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ईद मिलाद के जुलूस में कोटा से लेकर छपरा तक राष्ट्रीय ध्वज का अपमान, तिरंगे में अशोक चक्र की जगह लगा दिए चाँद-तारे: वीडियो वायरल

बिहार के सारण जिले के कोपा बाजार में एक जुलूस के दौरान राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के अपमान का मामला सामने आया है। मोहम्मद साहब के जन्मदिन मिलाद-उल-नबी के जुलूस के दौरान तिरंगे में अशोक चक्र के स्थान पर चाँद-तारा लगाया गया, जिसके बाद इस घटना का वीडियो वायरल हो गया। वीडियो वायरल होते ही हंगामा मच गया, और मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। ऐसी ही एक घटना राजस्थान के कोटा से भी सामने आई है, जिसमें पुलिस ने झंडे को बरामद कर कार्रवाई शुरू कर दी है।

बिहार की घटना को लेकर सारण पुलिस अधीक्षक (एसपी) कुमार आशीष ने बयान जारी करते हुए बताया कि भारतीय ध्वज संहिता 2002 सहित कई अधिनियमों के उल्लंघन को देखते हुए पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। एसपी आशीष ने बताया कि पुलिस ने विवादित झंडे को जब्त कर लिया है और इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस दोनों व्यक्तियों से पूछताछ कर रही है कि उन्होंने किसके प्रभाव में आकर यह कदम उठाया।

वीडियो का सत्यापन और पुलिस की कार्रवाई

एसपी कुमार आशीष ने जानकारी दी कि वीडियो का सत्यापन करने के बाद पता चला कि यह घटना कोपा थाना क्षेत्र के कोपा बाजार की है, जहाँ मिलाद-उल-नबी के जुलूस के दौरान यह विवादित झंडा इस्तेमाल किया गया था। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर तुरंत कार्रवाई की और विवादित झंडे को जब्त कर लिया। फिलहाल पुलिस पूरे जिले में कड़ी निगरानी बनाए हुए है और अन्य संवेदनशील स्थानों पर पुलिस बल तैनात किया गया है ताकि शांति व्यवस्था बनी रहे।

कोटा में भी तिरंगे का अपमान, पुलिस ने बताया नाबालिग, पूछताछ जारी

बिहार के छपरा की तरह ही राजस्थान के कोटा में भी मामला सामने आया, जहाँ तिरंगे के साथ छेड़छाड़ कर उस पर चाँद-तारा बना दिया गया। इस झंडे को भी जुलूस में लहराया गया। इस मामले का खुलासा होने के तुरंत बाद पुलिस सक्रिय हो गई।

हालाँकि कोटा पुलिस ने कहा है, “आज ईद मिलादुनबी के जुलुस के दौरान अनन्तपरा क्षेत्र में राष्टीय ध्वज के साथ आपत्तिजनक चिन्ह बनाकर लहराने का वीडिओ सोशल मीडिया पर वायरल होने पर पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और राष्ट्रीय ध्वज को बरामद किया। साथ ही तिरंगा फहराने वाले बच्चों की पहचान कर कानूनी कार्रवाई की जा रही है।”

छपरा और कोटा की इन घटनाओं के बीच देश में साम्प्रदायिक तनाव की स्थिति भी बनी हुई है। हाल ही में बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ हो रही प्रताड़ना, वक्फ संशोधन बिल के खिलाफ मुस्लिम समुदाय की गोलबंदी, और देश के विभिन्न हिस्सों में गणेश पूजा जुलूसों पर हो रहे हमलों के कारण माहौल तनावपूर्ण है। ऐसे में तिरंगे के अपमान की यह घटना और भी तनाव पैदा कर सकती है। भागलपुर में भी हाल ही में एक मुस्लिम युवक ने अयोध्या के राम मंदिर को उड़ाने की धमकी दी थी, जिसे यूपी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

कोटा और छपरा की घटनाएँ न सिर्फ राष्ट्रीय झंडे तिरंगा का अपमान है बल्कि देश के मौजूदा साम्प्रदायिक माहौल को और भड़काने का प्रयास भी माना जा रहा है।

RG Kar अस्पताल में महिला डॉक्टर की रेप-हत्या मामले में FIR नहीं चाहते थे संदीप घोष, सबूत मिटाने में जुटा था SHO: CBI जाँच से हुए खुलासे

कोलकाता रेप और हत्या मामले में आरजी कर मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष और ताला थाना के पूर्व प्रभारी अभिजीत मंडल की गिरफ्तारी के बाद नए खुलासे हो रहे हैं। रिमांड पत्र से जानकारी सामने आई है कि डॉक्टर के साथ हुए घिनौने कृत्य के खिलाफ संदीप घोष अस्पताल के प्रिंसिपल होते हुए मामले में प्राथमिकी नहीं दर्ज करवाना चाहते थे। वहीं अभिजीत मंडल ने थाना प्रभारी होते हुए इस मामले में सबूतों को दबाने का खूब प्रयास किया था और आरोपित को बचाने की कोशिश की थी।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अस्पताल के प्रिंसिपल संदीप घोष को महिला डॉक्टर की रेप-हत्या की जानकारी सुबह 9:58 मिनट पर हो गई थी लेकिन उन्होंने सारी सूचना होने के बावजूद मामले में शिकायत नहीं दी। उन्होंने वकील से बात करके इस मामले को दबाने का प्रयास किया। हालाँकि बाद में वाइस प्रिंसिंपल ने केस दर्ज कराया। छानबीन में ये भी सामने कि संदीप घोष और मंडल घटना के बाद सुबह 10:03 से संपर्क में थे, मगर दोनों ने कोई एक्शन नहीं लिया।

