राजनैतिक मुद्दे

वामपंथियों ने तिरंगे से बना ली दूरी, नेहरू तक सीमित रहे कॉन्ग्रेसी: जिस सरकार ने लोगों को दिए 1.26 करोड़ मकान, उस पर ‘घर...

राष्ट्रीय गौरव के इस पर्व पर इस तरह से विरोध करना किस तरह से सही व तर्कसम्मत है? कॉन्ग्रेस ने भी तिरंगा अभियान को नेहरू तक सीमित कर दिया।

‘दलाल गिरोह’ याद कर रहा 1997, क्योंकि 2014 में लालू यादव की कृपा वाला PM नहीं: सोते गुजराल को जगा कर कहा था –...

जब देश ने आज़ादी के 50 वर्ष पूरे किए थे, तब लालू यादव के कृपापात्र इंद्र कुमार गुजराल PM थे। 90 के दशक के भारत को याद कर रहा गिरोह, लेकिन यहाँ जानिए तब क्या थी देश की स्थिति।

वो हिंदुस्तानी जो अभी भी नहीं हैं आजाद: PoJK के लोग देख रहे आशाभरी नजरों से भारत की ओर, हिंदू-सिखों का यहाँ हुआ था...

विभाजन की विभीषिका को भी भुलाया नहीं जा सकता। स्वतंत्रता-प्राप्ति का मूल्य समझकर और स्वतन्त्रता का मूल्य चुकाकर ही हम अपनी स्वतंत्रता को सुरक्षित और संरक्षित कर सकते हैं।

स्वतंत्रता के हुए 75 साल, फिर भी बाँटी जा रही मुफ्त की रेवड़ी: स्वावलंबन और स्वदेशी से ही आएगी आर्थिक आत्मनिर्भरता

जब हम यह मानते हैं कि सत्य की ही जय होती है तब ईमानदार सत्यवादी देशभक्त नेताओं और उनके समर्थकों को ईडी आदि से भयभीत नहीं होना चाहिए।

हिंदू-सिखों को मरते छोड़ भाग गए थे कॉन्ग्रेसी नेता, सैकड़ों RSS कार्यकर्ताओं के बलिदान से बची हजारों जिंदगी: इतिहास की इन किताबों से जानें...

भारत बँटवारे के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने बहादुरी का परिचय देते हुए सैकड़ों हिंदू-सिख परिवारों की रक्षा की।

लालू-नीतीश से ऊब चुके बिहार में कौन होगा BJP का देवेंद्र फड़नवीस? कीचड़ में कमल खिलाने वाला चाहिए, लेकिन पार्टी के अधिकतर नेता अपने...

बिहार भाजपा के अधिकतर बड़े नेताओं का अपने जिले से बाहर कोई जनाधार नहीं है। ऐसे में देवेंद्र फड़नवीस वाला कार्य कौन कर सकता है? तेजस्वी बनाम कौन?

कोउ नृप (सरकार) होउ बिहारी को ही हानी… नीतीश कुमार इधर रहें या जंगलराज की छाया में पसरें, बिहार पर बोझ बना रहेगा

बिहार सियासी तौर पर अभिशप्त है। फिर भी जंगलराज की छाया से दूर रहने का सुकून था। हालिया राजनीतिक हलचल उस सुकून पर हमले जैसा है।

पसमांदा से ही मुस्लिम ‘वोट बैंक’, मजहबी भीड़ भी इनसे ही: चाहिए दलितों का कोटा, पर वोट उनको जिधर मदरसे-मौलवी

कौन हैं पसमांदा मुस्लिम? 'सबका साथ-सबका विकास' के बाद क्यों चर्चा में पसमांदा प्लान? क्या 2024 के लिए ऐसे किसी प्रयोग की बीजेपी को सच में जरूरत है?

बालपन की कुछ सफेद कहानियाँ और काले कपड़ों वाली कॉन्ग्रेस…

कॉन्ग्रेस के कर्म ऐसे हैं कि काले कपड़ों में प्रदर्शन कर वह उन्हें ढक नहीं सकती। इसलिए संसद से सड़क तक जुमे पर उसने जो सियासी तमाशा किया, वह बेअसर साबित हुई।

1000 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव परिणाम तय करने वाला अल्पसंख्यक कैसे? संविधान में सभी समान, फिर विदेशी संप्रदाय के लिए अल्पसंख्यक मंत्रालय क्यों?

क्या उस समुदाय को अल्पसंख्यक कह सकते हैं जो भारत के लगभग लगभग 200 लोकसभा और 1000 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव परिणाम तय करता हो?

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