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मर गए भोला पांडेय, देवेंद्र के साथ मिलकर हाइजैक कर लिया था हवाई जहाज: इंदिरा गाँधी की रिहाई की रखी थी शर्त, बाद में कॉन्ग्रेस ने बना दिया MP-MLA

डॉक्टर भोलानाथ पांडेय का शुक्रवार (23 अगस्त 2024) को निधन हो गया। वे अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस कमेटी के पूर्व राष्ट्रीय सचिव थे। पूर्व विधायक। लोकसभा का चुनाव भी लड़ चुके थे। पर ये उनका अधूरा परिचय है। उनका पूरा परिचय यह है कि उत्तर प्रदेश के ही देवेंद्र पांडेय के साथ मिलकर उन्होंने एक विमान को अगवा कर लिया था।

देवेंद्र पांडेय का साल 2017 में निधन हुआ था। दोनों की माँग थी कि इंदिरा गाँधी को बिना शर्त रिहा कर दिया जाना चाहिए। इसका इनाम दोनों को कॉन्ग्रेस ने बाद में सांसद-विधायक बनाकर दिया। वैसे सियासत और अपराध का घालमेल नई बात नहीं है। इस मोर्चे पर भी कॉन्ग्रेस सबसे ज्यादा अनुभव रखती है। सत्तालोभ और तुष्टिकरण के लिए ऐसा कोई सिद्धांत नहीं है जिसे उसने ध्वस्त न किया हो।

यही कारण है कि भोला पांडेय के निधन को कॉन्ग्रेस नेता पार्टी की अपूरणीय क्षति बता रहे हैं। उन्हें अन्याय के खिलाफ आजीवन संघर्ष करने वाला बता रहे हैं। जिस घटना ने भोला पांडेय के कॉन्ग्रेस में आगे बढ़ने की नींव डाली वह दिसंबर 1978 का है। किशन आर वाधवानी की पुस्तक ‘इंडियन एयरपोर्ट्स (शॉकिंग ग्राउंड रियलिटीज़)’ के अनुसार, भोला और देवेंद्र पांडेय ने इंडियन एयरलाइंस के एक घरेलू उड़ान का अपहरण कर लिया था। देवेंद्र पांडे कॉन्ग्रेस के उन समर्थकों में से एक थे, जो अपने चहेते नेता के लिए कुछ भी कर गुजरने को तत्पर रहते थे।

इंदिरा गाँधी की रिहाई के लिए 27 साल के देवेंद्र पांडेय ने भोला पांडेय के साथ मिलकर फिल्मी स्टाइल में इंडियन एयरलाइंस के विमान को हाइजैक कर लिया। दोनों ने क्रिकेट बॉल को रुमाल से ढककर उसे बम बताते हुए प्लेन को अगवा किया। दिल्ली जाने वाले प्लेन को वाराणसी ले गए। उस वक्त प्लेन में 132 यात्री सवार थे।

विमान अपहरण के बदले उन्होंने भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी कि रिहाई की माँग की थी, जिन्हें कि आपातकाल के बाद गिरफ्तार किया गया था। इन दोनों ने यात्रियों को छोड़ने के लिए मुख्यतः तीन शर्तें रखी थीं;

  • इंदिरा गाँधी को रिहा किया जाए।
  • इंदिरा गाँधी और संजय गाँधी के खिलाफ लगे सारे आरोप खत्म किए जाएँ।
  • इंदिरा गाँधी को गिरफ्तार करने वाली केंद्र की जनता पार्टी की सरकार इस्तीफा दे।

हालाँकि, इस विमान अपहरण कि घटना को ‘राजनीतिक हास्य’ का नाम दिया गया क्योंकि पांडेय भाइयों ने विमान अपहरण के लिए बच्चों के खिलौने वाले हथियार का इस्तेमाल किया था। कुछ घंटों के लिए 132 यात्रियों को बंधक बनाए रखने के बाद, उन्होंने मीडिया की मौजूदगी में वाराणसी उतरने पर आत्मसमर्पण कर दिया था।

देवेंद्र पांडेय को इस मामले में 9 महीने, 28 दिन जेल में भी रहना पड़ा था। देश में जब फिर से इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी, तब इन पर लगे मुकदमों को वापस ले लिया गया।

गाँधी परिवार की भक्ति में उठाए गए इस कदम के कारण ही विमान अपहरण के इस संगीन अपराध के बावजूद ‘पुरस्कार स्वरूप’ कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा उन्हें पुरस्कृत किया गया था- पहले उन्हें 1980 में विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी का टिकट मिला और बाद में लोकसभा के लिए। इस चुनाव में पांडेय जीत गए और उत्तर प्रदेश की विधान सभा के सदस्य बन गए।

भोलानाथ पांडेय ने वर्ष 1980 से 1985 और 1989 से 1991 तक दोआबा, बलिया से कॉन्ग्रेस विधायक के रूप में कार्य किया। दूसरी तरफ देवेंद्र पांडेय दो कार्यकाल तक संसद के सदस्य रहे और उत्तर प्रदेश के महासचिव के रूप में कॉन्ग्रेस पार्टी की सेवा की।