बताया जा रहा है कि ताला पुलिस थाने और आरजी कर अस्पताल के बीच 10 मिनट की दूरी है, फिर भी मंडल ने अस्पताल पहुँचने में देर की। ये भी पता चला है कि मंडल इस केस के मुख्य आरोपित संजय रॉय को बचाने की पूरी कोशिश की थी। उसने जानबूझकर एफआईआर दर्ज कराने में देर की थी। इसके अलावा उसने प्रमाणों को सील करते समय कोई वीडियोग्राफी भी नहीं कराई। उसने जल्दी-जल्दी में डॉक्टर के शव का अंतिम संस्कार कराया। इसके अलावा संजय रॉय के कपड़े बरामद करने में भी दो दिन का समय लिया। जाँच एजेंसियों का मानना है कि ये सब सिर्फ और सिर्फ इसलिए किया गया ताकि मामले से रेप-मर्डर के एंगल को हटाया जा सके।

गौरतलब है कि अब तक इस मामले में तीन लोग गिरफ्तार हो चुके हैं- संजय रॉय, संदीप घोष और अभिजीत मंडल। वहीं डॉक्टर प्रदर्शनकारी अब भी अपनी साथी को न्याय दिलाने के लिए सड़कों पर हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उनसे बात करना चाहती हैं ताकि मामले को सुलझा सकें लेकिन डॉक्टर मिलने को तैयार नहीं हो रहे। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें अपने आवास पर बुलाकर बातचीत करने को कहा है। इससे पहले वो खुद प्रदर्शनकारियों के बीच गई थीं। उन्होंने डॉक्टरों से कहा था कि अगर सब अपने काम पर लौट जाएँगे तो वो किसी पर कोई कार्रवाई नहीं करेंगी।

‘अडानी समूह ने कबूली सरकार में शामिल लोगों को घूस देने की बात’: सुप्रीम कोर्ट के वकील संजय हेगड़े ने शेयर किया फर्जी पत्र, बोले – सिर्फ ज़ुबैर की बात मानूँगा

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने अडानी समूह पर निशाना साधने के लिए फर्जी खबरों का सहारा लिया है। उन्होंने दावा किया है कि गौतम अडानी ने सरकार के कई अधिकारियों और हितधारकों को घूस दिया है, ताकि उनकी कंपनी को सरकारी परियोजनाओं का ठेका मिल सके। उनके अनुसार, अडानी समूह ने खुद भी इसे स्वीकार किया है। इतना ही नहीं, संजय हेगड़े ने सोमवार (16 सितंबर, 2024) एक एक फेक लेटर भी शेयर कर के अपनी बात को सही साबित करनी चाही।

वकील संजय हेगड़े ने अडानी को बदनाम करने के लिए फैलाई फेक न्यूज़

इस फर्जी पत्र में 10 सितंबर, 2024 की तारीख़ अंकित है। इस पत्र में लिखा हुआ है कि कंपनी उन सभी सरकारी अधिकारियों और हितधारकों के नाम सार्वजनिक करेगी, जिन्हें फायदा पहुँचाया गया है। उन्होंने इसे शेयर करते हुए लिखा, “अडानी कंपनी के किस मूर्ख कर्मचारी ने इस प्रेस रिलीज को ड्राफ्ट किया है? क्या तुम्हें पता है कि तुमने घूस देने की बात स्वीकार की है? आगे ये आपराधिक मुकदमों में आपका पीछा करेगा।” उन्होंने एक ब्रिटिश सीरियल के डायलॉग का जिक्र करते हुए कहा कि कभी खुद को दोषी नहीं बताना चाहिए।

इस फर्जी पत्र का शीर्षक था – “अडानी ने आधारहीन आरोपों और धमकियों को नकार दिया है”। जब हमने पता लगाया तो पाया कि अडानी समूह की तरफ से ऐसा कोई भी पत्र जारी नहीं किया गया है। यूजर्स ने भी तुलना करने पर पाया कि हस्ताक्षर, पता और लोगो तक में कई असमानताएँ थीं। हालाँकि, सोशल मीडिया पर बेइज़्ज़ती होने के बाद संजय हेगड़े ने इस पोस्ट को डिलीट कर लिया है। 1 दिन पहले ही अडानी पॉवर और एक अफ्रीकन डेवलपमेंट बैंक यूनिट को ‘पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप’ (PPP) की तर्ज़ पर केन्या में पॉवर ट्रांसमिशन को लेकर 1.30 बिलियन डॉलर की रियायत दी गई है।

संजय हेगड़े ने फर्जी पत्र शेयर कर के डिलीट कर लिया

बड़ी बात तो ये कि जब संजय हेगड़े के पोस्ट का फैक्ट-चेक हो गया, तब वो कहने लगे कि जब तक ALTNews और मोहम्मद ज़ुबैर नहीं कहेंगे, तब तक वो नहीं मानेंगे कि क्या झूठ है और क्या सच। बता दें कि हिंडेनबर्ग रिसर्च ने दावा किया है कि अडानी समूह की करोड़ों डॉलर की रकम सिंगापुर में सरकार ने जब्त की है। अडानी पर दोबारा फर्जी रिपोर्ट का असर न होने के बाद अमेरिकी संस्था ने ये झूठ फैलाया। हालाँकि, अब उसकी बातों का कोई असर नहीं हो रहा है।

अडानी समूह ने भी फर्जी पत्र को लेकर जारी किया बयान

अडानी समूह ने भी इस फर्जी पत्र को लेकर बयान जारी किया है। कंपनी ने कहा है कि कुछ निहित स्वार्थी तत्व दुर्भावनापूर्ण इरादों के साथ कई फर्जी प्रेस विज्ञप्तियाँ फैला रहे हैं, जिनमें से एक का शीर्षक ‘अडानी समूह ने निराधार आरोपों और धमकियों की निंदा की’ है, जो कि केन्या में कंपनी की उपस्थिति से संबंधित है। कंपनी का कहना है कि न तो अडानी समूह और न ही उसकी कोई भी कंपनियों या सहायक कंपनियों ने केन्या से संबंधित कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी की हैं।

