिकारियों ने अमेरिकी सिखों से मुलाक़ात की। सामने आया है कि अमेरिकी सरकार ने इन सिखों को हर प्रकार से बचाने का वादा किया है। अमेरिका ने यह वादा इसलिए किया है क्योंकि यह खालिस्तान समर्थक भारत पर अपनी आवाज दबाने का आरोप लगाते रहे हैं।
अमेरिकी अधिकारियों से मिलने वाले इन संगठनों में अमेरिकन सिख कॉकस कमिटी (ASCC), सिख कोएलिशन और सिख अमेरिकन लीगल डिफेंस एंड एजुकेशन फंड (SALDEF) शामिल थे। इन संगठनों का खालिस्तानी एजेंडा चलाने का इतिहास रहा है। एक्स पर एक पोस्ट में, ASCC के प्रीतपाल सिंह ने लिखा, “अमेरिकी सिखों की की रक्षा में सहयोग के लिए अमेरिकी अधिकारियों का आभार। हम अपने समाज की सुरक्षा के लिए और काम उनके आश्वासन पर कायम रहेंगे। स्वतंत्रता और न्याय की जीत होनी चाहिए।”
Thankful to U.S. officials for their vigilance in protecting Sikh Americans. We will hold them to their assurances to do more in safeguarding our community. Freedom and justice must prevail.https://t.co/4YnNZagTRl
यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब खालिस्तानी आतंकी गुरवतपन्त सिंह पन्नू ने अमेरिका में भारत के खिलाफ एक मुकदमा दाखिल किया है। इस मामले में अमेरिकी कोर्ट ने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल को तलब किया है। भारत के बाहर खालिस्तानियों की आवाज दबाने के आरोपों को लेकर एक बिल भी अमेरिकी संसद में आ चुका है। इसमें सीधे तौर पर सिखों का नाम नहीं लिया गया लेकिन कहा गया है कि अगर कोई देश अमेरिका के भीतर उसके नागरिकों की आवाज दबाने का प्रयास करता है तो उसे बताना होगा।
यह बिल एडम शिफ़ नाम के एक सांसद द्वारा लाया गया है। SALDEF ने इस बिल का समर्थन किया है। SALDEF की प्रवक्ता किरण कौर गिल ने कहा कि यह अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा में एक बड़ा कदम होगा। सिख कोएलिशन ने भी यही भाषा बोली है। हरमन सिंह ने कहा, “हम इस बिल को लाने करने और भारत द्वारा सिखों को निशाना बनाए जाने के खतरे को गंभीरता से लेने के लिए कॉन्ग्रेसमैन शिफ के प्रति आभारी हैं।” स्वर्णजीत सिंह खालसा नाम के एक व्यक्ति ने भी इस बिल का समर्थन किया।
अमेरिकन सिख कॉकस कमिटी
ASCC की गतिविधियों से प्रतीत होता है कि यह एक अलगाववादी संगठन है जो भारत से खालिस्तान तोड़ने की माँग को लेकर 2015 से काम कर रहा है। इसका एक प्रमुख सदस्य प्रीतपाल लगातार पाकिस्तानियों के सम्पर्क में है और उनसे मुलाकातें करता रहा है। फरवरी 2020 में उसने पाकिस्तानी नेता नईमुल हक के साथ 2019 में ली गई एक तस्वीर शेयर की थी। नईमुल हक़ की यह तस्वीर उसकी मौत के बाद साझा की गई थी। प्रीतपाल ने “नईमुल हक के से पाकिस्तान ने एक महान नेता और सिखों ने एक मित्र खो दिया है।”
इससे पहले प्रीतपाल की तस्वीरें पाकिस्तान के एक और नेता आज़मी गिल के साथ आईं थी। जनवरी 2024 में उसने हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन को एक जवाब देते हुए खालिस्तान का खुले तौर पर समर्थन किया था। प्रीतपाल का कहना है कि हिन्दुओं में जाति व्यवस्था की तरह ही सिख भी खालिस्तान माँग सकते हैं। उसने खुद पर खतरा भी बताया था।
Just like the @HinduAmerican Foundation has the right to advocate for a society’s segregation based Caste System(वर्णाश्रम), Sikhs also have the right to champion the cause of a Free Punjab and the establishment of Khalistan. In America, where freedom of belief is paramount, let…
जून 2024 में, उन्होंने खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या पर अब प्रतिबंधित अल जज़ीरा डॉक्यूमेंट्री साझा की। उसने इस पर लिखा, “भारत, अमेरिका और कनाडा में आलोचकों को कैसे चुप कराता है। जुलाई 2022 में, कनाडाई सुरक्षा एजेंसियों ने हरदीप निज्जर को चेतावनी दी थी कि उसकी जान को खतरा है। खतरे के बावजूद, उसने खालिस्तान का समर्थन जारी रखा। दुख की बात है कि निज्जर की जून 2023 में भारतीय एजेंटों द्वारा हत्या कर दी गई। अल जज़ीरा डॉक्यूमेंट्री दमन के इस भयावह उदाहरण को उजागर करती है।”
