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कौन हैं ‘ब्राह्मण Genes’ लाने वाली महिला CEO, जातिवादी नैरेटिव का कैसे बनी जवाब: उस हैशटैग के बारे में जानिए सबकुछ जिससे दिलीप मंडल जैसे हो रहे नंगे

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर ‘Brahmin Genes’ ट्रेंड हो रहा है। अर्थात, जो लोग ब्राह्मणों को गाली दे रहे हैं उन्हें प्रतिक्रिया के रूप में ब्राह्मण समाज के लोग भी अपनी शारीरिक बलिष्ठता, पारंपरिक वेशभूषा और सांस्कृतिक परिवेश का प्रदर्शन करते हुए तस्वीरें शेयर कर रहे हैं। ब्राह्मण समाज के कई लोगों ने अपनी-अपनी तस्वीरें ‘ब्राह्मण ज्ञानतंतु’ वाले हैशटैग के साथ शेयर कर रहे हैं। हालाँकि, कई जातिवादी लोग इन्हें निशाना बनाते हुए कह रहे हैं कि ये श्रेष्ठता का बोध है।

ये सब शुरू हुआ बेंगलुरु में एक कंपनी चलाने वाली अनुराधा तिवारी के पोस्ट से, जिन्होंने अपने ट्राइसेप्स दिखाते हुए इस ‘Brahmin Genes’ लिखा। कुछ जातिवादी लगातार अत्यधिक चर्बी वाले लोगों की तस्वीरें शेयर कर ‘ब्राह्मण जीन्स’ लिख रहे थे, जिसके प्रतिक्रिया में उन्होंने ऐसा किया। वो JustBurstOut नामक कंटेंट राइटिंग एवं मार्केटिंग एजेंसी चलाती हैं। बाद में अनुराधा तिवारी ने कहा कि केवल ‘ब्राह्मण’ शब्द से ही खुद को ‘निम्न’ मानने वाले कुछ लोग चिढ़ गए, इससे पता चलता है कि असली जातिवादी कौन है। उन्होंने लिखा कि सामान्य वर्ग को न आरक्षण मिलता है, न मुफ्त की चीजें।

ऊपर जो तस्वीर आप देख रहे हैं, उसे ‘Bravo Pharma’ के CEO राकेश पांडेय ने शेयर किया। राकेश पांडेय ने भी इस हैशटैग में हिस्सा लेते हुए अपनी शारीरिक बलिष्ठता वाली तस्वीर शेयर की। इस पर जैकी यादव जैसे जातिवादी भड़क गए और कहने लगे कि सभी तो Genes से ही बने हैं। राकेश पांडेय की कंपनी करोड़ों डॉलर की है और दुबई से लेकर लंदन तक उनका कारोबार फैला हुआ है। उन्होंने दक्षिण भारत के एक दलित बहुल गाँव में दलितों के लिए मंदिर का निर्माण भी करवाया है।

इसी तरह अधिवक्ता और लीगल फर्म चलाने वाले राघव अवस्थी ने भी अपनी शर्टलेस तस्वीर शेयर कर के ‘Brahmin Genes’ वाला हैशटैग डाला। कई महिलाओं ने भी खुल कर इस ट्रेंड में हिस्सा लिया और अपनी तस्वीरें शेयर की।

वहीं कुछ लोगों ने स्वतंत्रता सेनानियों मंगल पांडेय, बाल गंगाधर तिलक और चंद्रशेखर आज़ाद की तस्वीरें भी शेयर की और ‘Brahmin Genes’ वाला हैशटैग लगाया। आखिर इस ट्रेंड की ज़रूरत ही क्यों पड़ी? इसका जवाब विचारक दिव्य कुमार सोती ने दिया है। उन्होंने दिलीप मंडल एक एक पोस्ट का स्क्रीनशॉट शेयर किया, जिसमें ‘इंडिया टुडे’ पत्रिका के पूर्व संपादक ने लिखा था कि ब्राह्मण बलात्कारी है, बच्चियों का यौन शोषण करता है, माँग कर संपत्ति बनाई है, अवैध कब्ज़ा कर के उसने मंदिर बनाए हैं।

दिव्य कुमार ने कहा कि हमें ‘Brahmin Genes’ ट्रेंड की लोकप्रियता बताती है कि ये इस तरह का नैरेटिव बनाए जाने का परिणाम है। उन्होंने कहा कि ये राजनीतिक प्रतिरोध में भी बदल सकता है। साथ ही उन्होंने कहा कि ये कोई न कहे कि पहले चेतावनी नहीं दी गई थी।

कभी ‘श्रीकृष्ण’ गायब तो कभी ‘श्रीराम’… जन्माष्टमी पर भी छलका राहुल गाँधी का ‘सेकुलरिज्म’, जब हिंदुओं को दिखाना होता है नीचा तब हाथ में होती है देवी-देवताओं की तस्वीर

हिंदू धर्म में मूर्ति पूजन का महत्व सदियों से रहा है। सनातन मानने वाले लोग आमतौर पर पूजा पाठ के दौरान भगवान की मूर्ति के समक्ष ही आराधना करते हैं। आप भी यदि किसी देवी-देवता का नाम स्मरण करेंगे तो पहले उनकी एक मूरत आपके मन में बनेगी फिर आगे कुछ सोच पाएँगे। ऐसा सिर्फ होगा क्योंकि आपके मन में हिंदू धर्म के लिए आस्था है… जिनके मन में ये आस्था नहीं होती वो मूर्ति और मूर्ति पूजन दोनों से आपत्ति करते हैं। वो आपके त्योहार पर आपको शुभकामनाएँ तो देते हैं लेकिन भगवान के रूप को साझा करने से अक्सर परहेज करते हैं।

