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सौंदर्य सामग्री पर ₹60000 और ब्रांडेड कपड़ों पर ₹50000 महीना खर्च: महिला ने अलग रह रहे पति से भरण-पोषण में माँगा ₹6 लाख प्रतिमाह, कोर्ट बोला- खुद कमाओ

कर्नाटक में एक महिला ने अलग रह रहे अपने पति से भरण-पोषण के लिए 6 लाख रुपए की माँग की है। हाई कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। अदालत ने कहा कि यदि महिला अपने ऊपर वास्तव में इतना खर्च करना चाहती है तो उसे खुद कमाना चाहिए। अदालत ने कहा कि उसे ना तो अपने बच्चों को पालना है और ना ही उस पर कोई दायित्व है, फिर खर्च के लिए इतने पैसों की माँग सही नहीं है।

इस मामले की सुनवाई कर्नाटक हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति ललिता कन्नेगांती की अदालत ने 21 अगस्त 2024 को की। सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने महिला को अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने को लेकर भी चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि वह इस मामले का उपयोग उन सभी वादियों को कड़ा और स्पष्ट संदेश देने के लिए करेंगी, जो सोचते हैं कि वे कानून का दुरुपयोग कर सकते हैं।

महिला न्यायाधीश ने कहा, “वह खर्च के रूप में 6,16,300 रुपए चाहती है? हर महीने? उसे सिर्फ़ उसके पति की कमाई के आधार पर भरण-पोषण नहीं दिया जाएगा। उसकी आवश्यकताएँ क्या-क्या हैं? पति की कमाई 10 करोड़ रुपए होगी तो क्या कोर्ट उसे भरण-पोषण के रूप में 5 करोड़ रुपए देगा? एक अकेली महिला खुद पर हर महीने इतना खर्च करेगी? अगर वह खर्च करना चाहती है तो वह कमाए।”

दरअसल, अदालत एक महिला द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा थी। याचिका में निचली अदालत द्वारा उसे दिए गए भरण-पोषण भत्ते में वृद्धि की माँग की गई थी। पारिवारिक न्यायालय ने उसे 50,000 रुपए मासिक भरण-पोषण भत्ता दिया था। महिला ने हाई कोर्ट जाकर दावा किया कि उसका मासिक खर्च 6 लाख रुपए से अधिक है। इसलिए उसे यह राशि दी जाए।

महिला के वकील आकाश कनाडे ने कोर्ट में तर्क दिया कि याचिकाकर्ता महिला को पौष्टिक भोजन की आवश्यकता है। उसे बाहर का खाना खाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उसके खाने का खर्च ही हर महीने 40,000 रुपए है। वकील ने कहा कि महिला का अलग रह रहा पति हर दिन अलग-अलग ब्रांडेड कपड़े पहनता है। उसके टी-शर्ट की कीमत 10,000 रुपए है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, महिला के एडवोकेट ने अदालत ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता महिला को पुराने कपड़े एवं ड्रेस पहनने के लिए मजबूर किया गया। इस प्रकार उसे कपड़ों और सामान के लिए 50,000 रुपए हर महीने की जरूरत है। इसके अलावा, उसके चिकित्सा एवं सौंदर्य प्रसाधन के लिए 60,000 रुपए की आवश्यकता है।

इस पर न्यायाधीश कन्नेगांती ने कहा कि न्यायालय कोई बाजार नहीं है, जहाँ मुकदमेबाज मोल-तोल करने आएँ। अदालत ने कहा, “आपका मुवक्किल समझ नहीं रही है, लेकिन आपको उसे समझना चाहिए। यह मोल-तोल करने की जगह नहीं है। आप उसके वास्तविक खर्चों के बारे में अदालत को बताइए। हम आपको एक आखिरी मौका देंगे, अन्यथा इसे हम खारिज कर देंगे।”

वहीं, महिला के पति की ओर से पेश वकील आदिनाथ नारदे ने तर्क दिया कि महिला के बैंक स्टेटमेंट के अनुसार उसके पास शेयरों में 63 लाख रुपए निवेश हैं। हालाँकि, बाद में याचिकाकर्ता महिला के वकील ने कहा कि भरण-पोषण का दावा उसका वास्तविक व्यय नहीं, बल्कि अनुमानित व्यय है। तमाम तर्कों को सुनने के बाद जज ने तर्कसंगत व्यय को न्यायालय के समक्ष पेश करने के लिए कहा है।

अलकायदा से जुड़ा आतंकी मॉड्यूल ध्वस्त, 14 आतंकी धराए: राजस्थान में ट्रेनिंग, झारखंड का डॉक्टर इश्तियाक मास्टरमाइंड

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने झारखंड, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के पुलिस बलों के साथ एक संयुक्त अभियान में अल-कायदा से प्रभावित एक आतंकी मॉड्यूल का पर्दाफाश किया है। इस आतंकी मॉड्यूल का मुखिया झारखंड की राजधानी राँची का डॉ. इश्तियाक है, जिसके नेतृत्व में ये मॉड्यूल देश भर में सार्वजनिक जगहों पर हमलों की तैयारी कर रहा था।

आतंकी हमलों की तैयारी के लिए आतंकियों को ट्रेनिंग भी दी जा रही थी। राजस्थान के भिवाड़ी में ट्रेनिंग ले रहे 6 आतंकियों को गिरफ्तार कर लिया गया है, तो देश के अलग-अलग हिस्सों से 8 अन्य संदिग्धों को भी हिरासत में लिया गया है। देश के अलग-अलग 17 हिस्सों में अब भी छापेमारी की कार्रवाई जारी है।

जानकारी के मुताबिक, अल-कायदा से प्रभावित ये आतंकी मॉड्यूल देश भर में कई आतंकी हमलों की योजना बना रहा था। राजस्थान के भिवाड़ी में हथियार प्रशिक्षण के दौरान छह संदिग्ध आतंकवादियों को गिरफ्तार किया गया, जबकि झारखंड और उत्तर प्रदेश में आठ और संदिग्धों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया। समूह के सदस्यों ने विभिन्न स्थानों पर हथियारों का प्रशिक्षण प्राप्त किया था।

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने खुफिया ऑपरेशन के तहत, राजस्थान के भिवाड़ी में छह संदिग्ध आतंकवादियों को हथियार प्रशिक्षण के दौरान गिरफ्तार किया गया। साथ ही झारखंड और उत्तर प्रदेश से आठ संदिग्धों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है।

दिल्ली पुलिस ने छापेमारी के दौरान हथियार, गोला-बारूद और साहित्य बरामद किया, जो अभी भी जारी है। स्पेशल सेल ने संभावित आतंकवादी गतिविधियों को विफल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण सफलता मिली।

