यह सही है कि महाराष्ट्र और हरियाणा में बीजेपी की सीटें गिरी है। लेकिन, इसी आधार पर नतीजों का आकलन करना तथ्यों को अपने ही चश्मे से देखना है। इसका एक पक्ष यह भी है कि यह अगले पॉंच साल के लिए भाजपा के लिए ही जनादेश है।
पिछले 10-15 सालों में जनता ने इस बात को बखूबी समझा है कि कॉन्ग्रेस पार्टी में सत्ता-सुख की लालसा रखने वाला केन्द्रीय नेतृत्व यानी गाँधी परिवार पर गाहे-बेगाहे भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहते हैं। आरोप लगने से लेकर इसकी सच्चाई आने तक जनता एक मतदाता के रूप में अपना काम कर चुकी होती है। क्यों, क्योंकि खून-पसीना एक कर टैक्स भरने वाली जनता और करे तो क्या करे?
महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावी नतीजों में कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है। गॉंधी परिवार प्रचार से दूर रहा। राहुल कम बोले। इसका असर दिखना लाजिमी था। सो, भाजपा की सीटें दोनों जगह घट गईं।
जब सुशासन की ही पोल खुल चुकी हो तो उसके बड़बोले मंत्री के दावों पर गौर करना बेमानी है। लेकिन, यह सियासत है। और वो भी बिहार की, जिसके समीकरण दिल्ली से ही तय होने हैं। लिहाजा हर ट्वीट के पीछे का गणित समझना जरूरी हो जाता है।
गुजरात पुलिस और योगी की पुलिस को शक की नज़र से देखने वाले यह भी कह सकते हैं कि सबूत मैन्युफैक्चर्ड है। ऐसे लोगों के लिए राँची के काँके में बिरसा मुंडा के नाम पर एक अस्पताल है। वहाँ अच्छी व्यवस्था है।
सत्ता के परिवर्तन और समय के चक्र से कभी-न-कभी कॉन्ग्रेस, माकपा, हिन्दू कारसेवकों पर गोली चलवाने वाले 'मुल्ला मुलायम' की सपा जैसे लोग वापिस आ ही जाएँगे। उस समय अगर राम मंदिर सरकारी नियंत्रण में रहे तो क्या होगा, ये कभी सोचा है?
इतनी दुर्भावना ले कर ज़िंदा ही क्यों हैं ऐसे लोग? इतनी घृणा ले कर हर दिन कैसे बिता रहे हैं लोग? क्या ये आश्चर्य की बात नहीं है कि आपको समुद्र तट साफ भी चाहिए, और कोई इसे एक जन-अभियान बनाना चाहता है तो आपको दर्द होने लगता है?
जेपी ने अव्यवहारिक राजनीति की, वे ऐसी मसीहाई भूमिका में आ गए थे, जो अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई और अपने ही लोगों के खिलाफ लड़ाई को एक ही तराजू में तौल रहे थे। उन्हें उम्र के उस अंतिम पड़ाव में जरा भी भान नहीं हुआ कि जो लोग उनकी पालकी उठा रहे हैं, उनकी मंशा क्या है?
इसी आन्दोलन से निकले सुशील कुमार मोदी की सत्तर के दशक में पटना के जलजमाव पर अनशन की तस्वीरें नजर आती हैं। अब वो उप मुख्यमंत्री हैं और पटना के जलजमाव से पिछले ही वर्ष की तरह इस वर्ष भी उनका आवास डूबा रहा।
जेएनयू में हजार वोट पाकर विद्यार्थी संघ का वाइस प्रेसिडेंट बनना किसी को यह अधिकार दे देता है कि वो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर सके? इनके हिसाब से वो मुट्ठी भर आतंकी कश्मीर घाटी के लाखों लोगों का भविष्य तय करेंगे क्योंकि उनको 'आजादी' चाहिए।