Monday, January 18, 2021
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इंदिरा व राजीव शिकार हुए थे, शहीद नहीं: ढोंगी देशभक्ति के नाम पर वोट मत माँगिए, यह नौटंकी है

जिस तरह से एक ही परिवार को देश के ऊपर थोपा जा रहा है, वह लोकतंत्र की हत्या कर परिवार तंत्र को बढ़ावा देना है। चारण मीडिया के गुणगान को देश की सच्ची आवाज समझने की भूल मत करिए। आँखे खोलकर देखिए, आपकी पार्टी की तरह ये मीडिया गिरोह भी नकारा जा चुका है।

जमीनों की हेराफेरी और कमीशन के कई मामलों में आरोपित रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी कॉन्ग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा शनिवार (अप्रैल 6, 2019)को देश को देशभक्ति का पाठ पढ़ाने निकलीं। इंदिरा से नाक मिलने की योग्यता रखने वाली प्रियंका यूपी के फतेहपुर में एक नुक्कड़ सभा में बोल रही थीं। अचानक से वहाँ उन्हें देशभक्ति की बात याद आई ठीक उसी तरह जिस तरह से अक्सर पिछले चुनावों में उनके भाई साहब को कभी राम भक्त तो कभी शिवभक्त और कभी खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण दिखाने की याद आती थी। फिलहाल अब वह वायनाड से खुद को मुस्लिमों का मसीहा साबित करने में लगे हैं। क्योंकि, अमेठी अब उनके लिए उतनी मीठी नहीं रही कि वो उसका और फायदा उठा पाएँ।

तो अचानक से देशभक्त बनी प्रियंका ने फतेहपुर में कहा, “हर चुनाव में भाजपा देशभक्ति का मुद्दा उठाती है, मगर विकास पर कोई बात नहीं करती है। मैं यहाँ आपको यह याद दिलाने आई हूँ कि देशभक्ति के क्या सही मायने हैं।”

देशभक्ति और विकास साथ-साथ अच्छी बात है। पर जिसने 60 सालों तक विकास की ऐसी-तैसी कर खुद को घोटालों की सरकार कहलाने में फक्र महसूस किया हो, उस पार्टी के महासचिव के मुँह से विकास निकलते ही शायद प्रियंका को लगा कि ये तो सेल्फ गोल हो गया, कहीं कॉन्ग्रेस और मोदी सरकार के कार्यों के बीच तुलना न हो जाए? कहीं जनता ये सवाल न कर दे कि आपका परिवार तो घोटालों, दलालों और देश को बेच खाने वालों का जमावड़ा है, जिन पर जाँच के बाद कई आरोपपत्र दाखिल हो चुके हैं। जिनका पूरा परिवार जमानत पर चल रहा है। जिनके पतिदेव ED के सवालों का जवाब दे हलकान हो रहे हैं। मिशेल ने जिनके परिवार और पार्टी के कई नेताओं का नाम सीधे-सीधे न सही, परोक्ष तौर पर तो ले ही लिया है। वो विकास का नाम ले भी तो कैसे? तुरंत वापस लौट आईं देशभक्ति के मुद्दे पर और जल्दबाजी में अपने परिवार के ही दो प्रिविलेज्ड नेताओं को शहीद का दर्ज़ा दे डालीं।

इस क्रम में यहाँ तक कह दिया, “अगर भारतीय जनता पार्टी के नेता सच्चे देशभक्त होते तो वे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी समेत देश के शहीदों का सम्मान करते।” यहाँ साफ़ दिख रहा है जिस परिवार ने नाम्बी नारायणन जैसे वैज्ञानिकों पर देश के खिलाफ जासूसी का आरोप मढ़कर, सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए उनका पूरा जीवन बर्बाद कर दिया हो। जिसके कार्यकाल में होमी जहाँगीर भाभा और विक्रम साराभाई जैसे वैज्ञानिकों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बावजूद न उनका पोस्टमार्टम कराया गया और न कोई जाँच बैठाई गई। वो आज देशभक्ति का पाठ पढ़ा रही हैं। आपको कॉन्ग्रेसी राज के वो दिन तो याद ही होंगे जब देश को मजबूत बनाने की सोचने वाले जिंदा नहीं बचते थे