कोलकाता रेप केस में सबूतों से हुई छेड़छाड़, परिजनों को भी किया भ्रमित: CBI ने सुप्रीम कोर्ट को बताया, बंगाल पुलिस पर जज बोले – 30 साल में नहीं देखा ऐसा

कोलकाता के RG कर मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर के रेप और हत्या के संबंध में CBI ने स्टेट्स रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी है। CBI ने कहा है कि जहाँ पीड़िता से रेप हुआ, उस जगह में बदलाव किए गए। CBI ने और भी कई खुलासे मामले में किए हैं। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल पुलिस को लताड़ा है। कोर्ट ने वकील कपिल सिब्बल को भी फटकारा है।

गुरुवार (22 अगस्त, 2024) को सुप्रीम कोर्ट ने RG कर मेडिकल कॉलेज मामले की सुनवाई की है। इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान में लिया है। इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच कर रही है। कोर्ट में सुनवाई के दौरान डॉक्टर, पश्चिम बंगाल और CBI के वकील मौजूद रहे हैं।

CBI की तरफ से सुप्रीम कोर्ट को सोलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि उन्हें जाँच घटना के पाँचवे दिन मिली। CBI ने बताया कि तब तक जहाँ पीड़िता का रेप हुआ, वहाँ काफी बदलाव किए जा चुके थे इसलिए CBI का जाँच शुरू करना मुश्किल हो रहा है। CBI ने यह भी कहा कि मामले में पीड़िता के परिजनों को भ्रमित किया गया। CBI ने इस मामले में RG कर कॉलेज के प्रिंसिपल की भूमिका को लेकर भी जाँच की है।

वहीं मामले की सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल पुलिस की कार्यशैली पर भी सुप्रीम कोर्ट ने प्रश्न उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि यदि पीड़िता का पोस्टमार्टम शाम में हो गया तो उसकी मौत को अप्राकृतिक आखिर उसके बाद रात के 11 बजे कैसे माना गया और इस पर रिपोर्ट दर्ज हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि मामला अप्राकृतिक मौत का नहीं था तो फिर पोस्टमार्टम क्यों हुआ और अगर यह मामला अप्राकृतिक मौत का था तो फिर रिपोर्ट कैसे बाद में दर्ज हुई। मामले में उलटे सीधे जवाब देने पर सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार के वकील कपिल सिब्बल को फटकार भी लगाई और उनसे कहा कि वह समझदारी से बोलें।

सुप्रीम कोर्ट ने पोस्टमार्टम और अप्राकृतिक मौत की रिपोर्ट की रिपोर्ट के बीच समय अंतराल को लेकर काफी गुस्सा जताया। जस्टिस जेबी पारदीवाला ने इस दौरान कहा कि उन्होंने 30 सालों में ऐसा मामला नहीं देखा है। कोर्ट ने बंगाल सरकार से इस बात को लेकर स्पष्टता की माँग की है।

वहीं कोर्ट में सुनवाई के दौरान हंसने को लेकर भी तुषार मेहता ने कपिल सिब्बल को मना किया। मेहता ने कहा कि एक लड़की की नृशंस तरीके से मौत हुई है और सिब्बल हंस रहे हैं। कोर्ट ने मामले की सुनवाई की शुरुआत में देश बहर के डॉक्टरों का पक्ष भी सुना और उन्हें निश्चिंत रहने को कहा।

गौरतलब है कि कोलकाता के RG कर मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाली एक PG मेडिकल छात्रा का शव 9 अगस्त को अर्धनग्न अवस्था मिला था। उसके शरीर पर चोट के निशान थे। पोस्टमार्टम में साफ़ हुआ था कि छात्रा के साथ रेप हुआ है और फिर उसकी नृशंसता से हत्या कर दी गई।

इस मामले में कॉलेज और पुलिस प्रशासन पर शुरुआत में ढिलाई बरतने के के आरोप हैं। मामले में हीलाहवाली से क्षुब्ध होकर इसकी जाँच कलकत्ता हाई कोर्ट ने CBI को सौंप दी थी। इस बीच लगातार छात्र इस मामले में आरोपितों की गिरफ्तारी और न्याय के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। मामले में ममता बनर्जी सरकार पर प्रश्न उठ रहे हैं।

महिला पत्रकारों पर कॉन्ग्रेसी CM के समर्थकों का हमला, बदसलूकी: सरकारी वादों की कर रही थीं तहकीकात, KTR बोले – राज्य में महिलाएँ सुरक्षित नहीं

तेलंगाना में मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के समर्थकों ने उनके ही गाँव में दो महिला पत्रकारों पर बुरी तरह हमला कर दिया। घटना की वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। बताया जा रहा है कि जिस समय हमला हुआ उस समय पत्रकार अपनी ड्यूटी कर रही थीं।

स्थानीय मीडिया साइट पर प्रकाशित खबर के अनुसार, सीएम रेवंत रेड्डी के समर्थकों ने उनके ही गाँव में दो महिला पत्रकारों पर हमला कर दिया। महिला पत्रकारों का नाम विजया रेड्डी और सरिता है। जानकारी के मुताबिक, दोनों पत्रकार गुरुवार सुबह कोडंगल निर्वाचन क्षेत्र में रेवंत रेड्डी के गृह गाँव कोंडा रेड्डीपल्ली गईं थीं। वहाँ वह किसानों से बात कर रही थीं और जानना चाहती थीं कि ऋण माफी का क्या हुआ।

सरिता के अनुसार, इसी दौरान रेवंत के 50 के करीब समर्थक आए और किसानों को बात करने से रोकने लगे। इस दौरान महिला पत्रकारों से बदसलूकी हुई, उनके कैमरे छीन लिए गए। पत्रकारों ने मोबाइल में घटना रिकॉर्ड करना शुरू की तो उन लोगों ने वो फोन भी छीन लिए। उनके साथ मारपीट की गई। इसी तरह विजया के साथ भी हुआ।

बाद में दोनों ने जाकर इस मामले को वांगुर पुलिस थाने में दर्ज कराया। शिकायत में कहा गया कि जिन लोगों ने उनके साथ मारपीट है उनके खिलाफ कार्रवाई होनी ही चाहिए।

बता दें कि इस मुद्दे को राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे केटीआर ने भी उठाया है। उन्होंने सवाल किया है कि आखिर क्यों कॉन्ग्रेस शासन में महिलाएँ सुरक्षित तक नहीं हैं। अगर ऋण माफी का काम अच्छे से हुआ है तो फिर मुख्यमंत्री को दिक्कत क्या है। ड्यूटी करते हुए पत्रकारों पर हमला करना अपराध है। कॉन्ग्रेस के गुर्गों पर फौरन केस दर्ज होना चाहिए और इनकी तुरंत गिरफ्तारी होनी चाहिए। महिला आयोग को भी इसमें तुरंत हस्तक्षेप करने की जरूरत है।

