Home Blog Page 669

झारखंड के 6 जिलों में 13%, 2 जिलों में 35% बढ़े मुस्लिम: घुसपैठ-धर्मांतरण से बदल रही डेमोग्राफी, पूर्व CM बोले- राज्य में 7% घटे हिंदू

झारखंड के संथाल परगना में हो रहा डेमोग्राफिक बदलाव इस समय राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। हाल में केंद्र सरकार ने इलाके में हो रहे जनसांख्यिकी बदलाव से संबंधित हाई कोर्ट में एक जवाब दाखिल किया जिसमें चौंकाने वाले खुलासे हुए।

केंद्र द्वारा दिए गए जवाब से पता चला कि कैसे संथाल परगना के साहिबगंज, पाकुड़, दुमका, गोड्डा व जामताड़ा समेत 6 जिलों से 16 फीसदी (44% से 28%) जनजातीय समुदाय के लोग घटे हैं जबकि मुस्लिमों की आबादी में 13% की वृद्धि हुई है और दो जिले- साहिबगंज और पाकुड़ में तो इनकी संख्या 35% बढ़ी है।

कैसे उठा डेमोग्राफी बदलाव का मामला

राज्य में होते इस बदलाव के पीछे पलायन, घुसपैठ और धर्मांतरण को कारण माना जा रहा है। वहीं इसका समाधान सिर्फ और सिर्फ एनआरसी को कहा जा रहा है। पहले इस मामले में सोमा उरांव द्वारा जनहित याचिका के जरिए जनजातीय समुदाय के लोगों के धर्म परिवर्तन का मामला उठाया गया था। वहीं बाद में दानियाल दानिश ने जनहित के जरिए बांग्लादेशी घुसपैठियों के घुसने का मुद्दा उठाया था। इन लोगों की चिंता संथाल परगना में हो रहा डेमोग्राफिक बदलाव था। प्रार्थियों ने ये भी बताया था कि कैसे घुसपैठियों को प्रवेश देने के लिए इलाकों में सिंडिकेट काम कर रहा है जो उन्हें आधार कार्ड बनाकर देता है।

इस गंभीर मसले के कोर्ट में पहुँचने के बाद छह जिलों के डिप्टी कमीशनर ने कोर्ट को बताया था कि उनके क्षेत्रों में घुसपैठ समस्या नहीं है। हालाँकि कोर्ट ने उन्हें आगाह कर दिया था कि अगर ये जानकारी झूठ निकली तो वो उनके खिलाफ कोर्ट की अवमानना का केस चलाएँगे।

केंद्र का कहना है कि राज्य में घुसने वाले घुसपैठियों के खिलाफ संविधान के तहत कार्रवाई के अधिकार राज्य सरकार को दिए गए हैं। इसके लिए एक समिति राज्य सरकार के पास है। अगर राज्य को भी इस बाबत सहायता चाहिए तो केंद्र देने को तैयार है।

पूर्व CM ने जनता को किया आगाह

गौरतलब है कि इस मामले की सुनवाई कोर्ट में अब 17 सितंबर को होगी, लेकिन उससे पहले झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे को जनता के समक्ष उठाया है। उन्होंने 12 सितंबर को जामताड़ा के यज्ञ मैदान में जनआक्रोश रैली की। उन्होंने समझाया कि कैसे इस डेमोग्राफी बदलाव से सरकारी क्षेत्रों में अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए आरक्षित सीटों पर प्रभाव पड़ेगा। अगर क्षेत्र में आबादी कम होगी तो लोकसभा, विधानसभा, सरकारी नौकरी हर जगह आबादी कम होगी।

उन्होंने बताया कि 1951 के जनगणना के अनुसार, झारखंड में जनजातीय समुदाय की आबादी 36% थी, जो 2011 की जनगणना में घटकर 26% हो गई है। वहीं मुसलमानों की आबादी 9% से बढ़कर लगभग 14.5% तक जा पहुँची है। इसी दरम्यान हिंदुओं की आबादी भी लगभग 7% घटकर, 88% से 81% पर पहुँच गई है। उन्होंने आँकड़े देकर समझाया कि झारखंड में जनजातीय, हिंदू की आबादी घट रही है और उसी अनुपात में मुसलमानों की आबादी बढ़ रही है।

पंजाब के गाँवों में UP-बिहार के श्रमिकों को प्रवेश की अनुमति नहीं, खुद जा रहे कनाडा या बन रहे ईसाई: एक ऐसी त्रासदी जिस पर कम होती है चर्चा

पंजाब में प्रवासी मजदूरों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार की समस्या गंभीर रूप ले चुकी है। उत्तर प्रदेश और बिहार से आए प्रवासी मजदूरों को गाँवों में काम करने की अनुमति नहीं दी जा रही है। वहीं, दूसरी तरफ, स्थानीय लोग ईसाई धर्म अपना रहे हैं या विदेशों, विशेषकर कनाडा में बसने का रास्ता तलाश रहे हैं। यह पंजाब की एक अनकही त्रासदी है, जिस पर बहुत कम लोग बात करना चाहते हैं।

प्रवासी मजदूरों के खिलाफ बढ़ता भेदभाव

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता चरणजीत सिंह चन्नी ने तीन साल पहले उत्तर प्रदेश और बिहार से आने वाले प्रवासी मजदूरों को अपमानजनक अर्थ में “भैया” कहा था। हालाँकि तीखे विरोध के बाद उन्हें माफी माँगनी पड़ी। लेकिन लगाई आग अब पंजाब के अंदर धधकने लगी है। ऐसा ही एक मामला आया है मोहाली से, जहाँ एक गाँव से प्रवासी मजदूरों को भगाया जा रहाहै। यही नहीं, कई गाँवों में प्रवासी मजदूरों के लिए 11 ‘प्रतिबंधों’ वाले बोर्ड लगाए गए हैं।

आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब के मोहाली जिले के साहिबज़ादा अजीत सिंह नगर के अंतर्गत आने वाले जंदपुर गाँव में प्रवासी मजदूरों को घर किराए पर लेने की अनुमति नहीं है। गाँव में उनके लिए 11 तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं, जिनमें रात 9 बजे के बाद बाहर जाने पर प्रतिबंध, धूम्रपान और तंबाकू चबाने पर पाबंदी, और उनके कपड़ों को लेकर सख्त नियम शामिल हैं। गाँव के गुरुद्वारा कमेटी ने यह फैसला लिया कि प्रवासी मजदूर अब गाँवों में नहीं रह सकते।

मामले की शुरुआत और कानूनी दखल

इस साल अगस्त में मुंडो संगतियान गाँव से प्रवासी मजदूरों को निकालने का सिलसिला शुरू हुआ। जब मजदूरों को काम से निकालकर गाँव से बाहर कर दिया गया, तो यह मामला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट तक पहुँचा। वैभव वत्स नामक एक व्यक्ति ने प्रवासी मजदूरों को अवैध रूप से निकालने के खिलाफ याचिका दायर की, जिससे यह मामला कानूनी चर्चा में आ गया।

स्थानीय लोगों का क्या है कहना?

गाँव के लोग आरोप लगाते हैं कि प्रवासी मजदूर गांव में गंदगी फैलाते हैं और सड़कों पर अर्धनग्न होकर घूमते हैं, जिससे महिलाओं को असुविधा होती है। उनका यह भी कहना है कि प्रवासियों के आने से अपराध दर में वृद्धि हुई है। पंचायत सदस्य चरणजीत सिंह ने तो यहाँ तक आरोप लगाया कि प्रवासी मजदूर कई स्थानीय नाबालिग लड़कियों को भगाकर ले गए हैं।

प्रवासी मजदूरों की दिक्कतें

दूसरी तरफ, प्रवासी मजदूरों का कहना है कि वे अपनी मेहनत से पैसे कमाते हैं, लेकिन उन्हें यहां सम्मान नहीं मिलता। मजदूरों को “भैया” कहकर अपमानित किया जाता है और उनके सांवले रंग के कारण उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता है। कई प्रवासी मजदूर अब पंजाब छोड़ने का मन बना चुके हैं क्योंकि उन्हें यहां असुरक्षित महसूस हो रहा है।

धर्मांतरण और विदेश जाने की होड़

आजतक की एक रिपोर्ट के अनुसार, जंदपुर गाँव में कई बैनर लगे हैं, जिनमें कनाडा, अमेरिका और पोलैंड जैसे देशों के वीज़ा की जानकारी दी गई है। इसके अलावा, चर्च ऑफ ग्लोरी एंड विजडम के ‘पैगंबर’ बजिंदर सिंह की प्रशंसा वाले बोर्ड भी लगे हैं, जिनमें दावा किया गया है कि उनके आशीर्वाद से तुरंत वीज़ा मिल सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, यहां एक धर्मांतरण लॉबी काम कर रही है, जो युवाओं को ईसाई धर्म अपनाने और विदेश जाने के लिए प्रेरित करती है।

पुलिस की कार्रवाई और नए नियम

प्रवासी मजदूरों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस सत्यापन अनिवार्य कर दिया गया है। उन्हें किराए पर जगह देने वाले मकान मालिकों को डस्टबिन उपलब्ध कराने होंगे और एक कमरे में दो से अधिक मजदूर नहीं रह सकते। मजदूरों पर किसी भी प्रकार की अवैध गतिविधियों में शामिल होने पर मकान मालिक को जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

पंजाब में प्रवासी मजदूरों के खिलाफ बढ़ता भेदभाव और स्थानीय लोगों द्वारा धर्मांतरण या विदेश जाने की होड़ एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। इससे न केवल प्रवासी मजदूरों के जीवन पर प्रभाव पड़ रहा है, बल्कि समाज में भी असंतुलन पैदा हो रहा है। यह जरूरी है कि इस मामले को गंभीरता से लिया जाए और समाज के सभी वर्गों के लिए एक सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण सुनिश्चित किया जाए।

यह समाचार मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

सड़क पर उतरे हिंदू तो जागा मंडी प्रशासन, नगर निगम ने अवैध मस्जिद गिराने का दिया आदेश: PWD की जमीन पर कब्जा, बिना अनुमति बना ली 2 मंजिल

शिमला के संजौली में मस्जिद के अवैध निर्माण के विरुद्ध प्रदर्शन के बाद अब हिमाचल प्रदेश के अलग-अलग शहरों में अवैध रूप से बनाई गई मस्जिदों की जानकारी सामने आने लगी है। इसी कड़ी में मंडी में बनी अवैध मस्जिद के विरोध में भी हिन्दू समाज उतर आया है। हिमाचल प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार ने शिमला के बाद मंडी में भी हिन्दुओं के प्रदर्शन पर वाटर कैनन चलाए हैं।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि बिना कोई अनुमति लिए ही मंडी के जेल रोड पर यह मस्जिद बना दी गई। इसके लिए अवैध रूप से लोक निर्माण विभाग (PWD) की जमीन भी कब्जा कर ली गई। इसके अलावा इस मस्जिद में तेजी से दो अतिरिक्त मंजिलों का निर्माण भी हो गया।

मंडी की इस मस्जिद में हुए अवैध निर्माण को तोड़ने का आदेश शुक्रवार (13 सितम्बर, 2024) को मंडी नगर निगम ने दिया है। इस मामले में कई बार सुनवाई हो चुकी है। मंडी नगर निगम ने कहा है कि मस्जिद की ऊपरी दो मंजिल गिरा दी जाएँ। नगर निगम के आयुक्त ने यह निर्णय दिया है। उन्होंने कब्जे की बात को सही माना है।

नगर निगम ने पाया है कि इस मस्जिद पर अतिरिक्त दो मंजिल बनाने के लिए कोई अनुमति नहीं थी। इसका नक्शा भी नहीं पास करवाया गया था। साथ ही यहाँ पर निर्माण के लिए PWD की मंजूरी भी नहीं ली गई थी। मस्जिद की चारदीवारी भी अवैध रूप से बनाई गई थी।