इस बात को अगर आपको अच्छे से समझना है तो लिबरलों द्वारा त्योहारों पर साझा होने वाले पोस्ट पर ध्यान देना चाहिए। ये लोग हर त्योहार पर हर समुदाय के लोगों को बधाई देते हैं लेकिन हिंदू धर्म के त्योहारों पर शुभकामना संदेश देते समय उनका अंदाज थोड़ा अलग होता है।

उदाहरण कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी का ले लीजिए। आज जन्माष्टमी है राहुल गाँधी ने एक पोस्ट साझा किया है। इस पोस्ट में उन्होंने एक बाँसुरी और मोरपंख के साथ जन्माष्टमी की बधाई दी और लिखा, “सभी को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाए एवं बधाई। आशा करता हूँ कि हर्ष और उल्लास का यह पर्व आप सभी के जीवन को नई उमंग एवं उत्साह से भर दे।”

राहुल गाँधी के पोस्ट में जन्माष्टमी की बधाई तो दे दी गई, ये तो कह दिया गया कि ये पर्व हर्ष और उल्लास का है लेकिन इसे हिंदू मनाते क्यो हैं और किनके जन्म के कारण इसकी महत्वता है इस पर एक शब्द नहीं लिखा।

इसी तरह उन्होंने जो पोस्ट साझा की उसमें नीले बैकग्राउंड में बाँसुरी और मोरपंख दिखाया गया, लेकिन ग्राफिक्स में कहीं भी ये नहीं दिखाया गया कि ये बाँसुरी और मोरपंख आखिर किसके प्रतीक हैं। तस्वीर में देख सकते हैं कि कहीं भी श्रीकृष्ण का चित्र नहीं दिखाया गया है।

अब शायद आप सोचें कि इसमें क्या समस्या है हर किसी का तरीका होता है बधाई संदेश देने का, कुछ लोग प्रतीकों को आधार बनाकर भी देते हैं और कुछ बिन तस्वीर के भी और कुछ सिर्फ टेक्स्ट के जरिए… बिलकुल सही बात है क्रिएटिव होने के नाम पर कोई भी विधा अपनाई जा सकती है लेकिन भावनाएँ आपकी साफ होनी चाहिए। आज बहुत से लोग भगवान के प्रतीकों को आधार बनाकर फोटो शेयर करते हैं, लेकिन उनके पोस्ट से हमेशा ही भगवान की मूर्ति गायब नहीं होती, लेकिन राहुल गाँधी के केस में ऐसा नहीं है।

ये पहली बार नहीं है जब राहुल गाँधी के सोशल मीडिया पोस्टों से भगवानों की मूर्तियाँ ही गायब मिली हों। ये सिलसिला पुराना है। राहुल गाँधी ने महाशिवरात्रि के मौके पर कैलाश पर्वत की तस्वीर लगा सकते हैं लेकिन प्रतीक के तौर पर उनसे शिवलिंग की तस्वीर नहीं लग पाती। जगन्नाथ यात्रा के वक्त वो मंदिर के शिखर की तस्वीर लगाकर शुभकामनाएँ दे सकते हैं मगर न रथ की फोटो और न भगवान जगन्नाथ की फोटो लगा सकते हैं।

इसी तरह गणेश चतुर्थी पर राहुल गाँधी मोद, भोग, अगरबत्ती सबकी तस्वीरें लगा सकते हैं लेकिन उन्हें अपने पोस्ट में गणेश जी की फोटो लगाने में ससमस्या हो जाती है।

श्री राम नवमी पर टेक्स्ट के तौर पर राम नवमी लिखकर बधाई देना उन्हें आसान पड़ता है मगर श्रीराम का चित्र लगाना उनके लिए मुश्किल काम है। इसके अलावा दीवाली पर तो राहुल गाँधी बिन किसी तस्वीर के ही शुभकामना दे देते हैं।

ऊपर दिए उदाहरण चुनिंदा है और संभव है राहुल गाँधी की टाइमलाइन पर ऐसे और वाकये मिल जाएँ जहाँ भगवान के साकार रूप का चित्र लगाने से बचा गया हो। ऐसा करने के पीछे दूसरे समुदायों को अपनी ओर आकर्षित करने की मंशा, खुद को सेकुलर लिबरल दिखाने की उनकी कोशिश किसी से छिपी नहीं है। आम दिनों में राहुल गाँधी श्रीराम की तस्वीर लगाने से बचते हैं, अयोध्या राम मंदिर जाने से बचते हैं लेकिन एक हिंदू देवता को समर्पित त्योहार पर भी उनका तस्वीर न लगाने वाला रवैया स्वीकार्य कैसे हो सकता है। क्रिएटिविटी के नाम पर एक ही गलती बार-बार नहीं हो सकती और बार-बार सिर्फ भगवान की मूर्तियाँ गायब होना या उनके चिह्न से ही समझौता करना मात्र संयोग नहीं हो सकता। ये विशुद्ध रूप से केवल मूर्ति पूजा का विरोध मालूम पड़ता है।

यही राहुल गाँधी को जब हिंदू धर्म पर सवाल खड़ा करना होता है, हिंदुओं को हिंसक दिखाकर देवताओं का अपमान करना होता है तो वो फौरन संसद में भगवान की तस्वीरें दिखाने से परहेज नहीं करते क्योंकि वहाँ पर मंशा हिंदुओं को बदनाम करने की होती है लेकिन बात जैसे ही हिंदुओं की आस्था को सम्मान देने की आती है वो चालाकी से उन्हीं तस्वीरों को छिपा लेते हैं। राहुल गाँधी के ऐसे दोहरे रवैया के बारे में अब नेटिजन्स भी अच्छे से जान गए हैं। उन्होंने पुराने पोस्ट की तस्वीरें साझा कर सवाल उठाए हैं कि आखिर जब संसद में चिल्लाते हुए भगवान की तस्वीर दिखा दी जाती है तो सदन के बाहर हिंदू त्योहारों के वक्त क्यों भगवानों की तस्वीरें गायब हो जाती हैं।

