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पाकिस्तान के खालिद को UK कोर्ट ने भारतीय की हत्या का दोषी पाया, वैलेंटाइन डे के दिन कार से रौंद दिया था: साकिब इस्माइल ने दी थी सुपारी

ब्रिटेन में भारतीय नागरिक विग्नेश पट्टाभिरामन की हत्या के मामले में 25 वर्षीय पाकिस्तानी नागरिक शाजेब खालिद को दोषी ठहराया गया है। विग्नेश पट्टाभिरामन, जो तमिलनाडु के निवासी थे और लंदन में एक रेस्टोरेंट मैनेजर के तौर पर काम कर रहे थे, की हत्या वैलेंटाइन डे (14 फरवरी 2024) के दिन हुई थी। शाजेब और उसके साथी को 10 अक्टूबर को सजा सुनाई जाएगी।

पुलिस के मुताबिक, रीडिंग क्राउन कोर्ट की ज्यूरी ने शाजेब खालिद को विग्नेश की हत्या का दोषी पाया है। आरोप है कि खालिद ने विग्नेश को जानबूझकर अपनी कार से टक्कर मारकर मौत के घाट उतारा। खालिद को इस जघन्य अपराध के लिए 2000 पाउंड की सुपारी दी गई थी। विग्नेश की मौत 15 फरवरी को रॉयल बर्कशायर अस्पताल में हुई, और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, उनकी मौत सिर में गंभीर चोट लगने के कारण हुई थी।

विग्नेश पट्टाभिरामन, जो कोयंबटूर के मदुरामलाई के आईओबी कॉलोनी का निवासी था, दिसंबर 2022 में अपनी पत्नी राम्या के साथ लंदन आया था। उन्होंने वेल के एक दक्षिण भारतीय रेस्टोरेंट में काम शुरू किया था और चर्चिल स्थित हयात रीजेंसी लंदन में नई नौकरी की तैयारी कर रहे थे। इसी बीच, उनकी हत्या हो गई।

हत्याकांड की जाँच में यह खुलासा हुआ कि विग्नेश की हत्या की सुपारी मोहम्मद साकिब इस्माइल ने दी थी, जो वेल के रेस्टोरेंट में ऑपरेशन मैनेजर के रूप में काम करता था। इस्माइल को संदेह था कि विग्नेश उसके रेस्टोरेंट में लोगों को गैरकानूनी तरीके से नौकरी दिला रहा है। इस्माइल ने अपने दोस्त सोहित हुसैन से विग्नेश को डराने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढने को कहा जो उसे डराकर सजा दे सके। सोहित हुसैन ने यह काम शाजेब खालिद को सौंपा, जिसने विग्नेश को अपनी कार से टक्कर मार दी।

घटना के बाद एक प्रत्यक्षदर्शी ने देखा कि खालिद ने कार से बाहर निकलकर विग्नेश पर तीन बार किसी वस्तु से हमला किया। प्रॉसीक्यूशन का आरोप है कि खालिद ने विग्नेश के पैसे भी चुराए। खालिद ने अपने बचाव में कहा कि उसने केवल डराने के लिए कार दौड़ाई थी और उसका इरादा विग्नेश को मारने का नहीं था। उसने पैसे चुराने के आरोपों को भी नकारा किया है।

खालिद 2007 में पाकिस्तान से ब्रिटेन आया था और वहाँ लंबे समय से रह रहा था। इस मामले में खालिद को काम पर रखने वाले सोहित हुसैन को भी अपराध में सहयोग करने के लिए दोषी पाया गया है। दोनों आरोपितों को 10 अक्टूबर को सजा सुनाई जाएगी।

इस हत्याकांड ने न केवल स्थानीय भारतीय समुदाय को झकझोर दिया, बल्कि ब्रिटेन में भारतीयों की सुरक्षा और कानून व्यवस्था पर सवाल भी खड़ा किया है। इस मामले ने यह साबित कर दिया है कि समाज में अपराध और बुराई को रोकने के लिए सख्त निगरानी और सही कार्रवाई की आवश्यकता है।

झारखंड के संथाल परगना में 16% घटे ST, ईसाई 6000 गुणा बढ़े: बांग्लादेशी घुसपैठियों ने भी बनाया ठिकाना, डेमोग्राफी चेंज पर केंद्र ने हाई कोर्ट को सब कुछ बताया

झारखंड में हो रहे डेमोग्राफिक बदलावों पर कुछ हैरान करने वाले खुलासे हुए हैं। ये खुलासे केंद्र सरकार द्वारा झारखंड हाईकोर्ट में एक याचिका पर दिए गए जवाबों से हुए हैं। अपने जवाब में केंद्र सरकार ने बताया कि झारखंड के संथाल परगना में जनजातीय आबादी में 16 फीसदी की कमी आई है। ये आबादी परगना में पहले 44 फीसदी थी लेकिन अब ये मात्र 28 रह गई है।

केंद्र ने अपने जवाब में बताया कि जनजातीय आबादी के कम होने के पीछे दो कारण हैं-पहला पलायन और दूसरा धर्मांतरण। केंद्र सरकार के जवाब में ये भी बताया गया कि एक तरफ जहाँ जनजातीय आबादी घटी है तो वहीं दूसरी ओर संथाल परगना के छह अलग-अलग जगहों में मुस्लिम आबादी 20 से 40 फीसदी तक बढ़ी है। वहीं ईसाइयों की संख्या भी इन इलाकों में 6000 गुणा तक बढ़ी है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों झारखंड में हो रही बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर दानियल दाश की ओर से जनहित याचिका दायर की गई थी। इस याचिका में बताया गया था कि संथाल के छह जिलों में बांग्लादेशी घुसपैठिए आ रहे हैं जिसकी वजह से संथाल की जनसंख्या बदल रही हैं। इलाकों में मदरसे बनाए जा रहे हैं। स्थानीय जनजातीय महिलाओं को फाँस कर वैवाहिक संबंध बनाया जा रहा है।