दोनों पांडेय बंधुओं को भारत में आपातकाल के दौरान जेल में सभी विपक्षी नेताओं की हत्या के विचार के साथ ही कई अन्य आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। भोलानाथ पांडेय आजमगढ़ जिले से थे और देवेंद्र पांडेय उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से। दोनों ही युवा कॉन्ग्रेस के सदस्य थे।

विमान का अपहरण करना कुछ सबसे बड़े अपराधों में से एक है और ऐसे व्यक्ति को आजीवन कारावास की न्यूनतम सजा से लेकर मौत की सजा तक हो सकती थी। लेकिन कॉन्ग्रेसी प्लेन अपहरणकर्ताओं को परिवार के लिए उठाए गए इस कदम के लिए संसद भेजकर सम्मानित किया गया।

विमान अपहरण की इस घटना के दशकों बाद, ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की 2014 की एक रिपोर्ट से पता चला कि विमान अपहरणकर्ता भोलानाथ पांडेय लोकसभा चुनाव के दौरान सलेमपुर से कॉन्ग्रेस का उम्मीदवार था। उन्हें कॉन्ग्रेस ने 1991,1996,1998, 1999, 2004, 2009 और 2014 में लोकसभा का चुनाव लड़ाया। यह दूसरी बात है कि 7 बार टिकट मिलने के बाद भी वे संसद नहीं बन पाए।

‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’: न्याय की प्रतीक्षा में हैं लाखों जिंदगी, वर्षों से जेलों में बंद हैं अंडरट्रायल कैदी

भारत की जेलों में अंडरट्रायल कैदियों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। ये वे लोग हैं जिन्हें किसी अपराध के आरोप में गिरफ्तार किया गया है, लेकिन उनका मामला अभी अदालत में चल रहा है और उनके खिलाफ कोई फैसला नहीं हुआ है। दुर्भाग्यवश कई अंडरट्रायल कैदी ऐसे हैं, जो वर्षों से बिना दोषी साबित हुए जेल में बंद हैं।

भारतीय संविधान के तहत हर नागरिक को न्याय पाने का अधिकार है। ‘निर्दोषता की धारणा’ एक प्रमुख सिद्धांत है, जिसका अर्थ है कि जब तक किसी व्यक्ति को अपराध का दोषी सिद्ध नहीं किया जाता, उसे निर्दोष माना जाएगा। इसके बावजूद, हमारे देश की कानूनी प्रक्रिया इतनी धीमी है कि अनेक अंडरट्रायल कैदी वर्षों तक जेल में बंद रहते हैं।

भारत की न्यायिक प्रणाली में मुकदमों की सुनवाई में अक्सर देरी होती है। इसके कई कारण हो सकते हैं- जैसे कि न्यायालयों में लंबित मामलों की अधिकता, वकीलों की अनुपलब्धता, गवाहों की कमी और पुलिस की धीमी जाँच प्रक्रिया। यह सब मिलकर अंडरट्रायल कैदियों के मामलों को लंबा खींच देता है।

अक्सर देखा जाता है कि गरीब और असहाय कैदी, जो ज़मानत की राशि नहीं भर सकते, उन्हें ज़मानत मिलने के बावजूद जेल में रहना पड़ता है। ये लोग या तो अपनी वित्तीय स्थिति के कारण ज़मानत नहीं ले पाते या फिर उनके पास कानूनी सहायता नहीं होती। कई मामलों में अंडरट्रायल कैदियों को जेल में रखना उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन है।

जेल में लंबे समय तक रहना किसी व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक स्थिति को प्रभावित करता है। इसके साथ ही उसके परिवार पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। कई बार तो यह देखा गया है कि अंडरट्रायल कैदियों की जेल में रहते-रहते मृत्यु तक हो जाती है और उनका मुकदमा अधूरा ही रह जाता है।

सरकार और न्यायपालिका ने इस समस्या का समाधान निकालने के लिए कुछ कदम उठाए हैं। ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट’ का गठन किया गया है, ताकि मामलों का निपटारा जल्द हो सके। इसके अलावा, गरीब कैदियों के लिए मुफ्त कानूनी सहायता का प्रावधान भी किया गया है। हालाँकि, अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अंडरट्रायल कैदियों की समस्या हमारे देश की न्याय प्रणाली की गंभीर चुनौती है।

इसके समाधान के लिए आवश्यक है कि न्यायपालिका, सरकार और समाज मिलकर काम करें। न्याय में देरी अन्याय के समान है और अंडरट्रायल कैदियों की ज़िंदगी इस कथन की सच्चाई को दर्शाती है। न्याय व्यवस्था को तेज और सुलभ बनाना आज की प्रमुख आवश्यकता है, ताकि हर नागरिक को न्याय मिल सके और कोई भी निर्दोष वर्षों तक जेल में न रहे।

भारत में न्यायिक प्रणाली में सुधार लाने के उद्देश्य से भारतीय न्याय संहिता (BNS) और भारतीय सुरक्षा संहिता (BSS) को लागू किया गया है। इन नए कानूनों में ज़मानत से जुड़े प्रावधानों में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। इन प्रावधानों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि न्याय प्रक्रिया तेज़ और सुलभ हो और दोषियों को दंड देने के साथ-साथ निर्दोषों को राहत मिले।