अपडेट: कॉन्ग्रेस के कुछ समर्थकों ने राहुल गाँधी के कुछ पुराने ट्वीट और कुछ हालिया ट्वीट दिखाए हैं, जिनमें हिंदू देवताओं की तस्वीरें दिखाई दे रही हैं। बावजूद इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता है कि हिंदू त्योहारों पर राहुल गाँधी के सोशल मीडिया पोस्ट से बार-बार हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरें गायब रही हैं। यही वजह कि लोगों ने उनके सोशल मीडिया पोस्टिंग पैटर्न पर सवाल उठाया है।

हाइवे ब्लॉक कर बस रोकी, यात्रियों को नीचे उतार चेक की ID, 23 लोगों की गोली मारकर हत्या: अपनी ही लगाई आग से बलूचिस्तान में जला पाकिस्तान

पाकिस्तान के बलूचिस्तान में अज्ञात बंदूकधारियों ने एक हाइवे पर कई गाड़ियों पर हमला किया। हमलावरों ने उन लोगों को मौत के घात उतार दिया जो पंजाब प्रांत से तालुक रखते थे। बलूचिस्तान में हुए इस हमले में कम से कम 23 लोगों की मौत हो गई है। हमलवारों ने लोगों को मारने के अलावा लगभग एक दर्जन गाड़ियों को आग भी लगा दी और फरार हो गए।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह हमला बलूचिस्तान के मूसाखेल जिले में सोमवार (26 अगस्त, 2024) को हुआ। यहाँ एक अंतरराज्यीय हाइवे को हमलावरों ने बंद कर दिया। इसके बाद यहाँ आने वाली गाड़ियों से लोगों को उतार कर उनकी पहचान पूछी। जो लोग पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के रहने वाले थे, उनको अलग कर लिया गया और अंधाधुंध गोलियाँ बरसाई गईं।

इसके बाद हमलावरों ने यहाँ से जाते समय 10 गाड़ियों में आग लगा दी। हमलावर किस समूह से थे यह अभी पता नहीं चल पाया है। बलूचिस्तान प्रशासन ने हमले की सूचना के बाद यहाँ से मृतकों के शवों को हटवाया और घायलों को अस्पताल पहुँचाया है।

बताया गया है कि इस हमले में मरने वाले 20 लोग पाकिस्तानी पंजाब प्रांत से हैं जबकि 3 लोग बलूचिस्तान के रहने वाले थे। सुरक्षा बलों ने मौके पर पहुँच कर मोर्चा संभाल लिया है, वह हमले की जाँच कर रहे हैं। अभी तक किसी भी समूह ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है।

माना जा रहा है कि हमला किसी बलूच विद्रोही संगठन ने किया है। बलूच विद्रोही लगातार कहते आए हैं कि उनके संसाधनों पर पंजाब के लोग कब्जा करते हैं। वह बलूचिस्तान में सेना और पाकिस्तान की सरकार के दमन से नाराज हैं। बलूच विद्रोही इससे पहले भी चीनी नागरिकों और पंजाबियों पर हमला कर चुके हैं। उनकी सेना से लगातार लड़ाई चल रही है।

मूसाखेल में हुए हमले के अलावा भी पाकिस्तान में कई जगह हमले एक साथ हुए हैं। रविवार से सोमवार के बीच कलात, मुस्तांग समेत कई जगहों पाक फ़ौज निशाने पर ली गई है। मूसाखेल में हुए इस हमले की पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ और राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने निंदा की और कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया है।

झारखंड में एक भी बांग्लादेशी नहीं… हेमंत सोरेन सरकार का दावा हाई कोर्ट के गले भी नहीं उतरा, पूछा- 60 साल में 16% कैसे कम हो गई ST आबादी

झारखंड हाई कोर्ट ने बांग्लादेशी घुसपैठ मामले में झारखंड सरकार पर प्रश्न उठाए हैं। हाई कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि जब बांग्लादेशी घुसपैठ से इनकार किया जा रहा है तो भला जनजातीय जनसंख्या कैसे घट गई। हाई कोर्ट ने संथाल परगना में जनजातीय समाज (ST) की जनसंख्या घटने को लेकर प्रश्न पूछे हैं।

झारखंड हाई कोर्ट ने बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर दायर की गई एक याचिका की सुनवाई में यह सब बाते कही हैं। झारखंड हाई कोर्ट ने 22 अगस्त, 2024 को इस मामले की सुनवाई की है। इस दौरान हाई कोर्ट के सामने संथाल परगना के सभी जिलों के डिप्टी कमिश्नरों ने बांग्लादेशी घुसपैठ को हलफनामा दायर किया है।

यह हलफनामे गोड्डा, देवघर, जामताड़ा, पाकुड़, साहिबगंज और दुमका जिलों के प्रशासन की तरफ से दाखिल किए गए हैं। इस हलफनामे में प्रशासन ने दावा किया है कि इन जिलों में कोई भी बांग्लादेशी घुसपैठिया नहीं आया है। प्रशासन के इस दावे पर हाई कोर्ट ने नाराजगी जाहिर की है।

हाई कोर्ट ने इस संबंध में कहा, “इस कोर्ट ने संबंधित जिलों के DC की ओर से दायर हलफनामे का अध्ययन किया है, जिसमें कहा गया है कि बांग्लादेशी प्रवासियों की कोई घुसपैठ नहीं हुई है, लेकिन इन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों की संख्या कम होने के कारण के संबंध में कोई बात नहीं बताई गई है।”

हाई कोर्ट ने आगे इसी मामले पर प्रश्न उठाए हुए कहा, “सवाल यह है कि यहाँ रखे गए आँकड़ों में इस क्षेत्र में (संथाल परगना) अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या 1951 में 44.67% थी जो वर्ष 2011 में घट कर 28.11% तक आ गई। इसे दिनांक 8 अगस्त, 2024 के आदेश में नोट भी किया गया है। लेकिन हैरानी की बात है कि हलफनामे में इन क्षेत्रों में आदिवासियों की जनसंख्या में कमी के बारे में कोई प्रासंगिक आँकड़े प्रस्तुत नहीं करके उस बिंदु पर कोई जवाब नहीं दिया गया है।”