वारसॉ यूनिवर्सिटी की दीवारों पर वेद, जोधपुर में पोलिश चित्रकार की हिन्दू पेंटिंग, जामनगर में अनाथ बच्चों को शरण… सनातन संस्कृति से जुड़ा है भारत-पोलैंड का रिश्ता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पोलैंड के दौरे पर वहाँ की राजधानी वारसॉ पहुँचे। मध्य यूरोप में स्थित इस देश की 72% जनसंख्या ईसाई है। 10वीं सदी के अंत में पोलन जनजाति के शासक मिएश्को प्रथम के ईसाई बन जाने के बाद ये देश कैथोलिक बहुल हो गया। उनके द्वारा स्थापित पिएस्ट राजवंश ने 400 वर्षों तक इस देश में शासन किया, ऐसे में उन्हें पोलैंड का संस्थापक भी कहा जाता है। जीवन के उच्च-स्तर, आर्थिक स्वच्छंदता और अधिक आय की वजह से ये देश समृद्ध है, यहाँ के लोग खुश रहते हैं।

1979 के बाद नरेंद्र मोदी पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो पोलैंड जा रहे है, 45 वर्ष पहले मोरारजी देसाई वारसॉ पहुँचे थे। पीएम मोदी ने राष्ट्रपति एंड्रेज सेबेस्टियन डूडा के साथ मुलाकात की और प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क के साथ द्विपक्षीय बैठक की। साथ ही उन्होंने पोलैंड में भारतीय समाज के साथ भी संवाद किया। आपको ये जान कर आश्चर्य होगा कि पिछले 164 वर्षों से पोलैंड में संस्कृत पढ़ाई जा रही है। भारत के इतिहास, यहाँ की संस्कृति, धर्म और सभ्यता को लेकर वहाँ शोध होते रहे हैं।

एक और जानने वाली बात ये भी है कि पोलैंड में समय के साथ भारतीय दर्शन और सनातन धर्म के मूल्यों का भी समर्थन बढ़ा है, वहाँ के लोग भारत से प्रभावित हैं। क्राकोव स्थित देश के सबसे पुराने जगियेलोनियन विश्वविद्यालय में सन् 1860-62 के दौरान संस्कृत पढ़ाया जाना शुरू हुआ था। प्रोफेसर लियोन मान्कोव्स्की ने यहाँ पहली बार संस्कृत चेयर की स्थापना की। उन्होंने न सिर्फ कानून और दर्शन में डॉक्टरेट की उपाधि पाई थी, बल्कि वो जर्मनी के दूसरे सबसे पुराने लीपज़िग विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्रोफेसर भी थे।

पोलैंड में संस्कृत भाषा का 164 वर्ष पुराना इतिहास

सन् 1893 में पोलैंड के विश्वविद्यालय में संस्कृत चेयर की स्थापना कर वो इसके प्रमुख बने। उनके बाद 1916 में आंद्रेज गाव्रोन्स्की ने इस विभाग को सँभाला। उन्होंने इस दौरान बौद्ध धर्म और रामायण को लेकर शोध-पत्र प्रकाशित किए। 100 से भी अधिक भाषाओं के जानकार आंद्रेज गाव्रोन्स्की ने 1913 से JU में इंडोलॉजी से संबंधित लेक्चर देना शुरू किया था। उन्होंने पोलैंड में पहली बार संस्कृत की किताब लिखी, जो आज तक पढ़ाई जाती है।

संस्कृत और सांस्कृतिक भाषाशास्त्र के चेयर की प्रमुख आगे चल कर हेलेना विलमन-ग्राबोस्का बनीं, जो यूनिवर्सिटी की पहली महिला प्रोफेसरों में से एक थीं। उन्होंने सन् 1928 में ये पद सँभाला। उन्होंने खुद के खर्च से वहाँ भारत से संबंधित पुस्तकालय की स्थापना की और कोर्स के आयाम को बढ़ाया। 1970 के दशक में भाषाविद तादेउज़ पोबोज़्नियाक ने वहाँ हिंदी का कोर्स शुरू करवाया। यूनिवर्सिटी और वारसॉ के ओरिएंटल इंस्टिट्यूट में 1932 में स्थापित इंडोलॉजी डिपार्टमेंट मध्य यूरोप में भारतीय अध्ययन का सबसे बड़ा केंद्र है।

पॉज़्नान स्थित एडम मिकीविक्ज़ विश्वविद्यालय और लोअर सिलेसियन वोइवोडीशिप स्थित व्रोकला विश्वविद्यालय में भी भारतीय भाषाओं, धर्म, संस्कृति और इतिहास की पढ़ाई होती है। 2022 में पोलैंड की एक लाइब्रेरी की दीवारों पर उपनिषदों के वाक्य लिखी हुई तस्वीरें वायरल हुई थी। वारसॉ यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी की दीवार पर भी वैदिक संस्कृत के श्लोक लिखे हुए हैं। पोलैंड और भारत के रिश्ते प्रगाढ़ होने का एक कारण संस्कृत से पोलैंड का पुराना कनेक्शन भी है।

भारत में पोलैंड का चित्रकार

आइए, अब भारत-पोलैंड के शुरुआती इतिहास की भी बात कर लेते हैं जिसे शोधार्थी और लेखक क्रिज़्सटॉफ़ इवानेक ने ‘X’ पर साझा किया है और पीएम मोदी भी इससे प्रभावित हुए। उन्होंने बताया है कि पोलैंड ने कभी UK-फ़्रांस की तरह भारत पर कभी आक्रमण नहीं किया। 18वीं सदी में ‘नेप्चून’ और ‘कोन पोल्स्की’ नामक 2 जहाज व्यापारी के लिए बंगाल की खाड़ी में घुसे, लेकिन फिर पता चला कि ऑस्ट्रेलियाई जहाजियों ने पोलैंड के नाम का इस्तेमाल किया था, ताकि वो ब्रिटिश-डच के एकाधिकार को चुनौती दे सकें।

लेकिन, अंग्रेजों और नीदरलैंड्स ने मिल कर उन्हें रोक दिया। पोलिश चित्रकार स्टीफन नोरब्लिन ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भाग कर भारत में शरण ली। महाराजा उम्मेद सिंह बहादुर के राजमहल में आज भी उनकी बनाई पेंटिंग लगी हुई है, जिसमें उन्होंने भित्ति-चित्र बनाए थे। जर्मनी के आक्रमण के बाद उस दौरान रोमानिया, तुर्की और इराक होकर लगभग 300 पोलिश नागरिक भाग कर भारत आए थे। बॉम्बे में पोलैंड का काउंसलेट था, अधिकतर ने वहाँ शरण ली।

