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हिन्दू छात्रों के कलावा और तिलक पर बैन, मुस्लिमों को नमाज़ के लिए छुट्टी: कॉलेज प्रिंसिपल मोहसिन अली के खिलाफ प्रदर्शन, ‘जय श्री राम’ और ‘वन्दे मातरम्’ के नारे

उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में एक इंटर कॉलेज के अंदर हिन्दू छात्रों ने अपने प्रिंसिपल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। छात्रों का आरोप है कि प्रिंसिपल मोहसिन अली ने उन्हें कलावा बाँधने और तिलक लगाने से रोका है। इन्ही छात्रों के मुताबिक कॉलेज के अंदर मुस्लिम छात्रों को जुमे की नमाज़ के लिए 12 बजे छुट्टी कर दी जाती है। मामले की जानकारी मिलने पर ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ (ABVP) से जुड़े छात्रों ने हंगामा करते हुए मोहसिन पर कार्रवाई की माँग की है। घटना बुधवार (4 सितंबर, 2024) की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना अमरोहा जिले के थाना क्षेत्र गजरौला की है। यहाँ मंडी समिति मार्ग पर पियर्स चड्ढा इंटर कॉलेज में आसपास के कई छात्र-छात्राएँ पढ़ाई करते हैं। बुधवार को यहाँ ABVP से जुड़े छात्र हंगामा शुरू कर दिए। इनके साथ ‘बजरंग दल’ के सदस्य भी शामिल हो गए। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रिंसिपल मोहसिन अली हिन्दू और मुस्लिम छात्रों में भेदभाव करता है। उन्होंने बताया कि मोहसिन अली हिन्दू छात्रों को तिलक और कलावा बाँधने पर रोकता-टोकता है।

इन्हीं छात्रों ने आगे बताया कि मोहसिन का व्यवहार मुस्लिम छात्रों के लिए एकदम अलग है। प्रार्थना के दौरान मुस्लिम छात्रों से हाथ न जोड़ने के लिए कहा जाता है। साथ ही जुमे के दिन (शुक्रवार) को उनकी छुट्टी कर दी जाती है। इन छात्रों ने मोहसिन अली पर कड़ी कार्रवाई की माँग की। कॉलेज के गेट पर भारत माता की जय, जय श्री राम और ‘वन्दे मातरम्’ के नारे लगे। इस दौरान छात्रों ने मनमानी नहीं चलने देने का एलान किया। हंगामे की सूचना पर पुलिस फ़ौरन ही कॉलेज पहुँच गई। प्रदर्शनकारी छात्रों को समझा कर शांत किया गया।

इस हंगामे का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। प्रिंसिपल मोहसिन अली से भी बातचीत की गई। इस पूरे मामले में मोहसिन अली का भी बयान सामने आया है। मोहसिन ने बताया कि अभी हाल में ही उन्होंने कॉलेज का संचालन सँभाला है। जो भी नियम पालन करवाए जा रहे थे वो सब पहले के बने थे। प्रशासन की मौजूदगी में इन नियमों के सुधार करने का समझौता हुआ। इस समझौते का लिखित प्रमाण भी बनाया गया। आखिरकार मामले का काफी जद्दोजहद के बाद मामले का पटाक्षेप हुआ।

बहराइच में कहाँ से आ गए आदमखोर भेड़िए, जिन्होंने 55 गाँवों में मचाया आतंक: जानिए – कैसे 28 साल पहले यूपी के 3 जिलों में गई थी 30 बच्चों की जान

उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिले बहराइच में भेड़ियों का आतंक है। मार्च 2024 से शुरू हुए भेड़ियों के खूनी हमलों में अब तक 9 बच्चों समेत 10 लोगों की मौत हो चुकी है, तो 34 से अधिक लोग घायल हो चुके हैं, जिसमें अधिकाँश बच्चे हैं। इन घटनाओं के बाद प्रशासन की ओर से 32 राजस्व विभाग की टीम और 25 वन विभाग की टीम तैनात की गई है। ड्रोन समेत तमाम सर्विलांस उपकरणों की मदद से अब तक 4 भेड़ियों को पकड़ा जा चुका है। इसके बावजूद अभी तक 2 नरभक्षी पकड़े नहीं जा सके हैं। बहराइच में भेड़ियों के हमले की खबरें लगातार सुर्खियों में हैं। ऐसे में ये जानना जरूरी हो गया है कि ये समस्या आखिर आई क्यों? क्या ऐसे मामले पहले भी आ चुके हैं?

दरअसल, भेड़िये तेजी से विलुप्त होते वन्यजीवों की श्रेणी में हैं। पूरे देश में खासकर उत्तर भारत में इनकी संख्या महज 2000 से 3000 के बीच ही बची है। हालाँकि अतीत में भारत में भेड़ियों की संख्या बहुत ज्यादा हुआ करती थी। अंग्रेजों के समय में भेड़ियों को मारने का बड़ा अभियान चला था, जिसमें 40 सालों में 1 लाख से अधिक भेड़ियों को शिकारियों ने मार डाला था और ब्रिटिश राज से ईनाम भी हासिल किया था। इस लेख में भेड़ियों से जुड़े ऐसे ही तथ्यों को शामिल किया गया है।

लोककथाओं में भेड़ियों का अहम स्थान, महाभारत काल में भीम से जुड़ाव

भेड़ियों ने मानव संस्कृति में एक जटिल स्थान प्राप्त किया है, जहाँ वे कभी खतरनाक शिकारी के रूप में तो कभी ताकत के प्रतीक के रूप में उभरे हैं। भारतीय महाकाव्य महाभारत में, भीम को “वृकोदर” नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है “भेड़िये का पेट,” जो उनकी अतृप्त भूख को दर्शाता है। इसी तरह, अंग्रेजी में “hungry as a wolf” और “wolfing down food” जैसे मुहावरे भेड़िये की भूख की प्रतीकात्मकता को प्रकट करते हैं।

पश्चिमी लोककथाओं में भेड़िये अक्सर खलनायक की भूमिका में नजर आते हैं, जैसे कि “Big Bad Wolf” और “Werewolf” की कहानियों में। हालाँकि, उन्हें सम्मान के प्रतीक के रूप में भी देखा गया है, जैसे कि ग्रीक देवता अपोलो और रोमन देवता मार्स के साथ उनका संबंध। रोमन मिथक में, एक मादा भेड़िया ने रोम के संस्थापक रोमुलस और रेमुस को पाला था। वहीं, मशहूर लेखक रुडयार्ड किपलिंग की “द जंगल बुक” में, “सीओनी भेड़िया” दल, जिसका नेतृत्व नेकदिल अकैला करता है, एक हीरो के तौर पर है। वहीं, शेर खान नाम का बाघ विलैन के रूप में है।

भेड़ियों के हमलों का अतीत

भारत में भेड़ियों का इंसानों पर हमला करना कोई नई बात नहीं है। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश राज के समय, भेड़ियों के हमलों से कई लोगों की जान गई थी। 1866 में, कैप्टन बी. रोजर्स ने निचले बंगाल में भेड़ियों द्वारा 4,287 लोगों की मौत दर्ज की, जो उस समय बाघों द्वारा की गई 4,218 मौतों से भी थोड़ी ज्यादा ही थी। इसी प्रकार, 1875 में सर्जन जनरल जोसेफ फायरर के अनुसार, उत्तर भारत में भेड़ियों ने 1,018 लोगों की जान ली थी, जो बाघों द्वारा मारे गए 828 लोगों से भी अधिक थी।