याचिका के कोर्ट पहुँचने के बाद उस समय संथाल के छह जिलों (पाकुड़, साहिबगंज, दुमका, गोड्डा, देवघर और जामताड़ा) के डिप्टी कमीशनरों ने कहा था कि उनके जिले में कोई बांग्लादेशी घुसपैठ नहीं हुई है। इस तरह साफ नकारे जाने की बात पर कोर्ट ने उन्हें चेताया भी था कि अगर इलाके में एक भी घुसपैठ का मामला मिला तो उनके ऊपर कोर्ट की अवमानना का मामला चलेगा।

इस मामले में इससे पहले 5 सितंबर को हाईकोर्ट में एक्टिंग चीफ जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई हुई थी। इस दौरान सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया तुषार मेहता ने बताया था कि झारखंड में बांग्लादेशी घुसपैठियों के प्रवेश काफी संवेदनशील मामला है। घुसपैठिया झारखंड के रास्ते देश के अन्य राज्यों में भी प्रवेश कर वहाँ की आबादी को प्रभावित करेंगे। इसे हर हाल में रोकना होगा।

उन्होंने कोर्ट को जानकारी दी थी कि जनजातीय समुदाय की कम होती संख्या केंद्र सरकार के लिए भी चिंता का विषय है। ऐसे में केंद्र सरकार बीएसएफ-आईबी सब से विचार विमर्श करके इस मामले में जवाब तैयार करेगी और कोर्ट को पेश करेगी। 5 सितंबर को हुई इस सुनवाई के बाग मामले के संबंध में 12 सितंबर को जवाब दाखिल किया गया। केंद्र सरकार ने बताया कि घुसपैठ साहिबगंज और पाकुड़ जिलों से हुई है। ये इलाके पश्चिम बंगाल से सटे हुए हैं। घुसपैठिए इन इलाकों में इसलिए आए क्योंकि यहाँ की बोली एक जैसी थी, जिससे उन्हें घुलने-मिलने में मदद मिली। अब इस मामले में अगली सुनवाई 17 सितंबर को होगी।

मालूम हो कि केंद्र के अनुसार, 1951 की जनगणना में संथाल परगना की कुल जनसंख्या 23,22,092 थी, जिसमें हिंदू 90.37 प्रतिशत, मुस्लिम 9.43 प्रतिशत और ईसाई 0.18 प्रतिशत थे। वहीं 2011 की जनगणना में संथाल परगना की कुल जनसंख्या 69,69,097 हो गई, जिसमें हिंदू 67.95 प्रतिशत रह गए, मुस्लिमों की संख्या 22.73 प्रतिशत हो गई और ईसाई 4.21 प्रतिशत हो गए।

13 सितंबर का वह फैसला जिसकी काट नहीं खोज पाया कॉन्ग्रेस का इकोसिस्टम, जिसके कारण आज भी बेचैन है लिबरल-वामपंथी गैंग

चंद महीने पहले ही भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए ने लगातार तीसरी बार केंद्र की सत्ता में वापसी की है। हालाँकि पिछले दो चुनावों के मुकाबले इस बार बीजेपी की सीटें कुछ घटी है, बावजूद इसके उसके मुकाबले कोई दूसरा दल नहीं दिखता। लोकप्रियता के मामले में कोई भी नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगे टिकता तक नहीं है।

आज जो वैश्विक मंचों पर भारत का प्रभाव दिख रहा है, देश की राजनीतिक दशा और दिशा में जो बदलाव दिख रहा, आम आदमी के चेहरों पर जो उम्मीदों का भाव दिखता है, इन सबकी पटकथा 2013 में आज यानी 13 सितंबर को ही लिखी गई थी।

दरअसल, 2014 लोकसभा चुनाव से पहले 13 सितंबर, 2013 को ही तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उनके साथ गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी थे।

इसी प्रेस वार्ता में यह घोषणा की गई कि नरेंद्र मोदी आगामी चुनावों में भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री का चेहरा होंगे। उससे पहले कयास लगाए जा रहे थे कि फिर से लालकृष्ण आडवाणी पीएम का चेहरा हो सकते हैं। बहुतों ने यह भी सोचा था कि सुषमा स्वराज या अरुण जेटली भी पीएम का चेहरा हो सकते है, क्योंकि मोदी को मीडिया ने 2002 के गुजरात दंगों की अगुवाई करने वाले व्यक्ति के तौर पर पेश किया था, जबकि इस तथ्य पर किसी ने ध्यान नहीं दिया कि उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल के 12 वर्षों में गुजरात काफी हद तक शांतिपूर्ण रहा था।

उस वक्त के कई ट्वीट्स हैं जिसमें राणा अय्यूब और राजदीप सरदेसाई ने भाजपा की तरफ से नरेंद्र मोदी को पीएम चेहरे के लिए चुनने पर जमकर हमला किया था। उस दौरान वे नरेंद्र मोदी को काफी हल्के में ले रहे थे।

उन लोगों ने उनके US वीजा स्टेटस का मजाक भी उड़ाया।

आप देखें, किसी ने वास्तव में नहीं सोचा था कि साबरमती के किनारे से यह आदमी भाजपा का यह सपना पूरा करेगा। मीडिया की धारणा उनके खिलाफ थी। विपक्षी नेताओं द्वारा उन्हें ‘मौत का सौदागर’ कहा जाता था। उनके अपने सहयोगी इस बात से बहुत खुश नहीं थे और उन्होंने इसे बहुतायत स्पष्ट भी कर दिया था। जून 2013 में जब मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होने की चर्चाएँ तेज हो रही थीं, तब जदयू के नीतीश कुमार ने 17 साल पुराने एनडीए गठबंधन को तोड़ दिया था।

उन्होंने पीएम मोदी के लिए अपनी ‘नापसंदगी’ को काफी हद तक स्पष्ट कर दिया था। नीतीश कुमार ने 2010 में मोदी सहित कई भाजपा नेताओं के लिए एक पूर्व निर्धारित रात के भोजन के कार्यक्रम को भी रद्द कर दिया था। वहीं दो साल पहले 2008 में, उन्होंने नरेंद्र मोदी की अगुवाई में गुजरात सरकार द्वारा दिए गए 5 करोड़ रुपए को भी लौटा दिया था जो बिहार को बाढ़ राहत के लिए मिला था। उन्होंने इसे ब्याज के साथ वापस किया था।

