Home Blog Page 782

भारत के ओलंपिक खिलाड़ियों को मिला BCCI का साथ, जय शाह ने किया ₹8.50 करोड़ मदद का ऐलान: पेरिस में पदकों का रिकॉर्ड तोड़ने को तैयार है टीम

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने पेरिस ओलंपिक अभियान के लिए इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन को 8.5 करोड़ रुपए देने का ऐलान किया है। बीसीसीआई के सचिव जय शाह ने अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट से एक पोस्ट साझा करते हुए इस बात की जानकारी दी है।

बीसीसीआई के सचिव जय शाह ने एक्स पोस्ट पर लिखा, “मुझे यह घोषणा करते हुए गर्व हो रहा है कि बीसीसीआई 2024 पेरिस ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले हमारे बेहतरीन एथलीटों का समर्थन करेगा। हम ओलंपिक अभियान के लिए इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन (IOA) को 8.5 करोड़ रुपए दे रहे हैं। हमारे पूरे दल को हमारी शुभकामनाएँ। भारत को गौरवान्वित करें! जय हिंद!”

पेरिस ओलंपिक की शुरुआत में अब सात दिन का समय शेष बचा है। भारत ने आगामी टूर्नामेंट के लिए 117 खिलाड़ियों का दल भेजा है। इसमें सबसे बड़ा दल एथीलट्स के इवेंट्स में हिस्सा लेने वाले 29 खिलाड़ियों का शामिल है, जिसकी अगुवाई टोक्यो ओलंपिक में जेवलिन थ्रो इवेंट में गोल्ड मेडल जीतने वाले नीरज चोपड़ा करेंगे। ओलंपिक के इतिहास में ये भारत का अब तक का दूसरा सबसे बड़ा दल है।

भारत की तरफ से पेरिस ओलंपिक में हिस्सा लेने के लिए रवाना हुए 117 एथलीट्स के दल में 70 पुरुष और 47 महिला खिलाड़ी शामिल हैं। ट्रैक एंड फील्ड इवेंट के बाद शूटिंग के इवेंट्स में भारत के सबसे ज्यादा खिलाड़ियों ने क्वालीफाई किया है जिसमें कुल 21 एथलीट शामिल हैं। वहीं वेटलिफ्टिंग के इवेंट में सिर्फ मीराबाई चानू ने क्वालीफाई किया है जिन्होंने टोक्यो ओलंपिक में सिल्वर मेडल को अपने नाम किया था। एथीलट्स के अलावा 67 कोच और 72 सपोर्ट स्टाफ का दल भी पेरिस ओलंपिक एथलीटों की मदद के लिए गया है।

वामपंथी सरकार ने चलवाई गोली, मारे गए 13 कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता: जानें क्यों ममता बनर्जी मना रहीं ‘शहीद दिवस’, TMC ने हाईजैक किया कॉन्ग्रेस का कार्यक्रम?

ममता बनर्जी की अगुवाई में टीएमसी ने रविवार (21 जुलाई 2024) को शहीद दिवस कार्यक्रम मनाया। कभी शहीद दिवस कार्यक्रम कॉन्ग्रेस मनाती थी, लेकिन ममता बनर्जी ने कॉन्ग्रेस पार्टी से अलग होने के बाद युवा कॉन्ग्रेस के 13 कार्यकर्ताओं की हत्या को अपने नाम के साथ जोड़ लिया और उसका इस्तेमाल कम्युनिष्टों की जड़ काटने में किया। दरअसल, साल 1993 में तब युवा कॉन्ग्रेस की नेता रही ममता बनर्जी की अगुवाई में युवा कॉन्ग्रेसियों का बड़ा प्रदर्शन राइटर्स बिल्डिंग के सामने होना था, लेकिन कोलकाता पुलिस की गोलीबारी में 13 युवा कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं की जान चली गई थी।

क्यों गई थी कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं की जान?

दरअसल, पश्चिम बंगाल में वामदलों के शासन के दौरान राशन कार्ड दिखाने पर वोटिंग की अनुमति मिल जाती थी। लेकिन कॉन्ग्रेस माँग कर रही थी कि वोटिंग के लिए सिर्फ मतदाता पहचान पत्र को ही मान्य किया जाए, राशन कार्ड पर वोटिंग को रोका जाए। उस समय ज्योति बसु पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री थे, उन्होंने कॉन्ग्रेस की माँग को खारिज कर दिया था। वहीं, ममता बनर्जी पूरे जोश में थी। वो साल 1984 के लोकसभा चुनाव में दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को धूल चटा चुकी थी। ऐसे में युवा कॉन्ग्रेस का नेतृत्व करते हुए उनकी अगुवाई में ही ये रैली निकली थी, जिसमें बाद में 13 युवा कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं की जान चली गई थी।

कॉन्ग्रेस अगले साल से हर साल पश्चिम बंगाल में 21 जुलाई को शहीद दिवस के तौर पर मनाती रही, लेकिन साल 1998 में ममता बनर्जी ने कॉन्ग्रेस छोड़कर टीएमसी का गठन किया, तो इस शहीद दिवस को भी कॉन्ग्रेस से छीन लिया। इसके बाद से 21 जुलाई को टीएमसी हर साल बड़े पैमाने पर शहीद दिवस मनाती है, जिसे ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में सीपीआई(एम) के खिलाफ खुद के तने रहने के तौर पर प्रस्तुत करती हैं।