प्रियंका ने यह भी कहा, “देशभक्ति की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले बीजेपी नेता अगर सच्चे देशभक्त होते तो वे देश के शहीदों का सम्मान करते, चाहे वे शहीद हिंदू हों या मुस्लिम या उनके राजनीतिक विरोधी के पिता! वह शहीद हैं। आप यह चयन नहीं कर सकते कि आप किस शहीद का सम्मान करें अगर आप सच्चे देशभक्त हैं तो राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी समेत सभी शहीदों का सम्मान करें।” यहाँ बात थोड़ी और साफ़ हुई कि उन्हें सैनिकों के बलिदान या शहादत से कुछ भी लेना-देना नहीं है। दरअसल वो भारत रत्न की तरह चुनाव के माहौल में जनता की भावनाओं का फायदा उठाने के लिए शहीद-शहीद खेलकर अपने परिवार के लोगों के नाम पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने का काम कर रही हैं।

देश के वीर सैनिकों के नाम पर अपने परिवार को रेवड़ी मत बाँटिए प्रियंका जी। क्या आप जानती हैं कि शहीद कौन होता है? जिसने शहादत खुद चुना हो, जिसे पता हो कि इस मिशन में देशहित की रक्षा के लिए दुश्मनों का सामना करते हुए उसकी जान जा सकती है फिर भी वह पीछे न हटे उसे देश गर्व से शहीद कहता है

सेना में ड्यूटी पर मरने वाला हर सैनिक या जवान, शहीद ही है क्या? जी नहीं। मारा गया हर सिपाही, अर्धसैनिक बल का जवान शहीद नहीं। ‘शहीद’ का ये गरिमापूर्ण सम्मान, हर मृतक को नहीं दिया जा सकता है। धोखे से जिनकी हत्या की गई, भले ही वो सैनिक ही हों, वे शहीद नहीं होते। अपनी और अधिकारियों की लापरवाही और अनदेखी में, धोखे से मारे गए सिपाही, शहीद नहीं कहलाते। बेखबर, लापरवाह किसी एक्सीडेंट में मारे गए लोग, शहीद नहीं होते हैं, वे बस शिकार होते हैं।

शहीद तो वे सजग सिपाही होते हैं, जो खतरा जानते हुए, अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए, चौकस रहकर, पूरे होशो-हवास में, सतर्कता से, सुनियोजित जोखिम उठाकर, अपनी कुर्बानी दे देते हैं कि सिवा उसकी कुर्बानी के और कोई विकल्प था ही नहीं। बिना मुठभेड़ किए ही, अगर कोई किसी साजिश का शिकार होकर मारा गया, किसी के गुस्से का शिकार हुआ, किसी रैली में मारा गया वो शहीद नहीं, शिकार है – साजिश का शिकार। शहीद होने के लिए जरूरी है, मौत की परिस्थितियों और उसके पीछे के कारण का, शौर्यपूर्ण और बुद्धिमतापूर्ण होना।

यहाँ तक की आतंकवादियों के फिदाईन हमलों में अगर आतंकवादी से मुठभेड़ नहीं हुआ और अपने ध्येय के लिए आतंकवादी ने जान दे दी तो, अपने मकसद के लिए शहीद वो आतंकवादी (वो भी उसके पक्ष के हिसाब से) हुआ न कि वो सैनिक जो उस फिदाईन का शिकार बना। ऐसे हमलों में दो सैनिक मारे जाते हैं, उन्हें हम सम्मानवश बलिदानी, हुतात्मा कह सकते हैं। लेकिन शहीद नहीं। शहादत का मतलब है, दुश्मन को मारने के लिए, खुद मर जाना। दुश्मन की चाल में आकर बिना उसे मारे ही, मारा जाना शहादत नहीं, खेत आना कहलाता है। खेत आया हर सैनिक, शहीद नहीं होता है। अपनी कमर में बम बाँध कर, कोई प्रायोजित आतंकवादी, अगर बेखबर सोए सैनिकों के शिविर में घुस कर फट जाए और अगर इस धमाके में खेत आए सारे सैनिकों के लिए आप शहीद शब्द प्रयोग करते हैं तो फिर उस महान सैनिक को क्या कहेंगे, जो दुश्मन का सामना करते हुए, अंतिम उपाय में, हैंडग्रेनेड लेकर दुश्मन के बंकर में कूद पड़ा, और अपनी जान देकर पचास दुश्मनों को मार गिराए ताकि अपने हजार साथियों की जान बचा सके।