अडानी समूह ने कहा, “हम इस धोखाधड़ी वाली करतूत की कड़ी निंदा करते हैं और सभी से इन फर्जी और भ्रामक विज्ञप्तियों को पूरी तरह से नजरअंदाज करने का आग्रह करते हैं। हम झूठा बयान फैलाने में शामिल लोगों खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे। हमारी आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियाँ हमारी वेबसाइटों पर उपलब्ध हैं। हम मीडिया और प्रभावशाली व्यक्तियों से आग्रह करते हैं कि वे अडानी समूह से संबंधित किसी भी समाचार या लेख को प्रकाशित या प्रसारित करने से पहले तथ्यों और स्रोतों की जाँच करें।”

शरिया की पढ़ाई, आपत्तिजनक सिलेबस, कट्टरपंथियों से वास्ता, NCPCR ने सुप्रीम कोर्ट को बताया मदरसा तालीम का हाल: कहा- संविधान का उठा रहे हैं गलत फायदा

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने सुप्रीम कोर्ट के सामने मदरसा तालीम पर चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट मदरसा तालीम को लेकर चिंताजनक तथ्य बताए हैं। आयोग ने कहा कि मदरसे भारत के संविधान द्वारा निर्धारित बच्चों के शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन कर रहे हैं। NCPCR के अनुसार, “मदरसा तालीम भारत में बच्चों के शिक्षा के अधिकार में अड़ंगा डाल रही है। शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम या संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत इसका कोई संवैधानिक आधार नहीं है।”

दारुल उलूम देवबंद का प्रभाव: चरमपंथ का रास्ता?

NCPCR ने अपनी रिपोर्ट में मदरसों पर दारुल उलूम देवबंद के गहरे प्रभाव की बात कही है। NCPCR ने बताया है कि दारूल उलूम देवबंद को ‘शरिया की सख्त और रूढ़िवादी व्याख्या करने वाली विचारधारा’ बताया है। NCPCR ने आगे कहा कि तालिबान जैसे इस्लामी कट्टरपंथी समूह दारूल उलूम देवबंद की धार्मिक और राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित रहे हैं। तालिबान पर इनका प्रभाव उनके मदरसों से जुड़ाव के चलते है क्योंकि मदरसों में दारूल उलूम देवबंद का काफी असर है। NCPCR ने छात्रों पर इस कारण इस्लामी कट्टरपंथ की तरफ जाने का खतरा जताया है।

बच्चों को नहीं मिल रही औपचारिक शिक्षा, अधिकारों से भी हो रहे वंचित

NCPCR ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि मदरसा में पढ़ने वाले बच्चे शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE), 2009 के तहत मिलने वाले अधिकारों से भी वंचित हैं। मदरसे में पढ़ने वाले बच्चों को उच्च मानक वाली शिक्षा, मिड डे मील और अच्छे शिक्षकों तक पहुँच नहीं मिल रही।

NCPCR ने कहा कि RTE मानदंड पूरे ना होने के कारण मदरसे में पढ़ने वाले बच्चे बाक़ी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के बराबर अधिकार नहीं पा रहे। NCPCR ने इस बात पर भी चिंता जताई कि मदरसों के भीतर बच्चों को शारीरिक तौर पर दंड दिया जाता है। बच्चों को इन मदरसों के भीतर बताया जाता है कि इस्लाम ही सर्वोच्च है।

बच्चों का शारीरिक शोषण भी इन मदरसा में एक समस्या है, इसके कई मामले सामने आए हैं, आयोग ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चिंता जताई है। NCPCR ने कहा कि मदरसे अल्पसंख्यक संस्थान की श्रेणी में आते हैं और उन्हें संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15(1) से छूट प्राप्त है। यह दोनों कानून बच्चों में समानता और और उनके स्वस्थ तरीके से और स्वतंत्रता और सम्मान की स्थिति में विकसित होने के अवसर और सुविधाएँ देना सुनिश्चित करते हैं।

मदरसों में गैर-मुस्लिम छात्र

NCPCR ने यह भी खुलासा किया है कि इन मदरसा में बड़ी संख्या में गैर-मुस्लिम छात्र भी पढ़ते हैं। यह देश के संविधान के अनुच्छेद 28(3) का उल्लंघन है। इस्लामी शिक्षा देने वाले यह मदरसे किशोर न्याय अधिनियम 2015 की धारा 75 का उल्लंघन भी करते हैं। NCPCR ने तर्क दिया है कि यहाँ बच्चों को इस्लाम के अलावा भी और धर्म को मानने से रोका जाता है, इसीलिए यह किशोर न्याय अधिनियम की धरा 75 का उल्लंघन है।

मदरसों का सिलेबस भी चिंताजनक

NCPCR ने उन पुस्तकों का भी संज्ञान लिया है जिन्हें दारुल-उलूम-देवबंद द्वारा जारी किए गए फतवों के आधार पर बनाया गया है और मदरसों के पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया गया है। ऐसे ही एक फतवे में तक़्वियत-उल-ईमान नाम की एक किताब को प्रामाणिक स्रोत बताया गया है। चिंता की बात यह है कि इस किताब में इस्लाम पर काफी कट्टर विचार लिखे हुए हैं।

आयोग ने यह भी पाया है कि मदरसों में पढ़ाई जाने वाली कई किताबों में बताया जाता है कि इस्लाम ही सर्वोच्च है। इससे यह चिंताएँ बढ़ गई हैं कि मदरसों में बच्चों को एक विचार की तरफ झुकाया जा सकता है। इसके अलावा, NCPCR ने पाया कि मदरसों की कुछ किताबों में नाबालिगों के साथ अवैध संबंधों के बारे में भी बात की गई है। इससे चिंताएँ और गहरी हो गई हैं।

NCPCR ने कहा, “आयोग को दारुल उलूम देवबंद द्वारा जारी किए गए फतवों के बारे में शिकायतें मिली हैं, जिसमें ‘बहिश्ती ज़ेवर’ नामक पुस्तक के संदर्भ शामिल हैं। यहाँ यह बताना जरूरी है कि उक्त पुस्तक में बच्चों के संबंध में आपत्तिजनक और अवैध बाते लिखी गई हैं, इसमें नाबालिग बच्चों के साथ यौन संबंध बनाने सम्बन्धित बाते तक हैं। यह पुस्तक मदरसों में बच्चों को पढ़ाई जाती है और इस तरह की आपत्तिजनक जानकारी वाले अन्य फतवे भी उपलब्ध हैं।”

