Thursday, June 4, 2020
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प्राइम टाइम स्क्रिप्ट: जनता कर्फ्यू आपातकाल की टेस्टिंग, थाली बजाना गरीबों को बेइज्जत करने की मुहिम

असली समस्या तो उन लोगों को होने वाली है जिनके पास पालतू जानवर हैं। उस कुत्ते को कौन समझाए कि भाई जनता कर्फ्यू है क्योंकि वो समझ भी गया तो पूछेगा पलट के कि कुत्ता कर्फ्यू तो है नहीं, उसे क्या! बात भी सही है कि उसने तो वोट भी नहीं दिया था, मोदी तो 27 करोड़ लोगों के ही प्रधानमंत्री हैं, उतने लोगों का ही वोट मिला था।

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

नमस्कार, मैं कौन हूँ, आप जानते ही हैं, नहीं भी बताऊँगा तब भी समझ में आ ही जाना है, तो फिर क्या बोलना। हें हें हें… और मैं कोई भारत का प्रधानमंत्री तो हूँ नहीं जो थाली और गिलास बजवाने के चक्कर में 29 मिनट बोल जाता है!

आठ बजे बड़ा ही रोमांचक समय है (और रोमेंटिक भी जिनकी महबूबाएँ हैं, हमारा क्या हम तो सिंगल हैं)। यूँ तो ऐतिहासिक रूप से अगर देखा जाए तो कमरे में ही कैमरा लगवा कर रात-बेरात हमारे प्राइम टाइम पर मुँह उठा कर चले आने वाले फैजान मुस्तफा कमाल पासा भी बताते हैं कि संविधान में तो आठ बजे भी वैसे ही बजता है जैसे नौ या ग्यारह, लेकिन मोदी जी के आने से आठ बजे का महत्व बढ़ जाता है।

जी, मैं नोटबंदी की बात कर रहा हूँ। उन्हीं नोटों के बंदी की जो कभी नेहरू जी की हुआ करती थी। लेकिन नेहरू की बनवाई चीजों से आज कल के कुछ विचारधाराओं को इतनी समस्या है कि कह दिया कि सारे नोट बंद कर दो। ध्यान रहे कि अगर नेहरू न होते, न नोट होता, न अर्थव्यवस्था होती, न ये देश होता, न ये स्टूडियो, न मोदी, न भाजपा… आखिर जो भी है, वो नेहरू जी का ही तो है… IIT, IIM, प्राइमरी स्कूल, मिडिल स्कूल, भारत रत्न, एडविना… सब नेहरू की थी, हैं और रहेंगी। इस तथ्य को कोई मोदी नहीं झुठला सकते, न ही उनके आईटी सेल का अजीत भारती।

खैर, 29 मिनट कल रात आठ बजे से प्रधानमंत्री ने सिर्फ डींगे हाँकी है। नहीं, आप ही बताइए कि क्या प्रधानमंत्री के बोलने से कोरोना मर जाएगा? तब तो हर देश के प्रधानमंत्री को माइक ले कर, स्क्रिप्ट पढ़ कर संबोधन दे देना चाहिए, कोरोना मर जाएगा। जबकि हमारे फैजान मुस्तफा बताते हैं कि भारतीय दंड विधान और संविधान में ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि भाषण देने से कोरोना मर जाता है।

सॉल्टन्यूज सेक्सी सैंया चेक वाले जुब्बू रंगरसिया ने भी पंचर की दुकान पर बारह वोल्ट वाले बैटरी के डब्बे में पानी भरने के बाद, ट्यूब को डुबा कर बुलबुला चेक करते हुए किसी के बिना पूछे ही बताया कि भाषण देने से कोरोना नहीं मरता। लेकिन आप नहीं मानेंगे क्योंकि आपको हिन्दू-मुसलमान करना है, आपको ये चेक करना है कि अरे शुक्रवार की नमाज में कितने टोपीवाले जमा हुए!

इसीलिए कहता हूँ कि टीवी देखना बंद कर दीजिए। आपको कोई यह नहीं बताएगा कि योगी जी रामनवमी का मेला करवा रहे हैं… लीजिए बताया जा रहा है कि दो बार इस बात का खंडन हो चुका है, आज भी कहा गया कि मेला नहीं होगा। लेकिन मुझे तो नहीं बताया न? फिर मैं कैसे मान लूँ? मेरा तो काम है सवाल पूछना। सवाल तो यही है कि नमाज पर सवाल करने वाले रामनवमी पर चुप कैसे हैं?