गौरतलब है कि इस मामले की पहले सुनवाई में कोर्ट ने राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठ पर चिंता जताते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया था कि वह इनकी पहचान करे। कोर्ट ने कहा था कि राज्य सरकार राज्य में अवैध रूप से घुसने वालों की पहचान करके आँकड़े तैयार करे और उन्हें राज्य से बाहर करे। इसको लेकर संथाल परगना के जिलों ने कमिटियों का गठन किया था। इन कमिटियों का काम जिलों में बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान करना था। अब इस मामले में इन जिलों के प्रशासन ने कहा है कि राज्य में कोई घुसपैठिया नहीं है।

सरकार कह रही घुसपैठ नहीं, लेकिन वोट बेतहाशा बढ़े

जहाँ झारखंड सरकार घुसपैठ की बात को कोर्ट के भीतर नकार रही है वहीं विपक्षी दल दूसरी चिंताएँ जता रहे हैं। हाल ही में भाजपा की रिपोर्ट में सामने आया है कि मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में वोटरों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़त 20% से 123% तक की है। यह बढ़त इन 10 विधानसभा के कुल 1467 बूथ पर हुई है।

भाजपा ने बताया है कि सामान्यतः पाँच वर्षों में 15% से 17% की वृद्धि होती है, इसीलिए यह वृद्धि असामान्य है। भाजपा ने यह भी बताया है कि हिन्दू आबादी वाले बूथ पर वोटरों की संख्या में बढ़त मात्र 8% से 10% हुई है। भाजपा ने यह भी बताया है कि कई बूथ पर हिन्दू मतदाता घट भी गए हैं।

नई नहीं है डेमोग्राफी बदलने की बात

झारखंड हाई कोर्ट की टिप्पणी को रेखांकित करने वाली काफी सारी घटनाएँ पहले भी सामने आ चुकी हैं। इससे पहले मार्च, 2024 में आजतक की एक रिपोर्ट में याचिका में बताई गई समस्या को लेकर ही बात की गई थी। आजतक की रिपोर्ट में बताया गया था कि यहाँ बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिए, पश्चिम बंगाल के रास्ते आते हैं। इसके बाद वह बस जाते हैं। इनमें से कुछ आदिवासियों की लड़कियों को निशाना बनाते हैं। जब लडकियाँ उनके दिखावे में फंस जाती हैं तो उनसे शादी कर ली जाती है।

शादी के बाद लड़की की कागजों में पहचान जनजाति के तौर पर ही रहने दी जाती है। इसके बाद उस लड़की के नाम पर जमीन ली जाती है या फिर उसकी ही जमीन कब्जा ली जाती है। रिपोर्ट में बताया गया था कि यह सब करने के लिए बांग्लादेश से आने वाले घुसपैठियों को फंडिंग मिलती है। लड़की की पहचान जनजातीय रखने के पीछे सरकारी फायदे लेने के मकसद रहता है। इसके अलावा कई जगह उन लड़कियों को चुनाव भी लड़वाया गया, जिन्होंने मुस्लिमों से शादी की।

आजतक की रिपोर्ट में यह तक बताया गया था कि यहाँ घुसपैठ करने वाले बांग्लादेशी इस जमीन में खनन के लिए भी ऐसा कर रहे हैं। कुल मिलाकर धीमे-धीमे इस इलाके की पहचान बदली जा रही है। बांग्लादेशी घुसपैठिए झारखंड में घुसते ही फर्जी पहचान पत्र भी बनवा लेते हैं। इसमें इनकी मदद पहले से आकर बस चुके लोग भी करते हैं।

2272 जातियाँ/जनजातियाँ टारगेट, हर गाँव से डाटा इकट्ठा करने के लिए एजेंट: भारतीयों को ईसाई बना रहा अमेरिका का ‘जोशुआ प्रोजेक्ट’, 6 करोड़ लोगों तक पहुँचे

भारत में लम्बे समय से हिन्दुओं और विशेष कर जनजातीय समूहों को ईसाई बनाने का काम चल रहा है। इसके लिए ईसाई मिशनरी नैतिक-अनैतिक तरीके सब अपनाती आई हैं। ईसाईयत फैलाने के लिए विदेशों से भी फंडिंग होती रही है। ईसाइयत में धर्मांतरण करवाने वालों के निशाने पर गरीब और पिछड़े हिन्दू सबसे अधिक रहे हैं। उन इलाकों में भी ईसाइयत ने पैर पसारे हैं, जहाँ आज भी सामान्य सुविधाएँ पहुँच नहीं पाई हैं। कहीं अच्छे इलाज तो कहीं पढ़ाई के नाम पर लोगों को अपना धर्म छोड़ ईसाइयत में आने को बरगलाया जा रहा है।

भारत में ईसाई धर्म को बढ़ावा देने में जोशुआ प्रोजेक्ट बड़ी भूमिका निभा रहा है। अमेरिका से चलने वाला यह संगठन भारत की जातियों-जनजातियों और अन्य समूहों के आँकड़े इकट्ठा करके उनको ईसाई बनाने का प्रयास कर रहा है। जोशुआ प्रोजेक्ट ने भारत में 2000 से अधिक जातियों और समुदायों के आँकड़े इकट्ठा किए हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट मात्र भारत ही नहीं बल्कि विश्व के बाकी हिस्सों में भी काम कर रहा है। इसके निशाने पर अधिकांश वह देश हैं, जहाँ ईसाइयत अभी बड़े पैमाने पर अपने पैर नहीं पसार पाई है।

क्या है जोशुआ प्रोजेक्ट?