भारतीय न्याय संहिता के तहत ज़मानत देने के संबंध में नए दिशा-निर्देश तय किए गए हैं। ज़मानत के प्रावधान अब अधिक स्पष्ट और न्यायसंगत बनाए गए हैं, ताकि न्यायालयों द्वारा इसे लागू करने में कोई अस्पष्टता न हो। गंभीर अपराधों के मामलों में ज़मानत देने के लिए अब कड़े मानदंड तय किए गए हैं।

ऐसे मामलों में ज़मानत सिर्फ तभी दी जा सकेगी, जब अभियुक्त की ओर से पर्याप्त सबूत प्रस्तुत किए जाएँगे कि वह न तो न्याय प्रक्रिया में बाधा डालेगा और ना ही गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश करेगा। अपराध की प्रकृति, अभियुक्त का चरित्र और समाज में उसकी स्थिति को ध्यान में रखते हुए ज़मानत दी जाएगी।

इसके साथ ही अपराध की गंभीरता के आधार पर ज़मानत की शर्तें निर्धारित की जाएँगी। ज़मानत राशि को अभियुक्त की आर्थिक स्थिति के अनुरूप तय किया जाएगा, ताकि गरीबों को ज़मानत प्राप्त करने में कोई कठिनाई न हो। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाएगा कि अभियुक्त द्वारा दी गई ज़मानत की राशि न्यायसंगत हो।

भारतीय सुरक्षा संहिता के तहत भी ज़मानत से जुड़े प्रावधानों में सुधार किए गए हैं। ऐसे अपराध जिनका संबंध राष्ट्र की सुरक्षा, आतंकवाद या संगठित अपराध से है, उनमें ज़मानत देने के लिए सख्त प्रावधान किए गए हैं। इन मामलों में ज़मानत प्राप्त करना अत्यंत कठिन होगा, ताकि राष्ट्र की सुरक्षा को कोई खतरा न हो।

ज़मानत प्राप्त करने वाले अभियुक्तों पर निगरानी रखने के लिए अब विशेष तंत्र बनाए गए हैं। इसके तहत इलेक्ट्रॉनिक निगरानी के माध्यम से अभियुक्त की गतिविधियों पर नज़र रखी जाएगी। अंतराष्ट्रीय अपराधों के मामलों में ज़मानत के प्रावधान भी सख्त किए गए हैं और ज़मानत देने के लिए अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों का पालन किया जाएगा।

BNS और BSS के तहत ज़मानत के नए पारदर्शी, सुलभ और न्यायसंगत प्रावधान न्यायालयों को उचित दिशा-निर्देश देते हैं, जिससे न केवल दोषियों को दंडित करने में मदद मिलेगी, बल्कि निर्दोष व्यक्तियों को भी राहत मिलेगी। न्यायपालिका और कानून व्यवस्था के प्रति आम जनता का विश्वास बढ़ाने के लिए यह एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि ‘ज़मानत नियम है और जेल अपवाद’।

कौन कहता है कमजोर हुआ नरेंद्र मोदी का मैजिक, क्योंकि पब्लिक कह रही उन जैसा प्रधानमंत्री कोई नहीं: राहुल गाँधी के लिए दिल्ली अब भी बहुत दूर

प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी अभी भी सबसे लोकप्रिय चेहरा हैं। ये बात मैं नहीं, बल्कि एक सर्वे कह रहा है। सर्वे में 49 प्रतिशत लोगों ने प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी को सबसे बेहतर विकल्प बताया है। वहीं, सर्वे में शामिल 22 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जो ये मानते हैं कि कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी बेहतर प्रधानमंत्री साबित होंगे।

इस साल हुए लोेकसभा चुनावों में जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं। हालाँकि, पिछली बार की तुलना में इस बार भाजपा की सीटों में कमी देखी गई है। पिछले लोकसभा चुनावों यानी साल 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को 303 सीटें मिली थीं। यानी बहुमत के आँकड़े से 31 सीटें अधिक मिली थीं।

इस साल हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा को 240 सीटें मिलीं। यानी कि वह बहुमत का आँकड़ा नहीं छू पाई। इसके बाद यह कयास लगाए जाने लगे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इकबाल कम हुआ है और भाजपा सरकार की लोकप्रियता में कमी आई है। इतना ही नहीं, भाजपा के जुड़े कार्यकर्ता भी ये मान रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की सरकार में पहले वाली बात नहीं है।

इसके पीछे वे तर्क देते हैं कि अपने फैसलों को लेकर अडिग रहने वाली मोदी सरकार अब अपने पाँव पीछे खींचने के लिए मजबूर हो गई है। इसके लिए वे वक्त बोर्ड बिल को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजकर ठंडे बस्ते में डालने की बात हो या लेटरल एंट्री वाले अपने आदेश को वापस को लेने के मुद्दे का तर्क देते हैं। सोशल मीडिया पर सरकार समर्थक भी इसको लेकर आलोचना करते रहते हैं।