गौरतलब है कि भाजपा पूरे पाँच साल के लिए सिर्फ एक बार ही सत्ता में आई थी। वहीं मोदी को पीएम उम्मीदवार के रूप में प्रचारित कर भाजपा एक बहुत ही बड़ा जोखिम मोल ले रही थी, जब उनकी खुद की पार्टी के सहयोगी इस बात से नाराज चल रहे थे। इसके अलावा वे कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए को भी चुनौती दे रहे थे जिसके पास तीसरी बार सत्ता में आने के लिए पूरा इकोसिस्टम साथ खड़ा था।

गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, नरेंद्र मोदी ने वाइब्रेंट गुजरात नामक द्विवार्षिक शिखर सम्मेलन शुरू किया था। एक वरिष्ठ पत्रकार ने एक बार मुझसे कहा था कि 2002 के दंगों के ठीक बाद मोदी ने गुजरात में परिवर्तन लाने का फैसला किया था। उन्होंने मन बना लिया था कि जब लोग गुजरात के बारे में सोचेंगे तो वे प्रगति के बारे में सोचेंगे। पहला वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन नवरात्रि के दौरान 2003 में आयोजित किया गया था, जो नौ-रात्रि लंबा नृत्य महोत्सव था।

उससे पहले मोदी ने विभिन्न मीडिया हाउस के संपादकों और पत्रकारों को बुलाया और उन्हें अपने विजन पर एक पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन दिया। एक पत्रकार ने मुझे बताया 2002 के दंगों के दौरान भड़काऊ खबरों को प्रसारित करने वाले गुजरात समाचार संपादक श्रेयांश शाह भी उसमें मौजूद थे। उन्होंने मुझे बताया कि शाह प्रस्तुति के बीच में ही बाहर चले गए थे। जाहिर तौर पर उन्हें वो सब पसंद नहीं आया होगा। इसके बाद गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उन्हें खुद रोका और वापस आने के लिए कहा। लेकिन शाह फिर भी नहीं माने।

यह तब था जब मोदी ने यह परवाह करना छोड़ दिया था कि मीडिया उनके बारे में क्या कहती है। उन्होंने इस बात का फैसला किया था कि उनके द्वारा किए गए काम को बोलने दो।

अगला शिखर सम्मेलन जनवरी 2015 के लिए निर्धारित किया गया था। नरेंद्र मोदी ने इस अवसर का भरपूर फायदा उठाया। उन्होंने हरित ऊर्जा, स्वच्छ तकनीक, शिक्षा, कृषि, सूचना प्रौद्योगिकी जैसे विभिन्न विषयों पर ‘वाइब्रेंट गुजरात प्री-इवेंट समिट्स’ की एक श्रृंखला की।

जिन लोगों ने 2003 में शिखर सम्मेलन को खारिज कर दिया था। वहीं लोग उसके शुरुआत से पहले ही उसको फ्रंट पेज पर प्रकाशित कर रहे थे। उन्होंने न केवल देश को यह बताया कि एक सीएम होते हुए उन्होंने सबसे उद्यमी राज्य में क्या-क्या किया। बल्कि यह भी कि जो वादा उन्होंने किया उसे पूरा भी किया। वह जानते थे कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था नीतिगत पक्षाघात के कारण फँस गई है। उन्होंने सुनिश्चित किया कि हर कोई इसके बारे में जाने।

लेकिन इस बात की उम्मीद कम थी कि बीजेपी के पास वास्तव में एक मौका हो सकता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चरम पर था। लोग कॉन्ग्रेस से नाराज थे। लेकिन क्या उनकी नाराजगी भाजपा को बहुमत देने देने के लिए पर्याप्त थे? क्या लोग 2002 के दंगों के बाद मोदी को वोट देने के लिए घटनाओं और मनगढ़ंत कहानियों को नजरअंदाज करने के इच्छुक थे? क्या भाजपा के लिए तर्कसंगत नेता को पीएम चेहरे के रूप में चुनना बुद्धिमानी होगी? क्या ‘त्रिशंकु संसद’ होगी और भाजपा को 5 साल की स्थिर सरकार के लिए सहयोगियों पर निर्भर रहना होगा? सच कहूँ, तो मुझे यकीन नहीं था।

यह तस्वीर मतगणना से 2 दिन पहले की है। भारत ने तय किया था। मोदी की बॉडी लैंग्वेज से यह लगता था कि उन्हें यकीन था कि वह दिल्ली आ रहे हैं।

भाजपा ने रिस्क लिया। मोदी जीते और कैसे। सिर्फ एक बार नहीं। 2019 में मजबूत जनादेश के साथ वापसी करते हुए सत्ता में अपनी पकड़ को स्थापित किया।

राजनाथ सिंह की उस घोषणा ने पार्टी के इतिहास को बदल दिया। पार्टी को मजबूती के साथ हर वर्ष एक नई उम्मीद और पहचान बनाने का मौका दिया। अब 2024 के आम चुनावों के बाद वह लगातार तीसरी बार सत्ता में आने में सफल रही है।

(यह लेख मूल रूप से 2020 के 13 सितंबर को ऑपइंडिया अंग्रेजी की तत्कालीन संपादक निरवा मेहता ने लिखा था। कुछ आवश्यक बदलावों के साथ हम इसे फिर से प्रकाशित किया गया है)

अब अडानी के खिलाफ स्विस बैंक का शिगूफा लेकर आया हिंडनबर्ग, कहा- ₹2600 करोड़ फ्रीज: भारतीय कंपनी ने बताया मार्केट वैल्यू गिराने का सुनियोजित प्रयास

हिंडनबर्ग रिसर्च ने हाल ही में अडानी ग्रुप के खिलाफ फिर से गंभीर लगाकर सनसनी फैलाने की कोशिश की। स्विस मीडिया आउटलेट गॉथम सिटी की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए, हिंडनबर्ग ने दावा किया है कि स्विस अधिकारियों ने अडानी ग्रुप के स्विस बैंकों में रखे गए 310 मिलियन डॉलर (लगभग 2600 करोड़ रुपये) की धनराशि को फ्रीज कर दिया है।

