Tuesday, April 23, 2024
Homeविचारराजनैतिक मुद्देजेपी जन्मदिन पर: उनकी अव्यवहारिक क्रांति के चेले आज भी प्रयोग के मूड में...

जेपी जन्मदिन पर: उनकी अव्यवहारिक क्रांति के चेले आज भी प्रयोग के मूड में रहते हैं

शरद यादव, रामविलास पासवान, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, जॉर्ज फर्नांडीज और तमाम अन्य नेता जो उस दौर की राजनीति से निकले, वह आज तलक भी प्रयोग के मूड में हैं। तब इस एब को सम्पूर्ण क्रांति कहा जाता था, अब इसे तीसरा मोर्चा, थर्ड फोर्स, वैकल्पिक राजनीति और गैर कॉन्ग्रेस-भाजपा की राजनीति कहा जाता है।

यूँ तो 11 अक्टूबर का मतलब सिर्फ अमिताभ बच्चन ही रह जाता है क्योंकि बीते चार दशक से ज्यादा समय से इस देश में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति रहा होगा जो उनके व्यक्तित्व की जद में न आया हो। और इसलिए आज उनके जन्मदिन पर बहुत कुछ है लिखने को, कोशिश करूँगा कि कुछ नया लिखूँ या फिर जो पहले थोड़ा-बहुत लिखा है, उसी को झाड़-पोंछकर, सजाकर अपनी वाल पर चस्पा कर लूँ, लेकिन आज जय प्रकाश नारायण का भी जन्मदिन है, जिन्हें जेपी और लोकनायक भी कहा जाता है।

चूँकि मेरी रूचि राजनीति में है और राजनीति भी उस भारत की, जो सन 47 के बाद अस्तित्व में आया। बेशक 1947 से लेकर 2017 का ये कालखंड 70 वर्षों को समेटे हुए है, लेकिन इसके बारे में जितना आप जानते हैं, उतना ही अधिक जानने का मन करता है। इस दौर की और इस राजनीति का सबसे खास बात यह है कि इसमें आजादी के लम्बे संघर्ष, उससे उपजे आदर्शवाद और उम्मीदों के एवरेस्ट को दरकिनार कर दिया गया था, और ऐसा प्रतीत होता है मानो कि 15 अगस्त 1947 के नेताओं का 15 अगस्त 1947 से कोई वास्ता ही नहीं है।

आज के समय में हम अक्सर राजनीतिक दलों के कॉन्ग्रेसीकरण की बात करते हैं। कॉन्ग्रेसीकरण अर्थात सत्ता में बैठकर तमाम नियम, कायदे-कानूनों को अपने पक्ष में करके या उन्हें धता बताते हुए अधिकतम लाभ स्वयं के लिए अथवा स्वयं के भाई-भतीजों के लिए सुनिश्चित करना तथापि गाँधी टोपी और नेहरू जैकेट के आधार पर जनता में देशभक्त और आदर्शवादी होने का ढोंग करना।

लेकिन कभी अपने सोचा है कि कॉन्ग्रेस का कॉन्ग्रेसीकरण कैसे हुआ? दरअसल, नेहरू जी प्रधानमंत्री तो सन 47 में बन गए थे लेकिन उन्होंने जनता का सामना पहली बार, प्रथम आम चुनाव 1952 में किया था। यह पाँच साल का एक लम्बा पीरियड था। लोकतंत्र में, वह भी भारत जैसे बहुदलीय लोकतंत्र में एंटी-इनकम्बेंसी एक फैशन भी है और नेहरू जी भी उसकी जद से बचे नहीं। सरदार पटेल रहे नहीं थे, अम्बेडकर नेहरू से अलग हो गए थे और भी तमाम अन्य नेता जो आजादी की लड़ाई में नेहरू के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे, वे भी नेहरू से तमाम मनभेद और मतभेदों के चलते अलग हो गए थे, इस नाते यह चुनाव नेहरू जी के लिए एक कठिन चुनौती था क्योंकि अब वे वन मैन आर्मी रह गए थे।

यह किस्सा क्योंकि बहुत लम्बा खिंच जाएगा और जिक्र मुझे यहाँ जेपी का करना है तो संक्षिप्त में यही कहूँगा कि नेहरू ने सत्ता की आकंठ महत्वकांक्षा के चलते कॉन्ग्रेस का ‘कॉन्ग्रेसीकरण’ किया लेकिन साथ में यह भी कहूँगा कि राजनीति में महत्वकांक्षा रखना कभी भी अनैतिकता की श्रेणी में नहीं आता है।