संजौली में बनाई गई अवैध मस्जिद के विवाद के उठने के बाद स्थानीय लोगों ने मंडी की इस मस्जिद का भी मुद्दा उठाया। इस मस्जिद के विरोध में शुक्रवार (13 सितम्बर, 2024) को स्थानीय लोगों ने बड़ी संख्या में प्रदर्शन भी किया। उन्होंने रोकने के लिए सुक्खू सरकार ने पानी की बौछारें भी चलाई। पुलिस प्रशासन ने यहाँ धारा 163 लगा रखी थी।

पुलिस की कार्रवाई के कारण कुछ लोगों की तबियत बिगड़ने की भी सूचना है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि मस्जिद का एक हिस्सा अवैध बताया जा रहा है जबकि पूरी मस्जिद ही अवैध है। वह इस पर कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। वहीं नगर निगम ने इसी दौरान फैसला देते हुए मस्जिद सीज करने की बात कही है।

नगर निगम ने मस्जिद कमिटी को गिराने की कार्रवाई के विरुद्ध 30 दिन का समय अपनी आपत्ति दर्ज करवाने के लिए भी दिया है। नगर निगम का फैसला आने से पहले ही मंडी में मुस्लिम समुदाय ने मस्जिद का एक हिस्सा तोड़ दिया। यह कार्रवाई गुरुवार को हुई। मस्जिद की चारदीवारी समेत शौचालय भी तोड़ दिए गए।

मस्जिद कमिटी ने माना कि उन्होंने इसकी दीवार PWD की जमीन पर बनाई थी और इसीलिए अब इसे तोड़ रहे हैं। मस्जिद के आसपास भी बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात हैं। मंडी के डीसी ने लोगों से अपील की है कि वह शान्ति बनाएँ रखें।

गौरतलब है कि इससे पहले राजधानी शिमला के संजौली इलाके में अवैध रूप से बनाई गई मस्जिद को लेकर हिन्दुओं का प्रदर्शन हुआ था। इस पर सुक्खू सरकार ने लाठियाँ भी बरसाईं थी। हालाँकि, यह मस्जिद तोड़ने का प्रस्ताव कमिटी ने स्वयं दे दिया था। उन्होंने माना था कि मस्जिद का निर्माण अवैध रूप से हुआ है।

अमेरिका ने चीनी कंपनियों सहित 5 संस्थाओं और 1 व्यक्ति पर लगाया प्रतिबंध: पाकिस्तान की लंबी दूरी की बैलेस्टिक मिसाइल के विकास में कर रहे थे मदद

पाकिस्तान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम के खिलाफ अमेरिका ने बड़ा कदम उठाया है। उसने पाकिस्तान के इस कार्यक्रम में मदद एवं उपकरणों की आपूर्ति करने वाली पाँच कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिया है। इन कंपनियों में चीन की भी कई कंपनियाँ हैं। इसके अलावा, अमेरिका ने एक व्यक्ति पर भी प्रतिबंध लगाया है, जो मिसाइलों के प्रसार में संलिप्त रहा है।

गुरुवार (12 सितंबर 2024) को इसकी घोषणा करते हुए अमेरिकी विदेश के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने कहा कि पाकिस्तान के खिलाफ उनका सख्त रवैया बरकरार है। मंत्रालय के आदेश में विशेष तौर पर बीजिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑटोमेशन फॉर मशीन बिल्डिंग इंडस्ट्री (RIAMB) को नामित किया गया है। यह कंपनी सामूहिक विनाश के हथियार और उनके वितरण का काम करती है।

RIAMB ने पाकिस्तान के राष्ट्रीय विकास परिसर (NDC) के साथ काम किया है। NDC के बारे में अमेरिका का मानना है कि वह पाकिस्तान की लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों के विकास और उत्पादन में शामिल है। मैथ्यू मिलर ने कहा कि RIAMB ने पाकिस्तान की मिसाइल शाहीन-3 और अबाबील प्रणालियों से जुड़े उपकरणों में पाकिस्तान की मदद की है।

इस कंपनी ने पाकिस्तानी मिसाइल कार्यक्रम के लिए रॉकेट मोटर्स के परीक्षण हेतु उपकरण खरीदने में उसकी मदद की। मैथ्यू मिलर ने आगे कहा, “ये प्रतिबंध इसलिए लगाए जा रहे हैं, क्योंकि इन संस्थाओं और व्यक्तियों ने जानबूझकर मिसाइल टेक्नोलॉजी को ट्रांसफर किया, जिन पर रोक लगी है।”

इसके साथ ही चीन की हुबेई हुआचांगडा इंटेलिजेंट इक्विपमेंट कंपनी, यूनिवर्सल एंटरप्राइज और शीआन लोंगडे टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट कंपनी के साथ-साथ पाकिस्तान स्थित इनोवेटिव इक्विपमेंट पर भी बैन लगाया है। इस प्रतिबंध में एक चीनी नागरिक को भी शामिल किया गया है, इस व्यक्ति पर आरोप है कि उसने चीन को उपकरण पहुँचाने में मदद की है।  

अमेरिका ने साफ तौर पर कहा कि पाकिस्तान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोजेक्ट के खिलाफ उसकी कार्रवाई जारी रहेगी, चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने से संचालित क्यों ना हो रही हो। वहीं, चीन ने अमेरिका द्वारा लगाए गए इन प्रतिबंधों का विरोध किया है। हालाँकि, इस संबंध में अभी पाकिस्तान की ओर से कोई बयान नहीं आया है।”

अमेरिका स्थित चीनी दूतावास के प्रवक्ता लियू पेंग्यू ने इन प्रतिबंधों पर कहा, “चीन इस तरह की एकतरफा प्रतिबंधों का दृढ़ता से विरोध करता है। इस तरह के प्रतिबंध का अंतरराष्ट्रीय कानून या यूएस सुरक्षा परिषद के प्राधिकरण में कोई आधार नहीं है। बीजिंग हमेशा चीनी कंपनियों और लोगों के हितों की दृढ़ता से रक्षा करेगा।”