बल्लीमाराँ से बल्ली खरीदने गया था, उधर एक ठेले पर कोई बाँस बेच रहा था। दूर से लगा आईटी सेल का आदमी होगा क्योंकि उसके घड़ी की चेन भगवा रंग की थी। मैं गया ही नहीं और वैसे भी बाँस खरीदने से कोरोना का क्या मतलब!

खैर, मोदी जी के 29 मिनट में काम का एक भी मिनट नहीं था। आप ये सोचिए कि ऐसे संबोधनों के कारण देश 29 मिनट के लिए ठहर जाता है। किसी फल वाले के ठेले से कोई सामान खरीदता उतनी देर, लेकिन वो टीवी देखने लगता है। किसी फुटपाथ पर बैठे गरीब की सब्जी कोई खरीदता उस समय, लेकिन खरीदने वाला तो मोदी जी को देख रहा है। लगातार गिरती अर्थ व्यवस्था को एक तय तरीके से बर्बाद करके, उस गरीब को इतना गरीब बनाने की यह मुहिम है कि उसे NRC से बाहर कर दिया जाए।

फैजान मुस्तफा बताते हैं कि गरीबों के पास कागज नहीं होते। पैसे ले-दे कर मान लीजिए वो कागज बनवा भी लेगा, तो जब वो कमाने वाला है, तभी इस तरह के संबोधन कर देना, लोकल इकॉनमी को तबाह करना ही है। उन्होंने आगे बताया कि संविधान में आठ बजे संबोधन के बारे में न तो नेहरू जी ने कुछ कहा, न ही अंबेदकर जी ने। हमने सॉल्ट न्यूज के गंजे लौंडे को खोजने को कहा, तो उन्होंने भी कहा कि फैजान भाई सच बोल रहे हैं।

अब बात करेंगे थाली, ग्लास और ताली की। जैसा कि समाजशास्त्री विशाल बदनामी ने सवाल उठाया है कि देश में कितने लोगों के घरों में बालकनी है, ये सवाल अच्छा है। लोकतंत्र में सवाल करना जरूरी है चाहे वो जो भी हों। जैसे कि गाँव-घर में लोग पूछते हैं, ‘खैनी है क्या जी?’, या मुझसे कई बार मैथिल झा जी सब पूछते हैं कि ‘की यौ, भाँग खाइक प्राइम टाइम करै छी की अहाँ?’ मैं बुरा नहीं मानता क्योंकि सवाल नहीं तो लोकतंत्र नहीं।

अब आप बताइए कि किसी को भूख लगी हो, उसके घर में एक ही थाली हो, जिसे बार-बार धो कर लोग खाते हों, उसी वक्त बगल के घर वाला थाली बजाने लगे, तब क्या होगा? खास कर के गरीब और अल्पसंख्यक लोगों के घर में थाली-गिलास की कमी होती है। आपने कह दिया कि थाली बजाना है, उधर आईटी सेल वाला अजीत भारती ट्वीट कर दिया जिसमें श्री सर्केश्वर उर्फ सर्किट जी कह रहे हैं कि ‘भाई ने बोला करना है, मतलब करना है’, फिर तो अल्पसंख्यक डर कर थाली बजाएगा ही।

नहीं बजाएगा तो कल को बहुसंख्यक जनता या फिर सरकार ही कोई अध्यादेश ले आएगी जिसमें उनकी तस्वीरें चौराहों पर लग जाएगी कि ये आदमी शाम को थाली नहीं बजा रहा था। अध्यादेशों से ही तो सब चल रहा है आज कल। ये निजता का हनन है। बड़े लोग बड़ी थाली निकालेंगे। गरीब टिन या अलमूनियम की थाली निकालेगा, जिसमें वो एक ग्लास जोर से मार दे तो वो मुड़ जाएगा, अमीर स्टील की थाली निकालेगा, उससे ज्यादा अमीर चाँदी की… ये क्या विभाजनकारी बात नहीं है?

दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक एवम् मारवल कॉमिक यूनिवर्स, रोहित शेट्टी कॉप यूनिवर्स से ले कर मल्टीवर्स तक के हर मामलों के जानकार संपूरवानंद ने बताया कि यह अमानवीय और खतरनाक है। इससे गरीबों में हीन भावना भरेगी और वो इस फिराक में लगा रहेगा कि कैसे वो स्टील की थाली पा जाए… आप सोचिए कि जिस आदमी के लिए चावल-गेहूँ जुटाना मुश्किल है, वो अब स्टील की थाली के लिए पागल हो रहा है। प्रधानमंत्री इस समाज को किस दिशा में ले जाना चाह रहे हैं? घरों में लड़ाइयाँ होंगी, पति-पत्नी उलझेंगे कि भोजन जरूरी है या थाली… ये अंतहीन समस्या है!