हालाँकि, सरकार लोगों की माँगों को वृहद दायरे में रखकर निर्णय ले रही है, ये बात कोई समझने को तैयार नहीं है। पिछले बार की भारी बहुमत वाली सरकार में भी पीएम नरेंद्र मोदी ने विरोध के बाद तीन कृषि कानूनों को वापस लिया था। यह सब जनता के हित और उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप सरकार की प्रतिक्रिया थी।

हालिया सर्वे उनके इस दावे के झुठला रहा है कि मोदी सरकार का जलवा कम हुआ है। दरअसल, इन्हीं विषयों पर जनता का मूड जानने के लिए आजतक ने सी-वोटर के साथ मिलकर ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे किया। इस सर्वे में प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी की पसंद के आसपास कोई भी नेता नहीं है। राहुल गाँधी को उनसे आधे से भी कम लोग पीएम पद के लिए पसंद कर रहे हैं।

सर्वे में शामिल 49 प्रतिशत लोगों ने प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी को सबसे बेहतर विकल्प बताया। सिर्फ 22 प्रतिशत लोगों इसके लिए राहुल गाँधी को विकल्प के रूप में चुना। इसी सर्वे में लोगों ने नरेंद्र मोदी को देश का अब तक का सबसे अच्छा प्रधानमंत्री बताया। सर्वे में शामिल 52 प्रतिशत लोगों ने नरेंद्र मोदी का नाम लिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गाँधी, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह को पीछे छोड़ दिया है। 12-12 प्रतिशत लोगों ने माना कि अब तक सबसे अच्छे प्रधानमंत्री में मनमोहन सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी का नाम लिया। वहीं, 10 प्रतिशत लोगों ने इंदिरा गाँधी और 5 प्रतिशत लोगों ने जवाहरलाल नेहरू का नाम लिया।

इस तरह, भाजपा सरकार एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इकबाल अभी भी कायम है। समय के साथ इन प्रतिशतों में कमी या बढ़ोत्तरी होती रहती है, लेकिन संपूर्ण आँकड़ों में कोई बहुत बड़ा बदलाव देखने में नहीं आ रहा है। भाजपा सरकार अपना काम पहले की ही भाँति बेहद संजीदगी और देश के विकास को लक्षित करके कर रही है।

पाकिस्तान में टेस्ट क्रिकेट खेल रहे शाकिब अल हसन पर बांग्लादेश में संकट, हत्या का केस दर्ज: शेख हसीना की पार्टी से सांसद थे ऑलराउंडर, अब ‘घर वापसी’ पर सवाल

बांग्लादेश के स्टार क्रिकेटर शाकिब अल हसन एक गंभीर विवाद में फंस गए हैं, क्योंकि उन पर एक कपड़ा फैक्ट्री कर्मचारी की हत्या में शामिल होने का आरोप है। ये आरोप उस समय सामने आए हैं जब शाकिब पाकिस्तान में हैं और पाकिस्तानी टीम के खिलाफ दो मैचों की टेस्ट सीरीज खेल रहे हैं। इस मामले में पीड़ित के पिता ने ढाका पुलिस स्टेशन में डेढ़ सौ से अधिक नामजद और 500-600 अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है।

बांग्लादेशी मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये मामला बांग्लादेशी संसद के सदस्य के तौर पर शाकिब की पिछली भूमिका से जुड़ा है। जिसमें उनके संसदीय क्षेत्र में प्रदर्शन के दौरान युवक की मौत के मामले में पीड़ित के पिता ने शाकिब और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना समेत 156 लोगों को आरोपित बनाया है।

जानकारी के मुताबिक, ये मामला ढाका के अदबोर पुलिस स्टेशन में रूबेल नाम के युवक के पिता ने दर्ज कराया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 5 अगस्त को रूबेल विरोध प्रदर्शन का हिस्सा था, जहाँ भीड़ पर गोलियाँ चलाई गई। इस गोलीबारी में रूबेल को सीने-और पेट में गोली लगी, जिसकी 7 अगस्त को मौत हो गई।

इस एफआईआर में 156 लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट है, जिसमें शाकिब का नाम आरोपित नंबर 28वें के तौर पर है। अन्य आरोपितों में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना, ओबैदुल कादर और 154 अन्य शामिल हैं। करीब 400-500 अज्ञात लोग भी आरोपित हैं।

बता दें कि बांग्लादेश में राजनीतिक संकट के बावजूद शाकिब को अंतरिम सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ टेस्ट सीरीज में भाग लेने की अनुमति दी है। और वो पाकिस्तान में टेस्ट मैच खेल रहे हैं। इस मामले में बांग्लादेशी क्रिकेट टीम के कप्तान नजमुल हुसैन शांतो का भी बयान सामने आया है। शांतो ने कहा कि शाकिब का ध्यान क्रिकेट पर है। उन्होंने कहा, “शाकिब ने यह खेल काफी समय तक खेला है, इसलिए उन्हें अपनी भूमिका और खुद को तैयार करने का तरीका पता है। मैं उनके राजनीतिक करियर के बारे में नहीं सोच रहा हूँ।”