ध्यान देने वाली बात यह है कि पंजाब, राजस्थान, गुजरात और दक्कन पठार जैसे क्षेत्रों में भेड़िये के हमलों से इंसानी मौत के मामले बेहद कम थे, जबकि इन क्षेत्रों में भेड़ियों की संख्या अधिक थी। ब्रिटिश सरकार ने इस खतरे का मुकाबला करने और भेड़ियों के हमलों को नियंत्रित करने के लिए इनाम की घोषणा की गई, जिसके परिणामस्वरूप 1871 से 1916 के बीच उत्तर-पश्चिम प्रांतों और अवध में 1 लाख से अधिक भेड़ियों को मार दिया गया। इसके बावजूद, भारतीय भेड़िए अपने जीवित रहने के लिए संघर्ष करते रहे और आज उनकी आबादी महज 3,000 के करीब ही रह गई है।

बीते कुछ दशकों में भेड़ियों के हमलों में काफी मौतें

भारत में भेड़ियों के हमलों का एक लंबा और भयावह इतिहास है। 1985-86 में, मध्य प्रदेश के आष्ठा में चार भेड़ियों के एक समूह ने 17 बच्चों की हत्या कर दी, जिससे क्षेत्र में व्यापक दहशत फैल गई। इसी तरह, 1993 से 1995 के बीच, बिहार के हजारीबाग पश्चिम, कोडरमा और लेटेहर वन मंडलों में भेड़िया दलों द्वारा 60 बच्चों की मौत के मामले सामने आए। इन हमलों की वजह भी प्राकृतिक शिकार की कमी और भेड़िया-कुत्ता संकरों की वृद्धि को माना गया है।

वाई.वी. झाला और डी.के. शर्मा द्वारा साल 1996 में किए गए एक रिसर्च में, पूर्वी उत्तर प्रदेश में 76 बच्चों पर हुए हमलों का विश्लेषण किया गया। उनके अध्ययन में बताया गया कि इन हमलों में एक ही अल्फा मेल भेड़िया या उसके ग्रुप की भूमिका थी, न कि कई ग्रुपों ने। पूर्वी यूपी के तीन जिलों प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और जौनपुर में साल 1996 के मार्च से अक्टूबर महीने तक भेड़िये का आतंक था। तीनों जिलों में 30 बच्चों की मौत हुई थी। हर तीसरे दिन भेड़िया हमला करता था। हर पाँचवें दिन एक बच्चे की मौत हो रही थी। हर हमले वाली जगह में कम से कम 13 किमी का अंतर होता था।

उस समय इन तीनों में जिलों में भेड़िये को वेयरवुल्फ माना गया (इंसानी भेड़िया- ट्विलाइट सागा सीरीज में ऐसे किरदार दिखे और बॉलीवुड फिल्म भेड़िया में भी)। उसे मनई (Manai) कहा जा रहा था। मनई आम तौर पर इंसान के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला अवधी बोली का शब्द है। ऐसे में उस दौर में कोई अंजान आदमी प्रभावित इलाके के किसी गाँव में दिख जाता था, तो लोग उसे ‘मनई’ समझ कर मारने की कोशिश करते थे। ऐसे में लोगों का घरों से बाहर निकलना भी बंद हो गया था। इस मामले में सामने आया कि शिकारी भेड़िया बेहद ताकतवर था और अपने ग्रुप के मुखिया के जैसा था। ऐसे ग्रुप के मुखिया को ‘अल्फा मेल’ भी कहा जाता है। बाद में उस भेड़िये को शिकारियों ने मार गिराया था।

भेड़ियों से जुड़ी समस्या सुलझाने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण

भेड़ियों के हमलों को नियंत्रित करने के लिए एक लक्षित और सबूत-आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता है। पीड़ितों के लार के नमूनों का डीएनए परीक्षण, चोटों के पैटर्न का विश्लेषण, और स्थानीय मांडवों का सर्वेक्षण जिम्मेदार जानवरों की पहचान में मदद कर सकते हैं। जब एक भेड़िया मानवों पर हमला करने की आदत डाल लेता है, तो उसे तुरंत हटाना आवश्यक हो जाता है। इससे न केवल मानव जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों को भी समर्थन मिलेगा।

भेड़ियों के हमले कैसे हो सकते हैं कम

हालाँकि, यह समस्या तब तक पूरी तरह से हल नहीं हो सकती जब तक कि भेड़ियों को उनके प्राकृतिक आवास और शिकार का पर्याप्त हिस्सा नहीं दिया जाता। मानव-भेड़िया संघर्ष की समस्या को हल करने के लिए दीर्घकालिक योजनाओं की आवश्यकता है। इसमें जंगली क्षेत्रों का संरक्षण, भेड़ियों के प्राकृतिक शिकार की सुरक्षा, और स्थानीय समुदायों के साथ सहयोग शामिल है। साथ ही, जनता के बीच जागरूकता फैलाने और भेड़ियों के साथ सह-अस्तित्व के उपायों को अपनाने की भी आवश्यकता है।

इस तरह बहराइच में भेड़ियों के हमलों ने न केवल तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता को उजागर किया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि कैसे मानव गतिविधियों का वन्यजीवों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि हम इस समस्या का समाधान करना चाहते हैं, तो हमें भेड़ियों को उनके प्राकृतिक अधिकारों का हिस्सा देना होगा, और साथ ही उन्हें हमारे समाज के लिए खतरा बनने से रोकने के उपाय करने होंगे।

‘औक़ात है कि मेरे स्टूडियो में पाकिस्तानी झंडा फहराओगे?’: कभी जो DD यासीन मलिक को करता था कवर, अब वहीं से लताड़ कर भगाए जा रहे पाकिस्तान-परस्त

पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ‘DD न्यूज़’ पर ‘दो टूक’ कार्यक्रम लेकर आते हैं। बुधवार (28 अगस्त, 2024) को उनके शो में कुछ ऐसा हुआ कि वो अपना आपा खो बैठे। असल में इस शो में जम्मू कश्मीर में हो रहे विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र बहस चल रही थी। इसमें फारूक अब्दुल्लाह की ‘जम्मू कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस’ (JKNC) के प्रवक्ता के रूप में नासिर लोन थे। इस दौरान नासिर लोन ने कुछ ऐसा कह दिया जो अशोक श्रीवास्तव को बुरा लगा और उन्होंने ऑन-कैमरा कड़ा विरोध दर्ज कराया।

असल में नासिर लोन ने भारत के राष्ट्रध्वज तिरंगा का अपमान करते हुए जम्मू कश्मीर का पुराना झंडा वापस लाने की बात कही, न्यूज़ चैनल के स्टूडियो में पाकिस्तानी झंडा फहराने की बात की। इस पर शो के एंकर अशोक श्रीवास्तव ने कहा, “हिम्मत है तो चढ़ा कर दिखाइए। अरे, आपका क्या, आपके बाप में दम नहीं है कि पाकिस्तान का झंडा यहाँ लेकर आ जाइए। आप जैसे गद्दार पाकिस्तानी झंडा लेकर आएँ, यहाँ से जूता मार-मार कर निकालूँगा। आपकी औक़ात है, हिम्मत है पाकिस्तान का झंडा लेकर आने की?”