इस साल भी 1 जुलाई को टीएमसी ने कोलकाता के धर्मतला इलाके में एक बड़ी रैली का आयोजन किया। इस रैली में इंडी गठबंधन के उसके साथी पहुँचे। एक तरफ तो इंडी गठबंधन से खुद बाहर हुई ममता बनर्जी इस कार्यक्रम का आयोजन कर रही हैं, वहीं, इंडी बंधन में शामिल कम्युनिष्ट पार्टियों को चिढ़ाते हुए उनके ही सहयोगियों को मंच पर भी बुला रही हैं। ये किस तरह की राजनीति ममता बनर्जी कर रही हैं, शायद उन्हें खुद भी नहीं मालूम, क्योंकि लोकसभा चुनाव के दौरान एक तरफ तो वो खुद को इंडी गठबंधन से अलग भी बताती रही, तो बाहर से इंडी गठबंधन को समर्थन देने का भरोसा भी जताती रही, जबकि खुद पूरे पश्चिम बंगाल में वामदलों और कॉन्ग्रेस के खिलाफ चुनाव भी लड़ती रही, तो यूपी में सपा-कॉन्ग्रेस के गठबंधन में शामिल होकर भदोही लोकसभा सीट पर भी चुनाव लड़ लिया।

खैर, टीएमसी हर साल शहीद दिवस के मौके पर अपने अगले साल के राजनीतिक कदमों का मोटा-मोटा ब्यौरा पेश करती है। इस बार टीएमसी ने अभी से साल 2026 के विधानसभा चुनावों में पार्टी कार्यकर्ताओं को जुट जाने का ऐलान कर दिया है।

‘लोगों की हत्या कर रहे, अपहरण कर रहे’: गोविंदानंद ने अविमुक्तेश्वरानंद के ‘शंकराचार्य’ होने पर उठाए सवाल, कहा – गैर-जमानती वॉरंट के बाद कोर्ट में बोला झूठ

अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ बयानबाजी करने वाले अविमुक्तेश्वरानंद के ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य होने को लेकर संत गोविंदानंद सरस्वती ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने वाराणसी की अदालत का आदेश दिखाते हुए कहा कि अविमुक्तेश्वरानंद को फरार घोषित किया जा चुका है, उनके खिलाफ गैर-जमानती वॉरंट जारी किया गया था। गोविंदानंद सरस्वती ने कहा कि बाद में इन्होंने कोर्ट पहुँच कर चालाकी से छल-कपट से आत्मसमर्पण किया और झूठ कहा कि वो शंकराचार्य हैं, पूरी दुनिया में लोग रो रहे हैं और उन्हें मार्गदर्शन देना है, लेकिन उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है।

गोविंदानंद सरस्वती ने कहा कि अविमुक्तेश्वरानंद इस दौरान मध्य प्रदेश के एक आश्रम समेत कई जगह छिप कर भागते-फिरते रहे। उन्होंने बताया कि वो सुप्रीम कोर्ट में जाकर भी ये सब बोल सकते हैं, उन्हें न्याय चाहिए लेकिन तारीख़ पर तारीख़ बढ़ती जा रही है। उन्होंने कहा कि उधर सुनवाई अटकी पड़ी है, इधर देश में आग लग रही है और नुकसान हो रहा है। गोविंदानंद सरस्वती ने कहा कि देशहित में वो सारे दस्तावेज सार्वजनिक कर रहे हैं।

उन्होंने इस दौरान महाभारत के द्रौपदी के चीरहरण के प्रसंग को याद किया और कहा कि अगर उनकी गलती है तो ईश्वर उन्हें क्षमा करें। गोविंदानंद सरस्वती ने कहा, “अविमुक्तेश्वरानंद लोगों को मार रहे हैं, अपहरण करवा रहे हैं। भगवान श्रीराम की प्रतिष्ठा पर आपत्ति उठाते हैं, संन्यासी बन कर शादियों में जाते हैं। केदारनाथ में 228 किलोग्राम सोना गायब होने को लेकर झूठ बोलते हैं। इन्हें ये तक पता नहीं कि सोना और पीतल क्या होता है, क्योंकि ये डुप्लीकेट हैं।”

गोविंदानंद सरस्वती ने कहा कि अगर वो असली चिट्ठा खोलने को आए तो बहुत समस्या हो जाएगी। उन्होंने कहा कि वो दंडी संन्यासी हैं, उनसे कोई क्या छीन लेगा। उन्होंने कहा कि न्याय और धर्म अलग है। उन्होंने दस्तावेज दिखाते हुए कहा कि जमानत के लिए वकीलों के साथ अविमुक्तेश्वरानंद ने वकीलों से बैठक की, लेकिन 51 में से सिर्फ एक इन्हें ही बेल नहीं मिला। उन्होंने बताया कि पुलिस ने इन्हें पीटा, लेकिन इन्हें पाकिस्तान भेज दिया जाना चाहिए था।

कॉन्टैक्ट लेंस पहना, और अंधी हो गई अभिनेत्री… बीच कार्यक्रम में बंद हो गया दिखाई देना, जाना पड़ा डॉक्टर के पास

अभिनेत्री जैस्मिन भसीन की आँखें क्षतिग्रस्त हो गई हैं। कारण है – कॉन्टैक्ट लेंस। बता दें कि आजकल कॉन्टैक्ट लेंस पहनना आम बात है, कुछ लोग शौक से तो कुछ स्वास्थ्य कारणों से इसे पहनते हैं। ‘बिग बॉस 14’ का हिस्सा रहीं जैस्मिन भसीन ने दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान कॉन्टैक्ट लेंस पहना और कुछ ही पल के बाद उन्हें दिखना बंद हो गया, वो अंधी हो गईं। उनकी आँखें ज़ख़्मी हो गईं। इसका दुष्प्रभाव ऐसा पड़ा कि उनके आँखों का कॉर्निया (सुरक्षात्मक परत) ही क्षतिग्रस्त हो गया।

