Wednesday, September 23, 2020
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शेखर ‘कूप्ता’ के ‘द प्रिंट’ का नया धमाका: अपने ही हेडलाइन का किया फैक्टचेक, वो भी उसी लेख में!

शेखर गुप्ता जैसे लोग इस तरह की 'क्लिकबेट साहित्य' के जरिए प्रशांत भूषण जैसे लोगों को ही खुश करने का काम कर रहे होते हैं। नेहरु के नमक में डूबे कॉन्ग्रेस के ये प्रोपेगेंडा-मंत्री' अच्छी तरह से जानते हैं कि सत्ता और हिंदुत्व-विरोध से भरा हुआ उनका पाठक वर्ग मात्र एक ऐसी ही किसी सनसनीखेज हेडलाइन के इन्तजार में बैठा होता है।

अतुल्य गंगा नाम की संस्था राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को एक प्रस्ताव भेजती है, जिसमें इस बात की जाँच की माँग की गई है कि क्या गंगा जल द्वारा कोरोना वायरस संक्रमितों का इलाज किया जा सकता है? लेकिन शेखर गुप्ता के द प्रिंट ने वास्तविकता जानते हुए भी अपने एजेंडे के तहत इसे ट्वीस्ट देना बेहतर समझा।

अतुल्य गंगा के इस प्रस्ताव को राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन द्वारा इंडियन मेडिकल रिसर्च काउंसिल (ICMR) को आगे बढ़ाया जाता है। इसके बाद आईसीएमआर में अनुसंधान प्रस्तावों का मूल्याँकन करने वाली समिति देखती है कि इस बारे में वर्तमान समय तक उपलब्ध आँकड़े इतने पुख्ता और पर्याप्त नहीं हैं।

इस कारण कोरोना वायरस संक्रमण के इलाज के लिए विभिन्न स्रोतों और उद्गमों से गंगाजल पर क्लिनिकल अनुसंधान अभी नहीं किया जा सकता, और इस प्रस्ताव को यहीं पर रोक दिया गया। आईसीएमार, NGO आदि का काम यहाँ पर समाप्त हो जाता है।

आईसीएमआर और अतुल्य भारत संस्था के बीच मोदी सरकार कैसे आ गई?

यहाँ से काम शुरू होता है ‘जमात-ए-पत्रकारिता‘ के सरगना शेखर गुप्ता के ‘The Print’ और लिबरल मीडिया गिरोह का। ‘द प्रिंट’ इस खबर को फैक्ट चेक का नाम तो देता ही है, साथ में इस पूरे प्रस्ताव को मोदी सरकार के नाम बताकर अपने चिर-परिचित हिन्दू-घृणा के नैरेटिव में ढाल देता है।

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अपने रिपोर्टर्स की खामियों पर ध्यान देने के बजाए शेखर गुप्ता ने इसे अपने प्रोपेगेंडा की प्रतिभा का इस्तेमाल करते हुए इसमें चुपके से और बेहद शातिराना तरीके से मोदी सरकार के नाम कर दिया।

शेखर गुप्ता का ‘The Print’ इस पूरी घटना को एक हेडलाइन, जो की हर तरह से झूठी और सामान्य ज्ञान की कमी का उदाहरण है, में लिखता है- “क्या गंगाजल कोरोना वायरस को ठीक कर सकता है? मोदी सरकार जानना चाहती है, आईसीएमआर ने ना कहा!”

“गंगा जल पर रिसर्च में आईसीएमआर की रुचि नहीं, पीएमओ और जलशक्ति मंत्रालय का प्रस्ताव खामोशी से खारिज”

प्रशांत भूषण ने दी प्रिंट के इस कारनामे का फायदा उठाते हुए तुरंत इस रिपोर्ट को ट्वीट करते हुए लिखा:

“ICMR ने नरेंद्र मोदी सरकार के उस ‘अनुरोध’ को ठुकरा दिया, जिसमें कहा गया था कि गंगाजल संभवतः COVID-19 को ठीक कर सकता है। गौमूत्र, गो-कोरोना-गो का जप, थालियों को पीटना, मोमबत्तियाँ जलाने के बाद अब कोरोना के इलाज के लिए गंगाजल की बारी है! काफ़ी प्रतिभाशाली!”

यदि द प्रिंट की हेडलाइन देखें तो शेखर गुप्ता ने मोदी सरकार और गंगाजल का प्रयोग किया है, जबकि इस प्रस्ताव के पीछे स्पष्ट रूप से कुछ एक्टिविस्ट्स और NGO हैं।

यह भी ज्ञात होना चाहिए कि यह प्रस्ताव राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को भी अतुल्य गंगा नाम की आर्मी वेटरेन्ज की संस्था ने भेजा था, जिसे राष्ट्रीय गंगा मिशन ने आईसीएमआर को बढ़ा दिया। अतुल्य गंगा ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को एक पत्र लिखा था, जिसमें कहा गया था कि गंगा के ऊपरी सतह के पानी में पाए जाने वाले बैक्टीरियोफेजेस में बैक्टेरिया के खिलाफ लड़ने की क्षमता है।

सरकार ने महज उनके प्रस्ताव को उस एजेंसी तक पहुँचाने का काम किया है, जिसके पास ऐसे दावों की पुष्टि या खंडन का विशेषाधिकार भी है और जानकारी भी।

द प्रिंट की यह हेडलाइन धूर्तता का उदाहरण है, जहाँ मोदी और हिन्दू-घृणा से सने लोगों के पूर्वग्रहों को हवा देने के लिए इस तरह की बेहूदगी आम हो चली है।

जब इस तथाकथित रिपोर्ट में भीतर लिखा हुआ है कि यह प्रस्ताव कुछ लोगों ने निजी स्तर पर दिया, तो इस में हेडलाइन के जरिए सनसनी फैला कर वैश्विक महामारी के समय क्या सरकार को मूर्खों की तरह गंगाजल पर रीसर्च करने वाला दिखाना धूर्तता नहीं है?

शेखर गुप्ता जैसे लोग इस तरह की ‘क्लिकबेट साहित्य’ के जरिए प्रशांत भूषण जैसे लोगों को ही खुश करने का काम कर रहे होते हैं। नेहरु के नमक में डूबे कॉन्ग्रेस के ये प्रोपेगेंडा-मंत्री’ अच्छी तरह से जानते हैं कि सत्ता और हिंदुत्व-विरोध से भरा हुआ उनका पाठक वर्ग मात्र एक ऐसी ही किसी सनसनीखेज हेडलाइन के इन्तजार में बैठा होता है।

शेखर गुप्ता जानते हैं कि उनका पाठक उनके ‘आसमानी दावों’ को ही बुनियाद बनाकर ‘फेसबुक साहित्य’ लिख सके। पत्रकारिता के मूल्यों की यह कितनी बड़ी हानि है कि यही फेसबुक साहित्यकार आगे चलकर शेखर गुप्ता बन जाते हैं

ये वही लोग हैं, जिन्हें जनता कर्फ्यू के दिन डॉक्टर्स और सफाईकर्मियों के उत्साहवर्धन में बजाए गए शंख, थाली और घंटियों ने हृदयाघात देने का काम किया था।

यह इस बात का एक बड़ा उदाहरण है कि ऐसे ही कॉन्ग्रेस शासित-पत्रकारों ने सदियों तक लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया के बड़े पदों पर आसीन रहकर अपनी कुत्सित मानसिकता से समाज को सींचने का कितना व्यापक काम किया होगा?

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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