अशोक श्रीवास्तव ने आगे नासिर लोन को फटकारते हुए कहा, “मेरे स्टूडियो में पाकिस्तान का झंडा लेकर आएँगे? किसी की औक़ात है? अगर लगाएँगे न, तो आपके पिछवाड़े में भी वहाँ पता चलेगा। ये अनुच्छेद-370 वाली आपकी सरकार नहीं है कि आप पाकिस्तान का झंडा लहराएँगे यहाँ।” इसके बाद उन्होंने नासिर लोन की आवाज़ बंद करने के लिए टेक्नीशियन को कहा। असल में पूरा मामला JKNC के घोषणा-पत्र से शुरू हुआ। अशोक श्रीवास्तव के अनुसार, इसमें लिखा है कि पाकिस्तान झंडा फहराने वालों और पत्थरबाजों पर से मुक़दमे हटाए जाएँगे।

इस पर नासिर लोन पूछने लगे कि अगर कोई पागल आपके स्टूडियो में आकर पाकिस्तान का झंडा फहरा दे तो क्या आप पाकिस्तानी साबित हो जाएँगे? अशोक श्रीवास्तव इसी चीज को बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्होंने लताड़ लगा दी। बता दें कि जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव के लिए फारूक अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर अब्दुल्लाह की पार्टी ने कॉन्ग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन किया है। जब कश्मीरी पंडितों का नरसंहार शुरू हुआ था तब फारूक अब्दुल्लाह मुख्यमंत्री थे बाद में वो लंदन में छुट्टियाँ मनाने चले गए थे।

कई लोगों को ‘DD न्यूज़’ का बदला हुआ रूप पसंद नहीं आ रहा है। अशोक श्रीवास्तव ने बाद में अपने एक ‘X’ पोस्ट में स्पष्टीकरण देते हुए लिखा भी कि उन्होंने बहस तीखी होने के दौरान एक पैनलिस्ट के साथ ऐसे शब्दों का प्रयोग कर दिया जो उन्हें नहीं करनी चाहिए थी। उन्होंने इस पर अफ़सोस जताते हुए बताया कि कैसे उनके स्टूडियो में पाकिस्तानी झंडा फहराने की बात की गई थी। अशोक श्रीवास्तव ने लिखा कि एक पत्रकार और पब्लिक ब्रॉडकास्टर से जुड़ा एंकर होने के नाते उन्हें अपने गुस्से और भाषा पर नियंत्रण रखनी चाहिए थी।

हालाँकि, अधिकतर लोगों ने इस पोस्ट की रिप्लाई में अशोक श्रीवास्तव का समर्थन किया और कहा कि पाकिस्तान की तरफदारी करने वालों को ऐसे ही जवाब दिया जाना चाहिए। याद कीजिए, ये वही ‘DD न्यूज़’ है कभी जिसके पत्रकार जम्मू कश्मीर के आतंकी यासीन मलिक और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की PMO में मुलाकात को कवर करते होंगे, उन्हें उस यासीन मलिक के खिलाफ चुप रहने को कहा जाता होगा। उस समय डीडी न्यूज़ के पत्रकारों को मजबूरी में एक आतंकी को नेता की तरह पेश करना होता था, आज पाकिस्तान की पैरवी करने वाले भगाए जाते हैं।

बछिया को काटने जा रहे थे महफूज और महमूद: UP पुलिस ने रोका तो करने लगे फायरिंग, पाँव में लगी यूपी पुलिस की गोली, गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में मंगलवार (3 सितंबर 2024) को पुलिस और गो-हत्यारों के बीच मुठभेड़ हुई। महफूज़ और महमूद नाम के 2 सगे भाइयों द्वारा चलाई गोली में पुलिसकर्मी बाल-बाल बच गए। हालाँकि, जवाबी कार्रवाई में दोनों भाई घायल हो गए और पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस ने इनके पास से एक जिन्दा गोवंश, तमंचे, गोलियाँ और धारदार हथियार बरामद किए हैं।

यह घटना फतेहपुर जिले के थाना क्षेत्र सुल्तानपुर घोष की है। यहाँ के थाना प्रभारी राजेंद्र कुमार त्रिपाठी ने मंगलवार को अपने ही थाने में शिकायत दर्ज करवाई है। शिकायत में उन्होंने बताया कि 3 सितंबर को वे अपनी टीम के साथ गश्त कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें एक मुखबिर ने बताया कि बाइक सवार 2 लोग भट्ठे के पीछे एक बछिया (गोवंश) को काटने जा रहे हैं।

पुलिस टीम मौके पर पहुँची तो देखा कि बछिया पेड़ से बँधी हुई है और आरोपित उसे काटने की तैयारी कर रहे थे। पुलिस ने तलाशी देने के लिए कहा। पुलिस को देखते ही दोनों आरोपितों ने टीम पर गोलियाँ बरसानी शुरू कर दीं। गोली एक पुलिसकर्मी को छूती हुई निकल गई, जिसमें वह जवान बाल-बाल बच गए। जवाबी कार्रवाई में थाना प्रभारी ने भी गोलियाँ चलाईं।

इस कार्रवाई में दोनों आरोपित घायल हो गए। गोलियाँ उनके पैर में लगीं। घायलों की पहचान 44 वर्षीय महफूज़ और 42 वर्षीय महमूद के तौर पर हुई है। दोनों सगे भाई हैं और फतेहपुर जिले के ही मूल निवासी हैं। तलाशी के दौरान इन दोनों के पास से तमंचे, कारतूस, गाय काटने के लिए धारदार हथियार बरामद हुए। पुलिस ने दोनों आरोपितों से मिली बाइक भी सीज कर ली है।

पुलिस ने गोवंश को जीवित बचा लिया है। दोनों आरोपित भाइयों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कारवाया गया है। इन सभी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 109 के अलावा आर्म्स एक्ट व गोवध अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। पुलिस मामले की जाँच व अन्य जरूरी कार्रवाई कर रही है।

6 सितंबर को रिलीज नहीं होगी ‘इमरजेंसी’, बॉम्बे हाई कोर्ट ने सुनवाई टाली: बोलीं कंगना रनौत- मैं सबका पसंदीदा निशाना, देश को जगाने की वसूल रहे ‘कीमत’

बॉलीवुड अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके अपनी चिंताएँ जाहिर की हैं। उन्होंने यह पोस्ट अपनी फिल्म इमरजेंसी के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट से कोई राहत ना मिलने के बाद किया है। इसमें कंगना रनौत ने बताया है कि वह आजकल सबके निशाने पर हैं और यह कीमत उन्हें देश को जगाने के नाम पर मिली है।

कंगना रनौत ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “आज मैं सबका पसंदीदा निशाना बन गई हूँ, इस सोए हुए देश को जगाने के लिए आपको यही कीमत चुकानी पड़ती है। वे नहीं जानते कि मैं किस बारे में बात कर रही हूँ, उन्हें इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं है कि मैं इतनी चिंतित क्यों हूँ, क्योंकि वो लोग शांति चाहते हैं, वो किसी के साथ खड़े नहीं होना चाहते। वो कूल हैं, चिल हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “काश सीमा पर खड़े उस बेचारे सैनिक को भी शांत रहने का यही विशेषाधिकार मिलता होता, काश उसे किसी का पक्ष ना लेना पड़ता, और पाकिस्तानियों/चीनियों को अपना दुश्मन ना मानना ​​पड़ता। वह आपकी रक्षा कर रहा है जबकि आप आतंकवादियों या देशद्रोहियों को लेकर अच्छी बातें कर सकते हैं।”