जेपी की बात करते हैं, क्योंकि आजादी की लड़ाई में पूरा देश एकजुट था। इसलिए इसमें नायकों की कमी नहीं थी। न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि प्रान्तीय और कस्बाई स्तर पर आजादी के संघर्ष से नायक उपजे। इसलिए आजादी के परिप्रेक्ष्य में, मुझे लगता है कि जयप्रकाश नारायण का इतना बड़ा योगदान नहीं था कि उन्हें जेपी और लोकनायक की उपाधि यहाँ से मिल सकती थी और जैसा कि हम जानते हैं उन्हें यह उपाधियाँ आपतकाल के संघर्ष और सम्पूर्ण क्रांति में उनकी भूमिका से मिली।

सम्पूर्ण क्रांति, आपातकाल और जनता शासन भारतीय राजनीति का इतना रोचक दौर है कि लोगों ने कभी इसको निरपेक्ष तरीके से देखने की कोशिश नहीं की है। हम इससे बहुधा सपाट और ब्लैक एंड व्हाईट की तर्ज पर देखते हैं। कॉन्ग्रेसी इसके लिए शर्मिंदा रहते हैं या मौन रहते हैं। वहीं, गैरकॉन्ग्रेसी दल इसे आजादी की दूसरी लड़ाई, लोकतंत्र की हत्या, सत्ता की निरंकुशता और इसके खिलाफ अपने संघर्ष को महानतम और पवित्रतम मानते हैं। यह सभी बातें लम्बे विमर्श का विषय हैं, लेकिन एक बात तय है कि दोनों पक्षों में दूध का धुला कोई नहीं है। विशेषकर जेपी।

जेपी, इंदिरा गाँधी के पिता नेहरू के मित्र थे, दोनों परिवारों के घनिष्ठ सम्बन्ध थे। इंदिरा की माँ कमला नेहरू का जेपी की पत्नी से खूब पत्राचार भी होता था, जिसमें वो अपने जीवन से जुड़े तमाम विषयों पर उनको खुलकर लिखती थीं, आपातकाल के हटने के बाद इंदिरा गाँधी जब बीमार जेपी से मिलने गईं तो ये सारे पत्र उन्होंने इंदिरा को सौंप दिए थे।

लेकिन वह जेपी ही थे, जिन्होंने आपातकाल लगाए जाने की भूमिका का सूत्रपात किया। 1971 में रायबरेली से इंदिरा गाँधी ने एक लाख से ज्यादा मतों से जीत दर्ज की, उनके खिलाफ़ खड़े हुए राज नारायण ने मुकदमा दर्ज कर दिया कि चुनाव में धाँधली हुई है, 1974 में इलाहबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस जगमोहन सिन्हा ने इस केस पर फैसला देते हुए इंदिरा को दोषी करार दिया कि उन्होंने चुनाव में सरकारी वाहन का उपयोग किया और उनके एक निजी सहायक यशपाल जो सरकार के कर्मचारी थे, लेकिन वे चुनाव में इंदिरा गाँधी के साथ ड्यूटी कर रहे थे।

अदालत ने उनका चुनाव रद्द कर दिया और छ: साल तक उनके द्वारा किसी भी सार्वजनिक पद को ग्रहण करने पर रोक लगा दी तथा उन्हें इसके कार्यान्वयन हेतु बीस दिन का समय दिया। इस पर इंग्लैंड के अखबार गार्जियन ने लिखा था कि यह फैसला बिलकुल वैसे ही जैसे ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर किसी प्रधानमंत्री को उसके पद से हटा देना।

इंदिरा गाँधी ने कोर्ट से स्टे ले लिया, लेकिन बीते कुछ वर्षों में पाकिस्तान से युद्ध, पूर्वी पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों, तेल के महँगे आयात से अर्थव्यवस्था पर दबाव बहुत बढ़ गया था, बिहार में छात्र कॉलेजों में चुनाव करवाने को लेकर आन्दोलन कर रहे थे, इसी बीच गुजरात में हुए चुनाव में विपक्षी दलों के गठबंधन ने कॉन्ग्रेस को परास्त कर दिया था, और इस तमाम असंतोष की कमान जेपी ने थाम ली या उनको थमा दी गई। जेपी ने सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान कर दिया जो आदर्शवाद की सोच में पगा हुआ था कि दलीय प्रणाली को भंग करके बहुदलीय सरकार बनाई जाए, जिसमें कोई विपक्ष न हो। इंदिरा गाँधी ने इस बारे में उनसे बात भी की लेकिन उनके इस्तीफे और सम्पूर्ण क्रांति के अमल से कुछ भी नहीं चाहते थे।

