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मुरब्बा-पटाखा के बाद ‘चिकनकारी’ भी हुआ मुगलों का, 2500 साल पुराने अजंता-चन्द्रकेतुगढ़ को भूले: राजा हर्ष भी कढ़ाई की इस कला के थे शौकीन

480 ईसापूर्व के अजंता की गुफाओं में 'चिकनकारी' जैसी कलाकृति है। 2500 साल पुरानी चन्द्रकेतुगढ़ की एक मूर्ति में ये है। राजा हर्षवर्धन इसके शौक़ीन थे। मुगलों को श्रेय क्यों?

‘ब्रेस्ट टैक्स का विरोध करते हुए महिला ने काट डाले थे अपने दोनों स्तन’: CJI ने कहा: जानें केरल की इस कहानी का सच,...

डीवाई चंद्रचूड़ ने नंगेली की उस कहानी का जिक्र किया जिसके अनुसार, एक दलित महिला ने 'स्तन कर' का विरोध करने के लिए अपने स्तनों को काट दिया। जानें सच।

विभीषण द्वारा स्थापित 1000 स्तंभों वाला श्री रंगनाथस्वामी मंदिर: तुगलक ने 12000 भक्तों का सिर कलम करवा दिया था, रामानुजाचार्य ने यही किया था...

तमिलनाडु में स्थित श्री रंगनाथस्वामी मंदिर वैष्णव संप्रदाय के प्रमुख मंदिरों में से एक है। इसे किसने बनवाया था, इसके बारे में ज्ञात नहीं है।

इतने भयभीत थे अंग्रेज कि 2 बार फाँसी पर लटकाया, नहीं जीते तो धोखा और गद्दारी को बनाया हथियार: 1857 में आक्रांताओं को कई...

महाराणा बख्तावर सिंह की पत्नी रानी दौलत कुँअर भी वीरांगना थीं और उन्होंने अपने पति द्वारा जलाई गई क्रांति की मशाल को आगे बढ़ाते हुए अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी।

त्रिपुरा का उनाकोटी: वो जगह जहाँ 99 लाख 99 हजार 999 मूर्तियाँ, मिल सकता है विश्व हेरिटेज का टैग, कभी था शिवभक्तों की आस्था...

99 लाख 99 हजार 999 मूर्तियों वाले त्रिपुरा के उनाकोटी नाम के स्थान को विश्व हेरिटेज में जोड़ने के लिए भारत सरकार कर रही प्रयास।

काशी तमिल संगमम: जीवंत परंपराओं को आत्मसात करने की विशेषता ही भारतीय सांस्कृतिक संपूर्णता का आधार

प्रथम तमिल संगम मदुरै में हुआ था जो पाण्ड्य राजाओं की राजधानी थी और उस समय अगस्त्य, शिव, मुरुगवेल आदि विद्वानों ने इसमें हिस्सा लिया था।

रोता हुआ आम का पेड़, आरती के समय मंदिर में देवता को प्रणाम करने वाला ताड़ का वृक्ष… वेदों से प्रेरित था जगदीश चंद्र...

छुईमुई का पौधा हमारे छूते ही प्रतिक्रिया देता है। जगदीश चंद्र बोस ने दिखाया कि अन्य पेड़-पौधों में भी ऐसा होता है, लेकिन नंगी आँखों से नहीं दिखता।

‘मेरे मामा मेरी मातृभूमि से बढ़कर नहीं हो सकते’: जिसने उत्तर-पूर्व की रक्षा के लिए मामा का भी किया वध, जिसके ‘त्रिभुज’ में औरंगजेब...

मुगल आक्रांताओं से उत्तर-पूर्व भारत की पवित्र भूमि की रक्षा करने वाले वीरयोद्धा लाचित बरपुखान का जीवन और व्यक्तित्व शौर्य, साहस, स्वाभिमान, समर्पण और राष्ट्रभक्ति का पर्याय है।

50000 की मुगलिया फौज, पूर्वोत्तर के पानी से गई हार: यूँ ही नहीं NDA का सर्वश्रेष्ठ कैडेट पाता है ‘लाचित बरपुखान’ सम्मान

लाचित बरपुखान ने पूर्वोत्तर की जमीन पर मुगलों की बर्बर विस्तारवादी मंसूबों को दफन कर दिया। उनके पराक्रम में इतना बल था कि उससे टकराने के बाद मुगलों ने कभी पूर्वोत्तर पर काबिज होने का स्वप्न न देखा।

औरंगजेब मर गया पर उस राठौड़ से जीत न पाया, इस्लामी सरदार देते थे टैक्स: मारवाड़ की वह अभेद्य दीवार जिससे टकरा मुगल हुए...

जसवंत सिंह की मौत हो गई। मारवाड़ के नवजात उत्तराधिकारी अजीत सिंह की रक्षा का जिम्मा दुर्गादास राठौड़ ने उठाया। औरंगजेब मर गया, जीत नहीं पाया।

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