कंगना ने इसके आगे भी लिखा, “काश वो युवती जिसका अपराध सिर्फ़ इतना था कि वो सड़क पर अकेली थी और उसके साथ बलात्कार हुआ, वो शायद एक शांत और दयालु इंसान थी जो मानवता में विश्वास करती थी लेकिन क्या उसकी मानवता का मोल उसे मिला? काश सभी लुटेरे और अपराधी भी इस शांत और सोई हुई पीढ़ी की तरह ही प्यार और स्नेह रखते लेकिन जिन्दगी की सच्चाई और है। चिंता मत करिए लेकिन वो आपके भी पीछे आ रहे हैं, हम अगर शांत हुए तो वो आपको भी निशाना बनाएँगे, और तब तुम्हे हमारी याद आएगी।”

कंगना रनौत का यह पोस्ट वर्तमान में चल IC814: द कंधार हाइजैक पर चल रहे विवाद और उनकी फिल्म इमरजेंसी की रिलीज रुकने के बाद आई है। उन्होंने इसमें किसी का नाम नहीं लिया है लेकिन उनका निशाना उनको माना जा रहा है जो इस हाइजैक के आतंकियों को लेकर मानवतावादी बातें कर रहे हैं।

इस बीच उनकी फिल्म इमरजेंसी को बॉम्बे हाई कोर्ट से भी राहत नहीं मिली है। बॉम्बे हाई कोर्ट में इस फिल्म के निर्माताओं ने केन्द्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड (CBFC) के विरुद्ध याचिका दायर की है। इमरजेंसी के निमाताओं ने कहा है कि सेंसर बोर्ड ने उनकी फिल्म का सर्टिफिकेट दे दिया है लेकिन इसे जारी नहीं कर रहे।

इमरजेंसी फिल्म निर्माताओं ने इस फिल्म को तुंरत सर्टिफिकेट दिए जाने की माँग की है। बुधवार (4 सितम्बर) को बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई की। हालाँकि, इमरजेंसी की रिलीज को इससे कोई राहत नहीं मिली और कोर्ट ने इस मामले में सेंसर बोर्ड 18 सितम्बर, 2024 को तक निर्णय करने का समय दिया है।

इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा, “हम इसके चलते कोई निर्देश पारित करने में नहीं कर पा रहे कि इस मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने जबलपुर सिख संगत के एतराजों पर ध्यान देने का आदेश CBFC को दिया है। अगर हम CBFC को प्रमाण सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश देते हैं, तो हम मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के निर्देश का उल्लंघन करेंगे।”

हाई कोर्ट ने कहा,”न्यायिक अवधारणा की माँग है कि ऐसे आदेश पारित नहीं किए जाने चाहिए। इसलिए, हम याचिकाकर्ता द्वारा मांगे गए प्रमाण सर्टिफिकेट जारी करने के लिए CBFC को निर्देश देने में असमर्थ हैं। हालाँकि, हम वर्तमान याचिका का निर्णय नहीं कर रहे। हम CBFC को 18 अगस्त तक समय दे रहे हैं।”

कंगना रनौत ने बॉम्बे हाई कोर्ट के सवालों को लेकर भी एक पोस्ट किया। उन्होंने कहा कि CBFC को हाई कोर्ट ने लताड़ दिया है।

गौरतलब है कि कंगना रनौत की फिल्म इमरजेंसी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के समय पर बनाई गई है। इस फिल्म में इंदिरा गाँधी का रोल कंगना रनौत ने स्वयं निभाया है। इस फिल्म को CBFC से सर्टिफिकेट जारी नहीं किया गया है। ऐसे में यह अब पूर्व में निर्धारित 6 सितम्बर, 2024 को नहीं रिलीज हो पाएगी।

स्वास्थ्य जाँच करने बच्चियों के स्कूल में जाता था डॉक्टर डेनियल, करता था अश्लील हरकतें: उसकी प्रिंसिपल माँ क्राइम को छिपाती थी, दोनों गिरफ्तार

तमिलनाडु के त्रिची में मंगलवार (3 सितंबर 2024) को पुलिस ने नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण के आरोप में एक सरकारी डॉक्टर को गिरफ्तार किया है। पीड़ित छात्राएँ सरकारी सहायता प्राप्त एक स्कूल के हॉस्टल में रहती थीं। आरोपित डॉक्टर की माँ इस स्कूल की प्रिंसिपल थी, जिसने मामले को दबाने की बहुत कोशिश की। पुलिस ने डॉक्टर की माँ को भी गिरफ्तार कर लिया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, घटना त्रिची जिले के पलक्कराई इलाके की है। यहाँ का रहने वाला 31 वर्षीय सैमसन डेनियल एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर के पद पर तैनात है। वह अक्सर शहर में ही मौजूद सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त एक प्राइमरी स्कूल के हॉस्टल में जाया करता था। डेनियल वहाँ रहने वाली छात्राओं का हेल्थ चेक किया करता था।

आरोप है कि चेकअप के बहाने वह 5 से 10 साल के उम्र की बच्चियों को बदनीयती से छूता था और उनके साथ अश्लील हरकतें करता था। इन बच्चियों में से कुछ ने डॉक्टर की इन हरकतों की जानकारी अपने अभिभावकों को दी। अभिभावकों ने चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 पर कॉल किया और डेनियल की शिकायत की।

चाइल्ड हेल्पलाइन की एक टीम ने सोमवार (2 सितंबर) को हॉस्टल का दौरा किया। टीम ने 42 नाबालिग छात्राओं एवं छात्रों के बयान लिए, जिसमें डॉक्टर डेनियल पर लगे आरोपों की पुष्टि हुई। चाइल्ड हेल्पलाइन की रिपोर्ट पर डॉक्टर डेनियल के खिलाफ FIR दर्ज कर ली गई। मंगलवार (3 सितंबर) को पुलिस ने आरोपित डॉक्टर को गिरफ्तार कर लिया है।

जाँच के दौरान पुलिस को पता चला कि आरोपित की 54 वर्षीया माँ ग्रेस सगायारानी इस स्कूल की प्रिंसिपल है। उन्होंने अपने बेटे को बचाने और मामले को दबाने की तमाम कोशिशें की। पुलिस ने डॉक्टर की माँ को भी गिरफ्तार कर लिया है। आरोपितों पर यौन शोषण सहित अन्य धाराओं में कार्रवाई की गई है।

हिंदू विलेन, इस्लाम अच्छा… वामपंथी प्रोपेगेंडा वाले फिल्म स्कूल के ‘अनुभव’ से निकला है ‘IC814’, इसलिए लव स्टोरी वाला बॉलीवुड प्रेम कहानी खत्म करने वाले आतंकियों से भी निभाता है मोहब्बतें

बॉलीवुड में प्रेम कहानियाँ दिखाने का चलन रहा है। विषय कोई भी, कितना ही गंभीर हो, बॉलीवुड वाले कहीं न कहीं से प्रेम कहानी को खोज लाते हैं और फिर फिल्म का अंत उसी कहानी के ईर्द-गिर्द करते हैं। हाल में नेटफ्लिक्स पर एक सीरिज आई- ‘आईसी 814- द कंधार हाईजैक।’ इसमें भी फिल्म निर्देशक अनुभव सिन्हा ने एक लव स्टोरी डाली लेकिन निर्देशकों ने इस सीरिज में इस लव स्टोरी को तवज्जों देना जरूरी नहीं समझा, शायद इसलिए क्योंकि उनका ध्यान इस्लामी आतंकियों की पहचान को ढाँकने में ज्यादा था जिन्होंने प्रेम कहानी का अंत किया।