कॉन्ग्रेस और इंदिरा का दशकों से विरोध कर रही तमाम राजनैतिक जमातों के लिए यह अवसर एक सुअवसर के रूप में आया, उन्होंने इंदिरा के इस्तीफे के लिए हड़तालें, धरना, आगजनी, हिंसक प्रदर्शन शुरू कर दिए। रेल यूनियनों को रेल के पहिए जाम करने के लिए मना लिया गया, जिसका इंदिरा गाँधी ने सख्ती से दमन किया। जैसा कि होता है नेता भीड़ देखकर भगवान बन जाता है, भीड़ उसे सपेरा बना देती है, जिसे वह अपने इशारों पर नचाना चाहता है, जेपी उम्र के उस पड़ाव पर ऐसा जनसमर्थन पाकर अभिभूत थे, सारे गैर कॉन्ग्रेसी दल उनके पीछे लामबंद हो गए थे, जैसे-जैसे इंदिरा का विरोध हो रहा था, उन्हें सत्ता उतनी ही नजदीक दिख रही थी। इंदिरा से लड़ने के लिए जनता पार्टी का गठन किया गया।

इसी सबके बीच 25 जून की सुबह इंदिरा गाँधी को खुफिया विभाग की रिपोर्ट मिलती है कि रामलीला मैदान में होने वाली रैली में जेपी सेना और पुलिस से इंदिरा सरकार के खिलाफ विद्रोह करने की कह सकते हैं। यह बहुत भयावह स्थति थी और भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसे सोचा ही नहीं जा सकता था, लेकिन इसकी सम्भावना इस बात से बलवती हो रही थी, भारत से अलग हुए पाकिस्तान में यह सब प्रैक्टिस में आ चुका था और पाकिस्तान से अलग हुए बांग्लादेश में वहाँ की सेना द्वारा वहाँ के राष्ट्रपति मुजीबुर्रहमान की उनके घर में उनके परिवार सहित हत्या कर दी गई थी, जिसके बारे में कहा गया कि यह अमेरिकी की सीआईए की शह पर हुआ था।

1971 में अमेरिका के मर्जी के विरुद्ध पाकिस्तान से युद्ध कर इंदिरा ने अमेरिका से भी अदावत मोल ले ली थी, तत्कालीन अमेरिकन प्रेसिडेंट निक्सन ने इंदिरा की हठधर्मिता के लिए न केवल भारत के लिए की जाने वाले तमाम मदद पर रोक लगा दी थी, बल्कि खुलेआम उन्हें ‘ओल्ड बिच’ भी कहा था।

इसके अलावा इंदिरा कॉन्ग्रेस में नेतृत्व किसी और को सौंपने को लेकर भी सहज नहीं थीं, स्वयं उनके राजनैतिक उत्तराधिकारी संजय गाँधी ऐसा नहीं चाहते थे। इसके अलावा यह स्थिति थी जहाँ हम न आगे जा सकते हैं और न ही पीछे और एक ही स्थान पर जड़ हो जाते हैं कि जो होगा सो देखा जाएगा और इंदिरा द्वारा इन हालातों में लिया गया आपातकाल का निर्णय इसी जड़ता के तहत था, जहाँ उनके कुछ अपने हित भी जुड़े हुए थे। वहीं, यह भी सच था कि सत्ता के दरवाजे के बाहर अराजक लोगों की भीड़ लगी थी, जो लंगूरों की तरह सत्ता के कंगूरों पर चढ़ने को बेताब थे। और इंदिरा यह हरगिज भी नहीं होने देना चाहतीं थी।

मैं यह सब में इसलिए कह पा रहा हूँ कि आपातकाल के हवन कुंड से निकले नेताओं की सोच और राजनीति ने जनता पार्टी की सरकार के माध्यम से न केवल इस आन्दोलन को असफल कर दिया बल्कि यह भी दिखा दिया कि इनकी सत्तालोलुपता को लेकर इंदिरा गाँधी के तमाम कयास भी सच ही थे। मोरारजी देसाई, चरण सिंह, जगजीवन राम सरीखे नेता सत्ता के लिए के दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे थे और इस सब में जेपी कहीं नहीं थे। ऐसा लगता है मानो उन्होंने इंदिरा से सत्ता छीन कर एक झुण्ड अथवा गिरोह को चिथड़े-चिथड़े करने के लिए सौंप दी है।