ये घटना बुधवार (17 जुलाई, 2024) की है। लेंस पहनने के तुरंत बाद ही उन्हें समझ आ गया था कि कुछ गड़बड़ है, क्योंकि उनकी आँखों में दर्द होने लगा था। फिर उन्हें दिखाई देना बंद हो गया। स्थिति इतनी ख़राब हो गई कि उन्हें पूरे कार्यक्रम के दौरान काला चश्मा पहनना पड़ा। बिना सहारे के वो चल भी नहीं पाती थीं। वीडियो में देखा जा सकता है कि एक युवती उन्हें पकड़ कर मंच पर ले जा रही है और एक शख्स ने उनका हाथ पकड़ के सहारा दिया हुआ है।

कार्यक्रम के तुरंत बाद जैस्मिन भसीन को आँखों के डॉक्टर के पास जाना पड़ा। हालाँकि, उन्होंने जानकारी दी है कि अब उनकी स्थिति में सुधार हो रहा है। अभिनेत्री ने बताया कि कार्यक्रम को लेकर करार के कारण वो तुरंत डॉक्टर के पास नहीं गईं। उनकी टीम ने उनका साथ दिया, क्योंकि उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। डॉक्टर ने उनकी आँखों के ऊपर बैंडेज लगाया। उन्हें रिकवर होने में 5 दिन लग सकते हैं। उन्होंने बताया कि अब भी उन्हें कुछ दिखाई नहीं दे रहा है, दर्द के कारण वो सो भी नहीं पाती हैं।

हालाँकि, जैस्मिन भसीन का कहना है कि उन्हें कोई काम नहीं रोकना पड़ा है। दिल्ली के बाद मुंबई में उनका इलाज चला। बता दें कि 2011 में तमिल फिल्म ‘वानम’ से डेब्यू करने वाली जैस्मिन भसीन ने टीवी सीरियल ‘टशन-ए-इश्का’ और ‘दिल से दिल तक’ के जरिए नाम बनाया है। साथ ही वो ‘खतरों के खिलाड़ी 9’ और ‘फियर फैक्टर: खतरों के खिलाड़ी – मेड इन इंडिया’ जैसे रियलिटी शो में भी काम किया है। वो एक सिख परिवार से आती हैं और उनकी शिक्षा कोटा में हुई है।

हैदराबाद में हिन्दुओं का नरसंहार करने वाले, बांग्लादेश में क्या? समझिए PM शेख हसीना ने दंगाइयों को क्यों कहा ‘रजाकार’, आरक्षण विरोधी हिंसा से कनेक्शन

बांग्लादेश में आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों से जुड़ी हिंसा की वजह से अब तक 130 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। पूरा देश थम गया है। हालाँकि बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने उस 30 प्रतिशत के आरक्षण पर रोक लगा दी है, जो सरकारी नौकरियों में बांग्लादेश की आजादी के लिए लड़ने वाले लोगों के परिजनों, आश्रितों को दिया जाता था। अब बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने देश में 7 प्रतिशत का आरक्षण लागू किया है और 93 प्रतिशत नौकरियों को अनारक्षित कर दिया है। ये उन प्रदर्शनकारी युवाओं (राजनीतिक कार्यकर्ताओं की नहीं) की जीत है, जिनकी प्रधानमंत्री शेख हसीना ने ‘रजाकारों’ से तुलना कर दी थी।

शेख हसीना के ‘रजाकार’ वाले बयान के बाद प्रदर्शनों में शामिल भीड़ ने अराजकता का प्रदर्शन किया। भीड़ ने नारे लगाए, “तुई के? अमी के? रजाकार, रजाकार! के बोलेचे? के बोलेचे? सैराचार- सैराचार ।” इस बंगाली लाइन का मतलब है, “तुम कौन? मैं कौन? रजाकार, रजाकार! कौन कहता है? कौन कहता है? तानाशाह, तानाशाह!” इस नारे में प्रदर्शनकारी युवाओं की भीड़ ने शेख हसीना को ‘तानाशाह’ करार दिया और खुद को ‘रजाकार’ कहने पर तीखा व्यंग किया।

भारत में रजाकार किन्हें कहा जाता था, ये तो आप जानते ही होंगे? अगर नहीं-तो हैदराबाद के भारत में विलय के ऐतिहासिक पन्ने को खोल लें। हैदाराबाद के निजामी रियासत में हिंदुओं पर अत्याचार करने वाली मिलिशिया रजाकार कहलाती थी, जिसने हैदराबाद की रियासत को भारत में मिलाने के लिए चलाए गए ऑपरेशन पोलो के खिलाफ हथियार भी उठाए थे। ठीक उसी तरह 1971 तक पूर्वी पाकिस्तान यानी अब के बांग्लादेश में ‘रजाकार’ एक प्राइवेट मिलिशिया की तरह थी, इसके लिए पाकिस्तानी सेना बकायदा कानून यानी बिल लेकन भी आई थी। इसी तरह से 2 अन्य कट्टरपंथी मुस्लिमों के मिलिशिया अल-बद्र और अल-शम्स भी थे। ये संगठन पूर्वी पाकिस्तान पर पश्चिमी पाकिस्तान के कब्जे को बनाए रखना चाहते थे और बंग भाषियों की आजादी की लड़ाई को कुचलने में पाकिस्तानी सेना का साथ दे रहे थे।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश यानी तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में करीब 50 हजार रजाकार थे। जो बांग्लाभाषियों को सताने में न सिर्फ पाकिस्तानी सेना की मदद करते थे, बल्कि हिंदुओं का सफाया करने में, बांग्ला भाषियों की घरों की तलाशी लेने में, महिलाओं का बलात्कार करने में, बांग्लादेश के सेनानियों की जासूसी करने में सबसे आगे रहते थे। वैसे, रजाकारों को बनाने में पाकिस्तानी सेना का हाथ था, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है स्वयंसेवक होना। वो स्वयंसेवक जो पाकिस्तानी सेना के सहयोगी थे। बांग्लादेश में आज भी रजाकार शब्द का इस्तेमाल बंग विरोधियों और पाकिस्तान समर्थकों के लिए किया जाता है।