अगर वो इस फिल्म में दिखाई गई प्रेम कहानी को मुख्य तौर पर दिखाते तो न उनका हिंदूफोबिक नैरेटिव चल पाता और न ही वो आतंकियों के कुकर्मों को धो पोंछने में सफल हो पाते। ये कहानी जिसे दिखाने से फिल्म के निर्देशकों ने परहेज किया वो रुपिन कात्याल और रचना कात्याल की थी।

हाईजैक के दौरान आतंकियों ने अपनी शर्त मनवाने के लिए एक नवयुवक की बर्बरता से गला रेतकर हत्या की थी। शायद संख्या के सुनने में ये ज्यादा भयावह न लगे कि 174 यात्रियों में से आतंकियों ने 1 को मार डाला, लेकिन अगर रचना की नजर से देखेंगे तो उनके लिए वो 1 व्यक्ति ही उनकी दुनिया था।

रचना कात्याल और रुपिन की कहानी

हाईजैक के समय रुपिन और रचना अपने हनीमून पर जा रहे थे। मात्र 22 दिन पहले ही उनकी शादी हुई थी। जाहिर है दोनों ने आगे जीवन के लिए कई सपने देखे होंगे, लेकिन उन आतंकियों ने रचना-रुपिन के सारे सपनों को चकनाचूर कर दिया। हाईजैक के बाद पहले रुपिन को अलग ले जाया गया और उसके बाद अपनी बात मनवाने के लिए उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। रचना बदहवास हालत में बार-बार अपने पति से मिलने के लिए मिन्नतें करती रहीं लेकिन वो आतंकी जिन्हें IC814 में दयालु और बार बार ये कहते दिखाया गया है- ‘हमें आपसे निजी दुश्मनी नहीं है’, उन्होंने एक भी बार रचना की ओर देखा तक नहीं। किसी आतंकी ने उनकी कोई बात नहीं सुनी।

7 दिन बाद जब सारे यात्री विमान से बाहर आए तब रचना बेसुध हो चुकी थीं। उन्हें बाकी कुछ याद नहीं था वो सिर्फ अपने पति को खोज रही थीं। विमान से उतरने के बहुत देर बाद तक उन्हें नहीं बताया गया था कि उनके पति अब दुनिया में नहीं हैं। सबको डर था कि कहीं रचना सदमे में न चली जाएँ। लोगों का डर सही था रचना को जब अपने पति की हत्या का पता चला तो वो एकदम शांत हो गईं। उन्हें कुछ समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या। आखिर में रचना को अवसाद से निकालने में उनके सास-ससुर ने उनकी मदद की।

क्यों छिपाए गए फिल्म में आतंकियों के नाम

अब बॉलीवुड फिल्म निर्माता अनुभव सिन्हा चाहते तो इस कहानी को प्रमुखता से दिखाकर बता सकते थे कि उस समय यात्रियों पर क्या बीती होगी, रचना कैसे दर्द से उभरी होंगी, लेकिन हुआ क्या? इस कहानी को कुछ मिनटों में समेटकर उन्होंने पूरी ताकत इस्लामी आतंकियों के बर्बर चेहरे को धो पोंछने में लगा दी। अनुभव सिन्हा ने अपनी फिल्म में आतंकियों के असली नाम तक छिपाए जबकि गृह मंत्रालय की साइट से लेकर सामान्य मीडिया रिपोर्ट तक में उनके नाम का उल्लेख था। सवाल उठने पर तर्क दे दिया गया कि सीरिज में सब असलियत दिखाई गई इसलिए वही कोडनेम इस्तेमाल हुए जो आतंकियों ने रखे थे।

अब ये बात अगर मान भी ली जाए कि फिल्म में भोला-शंकर जैसे नाम सिर्फ हकीकत दिखाने के लिए रखे गए थे, तो क्या ये प्रश्न नहीं उठता कि अगर निर्देशक ने कोडनेम फिल्म में इतनी प्रमुखता से बार-बार दिखाए तो वो ये भी दिखाएँ कि उन आतंकियों का असली नाम क्या था? एक तो अनुभव सिन्हा ने ऐसा किया नहीं, ऊपर से जब लोगों ने सवाल खड़े किए तो उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देना तक नहीं समझा।

खैर! अनुभव सिन्हा ने कुछ नया नहीं किया है। बॉलीवुड में हिंदूफोबिक कंटेंट दिखाने का काम और इस्लाम मजहब का महिमामंडन दशकों से होता रहा है। फिल्मों में भगवा पहनने वाले, टीका लगाने वाले को बलात्कारी, किडनैपर दिखाना और इस्लाम मानने वालों को इंसानियत का पहरेदार दिखाना बॉलीवुड का पुराना प्लॉट रहा है।

इस सीरिज में भी इसके अलावा और कुछ नहीं हुआ है। तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने अपनी किताब- अ कॉल टू ऑनर- इन सर्विस ऑफ इमरजेंस इंडिया में साफ कहा था कि इस मामले में आईएसआई का सीधा हाथ था। उन्होंने उन लोगों को कंधार में भेजा था जिनके दोस्त या रिश्तेदार भारत में बंद थे। बावजूद इस तथ्य के अनुभव सिन्हा ने इन बातों को सीरिज में दिखाना जरूरी तक नहीं समझा। उन्होंने इन बातों को छोटे-छोटे दृश्यों में समेटा और अपना कैमरा आतंकियों के उन चेहरों को दिखाने पर फोकस किया जहाँ वो परेशान थे, भावुक थे, यात्रियों से हँसी-मजाक कर रहे थे, अपने अपनों की याद में गुमसुम थे, इंसानियत दिखा रहे थे।

यात्रियों के दर्द को दिखाने में विफल हुई IC814

आतंकियों को इंसान दिखाने के प्रयास में और भारतीय सरकार को घेरने की कोशिश में वो न तो यात्रियों द्वारा झेले गए ट्रॉमा को समझा पाए और न ही उस महिला के दर्द को ढंग से दिखा पाए जिसने इस्लामी बर्बरता के कारण अपने जीवनसाथी को खो दिया।

दिलचस्प बात ये है कि ये बॉलीवुड वही है जो कश्मीरी पंडितों के दर्द को दिखाने के नाम पर एक प्रेम कहानी को परोस देता है और बड़ी चालाकी से महिलाओं के साथ हुए गैंगरेप और शरीर को चीरकर तीन हिस्सों में फेंकने वाली बर्बरता को छुपा लेता है। ये वही बॉलीवुड है जो राजी फिल्म में हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी की लव स्टोरी दिखाने लगता है और एक नायिका को इतना लाचार बता देता है जैसे उसे हिंदुस्तान से होने का पछतावा हो।

इसके अलावा फिल्म से तिरंगे गायब करके वहाँ पाकिस्तानी झंडे दिखाने में बॉलीवुड गुरेज नहीं करता लेकिन जब आतंकी घटना में आतंकी का असली नाम बताने पर बात आए तो उन्हें सरकारी दस्तावेज जैसी बातें याद आ जाती हैं।