जनता कर्फ्यू

अब बात जनता कर्फ्यू की। आपने ध्यान दिया कि यहाँ कोई और शब्द इस्तेमाल हो सकता था। लेकिन कर्फ्यू कहा गया। फासीवादियों को काफी प्रिय है ये शब्द। अगर आप जर्मनी के फलाँ संग्रहालय के नाज़ी दौर की किताबों वाले हिस्से में जाएँगे और महसूस करेंगे उन पन्नों को तो आपको पता चलेगा कर्फ्यू क्या होता है। यहाँ तो अब पीएम ही इन शब्दों को खेल-खेल में इस्तेमाल कर रहे हैं।

आपको लगता होगा आपातकाल क्या होता होगा जो मैं सोते-जागते बोलता रहता हूँ। यही है आपातकाल जब बड़े-बड़े, भयावह शब्दों को प्रोपेंगेंडा मशीनरी के इस्तेमाल से कूल बना दिया जाए, आईटी सेल के पेड बेरोजगार युवाओं की भीड़ से उसे दुनिया का नंबर एक ट्रेंड बना दिया जाता है। और आप भूल जाते हैं कि कर्फ्यू में तो मौलिक अधिकारों को सस्पेंड कर दिया जाता है। यूँ तो इस पर फैजान साहब बोलते तो बेहतर रहता लेकिन हमने डेढ़ किलो नकली से पूछा तो उन्होंने बताया कि लोगों को घरों में बंद कर देना, कोलोनियल कानून है।

जब मन में आया कहा घर से बाहर मत निकलो। अब देखिए कि मोदी जी का क्या है, घर में ही बगीचा है, टहल लेंगे। असली समस्या तो उन लोगों को होने वाली है जिनके पास पालतू जानवर हैं। उस कुत्ते को कौन समझाए कि भाई जनता कर्फ्यू है क्योंकि वो समझ भी गया तो पूछेगा पलट के कि कुत्ता कर्फ्यू तो है नहीं, उसे क्या! बात भी सही है कि उसने तो वोट भी नहीं दिया था, मोदी तो 27 करोड़ लोगों के ही प्रधानमंत्री हैं, उतने लोगों का ही वोट मिला था।

चलिए गायों को भी मान लेते हैं कि दिया होगा मोदी जी को वोट… एक बार भूरे और लाल के शेड वाले कुत्तों का भी मान लेते हैं कि वो सॉफ्ट और हार्ड शेड्स ऑफ सैफ्रन हैं, लेकिन काले कुत्तों का क्या? सफेद कुत्तों का क्या? काले और सफेद कुत्तों का क्या? वो क्यों मानें इस कर्फ्यू को? बताइए आप इन लोगों को कि वो उन्हें किसका संबोधन दिखाएँ कि चौदह घंटे का कर्फ्यू लगा है।

कुत्तों से आगे बढ़ते हुए चुनाल चामरा की बात करते हैं जिनके पास मोदी की आलोचना का बहुत बड़ा सर्टिफिकेट है। उन्होंने इस मामले पर कहा कि फक शिट, शिट फक, फक फक, शिट शिट! आप सोचिए कि एक नवयुवक जो पहले से ही मालनरिश्ड है, वो अब ऐसे सदमे में चला गया है कि वो सिर्फ कोड वर्ड में बात कर रहा है! इस युवक के रोजगार पर पहले ही हमला हो चुका है।

मेरे दुकानदार गुरुजी राजदीप सरदेसाई जी ने कल एक रोचक सवाल पूछा। संघी लोग बच कर निकल लेंगे। लेकिन मैं सवाल पूछता रहूँगा। उन्होंने पूछा कि ये जो कर्फ्यू होगा उसमें पुलिस क्या उनके घरों के बाहर होगी? राजदीप को मैं काफी समय से जानता हूँ, वो जो भी बोलते हैं बहुत सोच समझ कर बोलते हैं। जैसे कि एक बार उन्होंने कहा था कि संसद पर जब आतंकी हमला हुआ था तो उनकी आँखें चमक गई थीं क्योंकि वो तो गिद्ध हैं, ऐसे मौकों के इंतजार में रहते हैं।

अब आप मुझे बताइए कि एक मँजा हुआ पत्रकार, आखिर जब यह पूछने लगता है कि उसके घर के बाहर पुलिस भी होगी, तो आपको सोचना चाहिए कि कहीं आपके घरों के आगे सेना तो नहीं लगा दी जाएगी? आप तो छोटे लोग हैं, चलिए मैं थोड़ा बड़ा हूँ, मैं तो बच जाऊँगा, लेकिन सेना आ गई आपके घर तो? और सेना क्या पैदल आएगी? वो तो राफेल पर आएगी, टैंक ले कर आएगी, मिसाइल से लैस हो कर आएगी… और हाँ, अगर आप अल्पसंख्यक हैं, तब तो कपड़ों से आपकी पहचान होगी और आगे का आपको पता ही है!