स्टीफन नोरब्लिन के बारे में बता दें कि उनके दादा जीन-पियरे नॉरब्लिन डी ला गौरडाइन लोकप्रिय पेंटर रहे थे और उनकी पत्नी लेना ज़ेलिचोस्का अभिनेत्री थीं। उन्होंने गुजरात के मोरबी में, रामगढ़ में और जोधपुर के उम्मेद सिंह के पास रोजगार पाया और चित्र बनाए। सन्न 1943 में उम्मेद भवन का कार्य पूरा हुआ और इंटीरियर डिजाइन के लिए लंदन से आ रहे जहाज को जर्मनी ने डुबो दिया था। आज वहाँ ता होटल चलता है और स्टीफन नोरब्लिनने जिस कमरे में भित्ति चित्र बनाए उसे विशेष तौर पर प्रचारित किया जाता है।

स्टीफन नोरब्लिन द्वारा उम्मेद भवन में बनाई गई महाभारत की पेंटिंग

युद्ध खत्म होने के बाद दोनों पति-पत्नी अमेरिका में बस गए। हालाँकि, स्टीफन नोरब्लिन ने जहाँ 1952 में आत्महत्या कर ली वहीं 6 वर्ष बाद उनकी पत्नी भी चल बसीं। 1944 में बॉम्बे में जन्मा उनका बेटा एंड्रू अमेरिका में आगे चल कर संगीतकार बना। आपको ये जान कर भी हैरानी होगी कि चंडीगढ़ का ऑरिजिनल मास्टरप्लान भी एक पोलिश आर्किटेक्ट मैसीज नोविकी ने तैयार किया था। वो 1950 में बॉम्बे से न्यूयॉर्क जाते समय एक प्लेन क्रैश में मारे गए थे।

कला को लेकर भी भारत और पोलैंड का रहा जुड़ाव

एक और जिस कनेक्शन के बारे में लेखक क्रिज़्सटॉफ़ इवानेक ने बताया है वो फ़िल्मी है। दिलीप कुमार की एक फिल्म आई थी 1958 में, ‘मधुमती’ नाम की। बिमल रॉय की इस फिल्म में पहली बार पुनर्जन्म को दिखाया गया था। इसका एक गाना है – ‘दिल तड़प-तड़प के कह रहा’, जिसे मुकेश और लता मंगेशकर ने गाया है। ये गाना पोलैंड के एक लोकगीत पर आधारित था। सलिल चौधरी ने इस फिल्म का संगीत बनाया। संगीत बनाए जाने के बाद फिल्म के बोल लिखे गए थे।

इसी तरह एक कहानी पोलैंड के यहूदी मौरिसी फ़्राइडमैन की भी है जो भारत आकर रमन महर्षि और जिड्डु कृष्णमूर्ति के शिष्य बने। उन्होंने हिन्दू धर्म अपना लिया और अवध का संविधान तैयार करने में महात्मा गाँधी की मदद की। जब भारत 17वीं शताब्दी में कपड़ों का हब हुआ करता था तब यहाँ से कपास के बने कपड़े पोलैंड जाते थे। मालवा में कॉटन की खेती सबसे अधिक होती थी, पोलैंड इसका सबसे बड़ा बाजार था। अपने आमिर खान की ‘फना’ फिल्म देखी होगी, उसकी शूटिंग पोलैंड में हुई थी।

हैदराबाद में एक स्टेशनरी कंपनी है Kaybee नाम की, जिसकी स्थापना किरा बानासिन्स्का नामक एक पोलिश महिला ने की थी। ये इक्विपमेंट मनुफैक्टर कंपनी आज तक चल रही है। वो और उनके पति भारतीय नागरिक बन गए थे। इसी तरह पोलैंड में 19वीं सदी में एक महान कवि हुए हैं एडम मिकीविक्ज़ नाम के, जिन्होंने अपने लेखन में हिन्दू धर्म के सिद्धांतों का इस्तेमाल किया है। उन्होंने अपना अधिकतर समय पेरिस में पलायन कर के बिताया था, जहाँ वो पूरी दुनिया में रुचि रखने वाले विद्वानों के संपर्क में आए थे।

पेरिस के कॉलेज में लेक्चरर रहने के दौरान वो वेदों और भगवद्गीता से उद्धरण देते थे। उनकी ‘Pan Tadeusz’ जैसी कविताओं को पढ़ने पर प्रतीत होता है कि इसमें जिन मानवीय कर्तव्यों की बात की गई है वो हिन्दू धर्म से प्रेरित है। खासकर कर्म और धर्म के सिद्धांत के आधार पर उन्होंने काफी लिखा है। उन्होंने यूरोपियन भाषाओं में अनुवाद किए गए प्राचीन भारतीय साहित्यों का अध्ययन किया। यहाँ पोलैंड के एक थिएटर निर्देशक जेरज़ी ग्रोटोव्स्की का जिक्र करना भी बनता है।

उन्होंने कालिदास रचित ‘शकुंतला’ पर थिएटर नाटक तैयार किया। उन्होंने योग को भी महत्व दिया और कहा कि अनुशासन व एकाग्रता के लिए ये ज़रूरी है। इसके लिए वो नटराज का उदाहरण देते थे, जिनका चेहरा एक योगी की तरह एकाग्र है लेकिन जिनके शरीर के अंग एक ख़ास नृत्य की मुद्रा में हैं। वो कथकली नृत्य की भावमुद्राओं से भी काफी प्रभावित थे। 1970 के आसपास उन्होंने भारत में जम कर भ्रमण किया। उनका मानना था कि योग-अध्यात्म को थिएटर और अभिनय के साथ जोड़ा जाना चाहिए।

जाम साहेब ने पोलिश बच्चों को दी शरण

पोलैंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘जाम साहेब’ को भी श्रद्धांजलि देने पहुँचे, जिन्हें वहाँ नायक की तरह पूजा जाता है। सितंबर 1939 में जब पोलैंड में नाज़ी जर्मनी ने कहर बरपाया, तब से ही पोलिश नागरिकों का पलायन शुरू हो गया था। ऐसे में 1000 पोलिश शरणार्थियों ने सोवियत रूस में पलायन किया। हालाँकि, रूस सहित कई देशों ने उन्हें नकार दिया तो अंत में वो बॉम्बे पहुँचे। ब्रिटिश शासकों ने भी उन्हें रखने से नकार दिया, तब भारत का एक राजा मदद के लिए आगे आया।

नवानगर के दिग्विजय सिंहजी ने उन्हें शरण दी। न सिर्फ शरण दी, बल्कि उनके लिए शिक्षा, आवास और सुरक्षित माहौल की भी व्यवस्था की। बालाचडी में इन्हें बसाया गया। अधिकतर बच्चों की उम्र 2-15 वर्ष के बीच थी और वो युद्ध में अनाथ हो गए थे। उन्हें ठीक से भोजन मिले, इसके लिए पोलैंड से रसोइये भी मँगाए गए। बच्चे महाराजा को ‘बापू’ कह कर पुकारते थे और महाराजा उनके लिए उपहार लेकर समय-समय पर उनसे मिलने जाते रहते थे। आज वारसॉ के रॉयल लाज़िएन्की पार्क में उनकी प्रतिमा लगी हुई थी।

