दंगाइयों से सख्ती दिखाने के लिए एक वर्ग यूपी पुलिस को बदनाम करने के लिए प्रोपेगेंडा रचने में लगा है। इस बीच रायबरेली से ऐसी तस्वीरें सामने आई है जो बताती है कि आगजनी करने वालों से नरमी नहीं दिखाने वाली यही पुलिस आग में फॅंसे लोगों के लिए जान पर खेल जाती है।
ये पहली बार नहीं था, जब अनुराग कश्यप और उनके जैसे लिबरल किस्म के लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी की छवि को धूमिल करने के लिए ऐसे घटिया प्रयोग किए और उनका पर्दाफाश हुआ। इससे पहले भी कई बार वे कई उदाहरणों के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिटलर से जोड़कर और भारत की वर्तमान स्थिति को जर्मनी के हालातों से जोड़कर दिखाते रहे हैं।
अमेरिका के एक अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थान पीआरसी ने 39 इस्लामिक देशों में एक सर्वेक्षण किया था। उन्होंने मुस्लिमों से पूछा कि क्या वे अपने देश को शरियत कानून के अनुसार चलाना चाहते है? जवाब में अफगानिस्तान के सभी लोगों (99 प्रतिशत), पाकिस्तान के 84 प्रतिशत और बांग्लादेश में 82 प्रतिशत लोगों ने माना कि उनके यहाँ आधिकारिक कानून शरियत ही होना चाहिए।
पंकज ने खुद को गौरी तिवारी का बेटा बता तहसीलदार को झॉंसा देने की कोशिश की। लेकिन, एक पुलिसकर्मी ने कहा- साहब यह भी पत्थरबाजी कर रहा था। इसे मैंने खुद देखा है। इसके बाद कथित पंकज ने मुॅंह खोला तो उसका भेद भी खुल गया।
पत्थलगड़ी हिंसा फैलाने वाले उपद्रवियों के ख़िलाफ़ सैंकड़ों मामले दर्ज हैं, जो चुनाव का मुद्दा भी बनी। कुल 19 मामलों में 172 नामजद आरोपित हैं। भाजपा के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार का एक मुद्दा यह भी रहा। शिबू सोरेन ने कहा अगर उनकी सरकार बनती है तो सारे केस वापस ले लिए जाएँगे।
Zee News के सीनियर प्रोड्यूसर अमित कुमार सिंह ने आज़मी के झूठ का पर्दाफ़ाश फेसबुक पर किया। उन्होंने कहा है कि आज़मी न केवल जामिया के छात्रों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि इस्लाम के नाम पर झूठ भी बोल रहे हैं।
व्याख्याता परीक्षा का मुद्दा राजस्थान में गरमा गया है। छात्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री इसे इगो का मुद्दा बना रहे हैं। गौर करने लायक बात यह है कि ज्यादातर नाराज़ छात्र मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थक हैं।
संबित पात्रा के साथ गौरव वल्लभ के टीवी डिबेट का एक वीडियो सोशल मीडिया में खूब चला था। इससे उत्साहित होकर कॉन्ग्रेस ने गौरव को झारखंड के चुनावी मैदान में उतार दिया। लेकिन, जमशेदपुर पूर्वी सीट पर उनका गणित बुरी तरह गड़बड़ा चुका है।
झारखंड से चुनाव लड़ने वाले दो ही उम्मीदवार पीएचडी हैं। इनमें एक लुइस मरांडी हैं। दुमका में कभी सहायक शिक्षिका रहीं लुइस कैसे बनी झारखंड की 'The Giant Killer'?
रवीश बार-बार यह बात भूल जाते हैं कि लोकतंत्र में एक आम आदमी के वोट की कीमत वही होती है जो उनके जैसे परम ज्ञानियों के वोट की है। शायद यही अभिजात्यता और घमंड उन्हें हर मतदान के बाद यह कहने पर मजबूर कर देता है (भाजपा की जीत की स्थिति में) कि युवाओं को रोजगार से मतलब नहीं।