इस किताब को 2023 में NCPCR के नोटिस के बाद दारुल उलूम देवबंद की वेबसाइट से हटा दिया गया था। NCPCR को दारुल उलूम की वेबसाइट पर ‘गजवा-ए-हिन्द’ से सम्बन्धित भी फतवा मिला था। NCPCR ने कहा, “आयोग ने दारुल उलूम देवबंद की वेबसाइट पर मौजूद एक फतवे का संज्ञान लिया है जिसमें भारत पर आक्रमण (गजवा-ए-हिंद) के बारे में बात की गई है और कहा गया है कि जो कोई भी इसमें मारा जाएगा वह एक महान शहीद कहा जाएगा।”

संविधान का हो रहा दुरुपयोग

NCPCR ने बताया कि मदरसों द्वारा अपने कारनामों को सही ठहराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 29(2) का दुरुपयोग किया जा रहा है। आयोग ने कहा, “इस्लामिक शिक्षा देने के लिए पढ़ाने के लिए मदरसे प्राथमिक संस्थान हैं, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता।” NCPCR ने कहा कि संविधान में मदरसों को मिली छूट बच्चों को संतुलित और औपचारिक शिक्षा प्रदान करने के व्यापक संवैधानिक दायित्व के अनुरूप नहीं है। NCPCR ने कहा कि मदरसे संविधान में दी गई छूट का नाजायज फायदा उठा रहे हैं।

कोर्ट करे मदरसों की निगरानी

NCPCR ने अंजुम कादरी की याचिका को चुनौती दी है। कादरी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमे उसने जिसमें उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम 2004 को रद्द कर दिया था। आयोग ने कहा कि यह अधिनियम धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों और अनुच्छेद 14, 21 और 21ए के संवैधानिक जनादेश के खिलाफ है। गौरतलब है कि हाई कोर्ट के इस निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलनी चाहिए लेकिन लेकिन उपाय अधिनियम को रद्द करना नहीं है।

सिलाई-कढ़ाई सेंटर के नाम पर धर्मांतरण करवाती थी हिना, इस्लाम कबूल करने के लिए शौहर मुस्तफा बनाता था दबाव: अश्लील वीडियो वायरल करने की देते थे धमकी

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में सिलाई कढ़ाई सेंटर चलाने के नाम पर हिन्दू महिलाओं के धर्मान्तरण के रैकेट का पर्दाफाश हुआ है। यहाँ बुधवार (11 सितंबर 2024) को एक हिन्दू लड़की की शिकायत में सिलाई-कढ़ाई सेंटर चलानी वाली मुस्लिम महिला और उसके शौहर पर FIR दर्ज हुई है। आरोपित मियाँ-बीवी का नाम हिना और मुस्तफा हैं। शनिवार (14 सितंबर) को पुलिस ने बताया कि हिना और मुस्तफा को गिरफ्तार कर लिया गया है।

यह घटना मुरादाबाद के थानाक्षेत्र मूंढापाण्डे की है। यहाँ 11 सितंबर 2024 को एक हिन्दू लड़की ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है। पीड़िता ने बताया कि वह अपनी कुछ हिन्दू सहेलियों के साथ गाँव में ही हिना नाम की मुस्लिम महिला के घर सिलाई-कढ़ाई सीखने जाती थी। इन लड़कियों को सिखाते हुए हिना अक्सर अपने शौहर मुस्तफा को बुला लेती थी। आरोप है कि मुस्तफा इन लड़कियों को उल्टी-सीधी बातें कर के इस्लाम कबूल करने के लिए उकसाया करता था।

हिना का शौहर सेंटर में आई लड़कियों को अपने साथ खाना खाने का भी दबाव बनाया करता था। जब लड़कियाँ इंकार करती थीं तो मुस्तफा उनसे जिद किया करता था। इस दौरान वह पीड़िताओं से छींटाकशी भी करने लगा। 14 जून 2024 की सुबह लगभग 10 बजे पीड़िता को हिना अपने सेंटर में बंद कर के कहीं चली गई। इस दौरान मुस्तफा वहाँ आया और पीड़िता से अश्लील हरकतें करने लगा। अपनी करतूत की वीडियो भी मुस्तफा ने चोरी-छिपे बना डाली।

शिकायत में आगे बताया गया है कि 2 दिन बाद 16 जून को हिना ने भी पीड़िता का एक अश्लील वीडियो बनाया। इसी दिन हिना ने पीड़िता और उसकी सहेलियों पर बाहर से मँगाए पकौड़े खाने का दबाव बनाया। पीड़िता को कुछ साजिश का शक हुआ तो उसने मना कर दिया। तब हिना पीड़िता की अश्लील वीडियो वायरल करने की धमकी देने लगी। इसी के साथ पीड़िता पर इस्लाम कबूल करने का दबाव फिर से बनाया जाने लगा। इस से पीड़िता के साथ उसकी सहेलियाँ भी डर गईं।

हिन्दू लड़की ने अपनी शिकायत में अपने साथ किसी अनहोनी की आशंका जताई है। आरोपितों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की माँग की गई है। पुलिस ने शिकायत का संज्ञान लेते हुए हिना और मुस्तफा को नामजद करते हुए FIR दर्ज कर ली है। यह FIR भारतीय दंड संहिता (IPC) 342, 354 और 294 के साथ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म सम्परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत दर्ज हुई है।

ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। 14 सितंबर को मुरादाबाद पुलिस ने बताया कि हिना और मुस्तफा को गिरफ्तार कर लिया गया है। मामले में जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

मुंबई से हिरोइन को उठाकर विजयवाड़ा ले गई आंध्र पुलिस, माँ-बाप को भी किया जलील, अब 3 IPS हुए सस्पेंड: कौन हैं कादंबरी जेठवानी, जानिए क्या है पूरा मामला?