गौरतलब है कि शाकिब अल हसन बांग्लादेश के अब तक सबसे बेहतरीन क्रिकेटर माने जाते हैं। उन्होंने अब तक 67 टेस्ट मैच खेला है, जिसमें 217 के उच्च स्कोर के साथ 4505 रन बनाए हैं। टेस्ट मैचों में उन्होंने 5 शतक और 31 अर्धशतक लगाए हैं, तो बॉलिंग में 237 विकेट लिए हैं। वो बांग्लादेश के लिए सर्वाधिक विकेट लेने वाले गेंदबाज भी हैं। शाकिब ने वनडे क्रिकेट में 247 मैच खेले हैं और 9 शतक, 56 अर्धशतक के साथ 7570 रन बनाए हैं, साथ ही 317 विकेट लिए हैं। वहीं, टी20 इंटरनेशनल फॉर्मेट में उन्होंने 129 मैच खेलते हुए 13 अर्धशकतों के साथ 2551 रन बनाए हैं, तो 149 विकेट भी लिए हैं। वो तीनों ही फॉर्मेट में बांग्लादेश ही नहीं, दुनिया के सबसे शानदार आल राउंडर्स में गिने जाते हैं।

40 साल में असम में बस गए 47928 अवैध प्रवासी, इनमें 56% मुस्लिम: विधानसभा में बीजेपी सरकार ने रखे आँकड़े, बांग्लादेश से घुसपैठ राज्य में बड़ा मुद्दा

असम में लगभग 48000 घुसपैठियों की पहचान की गई है। इन घुसपैठियों की पहचान बीते लगभग साढ़े चार दशक में की गई है। राज्य में घुसपैठियों के संबंध में यह जानकारी असम सरकार ने दी है। यह जानकारी असम विधानसभा में दी गई है।

असम विधानसभा में सरकार ने घुसपैठियों पर पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में बताया है कि राज्य में 1971 से लेकर 2014 के बीच 47,928 घुसपैठियों की पहचान की गई है। इन लोगों को राज्य के फॉरेन ट्रिब्यूनल ने विदेशी घोषित किया है। असम विधानसभा में मुख्यमंत्री और गृहमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बताया कि इन 47,928 विदेशी लोगों में से 27,309 मुस्लिम हैं जबकि 20613 हिन्दू हैं। यानी कुल घुसपैठियों में 56% मुस्लिम हैं।

राज्य विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, 27,309 मुस्लिम घुसपैठियों में से सबसे अधिक 4182 जोरहाट जिले में जबकि 3897 मुस्लिम गुवाहाटी शहर में पहचाने गए हैं। डिब्रूगढ़ में 2782 लोगों को मुस्लिम घुसपैठिया बताया गया है। इसके अलावा होजाई, सिवासनगर, नगांव और कछार में भी 2000 से अधिक मुस्लिम घुसपैठियों की पहचान हुई है। इसके अलावा भी असम के कई जिलों में मुस्लिम घुसपैठियों को पहचाना गया है। वहीं बाहर से आने वाले सबसे अधिक हिन्दुओं की सँख्या कछार, गुवाहाटी और लखीमपुर जैसे जिलों में हैं।

वर्ष 1971 से घुसपैठियों की पहचान किए जाने के पीछे वर्ष 1985 में राजीव गाँधी की सरकार के दौरान किया गया असम एकॉर्ड है। इस समझौते को असम के छात्र नेता प्रफुल्ल कुमार महंत और भारत सरकार के बीच किया था। इस समझौते के अनुसार, उन लोगों को घुसपैठिया माना जाएगा जो अवैध रूप से राज्य में वर्ष 1971 में घुसे हैं। यह समझौता असम में घुसपैठ को लेकर हुए छात्र आन्दोलन के बाद किया गया था।

असम में बांग्लादेश के रास्ते होने वाली घुसपैठ बड़ा मुद्दा रही है। इसी को लेकर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने भी बताया था कि राज्य की 72% जनसंख्या असमिया भाषी है जबकि 28% बांग्ला बोलते हैं। असम सरकार ने प्रदेश में बाहरी घुसपैठ और असम की संस्कृति को बचाने को लेकर आश्वासन भी दिया है।

बेटी से कर रहा था रेप की कोशिश, बीवी ने सिर पर हथौड़े से वार कर मार डाला: तमिलनाडु पुलिस ने बनाया ‘हत्या’ का केस, हाई कोर्ट ने ‘आत्मरक्षा’ बता किया बरी

मद्रास हाई कोर्ट ने अपने पति की हत्या करने वाली एक महिला के खिलाफ दायर हत्या के केस को खारिज कर दिया है। महिला का पति नशे की हालत में अपनी 21 साल की बेटी के साथ रेप करने का प्रयास किया था। बेटी को बचाने की कोशिश में महिला ने पति के सिर पर वार किया था, जिससे उसकी मौत हो गई थी। इसके बाद पुलिस ने महिला के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया था।

न्यायाधीश जी जयचंद्रन की एकल पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत फोटोग्राफ और पोस्टमार्टम रिपोर्ट सहित विभिन्न रिकॉर्ड आरोपित महिला (याचिकाकर्ता) और उसकी बेटी द्वारा दिए गए बयान मेल खाते हैं। अभियोजन पक्ष के अनुसार, जाँच में पाया गया कि मृतक अपनी बेटी के ऊपर लेटा हुआ था और उसका मुँह बंद कर रहा था। महिला ने जब बेटी की चीखने की आवाज सुनी तो वहाँ आई।

