Thursday, November 26, 2020
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मोदी-शाह की जोड़ी की मारी नहीं, कॉन्ग्रेस तो सोनिया-राहुल-प्रियंका की तिकड़ी के बोझ तले दबी है

इन नतीजों के सबक स्पष्ट हैं। कॉन्ग्रेसियों को भले लगता हो कि गॉंधी परिवार जोड़ कर रखने वाला फेविकोल है, पर असल में वे बोझ हैं। जिन्हें ढोने की मजबूरी ही कॉन्ग्रेस के चुनाव दर चुनाव धॅंसने का सबसे बड़ा कारण है।

कॉन्ग्रेसियों के लिए नेहरू-गॉंधी परिवार की चौखट इबादतगाह है। उनका कहा किसी आसमानी किताब जैसा पाक। उनका मानना है कि यह परिवार वह फेविकोल है जो उन्हें जोड़ कर रखता है। इसलिए, परिवार में ही वे भारत की खोज करते हैं। जमीन से कटे-कटे रहते हैं।

पर ये आज का भारत है। टिकटॉक करता। सूचनाओं के सागर में गोते लगाता। सो, जब-जब चुनाव के नतीजे आते हैं कॉन्ग्रेस जमीन में पहले से ज्यादा धॅंस जाती है। उम्मीद थी कि कॉन्ग्रेसी आम चुनाव के नतीजों से सबक लेंगे। लक बाय चॉंस उनके पास मौका भी था। नया नेतृत्व चुनने का। परिवार से पीछा छुड़ाने का। पर वफादार ओल्ड गार्ड ने ऐसा होने न दिया और इसके नतीजे महाराष्ट्र और हरियाणा में लगे हाथ कॉन्ग्रेस को मिल भी गए।

महाराष्ट्र में विधानसभा की 288 तो हरियाणा में 90 सीटें हैं। लेकिन, इन चुनावों में गॉंधी परिवार ने प्रचार से दूरी बना रखी थी। पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गॉंधी और महासचिव प्रियंका गॉंधी ने दोनों राज्यों में एक भी रैली नहीं की। पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी ने महाराष्ट्र में पॉंच तो हरियाणा में दो रैली की। जबकि स्टार प्रचारकों की लिस्ट में तीनों थे।

पढ़ें: मुक्ति मार्ग पर 2 कदम और… कॉन्ग्रेस वह ‘बैल’ है जिसे अब गॉंधी भी हाँकना नहीं चाहते

दूसरी तरफ भाजपा थी। दोनों राज्यों में पॉंच साल के एंटी इंकबेंसी फैक्टर की काट के लिए नेतृत्व ने पूरा दमखम झोंका। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने महाराष्ट्र और हरियाणा में 50 के करीब रैलियॉं की। विकास के साथ-साथ हर उस मुद्दे को उभारा, जिसके आधार पर वोटरों को गोलबंद किया जा सकता था।

फिर भी महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा की सीटें 2014 के मुकाबले कम हो गई। जाहिर है, गॉंधी परिवार की प्रचार से दूरी कॉन्ग्रेस के लिए काम कर गई और राहुल गॉंधी का कम बोलना भाजपा को नुकसान कर गया। याद करिए आम चुनावों में राहुल और प्रियंका की सक्रियता और कॉन्ग्रेस के प्रदर्शन को। तस्वीर तरह साफ हो जाएगी।सो, इस जनादेश में ऐसा कुछ भी नहीं है जो अप्रत्याशित हो।

कॉन्ग्रेसी परिवार परिक्रमा से तौबा कर चाहें तो अब भी अपनी नियति बदल सकते हैं। घोर विरोधी राम मनोहर ​लोहिया के कहे में अपनी मुक्ति का मार्ग तलाश सकते हैं। समाजवादियों के लिए लोहिया के दो रेडिमेड फॉर्मूले थे। पहला, कॉन्ग्रेस से लड़ने के लिए शैतान से भी हाथ मिलाओ। दूसरा, सुधरो या टूटो। गॉंधी परिवार ने कॉन्ग्रेस की वो औकात रहने नहीं दी कि अब पहले फॉर्मूले की जरूरत पड़े। कॉन्ग्रेसी चाहे तो दूसरे पर अमल कर सकते हैं।

कहते हैं कि आदमी को आगे से और बैल को पीछे से हॉंकते हैं। जीते-जागते ऊर्जावान लोगों के संगठन को गॉंधी परिवार ने पहले तो बैल बनाया। फिर उसे ऐसे बैल में बदल दिया जिसे उसका मालिक भी पीछे से हॉंकने को तैयार नहीं। महाराष्ट्र और हरियाणा में यह दिखा भी। कॉन्ग्रेस मुक्त भारत के सपने को साकार करने की जिस हड़बड़ाहट में गॉंधी परिवार है उसमें कॉन्ग्रेसियों के पास ज्यादा वक्त नहीं है। अब वे जल्दी न सुधरे, न टूटे तो दफन होना ही उनकी नियति है। वैसे भी वे मोदी-शाह की जोड़ी के कम मारे हैं। सोनिया-राहुल-प्रियंका की तिकड़ी का बोझ ही कुछ ज्यादा है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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