मुंबई की मॉडल और अभिनेत्री डॉक्टर कादंबरी जेठवानी को फर्जी केस में परेशान करने के आरोप में आंध्र प्रदेश सरकार ने तीन आईपीएस अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है। राज्य सरकार ने यह कार्रवाई अभिनेत्री द्वारा मिली शिकायत के बाद की।

मॉडल की शिकायत पर जिन अधिकारियों को निलंबित किया गया उनमें पूर्व खुफिया प्रमुख पी. सीताराम अंजनेयुलु (डीजी रैंक), पूर्व विजयवाड़ा पुलिस आयुक्त क्रांति राणा टाटा (महानिरीक्षक रैंक) और पूर्व पुलिस उपायुक्त विशाल गुन्नी (अधीक्षक रैंक) शामिल हैं।

अब कादंबरी को ये तीनों अधिकारी क्यों परेशान कर रहे थे इसे जानते हैं। दरअसल ये मामला इसी साल की शुरुआत से चर्चा में था, लेकिन इसे तूल कादंबरी की शिकायत के बाद मिला।

क्या था मामला

आंध्र प्रदेश में नायडू सरकार बनने के बाद कादंबरी ने अपनी शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने कहा था कि उन्होंने मुंबई में एक निगम के शीर्ष अधिकारी के खिलाफ केस दर्ज कराया था उस समय उन्हें धमकी देते हुए कहा गया था कि वो केस वापस लें वरना उन्हें गंभीर परिणाम भुगतना होगा।

बाद में वाईएसआर कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता और फिल्म निर्माता विद्यासागर ने फरवरी में उनके खिलाफ जालसाजी और जबरन वसूली का मामला दर्ज कराया । कादंबरी जेठवानी ने आरोप लगाया था कि शीर्ष पुलिस अधिकारियों ने विद्यासागर के साथ मिलकर उन्हें और उनके माता-पिता को परेशान किया, उन्हें गिरफ्तार किया और बिना किसी पूर्व सूचना के मुंबई से विजयवाड़ा ले गए। उन्होंने अपनी शिकायत में कहा कि उन्हें इतना समय भी नहीं मिला कि वो अपने लिए बेल ले पाएँ।

अभिनेत्री के अनुसार, केवल उन्हें ही नहीं बल्कि उनके माता-पिता को भी इस केस में फँसाया गया। उन्हें जलील किया गया और 40 दिन से ज्यादा समय तक न्यायिक हिरासत में रखा गया। रिहा होने के बाद जेठवानी ने इस संबंध में अपनी शिकायत दायर कराई और अब आंध्र प्रदेश की सरकार ने इस मामले में अपनी कार्रवाई की।

क्यों हुई तीनों आईपीएस कार्रवाई

कादंबरी जेठवानी की शिकायत पर राज्य सरकार ने जाँच की और पाया कि कादंबरी जेठवानी के खिलाफ एफआईआर 2 फरवरी को दर्ज की गई थी जबकि उन्हें गिरफ्तार करने के आदे 31 जनवरी को दे दिए गए थे। राज्य सरकार ने तीनों अधिकारियों को सस्पेंड करने का फैसला जारी करते हुए कहा कि मामले में अधिकारियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया साक्ष्य मौजूद हैं और उनके गंभीर कदाचार और कर्तव्य के प्रति लापरवाही के लिए अनुशासनात्मक कार्यवाही की आवश्यकता है।

कौन हैं कादंबरी जेठवानी

बता दें कि कादंबरी जेठवानी एक 28 साल की मॉडल और एक्ट्रेस हैं। उनका जन्म अहमदाबाद में हुआ था। उनके पिता नरेंद्र कुमार नेवी ऑफिसर थे वहीं माँ इकोनॉमिक्स में गोल्ड मेडलिस्ट रह चुकी हैं और रिजर्व बैंक में बतौर मैनेजर अपनी सेवा दे चुकी हैं।

कादंबरी की शिक्षा अहमदाबाद के नामी स्कूल जैसे प्रकाश हाईहर स्कूल, माउंट कैरामल हाई स्कूल और उद्गम स्कूल। पढ़ाई में अच्छा होने के कारण उन्होंने अहमदाबाद के मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई की। बाद में माँ के ट्रांसफर की वजह से उन्हें मुंबई आना पड़ा। यहाँ उनकी मुलाकात एक डायरेक्टर से हुई। उसने उन्हें बॉलीवुड में काम करने का मौका दिया। इसके बाद कादंबरी ने कन्नड़ की ओइजा, आटा (तेलुगु), आई लव मी (मलयालम) में रोल किया।

‘क्या राम मंदिर पर बुलडोजर चलेगा?’: कॉन्ग्रेस नेता ने रेप को अयोध्या के मंदिर से जोड़ा, सपा सांसद अवधेश प्रसाद के गुर्गों की कारस्तानी पर पार्टी को मार गया था लकवा

कॉन्ग्रेस नेता उदित राज राम मंदिर को ध्वस्त करना चाहते हैं। उन्होंने ‘X’ पर एक पोस्ट के जरिए अपनी हिन्दू विरोधी घृणा का प्रदर्शन किया है। अयोध्या में हुए एक बलात्कार के मुद्दे को लेकर उन्होंने ये प्रपंच चलाया है, जिसके बाद हिन्दू उन्हें तगड़ा जवाब दे रहे हैं। ‘Unorganized Workers and Employees Congress’ (KKC) के अध्यक्ष उदित राज ने लिखा, “अयोध्या में राम मंदिर में सफाईकर्मी के रूप में काम करने वाली युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ। क्या राम मंदिर पर भी बुलडोज़र चलेगा?”