सक्रिय व सजग रहकर, समाज की सुरक्षा के लिए, सही समय पर अपना सब कुछ न्योछावर कर देना ही, शहादत और बलिदान है।

शहीद थे भगत सिंह। शहीद थे आजाद। शहीद थे राजगुरु। शहीद थे सुखदेव। शहीद थे महाभारत के अभिमन्यु। शहीद हैं वे महान सैनिक, जिन्होंने दुश्मनों के शिविर में घुसकर, उनको मारते हुए अपनी जानें दे दीं।

शहीद और शिकार में फर्क है। पहले ये खुद समझिए फिर समझाइए कि देशभक्ति और शहादत क्या है।

प्रियंका गाँधी, शहादत के लिए बुद्धिमान होना बेहद जरूरी है। और आपके परिवार का बुद्धि से ही दुश्मनी है। आपके परिवार में सिर्फ परिवार का होना, खानदान से नाक मिलना ही जहाँ योग्यता हो, वहाँ बुद्धि और विवेक की बात करना बेमानी होते हुए भी देशहित में मैं आपका संदेह दूर कर रहा हूँ ताकि आप घोषित आपातकाल लगाने वाली महिला (अपनी दादी) को शहीद कहने की भूल न करें। आपकी दादी और आपके चाचा संजय गाँधी के ही पाले हुए भिंडरावाले जैसे पाकिस्तान परस्त अलगाववादी के खात्मे के लिए स्वर्ण मंदिर में जूते पहन के घुसे सैनिकों से धार्मिक भावना आहत होने पर अपने अंगरक्षकों के गुस्से का शिकार थीं आपकी दादी न कि शहीद।

ये जानते हुए भी कि इससे सिखों की धार्मिक भावना आहत हुई है और वो भयंकर रूप से उनसे खफा हैं। यहाँ तक की IB की सूचना के बावजूद सिख अंगरक्षकों को न हटाना मूर्खता है, लापरवाही है। और उनके गुस्से का शिकार हो अपनी जान गवाना एक हादसा है, दुर्घटना है, शहादत नहीं।

उसके बाद का तो आपको पता ही होगा। 1984 में आपकी दादी की हत्या के बाद जब कॉन्ग्रेसी ढूँढ-ढूँढ कर दिल्ली में सिखों को ज़िंदा जला रहे थे, एक नरसंहार को अंजाम दिया जा रहा था तो आपके ‘पूज्य’ पिताजी ने ही कहा था, “जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है।” याद है आपके पिताजी भी शहीद नहीं बल्कि अपनी बेवकूफी और लिट्टे के गुस्से का ही शिकार हुए थे। इस लिट्टे को भी आपके परिवार ने ही देश को खोखला और अशांत करने के लिए पाला था। माना की राजीव गाँधी की मौत वीभत्स तरीके से हुई थी, देश को अपना एक प्रधानमंत्री खोने का दुःख भी है लेकिन वह शहादत नहीं बल्कि महज हत्या थी। देश आपके परिवार की बेवकूफियों की कीमत आज तक चुका रहा है।

लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि आज जिस तरह से एक ही परिवार को देश के ऊपर थोपा जा रहा है वह लोकतंत्र की हत्या कर परिवार तंत्र को बढ़ावा देना ही है। बेशक आज आपकी चारण मीडिया गुणगान कर रही हो लेकिन उसे देश की सच्ची आवाज समझने की भूल मत करिए। वो आपके पाले हुए वामपंथी मीडिया गिरोह का मात्र स्तुतिगान है। आँखे खोलकर देखिए, आपकी पार्टी की तरह ये गिरोह भी नकारा जा चुका है।

प्रियंका जी आप देशभक्ति और देश के भविष्य की चिंता मत करिए। आज देश की संस्थाएँ, सुरक्षा बल और वैज्ञानिक ज़्यादा स्वतंत्र हैं और देशहित में नित नई उन्नति कर रहे हैं। तभी तो आज आपको वर्तमान नेतृत्व के कामों का श्रेय भी अपने परदादा को देने की ज़रूरत पड़ रही है। विकास या उत्थान नहीं हो रहा तो क्या आप विफलता का श्रेय लूटने को तैयार बैठी हैं?