जोशुआ प्रोजेक्ट उनको ईसाई बनाने का मिशन है जो इसमें आस्था नहीं रखते। यह संगठन अमेरिका से काम करता है। इसे 1995 में चालू किया गया था। इसे चार लोगों ने मिलकर चालू किया था। इन चार व्यक्तियों में एक भारतीय भी था। जोशुआ प्रोजेक्ट की वेबसाइट बताती है कि यह बाइबल में दिए गए एक निर्देश पर काम करता है। जोशुआ का कहना है कि बाइबल के मैथ्यू 28:19 में उन्हें विश्व के अलग-अलग हिस्सों में लोगों को ईसाइयत का अनुयायी बना कर उनका बाप्तिस्मा बनाने का आदेश मिला है, जिस पर वह काम कर रहे हैं।

जोशुआ प्रोजेक्ट का मुख्य काम उन समूह के आँकड़े इकट्ठा करना है, जिनमें अभी तक ईसाइयत का प्रभाव नहीं हुआ है। जोशुआ प्रोजेक्ट को इसके लिए पैसा कहाँ से आता है, यह स्पष्ट नहीं है। हालाँकि, जोशुआ प्रोजेक्ट अपनी वेबसाइट पर ईसाइयत को बढ़ाने के लिए दान माँगता है। जोशुआ प्रोजेक्ट ने जो समूह ईसाइयत से दूर हैं, उनके लिए एक नक्शा बनाया है। विश्व के नक़्शे पर एक इलाका भी बनाया गया है, जो ईसाइयत से सबसे दूर है। इसे जोशुआ प्रोजेक्ट ने ’10:40 विंडो’ का नाम दिया है।

यह 10:40 विंडो अक्षांश पर 10 डिग्री उत्तर और 40 डिग्री उत्तर के बीच पड़ने वाले देशों का एक इलाका है। इसमें भारत, चीन, सऊदी अरब और म्यांमार जैसे देश आते हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट का कहना है कि यह देश ईसाइयत का प्रतिरोध करते रहे हैं, इसलिए इनमें ईसाइयत का प्रचार करने की सबसे पहले जरूरत है।

कैसे काम करता है जोशुआ प्रोजेक्ट?

जोशुआ प्रोजेक्ट ने भारत की अलग-अलग जातियों और जनजातीय समूहों के आँकड़े इकट्ठा किए हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट के पास देश की 2272 जातियों-जनजातियों के आँकड़े हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट अपने काम को पाँच स्तर पर मापता है। जिन जातियों में ईसाइयत में धर्मांतरण नहीं हो पाया है, उन्हें जोशुआ ‘अनरीचड’ के वर्ग में रखता है। इसके अलावा जिन जातियों-जनजातियों को में ईसाइयत को फैलाने में आंशिक सफलता मिली है, उन्हें ‘मिनिमली रीच्ड’ वर्ग और इस्ससे ऊपर ‘सुपरफिशियली रीच्ड को रखा जाता है। इसके अलावा भी दो वर्ग हैं।

जोशुआ प्रोजेक्ट को लेकर दैनिक भास्कर ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि यह मिशन देश भर में हर जाति समूह को ईसाइयत में लाने के लिए एक एजेंट की नियुक्ति कर रहा है। यह एजेंट धर्मांतरण के साथ ही जगह-जगह नए चर्च बनाने का काम कर रहे हैं। भास्कर को ऐसा ही एक एजेंट भी मिला है। रिपोर्ट में बताया गया है कि जोशुआ प्रोजेक्ट इन एजेंटों को लम्बी ट्रेनिंग के बाद जमीन पर उतारता है। इनका मुख्य काम जगह-जगह जाकर आँकड़े इकट्ठा करना होना है। इन्ह्ने जोशुआ प्रोजेक्ट की तरफ से लगभग ₹2000 की तनख्वाह भी मिलती है।

क्या बताता है जोशुआ प्रोजेक्ट का डाटा?

जोशुआ प्रोजेक्ट की वेबसाइट के अनुसार, उन्हें भारत में 2272 समूहों तक ईसाइयत को लेकर जाना है। जोशुआ प्रोजेक्ट बताता है कि वह इनमें से अभी 2041 जातियों तक नहीं पहुँच सका है। वहीं 103 जातियों में ईसाइयत का प्रभाव डालने में यह सफल रहा है। इनमें एक छोटी संख्या में लोग ईसाइयत को मानने लगे हैं। वहीं 128 जाति समूह ऐसे हैं, जिनमे बड़े पैमाने पर ईसाइयत की घुसपैठ हो गई है। जोशुआ प्रोजेक्ट की वेबसाइट ने बताया है कि वह अब तक 143 करोड़ में से 6 करोड़ लोगों तक ईसाइयत को लेकर पहुँच चुके हैं।

वेबसाइट के अनुसार, भारत में इवैंजेलिकल ईसाइयत (ईसाइयत की एक शाखा, जिसे जोशुआ प्रोजेक्ट फैला रहा है।) की वृद्धि दर 3.9%/वर्ष है। यह वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। इसके अंतर्गत उन लोगों को रखा जाता है, जो पूरी तरीके से जोशुआ प्रोजेक्ट के ढाँचे में ढल चुके हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट की वेबसाइट मात्र हिन्दू ही नहीं बल्कि सिखों और मुस्लिमों समेत बौद्धों के आँकड़े भी भारत में इकट्ठा कर रहा है। उसने इनके आँकड़े भी अपनी वेबसाइट पर डाले हुए हैं।

बड़ी संख्या में जातियों में धर्मांतरण

जोशुआ प्रोजेक्ट का डाटा बताता है कि उसने कई जातियों में 10%-100% तक ईसाइयत में धर्मांतरण करवाया है। जिन जातियों में बड़ी संख्या में ईसाइयत में धर्मांतरण हुआ है, उनको अलग नाम दे दिया गया है। तेलंगाना के मडिगा और माला समुदाय में 21000 की आबादी को ईसाइयत में बदल कर उसे आदि क्रिस्चियन का नाम दिया गया है। बोडो समुदाय की 15.7 लाख आबादी में से लगभग 1.5 लाख आबादी को ईसाइयत में लाया गया गया है।