तो हम क्या करें ऐसे बुरे दौर में?

अब सवाल उठता है कि हम इस खतरनाक दौर में क्या कर सकते हैं। हमें एकजुट होना ही होगा। हमें शाहीन बाग की तर्ज पर जगह-जगह इकट्ठा होना होगा और इस दमनकारी शासन की तानाशाही नीतियों के विरोध में आवाज बुलंद करनी ही होगी। आपने देखा होगा कि कैसे डीडी न्यूज के होते हुए भी सारे चैनलों ने न सिर्फ आधा घंटा लाइव दिखाया वो भाषण, बल्कि अगले दिन के आठ बजे तक उसी पर चर्चा भी करते रहे।

नहीं करेंगे, तो ऊपर से फोन आ जाएगा कि आपके यहाँ तो तीन ही बार दिखाया गया, आपके यहाँ तो स्पेशल बनाया ही नहीं। फिर आपको विज्ञापन नहीं मिलेंगे, और आपका धंधा चौपट हो जाएगा। यहाँ कुछ भी सीधे तरीके से नहीं होता, सब पीछे से चलता है। लेकिन इस सबसे ऊपर जनता है जिसे मैं कहता हूँ कि टीवी मत देखो, वो कहती है सर, हम तो बस आपके लिए देखते हैं। मैं कहता हूँ टीवी फेंक दो, वो कहते हैं हैशटैग, सर आपसे ही उम्मीद है।

व्हाट्सएप्प बंद कर लेता हूँ, मैंसेंजर पर मैसेज आते हैं। प्राइम टाइम करता रहता हूँ, तो कई कहता है कि देखिए सर आईटी सेल वाले आपको गाली देने पर तुल गए हैं। झबरा से कह कर हिट जॉब करवाता हूँ, लेकिन अजीत भारती मेरे ऊपर स्पेशल प्रोग्राम करना नहीं छोड़ता। मैंने सोचा लिखना ही कम कर देता हूँ, वो अब एक सप्ताह तक इंतजार करता है कि एक ही दिन बैठ कर प्रोग्राम बनाएगा!

इस स्थिति में वामपंथी, लिब्रांडू समूह में ही मेरी आस्था बची है। न्यूजलौंडी वाले झबरे ने मुझे बताया कि वो लोग एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाने वाले हैं जिसमें इस तानाशाही के खिलाफ योजना बनाई जाएगी कि किसे क्या करना है। मैं आपको बताने जा रहा हूँ कि आपको क्या करना है, कैसे करना है। सब ध्यान से सुनिए, और लोगों तक पहुँचाइए।

पहली बात तो यही है कि हमारा संविधान कहता है कि हमें सरकार के खिलाफ होना चाहिए, हमेशा। हर स्थिति में। सरकार जो बोले, उसका उल्टा करो, तभी लोकतंत्र समृद्ध होता है। आज जब बोला जा रहा है कि घर में रहो, तो मैं कहता हूँ आप सड़कों पर आइए, नाचिए, झूमिए, कंधे पर रेडियो ले कर आइए। कोई कहे कि थाली बजाओ, तो आप केले के पत्ते पहन कर बाहर आइए और पुरुष स्वच्छंदता के ब्रांड अंबेसडर बनिए। हाँ, ये ध्यान रहे कि आस पास किसी की बकरी न खुली हो, दिक्कत हो जाएगी। हें हें हें…

एक झा जी मेरे गहरे मित्र हैं, उन्होंने बड़ी गूढ़ बात कह दी है कि ये चौदह घंटों का आपातकाल टेस्टिंग है। अगर मोदी ने ये देख लिया कि ये सफल हो गया है, तो वो आपको कोरोना के नाम पर पूरे दिन घर में रहने बोलेगा, फिर पूरे सप्ताह, फिर पूरे महीने, फिर पूरे साल… ऐसा करते हुए वो आपको लगातार डराएगा कि बाहर में वायरस है। आप डरे रहेंगे, बाहर नहीं निकलेंगे।