इस दौरान आरोपित महिला ने अपने पति को बेटी के ऊपर से खींचकर दूर करने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं हटा। इसके बाद महिला ने अपने पति को लकड़ी के चाकू से उसके सिर पर मारा। इस पर उका पति नहीं माना और कुकृत्य जारी रखा तो महिला ने पीछे से उसके सिर पर हथौड़ा मार दिया। इससे उसके पति की मौके पर ही मौत हो गई। महिला पर पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर लिया था।

हत्या का मामला दर्ज किए खिलाफ महिला ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। महिला ने कोर्ट में तर्क दिया कि यह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 97 के तहत यह मामला खुद के बचाव से संबंधित था। इसलिए, भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत उस पर हत्या का मुकदमा चलाना अनुचित है। उसने कोर्ट से हत्या का मामला हटाने का आग्रह किया।

अदालत ने इसके ‘सामान्य अपवादों’ पर विचार किया और कहा कि प्रत्येक व्यक्ति आत्मरक्षा और दूसरे व्यक्ति को बचाने का अधिकार रखता है। कोर्ट ने कहा, “कोई भी व्यक्ति खुद को या किसी को ऐसे यौन अपराधों से बचाने के लिए IPC की धारा 97 के तहत निजी बचाव का अधिकार रखता है। भले ही अपराध स्वीकार कर लिया गया हो, लेकिन उसे दंडित किए जाने से छूट दी जाएगी।”

इस मामले में कोर्ट ने मृतक की बेटी के बयान के साथ-साथ अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत की गई तस्वीरों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला दिया। इसमें दिखाया गया था कि मृतक के सिर के पिछले हिस्से में चोट लगी थी। कोर्ट ने कहा, “मृतक नशे में अपनी बेटी के साथ दुर्व्यवहार करने की कोशिश की। बेटी की इज्जत बचाने के लिए याचिकाकर्ता, जो लड़की की माँ है, ने ये अपराध किया है।”

न्यायालय ने आगे कहा कि ऐसी परिस्थितियों में यह हस्तक्षेप करने के लिए उपयुक्त मामला था। इसलिए कोर्ट ने याचिका को स्वीकार कर लिया और महिला के खिलाफ लंबित आपराधिक मामले को रद्द कर दिया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता महिला की ओर से कोई भी अदालत में पेश नहीं हुआ था।

कोलकाता-बदलापुर के बाद गैंगरेप से उबला असम, ट्यूशन से लौट रही हिंदू नाबालिग को दरिंदगी के बाद सड़क पर फेंका: बोले CM- लोकसभा चुनाव के बाद विशेष समुदाय अत्यंत सक्रिय

कोलकाता और बदलापुर में रेप की घटनाएँ सामने आने के बाद अब असम के ढिंग में एक हिंदू नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप की घटना सामने आई है। वहाँ स्थानीय सड़कों पर प्रदर्शन करने उतरे हुए हैं। पुलिस ने दो आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है जबकि एक अब भी फरार है। प्रदेश मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इस मुद्दे पर मीडिया से बात की। उन्होंने कहा कि बच्ची के साथ जघन्य अपराध करने वाले को छोड़ा नहीं जाएगा।

असम ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, जिस नाबालिग के साथ कुकर्म किया गया है वो दसवीं कक्षा की छात्रा है। घटना वाले दिन शाम 7 से 8 बजे के करीब वो ट्यूशन से घर लौट रही थी। इसी दौरान उसपर तीन लोगों ने हमला किया। बाद में उसके साथ दुष्कर्म करके उसे सड़क किनारे बेहोशी की हालत में फेंक गए। पीड़िता सड़क किनारे करीब एक घंटे तक पड़ी रही।

इसी बीच एक स्थानीय की नजर लड़की पर पड़ी। उन्होंने बच्ची की हालत देख फौरन पुलिस को फोन किया और कार्रवाई की माँग की। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर पहले पीड़िता को ढिंग फर्स्ट रेफरल यूनिट में ले गए जहाँ उसकी चोटें देख उसे नगाँव के एक अस्पताल में रेफर कर दिया गया।

घटना की सूचना फैलते ही स्थानीय संगठन भी सड़कों पर न्याय माँगने उतर आए। इस दौरान जमकर प्रदर्शन हुआ, सड़कें जाम हुई और न्याय की माँग को लेकर रास्ते बंद कर दिए गए। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) की ढिंग यूनिट ने भी दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी की माँग की और अपराधियों के पकड़े जाने तक धींग इलाके में बंद का आह्वान किया है। वहीं सीएम सरमाने भी घटना की निंदा की और अपराधी को सजा दिलाने की बात कही।

उन्होंने अपने एक्स पर लिखा, “ढिंग में हुई भयावह घटना मानवता के खिलाफ अपराध है और इसने हमारी अंतरात्मा को झकझोर दिया है। हम किसी को नहीं बख्शेंगे और अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाएँगे। मैंने असम पुलिस के डीजीपी को घटनास्थल पर जाने और ऐसे राक्षसों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।”