रजाकारों ने अल-बद्र और अल-शम्स जैसे कट्टरपंथी धार्मिक मिलिशिया के साथ मिलकर उन नागरिकों, छात्रों, बुद्धिजीवियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया, जिन्होंने पाकिस्तान के कब्जे का विरोध किया था। रजाकारों की मदद से पाकिस्तानी सेना ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के सिपाहियों और उनके परिवार पर जो जुल्म ढाया, उसकी वजह से 1970-71 में 3-30 लाख बांग्लाभाषियों की मौत हुई, करीब 4 लाख महिलाओं का पाकिस्तानी सेना और रजाकारों ने बलात्कार किया, जिसमें करीब 1.95 महिलाएँ गर्भवती भी हुई। इनके अत्याचारों की वजह से 60 लाख से अधिक बांग्ला भाषी लोग भारत में आश्रय लेने को मजबूर हुए और भारत को मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा। जिसके परिणाम स्वरूप बांग्लादेश नाम का नया देश अस्तित्व में आया।

बांग्लादेश की आजादी के लिए बांग्लादेश के आजादी के दीवानों ने जमकर खून बहाए। बाद में जब देश को आजादी मिली, तो आजादी के नायकों का खूब सम्मान हुआ। उन्हें तमाम तरह की सुविधाएँ देने की कोशिश की गई। इसी क्रम में उनके परिजनों, आश्रितों को सरकारी नौकरियों में 30 प्रतिशत का आरक्षण भी दिया गया।

शेख मुजीबुर्रहमान बांग्लादेश के राष्ट्रपति बनें। बांग्लादेश की बड़ी जनसंख्या जो पश्चिमी पाकिस्तान की समर्थक थी, उसका दमन भी हुआ। देश से कट्टरपंथी तत्वों को हटाया गया। वो भाग कर पाकिस्तान चले गए, लेकिन जमात-ए-इस्लामी जैसे पाकिस्तान परस्त कट्टरपंथी, रजाकार, अल बद्र, अल शम्स से जुड़े सारे आताताई पाकिस्तान नहीं जा पाए। वो वहीं रह गए। शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या कर दी गई। सेकुलर सरकार का पतन कर दिया गया।

बांग्लादेश में तानाशाही आई। पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के शौहर जियाउर रहमान देश के राष्ट्रपति बन बैठे। जियाउर रहमान मुक्ति वाहिनी की कमान संभालने वालों में से थे। चूँकि वो पैदा भी हुए थे, तो पश्चिमी पाकिस्तान के एबटाबाद में ही, ऐसे में सत्ता की लालच में वो धीरे-धीरे धार्मिक कट्टरपंथ की ओर झुक गए और फिर देश विरोधी कट्टरपंथी तत्व धीरे-धीरे बांग्लादेश में समाहित हो गए। एक समय बाद देश में तानाशादी का दौर समाप्त हुआ, तो बांग्लादेश की राजनीति भी 2 धड़ों में बँट गई।

हैरानी की बात ये है कि बांग्लादेश की आजादी के 53 साल हो चुके हैं। बीच के देढ़ दशक बांग्लादेश में तानाशाही रही, फिर लोकतंत्र लौटा। लेकिन देश की अगुवाई सिर्फ 2 महिलाओं ने की। पहली- खालिदा जिया, जो जियाउर रहमान की विधवा हैं। तो दूसरी हैं मौजूदा प्रधानमंत्री शेख हसीना- शेख हसीना बांग्लादेश के निर्माता शेख मुजीबुर्रहमान की बेटी हैं। पहली की पार्टी है बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएमपी और दूसरे की पार्टी है आवामी लीग।

खैर, हम रजाकारों के बारे में बता रहे थे। पश्चिमी पाकिस्तान में पैदा हुए जियाउर रहमान ने जब देश की कमान संभाली, तो बांग्लादेश में रह गए ‘बिहारी, उर्दू भाषी और कट्टरपंथी तत्वों, जो पहले पश्चिम पाकिस्तान के साथ थे’ बांग्ला विरोधी खेमे के लोग जिया के साथ आ गए। आज भी वो खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी को ही सपोर्ट करते हैं। ऐसे में शेख मुजीब के जमाने से ही बांग्लादेश में लंबे समय तक बांग्लाभाषियों की पहली पसंद की पार्टी आवामी लीग ही रही। उसी ने देश की आजादी के लिए लड़ने वालों के लिए कोटा तय किया था, जिसमें समय-समय पर बदलाव लाया गया।

साल 1998 तक ये सुविधा सिर्फ आंदोलन में हिस्सा लेने वालों को मिलती थी, बाद में ऐसे कैंडिडेट न मिलने की वजह से उनके परिजनों को ये कोटा दे दिया गया। और अब चूँकि 2006 से शेख हसीना ही प्रधानमंत्री हैं और उनकी पार्टी आवामी लीग ही बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई की सबसे बड़ी हिस्सेदार थी, ऐसे में आरोप लगाए जाने लगे कि इस खास कोटा का इस्तेमाल शेख हसीना की पार्टी से जुड़े लोग ही करते हैं। ऐसे में इस कोटा का विरोध बढ़ने लगा। खालिदा जिया की पार्टी लंबे समय से सत्ता से बाहर है। उसे भी मुद्दा चाहिए था। लेकिन 2006 के बाद से ही सत्ता से बाहर रही बीएनपी ने अगले चुनाव में हार के बाद से चुनावों का बहिष्कार करना शुरू कर दिया। देश में सिविल अनरेस्ट की हालत पैदा कर दी गई। बीते चुनाव में भी उस पार्टी ने चुनाव का बहिष्कार किया और बीते 18 साल से पार्टी सत्ता से बाहर है।