उधर पता चलेगा कि चुनाव पर चुनाव हो रहे हैं, संविधान में संशोधन कर दिया गया और अगली बार के तीन आम चुनाव मोदी ने आपको घर में बंद कर के संघियों से वोट करवा कर पूर्ण बहुमत से जीत लिया। आप बाहर निकलेंगे तो बालमुकुंद पुतिन और जिनपिंग झा की तर्ज पर मोदी जी अगले बीस सालों तक के लिए प्रधानमंत्री सुनिश्चित हो चुके होंगे।

फिर पता चलेगा संविधान बदल दिया गया है। चूँकि, संसद में इन्हीं के लोग हैं, और अब तो जज भी राज्यसभा पहुँच रहे हैं (हें हें हें), तो सुप्रीम कोर्ट भी मुट्ठी में। फिर कहा जाएगा कि यहाँ सिर्फ अमीर लोग रहेंगे। एक दिन घोषणा होगी कि यहाँ सिर्फ वही लोग रहेंगे जो मंगल और गुरुवार को मुर्गा नहीं खाते, बल्कि बारह बजने का इंतजार करते हैं, तब तक तरी खाते रहते हैं।

आपके पैरों तले की जमीन किसी आईटीसेल वाले के नाम हो जाएगी जो मेरे प्रोग्राम के समय, जब आप फोन साइलेंट में करके मुझे देखते हैं, तब वो ‘हैशटैग रबिश कुमार’ ट्रेंड कराता है। फिर आपसे कागज माँगा जाएगा। आप कहेंगे आपके पास तो कागज है। लेकिन आपको ये हवा भी नहीं लगेगी कि जब तक आप जनता कर्फ्यू खेल रहे थे, यहाँ बता दिया गया कि सिर्फ आईटी सेल वाले लोगों की दस्तखत वाले कागज ही चलेंगे।

देख रहे हैं आप ये खेल? कैसे ‘गोली मारो’ कहने वालों को ये सरकार आपकी जमीन देने जा रही है? आप तब नहीं समझे थे जब मैंने कहा था कि सड़कों पर आओ और शाहीन बाग वाली बुजुर्ग आसमाँ के साथ खड़े हो जाओ। आपने सोचा था कि आपके पास तो कागज है, आपको क्या डर! अब कागज बदल दिया गया, अब वो आपके लिए आ रहे हैं।

झा जी ने इसीलिए प्रगतिशील चमन जी लोगों से कहा कि जनता कर्फ्यू नरेंद्र मोदी की गहरी चाल है। इस बहाने मोदी देश में इमरजेंसी लागू करना चाहते हैं। अगर यह सफल रहा तो देश में आपातकाल लागू कर दिया जाएगा। सभी सेकुलर प्रगतिशील चमन जी को इसका विरोध करना चाहिए। चमन जी एक दूसरे के साथ लिप लॉक करें और एक दूसरे के मुँह का लार अपने मुँह में लें।

बात समझिए, वरना देर हो चुकी होगी। और आपके कानों में जब-जब ‘देर न हो जाए, कहीं देर ना हो जाए, आ जा रे, आ जा मेरा मन घबराए, देर न हो जाए, कहीं देर न हो जाए’ गीत सुनाई देगा तो आप जो आँसू रोएँगे उसका नमक मोदी की संदूक में होगा, और पानी आप पी नहीं पाएँगे।

टीवी देखना बंद कीजिए, हजार बार कहा है। कल मेरी बात मान लेते तो आज ये दिन न देखना पड़ता। चलता हूँ, चलते रहिए, बाकी जे है से त हइए है… ऐ जी, ऊ नया वाला भोजपुरी गाना लगा दो ‘कॉल करें क्या, कॉले न की हो’… हैं? चलिए रहा है अभी तक? रिकॉर्ड हो रहा है क्या? ले लोटा! नमस्कार पर काटते हो? हद है यार… नमस्कार!

नोट: वामपंथी मगजमारी और बकलोल लोगों के लिए बोल्ड अक्षरों में बताया जाता है कि ये कटाक्ष है! न्यूजलॉन्ड्री के अभिनंदन सेखरी के लिए विशेष रूप से बताया जाता है कि हमने रवीश कुमार से फोन पर बात कर के कुछ भी कन्फर्म नहीं किया है। (पाठकों, ये आदमी ढहलेल है, इसलिए लिखना पड़ता है। कहा-सुना माफ करें।)

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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