इसके पहले भी अमेरिका ने पाकिस्तान की मिसाइल कार्यक्रम में मदद देने वाली चार संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाया था। इन संस्थाओं ने बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम से जुड़ी चीजों की सप्लाई की थी। जिन संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाया गया था, उनमें बेलारूस का मिन्स्क व्हील ट्रैक्टर प्लांट शामिल है। इस कंपनी पर आरोप है कि उसने मिसाइल प्रोग्राम के लिए विशेष वाहन चेसिस की आपूर्ति की है। 

यह प्रतिबंध 2005 के कार्यकारी आदेश पर आधारित हैं, जो सामूहिक विनाश के हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए बनाया गया था। बता दें कि घातक हथियारों के प्रसार से संबंधित एमटीसीआर भारत सहित 35 सदस्यों का एक अंतरराष्ट्रीय समूह है, जो परमाणु हथियारों की वितरण प्रणाली को सीमित करके उनके प्रसार को रोकने के लिए काम करता है।

अमृतपाल के रिश्तेदारों के 14 ठिकानों पर NIA ने मारा छापा, जेल में बंद है खालिस्तान समर्थक सांसद: दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स एजेंसी ने किए जब्त

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने शुक्रवार (13 सितंबर 2024) की सुबह खडूर साहिब से खालिस्तान समर्थक निर्दलीय सांसद अमृतपाल सिंह के रिश्तेदरों के घरों में रेड डाली। यह रेड अमृतसर, गुरुदासपुर, मोंगा, जालंधर सहित पंजाब 14 अलग-अलग ठिकानों पर छापेमारी की। अमृतपाल अलगाववादी खालिस्तानी संगठन ‘वारिस पंजाब दी’ का सुप्रीमो भी है और फिलहाल असम की डिब्रूगढ़ की जेल में बंद है।

NIA की टीम अमृतसर के रईया में फेरोमन रोड पर स्थित अमृतपाल सिंह के चाचा प्रगट सिंह के घर भी पहुँची। टीम ने प्रगट सिंह की पत्नी को हिरासत में लिया है। उन्हें ब्यास थाने लाकर पूछताछ की जा रही है। प्रगट सिंह के चाचा फर्नीचर का काम करते हैं। दूसरी रेड अमृतसर में सठियाला के पास बुटाला गाँव में अमृतपाल के जीजा के घर हुई।

भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, उसके जीजा के जीजा के घर में दबिश दी गई। मोगा में हल्का बाघापुराना के कस्बा स्मालसर में कविश्री मक्खन सिंह मुसाफिर के घर भी सुबह 6 बजे NIA की टीम पहुँची और छानबीन की। इसके अलावा, पंजाब के गुरदासपुर के हरगोबिंदपुरा में छापेमारी के दौरान टीम ने कुछ दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक सामान को कब्जे में लिया है।

NIA ने ये रेड कनाडा में खालिस्तान समर्थकों के भारतीय उच्चायोग पर 23 मार्च 2023 को किए गए हमले को लेकर की। अमृतपाल की गिरफ्तारी के बाद कनाडा, अमेरिका और UK के भारतीय उच्चायोगों के बाहर खालिस्तानियों ने प्रदर्शन किया था। कनाडा में दूतावास के बाहर तिरंगे का अपमान और तोड़फोड़ की गई थी। इसके बाद जून महीने में NIA ने FIR दर्ज कर जाँच शुरू की थी।

बता दें कि अमृतपाल सिंह ने 2024 के लोकसभा चुनावों में जेल में रहते हुए पंजाब के खंडूर साहिब सीट से निर्दलीय जीत हासिल की है। जीतने के बाद उसे भारी सुरक्षा के बीच सांसद के रूप में शपथ ली थी। अमृतपाल सिंह को लोकसभा के सदस्य के रूप में शपथ लेने के लिए पैरोल दी थी। इसके बाद उसे फिर से असम के डिब्रूगगढ़ जेल में भेज गया है।

अमृतपाल के खिलाफ पंजाब के अलग-अलग थानों में 11 आपराधिक मामले दर्ज हैं। असम के डिब्रूगढ़ में भी उसके खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज है। दरअसल, डिब्रूगढ़ जेल स्थित उसके सेल से कुछ आपत्तिजनक इलेक्ट्रॉनिक सामान बरामद हुए थे। इसके बाद असम में उसके खिलाफ यह आपराधिक मामला दर्ज हुआ था।

अमृतपाल के खिलाफ दर्ज मामलों में 19 मार्च 2023 को पंजाब के अजनाला पुलिस स्टेशन पर किया गया हमला भी शामिल है। थाने पर उसके समर्थकों ने अवैध हथियार लेकर गैर-कानूनी ढंग से घुसकर हमला किया था। इसमें कई पुलिसकर्मी घायल हो गए थे। अमृतपाल और उसके साथियों पर धार्मिक भावनाएँ भड़काने, पुलिसकर्मियों पर हमला, धमकाने, भड़काऊ बयान देने आदि से संबंधित मामले हैं।

वकील महमूद प्राचा पर हाई कोर्ट ने लगाया ₹1 लाख जुर्माना, पूछा- समस्या हल हो गई फिर क्यों डाली याचिका: दिल्ली दंगों की सुनवाई के दौरान भी लग चुकी है फटकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वकील महमूद प्राचा पर ₹1 लाख का जुर्माना ठोंका है। हाई कोर्ट ने प्राचा के व्यवहार को देखते हुए यह जुर्माना लगाया। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्राचा ने उसका बहुमूल्य समय बर्बाद किया है। महमूद प्राचा की याचिका भी कोर्ट ने रद्द कर दी।

लाइवलॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार, मंगलवार (10 सितम्बर, 2024) को इलाहाबाद हाई कोर्ट की जस्टिस शेखर बी सर्राफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच प्राचा की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। प्राचा की यह याचिका चुनावी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी के सत्यापन और सुरक्षा सम्बन्धित मुद्दों पर थी।