हिंडनबर्ग के दावे के अनुसार, स्विस अधिकारियों ने अडानी ग्रुप की वित्तीय गतिविधियों की गहरी जाँच की है और पाया है कि समूह ने विदेशी फंड्स में निवेश किया है जो कि अपारदर्शी हैं। इन फंड्स में अधिकांश अडानी के स्टॉक्स शामिल हैं। रिपोर्ट का कहना है कि अडानी ग्रुप के प्रतिनिधि ने इन फंड्स को स्विस बैंकों में रखा था और यह धनराशि अब फ्रीज कर दी गई है। इस धधनराशि की टोटल वैल्यू करीब 2600 करोड़ रुपये हैं।

इस आरोप को 12 सितंबर 2024 को X (पूर्व में ट्विटर) पर हिंडनबर्ग द्वारा पोस्ट किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, स्विस अधिकारी 2021 से अडानी ग्रुप के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग और सिक्योरिटी फ्रॉड की जाँच कर रहे हैं।

अडानी ग्रुप ने दावों को किया खारिज

अडानी ग्रुप ने हिंडनबर्ग के दावों को “आधारहीन, अव्यवहारिक और हास्यास्पद” करार दिया है। ग्रुप की तरफ से कहा गया है कि अडानी ग्रुप का स्विस कोर्ट की किसी भी कार्यवाही से कोई संबंध नहीं है और उनकी किसी भी कंपनी का खाता किसी भी प्राधिकरण द्वारा फ्रीज नहीं किया गया है। साथ ही यह भी कहा कि न तो स्विस कोर्ट ने कथित आदेश में अडानी की कंपनियों का उल्लेख किया है और न ही किसी प्राधिकरण या नियामक संस्था ने उनसे कोई स्पष्टीकरण या जानकारी माँगी है।

अडानी ग्रुप ने अपने बयान में यह आरोप लगाया है कि यह पूरी घटना उनके ग्रुप की प्रतिष्ठा और बाजार मूल्य को स्थायी रूप से नुकसान पहुँचाने के लिए एक सुनियोजित और गंभीर प्रयास है। कंपनी ने यह भी कहा कि उनका विदेशी होल्डिंग ढाँचा पूरी तरह से पारदर्शी है और सभी प्रासंगिक कानूनों के अनुरूप है।

पहले भी अडानी ग्रुप को निशाने पर ले चुका है हिंडनबर्ग

हिंडनबर्ग की यह नई रिपोर्ट एक लंबे विवाद की कड़ी में आती है। पहले भी हिंडनबर्ग रिसर्च ने अडानी ग्रुप पर रिपोर्ट जारी की थी। उस रिपोर्ट में अडानी ग्रुप पर कर्ज, शेयरों की कीमत में हेर-फेर, और अन्य वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगाए गए थे। रिपोर्ट ने अडानी ग्रुप की वित्तीय स्थिति और उनके बाजार मूल्य पर सवाल उठाए थे। रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद, अडानी की कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई थी, जो कि शेयर बाजार में एक तरह का भूचाल लेकर आया था।

इस रिपोर्ट के बाद अडानी ग्रुप का मार्केट कैप गिर गया था और गौतम अडानी की नेटवर्थ में भी बड़ी कमी आई थी। हिंडनबर्ग की पहली रिपोर्ट ने अडानी ग्रुप की वित्तीय स्थिति और उसकी संपत्तियों पर गंभीर सवाल उठाए थे, जिसके परिणामस्वरूप अडानी ग्रुप को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा था।

अडानी ग्रुप ने हिंडनबर्ग की पहली रिपोर्ट के बाद अपनी स्थिति स्पष्ट की थी और आरोपों को खारिज किया था। उन्होंने कहा था कि उनकी सभी वित्तीय गतिविधियाँ पारदर्शी और कानूनी ढांचे के अनुसार हैं। इसके बावजूद, रिपोर्ट के प्रभाव ने अडानी ग्रुप की मार्केट वैल्यू को नुकसान पहुँचाया और इसके परिणामस्वरूप उनके शेयरों की कीमत में भारी गिरावट आई। हालाँकि बाद में अडानी ग्रुप ने जोरदार वापसी की। अडानी ग्रुप के शेयरों ने रिकवरी की और उन्होंने अपनी वित्तीय स्थिति को स्थिर करने में सफलता प्राप्त की है। यह रिकवरी दर्शाती है कि अडानी ग्रुप ने अपनी स्थिति को सुधारने के लिए कई कदम उठाए हैं और बाजार में फिर से अपनी जगह बनाई है।

अडानी ग्रुप के खिलाफ हिंडनबर्ग रिसर्च द्वारा लगाए गए आरोपों ने एक बार फिर से वित्तीय जगत में हलचल मचा दी है। स्विस बैंकों में रखी गई राशि के फ्रीज होने के आरोप और अडानी ग्रुप का खंडन, दोनों ही इस विवाद की जटिलता को बढ़ा रहे हैं। अडानी ग्रुप ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है और सभी आरोपों को खारिज किया है, जबकि हिंडनबर्ग ने अपने दावों को मजबूत करने के लिए नई रिपोर्ट प्रकाशित की है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि इस विवाद के क्या परिणाम होते हैं और अडानी ग्रुप अपने कारोबारी संचालन और निवेशकों के विश्वास को कैसे बनाए रखता है।

इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद की शान में गुस्ताखी के आरोप में 70 वर्षीय बुजुर्ग को थाने लाई पुलिस, फिर गोली मार कर दी हत्या: पाकिस्तान में कट्टरपंथियों ने किया सम्मानित

पाकिस्तान के बलूचिस्तान में पुलिस थाने के भीतर एक पुलिसकर्मी ने कथित ईशनिंदा के आरोपित की गोली मार कर हत्या कर दी। ईशनिंदा के आरोपित को भीड़ के गुस्से से बचाने के लिए थाने में रखा गया था। यहाँ भी उसकी जान नहीं बची और एक कट्टरपंथी पुलिसकर्मी का वह निशाना बन गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह वाकया बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा का है। यहाँ 70 वर्षीय सैयद खान नाम के एक बुजुर्ग व्यक्ति पर फोन पर इस्लाम के पैगम्बर के विषय में अपमानजनक बातें करने का आरोप लगाया था। सैयद खान की एक फोन रिकॉर्डिंग वायरल हो गई थी। इसके बाद उसे पुलिस पकड़ लाई थी।