आज जो पोलैंड के राष्ट्रपति हैं, उनके परिवार के कई लोगों को भी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत में शरण मिली थी। जब वो भारत के दौरे पर आए थे तो उन्होंने जामनगर जाकर महाराजा के वंशजों से मुलाकात की थी। 2017 के उस दौरे में उन्होंने भारत द्वारा दिए गए मदद के लिए देश के नागरिकों को धन्यवाद दिया था। इन पोलिश बच्चों में से कई को उनके परिवार से धीरे-धीरे मिलाया गया, कुछ लंबे समय तक भारत में रहे। इनमें से कइयों ने भारत में लेकर अपने अनुभव लेखन के जरिए साझा किया।

असम में अब काजी नहीं सरकार करेगी मुस्लिमों के निकाह रजिस्ट्रेशन, हिमंता सरकार लाई बिल: बोले CM – इससे रुकेंगे बाल विवाह

असम में अब मुस्लिम निकाह को काजी नहीं पंजीकृत कर पाएँगे। मुस्लिम निकाह को भी अब सरकारी दफ्तरों में ही पंजीकृत करवाना होगा। असम की हिमंता बिस्वा सरकार इसके लिए एक कानून लेकर आई है। इसे असम की कैबिनेट ने मंजूरी दी है और इसे अब विधानसभा में पेश किया जाएगा।

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इस बिल के विषय में जानकारी भी दी है। इस बिल पर गुरुवार (22 अगस्त, 2024) से शुरू हो रहे असम विधानसभा सत्र में चर्चा होगी। असम CM हिमंता बिस्वा ने बताया, “मुस्लिम निकाहों को पहले काजी रजिस्टर करते थे, अब से सरकार इन्हें रजिस्टर करेगी। पहले के क़ानून में यह भी प्रावधान था कि नाबालिग का भी निकाह पंजीकृत हो जाता था लेकिन अब यह नहीं होगा। हम दो यही प्रावधान ला रहे हैं। हम बाल विवाह की समस्या को खत्म करना चाहते हैं।”

CM हिमंता बिस्वा ने साफ किया है कि इस कानून से मुस्लिमों के निकाह के तौर तरीके में कोई दखल नहीं होगा, केवल काजियों के पंजीकरण का अधिकार खत्म किया गया है। इससे पहले असम सरकार ने पुराना मुस्लिम मैरिज एक्ट खत्म करने का निर्णय लिया था, इसके तहत ही काजियों को मुस्लिमो के निकाह को पंजीकृत करने का अधिकार दिया गया था। असम सरकार इसे खत्म करने के लिए एक बिल लाएगी, इसे भी इसी विधानसभा सत्र में पेश किया जाएगा।

असम की हिमंता बिस्वा सरकार का मुस्लिम निकाहों में काजी के दखल खत्म करने के निर्णय के पीछे असम में बड़ी सँख्या में हुए बाल विवाह हैं। हिमंता बिस्वा सरकार अब राज्य में बाल विवाह को पूरी तरह से रोकना चाहती है। इससे पहले सरकार ने बीते वर्ष बाल विवाह पर कार्रवाई भी की थी। असम सरकार ने 3000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया था।

असम की हिमंता बिस्वा सरकार ने मुस्लिम निकाह सम्बन्धी कानून के साथ ही एक और कानून को मंजूरी दी है। इसके तहत 250 वर्षों से अधिक पुराने स्मारकों के आसपास का 5 किलोमीटर का इलाका संरक्षित किया जाएगा। इस इलाके में जमीन की खरीद-बिक्री पर रोक लगेगी। यहाँ वही लोग जमीन बेच सकेंगे जो तीन पीढ़ियों से रह रहे हैं।

जब ‘मुस्लिमों’ के लिए दीन पहले… तो डॉक्टर उमर एजाज की गिरफ्तारी पर ‘भारत’ क्यों हो बदनाम: समझें कैसे यौन अपराधी के मामले में मीडिया ने हेडलाइन में खेला खेल

लिबरल मीडिया गिरोह का दोहरा चेहरा किसी से छिपा नहीं है। भारत की छवि बिगाड़ने वाली खबरों में भारत का नाम बढ़-चढ़कर हाईलाइट करना इनका पसंदीदा पैटर्न रहा है। इस बार भी उन्होंने कुछ ऐसा ही किया है। अमेरिका में एक भारतीय मूल का मुस्लिम डॉक्टर महिलाओं और बच्चियों की अश्लील वीडियोज रिकॉर्ड करने के आरोप में पकड़ा गया। उसकी बीवी ने खुद इस बात के प्रमाण जाकर पुलिस को दिए। छानबीन में पता चला कि उमर एजाज नाम का डॉक्टर न केवल महिलाओं के अश्लील वीडियोज रिकॉर्ड करता था, बल्कि अचेत अवस्था में सोती महिलाओं के साथ संबंध भी बनाता था।

अब चूँकि ये उमर एजाज मूल रूप से बेंगलुरू का था इसलिए पश्चिमी मीडिया और भारत के लिबरल मीडिया संस्थानों ने हर जगह इसकी पहचान इसके नाम के बजाय भारतीय शब्द से कर दी। अधिकतर हेडलाइन्स में देखा गया कि कैसे ‘भारतीय’ लिखकर ये दिखाया गया कि किसी भारतीय ने जाकर अमेरिका में घृणित कार्य किया है ताकि हर भारतीय शर्मिंदा हो सके।

पश्चिमी मीडिया का उदाहरण लें तो नीचे WION और साउथ मॉर्निंग पोस्ट के उदाहरण साफ तौर पर देखे जा सकते हैं। देख सकते हैं कि डॉक्टर से पहले इंडियान कैसे लिखा गया है।

प्रकाशित हेडलाइन में ‘इंडियन’ शब्द का इस्तेमाल

अब समस्या ये नहीं है कि ये मीडिया संस्थान भारतीय-भारतीय हर जगह लिख रहे हैं। जब उमर भारत से ही अमेरिका गया है तो इसमें उसके नाम के साथ भारतीय लिखने पर कोई समस्या नहीं है, बस आपत्ति है तो मीडिया की मंशा से। क्यों? समझते हैं।

जब कभी भी मुस्लिम व्यक्ति से जुड़ी कोई पॉजिटिव खबर आती है तो मजहब को जानकर उजागर किया जाता है चाहे फिर उसके साथ वहाँ पर भारतीय लिखा जाए या नहीं, लेकिन कोई भी नेगेटिव खबर आते ही सबसे पहले मजहब छिपाने का होता है और भारत का नाम उजागर करने का। अजीब बात ये है कि विदेशी मीडिया ऐसा हर बार नहीं करता। मसलन अगर आरोपित किसी और मुल्क का है तो वो उस देश का नाम भी हेडलाइन में छिपा लेते हैं मगर ‘भारत’ जानकर उसमें लिखते हैं।