सिख कोएलिशन
सिख कोएलिशन एक ओर कहता है कि वह खालिस्तान की माँग को लेकर कोई रुख नहीं रखता लेकिन दूसरी तरफ वह भारत के विरुद्ध लगातार काम करता आया है। वह इस्लाम्मी आतंकी संगठनों से लिंक रखने वाले IAMC का भी समर्थन करता रहा है। फरवरी, 2021 में बेसबॉल के बड़े मुकाबले सुपर बॉल के दौरान भारत में हो रहे किसान प्रदर्शनों को लेकर एक एड चलाया गया था। यह एड काफी महँगे होते थे। इस प्रदर्शन का कनेक्शन इसी सिख कोएलिशन से निकला था।
A free press is the cornerstone of a strong democracy. Under Mr. Modi's leadership, India has experienced a sharp decline in press freedom, including arrests and expulsions of journalists and the suppression of dissent. https://t.co/72uXJkOxmZ
सिख गठबंधन को ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन (OSF) से भी फंडिंग मिलती है। OSF जॉर्ज सोरोस का संगठन है, उसने प्रधानमंत्री मोदी सहित राष्ट्रवादियों और राष्ट्रवाद के खिलाफ़ युद्ध की घोषणा की थी। जुलाई 2023 में, सिख कोएलिशन ने भारत में प्रेस की स्वतंत्रता के बारे में एक रिपोर्ट साझा की थी। यह रिपोर्ट प्रेस की आजादी की रैंकिंग से जुड़ी थी। ऑपइंडिया ने पहले ही बताया है कि ऐसी रैंकिंग निराधार आरोपों, संदिग्ध आंकड़ों और पुरानी रिपोर्टों पर आधारित हैं।
सिख अमेरिकन लीगल डिफेंस एंड एजुकेशन फंड (SALDEF)
SALDEF खुले तौर पर खालिस्तान का समर्थन नहीं करता लेकिन इसकी गतिविधियाँ भी संदिग्ध रही हैं। यह दिखाती हैं कि यह खालिस्तान समर्थक है। सितंबर 2023 में, SALDEF ने फेसबुक पर एक पोस्ट साझा की थी, इसमें खालिस्तानी आतंकी से नेता बने अमृतपाल सिंह पर कार्रवाई और खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के लिए भारत सरकार को निशाना बनाया गया। उसने अमृतपाल सिंह की गिरफ़्तारी के विरुद्ध बात की थी।
SALDEF ने फरवरी 2024 में, इक्वलिटी लैब्स, हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (HFHR) और IAMC के साथ मिलकर “वर्चुअली वल्नरेबल” नाम से एक रिपोर्ट जारी की थी। ये सभी भारत विरोधी संगठन हैं, जिनमें से दो के आतंकवादी संगठनों से संबंध साबित हुए हैं। रिपोर्ट में, उन्होंने दावा किया कि जब भी भारतीय राज्य सिखों की आवाज़ को दबाना चाहता है, तो वे उन्हें “खालिस्तानी” के रूप में लेबल करते हैं। हालाँकि, यह पूरी तरह से झूठ है।
सिख असेम्बली ऑफ़ अमेरिका
सिख असेंबली ऑफ अमेरिका एक अलगाववादी संगठन है। यह खालिस्तान की माँग को ओने मिशन स्टेटमेंट में शामिल करते हैं। यह एक नया संगठन लगता है। यह हरदीप सिंह निज्जर और गुरपतवंत सिंह पन्नू सहित खालिस्तानी आतंकवादियों का समर्थन करते हुए सोशल मीडिया पर खुलेआम पोस्ट शेयर करता है। हाल ही में एक पोस्ट में, इस संगठन ने 2024 के उसी एक्ट पर चर्चा लिखी जिसे शिफ़ ने पेश किया था।
इसने लिखा, “यह बिल अमेरिका सिखों के दमन के लिए भारत को जवाबदेह ठहराएगा। यह बिल अमेरिका में सिखों के उत्पीड़न और धमकाने से निपटने में मदद करेगा।” इसके अलावा संगठन ने कहा कि बिल में खालिस्तान के लिए सिखों की माँग को उजागर किया गया था। दिलचस्प बात यह है कि बिल के प्रायोजकों में कांग्रेसी डैन गोल्डमैन, जेम्स मैकगवर्न और एरिक स्वेलवेल और कांग्रेसी बारबरा ली, इल्हान उमर और एलेनोर होम्स नॉर्टन शामिल हैं। एक और पोस्ट में इसी संगठन ने आतंकी अवतार सिंह खंडा और निज्जर जिक्र किया था।
अमेरिकी अधिकारियों का खालिस्तान समर्थक संगठनों से मिलना अमेरिका की सरकार के लिए काफी बुरा संकेत है। लम्बी अवधि में अमेरिका को अपनी भूमि पर तेजी से फैल रहे भारत विरोधी बयानबाजी को नियंत्रित करना होगा और भारत के साथ काम करने के लिए उसे यह जल्द से जल्द करना चाहिए।