इस बीच, बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई लड़ने वालों के परिजनों को मिलने वाली सुविधाओं खासकर का विरोध शुरू हुआ। इस आरक्षण पर साल 2018 में रोक लगा दी गई, लेकिन हाल ही में एक कोर्ट ने इस आरक्षण को फिर से शुरू करने की राह खोल दी थी। इसके बाद पूरे बांग्लादेश में उबाल आ गया। तिस पर शेख हसीना का “रजाकार” बयान आग में घी का काम कर गया। जगह-जगह प्रदर्शन होने लगे, यूनिवर्सिटी बंद कर दी गई। सेना फ्लैग मार्च करने लगी। उपद्रव को दबाने के लिए गोलीबारी भी हुई। अब तक बांग्लादेश में इस हिंसा की वजह से 130 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। सैकड़ों लोग घायल हैं, तो 2000 से अधिक लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं।

हसीना ने क्यों कहा रजाकार?

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना लंबे समय से सत्ता में हैं। जाहिर तौर पर देश में असंतोष बढ़ रहा था। विपक्षी किसी भी तरह उन्हें सत्ता से हटाने के लिए व्याकुल हो रहे थे। उनके पास ‘जवानी’ की ताकत यानी नौजवानों के प्रदर्शन की ताकत आई। ठीक उसी तरह से, जैसे 1971 में नौजवानों ने मुक्ति बाहिनी बनाकर पाकिस्तान को भारत की मदद से घुटने टेकने पर मजबूत कर दिया था। इस बार ये ताकत विपक्ष के पास आई, जिसमें रजाकार हों या अन्य कट्टरपंथी ताकत, जो पहले से ही उसमें समाहित थे। उन्हें चोट पहुँचाने के लिए शेख हसीना ने उनका नाम लिया, तो वो तत्व नौजवानों के विरोध प्रदर्शन की आड़ में खुलकर सामने आ गए। कथित रजाकारों ने पूरे बांग्लादेश को आग के ही हवाले कर दिया है। प्रदर्शनकारियों की शक्ल में सड़कों पर मौजूद कट्टरपंथी भीड़ खुद को ‘रजाकार’ तो कह रही है, सहानुभूति पाने के लिए, लेकिन शेख हसीना को भी ‘तानाशाह’ की संज्ञा दे रही है।

खास बात ये है कि जिस शेख हसीना के पिता के नेतृत्व में आज का बांग्लादेश बना है, जिन्होंने बांग्लादेश के लिए खून बहाया, उनका खून बहाने में पाकिस्तानियों का सहयोग करने वाले रजाकारों के नाम पर आज फिर से देश को लहूलुहान किया जा रहा है। ऐसे में बांग्लादेश की फिजा में कट्टरपंथी ताकतों का प्रभाव कितना ज्यादा हो चुका है, इस बात को आसानी से समझा जा सकता है। क्योंकि जिन रजाकारों ने बांग्ला महिलाओं का दामन रौंदा, जिन्होंने बांग्लादेश की लड़ाई में बंगालियों से घात किया, उन्हें ‘क्रांति’ का प्रतीक बनाना कहीं से भी सही नहीं लगता। ऐसे में इन रजाकारों की आड़ में विदेशी ताकतें और कट्टरपंथी तत्व बांग्लादेश में किस तरह का हस्तक्षेप कर रहे हैं, इसे समझने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

वैसे, अब जबकि बांग्लादेश का सुप्रीम कोर्ट आरक्षण को महज 7 प्रतिशत पर समेट चुका है, तो देर-सबेर देश में फैली हिंसा पर भी रोक लग जाएगी, क्योंकि पढ़ाई लिखाई और नौकरी वाले युवा अपने लक्ष्य में जुट जाएँगे और बाकी उपद्रवी ‘रजाकार’ तत्व सरकार की जड़ में खोदने में जुट जाएँगे। ऐसे में शेख हसीना जरूर चाहेंगी उन ताकतों का पता लगाना, जिन्होंने आरक्षण की आड़ में देश को जलाने का काम किया।

सपा नेता चौधरी अब्दुल नईम के अवैध मैरिज हॉल पर चला ‘बाबा का बुलडोजर’: कब्जा ली थी तालाब की ढाई करोड़ रुपए की जमीन, अखिलेश यादव के विधानसभा क्षेत्र का मामला

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के गृह क्षेत्र मैनपुरी में ‘बाबा का बुलडोजर’ गरजा है। करहल नगर पंचायत के अध्यक्ष चौधरी अब्दुल नईम के मैरिज हॉल को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश के बाद ध्वस्त कर दिया गया। इस मैरिज हॉल को सरकारी तालाब को कब्ज़ा कर बनाया गया था। बता दें कि 2022 में अखिलेश यादव करहल विधानसभा से ही विधायक बने थे, लेकिन कन्नौज से सांसद सांसद चुने जाने के बाद उन्होंने ये सीट छोड़ दी है, यहाँ अब उपचुनाव होगा।

ध्वस्त किए गए ‘आयजा मैरिज हॉल’ का निर्माण चौधरी अब्दुल नईम ने अपनी बीवी फरजाना बेगम के नाम पर करवाया था। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के दौरान PAC की 4 कंपनियाँ और साथ-साथ पूरे जिले की पुलिस फ़ोर्स को लगाया गया था। कई पुलिस इंस्पेक्टर, थाना प्रभारी और SDM इस दौरान मौजूद रहे। रविवार (21 जुलाई, 2024) को सुबह 10 बजे कार्रवाई शुरू की गई। तालाब की जमीन को घेर कर निर्माण कार्य कराया गया था।