न दर्द दिखाया, न क्रूरता

क्या आईसी814 को बनाते समय एक भी बात पीड़ित से उनका दर्द नहीं पूछा गया? शायद नहीं। क्योंकि अगर पूछा गया होता तो निर्माताओं को पता होता उस समय किस डर से लोग गुजर रहे थे। वो डर इतना भयानक था कि घटना के 24 साल बीत जाने के बाद वो लोग इस मुद्दे पर बनी फिल्म भी नहीं देखना चाहते।

पूजा उन्हीं लोगों में से एक हैं। उस प्लेन में उस दिन पूजा भी थीं। उनकी शादी राकेश से हुई थी। दोनों नेपाल हनीमून पर गए थे। पूजा ने मीडिया को साफ बताया कि प्लेन के अंदर मौजूद हाईजैकर्स मुसलमान थे, लेकिन वे एक दूसरे को बर्गर, डॉक्टर, भोला, शंकर और चीफ नाम से बुला रहे थे।

अब पूजा जिन्हें प्लेन के भीतर बाहर का कुछ भी नहीं पता था उन्हें भी समझ आ गया था कि आतंकी मुसलमान हैं, लेकिन इस घटना पर 24 साल बाद फिल्म बनाने वाले अनुभव सिन्हा को ये जरूरी नहीं लगा।

पूजा ने बताया कि वो 7 दिन उन लोगों के जीवन के सबसे खौफनाक दिन थे। लोगों को प्लेन में पैनिक अटैक पड़ रहा था। एक डॉक्टर नाम का हाईजैकर पूरे दिन लोगों को इस्लाम को लेकर स्पीच देता था। वह सबसे बस यही कहता था इस्लाम मजहब सबसे अच्छा है और सबको उसे कबूल लेना चाहिए।

अब जिस किसी ने इस सीरिज को देखा है वो बता सकता है कि कहीं भी आतंकी को प्लेन में इस तरह की कोई बातचीत करते नहीं दिखाया गया है उलटा दिखाने की कोशिश ये हुई है कि वो हाईजैकर्स अपने अपनों को छुड़ाने के लिए मजबूर थे और उन्होंने इसीलिए प्लेन हाईजैक किया। उस प्लेन में जिन्होंने वो खौफनाक दिन गुजारे वो मानते हैं कि फिल्म उस खौफ को दिखाने में विफल हुई है।

प्रयागराज के जिस मदरसे में छपते थे जाली नोट, उसे तुर्की-अरब से करोड़ों की फंडिंग: फर्जी आधार कार्ड का भी धंधा, 630 छात्रों की तलाश

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले के जिस मदरसे में नकली नोट छापने की मशीन पकड़ी गई थी वहाँ के बारे में जाँच में लगातार नए खुलासे हो रहे हैं। जाँच एजेंसियों को अब उन 630 छात्रों की तलाश है जो यहाँ से पढ़ाई कर के निकले हैं। आशंका जताई जा रही है कि मौलवी तफसीरुल इन इन सभी का ब्रेनवॉश किया होगा। इस मदरसे को हर साल लगभग 48 लाख रुपए विदेशों में फंडिंग मिलने की भी जानकारी सामने आई है। मामले की पड़ताल में पुलिस के अलावा ATS और IB की टीमें भी जुट गईं हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिस मदरसे में नकली नोट छापने के साथ RSS को आतंकी संगठन बताया जाता था वहाँ से अब तक लगभग 630 छात्र पढ़ाई कर के निकल चुके हैं। मौलवी तफसीरुल मदरसे में लगभग 6 साल से पढ़ा रहा था। प्रतिवर्ष औसतन 105 छात्र मदरसे से पढ़ाई कर के निकले हैं। जाँच एजेंसियों को आशंका है कि मौलवी तफसीरुल ने इन्हें भी कट्टरपंथ का पाठ पढ़ाया होगा। ये छात्र देश के अलग-अलग राज्यों में हैं। ऐसे में स्थानीय पुलिस के साथ ATS और IB की टीमें भी इनकी खोज में 6 प्रदेशों में गईं हैं।

ATS ने बुधवार (4 सितंबर, 2024) को प्रयागराज पहुँच कर जाँच शुरू की है। इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) की टीम 28 अगस्त को ही प्रयागराज पहुँच चुकी थी। अब तक हुई जाँच में यह सामने आया है कि मदरसे में हर साल विदेशों से लाखों रुपए भेजे जाते थे। तुर्की और सऊदी अरब मिला कर प्रतिवर्ष 48 लाख रुपए भेजे जाने के प्रमाण भी मिले हैं। अब तक हुई कुल फंडिंग 2 करोड़ रुपए से अधिक बताई जा रही है। मदरसा कमिटी के मैनेजर शाहिद के मुताबिक, ये पैसे दूसरे देशों से मदद के तौर पर भेजी जाती है।

इसी से मदरसे में पढ़ने वाले बच्चों की तालीम से ले कर उनके रहने आदि के खर्च व मेंटेनेंस का हिसाब-किताब किया जाता है।

जाँच एजेंसियों ने पैसे भेजने वालों की पहचान उजागर नहीं की है लेकिन उनके पाकिस्तान ने कनेक्शन खंगाले जा रहे हैं। ATS और IB की टीमें यह पता लगाने में भी जुटी हैं कि जिस खाते में विदेशों से पैसे आते थे उन्हें हैंडल कौन करता था। विदेशों से पैसे मँगाने के मामले में अब तक 12 बैंक खाते रडार पर हैं। मदरसे के प्रिंसिपल मौलवी तफसीरुल के परिजनों और रिश्तेदारों के भी खातों की डिटेल तलब की गई है। अन्य खातेदारों में अधिकतर मदरसा कमेटी से जुड़े हुए लोग हैं। इस बावत संबंधित बैंकों से भी लेन-देन का ब्यौरा तलब किया गया है।

इसी केस में मौलवी के साथ पकड़े गए ओडिशा के अब्दुल जहीर के पास मिला आधार कार्ड फर्जी बताया जा रहा है। उसे नकली नोट की ही तरह जाली आधार कार्ड बनाने का एक्सपर्ट माना जा रहा। IB की पूछताछ में अब्दुल जहीर ने कबूल किया है कि फर्जी आधार कार्ड बनाने के रैकेट में ओडिशा में मौजूद उसका भाई भी शामिल है। मदरसे से जुड़े कुछ लोगों का पिछले 5 वर्षों से अलग-अलग देशों में आना-जाना लगा हुआ है। इनके साथ कुछ अन्य राज्यों से भी मदरसे का कनेक्शन पाया गया है। जाँच एजेंसियाँ इन सभी लोगों की पड़ताल में जुटी हैं।

केरल के 6 चर्च पर होगा सरकार का कंट्रोल, हाई कोर्ट ने दिया आदेश: जानिए क्या है ऑर्थोडॉक्स और जैकोबाइट गुट के बीच का विवाद जो इस मोड़ तक पहुँचा

हाल ही में केरल हाई कोर्ट ने एर्नाकुलम और पलक्कड़ के जिला कलेक्टरों को मलंकारा ईसाई के 6 चर्चों को अपने कब्जे में लेने का निर्देश दिया है। दरअसल, मलंकारा ईसाई के दो गुटों- जैकोबाइट और ऑर्थोडॉक्स, के बीच इनको लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। हाई कोर्ट ने यह आदेश ऑर्थोडॉक्स गुट के दो पादरियों (याचिकाकर्ता) द्वारा दायर अवमानना ​​याचिका पर दी।

