डीईए, सीबीआई और डीओपीटी ने सीवीसी से राय मांगी थी जिसके आधार पर सीवीसी ने इन चारों पूर्व अधिकारियों के ख़िलाफ़ मुकदमा चलाने की मंजूरी दी है। जिसमें हिमाचल प्रदेश सरकार में वर्तमान प्रमुख सचिव प्रबोध सक्सेना और डीईए के पूर्व अवर सचिव रबिन्द्र प्रसाद का भी नाम है।
प्रोपेगेंडा पोर्टल 'द वायर' बड़ी चालाकी से अपने हैडलाइन में ऐसे शब्द लिखता है जैसे कोर्ट ने अपराधी संजीव भट्ट को उम्र कैद की सजा उसके 30 साल पुराने अपराध के कारण नहीं बल्कि 'मोदी के गुजरात दंगों शामिल' होने की बात कहने के लिए दिया गया है।
"जब 2009 में NDTV के शेयर्स 140 रुपए प्रति शेयर के हिसाब से बिक रहे थे, तब रॉय ने मात्र 4 रुपए प्रति शेयर की दर से इन्हें ख़रीदा था। इसके बाद रॉय ने उसी दिन सभी ख़रीदे गए शेयर्स को RRPR होल्डिंग नामक कम्पनी को बेच दिया था। इससे रॉय को 200 करोड़ रुपए का 'Capital Gain' हुआ था।"
ये पत्रकारिता के कुछ ऐसे संस्थान हैं, जो भोजन शुरू करने से पहले अन्न का प्रथम अंश जवाहरलाल नेहरू और दूसरा अंश गाँधी परिवार के लिए रख देते हैं। कम ही लोग ये बात जानते हैं कि BBC जैसे मीडिया गिरोह राहुल गाँधी द्वारा हर चुनाव नतीजों के बाद त्याग दिए गए जनेऊ गले में धारण कर के ही कार्यक्षेत्र को रवाना होते हैं।
NDTV ने अपने शेयरों में हुए बदलाव व इंडियाबुल्स के साथ हुए समझौते के बाद समय पर सब कुछ खुलासा नहीं किया, इसीलिए उस पर 12 लाख रुपए का जुर्माना लगाने का निर्णय लिया गया। इससे पहले एक मामले में NDTV के दोनों प्रमोटरों प्रणय रॉय और राधिका रॉय पर कम्पनी में किसी भी प्रकार का पद लेने से 2 साल का प्रतिबन्ध लगा दिया था।
यह जानना आवश्यक है कि जिस पर आज फैसला सुनाया गया, वह अयोध्या में 2005 में हुआ आतंकी हमला था, जबकि बाबरी विध्वंस एक जगह पर विवाद के फलस्वरूप जन्मी घटना थी।
...लेकिन 2019 के चुनावों के बाद से इन नमक-हराम मीडिया गिरोहों ने नेहरू को ऐसे निकाल फेंका है जैसे लोग चाय में से मक्खी को निकाल फेंकते हैं। मीडिया अब समझ गया है कि वो नेहरू को गन्ने की तरह गन्ने की मशीन में ठूँसकर जितना निचोड़ सकते थे, निचोड़ चुके हैं।
वायरल वीडियो के चलते ट्विटर पर इस समय सानिया मिर्जा और पाकिस्तानी एक्ट्रेस वीना मलिक एक-दूसरे को जवाब देने में लगी हुई हैं। यह बात तब शुरू हुई जब वीना मलिक ने सानिया मिर्जा, उनके पति शोएब और बेटे के साथ जंक फूड खाते हुए वायरल वीडियो पर कमेंट किया।
"अगर आज़ादी का कोई भी अर्थ है, तो वह लोगों को वह सुनाने का अधिकार है जो वह नहीं सुनना चाहते।" हम निश्चित तौर पर आपकी मुवक्किल स्वाति चतुर्वेदी और कई अन्य पत्रकारों को वह सुनाने के दोषी हैं जो वह नहीं सुनना चाहते। जैसा कि आपकी मुवक्किल के द्वारा प्रदर्शित किया गया, यह मानहानि नहीं आज़ादी है।
प्रेस परिषद ने दोनों अखबारों का माफीनामा भी खारिज कर दिया है और शिकायतकर्ता की शिकायत पर कहा है कि पाठक को अधिकार है कि अगर वो अखबार में किसी तरह की गलती को पाता है तो सीधे परिषद को संपर्क करे।