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा, “जिन अपराधियों ने ढिंग की एक हिंदू नाबालिग लड़की के साथ जघन्य अपराध करने का साहस किया, उन्हें कानून छोड़ेगा नहीं। लोकसभा चुनाव के बाद एक विशेष समुदाय अत्यंत सक्रिय हो रहा है। हिंदुओं को भाषाओं के आधार पर बाँटने की कोशिश से सभी को सतर्क रहना चाहिए।”

UP सरकार का बुलडोजर पब्लिक के भी जीत रहा दिल, देश के सबसे पॉपुलर CM हैं योगी आदित्यनाथ: टक्कर में भी नहीं केजरीवाल-ममता, 19% लोग चाहते हैं मोदी के बाद बने PM

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ देश के सबसे लोकप्रिय CM हैं। वह लोकप्रियता के मामले में अन्य CM से दोगुना आगे हैं। यह राय देश के लाखों लोगों ने व्यक्त की हैं। CM योगी आदित्यनाथ लोकप्रियता के मामले में CM अरविन्द केजरीवाल, CM ममता बनर्जी और बाकियों से काफी आगे बढ़ चुके हैं। यह जानकारी आजतक के मूड ऑफ़ द नेशन सर्वे (MOTN) में सामने आई है। यह सर्वे में हाल ही में किया गया है।

आजतक के MOTN के अनुसार, योगी आदित्यनाथ को देश के 33.2% लोग पसंद करते हैं। वहीं अरविन्द केजरीवाल को 13.8% लोग पसंद करते हैं। CM ममता बनर्जी 9.1% लोग पसंद करते हैं। CM स्टालिन और CM चंद्रबाबू नायडू इसके बाद लोकप्रिय हैं।

आजतक का यह MOTN सर्वे 15 जुलाई, 2024 से 10 अगस्त, 2024 के बीच हुआ था। इस सर्वे में 1.36 लाख लोगों से CM की लोकप्रियता के बारे में प्रश्न पूछे गए। इससे पहले भी CM योगी आदित्यनाथ देश में लोकप्रियता के मामले में शीर्ष पर बने रहे हैं।

CM योगी आदित्यनाथ के देश में सबसे अधिक लोकप्रिय होने का कारण उनका उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था पर जोर देना है। लोगों ने सर्वे में बताया है कि योगी आदित्यनाथ के अपराधियों पर बुलडोजर एक्शन करवाने और अवैध संपत्तियों के जब्तीकरण के कारण भी वह उन्हें पसंद करते हैं।

योगी आदित्यनाथ की प्रशासन को लेकर स्पष्टता भी देश में लोगों को पसंद आई है। योगी आदित्यनाथ के सामने पेपर लीक और उत्तर प्रदेश के अन्य मुद्दे चुनौती बन कर भी उभरे हैं, लोगों ने कहा है कि CM योगी को इन पर काम करने की आवश्यकता है।

CM योगी आदित्यनाथ की अपने राज्य में भी लोकप्रियता अच्छी खासी है। CM योगी का कामधाम भी राज्य में लोगों को पसंद आया है। प्रदेश के लगभग 40% लोग उनके कामकाज से संतुष्ट हैं। हालाँकि, यह आँकड़ा पिछली बार अधिक था। बताया गया है कि इसमें 2024 लोकसभा चुनाव के बाद थोड़ा सा प्रभाव पड़ा है।

CM योगी को मुख्यमंत्री के तौर पसंद करने के अलावा देश की जनता उन्हें बड़े रोल में भी देखना चाहती है। MOTN सर्वे में सामने आया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बाद लोग अमित शाह और फिर सबसे ज्यादा CM योगी को उनका सही उत्तराधिकारी मानते हैं। 19% लोग CM योगी को लोग देश के PM के रूप में देखना चाहते हैं।

14 साल की बच्ची का महीनों रेप करता रहा 50 साल का हैदर, गर्भपात कराने के लिए पीड़िता और उसके पिता को किया अगवा: बिहार के पूर्णिया की घटना

बिहार के पूर्णिया में 50 साल के अधेड़ गुलाम हैदर उर्फ रमजान नाम के व्यक्ति ने 14 साल की नाबालिग को महीनों तक डरा-धमका कर अपनी हवस का शिकार बनाया। नाबालिग जब गर्भवती हो गई, तो उसका परिवार पीड़ित परिवार पर गर्भपात का दबाव बनाने लगा। जब परिवार नहीं माना, तो गर्भपात कराने के लिए पीड़ित बच्ची और उसके पिता का ही अपहरण कर लिया। हालाँकि पुलिस ने 23 अगस्त को पीड़ित बच्ची और उसके पिता को बरामद कर लिया है।

ये मामला मंगलवार (20 अप्रैल 2024) को पूर्णिया के बायसी थाने में दर्ज हुआ था। इसमें पीड़िता की माँ ने पुलिस को बताया कि आरोपित गुलाम हैदर उर्फ रमजान अप्रैल महीने से ही उनकी बच्ची का यौन शोषण कर रहा था। डर के मारे बच्ची ने किसी को कुछ नहीं बताया। जब बच्ची के शरीर में बदलाव दिखने लगे तो पता चला कि वो गर्भवती है। इसकी शिकायत पीड़ित परिवार ने आरोपित के बड़े भाई अब्दुल कैयूम से की, लेकिन उन पर दबाव बनाया जाने लगा।