केरल हाई कोर्ट के जज वीजी अरुण ने न्यायालय के 2022 के निर्देशों की घोर अवज्ञा की आलोचना की। इन निर्देशों में मलंकारा ऑर्थोडॉक्स चर्च (ऑथोडॉक्स गुट) के सदस्यों को इन चर्चों में प्रवेश करने और उन्हें शांतिपूर्वक ढंग से प्रार्थना करने की अनुमति दी गई थी। जैकोबाइट ईसाइयों ने ऑर्थोडॉक्स ईसाइयों को चर्च में घुसने से रोक देते थे।

न्यायाधीश ने कहा कि उनके पास जिला कलेक्टरों को इन चर्चों का कब्ज़ा अपने हाथ में लेने को कहने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है। अदालत ने कहा, “आधिकारिक प्रतिवादियों के अड़ियल रवैए और पार्टी प्रतिवादियों (जैकबाइट गुट) द्वारा निर्देशों की अवहेलना के कारण इस अदालत के पास अवमाननापूर्ण कृत्यों को रोकने के लिए निर्देश जारी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।”

राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि बुजुर्ग पुरुषों, महिलाओं और बच्चों सहित जैकोबाइट गुट के ईसाइयों का एक बड़ा समूह चर्च में घुसने से रोकता है। सरकार ने कहा कि उसने कोर्ट के निर्देशों को लागू करने के लिए ईमानदारी से प्रयास किए थे। हालाँकि, जैकोबाइट्स के बड़े आंदोलन के कारण उसे पीछे हटना पड़ा। कोर्ट को बताया गया कि सरकार के हस्तक्षेप से जानमाल का नुकसान हो सकता है।

जैकोबाइट गुट के सदस्यों ने कोर्ट से कहा कि चर्च को ऑर्थोडॉक्स गुट को नहीं सौंपा जा सकता है। कोर्ट ने उनकी आपत्तियों को खारिज कर दिया और एर्नाकुलम के जिला कलेक्टर को तीन चर्चों- ओडक्कली स्थित सेंट मैरी ऑर्थोडॉक्स चर्च, पुलिंथानम स्थित सेंट जॉन्स बेस्फैज ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च और मझुवन्नूर स्थित सेंट थॉमस ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च का कब्जा अपने हाथ में लेने का आदेश दिया।

वहीं, पलक्कड़ के जिलाधिकारी को मंगलम डैम स्थित सेंट मैरी ऑर्थोडॉक्स चर्च, एरिकिनचिरा स्थित सेंट मैरी ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च और चेरुकुन्नम स्थित सेंट थॉमस ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च की कमान अपने हाथ में लेने को कहा। दोनों कलेक्टरों को 30 सितंबर 2024 तक इसकी अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया गया है। इसी दिन मामले की अगली सुनवाई होगी।

केरल हाई कोर्ट ने इस इन चर्चों को कब्जा में लेने के दौरान कानून-व्यवस्था को लेकर दोनों जिलों के पुलिस प्रमुखों को भी निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने इन दोनों जिलों के पुलिस प्रमुखों को कहा गया है कि वे अधिग्रहण में सहायता के लिए पर्याप्त संख्या में पुलिस बल तैनात करें, ताकि कोर्ट के आदेशों को बिना देरी के लागू किया जा सके।

क्या है ऑर्थोडॉक्स एवं जैकोबाइट गुट के बीच विवाद

दरअसल, ऑर्थोडॉक्स और जैकोबाइट गुट शुरू में एक ही चर्च का हिस्सा थे, लेकिन चर्च की निष्ठा को लेकर दोनों के बीच मतभेद हो गया और दोनों अलग हो गए। ऑर्थोडॉक्स गुट ने केरल के एक बिशप (मलंकरा मेट्रोपोलिटन) के प्रति अपनी निष्ठा की प्रतिज्ञा की, जबकि जैकोबाइट गुट एंटिओक के पैट्रिआर्क को अपना धार्मिक प्रमुख मानता है।

मतभेद के बाद दोनों गुटों में इस बात पर विवाद शुरू हो गया कि केरल में विभिन्न चर्चों का प्रशासन किस गुट को सौंपा जाना चाहिए। मतभेद आखिरकार विभाजन में बदल गया और यह विवाद अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ निर्देश भी दिए थे। यह केस के.एस. वर्गीस बनाम सेंट पीटर्स एंड पॉल्स सीरियन ऑर्थोडॉक्स चर्च के नाम से जाना जाता है।

साल 2017 में के.एस. वर्गीस बनाम सेंट पीटर्स एंड पॉल्स सीरियन ऑर्थोडॉक्स चर्च एवं अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कई विवादित मुद्दों पर ऑर्थोडॉक्स चर्च के पक्ष में फैसला दिया था। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने साल 1934 में तैयार किए गए एक दस्तावेज़ (1934 का संविधान) पर भरोसा किया और अपने फैसले का आधार इसे बनाया।

अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि जैकोबाइट गुट द्वारा तैयार किए गए साल 2002 के दस्तावेज़ द्वारा चर्चों को चलाने की समानांतर प्रणाली स्थापित नहीं की जा सकती थी। हालाँकि, ऑर्थोडॉक्स गुट ने तब से सुप्रीम कोर्ट के साल 2017 के आदेश को लागू करने में विफलता की बार-बार शिकायत की।

ऐसी ही एक याचिका पर साल 2022 में केरल हाई कोर्ट के सिंगल बेंच जज ने पुलिस को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं (ऑर्थोडॉक्स गुट) को इन चर्चों में शांतिपूर्वक प्रवेश कराने और उनकी धार्मिक सेवाएँ संचालित करने के लिए जरूरी सहायता करे। इसके बावजूद जैकोबाइट गुट द्वार उन्हें चर्चों में नहीं घुसने दिया जा रहा था। इसलिए ऑर्थोडॉक्स याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट का रूख किया।

न टास्क फोर्स, न पॉक्सो अदालतों का गठन, पत्र भेजती रही मोदी सरकार… जब महिलाओं को देनी थी ‘सुरक्षा’ तब सोई रही बंगाल सरकार, अब बिल वाला दिखावा

RG Kar मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल में 9 अगस्त, 2024 को एक महिला डॉक्टर की लाश मिली। उक्त महिला डॉक्टर के साथ क्रूरता से बलात्कार किया गया था और फिर मार डाला गया था। परिवार का आरोप है कि काफी बातें छिपाई गईं, जैसे इसे आत्महत्या बताने की कोशिश हुई। आनन-फानन में अंतिम संस्कार किया गया। वहाँ पहले भी ऐसी संदिग्ध मौतें हो चुकी हैं, ऐसे में ड्रग्स-सेक्स रैकेट चलने की अटकलें भी लगीं। जिस तरह से प्रिंसिपल को बचाने की कोशिश हुई उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने फटकार लगाई।

पश्चिम बंगाल में इस बलात्कार और हत्या की वारदात के बाद जम कर विरोध प्रदर्शन हुए। ममता बनर्जी, जो कि मुख्यमंत्री होने के साथ-साथ राज्य की गृह और स्वास्थ्य मंत्री भी हैं – उन्होंने भी अपनी पार्टी की महिलाओं के साथ एक मार्च निकाला पीड़िता को न्याय दिलाने की माँग करते हुए। ये इतर बात है कि राज्य की सत्ता खुद के हाथ में होने के बावजूद वो किससे न्याय माँग रही रहीं, ये लोगों को समझ नहीं आया। खैर, इस ‘पैदल मार्च’ के जरिए उन्होंने खुद को महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाला दिखाया।