जोशुआ प्रोजेक्ट की इतनी बड़ी मशीनरी लगातार भारत में चल रही है। इसको खाद-पानी भी मिल रहा है। कई बार ऐसे ईसाई प्रचारक पकड़े गए हैं, जो ईसाइयत में लोगों को लाने के लिए उन्हें प्रलोभन दे रहे थे। ऐसा ही एक मामला हाल ही में मध्य प्रदेश में सामने आया था, जहाँ ईसाइयत में धर्मान्तरित होने पर लगभग ₹20 लाख तक का ऑफर दिया गया था। इसी तरह बरेली में भी ईसाई धर्म प्रचारकों द्वारा हिन्दू नाबालिगों को निशाना बनाने की बात सामने आई थी। कई लोगों पर कार्रवाई के बाद भी यह नेटवर्क लगातार चलता रहता है।

‘शैतान घुसा है शरीर में, पीट-पीटकर निकाल दूँगा’ : पंजाब में पादरी ने 30 साल के दिहाड़ी मजदूर को उतारा मौत के घाट, 9 गिरफ्तार

पंजाब के गुरदासपुर में 30 साल के दिहाड़ी मजदूर को बेरहमी से पीटे जाने के बाद उसकी मौत हो गई। पुलिस ने इस घटना की जानकारी 25 अगस्त को दी। उन्होंने बताया कि इस घटना की बाबत उन्होंने 9 लोगों को गिरफ्तार किया है। इसमें जैकब मसीह नाम के पादरी का नाम भी शामिल है। कहा जा रहा है कि पादरी ने शरीर से बुरी आत्मा निकालने के नाम पर युवक को पीटा। इस दौरान उसके साथ 8 लोग और भी शामिल थे।

पीड़ित मजदूर की पहचान सैमअुल मसीह के नाम से हुई। वो गुरदासपुर धरीवाल के सिंहपुरा गाँव का था। पुलिस ने बताया कि उसे दौरे आते थे और वो चिल्लाता था। इन्हीं कारणों से उसके परिजनों ने जैकब मसीह को संपर्क किया कि वो लोग घर में आकर प्रार्थना करवा दें।

जैकब मसीह ने परिवार की बात सुनी और बुधवार को प्रार्थना कराने का दिन दिया। जैकब ने यह भी परिवार के मन में डाला कि सैमुअल के भीतर शैतान घुस गया है और वो लोग उसे पीट -पीटकर बाहर निकालेंगे। पादरी ने इस तरह परिवार का ब्रेनवॉश किया कि परिजन भी मान गए कि पीटने से सैमुअल को कुछ नहीं होगा।

इसके बाद जैकब और उसके 8 साथियों ने मिकर सैमुअल को ताबडतोड़ मारा। इलाज के नाम पर उसे इतना पीटा गया कि वहीं मौके पर ही सैमुअल की मौत हो गई। परिजनों को अगले दिन उन्हें शव का अंतिम संस्कार करना पड़ा। घटना से उबरने के बाद सैमुअल की माँ और पत्नी ने जैकब मसीह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।

पुलिस ने शव को निकलवाकर पहले पोस्टमार्टम कराया और फिर पादरी व 8 अन्य के खिलाफ भारतीय न्याय संहिदा की उपयुक्त धाराओं के अंतर्गत केस को दर्ज कर लिया।

मालूम हो कि यूएसए के अटलांटा से भी ऐसा मामला 9 जनवरी को सामने आया था। साउथ कोरियन महिला ट्रंक में मिली थी। छानबीन में पता चला था कि एक संगठन द्वारा उसे वादा किया गया था कि वो उसे ईश्वर से मिलाएँगे। हालाँकि बाद में राक्षस की आत्मा मारकर भगाने के नाम पर उसे पीट-पीटकर मार डाला गया।

‘भाई होता तो तू यहाँ बैठती’ : बरेली के कंपनी गार्डन में हिंदू लड़के के साथ बैठी बुर्के वाली लड़की, इस्लामी कट्टरपंथी ने थप्पड़ मारे, वीडियो वायरल

उत्तर प्रदेश के बरेली से एक वीडियो सामने आई है। इस वीडियो में इस्लामी कट्टरपंथियों का एक गुट एक हिंदू लड़के को मारते हुए इसलिए दिख रहा है क्योंकि वो बुर्का पहनी लड़की के साथ बैठा है। कट्टरपंथी उनसे बार-बार आधार कार्ड माँगते हैं और बीच में उन्हें थप्पड़ भी मारते हैं।

सोशल मीडिया पर साझा हो रही वीडियो को लेकर कहा जा रहा है कि ये बरेली के कपंनी गार्डन की है जहाँ बुर्का पहनी लड़की को एक लड़के के साथ बैठे देखा गया। इस्लामी कट्टरपंथी पहले लड़के को थप्पड़ मारते हैं। लड़की उन्हें रोकती है तो एक कट्टरपंथी उस लड़की को भी थप्पड़ मारते हैं। आवाज सुनाई पड़ती है- हाथ पकड़ती है उसका और उसके बाद उसे झापड़ मारा जाता है।

लड़का स्थिति संभालने के लिए बताता भी है कि वो लड़की उसकी दीदी है, वहीं लड़की भी कहती है कि वो लड़का उसका भाई है, लेकिन कट्टरपंथी मानने को तैयार नहीं होते। वो सवाल करते हैं- “अगर ये भाई होता तो तू इसके साथ यहाँ आकर बैठती।”