इस मामले में संजीव यादव ने शिकायती पत्र सौंपा था, जो नगर पंचायत अध्यक्ष रहे हैं। इसमें आरोप लगाया गया है कि नोटरी स्टाम्प पर चौधरी अब्दुल नईम ने कई लोगों को प्लॉट बेचा है। उन्होंने खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इसकी शिकायत की थी। इसके बाद मुख्यमंत्री कार्यालय की तरफ से जिलाधिकारी को इस मामले की जाँच कर कार्रवाई का निर्देश दिया गया था। पुलिस ने कार्रवाई से पहले मैरिज हॉल की तरफ जाने वाले रास्तों पर पहरा बिठा दिया था।

इस मैरिज हॉल से 300 मीटर की दूरी तक किसी को प्रवेश नहीं दिया जा रहा था। आसपास की छतों पर भी किसी को तमाशबीन बनने की अनुमति नहीं थी। मैरिज होम का मेन गेट, 8 फ़ीट ऊँची बाउंड्री और बाथरूम को ध्वस्त किया गया। इसके बाद ऊपरी कमरों को तोड़ा गया। सामान पहले ही निकलवा दिया गया था। इस मामले में दिसंबर 2022 में ही शिकायत दर्ज कराई गई थी। एक सप्ताह पहले तहसीलदार की तरफ से नोटिस जारी किया गया। 0.283 हेक्टेयर जमीन घेर कर कब्जाया गया था, जो ढाई करोड़ रुपए की है। न्यायालय में सपा नेता अब्दुल नईम की अपील ख़ारिज हो गई थी।

काँवड़ यात्रा मार्ग के दुकानों पर नेम प्लेट लगाने के निर्देश को चुनौती, NGO ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की याचिका: जमीयत का मदनी बोला- यह मौलिक अधिकारों का हनन​

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा काँवड़ यात्रा मार्ग में पड़ने वाले होटल-ढाबों और ठेलों पर नेम प्लेट लगाने की अनिवार्यता वाले निर्देश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) नाम की एनजीओ ने यूपी सरकार के आदेश के खिलाफ याचिका दी है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली है और सोमवार (22 जुलाई) को इस पर सुनवाई करेगा।

सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका शनिवार (20 जुलाई) को सुबह 6:00 बजे ऑनलाइन दाखिल की गई। इसके बाद 20 जुलाई को ही सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने मामले को सुनवाई के लिए लिस्ट कर लिया। इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस एसवीएन भट्टी की बेंच सोमवार 22 जुलाई को सुनवाई करेगी। 

सबसे पहले यह आदेश उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर पुलिस ने सिर्फ जिले के काँवड़ यात्रा मार्गों पर पड़ने वाली दुकानों, भोजनालयों और ठेलों के लिए जारी किया था। बाद मे विरोध होने लगा तो राज्य सरकार ने इसे पूरे प्रदेश में लागू कर दिया। 22 जुलाई से शुरू हो रही काँवड़ यात्रा से पहले वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के दुकानदारों को भी नेमप्लेट लगाने के लिए कहा गया है।

उत्तराखंड के हरिद्वार और मध्य प्रदेश के उज्जैन में भी यह नियम लागू कर दिया गया है। इतना ही नहीं, बिहार के बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर परिसर में स्थित दुकानदारों ने स्वेच्छा से अपनी दुकानों के आगे नाम प्लेट लगा लिया है। उनका कहना है कि इससे उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं है। कई दुकानदारों का कहना है कि वे ऐसा पिछले 20 वर्षों से करते आ रहे हैं।

बता दें कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार के इस निर्देश का विपक्ष दल विरोध कर रहे हैं। वे यूपी सरकार के इस आदेश को सांप्रदायिक बता रहे है और भाजपा पर विभाजनकारी राजनीति करने का आरोप लगा रहे हैं। वहीं, भाजपा का कहना है कि हिंदुओं को भी अपनी आस्था की शुद्धता बनाए रखने का वैसे ही पूरा हक है, जैसे अन्य धर्मों के लोगों को है।

समाजवादी पार्टी से लेकर AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी तक इसका विरोध कर रहे हैं। मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी इसे ‘भेदभावपूर्ण और साम्प्रदायिक’ बताया है। वहीं, भाजपा के नेता इस बिहार सहित अन्य राज्यों में लागू करने की माँग कर रहे हैं। इंदौर से भाजपा विधायक रमेश मेंदोला ने एमपी के सीएम को पत्र लिखकर इसे पूरे राज्य में लागू करने की माँग की है।

उधर, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि इस निर्देश से संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का हनन होता है। अरशद मदनी ने आगे कहा, “देश के सभी नागरिकों को संविधान में इस बात की पूरी आजादी दी गई है कि वे जो चाहें पहनें, जो चाहें खाएँ। उनकी व्यक्तिगत पसंद में कोई बाधा नहीं डालेगा, क्योंकि यह नागरिकों के मौलिक अधिकार के विषय हैं।”

बांग्लादेश में आरक्षण खत्म: सुप्रीम कोर्ट ने कोटा व्यवस्था को रद्द किया, दंगों की आग में जल रहा है मुल्क

इस्लामी मुल्क बांग्लादेश में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के अधिकतर बड़े प्रावधानों को निरस्त कर दिया है। बता दें कि आरक्षण के खिलाफ पड़ोसी देश कई दिनों से भारी हिंसा में जल रहा था। अब तक 100 लोग मारे जा चुके हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में कोटा के अधिकतर प्रावधानों को हटा दिया है। निचली अदालत ने आरक्षण को फिर से बहाल कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को पलट दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का फैसला अवैधानिक था।