हाई कोर्ट ने कहा कि इसी मामले प्राचा पहले दो याचिकाएँ दिल्ली हाई कोर्ट में डाल चुके हैं और वहाँ उनकी इच्छा के अनुसार निर्देश भी कोर्ट दे चुका है। प्राचा ने दिल्ली हाई कोर्ट के निर्णयों से संतुष्टि भी जताई थी। इसके बावजूद प्राचा ने फिर इसी मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक याचिका ठोंक दी।

हाई कोर्ट ने कहा कि जब उनकी समस्या दिल्ली हाई कोर्ट से हल हो चुकी है तो आखिर वह इलाहाबाद में वैसी ही याचिका लेकर क्यों आए। कोर्ट ने कहा कि वह इसके पीछे का कारण समझ नहीं पा रहा कि एक ही विषय पर दो अलग अलग हाई कोर्ट में याचिका क्यों डाली गई।

कोर्ट ने कहा, “यह अदालत याचिकाकर्ता द्वारा किए जा रहे इस बदलाव को समझ नहीं पा रही, जब याचिकाकर्ता ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष रिकॉर्ड में कहा था कि उसकी चिंता का समाधान हो चुका है। याचिकाकर्ता बीच रास्ते में कूद नहीं सकता नहीं ही अपना मन बदल सकता है, वह अपने मन से अपनी पसंद का मंच नहीं चुन सकता। अगर उन्हें समस्या थी तो वह एक बार फिर दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते थे क्योंकि मामला तो वही है।”

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने समय खराब करने के अलावा प्राचा के व्यवहार पर भी सवाल उठाए। हाई कोर्ट ने कहा कि उसे फैसला सुनाने के बाद पता चला कि प्राचा खुद ही इस मामले में पेश हो रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि उन्होंने अपने एक वकील के माध्यम से यह याचिका दायर की थी, ऐसे में वह खुद इस मामले में बहस नहीं कर सकते थे। इसके लिए उन्हें अपने वकील का नाम हटाना पड़ता। लेकिन उन्होंने ऐसा किए बिना ही बहस करना चालू कर दिया।

हाई कोर्ट ने कहा कि प्राचा ने अपना कोट पर पहने जाने वाला बैंड बिना हटाए बहस की जो सही नहीं है। कोर्ट ने कहा कि उन्हें डेकोरम बना कर रखना था। हाई कोर्ट ने प्राचा की याचिका इस सुनवाई के बाद खारिज कर दी और उन पर ₹1 लाख का जुर्माना भी लगा दिया। प्राचा को आगे उनके व्यवहार के लिए चेतावनी भी दी गई है।

कौन है महमूद प्राचा?

महमूद प्राचा दिल्ली दंगा में ‘पीड़ितों’ का केस मुफ्त में लड़ने का दावा करता है और भारत में अघोषित आपातकाल के नैरेटिव को आगे बढ़ाता है। न सिर्फ कोर्ट में, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से भी वो इस्लामी प्रोपेगंडा फैलाने में दक्ष है। दिल्ली दंगों में ये आरोपित मुस्लिम दंगाइयों का वकील है।

NDA के सत्ता में आने से पहले महमूद प्राचा की ऐसी तूती बोलती थी कि वो राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, दिल्ली सफाई कर्मचारी कमीशन और भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक (FSSAI) जैसी सरकारी संस्थाओं के लिए कोर्ट में पेश को चुका है। वो सुप्रीम कोर्ट में हरियाणा का एडिशनल अधिवक्ता रहा है। साथ ही AIIMS दिल्ली का स्टैंडिंग काउंसल और दिल्ली लॉ स्कूल के छात्र संघ का अध्यक्ष रहा है।

जमात उलेमा-ए-हिन्द ने महमूद प्राचा को कई आतंकवादियों का केस लड़ने के लिए हायर किया था। वकील महमूद प्राचा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के दिल्ली ब्रांच का सदस्य है। साउथ एशिया माइनॉरिटी लॉयर्स एसोसिएशन का वो अध्यक्ष है। जुलाई 2017 से वो अमेरिका के ‘ब्लैक लाइव्स मैटर्स’ की तर्ज पर भारत में ‘दलित, माइनॉरिटी एंड ट्राइबल लाइव्स मैटर्स’ नामक अभियान चला रहा है।

उसने 2004 में जम्मू कश्मीर के मसले में अमेरिका की मध्यस्तथा की माँग की थी, जबकि ये भारत का आंतरिक मामला है। महमूद प्राचा ‘भीम आर्मी’ से तो जुड़ा ही हुआ है, साथ ही ‘रावण’ को दरियागंज में हुई हिंसा के मामले में कोर्ट में डिफेंड भी कर चुका है। उसने मेवात के मुस्लिम बहुल इलाके में जाकर भड़काऊ भाषण दिया था और CAA विरोधी आंदोलन को हवा दी थी। उसने तब खुलासा किया था कि पूरे बिहार में 1500 शाहीन बाग़ चल रहे हैं और इसमें मुस्लिम महिलाओं का सबसे ज्यादा योगदान है।

दिल्ली हाईकोर्ट में कपिल मिश्रा सहित अन्य भाजपा व संघ नेताओं के खिलाफ केस करने में उसका सबसे बड़ा हाथ था। साथ ही उसे NPR के खिलाफ भी मुस्लिमों को भड़काया था। उसने दावा किया कि असम में ‘बाहरी’ मारवाड़ियों ने पूरे व्यापार पर कब्जा कर रखा था, इसीलिए NRC लाई गई। उसने बड़े उद्योगपतियों पर RSS को लोन देने का आरोप लगाया और यहाँ तक दावा कर बैठा कि जिनका नाम NRC में नहीं आएगा, उनके बैंक एकाउंट्स के रुपए सरकार खा जाएगी।

