माइग्रेंट्स ने कभी भी खुद को सरकारी एजेंसियों से छुपाने की कोशिश नहीं की। सच तो यह है कि वे बड़ी मुश्किल में हैं इसलिए वो हर जगह खुद से सामने आए, जिनकी सहायता में राज्य और केंद्र सभी सरकारों ने वो सभी प्रकार की सहायता उन्हें मुहैया कराई जिसकी उन्हें जरूरत थी। इस प्रकार से जमातियों को माइग्रेंट्स के साथ एक खाने में रखना बदनीयती के अलावा कुछ नहीं समझा जाना चाहिए।
जर्नलिस्ट चित्रा त्रिपाठी आजतक का शो एंकर कर रही थीं। उन्होंने अपने शो में कह दिया कि ममता बनर्जी ने राज्य में लॉकडाउन को इस महीने की 40 तारीख तक बढ़ा दिया है।
मदरसों में छात्रों के साथ खिलवाड़ हो रहा है। कोरोना जैसी महामारी के बीच उन्हें जानवरों की तरह रखा जा रहा है। लेकिन वामपंथी कविता कृष्णन चाहती हैं कि मदरसों की इस हरकत पर मीडिया चुप्पी साध ले और बच्चों को मरने दे।
खुद को देश के नागरिकों का हितैषी स्थापित करते हुए दुआ ने देश की जनका को वीडियोज में न केवल जमकर भड़काया है। बल्कि अपने कुतर्कों से उन्हें गुमराह करने की कोशिश की है। वीडियोज की शुरुआत से लेकर अंत तक में विनोद दुआ एक भी बार देश के नागरिकों को कोरोना से बचे रहने की बात कहते नजर नहीं आते। बल्कि सरकार के ख़िलाफ़ बोलते, उनके फैसलों की निंदा करते और लोगों को उकसाते नजर आते हैं।
हास्यास्पद यह है कि दैनिक भास्कर ने जिन स्थानों को पाठकों के लिए रिक्त छोड़ा था उसमें 'द वायर' और 'न्यूज़लॉन्ड्री' ने अपनी समझ के अनुसार 'तबलीगी जमात' भर दिया। इसके बाद दैनिक भास्कर पर सांप्रदायिकता फैलाने का आरोप भी जड़ दिया।
महबूब अली दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में हैं। कोरोना संक्रमित होने का संदेह है। मीडिया गिरोह ने बवाना में उनकी पीट-पीटकर हत्या किए जाने की खबर उड़ा दी। झूठ पकड़े जाने पर भूल सुधार की जहमत भी नहीं उठाई।
“स्वास्थ्य अधिकारियों पर थूकना, सड़कों पर बस से बाहर थूकना, महिला कर्मचारियों के सामने अर्ध नग्न हो, भद्दी टिप्पणी करना, अस्पतालों में अनुचित माँग करना, केवल पुरुष कर्मचारियों को उनके लिए उपस्थित होने के लिए हंगामा करना और आप कितनी आसानी से कह रही हो कि इनके इरादे खराब नहीं हैं। हद है।”
आरफा की मानें तो नर्सें झूठ बोल रही हैं और प्रोपेगेंडा में शामिल हैं। तबलीगी जमात वाले नीच हरकत कर ही नहीं सकते, क्योंकि वे नि:स्वार्थ भाव से मजहब की सेवा कर रहे हैं। इसके लिए दुनियादारी, यहॉं तक कि अपने परिवार से भी दूर रहते हैं।
कई लोग मीडिया पर आरोप लगा रहे थे कि जब किसी हिन्दू धार्मिक स्थल में श्रद्धालु होते हैं तो उन्हें 'फँसा हुआ' बताया जाता है जबकि मस्जिद के मामले में 'छिपा हुआ' कहा जाता है। इसके बाद फेक न्यूज़ का दौर शुरू हुआ, जिसे अली सोहराब जैसों ने हज़ारों तक फैलाया।