सैयद खान को एक जगह सुरक्षित तौर पर रखा गया था ताकि कहीं भीड़ उसे मार ना दे। हालाँकि, यहाँ भी वह नहीं बच सका। यहाँ एक पुलिसकर्मी सैयद खान का रिश्तेदार बन कर आया और उससे मिलने के बहाने उसको गोली मार दी। सैयद की इससे मौत हो गई।

क्वेटा के पुलिस अधिकारीयों ने बताया है कि सैयद खान को मारने वाले पुलिसकर्मी को गिरफ्तार कर लिया गया है और उसके खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है। पुलिसकर्मी की पहचान अभी साफ़ नहीं हुई है। वह पुलिस के किस विभाग में काम करता था यह भी साफ़ नहीं हुआ है।

गौरतलब है कि जिस सैयद खान को पुलिसकर्मी ने मारा है, उसे सबसे पहले खैरोताबाद पुलिस थाने में रखा गया था। यहाँ उसके विरुद्ध ईशनिंदा का एक मामला दर्ज किया गया था। इस थाने पर इस दौरान एक भीड़ ने हमला बोल दिया था और ग्रेनेड भी फेंक दिया था। भीड़ कह रही थी की ईशनिंदा का आरोपित उनके हवाले कर दिया जाए।

भीड़ इस ईशनिंदा के आरोपित को मारना चाहती थी। इस भीड़ में पाकिस्तान की इस्लामी कट्टरपंथी पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक (TLP) के लोग भी शामिल थे। इस घटना का एक वीडियो भी वायरल हुआ था जिसमें कट्टरपंथी भीड़ थाने का दरवाजा तोड़ने की कोशिश करते हुए देखी जा सकती है।

TLP के लोगों ने अब मार दिए गए ईशनिंदा के आरोपित को मौत की सजा देने की माँग करते हुए क्वेटा की सड़कें जाम कर दी थीं। हालाँकि, तब क्वेटा प्रशासन ने उन्हें किसी तरह समझा लिया था। लेकिन इसके बाद इस कट्टरपंथी पुलिसकर्मी ने आरोपित को थाने में ही मार दिया।

सोशल मीडिया पर यह भी दावा किया गया है कि इस पुलिसकर्मी के परिजनों को इस्लामी कट्टरपंथियों ने सम्मानित भी किया है। एक वीडियो वायरल है जिसमें कुछ लोग एक शख्स को माला पहना रहे हैं, उसके हाथ चूम रहे हैं। बताया जा रहा है कि वह पुलिसकर्मी का पिता है।

हालाँकि, यह कोई पहली घटना नहीं है जब पुलिसकर्मियों ने ईशनिंदा के आरोपितों की हत्या की हो। इससे पहले भारतीय पत्रकार तवलीन सिंह के पति और पाकिस्तान के बड़े नेता सलमान तासीर की उनके ही बॉडीगार्ड ने हत्या कर दी थी। उन पर भी ईशनिंदा का आरोप था।

पुणे में गणपति विसर्जन पर खूब बजेंगे ढोल-नगाड़े, CJI चंद्रचूड़ वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने दी हरी झंडी: NGT ने लगाई थी रोक

सुप्रीम कोर्ट ने गणपति विसर्जन में ढोल-ताशे की संख्या पर सीमा लगाने वाले करने वाले राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) के एक आदेश पर रोक लगा दी है। यह आदेश पुणे शहर के लिए दिया गया था। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने NGT का यह निर्णय रोका है।

गुरुवार (12 सितम्बर, 2022) को चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने सुनवाई करते हुए महाराष्ट्र सरकार, पुणे अधिकारियों, महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) समेत अन्य को इस मामले में नोटिस भी जारी किए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “इनको अपना ढोल-ताशा बजाने दीजिए, यह पुणे का दिल है।” NGT ने इससे पहले प्रत्येक गणेश पंडाल के आसपास ध्वनि प्रदूषण की निगरानी करने और इसका उल्लंघन करने वालों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करने का निर्णय लिया था। इसके साथ ही उसने ढोल-ताशा-जंज बजाने वाले ग्रुप की संख्या को 30 लोगों तक सीमित करने का आदेश दिया था।

इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील अमित पई ने कहा कि पुणे में गणपति विसर्जन में ‘ढोल ताशा’ का बहुत गहरा सांस्कृतिक महत्व है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता को गणेश चतुर्थी समारोह के दौरान ध्वनि प्रदूषण को सीमित करने के NGT के बाकी निर्देशों से कोई समस्या नहीं है लेकिन वह ढोल ताशों का की संख्या घटाने के खिलाफ हैं।

CJI की बेंच ने कहा कि इस मामले में नोटिस जारी कर दीजिए। बेंच ने कहा कि पई ने इस मामले में बताया है कि यदि इसे आगे बढ़ाया तो NGT का निर्देश नम्बर 4 लागू हो जाएगा और ढोल ताशे नहीं बज पाएँगे। CJI ने कहा कि ढोल ताशा बजाने दीजिए क्योंकि यह पुणे का दिल है।

गौरतलब है कि NGT ने 30 अगस्त को आदेश दिया था कि 7 सितंबर से शुरू होने वाले 10 दिवसीय गणेशोत्सव के दौरान ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए गणेश पंडालों की निगरानी की जाए। इसके अलावा NGT ने विसर्जन जुलूसों को लेकर भी कुछ निर्देश दिए थे।

NGT ने पंडाल में 100 वाट की क्षमता से अधिक लाउडस्पीकर पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके अलावा विसर्जन जुलूस के दौरान टोल और डीजे सेट के उपयोग पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। साथ ही NGT ने ढोल ताशा वाले समूह की संख्या घटा कर 30 कर दी थी।

मेजर हर्षित चौधरी बन शहबाज ने कई हिंदू लड़कियों को फाँसा, शादी भी की: वन्दे भारत में चोरी से खुला राज, अधिकारी लड़की से फिर शादी के लिए करने गया था बात