अब विरोध प्रदर्शन को शांत करने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार ने एक नया कानून पारित किया है। इसे ‘अपराजिता वुमन एन्ड चाइल्ड बिल (वेस्ट बंगाल क्रिमिनल लॉज अमेंडमेंट) बिल 2024’ नाम दिया गया है। इसमें बलात्कार के दोषी के लिए उसके जीवित रहने तक जेल या फिर फाँसी का प्रावधान किया गया है। गैंगरेप के केस में भी उम्रकैद तक की सज़ा है। पीड़िता की मौत होने या फिर उसके अंग कार्य करना बंद कर दें तो दोषी को फाँसी तक हो सकती है। सबसे बड़ी बात ये है कि FIR दर्ज किए जाने के 21 दिन के भीतर जाँच पूरी किए जाने का प्रावधान है।

हालाँकि, केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) में भी बलात्कार के मामलों में 2 महीने के भीतर जाँच पूरी किए जाने का प्रावधान किया गया है। वहीं सुनवाई के लिए BNS में 2 महीने तो ममता बनर्जी वाले कानून में 1 महीने की समय-सीमा है। 2 दिवसीय विधानसभा सत्र बुला कर इस कानून को पारित कराया गया। BNS में भी बलात्कार के मामले में उम्रकैद तक का प्रावधान है, जिसे इसमें बढ़ा कर फाँसी तक किया गया है। इस तरह दोनों कानूनों में बहुत अधिक अंतर नहीं है।

भारत में फाँसी की सज़ा सुनाई तो जाती है, लेकिन सामान्यतः फाँसी दी नहीं जाती है। हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट और फिर राष्ट्रपति तक याचिका व दया याचिका घूमती रहती है। 2012 में ‘निर्भया’ के 4 बलात्कारियों को 2020 में फाँसी दी गई थी। उससे पहले कोलकाता में 1990 में हुए बलात्कार-हत्या के एक मामले को लेकर 2004 में एक व्यक्ति को फाँसी दी गई थी। इस तरह हमने देखा कि पिछले 2 दशक में सिर्फ रेप-हत्या के 3 मामलों में ही फाँसी दी गई है। जो मामले हाई-प्रोफ़ाइल नहीं बन पाते, उसमें भी बलात्कार तो बलात्कार ही होता है।

अब एक पत्र सामने आया है, जिसे 2021 में केंद्र में तत्कालीन कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने पश्चिम बंगाल सरकार को भेजा था। इससे पहले 2019-2021 के बीच 3 बार ऐसे पत्र भेजे जा चुके थे। इसमें पॉक्सो एक्ट, यानी बच्चों के साथ यौन शोषण के मामलों की जाँच के लिए FTSC, यानी ‘फ़ास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स’ की स्थापना और संचालन की सलाह दी गई थी। 2028 में केंद्र सरकार ने इससे संबंधित कानून बनाया था, सुप्रीम कोर्ट ने भी इसकी सलाह दी थी।

इसके तहत जिस भी जिले में POCSO से संबंधित लंबित मामलों की संख्या 100 से अधिक थी, वहाँ-वहाँ एक्सक्लूसिव पॉक्सो अदालतों की स्थापना का निर्णय लिया गया था। पश्चिम बंगाल में ऐसे 123 FTSC का प्रावधान किया गया था, जिनमें 20 ePOCSO अदालतें थीं। मुख्य सचिव तक इस मामले को ले जाया गया, लेकिन इसके बावजूद पश्चिम बंगाल सरकार ने इस दिशा में कदम नहीं उठाया। मोदी सरकार बार-बार आग्रह करती रह गई, याद दिलाती रह गई।

इस पत्र में आँकड़ा भी बताया गया था कि मई 2021 तक ही पश्चिम बंगाल में बलात्कार के 28,559 मामले दर्ज थे। केंद्र और राज्य, दोनों के लिए महिला सुरक्षा को सर्वाधिक चिंता का विषय बताते हुए इस पत्र में लिखा गया था कि ऐसे टास्क फोर्सेज और अदालतों की स्थापना के जरिए इन मामलों में सज़ा दिलाने के लिए मजबूत मशीनरी की आवश्यकता है। इस मामले में केंद्र सरकार ने पूर्ण सहयोग का भी आश्वासन दिया था। अब पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने भी इस पत्र को साझा किया है।

उन्होंने इसके जरिए ये बताने की कोशिश की है कि महिला सुरक्षा को लेकर ममता बनर्जी कितनी सजग हैं। उन्होंने बताया है कि जब यौन शोषण से पीड़ित महिलाओं-बच्चों को न्याय दिलाने का मौका था तब ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार की एक न सुनी। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी आज जो भी कर रही हैं वो सिर्फ दिखावा है। उन्होंने चेताया कि एक सही में काम करने का समय है। खैर, इस प्रकरण से कम से कम ममता बनर्जी के ड्रामे की तो पोल खुलती ही है और साथ ही उनकी इस जनता की आँखों में धूल झोंकने वाली राजनीति की भी।

अगर ममता बनर्जी सचमुच महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को लेकर सजग होतीं तो चुनाव के समय जो भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले होते हैं और कई महिलाओं-बच्चों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता है उन मामलों में न्याय होता। भाजपा के दफ्तर में जो लोग शरण लेते हैं कई-कई दिनों तक रहने को मजबूर होते हैं उनमें महिलाएँ-बच्चे भी होते हैं। भाजपा ने अपनी कई महिला कार्यकर्ताओं के यौन शोषण का भी आरोप लगाया था। उन मामलों में TMC सरकार ने क्या कार्रवाई की?

अगर ममता बनर्जी महिलाओं के खिलाफ अपराध को लेकर सजग होतीं तो संदेशखली में जिस शाहजहाँ शेख और उसके गुर्गों ने जनजातीय समाज की महिलाओं का यौन शोषण किया उन लोगों को गिरफ्तार करने में देरी नहीं की जाती। चोपरा में ताजेमुल लड़कियों को बाँध कर उनकी पिटाई करता था, वीडियो आने के बाद TMC विधायक हमीदुल रहमान ने पश्चिम बंगाल को ‘मुस्लिम राष्ट्र’ बताते हुए इसे जायज ठहराया। ममता बनर्जी ने इस विधायक के खिलाफ कोई कार्रवाई की? नहीं।

और अब भी क्या हो रहा है। प्रदर्शनकारी डॉक्टरों को ही धमकाया जा रहा है। सांसद अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि अगर कोई मरीज हड़ताल की वजह से मरता है कि इन डॉक्टरों को जनाक्रोश का सामना करना पड़ेगा, फिर हम आपको नहीं बचाएँगे। TMC नेता उदयन गुहा ने कहा था कि ममता बनर्जी की तरफ जो लोग उँगलियाँ उठा रहे हैं, उनकी उँगलियाँ तोड़ दी जाएँगी। इन सब पर कार्रवाई हुई? नहीं। फिर ममता बनर्जी द्वारा पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाने की बातों को कोरा न माना जाए तो और क्या?