चिंता मत करिए आप, देश का भविष्य तो उज्ज्वल है पर कॉन्ग्रेस का भविष्य देश को अंधकारमय नज़र आ रहा है। लेकिन आपने “इंदिरा इज इंडिया” के तर्ज़ पर यह भी कहने से गुरेज नहीं किया कि देश का भविष्य तय करने के लिए आगामी चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है इसलिए आप उनको यह याद दिलाने आई हैं कि सच्ची देशभक्ति के क्या मायने हैं। आप रहने दीजिए। देश समझ चुका है कि देशहित और सच्ची देशभक्ति क्या है। तभी तो उसने नकली देशभक्तों और जनेऊ धारियों को सत्ता से बाहर रखने की ठानी है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में आज देश सम्पन्नता की राह पर है। अब देश का कोई भी सच्चा सपूत यहाँ के संसाधनों की बंदरबाँट नहीं चाहता। जनता का तो यहाँ तक कहना है कि देशहित में सच्ची देशभक्ति का प्रमाण देते हुए कम से कम 20 साल तक परिवार को सत्ता से दूर रहकर आत्मशुद्धि का आनंद उठाना चाहिए। आप देश के लोकतंत्र में यकीन रखिए, जब ज़रूरी होगा ये देश हित में आपको मौका ज़रूर देगा। नहीं दे रहा तो देश जाग चुका है कि अब उसे घोटालों और दलालों की सरकार नहीं चाहिए।

खैर इसमें रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका मैं आपकी बुद्धि को दोष नहीं दूँगा। बस आपको लगा कहीं लोगों को कॉन्ग्रेस की घोटालों की याद न आ जाए, इसलिए राफेल राग पर ‘रागा’ के फेल होते ही आप अब देशभक्ति की लाइन पर आने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन चौकन्ना चौकीदार की वजह से कुछ काम नहीं आ रहा। अभी हाल ही में ABP को दिए एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री ने उनके भ्राता श्री (जो चुनाव हलफनामे में हेर-फेर को लेकर संदेह के घेरे में हैं) के संपत्ति के कई खुलासों के ऑपइंडिया के रिपोर्ट का जिक्र कर फिर से लंका लगा दी है। प्रियंका आप तो स्वयं ऐसी कई सम्पत्तियों की मालकिन हैं कि अगर आप चुनाव लड़ती हैं तो आपके भी भेद खुल जाने का डर है। इसलिए आपने एक गोली देकर फिलहाल इससे मुक्ति पा ली है कि यदि आपकी पार्टी चाहेगी तो आप ज़रूर चुनाव लड़ेंगी।

जिसके हाथ में 10 साल तक प्रधानमंत्री भी एक खिलौने की तरह रहा हो, जिनके भ्राता श्री देश के प्रधानमंत्री का अपमान करते हुए अध्यादेश बिना किसी अधिकृत पद पर होते हुए भी चारण मीडिया के सामने फाड़ चुके हों और पूरा कॉन्ग्रेसी मीडिया गिरोह ‘वाह राहुल जी वाह’ का नारा लगा चुकी हो – आप खुद वाराणसी के रामनगर में देशभक्ति का महान सन्देश देते हुए अपने ही गले की माला उतारकर देश के महान सपूत लाल बहादुर शास्त्री के गले में डालकर ये बता आई हैं कि कोई भी हो, वो हमेशा आपके परिवार से नीचे ही रहेगा। आप जैसे महानुभाव, आपके नकली देशभक्ति के पाठ और बाहरी दिखावों की देश को ज़रूरत नहीं। देश ने अभी तक आपके परिवार का बड़ा सम्मान किया। अब देश आपसे चाहता है कि आप भी लोकतंत्र की भावना और उसकी इच्छा का सम्मान करते हुए कुछ समय तक सत्ता से दूर रहने में योगदान देकर सच्ची देशभक्ति का सबूत दें। जय हिन्द! जय भारत!

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रवि अग्रहरि
अपने बारे में का बताएँ गुरु, बस बनारसी हूँ, इसी में महादेव की कृपा है! बाकी राजनीति, कला, इतिहास, संस्कृति, फ़िल्म, मनोविज्ञान से लेकर ज्ञान-विज्ञान की किसी भी नामचीन परम्परा का विशेषज्ञ नहीं हूँ!

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