उत्तर प्रदेश के रहने वाले शहबाज ने फर्जी हिन्दू नाम रख कम से कम दो दर्जन हिन्दुओं लड़कियों को निशाना बनाया। उन्हें झूठी पहचान के आधार पर फंसा कर बाद में उनसे पैसे वसूले। उसने एक हिन्दू लड़की से फर्जी पहचान के आधार पर शादी भी कर ली। लव जिहाद करने वाले शहबाज को अहमदाबाद पुलिस ने दिल्ली से पकड़ा तो कई खुलासे हुए।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, अहमदाबाद में 31 अगस्त को वन्दे भारत ट्रेन में एक बैग की चोरी हुई थी। इस चोरी की जाँच में पुलिस को हर्षित चौधरी नाम के आदमी का पता लगा था। उसके टिकट से पुलिस ने जानकारी निकाल कर उसका नम्बर ट्रेस किया था।

अहमदाबाद पुलिस को उसकी लोकेशन दिल्ली में मिली थी। इसके बाद पुलिस उसे पकड़ ले गई थी। पुलिस को शहबाज ने अपनी पहचान सेना में तैनात मेजर के तौर पर बताई थी। हालाँकि, यह झूठ निकला। इसके अलावा उसके आधार और पैन कार्ड भी फर्जी निकले। यहाँ तक कि उसने सेना का पहचान पत्र बनवा रखा था जो फर्जी निकला।

पुलिस ने जब उसकी पड़ताल की तो सामने आया कि वह हर्षित चौधरी नहीं बल्कि अलीगढ़ का रहने वाला मोहम्मद शहबाज है जो फर्जी पहचान के आधार पर ऑनलाइन साईट से हिन्दू लड़कियों को निशाना बनाता है। पुलिस ने उसकी फोन की जाँच भी की। उसके फोन में लगभग 24 लड़कियों के फोटो मिले।

पुलिस ने जब पूछताछ की तो शहबाज ने बताया कि वह सब कहीं अपनी पहचान मेजर हर्षित चौधरी के तौर पर बताता है और इसके सहारे अच्छी कमाई करने वाली लड़कियों को फंसाता है। उसने बताया कि वह शादी वाली साईट से लड़कियों को निशाने पर लेता है। वह इन लड़कियों को शादी का झांसा देकर सम्बन्ध बनाता है।

वह एक लड़की को अपने जाल में फँसाने के लिए ही अहमदाबाद आया था जहाँ उसने बैग चोरी किया। शहबाज ने बताया कि वह इन हिन्दू लड़कियों को ब्लैकमेल करता है और उनसे पैसे वसूलता है। वह बार बार यही क्रम दोहराता है। मोहम्मद शहबाज कुछ वर्ष सेना में रहा भी है, इसीलिए वह अपने आप को मेजर बता लेता है और किसी को शक नहीं होता।

बताया गया है कि मोहम्मद शहबाज को सेना से बर्खास्त किया जा चुका है। मोहम्मद शहबाज ने झारखंड की हिन्दू लड़की से शादी भी की है। वह उसे अलीगढ़ में ले कर रहता था। यह शादी हिन्दू तौर तरीके से हुई है। लड़की को भी इस बात की जानकारी अब हुई है कि उसकी शादी हर्षित नहीं बल्कि शहबाज से हुई है।

अब उस हिन्दू लड़की ने भी अलीगढ़ में एक FIR दर्ज करवाई है। पीड़िता ने आरोप लगाया है कि शहबाज उससे मारपीट करता था और जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाता था। इस मामले में अलीगढ़ पुलिस उसे गुजरात से लेकर भी आई है। शहबाज के बारे में खुलासा हुआ है कि वह पहले से शादीशुदा है, उसका पाँच साल पहले निकाह हुआ था और उसके 2 बच्चे हैं।

पुलिस अब उसके खिलाफ आगे की कार्रवाई कर रही है। मामले में अगर वह पीड़ीताएं भी सामने आती हैं जिनसे पूर्व में शहबाज ने ठगी और लव जिहाद किया है तो उसके खिलाफ और भी मामले दर्ज होने की संभावना है। शहबाज से अभी पुलिस और जानकारी निकालने की कोशिश कर रही है।

CPM नेता सीताराम येचुरी: एकमात्र हिंदू देश नेपाल से ‘हिंदू’ शब्द को गायब करने का रचा षड्यंत्र, साथ दिया था कॉन्ग्रेसी सरकार ने

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी), जिसे CPM या CPIM भी कहा जाता है, के महासचिव सीताराम येचुरी का निधन हो गया है। वे 72 साल के थे और निमोनिया की शिकायत होने के बाद उन्हें 19 अगस्त को दिल्ली के AIIMS में भर्ती कराया गया था। पिछले 25 दिन से उनका इलाज चल रहा था। वे 1974 में स्टूडेंट फेरेशन ऑफ इंडिया (SFI) से जुड़े थे।

CPI(M) की ओर से जारी एक बयान में कहा गया कि ‘कॉमरेड सीताराम येचुरी को साँस की नली में गंभीर संक्रमण हुआ था। डॉक्टरों की टीम उनका इलाज कर रही थी।’ कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने कहा, “वे मेरे अच्छे दोस्त थे। वे भारत के विचार के सच्चे रक्षक थे। वे देश को अच्छी तरह समझते थे। मैं उनके साथ की गई लंबी चर्चाओं को बहुत याद करूँगा। इस दुख की घड़ी में उनके परिवार के प्रति मेरी गहरी संवेदनाएँ हैं।”

चेन्नै के तेलुगू भाषी ब्राह्मण परिवार में 12 अगस्त 1952 को जन्मे सीताराम येचुरी नेपाल के राजा वीरेंद्र सिंह की लोकतांत्रिक पद्धति के खिलाफ और वामपंथियों के सहयोगी थे। वे नेपाल की विद्रोही वामपंथियों की समय-समय पर समर्थन एवं सहयोग किया। दुनिया के इकलौते हिंदू राष्ट्र के खिलाफ सीपीएम के सीताराम येचुरी और राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी के दिनेश चंद्र त्रिपाठी ने बड़ी भूमिका निभाई थी।