ऐसा क्यों किया जाता है ये किसी से छिपा नहीं है।

याद है आपको जब पश्चिम देशों में ग्रूमिंग जिहाद गैंग का खुलासा हुआ था। उस समय भी मीडिया ने ऐसा ही काम किया था। ग्रूमिंग गैंग में शामिल अपराधियों का सबका मजहब एक था, लेकिन उस समय भी उन्हें ‘एशियन ग्रूमिंग गैंग’ और ‘साउथ एशियन गैंग’ जैसे नाम दे दिए गए थे गया।

इस मामले में बहुत चालाकी से ये छिपा लिया गया था कि ये ग्रूमिंग गैंग कैसे सिर्फ गैर मुस्लिम लड़कियों को ही अपना निशाना बनाती थी और इसमें शामिल अपराधी या तो ब्रिटिश पाकिस्तानी मुस्लिम थे या फिर ब्रिटिश बांग्लादेशी मुस्लिम। मगर चूँकि विदेशी मीडिया को ये दोनों मुल्कों को बदनाम करना अपने एजेंडा का हिस्सा नहीं लगा था इसलिए इन्होंने उन्हें एशिन गैंग जैसे नाम दे दिए।

अब इन घटनाओं के ठीक उलट आप याद करके देखिए क्या आपने कभी विदेशी मीडिया में छपी किसी पॉजिटिव स्टोरी में इस तरह मीडिया को भारत का नाम दिखाते देखा है। अगर देश के मुस्लिम बाहर जाकर कुछ देश का नाम रौशन करने लायक कुछ करता है तो वहाँ पर मजहब को तो बताया जाता है लेकिन भारत का नाम लिखने से गुरेज होने लगता है। उस समय उनकी पहचान सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम बताई जाती है और उस देश का नाम लिखा जाता है जहाँ वह वर्तमान में रह रहा हो या कार्यरत हो।

सवाल यही है कि आखिर ऐसे मामलों में ये अप्रोच मीडिया क्यों नहीं दिखाता कि वहाँ भी भारत का नाम लिखे।

ग्रूमिंग गैंग के मामले में पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, मुस्लिम शब्द इस्तेमाल करने में क्या चला जाता या इस मामले में भारतीय मूल का अमेरिकी डॉक्टर लिखने में मीडिया का क्या चला जाता… कुछ नहीं। बस तब इन मीडिया संस्थानों का एजेंडा उलटा पड़ जाता।

सबसे दिलचस्प बात ये है कि लिबरल मीडिया जहाँ ऐसी किसी घटनाओं में आरोपित का मजहब छिपाने से बचते हैं और देश को बदनाम करना चुनते हैं… वहीं दूसरी ओर अगर सामान्य तौर पर देखेंगे तो इस्लामी कट्टरपंथियों की मानसिकता यही होती है कि उनके लिए उनका मजहब पहले होता है बाद में वो उस देश को रखते हैं जहाँ से उनकी जड़े जुड़ी हैं। इस हिसाब से तो फिर चाहे पॉजिटिव खबर हो या नेगेटिव… हर बार इस्तेमाल वही पहचान होनी चाहिए जो उनकी प्राथमिकता है। ऊपर लगाई वीडियो में मौलवी को साफ तौर पर एक मुसलमान को समझाते हुए देखा जा सकता है कि दीन पहले आता है देश बाद में।

मालूम हो कि ऐसा नहीं है कि ये भारत की छवि बिगाड़ने का काम सिर्फ पश्चिमी मीडिया करता है। भारतीय मीडिया इसमें पीछे नहीं है। देख सकते हैं कि कैसे धड़ल्ले से हर जगह सिर्फ इंडियन डॉक्टर लिखा जा रहा है। सोशल मीडिया पर लोग इसका विरोध भी कर रहे हैं हेडलाइन में इंडियन लिखने वालों को अपनी गलती समझ नहीं आ रही। इंडिया टुडे, इकोनॉमिक टाइम्स जैसे बड़े-बड़े संस्थानों ने अपनी खबर की हेडलाइन में इसका प्रयोग किया है। वहीं सबटाइटल आदि में जाकर अपराधी का नाम लिखा है।

24 घंटे में ही सर्वे-सुनवाई सब कर के दे दिया मुस्लिमों में आरक्षण: सुप्रीम कोर्ट में खुलासा, पश्चिम बंगाल की OBC लिस्ट में 65% इस्लामी जातियाँ

पश्चिम बंगाल सरकार ने आवेदन के 24 घंटे के भीतर ही कई मुस्लिम जातियों को OBC आरक्षण दे दिया। आरक्षण देने के लिए की जाने वाली तीन चरण की जाँच भी इसी एक दिन में पूरी हो गई। कुछ मामलों में कोई मुस्लिम जाति आरक्षण माँगे, इससे पहले ही उस जाति का ब्योरा तैयार कर लिया गया।

यह खुलासा पश्चिम बंगाल की ममता सरकार ने स्वयं सुप्रीम कोर्ट में दिए गए एक हलफनामे में किया है। बंगाल सरकार ने दावा किया है कि उसने 77 जातियों को आरक्षण देने में कोई गड़बड़ी नहीं की है। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले इस मामले में सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल से आरक्षण से सम्बन्धित जानकारी को कोर्ट के सामने रखने को कहा था।

पश्चिम बंगाल 24 घंटे में मुस्लिम पा गए आरक्षण

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल के पिछड़ा आयोग ने ऐसे ही एक मामले में खोट्टा मुस्लिम समुदाय को एक ही दिन में आरक्षण देने की सिफारिश कर दी। इस खोट्टा मुस्लिम जाति ने 13 नवम्बर, 2009 को OBC आरक्षण माँगा था। पिछड़ा आयोग ने 24 घंटे के भीतर ही OBC आरक्षण देने की सिफारिश कर दी। नियमानुसार, जब कोई जाति आरक्षण के लिए आवेदन देती है, तो इस संबंध में दो सर्वे और एक बार पिछड़ा आयोग सुनवाई करता है। परन्तु इस मामले में यह सब कार्रवाई 24 घंटे के भीतर पूरी हो गई।

इसी तरह मुस्लिम जमादार समुदाय ने 21 अप्रैल, 2010 को OBC आरक्षण माँगा और उसे इसी दिन आरक्षण मिल गया। इस संबंध में तीन चरणों की प्रक्रिया 24 घंटे की प्रक्रिया पूरी कर ली गई। इसके अलावा मुस्लिमों की जाति गाएन और भाटिया को भी एक दिन के भीतर ही OBC आरक्षण में जोड़ दिया। चुटोर मिस्त्री मुस्लिम समुदाय के लिए पिछड़ा आयोग ने मात्र 4 दिन लिए वहीं 10 से अधिक मुस्लिम जातियों को यही लाभ देने के लिए एक महीना से कम का समय लिया।