उसने मुस्लिम बहुल इलाकों में घूम-घूम कर लाइसेंसी हथियारों की खरीद-बिक्री करने की सलाह दी थी और उन्हें ‘आत्मरक्षा’ के लिए हथियार रखने को कहा था। उसने मुस्लिमों को यहाँ तक सलाह दी थी कि भले ही उनकी संपत्ति बिक जाए, वो बन्दूक जरूर रखें। उसने विभिन्न मस्जिदों में मुस्लिमों को बंदूक चलाने की ट्रेनिंग देने के लिए कैंप लगाने की भी वकालत की थी। उसने मस्जिदों में मार्शल आर्ट्स से लेकर हर फिजिकल ट्रेनिंग की बात करते हुए कहा था कि आज देश के SC/ST और मुस्लिमों के पास यही एकमात्र विकल्प बचा है।

प्राचा पर अब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए उस पर ₹1 लाख का जुर्माना ठोंका है और इसकी अदायगी ना होने पर दूसरे रास्ते अपनाने को कहा है। इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट भी दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगों के मामले में उसे फटकार चुका है।

दोस्तों के साथ मिलकर नर्स से रेप की कोशिश कर रहा था डॉक्टर, सर्जिकल ब्लेड से काट दी प्राइवेट पार्ट: बिहार की घटना, अस्पताल से भागकर खुद को बचाया

बिहार के समस्तीपुर जिले में एक शर्मनाक और चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जहाँ एक डॉक्टर और उसके दो दोस्तों द्वारा नर्स के साथ बलात्कार करने की कोशिश की गई। इस घटना में नर्स ने बहादुरी दिखाते हुए ऑपरेशन के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले ब्लेड से डॉक्टर का प्राइवेट पार्ट काट दिया। घटना के बाद नर्स किसी तरह से अस्पताल से भागी और पुलिस को सूचित किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये वारदात बुधवार (11 सितंबर 2024) की रात को समस्तीपुर के आरबीएस हेल्थ केयर सेंटर (निर्माणाधीन अस्पताल) में घटी। पीड़ित नर्स बीते 10-15 महीने से इस अस्पताल में काम कर रही थी। बुधवार की रात, अस्पताल में कोई मरीज नहीं था और डॉक्टर संजय कुमार अपने दो दोस्तों के साथ शराब पी रहा था। उन्होंने नर्स को बुलाया और शराब के नशे में तीनों ने नर्स के साथ बलात्कार करने की कोशिश की। अपनी जान बचाने के लिए नर्स ने ऑपरेशन थिएटर में मौजूद ब्लेड से डॉक्टर के प्राइवेट पार्ट पर हमला किया, जिससे डॉक्टर गंभीर रूप से घायल हो गया। इस हमले के बाद, तीनों आरोपियों ने उसे छोड़ दिया और नर्स अस्पताल से भागने में सफल रही।

एसडीपीओ संजय कुमार पांडेय ने बताया कि आरोपी डॉक्टर की पहचान बेगूसराय जिले के तेघरा थाना क्षेत्र के निवासी डॉक्टर संजय कुमार, पुत्र- स्वर्गीय रामभजन सिंह के रूप में हुई है। वहीं, डॉक्टर के दो अन्य साथी सुनील कुमार गुप्ता (वैशाली जिले के बलिगाँव थाना क्षेत्र निवासी) और अवधेश कुमार (समस्तीपुर के बंगरा थाना क्षेत्र निवासी) हैं। उन्होंने बताया कि बुधवार की रात मुसरीघरारी थाना के थानाध्यक्ष फैजुल अंसारी को डायल 112 के माध्यम से इस घटना की जानकारी मिली। पुलिस अधीक्षक विनय तिवारी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एक विशेष टीम का गठन किया, जिसमें मुसरीघरारी थानाध्यक्ष के नेतृत्व में जाँच की गई। पुलिस की टीम जब मौके पर पहुँची, तो पीड़ित नर्स पास के खेत में छिपी हुई मिली।

नर्स ने खेत में छिपते हुए पुलिस को घटना की सूचना दी। सूचना मिलते ही पुलिस तुरंत मौके पर पहुँची और नर्स द्वारा बताई गई जानकारी के आधार पर आरबीएस हेल्थ केयर सेंटर पहुंचकर जांच शुरू की। पुलिस ने मौके से आधी बोतल शराब, एक कार, खून से सना हुआ ब्लेड, लुंगी, बेडशीट, और तीनों आरोपियों के मोबाइल फोन जब्त किए। पुलिस ने यह भी बताया कि शराब पीने के संबंध में अलग से मामला दर्ज किया जा रहा है।

घायल डॉक्टर संजय कुमार और उसके दोनों साथियों सुनील कुमार गुप्ता और अवधेश कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया। डॉक्टर को तुरंत इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया। आरोपितों ने पुलिस की पूछताछ में अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। एसडीपीओ पांडेय के अनुसार, डॉक्टर और उसके साथी नशे की हालत में थे और उन्होंने नर्स के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की थी।

नर्स ने पुलिस को बताया कि उसने खुद को बचाने के लिए डॉक्टर के प्राइवेट पार्ट पर ब्लेड से वार किया। इस कार्रवाई के बाद तीनों आरोपितों ने उसे छोड़ दिया और वह किसी तरह से अपनी जान बचाकर वहाँ से भागने में सफल रही। नर्स ने खेत में छुपकर पुलिस को फोन कर घटना की सूचना दी। इसके बाद पुलिस टीम ने घटनास्थल पर पहुँचकर जरूरी साक्ष्य एकत्र किए। घटना स्थल से मिले सबूतों के आधार पर पुलिस ने बलात्कार के प्रयास और अवैध शराब सेवन के संबंध में मामला दर्ज किया है। पुलिस इस मामले की जाँच को तेजी से आगे बढ़ा रही है और सभी कानूनी प्रक्रियाएँ पूरी की जा रही हैं। एसडीपीओ संजय कुमार पांडेय ने बताया कि आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी और उन्हें जल्द से जल्द न्यायिक प्रक्रिया के तहत सजा दिलाने का प्रयास किया जा रहा है।