येचुरी और त्रिपाठी की मुलाकात माओवादी नेता बाबूराम भट्टाराई से दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में हुई थी, जहाँ वे छात्र नेता थे। साल 2006 में नेपाल में हिंदू राजशाही खत्म हो गई और वह हिंदू राष्ट्र से एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बन चुका था। उस दौरान येचुरी और त्रिपाठी नेपाली संसद में भी शामिल हुए थे।

नेपाल के पूर्व विदेश मंत्री और ‘भारत के अच्छे मित्र’ चक्र प्रसाद बस्तोला सहित नेपाली नेताओं ने उनका भव्य स्वागत किया था। संसद में येचुरी ने कहा था, “यह पूरी तरह से नेपाली लोगों की जीत है। अक्सर भारत को बड़े भाई के रूप में देखा जाता है। भारत और नेपाल भाई हैं, लेकिन जुड़वाँ हैं। एक की पीड़ा दूसरे में झलकती है। एक की जीत का जश्न दूसरा मनाता है।”

येचुरी और त्रिपाठी ने साउथ एशिया फाउंडेशन के राहुल बरुआ के साथ मिलकर साल 2005 में भारत में ‘नेपाल डेमोक्रेसी सॉलिडेरिटी कमेटी’ की स्थापना की थी। नेपाल में लोकतंत्र लाने के लिए येचुरी ने माओवादियों के साथ-साथ अपने प्रभाव का खूब इस्तेमाल किया। वहीं, त्रिपाठी ‘नेपाली कॉन्ग्रेस’ और शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाले उसके अलग हुए गुट नेपाली कॉन्ग्रेस (डेमोक्रेटिक) के करीब थे।

नेपाल में हिंदू राजशाही खत्म हुई तो तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने येचुरी का इस्तेमाल किया था। मनमोहन सिंह का मानना था कि जेएनयू के एक अन्य पूर्व छात्र रहे माओवादी बाबूराम भट्टराई पर वे अपना प्रभाव इस्तेमाल कर सकें। त्रिपाठी भट्टराई को भी अच्छी तरह जानते थे। हिंदू राजशाही खत्म होने से पहले येचुरी दो बार वामपंथियों का प्रतिनिधिमंडल लेकर नेपाल जा चुके थे।

नेपाल की राजनीति एवं हिंदू राजशाही के विरोध में सीताराम येचुरी की भूमिका का इसी अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी वजह से नेपाल के राजनीतिक दलों और माओवादियों के बीच 12 सूत्री समझौते हुए थे।इसे ‘येचुरी फॉर्मूला’ कहा गया था। तब येचुरी ने कहा था, “मैं इस तरह की ब्रांडिंग के खिलाफ हूँ। यह नेपाली फॉर्मूला है और नेपाली राजनीतिक दल यही चाहते थे।”

नेपाली संसद की बहाली और संविधान सभा के गठन की प्रक्रिया का स्वागत करते हुए सीपीएम नेता ने कहा था, “नेपाल को एक नए लोकतांत्रिक रास्ते पर चलना चाहिए। राजनीतिक प्रक्रिया को 1990 में जो हासिल हुआ था, उसे बहाल करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही समझ माओवादियों को लोकतांत्रिक मुख्यधारा में लाएगी।”

साल 2006 में नेपाल के लिए जाने से पहले उन्होंने माओवादी नेतृत्व प्रचंड से बात की थी। दिल्ली में उन्होंने कहा था, “उनका मुद्दा बिल्कुल स्पष्ट है। संविधान सभा के सवाल पर नेपाली लोगों के साथ दो बार विश्वासघात किया गया है? पहली बार 1951 में और फिर 1990 में। वे इसे दोहराना नहीं चाहते। यह उनके लिए एक उचित पूर्व शर्त है, जिसे वे ‘नेपाल के नए लोकतांत्रिक विकास’ कहते हैं।”

उन्होंने कहा :e, “इसका भारत में अति-वामपंथियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। आज की क्रांतियों में लोकतंत्र के लिए लोगों की चाहत को भी शामिल किया जाना चाहिए।” नेपाली कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष गिरिजा प्रसाद कोइराला के निमंत्रण पर येचुरी और त्रिपाठी नेपाल पहुँचे थे और वहाँ सात दलों के गठबंधन के नेताओं के साथ बैठक की थी।

नेपाल में जब संविधान लागू करने में कुछ ही महीने बाकी रहे तो सीताराम येचुरी वहाँ के राजनीतिक दलों से विचार विमर्श करने के लिए साल 2010 में तीन दिवसीय यात्रा पर नेपाल पहुँचे। इस दौरान वे नेपाली कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष गिरिजा प्रसाद कोइराला, नेपाल की एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के अध्यक्ष पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ और नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी) के अध्यक्ष झालानाथ खनल से भी मुलाकात की थी।

इस तह सीताराम येचुरी और दिनेश चंद्र त्रिपाठी ने पड़ोसी देश नेपाल की आंतरिक राजनीतिक हालातों में हस्तक्षेप करते हुए वामपंथियों को हर तरह से मदद पहुँचाई। इसके बाद हिंदू राष्ट्र की पदवी को खत्म करके भारत के इस पड़ोसी देश को एक धर्मनिरपेक्ष देश घोषित कराने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ज्योति बसु CPM पोलित ब्यूरो के सदस्य येचुरी को खतरनाक आदमी कहा करते थे।

सुल्तानपुर डकैती में शामिल था मंगेश यादव, यूपी डीजीपी ने जारी किया सबूत: वीडियो में मृतक की बहन के बयान से अखिलेश यादव की राजनीति पर फिरा पानी

उत्तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक (डीजीपी) प्रशांत कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके साफ किया है कि डकैत मंगेश यादव सुल्तानपुर में हुई डकैती में शामिल था। उन्होंने इसके सबूत में एक CCTV वीडियो भी जारी किया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि पुलिस किसी की जाति देख कर एनकाउंटर नहीं करती है।

गुरुवार (12 सितम्बर, 2024) को हुई लखनऊ में डीजीपी प्रशांत कुमार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने सुल्तानपुर में हाल ही में डकैत मंगेश यादव के एनकाउंटर पर बात की। उन्होंने इस संबंध में उठाए गए प्रश्नों का जवाब भी दिया।