इसके बाद लड़का बार-बार पुलिस को फोन करने की बात कहता है लेकिन सब उसे रोकते रहते हैं। आखिर में वो हिम्मत करके उठ जाता है और सवाल करता है कि आपने थप्पड़ क्यों मारा। लड़का अपने भैया को फोन मिलाता है और कहता है कि अगर वीडियो ही बनानी है तो वीडियो बनाना उसका भी अधिकार है वो भी वीडियो बनाएगा। इसके बाद उसे धक्का देकर बैठा दिया जाता है।

बता दें कि ये वीडियो कब की है ये तो अभी नहीं पता चल सकता है लेकिन इस Treeni नाम के अकॉउंट से वीडियो को शेयर करके पुलिस से कार्रवाई करने की माँग की जा रही है। वहीं बरेली पुलिस ने इस घटना के संबंध में अपने ट्वीट में बताया कि प्रभारी निरीक्षक कोतवाली, बरेली को जाँचकर आवश्यक विधिक कार्यवाही करने हेतु निर्देशित कर दिया गया है।

अपने कर्मचारियों को UPS पावर देने वाला पहला राज्य बना महाराष्ट्र, मोदी सरकार लेकर आई है पेंशन की यह स्कीम: जानिए कर्मचारियों को कैसे मिलेगा फायदा

महाराष्ट्र की एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली NDA सरकार ने राज्य कर्मचारियों के लिए यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) लागू कर दी है। महाराष्ट्र, केंद्र की मोदी सरकार के बाद इसे लागू करने वाला पहला राज्य बन गया है। महाराष्ट्र के राज्य कर्मचारी अब अपनी सेवानिवृत्ति के लिए UPS चुन सकेंगे।

महाराष्ट्र सरकार ने रविवार (25 अगस्त, 2024) को ऐलान किया कि वह UPS लागू कर रही है। रविवार को ही इसे महाराष्ट्र कैबिनेट की मंजूरी भी मिल गई। अब महाराष्ट्र सरकार के लिए काम करने वाले राज्य कर्मचारी UPS या फिर न्यू पेंशन स्कीम, दोनों में से एक का चुनाव कर सकेंगे। न्यू पेंशन स्कीम को 2004 में सरकारी कर्मचारियों के लिए लाया गया था।

महाराष्ट्र सरकार के अंतर्गत अभी लगभग 14.5 लाख कर्मचारी काम करते हैं। इनमें से बड़ी संख्या उनकी है, जिन्होंने 2004 के बाद नौकरी पाई है। 2004 के बाद नौकरी पाने वालों को पुरानी पेंशन का लाभ नहीं मिलता। ऐसे में उन्हें अब सेवानिवृत्ति के समय अधिक लाभ चुनने की आजादी होगी।

महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले को आगामी विधानसभा चुनावों से जोड़ कर देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह निर्णय राज्य कर्मचारियों में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए NDA सरकार ने लिया है। महाराष्ट्र में 2024 के अंत तक विधानसभा चुनाव होने हैं। इसमें NDA का मुकाबला INDI गठबंधन से है।

UPS को केंद्र सरकार ने शनिवार (25 अगस्त, 2024) को मंजूरी दी थी। इसके तहत 1 जनवरी, 2004 के बाद केंद्र सरकार में नौकरी पाने वाले कर्मचारियों को अधिक सेवानवृत्ति लाभ देने की बात कही गई है। इसके तहत यदि को केंद्र सरकार का कर्मचारी 25 वर्षों तक सेवा देता है, तो उसे उसकी अंतिम बेसिक तनख्वाह का 50% निश्चित तौर पर पेंशन में दिया जाएगा।

कर्मचारियों को पेंशन में महंगाई भत्ता भी मिलेगा। इसके अलावा कर्मचारी की मौत पर उसके परिजनों को उसकी तनख्वाह का 60% देने का फैसला सरकार ने किया है। साथ ही उन कर्मचारियों को ₹10 हजार पेंशन निश्चित तौर पर दी जाएगी, जिन्होंने केंद्र सरकार को 10 साल तक सेवा दी है।

केंद्र सरकार ने UPS के जरिए पुरानी पेंशन स्कीम (OPS) की माँग को पूरा करने की कोशिश की है। हालाँकि, UPS पुरानी पेंशन स्कीम से काफी अलग है। OPS के अंतर्गत पहले कर्मचारियों को कोई भी अंशदान नहीं देना होता था, जबकि अभी UPS में यह अंशदान जारी रहेगा।

20 साल पहले सरकारी जमीन कब्ज़ा कर रखी छोटी सी बुनियाद, अब बन गई वहाँ बड़ी सी ‘मदीना मस्जिद’ और मदरसा: वक्फ बोर्ड का लगा दिया ठप्पा, अदालत बोला – हटो वहाँ से

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में कोर्ट ने सरकारी जमीन पर बनी एक मस्जिद को ध्वस्त करने का आदेश जारी किया है। इस मस्जिद का नाम मदीना मस्जिद है जिसे मुस्लिम समुदाय के लोग वक्फ बोर्ड में रजिस्टर्ड बताते आ रहे थे। हिन्दू संगठनों ने इस मस्जिद को अवैध बताते हुए लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ी। कोर्ट ने मस्जिद की पैरवी कर रही कमिटी पर जुर्माना भी ठोका है। यह आदेश गुरुवार (22 अगस्त, 2024) को जारी हुआ है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मस्जिद बिंदकी क्षेत्र के मलवाँ कस्बे में लगभग 20 साल पहले बनी थी। शुरुआत में इसका आकर काफी छोटा था जो धीरे-धीरे बढ़ाया जाता रहा। वर्तमान में यह मस्जिद कस्बे और आसपास की सबसे बड़ी मस्जिदों में शुमार की जाने लगी थी। साल 2005 से हिन्दू संगठनों ने इस मस्जिद को अवैध बताते हुए लम्बी लड़ाई जमीन से ले कर कोर्ट तक लड़ी थी। उनका आरोप था कि मदीना नाम की इस मस्जिद को ग्राम समाज की सरकारी भूमि को कब्ज़ा कर के बनवाया गया है। आरोप यह भी है कि इस मस्जिद के साथ मदरसा भी बनवा दिया गया था।