समस्तीपुर की यह घटना एक दर्दनाक और चिंताजनक घटना है, जिसमें एक नर्स ने अपनी इज्जत बचाने के लिए एक खतरनाक कदम उठाया। डॉक्टर और उसके दोस्तों की इस शर्मनाक हरकत ने फिर से यह साबित कर दिया है कि समाज में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सुधार की आवश्यकता है। पुलिस की त्वरित कार्रवाई और आरोपियों की गिरफ्तारी सराहनीय है, लेकिन इस घटना ने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा को कैसे रोका जाए और उन्हें सुरक्षित माहौल कैसे प्रदान किया जाए।

पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा को भी लगी बांग्लादेश की नजर, शेख हसीना की ‘हिल्सा कूटनीति’ पर लगाया विराम: बंगाली हिंदू पारंपरिक भोज के रूप में करते हैं इस्तेमाल

बांग्लादेश से शेख हसीना सरकार के जाने के बाद वहाँ कुछ न कुछ हिंदूविरोधी फैसले लिए जा रहे हैं। पहले खबर आई कि अजान से पहले दुर्गा पूजा में पूजा पाठ बंद करने के निर्देश दिए गए हैं। अब पता चला है कि बांग्लादेश ने दुर्गा पूजा से ठीक पहले बंगालियों के पारंपरिक भोजन हिल्सा मछली का एक्पोर्ट भारत में करने से मना कर दिया है। पहले हर दुर्गा पूजा से पूर्व 1000 टन के करीब हिल्सा भारत में निर्यात की जाती थीं।

बता दें कि साल 2019 से बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने यह नीति अपनाई थी कि हर साल पूजा से एक महीने पहले पद्मा नदी से 1,000 टन से अधिक हिल्सा भारत को निर्यात की जाएगी। 5 साल तक ऐसा किया भी गया। हालाँकि सरकार बदलने के बाद अब अंतरिम सरकार ने उस निर्णय को वापस ले लिया।

बांग्लादेश के पशु संसाधन मंत्रालय की सलाहकार फरीदा अख्तर ने हिल्सा की बढ़ती घरेलू माँग का हवाला देते हुए भारत में किए जाने वाले निर्यात को खारिज कर दिया। साथ ही वाणिज्य मंत्रालय ने यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि इस बार हिल्सा पकड़ने पर रोक हो।

मालूम हो कि कुछ दिन पहले बांग्लादेशी मछली निर्यातकों के साथ समन्वय करने वाले एसोसिएशन ने बांग्लादेश सरकार के सलाहकार तौहीद हुसैन को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि पिछले वर्षों की तरह इस बार भी हिल्सा के सीमित व्यापार की अनुमति दी जाए, मगर बांग्लादेश की ओर से नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली।

एसोसिएशन के सचिव सैयद अनवर मकसूद ने हालात देखते हुए बताया कि इस बार पद्मार इलिश (पद्मा नदी की हिल्सा) मिलना मुश्किल है। हिलसा मछली पकड़ने तक पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है ताकि मछली को अंडे देने का मौका न मिले।

इससे पहले साल 2012 में बांग्लादेश सरकार ने ऐसा बैन लगाया था लेकिन फिर 2019 में सद्भावना के तौर पर इस व्यापार को अनुमति दे दी गई। पिछले साल हिल्सा डिप्लोमेसी के तहत भारत को 1300 टन से ज्यादा हिल्सा मिली थीं वहीं 2021 में ये संख्या 1200 थी।

उल्लेखनीय है कि 5 अगस्त को शेख हसीना सरकार के गिरने के बाद हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने का काम लगातार बांग्लादेश कर रहा है। 10 सितंबर को एक वीडियो सामने आई थी जिसमें एक व्यक्ति जिसे बांग्लादेश के गृहमंत्री का सलाहकार कहा जा रहा था वो हिन्दुओं को चेतावनी देते दिख रहा था कि वो मुस्लिमों की अजान से 5 मिनट पहले अपने पूजापाठ बंद कर दें वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा।

शराब घोटाले में जमानत तो मिल गई पर CM ऑफिस नहीं जा सकते हैं अरविंद केजरीवाल, फाइल पर साइन करने की इजाजत भी नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने लगाई कई शर्तें

दिल्ली शराब घोटाला केस में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट से महत्वपूर्ण राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल को जमानत देने का फैसला लिया है, जिसके बाद अब वो आज (13 सितंबर 2024) ही तिहाड़ जेल से बाहर आ जाएँगे। केजरीवाल को गिरफ्तारी के 177 दिनों बाद बेल मिली है। इसमें से 21 दिन उन्हें चुनाव प्रचार के लिए जमानत मिली थी, इस तरह वो कुल 156 दिन जेल में बिताने के बाद वो तिहाड़ से बाहर आ रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयाँ की बेंच ने यह फैसला सुनाया। केजरीवाल ने जमानत की याचिका दायर करते हुए अपनी गिरफ्तारी को भी चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान सीबीआई और केजरीवाल की ओर से प्रमुख वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने अपनी दलीलें पेश की थीं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत अरविंद केजरीवाल को दी गई जमानत की शर्तें इस तरह से हैं-

  • मुचलका: अरविंद केजरीवाल को 10-10 लाख रुपये के दो मुचलके भरने होंगे।
  • पब्लिक कमेंट: अरविंद केजरीवाल दिल्ली एक्साइज पॉलिसी केस की मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि केजरीवाल इस केस को लेकर कोई भी सार्वजनिक टिप्पणी नहीं करेंगे।
  • ऑफिस में नो-एंट्री: केजरीवाल को मुख्यमंत्री कार्यालय और दिल्ली सचिवालय में जाने की अनुमति नहीं होगी और न ही वह सरकारी फाइलों पर दस्तखत कर सकेंगे।
  • मुकदमे में सहयोग: अरविंद केजरीवाल को ट्रायल कोर्ट के सामने हर सुनवाई पर मौजूद होना होगा, जबतक कि उन्हें पेशी से छूट न मिले।
  • गवाहों से कोई संपर्क नहीं: जमानत पर बाहर रहने के दौरान वह केस से जुड़े गवाहों से संपर्क नहीं करेंगे, संपर्क की कोशिश भी नहीं कर सकते।