प्रक्रिया के उल्लंघन के हैं आरोप

24 घंटे के भीतर आरक्षण देने की इस कदम पर इसलिए प्रश्न उठे हैं क्योंकि यह काफी लम्बी प्रक्रिया होती है। नियमानुसार, जब कोई जाति आरक्षण के लिए आवेदन देती है तो उसे अपनी आबादी, अपनी आबादी वाले क्षेत्र, और अपनी जाति के इतिहास समेत सामाजिक-आर्थिक स्थिति के संबंध में प्रमाण देने पड़ते हैं। इसके बाद पिछड़ा आयोग अपने सदस्यों या फिर राज्य के संस्कृति संस्थान के जरिए इनका एक सर्वे करता है। इसके अलावा एक सर्वे एंथ्रोपोलॉजिस्ट के जरिए भी होता है।

यह दोनों सर्वे पूरे होने के बाद पिछड़ा आयोग इस संबंध में सुनवाई करता है। यदि किसी जाति को आरक्षण दिए जाने के विरोध में कोई दावा प्रस्तुत किया जाता है तो उस पर भी सुनवाई होती है। इसके लिए पहले सार्वजनिक जानकारी भी दी जाती है। इस सर्वे में आरक्षण सम्बन्धी दावे का परीक्षण होता है। इसके बाद यदि आयोग को लगता है कि आवेदक जाति सही में आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़ी है और इसके प्रमाण हैं तो उसे आरक्षण दिए जाने की सिफारिश की जाती है।

हालाँकि कई मुस्लिम जातियों के आरक्षण के आवेदन करने के 24 घंटे के भीतर यह तीनों चरण पिछड़ा आयोग ने पूरे कर लिए और उन्हें आरक्षण देने की सिफारिश की। पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे में दावा किया कि इन तीन चरणों की प्रक्रिया का पालन भी किया गया भले ही आरक्षण 24 घंटे के भीतर ही क्यों ना मिला हो।

मुस्लिम माँगे आरक्षण, उससे पहले ही कर लिया सर्वे

24 घंटे और 4 दिनों के आरक्षण के अलावा कुछ मामलों में मुस्लिम जातियों के आवेदन देने से पहले ही प्रक्रिया पूरी कर ली गई। पश्चिम बंगाल में मुस्लिमों की काजी, कोटल, हजारी, लायेक और खस का सर्वे जून, 2015 में ही पूरा हो गया। इन जातियों ने आरक्षण के लिए आवेदन इसके 1-2 वर्ष के बाद दिया। ऐसे में जब उन्होंने आरक्षण माँगा तो ज्यादा समय नहीं लगा। इन मामलों में भी बंगाल सरकार तीन चरण प्रक्रिया पूरे किए जाने का दावा कोर्ट के सामने किया है।

हाई कोर्ट ने रद्द किया था 77 जातियों का आरक्षण

कलकत्ता हाई कोर्ट ने मई, 2024 में पश्चिम बंगाल में 2010 के बाद जारी हुए 77 जातियों के OBC प्रमाण पत्र रद्द कर दिए थे। इनमें से 75 जातियाँ मुस्लिम थीं। हाई कोर्ट ने यह आरक्षण देने में प्रक्रिया का पालन ना किए जाने की बात कही थी। इन 77 जातियों को OBC आरक्षण दिए जाने पर रोक के खिलाफ ममता बनर्जी सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी। इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड की बेंच कर रही है। ममता सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से हाई कोर्ट का फैसला पलटने को कहा था।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए 5 अगस्त, 2024 को ममता सरकार से इन जातियों को आरक्षण दिए जाने के आधार को लेकर हलफनामा दायर करने को कहा था। इसी के बाद यह हलफनामा दायर हुए जिसमे 24 घंटे में आरक्षण देने की बात सामने आई।

पश्चिम बंगाल के OBC सूची में हिन्दू से अधिक मुस्लिम जातियाँ

पश्चिम बंगाल के पिछड़ा विभाग की वेबसाइट पर दी गई जानकारी दिखाती है कि 1994 में पहली बार वामपंथी सरकार ने किसी मुस्लिम जाति को OBC में शामिल करके आरक्षण दिया था। दिसम्बर 1994 में मुस्लिमों की जोलाह (अंसारी-मोमिन) जाति को OBC में शामिल किया गया था। 1995 तक राज्य में कुल 26 जातियों को OBC आरक्षण का लाभ मिलता था।

धीमे धीमे OBC आरक्षण में हिन्दुओं का हिस्सा घटने लगा। वामपंथी सरकार ने 1996 में 1 और मुस्लिम जाति फ़कीर/सेन को OBC आरक्षण दे दिया। इसके बाद 1997 में 4, 1999 में 2 और मुस्लिम जातियों को OBC का दर्जा दे दिया गया। इसके बाद यह सिलसिला तेजी से चालू हो गया। 2002 में 2 और 2009 में 2 और मुस्लिम जातियों को आरक्षण दिया गया।

2010 में वामपंथी सरकार ने 41 मुस्लिम जातियों को OBC में शामिल कर दिया। जहाँ 1994 में 26 में से 1 OBC जाति मुस्लिम थी, वहीं 2010 आते-आते कुल 108 OBC जातियों में से 53 मुस्लिम हो गईं। 2010 के बाद वामपंथी सरकार पश्चिम बंगाल की सत्ता से बेदखल हो गई और ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस की राज्य में सत्ता बनी।

मुस्लिमों को OBC में शामिल किए जाने के रवैये में फिर भी कोई बदलाव नहीं आया। ममता सरकार ने भी यही नीति जारी रखी। ममता सरकार ने 2011 से लेकर 2013 तक 33 और मुस्लिम जातियों को OBC में शामिल कर दिया। इसके बाद राज्य की OBC सूची में शामिल कुल जातियों की संख्या 143 हो गई, इनमें से 86 मुस्लिम थीं।

यह सिलसिला इसके बाद भी जारी रहा। 2014 से लेकर 2022 तक ममता सरकार ने 36 और जातियों को OBC में शामिल किया। इनमें से 32 मुस्लिम जातियाँ थी। वर्तमान में पश्चिम बंगाल में 179 जातियों को OBC आरक्षण मिलता है, इनमें से 117 जातियाँ मुस्लिम हैं।

दिल्ली मेयर के खिलाफ BJP-कॉन्ग्रेस ही नहीं AAP ने भी किया विरोध प्रदर्शन, अपनी ही पार्टी की पार्षद ने घेरते हुए कहा – जनता हमसे नाराज़, आँख मूँदी हुई हैं शैली ओबेरॉय