हालाँकि, बांग्लादेश की आज़ादी के लिए जिन परिवारों ने लड़ाई लड़ी, उनके लिए सिविल सर्विस की नौकरियों में 5% सीटें आरक्षित रहेंगी। वहीं अन्य नौकरियों में उन्हें 2% कोटा दिया जाएगा। इससे पहले बांग्लादेश की आज़ादी का युद्ध लड़ने वालों के बच्चों के लिए सरकारी नौकरियों में 30% आरक्षण का प्रावधान था। प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार ने 2018 में ही आरक्षण के इस नियम को खत्म कर दिया था। लेकिन, पिछले महीने हाईकोर्ट ने इसे फिर से लागू कर दिया था।

इसके बाद से ही दंगे शुरू हो गए थे और सरकार को कड़ा बल-प्रयोग करना पड़ा। विरोध प्रदर्शन में अधिकतर छात्र ही शामिल थे। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि कोटा व्यवस्था से शेख हसीना के समर्थकों को फायदा था, क्योंकि उनकी पार्टी ‘आवामी लीग’ बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व कर रही थी। प्रदर्शनकारियों ने इसकी जगह मेरिट आधारित व्यवस्था की माँग की थी। शेख हसीना ने भी आरक्षण का बचाव करते हुए कहा था कि पाकिस्तान से लड़ चुके स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान देना चाहिए, भले ही वो किसी भी राजनीतिक पार्टी के हों।

पुलिस ने दंगों को शांत करने के लिए आँसू के गोले, रबर बुलेट्स और स्मोक ग्रेनेड्स तक का सहारा लिया था। नरसिंगडी में तो प्रदर्शनकारी लोहे के रॉड हाथों में लेकर सेन्ट्रल डिस्ट्रिक्ट जेल पहुँच गए और 800 कैदियों को रिहा कर दिया। साथ ही जेल को आग के हवाले कर दिया गया। शेख हसीना को बांग्लादेश में लगातार चौथी बार चुना गया है। पूरे देश में कर्फ्यू लागू कर दिया गया था। फ़ोन और इंटरनेट कनेक्शन काट दिए गए थे। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद प्रदर्शनकारियों का रुख क्या होगा, ये देखना पड़ेगा।

वहीं सुप्रीम कोर्ट के बाहर भी एक सैन्य टैंक को खड़ा देखा गया था। पूरे ढाका में सेना को तैनात कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के आसपास के इलाके में लोगों का घर से निकलना भी मना है।

‘कमाल का है PM मोदी का एनर्जी लेवल, अनुच्छेद-370 हटाने के लिए चाहिए था दम’: बोले ‘दृष्टि’ वाले विकास दिव्यकीर्ति – आर्य समाज और RSS से जुड़ा रहा है परिवार

UPSC की तैयारी कराने वाली जानी-मानी कोचिंग संस्था ‘दृष्टि’ के संस्थापक विकास दिव्यकीर्ति ने बताया है कि उनका परिवार आर्य समाजी था, साथ ही RSS से भी ठीक-ठाक जुड़ाव था। विकास दिव्यकीर्ति ने कहा कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश में आर्य समाज के नियम-कायदे वही हैं, जो पश्चिम बंगाल में ब्रह्मो समाज का था। उन्होंने कहा कि ये संगठन अंग्रेजी संस्कृति से लड़ रहे हैं, उसके हिसाब से ये हिन्दू धर्म को पुनः परिभाषित कर रहे थे – जैसे जाति व्यवस्था और महिला विरोधी परंपरओं को ख़ारिज किया जाए।

ANI पर स्मिता प्रकाश के साथ पॉडकास्ट में विकास दिव्यकीर्ति ने बताया कि स्वामी दयानन्द सरस्वती गुजरात से आए थे, उनका मूल नाम मूलशंकर तिवारी था लेकिन उनका प्रभाव यहाँ ज़्यादा पड़ा। उन्होंने बताया कि इस बेल्ट में हिन्दू-मुस्लिम की टकराहट थी, इस कारण आर्य समाज और मुस्लिम समाज के बीच संघर्ष शुरू हुआ। आर्य समाज के शुद्धि आंदोलन (घर-वापसी) का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि स्वामी श्रद्धानन्द ने ये आंदोलन चलाया था, इसीलिए इतिहास देखें तो आर्य समाज में एक मुस्लिम विरोधी रुख और मुस्लिम समाज में आर्य समाज विरोधी रुख नज़र आता है।

विकास दिव्यकीर्ति ने कहा कि RSS 1925 में बना लेकिन आर्य समाज 1875 से चल रहा था। उन्होंने कहा कि संघ में अधिकतर महाराष्ट्र का ही नेतृत्व रहा, लेकिन उसे राष्ट्रीय आधार मिला। उन्होंने समझाया कि इस कारण ये संगठन आपस में जुड़ने लगे, इस कार्य आर्य समाजी सामाजिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और राजनीतिक रूप से भाजपा से सम्बद्ध रखता है। उन्होंने बताया कि उनके परिवार में और स्कूल में राम मंदिर के पक्ष में विचार था, वो भी यही विचार रखते थे।

विकास दिव्यकीर्ति ने बताया कि कई मुस्लिम दोस्त उनसे झगड़ा करते थे, क्योंकि उन्हें RSS के पक्ष से बहस करने वाला माना जाता था। उन्होंने बताया कि अगर वो UPSC की तरफ नहीं आते तो वो नेता होते। लोकसभा चुनाव 2024 के संबंध में उन्होंने कहा कि ग्रहणबोध के हिसाब से माहौल बनता है और उत्तर प्रदेश में ‘संविधान बदल देने’ और ‘आरक्षण खत्म करने’ वाले विपक्ष के प्रचार पर लोगों ने भरोसा किया। बकौल विकास दिव्यकीर्ति, लोगों ने ये नहीं समझा कि संविधान बदलने के लिए 400 सीटों की ज़रूरत ही नहीं है, 355 ही चाहिए।