पीड़ित बच्ची की माँ ने शिकायत में बताया है कि आरोपित पक्ष बच्ची के गर्भपात का दबाव बना रहा था, ताकी मामले को दबा दिया जाए। यही नहीं, परिवार को बच्ची की शादी में मदद का लालच भी दिया गया, लेकिन जब पीड़ित परिवार ने इनकार कर दिया, तो नाबालिग बच्ची और उसके पिता का अपहरण कर लिया गया। अपने पति और बेटी के अपहरण के बाद वो बायसी थाने में मदद की फरियाद लेकर पहुँची है।

इस मामले में ऑपइंडिया ने बायसी पुलिस से संपर्क किया। पुलिस ने बताया है कि शुक्रवार (23 अगस्त 2024) को पीड़ित बच्ची और उसके पिता को बरामद कर लिया गया है। उनका बयान दर्ज कराया जा रहा है। बयान दर्ज होने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। बायसी पुलिस ने कहा कि अभी कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। पीड़ित बच्ची का बयान दर्ज होने के बाद समुचित वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।

दारू घोटाले के फैसले अरविंद केजरीवाल के आदेश पर ही, जमानत मिला तो मिटा सकते हैं सबूत: सुप्रीम कोर्ट में CBI, दिल्ली CM की याचिका पर अब 5 सितंबर को सुनवाई

केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने शुक्रवार (23 अगस्त 2024) को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अगर अरविंद केजरीवाल को अंतरिम जमानत पर रिहा किया गया तो वे सबूतों से छेड़छाड़ कर सकते हैं। जाँच एजेंसी ने यह भी कहा कि वे दिल्ली शराब घोटाले से संबंधित मामले की चल रही जाँच को भी बाधित कर सकते हैं। CBI ने कहा कि दिल्ली आबकारी नीति के सारे फैसले सीएम केजरीवाल के आदेश पर लिए गए थे।

सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश उज्जल भुइयाँ की पीठ के समक्ष हलफनामा दायर करके यह बात कही है। सीबीआई का यह हलफनामा सीएम केजरीवाल की उस याचिका के जवाब में है, जिसमें सीबीआई द्वारा उनकी गिरफ्तारी को रद्द करने और उन्हें अंतरिम जमानत पर रिहा करने के लिए दायर किया गया है। इसके बाद पीठ ने 5 सितंबर तक के लिए सुनवाई स्थगित कर दी है।

सीबीआई ने हलफनामे में कहा, “एक प्रमुख राजनेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री होने के नाते याचिकाकर्ता बहुत प्रभावशाली है और वह हिरासत में पूछताछ के दौरान अपने सामने पहले से मौजूद गवाहों एवं सबूतों तथा संभावित गवाहों को भी प्रभावित कर सकता है। वह आगे एकत्र किए जाने वाले सबूतों के साथ भी छेड़छाड़ कर सकता है और चल रही जाँच में बाधा डाल सकता है।”

इसमें आगे कहा गया है, “याचिकाकर्ता के पास आबकारी सहित कोई भी मंत्री पद नहीं है। हालाँकि, समय के साथ यह बात सामने आई कि नई आबकारी नीति के बनाने में सभी महत्वपूर्ण निर्णय याचिकाकर्ता (सीएम अरविंद केजरीवाल) के इशारे पर दिल्ली के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री एवं आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया द्वारा लिए गए थे।”

सीबीआई द्वारा दायर हलफनामे में आगे कहा गया है कि दिल्ली आबकारी नीति की आड़ में किए गए शराब घोटाले में सह-आरोपियों के हार्ड ड्राइव और मोबाइल फोन से डेटा हासिल किए गए हैं। उन डेटा से संबंधित लेन-देन और नीतिगत निर्णयों में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के संबंध होने की पुष्टि हुई है। केजरीवाल ने जानबूझकर आबकारी नीति 2021-22 में हेरफेर किया।

एजेंसी ने आगे कहा, “याचिकाकर्ता माननीय न्यायालय के समक्ष मामले को राजनीतिक रूप से सनसनीखेज बनाने का प्रयास कर रहा है, जबकि विभिन्न न्यायालयों द्वारा बार-बार आदेश पारित किए गए हैं। वे प्रथम दृष्टया अपराधों के होने से संतुष्ट हैं, जिसके लिए पहले ही संज्ञान लिया जा चुका है। इस तरह के अनुचित कथन खारिज किए जाने योग्य हैं।”

दिल्ली हाई कोर्ट ने 5 अगस्त 2024 को इस संबंध में अरविंद केजरीवाल की याचिकाओं को खारिज कर दिया था और उन्हें जमानत के लिए निचली अदालत में जाने को कहा था। इसके बाद सीएम केजरीवाल ने तत्काल सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने 14 अगस्त 2024 को जमानत देने से इनकार करते हुए सीबीआई से जवाब माँगा था।