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि केजरीवाल की गिरफ्तारी कानूनी थी और इसमें कोई प्रक्रियागत अनियमितता नहीं थी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सीबीआई ने गिरफ्तारी के दौरान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41 के निर्देशों का पालन किया। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस भुइयाँ दोनों ने एकमत होते हुए केजरीवाल को जमानत देने का फैसला किया, इस आधार पर कि आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है और मुकदमे की सुनवाई में अभी समय लगेगा।

वहीं, जस्टिस भुइयाँ ने गिरफ्तारी की आवश्यकता और अनिवार्यता के बारे में अलग राय व्यक्त की। उन्होंने कहा कि सीबीआई ने 22 महीने तक केजरीवाल को गिरफ्तार नहीं किया और ईडी मामले में उनकी रिहाई के ठीक पहले उन्हें गिरफ्तार किया। जस्टिस भुइयाँ ने इस गिरफ्तारी को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पहले से दी गई जमानत को विफल करने के प्रयास के रूप में देखा।

सुप्रीम कोर्ट ने 12 जुलाई को ईडी मामले में केजरीवाल को अंतरिम जमानत दी थी, और अब उन्होंने सीबीआई के मामले में भी जमानत हासिल की है। इस दौरान, कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया कि केजरीवाल को मुकदमे में सहयोग देना होगा और किसी भी प्रकार की सार्वजनिक टिप्पणी से बचना होगा।

बता दें कि दिल्ली शराब नीति घोटाले से जुड़ा यह मामला दिल्ली सरकार की आबकारी नीति 2021-22 के निर्माण और क्रियान्वयन में कथित भ्रष्टाचार से संबंधित है। यह नीति बाद में रद्द कर दी गई थी। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग का एक अलग मामला दर्ज किया था। सीबीआई और ईडी का आरोप है कि शराब नीति में संशोधन करके अनियमितताएं की गईं और लाइसेंसधारकों को अनुचित लाभ पहुँचाया गया।

कौन थी लेडी मैकबेथ, जिससे हुई ममता बनर्जी की तुलना: बंगाल के गवर्नर अब CM के साथ साझा नहीं करेंगे मंच, सोशल बायकॉट का किया ऐलान

कोलकाता के आर जी कर अस्पताल में रेप-हत्या की घटना के बाद सवालों के घेरे में आई ममता बनर्जी पर अब प्रदेश के राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने निशाना साधा है। उन्होंने एक वीडियो जारी करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सार्वजनिक मंचों से बहिष्कार करने की बात कही है। साथ ही उनकी तुलना लेडी मैकबेथ से की है।

सीवी आनंद बोस ने कहा कि वो मुख्यमंत्री का सामाजिक बहिष्कार करेंगे। सामाजिक बहिष्कार का मतलब है कि वह मुख्यमंत्री के साथ कभी कोई मंच साझा नहीं करेंगे। साथ ही ऐसी किसी बैठक में शामिल नहीं होंगे, जिसमें मुख्यमंत्री मौजूद हों।

सामने आई वीडियो में बोस कहते दिखे, “मुख्यमंत्री सुरक्षा देने की जगह विरोध कर रही हैं। बंगाल की लेडी मैकबेथ हुगली का सारा पानी इस गंदे हाथ को साफ नहीं कर सकता। सड़क पर हिंसा है। घर में हिंसा हुई कैंपस में हिंसा है, अस्पताल में हिंसा है, गाँव में हिंसा है, शहर में हिंसा है। हर जगह हिंसा है। लोगों को चुप करा दिया गया है…याद रखें, चुप्पी हिंसा है। लोग पूछ रहे हैं कौन रक्षा करेगा। ये जटिल और भ्रमित करने वाली स्त्री है। जब तक बंगाल के लोगों को न्याय नहीं मिलता मैं मुख्यमंत्री का सामाजिक बहिष्कार करूँगा।”

कौन है लेडी मैकबथ जिसकी तुलना बंगाल CM से की।

बता दें कि लेडी मैकबेथ जिनकी तुलना बंगाल सीएम से की गई है, वह मशहूर उपन्यासकार विलियम शेक्सपियर के प्ले ‘द ट्रेजेडी ऑफ मैकबेथ’ की मुख्य किरदार है। इस प्ले में मैकबेथ को राजा का सिंहासन हासिल करने के लिए अपने पति को उकसाते और राजा की मौत की साजिश रचते देखा जाता है। इसके अलावा ये भी देखने को मिलता है कि कैसे ताकत बढ़ने के साथ मैकबेथ के अत्याचार भी बढ़ते हैं। मैकबेथ का मकसद स्कॉटलैंड पर रानी बनकर राज करना था, लेकिन उसकी इन महत्वकांक्षाओं के कारण उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ने लगी और धीरे-धीरे वह अपराध बोध से भरने लगी।

इन्हीं मैकबेथ के चरित्र की तुलना बंगाल सीएम से की गई। सिर्फ गवर्नर ही नहीं उनकी आलोचना कई जगह हो रही है। इस बीच उन्होंने आरजी कर अस्पताल में डॉक्टर की रेप-हत्या मामले में हड़ताल पर चल रहे डॉक्टरों से बात करने का प्रयास किया। हालाँकि डॉक्टरों ने उनसे बातचीत करने से इनकार कर दिया। इसके बाद वो कैमरे पर सामने आई। उन्होंने कहा– “कुछ लोग मेरी कुर्सी चाहते हैं। मैं इस्तीफा देने के लिए तैयार हूँ मुझे सत्ता की भूख नहीं है।” उन्होंने हाथ जोड़कर जनता से माफी भी माँगी कि वो डॉक्टरों का समाधान लाने में विफल रहीं।