बता दें कि उक्त घटना राम मंदिर में नहीं हुई है, इसके बावजूद बार-बार हिन्दू विरोधी इस घटना में राम मंदिर को घसीट रहे हैं। इस घटना पर त्वरित कार्रवाई करते हुए 8 आरोपितों को दबोचने में यूपी पुलिस ने सफलता पाई है। सहादतगंज निवासी वंश चौधरी मुख्य आरोपित है। पीड़िता पिछले 4 वर्षों से वंश को जानती थी। उसका कहना है कि वो घुमाने के बहाने कार से ले गया और उसने रेप किया। कार के एक डिवाइडर से टकराने पर पीड़िता को भागने का मौका मिल गया।

इसी घटना का इस्तेमाल उदित राज ने अपनी गंदी राजनीति के लिए किया है। उदित राज 2014 में भाजपा के टिकट पर सांसद बने थे लेकिन 2019 में उन्हें टिकट नहीं मिला तो वो कॉन्ग्रेस में आ गए। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें कॉन्ग्रेस ने टिकट दिया लेकिन AAP के समर्थन के बावजूद 2.90 लाख वोटों से हार गए। यूपी में अक्सर माफिया, बलात्कारियों और हत्यारों की अवैध संपत्ति पर बुलडोजर चलता है, ऐसे में उदित राज ने इसका विरोध करने के लिए ये तरीका अपनाया है।

हाल ही में अयोध्या में सपा नेता मोईद खान और उसके नौकर राजू खान द्वारा OBC निषाद समाज की एक लड़की के साथ गैंगरेप का मामला सामने आया था। वहीं सपा के एक अन्य नेता राशिद खान ने पीड़िता और उसके परिवार को जान से मार डालने की धमकी दी थी। इस पर उदित राज जैसे नेता चुप थे। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने तो DNA जाँच की माँग तक कर दी थी। उदित राज इससे पहले भी उलटे-सीधे बयानों के कारण चर्चा में रहे हैं।

लोकमान्य तिलक ने गणेश पूजा से हिंदुओं को किया एकजुट, इस्लामी कट्टरपंथियों ने धूलिया को दंगों की आग में जला दिया: 1895 से चलकर हम 2024 में पहुँचे, पर खत्म नहीं हुआ मुस्लिमों का उपद्रव

इस साल, हिंदू त्योहार गणेश चतुर्थी को लेकर देशभर में गणेश पूजा पंडालों पर मुस्लिम समूहों द्वारा कई हमलों की घटनाएँ सामने आईं। ऑपइंडिया ने उन घटनाओं को प्रकाशित किया है, जिसमें मुस्लिम समूहों ने छोटे बच्चों को भी शामिल किया और गणेश पंडालों, गणेश मूर्तियों और हिंदू भक्तों पर पत्थर फेंके।

गुजरात के सूरत में 2 मुस्लिम महिलाओं रुबाइना पठान और लाइमा शेख को उनके बच्चों को गणेश मूर्तियों पर हमला करने के लिए उकसाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। सूरत के लाल गेट क्षेत्र के वरियाली बाजार में कुछ मुस्लिम किशोरों ने गणेशोत्सव पंडाल पर पत्थर फेंके। कच्छ जिले में, मुस्लिमों ने भगवान गणेश की मूर्ति ले जा रहे हिंदू युवाओं पर हमला किया। 7 सितंबर को, मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के मोचीपुरा में भगवान गणेश की मूर्ति पर पत्थर फेंके गए। कर्नाटक के नागामंगला में, एक मुस्लिम भीड़ ने गणपति विसर्जन जुलूस पर पत्थरबाजी की, क्योंकि हिंदू उत्सव मनाते हुए दरगाह के सामने कुछ मिनटों के लिए डांस करते रहे।

हिंदुओं के त्योहारों पर हमलों की यह कोई नई प्रवृत्ति नहीं है। हर साल, गणेशोत्सव, राम नवमी या हनुमान जयंती जैसे त्योहारों पर हिंदू जुलूसों पर इस्लामी कट्टरपंथी समूहों द्वारा हमले किए जाते हैं। हालाँकि इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं से नफरत एक प्रचलित तथ्य है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि गणेश पूजा पर मुस्लिम समूहों द्वारा पहला हमला 1895 में धुलिया, महाराष्ट्र में हुआ था? धुलिया दंगे की घटना से पहले, यह देखना महत्वपूर्ण है कि मुस्लिमों ने हिंदुओं पर हमले के लिए कितने तुच्छ बहानों का इस्तेमाल किया और गणेशोत्सव कैसे लोकप्रिय हुआ।

1895 धूलिया हमला: मुस्लिम भीड़ ने गणेश विसर्जन पर किया आक्रमण

साल 1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने हिंदुओं को एकजुट करने के लिए गणेशोत्सव को सार्वजनिक रूप से मनाने की परंपरा शुरू की। इसका उद्देश्य हिंदू समाज को एकत्रित करना और सामाजिक एकता को बढ़ावा देना था। लेकिन धूलिया में गणेश विसर्जन के दौरान मुस्लिम भीड़ द्वारा किए गए हमले ने लोकमान्य तिलक की हिंदुओं को संगठित करने की कोशिशों को झकझोर कर रख दिया। इस घटना में ब्रिटिश पुलिस की गोलीबारी और बढ़ते सांप्रदायिक तनाव ने इतिहास में धर्म के आधार पर संघर्ष को और भड़काया, जिससे हिंदू-मुस्लिम संघर्ष की लंबी कड़ी शुरू हुई। धूलिया में गणेश विसर्जन के दौरान मुस्लिम भीड़ द्वारा किए गए हमलों ने इस धार्मिक और सांप्रदायिक संघर्ष को भड़का दिया।

साल1895 में महाराष्ट्र के धूलिया में गणेश विसर्जन के समय इस्लामवादी भीड़ ने हिंदुओं पर हमला किया। यह हमला तब हुआ जब हिंदू गणेश प्रतिमा के विसर्जन के लिए निकले थे और उनकी यात्रा शाही जामा मस्जिद के पास से गुजर रही थी। जैसे ही जुलूस मस्जिद के पास पहुँचा, मुस्लिम समुदाय ने विरोध जताया और हिंसा शुरू कर दी। ब्रिटिश पुलिस ने इस घटना के दौरान भीड़ पर गोली चलाई, जिसमें कई लोग मारे गए।