इस दौरान डीजीपी प्रशांत कुमार ने सुल्तानपुर डकैती कांड का एक वीडियो मीडिया को दिखाया। इसमें पुलिस ने अपराधियों पर नंबर भी लिख रखे थे। डीजीपी ने बताया कि वीडियो में पाँच नम्बर पर दिखने वाला अपराधी मंगेश यादव था। वह हेलमेट पहन कर दुकान में घुसा था।

डीजीपी प्रशांत कुमार ने बताया कि इस दौरान मंगेश हथियारों से लैस था और पिस्टल के डैम पर दुकानदार को धमका रहा था। वह दुकान में तीसरे नम्बर पर घुसा था। उससे पहले अनुज प्रताप सिंह और एक और लुटेरा सर्राफ की दुकान के भीतर पहुँच चुका था। मंगेश यादव केवल घटना में शामिल ही नहीं था बल्कि उसने जौनपुर से एक बाइक भी चुराई थी।

यह बाइक इस लूट में काम में ली गई थी। डीजीपी प्रशांत कुमार ने इस दौरान एक और वीडियो भी साझा किया जिसमें पुलिस को मंगेश की बहन बता रही हैं कि वह दो महीने से घर नहीं पहुँचा है। बाद में मंगेश की बहन ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि लूट वाले दिन मंगेश घर पे था। ऐसे में दोनों बयानों में अंतर नजर आया।

प्रशांत कुमार ने बताया कि इस वारदात में एक बोलेरो गाड़ी उपयोग की गई थी, उसे भी बरामद कर लिया गया था। इस बोलेरो के भीतर से 15 किलो चाँदी मिली थी। इसके अलावा 1.2 किलो सोना एक खेत से मिला था। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि इस घटना में मुख्य आरोपित विपिन सिंह ने स्वयं रायबरेली कोर्ट में सरेंडर कर दिया था।

वहीं मंगेश यादव के एनकाउंटर पर डीजीपी प्रशांत कुमार ने कहा कि पुलिस जाति देख कर काम नहीं करती। उन्होंने कहा कि मंगेश यादव के लूट में शामिल होने के सबूत थे और उस पर की गई कार्रवाई निष्पक्ष है। उन्होंने कहा कि इस मामले को लेकर लगातार भ्रम फैलाया जा रहा था जिसे हमने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से दूर करने का प्रयास किया है।

क्या था मामला?

सुल्तानपुर में बदमाशों के एक गैंग ने 28 अगस्त, 2024 को दिन दहाड़े भारत सर्राफ नाम की एक दुकान पर धावा बोल कर उसे लूट लिया था। इस दौरान कई बदमाश दुकान के अंदर घुसे थे जबकि बाकी बाहर मौजूद थे। यह दुकान से करोड़ों का सोना-चाँदी और कैश लेकर गए थे। इस घटना के बाद पुलिस ने इनकी जाँच चालू की थी। मामले में कई आरोपितों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था जबकि विपिन सिंह ने सरेंडर कर दिया था। वहीं मंगेश यादव इस मामले में फरार था।

2 सितम्बर, 2024 को मंगेश का सामना UPSTF से हो गया। इस दौरान उसने सरेंडर के बजाय पुलिस पर ही गोली चला दी थी। इसके बाद पुलिस की जवाबी कार्रवाई में उसकी मौत हो गई। इसके बाद इस मुद्दे ने तूल पकड़ लिया। समाजवादी पार्टी मुखिया ने इस एनकाउंटर में गड़बड़ी के आरोप लगाए और कहा कि पुलिस ने जाति देख कर यह किया। हालाँकि, यूपी पुलिस के मुखिया प्रशांत कुमार ने खुद ही सामने आ कर इस मामले में सब कुछ स्पष्ट कर दिया है।

PM मोदी के जन्मदिन पर अजमेर दरगाह में लगेगा लंगर, शाही देग में तैयार होगा 4000 किलो शाकाहारी खाना: सलामती की दुआ भी पढ़ी जाएगी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 74वें जन्मदिन के मौके पर 17 सितंबर को अजमेर शरीफ दरगाह की ओर से 4000 किलो शाकाहारी भोजन तैयार करवाकर वितरित करने का निर्णय लिया गया है। दरगाह के अधिकारियों की ओर से बताया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन और सेवा पखवाड़ा के मौके पर ये खाना अजमेर दरगाह की शाही देग में तैयार होगा।

इस आयोजन को लेकर अजमेर शरीफ के सैयद अफशां चिश्ती ने बुधवार को जानकारी दी। उन्होंने कहा कि शाही देग में सालों से शाकाहारी भोजन तैयार होता आया है और आने वाली 17 सितंबर को इसमें 4,000 किलो शाकाहारी भोजन तैयार होगा, जिसमें शुद्ध चावल और इसके साथ ही घी, मेवे आदि डाले जाएँगे। बाद में इसे गरीबों को बाँटा जाएगा।

उन्होंने बताया कि ये आयोजन पीएम मोदी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में होगा। साथ ही कहा ऐसा पहली बार हो रहा है कि देश के किसी प्रधानमंत्री के लिए दरगाह की देग में लंगर तैयार होगा। सैयद अफशां चिश्ती ने कहा कि इस आयोजन के साथ वह लोग पीएम मोदी के जन्मदिन पर उनकी लंबी उम्र के लिए भी प्रार्थना करेंगे। पूरे लंगर का आयोजन इंडियन माइनॉरिटी फाउंडेशन और अजमेर शरीफ के चिश्ती फाउंडेशन द्वारा किया जा रहा है।

भोजन का विरतरण 17 सितंबर को सुबह भर रहेगा। दरगाह से जुड़े लोग व्यवस्थित तरीके से इसे वितरित करने में मदद करेंगे। दरगाह के अधिकारियों ने बताया उनके द्वारा किया जा रहा यह कार्यक्रम न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के जश्न का प्रतीक है, बल्कि सेवा और सामुदायिक कल्याण की भावना को भी दर्शाता है। अधिकारियों के अनुसार, इस कार्यक्रम में पीएम मोदी की दुआ और सलामती के लिए दुआ भी पढ़ी जाएगी। साथ ही कुरान की आयतों का पाठ होगा, नात (भक्ति गीत गाए जाएँगे) और कव्वाली होगी।