अयोध्या में भाजपा की हार पर उन्होंने कहा कि OBC, दलित और मुस्लिम वहाँ 60% हैं जिनका वोट सपा के दलित उम्मीदवार को मिले। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबंध में विकास दिव्यकीर्ति ने कहा कि उनका एनर्जी लेवल कमाल का है, 75 की उम्र में, हमलोग 50 की उम्र में इतनी एनर्जी में नहीं रहते हैं। विकास दिव्यकीर्ति ने कहा कि तकनीक को लेकर जो खुलापन है, जो इस उम्र में दुर्लभ है, वो युवाओं से बेहतर तकनीक की समझ रखते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि वैश्विक नेताओं के साथ पीएम मोदी के अच्छे संबंध हैं। उन्होंने ये भी कहा कि इंफ्रास्ट्रक्चर में काम हुआ है, अनुच्छेद-370 हटाने जैसे फैसले के लिए बहुत दम चाहिए, ये हर पीएम नहीं कर सकता।

हर दिन 14 घंटे करो काम, कॉन्ग्रेस सरकार ला रही बिल: कर्नाटक में भड़का कर्मचारियों का संघ, पहले थोपा था 75% आरक्षण

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु को भारत की सिलिकन वैली के रूप में जाना जाता रहा है। लेकिन, जब से वहाँ कॉन्ग्रेस पार्टी सत्ता में लौटी है तभी से वहाँ के IT सेक्टर को झटके पर झटके दिए जा रहे हैं। अब कर्नाटक सरकार नया कानून लेकर आ रही है, जिसके तहत IT कर्मचारियों को प्रतिदिन 14 घंटे काम करना होगा। यानी, मुख्यमंत्री सिद्दारमैया की सरकार इसे कानून का रूप देती है तो इंजीनियरों को दफ्तर में अधिक समय गुजारना पड़ेगा, इससे उनका वर्क-लाइफ बैलेंस बिगड़ेगा।

अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए जब कर्नाटक सरकार एक ऐसा बिल लेकर आई थी, जो अगर कानून बन जाता तो मैनेजमेंट की नौकरियों में राज्य के नागरिकों को 50% और नॉन-मैनेजमेंट की नौकरियों में 75% आरक्षण मिलता। इसके बाद IT कंपनियों के संघ NASSCOM ने कहा था कि किसी भी महानगर को आईटी हब बनने के लिए अलग-अलग क्षेत्र की प्रतिभाओं को आकर्षित करना पड़ेगा। इसके बाद आंध्र प्रदेश के मंत्री नारा लोकेशन ने इन कंपनियों को हैदराबाद और विशाखापत्तनम आने का न्योता तक दे दिया था।

जहाँ पहले वाले फैसले से कंपनियों को दिक्कत होती, नए फैसले से कर्मचारियों का जीवन तबाह होगा। कर्नाटक के ‘IT/ITeS Employees Union (KITU)’ ने कॉन्ग्रेस सरकार पर निशाना साधा है। KITU ने कहा कि लेबर डिपार्टमेंट ने इंडस्ट्री के विभिन्न हितधारकों की एक बैठक में प्रस्ताव दिया कि कर्नाटक शॉप्स एन्ड कमर्शियल इस्टैब्लिशमेंट एक्ट में संशोधन किया जाए। इसके लिए विधानसभा में बिल लाने की भी तैयारी है। हालाँकि, कर्नाटक सरकार ने फ़िलहाल इस पर चुप्पी साध रखी है।

मौजूदा नियमों की बात करें तो ओवरटाइम मिला कर एक दिन में किसी कर्मचारी से अधिकतम 10 घंटे काम लिया जा सकता है। यूनियन का कहना है कि नए आदेश के बाद वर्क ऑवर्स अनिश्चित समय के लिए भी बढ़ाया जा सकता है। KITU ने इसे इस काल में वर्किंग क्लास पर सबसे बड़ा हमला करार दिया। संघ ने कहा कि इसके बाद कंपनियाँ 3-शिफ्ट व्यवस्था की जगह 2-शिफ्टव्यवस्था पर व्यवस्था पर आ जाएगी और बड़ी संख्या में कर्मचारियों को नौकरी से बाहर फेंक दिया जाएगा।

उक्त बैठक में लेबर डिपार्टमेंट के मंत्री संतोष S लाड के अलावा IT व बायोटेक्नोलॉजी विभाग के कई अधिकारी भी मौजूद थे। KITU ने कहा कि ये फैसला लागू होता है तो IT सेक्टर में काम करने वालों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ेगा। आँकड़े कहते हैं कि पहले से ही 45% IT कर्मचारी मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं, 55% शारीरिक रूप से दुष्प्रभाव का सामना कर रहे हैं। WHO-ILO का अध्ययन कहता है कि वर्क ऑवर्स बढ़ाने से स्ट्रोक से मौत का खतरा 35% और दिमाग-हृदय रोगों से मौत का खतरा 17% बढ़ जाएगा।

यूनियन ने कहा कि ये बिल ऐसे समय में लाया जा रहा है जब दुनिया मान रही है कि वर्क ऑवर्स बढ़ाने से उत्पादन क्षमता पर गलत असर पड़ता है। कई देशों में ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ का कानून लाया जा रहा है, जिसके तहत नॉन-वर्क ऑवर्स में कर्मचारी खुद को काम से एकदम दूर रख सकेंगे और ईमेल वगैरह की रिप्लाई देने की भी बाध्यता नहीं होगी। पिछले साल इनफ़ोसिस के अध्यक्ष NR नारायणमूर्ति ने 70 घंटे प्रति सप्ताह काम करने की सलाह देकर विवाद पैदा कर दिया था।