इस हमले के बाद उस स्थान पर स्थित गणेश मंदिर को “खूनी गणपति मंदिर” के रूप में जाना जाने लगा और मस्जिद को “खूनी मस्जिद” कहा जाने लगा। यह घटना इस्लामवादी आक्रमणों के इतिहास में पहला ज्ञात हमला था, जो हिंदू धार्मिक प्रक्रिया पर हुआ। इस घटना ने हिंदू-मुस्लिम तनाव को और बढ़ा दिया और इसे सांप्रदायिक संघर्ष का प्रतीक बना दिया।

इस घटना ने तिलक के अभियान को और भी मजबूत किया। तिलक ने गणेश उत्सव को न केवल धार्मिक उत्सव, बल्कि हिंदू समाज को संगठित करने और उन्हें आत्मरक्षा के लिए प्रेरित करने का साधन बनाया। उन्होंने इस घटना के बाद हिंदुओं को और भी बड़े पैमाने पर संगठित करना शुरू किया ताकि सांप्रदायिक हिंसा का सामना किया जा सके।

1893 बॉम्बे दंगे: गणेशोत्सव की प्रेरणा

1893 में मुंबई में भी इसी तरह के दंगे हुए थे, जब हिंदुओं द्वारा हनुमान मंदिर में संगीत बजाया जा रहा था। मुस्लिम भीड़ ने इसे नमाज के दौरान “विघ्न” का कारण बताया और हिंसा भड़क उठी। इन दंगों ने हिंदू समाज को गहरे सांप्रदायिक विभाजन का अनुभव कराया और तिलक को हिंदुओं को संगठित करने के लिए गणेशोत्सव की प्रेरणा दी।

गणेशोत्सव की परंपरा हिंदू समाज के लिए उत्सव का माध्यम बन गई, लेकिन इस्लामवादी गुट इसे अपनी धार्मिक पहचान के लिए खतरा मानते थे। उन्हें गणेश उत्सव से विशेष रूप से आपत्ति थी क्योंकि यह हिंदुओं को संगठित कर रहा था और उनकी संख्या और सांस्कृतिक शक्ति को बढ़ावा दे रहा था।

1992 में धूलिया दंगे

साल 1895 की घटना के बाद, 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भी धूलिया में सांप्रदायिक तनाव भड़का। हजारों मुस्लिमों ने हिंदू घरों पर हमला किया और उन्हें नुकसान पहुँचाया। यह घटना गणेश उत्सव के दौरान मुसलमानों द्वारा हिंदू धार्मिक आयोजनों पर हमले के पैटर्न का एक और उदाहरण थी।

2024 तक, गणेश विसर्जन के दौरान इस्लामवादी हमले एक सामान्य घटना बन चुके हैं। कई स्थानों पर, जैसे गुजरात, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में, मुस्लिम गुटों द्वारा हिंदुओं पर हमला किया गया, जब वे अपने धार्मिक जुलूस निकाल रहे थे। खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में ऐसे जुलूसों पर हमला किया जाता है, जिससे सांप्रदायिक तनाव और बढ़ता है।

साल 1895 से लेकर आज तक, गणेश उत्सव, राम नवमी, हनुमान जयंती जैसे हिंदू धार्मिक जुलूस मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में हमेशा से तनाव का कारण बने रहे हैं। यह सांप्रदायिक संघर्ष की जड़ें इतिहास में गहरी हैं, जब इस्लामवादी गुट हिंदू धार्मिक आयोजनों पर अपनी असहमति और असंतोष प्रकट करते रहे हैं।

गणेशोत्सव और हिंदू पुनरुत्थान

लोकमान्य तिलक का उद्देश्य गणेशोत्सव के माध्यम से हिंदुओं को धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से संगठित करना था। इस उद्देश्य को आज भी पूरा किया जा रहा है, जहाँ गणेश उत्सव केवल भगवान गणेश की पूजा का पर्व नहीं है, बल्कि यह हिंदू एकता और पुनरुत्थान का प्रतीक बन गया है। 1895 के धूलिया हमले से लेकर वर्तमान तक, गणेश उत्सव पर मुस्लिम आक्रामकता का इतिहास हिंदू-मुस्लिम संबंधों के तनाव का प्रतीक है। यह संघर्ष आज भी जारी है, जहाँ हिंदू धार्मिक आयोजनों पर हमले हो रहे हैं, लेकिन तिलक की तरह हिंदू समाज को संगठित करने का प्रयास भी जारी है।

इतिहास से लेकर वर्तमान तक, गणेश विसर्जन पर हुए हमले यह साबित करते हैं कि धार्मिक असहिष्णुता का संघर्ष लंबे समय से चला आ रहा है। ऐसे में हिंदू समाज को संगठित और मजबूत बनाने के लिए गणेश उत्सव जैसे आयोजनों का महत्व और भी बढ़ जाता है, जो तिलक के दृष्टिकोण को साकार करते हैं।

मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में प्रकाशित किया गया है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

सरकारी कॉलेज के हॉस्टल में 7 छात्रों ने पकाया ‘बीफ, किए गए निष्कासित, बजरंग दल-VHP ने की FIR की माँग: ओडिशा के बहरामपुर की घटना

ओडिशा के बहरामपुर के एक सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल में कथित तौर पर ‘बीफ’ पकाने वाले 7 छात्र निष्कासित कर दिए गए। उनकी शिकायत छात्रों के एक दूसरे समूह ने कॉलेज प्रशासन को दी। मामले में विश्व हिन्दू परिष और बजरंग दल ने भी प्रदर्शन किया। इसके बाद कॉलेज ने यह एक्शन लिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बहरामपुर के परला महाराज इंजीनियरिंग कॉलेज के 7 छात्रों को हॉस्टल से निकाले जाने का आदेश कॉलेज प्रशासन ने दिया है। आरोप है कि बुधवार (11 सितम्बर, 2024) की रात को इन लोगों ने एक कमरे में ‘बीफ’ पकाया और खाया। बीफ पकाने वालों की इस हरकत पर हॉस्टल में रहने वाले दूसरे छात्र गुस्सा गए और उन्होंने इसकी शिकायत की।