और वही वजह रही कि जनता पार्टी सरकार द्वारा इंदिरा और संजय गाँधी के खिलाफ आपातकाल की ज्यादतियों की जाँच के लिए बनाए गए आयोगों ने कुछ भी ऐसा ठोस सबूत नहीं पाया जिसके बल पर जनता पार्टी सरकार और उसके नेता इंदिरा गाँधी की राजनीति का खात्मा कर सकते, दोनों को क्लीन चिट दी गई बल्कि संजय गाँधी को जिस एक मामले में प्रत्यक्ष दोषी पाया गया, वह एक फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’, जो आपातकाल में इंदिरा गाँधी और संजय गाँधी की भूमिका को केंद्र में रखकर बनाई गई थी, उन्हें सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ला के साथ षडयन्त्र करके इस फिल्म के प्रिंट नष्ट करने का दोषी पाया गया था।

इसके बाद इंदिरा गाँधी ने देश भर के दौरे किए, हर जगह आपातकाल के लिए देश की जनता से माफी माँगी और 1980 महज तीन साल के भीतर फिर से सत्ता में वापसी की। मैं इस समूचे विमर्श में जेपी को इसलिए केंद्र में रख रहा हूँ कि उन्होंने अव्यवहारिक राजनीति की, वे ऐसी मसीहाई भूमिका में आ गए थे, जो अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई और अपने ही लोगों के खिलाफ लड़ाई को एक ही तराजू में तौल रहे थे। उन्हें उम्र के उस अंतिम पड़ाव में जरा भी भान नहीं हुआ कि जो लोग उनकी पालकी उठा रहे हैं, उनकी मंशा क्या है? और मेरे इस कथन का समर्थन जनता युग के बाद से जनता परिवार की राजनीति का चरित्र चित्रण है।

शरद यादव, रामविलास पासवान, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, जॉर्ज फर्नांडीज और तमाम अन्य नेता जो उस दौर की राजनीति से निकले, वह आज तलक भी प्रयोग के मूड में हैं, ये लोग हमेशा सफर में हैं, क्योंकि इनकी कोई मंजिल नहीं है। तब इस एब को सम्पूर्ण क्रांति कहा जाता है, अब इसे तीसरा मोर्चा, थर्ड फोर्स, वैकल्पिक राजनीति और गैर कॉन्ग्रेस-भाजपा की राजनीति कहा जाता है।

अन्ना भी हमारे दौर के हल्के-फुल्के जेपी हैं, जिनमें कुछ फ्लेवर गँधी जी का भी है। पीछे जब यशवंत सिन्हा ने अपनी ही सरकार को आर्थिक मोर्चे पर आईना दिखाया तो कुछ कुम्भकर्णी मोड में पड़े लोग उनमें भी जेपी की छवि देखने लगे और ये विचार अभी जीवित है, नष्ट नहीं हुआ है।

यही वजह है कि अक्सर केसी त्यागी जैसे नेताओं को या फिर जिन्होंने देश में घोषित इमरजेंसी लगाई थी उन्हें अघोषित इमरजेंसी का माहौल नजर आने लगता है। फिर उन्हें कोई क्रांति सूझती है, फिर उनके आँखें कहीं आउटडेटेड पड़े जेपी को तलाशती हैं। लेकिन यहाँ मुझे लगता है कि सरकार का स्ट्राइक रेट और हाल में घटित हुई मिनी क्रांति जिसने अरविन्द केजरीवाल जैसे एक्टिविस्ट को दिल्ली का सीएम बना दिया; अगली किसी भी क्रांति के लिए इतनी आसानी से रास्ता क्लियर नहीं करेंगे।

Special coverage by OpIndia on Ram Mandir in Ayodhya

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

तेजस्वी यादव ने NDA के लिए माँगा वोट! जहाँ से निर्दलीय खड़े हैं पप्पू यादव, वहाँ की रैली का वीडियो वायरल

तेजस्वी यादव ने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा है कि या तो जनता INDI गठबंधन को वोट दे दे, वरना NDA को देदे... इसके अलावा वो किसी और को वोट न दें।

नेहा जैसा न हो MBBS डॉक्टर हर्षा का हश्र: जिसके पिता IAS अधिकारी, उसे दवा बेचने वाले अब्दुर्रहमान ने फँसा लिया… इकलौती बेटी को...

आनन-फानन में वो नोएडा पहुँचे तो हर्षा एक अस्पताल में जली हालत में भर्ती मिलीं। यहाँ पर अब्दुर्रहमान भी मौजूद मिला जिसने हर्षा के जलने के सवाल पर गोलमोल जवाब दिया।

प्रचलित ख़बरें

- विज्ञापन -

हमसे जुड़ें

295,307FansLike
282,677FollowersFollow
417,000SubscribersSubscribe