दिल्ली के मेयर शैली ओबेरॉय के खिलाफ न सिर्फ भाजपा, बल्कि उनकी अपनी ही पार्टी AAP के पार्षद भी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। भाजपा, कॉन्ग्रेस और AAP के पार्षदों – तीनों दलों ने एक सुर में कहा कि दिल्ली की मेयर उनके द्वारा उठाए जा रहे मुद्दों की तरफ आँख मूँदे हुए हैं। इन पार्षदों का कहना है कि इस कारण उन्हें लोगों के विरोध का सामना करना पड़ता है। भाजपा और कॉन्ग्रेस के अलावा 3 AAP पार्षदों ने मेयर के विरोध में आवाज़ उठाई है। मेयर ने 4 भाजपा पार्षदों को 15 दिन के लिए निलंबित कर दिया है।

बुधवार (21 अगस्त, 2024) को जब MCD की बैठक हुई तो इसमें पार्षदों ने विरोध प्रदर्शन करते हुए पोस्टर लहराया – “मेयर इंसाफ करो, मैं चुप नहीं रहूँगी। मेरी आवाज़ सुनो।” इसके अलावा ‘आतिशी-शैली ओबेरॉय इस्तीफा दो’ वाले पोस्टर भी लहराए गए। AAP के 3 प्रदर्शनकारी पार्षदों में दिलशाद कॉलोनी की बहन प्रीति भी इसमें शामिल थीं। उन्होंने बताया कि वो पिछले 20 वर्षों से कॉर्पोरेशन के साथ जुड़ी हुई हैं, लेकिन इस तरह से प्रशासन चलाया जाना उन्होंने कभी नहीं देखा। इस बैठक में मेयर देरी से भी पहुँचीं।

बता दें कि प्रीति इससे पहले 3 बार बतौर निर्दलीय पार्षद MCD में अपनी कॉलोनी का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। उन्होंने कहा कि पहले हम जन-कल्याण के मुद्दों को हाउस में उठाते थे, लेकिन अब ये एक शादी समारोह की तरह हो गया है जहाँ पार्षद जुटते हैं, गाना गाते हैं, ताली बजाते हैं, खाते-पीते हैं और नारेबाजी कर के निकल जाते हैं लेकिन कोई काम नहीं होता। उन्होंने अपने वार्ड में महिलाओं की सुरक्षा को देखते हुए सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण एवं मरम्मत की माँग की।

उन्होंने बताया कि उनके प्रस्ताव को रद्द कर दिया है। नाराज़ AAP पार्षद ने कहा कि एक तरफ उनकी पार्टी महिलाओं के मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन करती है, वहीं दूसरी तरफ महिलाओं के कल्याण के लिए कुछ करने की बारी आती है तो वो प्रस्ताव को रद्द कर देती है। उन्होंने बताया कि पिछले साल के 75 लाख रुपए की जगह इस वर्ष सिर्फ 18 लाख रुपए के फंड्स आए हैं। मंगलपुरी के AAP पार्षद नरेंद्र कुमार गिरसा ने कहा कि जल-जमाव को लेकर कोई एक्शन नहीं हुआ है, डेंगू के मामले 400 के पार हो गए हैं। मोतीनगर की अलका ढींगरा भी AAP पार्षद हैं, उन्होंने भी मेयर पर आरोप लगाए।

मुंबई में होने वाला था इजरायली फिल्म फेस्टिवल, नसीरुद्दीन शाह जैसों के विरोध के बाद रद्द: 25 वामपंथियों के पत्र के बाद झुका NFDC और NMIC

नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (NFDC) ने मुंबई में प्रस्तावित किए जाने वाले इजरायली फिल्म फेस्टिवल को रद्द कर दिया है। यह आयोजन 21-22 अगस्त, 2024 को होना था। इसे नसीरुद्दीन शाह, रत्ना पाठक शाह और अन्य लिबरल पत्रकारों-एक्टरों की अपील के बाद रद्द किया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह इजरायली फिल्म फेस्टिवल मुंबई स्थित नेशनल म्यूजियम ऑफ़ इंडिया सिनेमा में आयोजित किया जाना था। इसमें इजरायली कलाकारों और फिल्मों से उड़े लोगों को को भी शामिल होना था। इसके अलावा इस फेस्टिवल के दौरान इजरायली फिल्मों की स्क्रीनिंग भी होती।

इजरायली फिल्म फेस्टिवल का आयोजन NFDC और NMIC ही मिल कर कर रहा था। हालाँकि, इस फेस्टिवल के आयोजन से पहले ही सिनेमा की लिबरल-वामपंथी लॉबी ने इसका विरोध चालू कर दिया। उन्होंने इसे इजरायल और हमास की लड़ाई से जोड़ दिया और रद्द करने की माँग की।

देश में ‘डर का माहौल’ की बात करने वाले नसीरुद्दीन शाह और सेट पर सेक्स की बात करने वाली उनकी पत्नी रत्ना पाठक शाह ने इस फिल्म फेस्टिवल को रद्द करने की माँग NFDC से की। नसीरुद्दीन के अलावा डाक्यूमेंट्री बनाने वाले आनंद पटवर्धन, नक्सलियों को बचाने का प्रयास कर चुके तुषार गाँधी और किसान आन्दोलन में फेक न्यूज फ़ैलाने वाली कॉन्ग्रेस परस्त एक्टिविस्ट शबनम हाशमी शामिल हैं।

लगभग 25 वामपंथी-लिबरल विचारधारा रखने वाले पत्रकारों, एक्टरों और लेखकों ने इस संबंध में एक पत्र लिखा है। इस पत्र में दावा किया गया है कि इजरायल गाजा के भीतर 1.8 लाख लोगों को मार चुका है। इस आँकड़े के लिए एक स्टडी का हवाला दिया गया है, जिस पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

इस पत्र में कहा गया है, “NFDC द्वारा यह स्क्रीनिंग से ऐसे समय में आयोजित की जा रही है, जब पूरी दुनिया इजरायल के युद्ध अपराधों, गाजा और पूरे फिलिस्तीन में चल रहे नरसंहार की गवाह बन रही है।” इस पत्र में कहा गया है कि भारत फिलिस्तीन को देश मानता है और इजरायल-हमास के बीच लड़ाई में शांति की बात करता रहा है, ऐसे में यह फिल्म फेस्टिवल रद्द हो।

विरोध के बाद बुधवार (21 अगस्त,2024) को यह सूचना सामने आई कि NFDC ने इजरायली फिल्म फेस्टिवल को रद्द कर दिया है। हालाँकि, NFDC की तरफ से इस सम्बन्ध में कोई आधिकारिक बयान नहीं सामने आया है।