बताया गया कि शिकायत करने वाले छात्रों ने कहा था कि बीफ पकाने के कारण बाकी छात्रों को समस्या हुई है। शिकायत करने वाले छात्रों ने कहा कि बीफ पकाने वालों ने उनकी भावनाओं का ख्याल नहीं रखा। उन्होंने इस मामले में सख्त कार्रवाई की माँग की थी।

यह शिकायत कॉलेज के छात्र कल्याण मामलों के डीन से की गई। इसके बाद डीन ने 7 छात्रों को हॉस्टल से निष्कासन का आदेश दिया। डीन के आदेश में कहा गया कि यह छात्र प्रतिबंधित गतिविधियों में संलिप्त थे। डीन के आदेश में कहा गया कि इन छात्रों ने नियमों का उल्लंघन किया है।

डीन के आदेश से निष्कासित किए जाने वाले 7 छात्रों में से 6 अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। एक छात्र पर ₹2000 का जुर्माना लगाए जाने की बात भी सामने आई है। कॉलेज प्रशासन ने यह स्पष्ट नहीं किया कि छात्रों को बीफ खाने के कारण ही निकाला गया है। कॉलेज प्रशासन ने इसका जिक्र निष्कासन के नोटिस में भी नहीं दिया।

इस मामले में स्थानीय विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने भी इस मामले में शिकायत की है। VHP और बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि हॉस्टल के अंदर बीफ पकाया गया था, वह इस मामले में कॉलेज प्रशासन से मिले हैं। उन्होंने छात्रों पर FIR की माँग भी की है।

मामले में पुलिस के पास भी शिकायत पहुँची है। पुलिस की एक टीम ने हॉस्टल में जाकर जायजा भी लिया है। कथित तौर पर बीफ खाने वालों छात्रों ने ने पुलिस को बताया कि वह एक शादी से बकरे का मीट लाए थे और खाया था। पुलिस ने कहा है कि यह स्पष्ट नहीं है कि छात्रों ने क्या खाया। हॉस्टल में तनाव को रोकने के लिए पुलिसबल तैनात है।

‘₹290 करोड़ की वंदे भारत पर ₹436 करोड़ खर्च कर रही मोदी सरकार’: TMC सांसद के झूठ का रेल मंत्रालय ने किया पर्दाफाश, ट्रेन का पूरा गणित समझाया

मोदी सरकार को घेरने के लिए विपक्ष के नेता अक्सर झूठ फैलाते हैं। इस बार उन्होंने ये झूठ वंदे भारत स्लीपर ट्रेन को बनाने में लग रही लागत को लेकर फैलाया है। सोशल मीडिया पर बताया जा रहा है कि मोदी सरकार ने वंदे भारत स्लीपर ट्रेन बनाने के लिए ₹58,000 करोड़ के कॉन्ट्रैक्ट को संशोधित किया है और इस फैसले से जहाँ पहले एक ट्रेन की कीमत दुगनी बढ़ गई है। संदेश में ये भी पूछा जा रहा है कि आखिर कौन सा कॉन्ट्रैक्टर है जिसे मोदी सरकार फायदा पहुँचाने के लिए ये सब कर रही है।

इस स्क्रीनशॉट को साझा करते हुए राज्यसभा सांसद साकेत गोखले ने भी ट्वीट किया। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, पहले जिस ट्रेन की लागत ₹290 करोड़ थी, अब उसकी लागत ₹436 करोड़ होगी। यह केवल AC कोच वाली ट्रेन है, जिसे गरीब लोग वहन नहीं कर सकते। उन्होंने आगे पूछा, वंदे भारत अनुबंध में 50% लागत वृद्धि से किसे लाभ हो रहा है।

इसी तरह अन्य यूजर अमीना ने भी एक स्क्रीनशॉट शेयर किया और अपने ट्वीट में लिखा कि राफेल घोटाला के बाद अब वंदे भारत का एक नया घोटाला सामने आया है घोटाले की कुल कीमत 19430 करोड़ हो सकती है।

अब इन्हीं दावों के वायरल होने के बाद रेल मंत्रालय ने इस मामले पर खुद संज्ञान लिया। उन्होंने साकेत गोखले के ट्वीट पर जवाब देते हुए कहा, “कृपया गलत सूचना और फर्जी खबरें फैलाना बंद करें। कोच की संख्या से गुणा की गई प्रति कोच लागत, ट्रेन की लागत के बराबर होती है।”

आगे साफ-साफ बताया गया कि स्लीपर परियोजना में, पूरे प्रोसेस में पारदर्शिता के कारण प्रति कोच लागत सभी बेंचमार्क से कम है। हमने लंबी ट्रेनें बनाने के लिए कोचों की संख्या 16 से बढ़ाकर 24 कर दी है, जबकि कॉन्ट्रैक्ट में कुल कोचों की संख्या स्थिर रखी गई है। ऐसा सिर्फ ट्रेन में सफर करने की बढ़ रही डिमांड के कारण किया गया है।

ट्वीट में बताया गया कि पहले 200 ट्रेन, 16 कोच के साथ थीं यानी 3200 कोच के साथ। वहीं संशोधन के बाद 133 ट्रेन बनेंगी 24 कोच के साथ यानी कुल कोच होंगे 3192। रेल मंत्रालय ने कोच की संख्या साझा करते हुए बताया कि असलियत में कॉन्ट्रैक्ट की कीमत बढ़ी नहीं बल्कि घटी है क्योंकि ट्रेन की लेंथ बढ़ा दी गई है।

टीएमसी सांसद द्वारा फैलाए गए झूठ का पर्दाफाश होने के बाद लोग कह रहे हैं कि इस तरह फर्जी खबर फैलाने के आरोप में रेल मंत्रालय को सांसद पर केस करना चाहिए ताकि सबक मिले और आगे कोई आधी-अधूरी देकर भ्रमित न करे।