घर संख्या 1 के निवासी ने भूपेंद्र चौबे को बताया कि ये घर 5 वर्ष पहले (मोदी के आने के बाद) सरकारी रुपयों से बना। इसमें कमरा, बाथरूम, किचन वगैरह सबकुछ है। स्थानीय निवासियों ने कहा कि पक्का घर मिलने से झोंपड़ियों में रहा करते थे।
"हम एक समय में कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन का सपना भी नहीं देख सकते थे। लेकिन देश में मौजूदा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, हमने एक तरह के टाई-अप के लिए कॉन्ग्रेस से संपर्क किया। हमने कॉन्ग्रेस को समझाया कि मोदी-शाह को हराना क्यों महत्वपूर्ण है।"
कॉन्ग्रेस के मुख्यमंत्री पहले भी ऐसा कर चुके हैं। महत्वपूर्ण पदों पर करीबी अफसरों को बैठाने के लिए कॉन्ग्रेस सरकारों ने बड़े पैमाने पर तबादले किए थे। यह बात ज्यादा पुरानी भी नहीं, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान की है - पिछले साल की।
इससे पहले वो पीएम मोदी पर भी निशाना साध चुके हैं। उन्होंने कहा था, “मैं ऐलान करता हूँ कि मोदी से मेरी लड़ाई में जो मेरे सामने आएगा और मुझे रोकने की कोशिश करेगा वो गठबंधन का नाम ले या हाथी का नाम ले, मैं उसको वार करके चूर-चूर कर दूँगा।”
यह पहली बार नहीं है कि ममता ने पड़ोसी देश बांग्लादेश में वोट की अपील की हो। इस महीने की शुरुआत में, दो बांग्लादेशी अभिनेताओं को पश्चिम बंगाल में ममता की TMC के लिए प्रचार करते हुए पाया गया था। बांग्लादेशी अभिनेता फिरदौस अहमद और गाज़ी अदबुन नूर बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में TMC के लिए प्रचार कर रहे थे।
घायल 38 वर्षीय महिला पुलिसकर्मी को जिला अस्पताल में दाखिल कराया गया। स्थानीय कॉन्ग्रेस पदाधिकारियों ने कहा कि प्रियंका उसके स्वास्थ्य को लेकर 'पल-पल' की अपडेट भी ले रही हैं। महिला पुलिसकर्मी के पाँव में चोट आई है। उन्हें अस्पताल के ICU वार्ड में रखा गया है।
ऐसे राजनेताओं के लिए महिलाएँ आज भी ‘माल’ हैं। ऐसी गिरी मानसिकता पर जनता ने तो अपना आक्रोश व्यक्त किया ही। अब देखना है आगे चुनाव आयोग इस मुद्दे पर क्या निर्णय लेता है। वैसे लोगों ने चुनाव आयोग से इस बात का संज्ञान लेने की अपील की है।
अमीषा यही चीज़ 5 साल पहले भी कर चुकीं हैं। 5 साल पहले भी वह कॉन्ग्रेस प्रत्याशी के समर्थन में रोड शो करते हुए गुजरात में विकास की तारीफ़ करने लगीं थीं।
कैप्टन की इस घोषणा में उनके हार का डर साफ-साफ झलक रहा है। उन्हें लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के जीत पर संदेह है और शायद वो चुनाव के परिणाम को लेकर भी थोड़े से डरे हुए लग रहे हैं।
जमीन पर मतदाताओं तक महागठबंधन की खबर पहुँचा पाने में बसपा कार्यकर्ता विफल रहे हैं। एक बड़ा मतदाता वर्ग हाथी न ढूँढ़ पाने के भ्रम में कमल का बटन दबा आ रहे हैं।