हालाँकि, मुस्लिम पक्ष इन आरोपों से लगातार इनकार करता रहा। मस्जिद की पैरवी वक्फ सुन्नी मदीना मस्जिद कमिटी कर रही थी। इस कमिटी की तरफ से हैदर अली कोर्ट में पेश हो रहे थे। हिन्दू संगठन की तरफ से बिंदकी तहसीलदार की कोर्ट में केस दायर किया गया था। अपने जवाब में मस्जिद कमेटी ने बताया कि 20 साल पहले मदीना मस्जिद पट्टे पर दी गई जमीन पर बनी थी। हैदर अली ने कोर्ट में जवाब दाखिल करते हुए हिन्दू संगठन के आरोपों को बेबुनियाद करार दिया था।

तहसीलदार की अदालत ने दोनों पक्षों सुनवाई का मौक़ा दिया। कोर्ट ने क्षेत्रीय लेखपाल से आख्या मँगवाई। इस आख्या में साबित हुआ कि मस्जिद अवैध कब्ज़ा कर के बनाई गई थी। अवैध कब्ज़े का यह दायरा लगभग 4 बिस्वा बताया गया है। आखिरकार 22 अगस्त को कोर्ट ने मलवां कस्बे की मदीना मस्जिद को सरकारी जमीन पर बना करार दिया। तहसीलदार की कोर्ट ने संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वो सरकारी भूमि पर बने अवैध निर्माण को ध्वस्त करें। साथ ही पुलिस को कार्रवाई के दौरान पूरी सुरक्षा मुहैया करवाने के निर्देश भी दिए।

तहसीलदार अचलेश सिंह की कोर्ट ने अपने आदेश में मस्जिद कमेटी को 65,500 रुपए जुर्माना भी भरने का आदेश दिया है। हालाँकि वक्फ सुन्नी मदीना मस्जिद कमेटी के अध्यक्ष हैदर अली ने इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में जाने की बात कही है। बताते चलें कि इसी साल 21 जुलाई को फतेहपुर में हिन्दू संगठनों ने पंचायत कर के मदीना मस्जिद पर जल्द फैसला देने की माँग की थी। तब जिलाधिकारी ने मामले को 15 दिनों में निस्तारित करवाने का आश्वासन दिया था।

‘नमाजी टोपी पहने बच्चे कर रहे पढ़ाई, पोंछ दिया हिन्दू छात्रों का तिलक’: बिजनौर में शिक्षिका आएशा के खिलाफ शुरू हुई जाँच, जुमे के दिन बच्चों को ले जाया जाता है मस्जिद

उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के एक सरकारी स्कूल में मुस्लिम छात्रों का नमाज़ी टोपी पहन कर पढ़ाई करते हुए वीडियो वायरल हो रहा है। आरोप है कि टोपी लगा कर स्कूल आने का फरमान उन्हें उनके ही स्कूल के एक मुस्लिम टीचर ने सुनाया है। इन बच्चों को जुमे के दिन यानी शुक्रवार को मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए भी ले जाया जाता है। बताया यह भी जा रहा है कि इसी स्कूल में हिन्दू बच्चों को तिलक लगा कर आने पर टोका भी गया है। जिले के बेसिक शिक्षा अधिकारी ने इस पूरे मामले में जाँच के आदेश दिए है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला बिजनौर जिले के बनेड़ा स्थित उच्च माध्यमिक विद्यालय का है। यहाँ पढ़ने वाले कुछ हिन्दू छात्रों ने शिकायत की है कि जब वो स्कूल में तिलक लगा कर गए तो उसे पोंछ दिया गया। यह आरोप स्कूल की टीचर आएशा पर लगा है। मयंक नाम के छात्र का यह भी कहना है कि जब उन्हीं के कई मुस्लिम सहपाठी नमाज़ी टोपी पहन कर स्कूल आते हैं तो उनको कोई नहीं रोकता। कुछ अन्य हिन्दू बच्चों के परिजनों की भी यही शिकायत है।

इस मामले के सामने आने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने भी आपत्ति उठाई है। आरएसएस के खंड कार्यवाह रोहित ने बताया कि स्कूल के कुछ छात्र उनकी शाखा में भी आते है। इन बच्चों ने यहाँ खुद को स्कूल टीचर आएशा के दोहरे भेदभाव से पीड़ित बताया। बकौल रोहित स्कूल के कुछ मुस्लिम छात्रों को तो स्कूल टाइम में ही जुमे (शुक्रवार) के दिन पास की एक मस्जिद में भी नमाज़ के लिए ले जाया जाता है। रोहित ने इस पूरे मामले की जाँच और कार्रवाई की माँग उठाई है।

इस मामले में स्कूल के प्रिंसिपल का भी बयान सामने आया है। उन्होंने माना कि स्कूल में नमाज़ी टोपी लगा कर आना सही नहीं है। बकौल प्रिंसिपल स्कूल के मुस्लिम टीचर ही अपने समुदाय के छात्रों को टोपी पहन कर आने के लिए कहते हैं। प्रिंसिपल ने यह स्वीकार किया कि शुक्रवार के दिन मुस्लिम छात्र पास की मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए जाते हैं। ये बच्चे स्कूल के मुस्लिम टीचरों के साथ मस्जिद में जाते हैं। प्रिंसिपल ने बताया कि उन्होंने तमाम सीनियर अधिकारियों को इसकी सूचना भेज दी है।

इस मामले में बिजनौर के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) का भी बयान सामने आया है। उन्होंने बताया कि मिली शिकायत का संज्ञान ले लिया गया है और जाँच शुरू कर दी गई है। बकौल BSA जाँच के बाद सामने आए तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।