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‘वैज्ञानिकों ने पेशाब से बना लिए स्पेस ब्रिक्स’: यूरिया को यूरिन लिखने वाले NDTV को IISC प्रोफेसर ने लताड़ा

असिस्टेंट प्रोफेसर आलोक कुमार ने NDTV की खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए 'स्पेस ब्रिक्स' बनाने में यूरिन के इस्तेमाल वाली खबर को नकार दिया। साथ ही उन्होंने मीडिया संस्थान को सलाह दी कि वो अपनी गलत हैडलाइन को तो बदले ही, साथ ही अपने कर्मचारियों को इतनी सैलरी दे कि वो प्रेस रिलीज को ठीक से पढ़ सकें। इसके बाद पहली सलाह को गंभीरता से लेते हुए NDTV ने.........

बेंगलुरु स्थित ‘इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस’ के एक अस्सिस्टेंट प्रोफेसर ने NDTV के प्रोपेगंडा की पोल खोली है। दरअसल, प्रोपगैंडाबाज मीडिया संस्थान NDTV ने भारतीय वैज्ञानिकों को बदनाम करने के लिए और उनके प्रयासों पर मिट्टी डालने के लिए जानबूझ कर गलत सूचना शेयर की, जिसके बाद उसे तगड़ी लताड़ लगी। NDTV ने खबर फैलाई थी कि भारतीय वैज्ञानिक मूत्र (यूरिन) से ‘स्पेस ब्रिक्स’ बना रहे हैं।

NDTV का दुष्प्रचार,वैज्ञानिकों को किया बदनाम

जबकि सच्चाई ये है कि ये वैज्ञानिक यूरिन नहीं बल्कि यूरिया से स्पेस ब्रिक्स बना रहे थे। इसके बाद ट्विटर पर रोज ज़हर की उलटी करने वाले अशोक स्वाइन ने तो यहाँ तक कह दिया कि मूत्र को लेकर भारत का जुड़ाव अब चाँद तक पहुँच गया है। बता दें कि लिबरल गिरोह अक्सर आयुर्वेद की निंदा करता है और इस चक्कर में गोमूत्र की आलोचना करता है। इसी क्रम में स्वाइन ने एनडीटीवी के खबर के हवाले से तंज कसा।

असिस्टेंट प्रोफेसर आलोक कुमार ने NDTV की खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए ‘स्पेस ब्रिक्स’ बनाने में यूरिन के इस्तेमाल वाली खबर को नकार दिया। साथ ही उन्होंने मीडिया संस्थान को सलाह दी कि वो अपनी गलत हैडलाइन को तो बदले ही, साथ ही अपने कर्मचारियों को इतनी सैलरी दे कि वो प्रेस रिलीज को ठीक से पढ़ सकें। इसके बाद पहली सलाह को गंभीरता से लेते हुए NDTV ने तुरंत हैडलाइन बदल डाली।

बिना जाने-समझे मजे लेने के लिए कूद पड़े अशोक स्वाइन जैसे लिबरल

आलोक कुमार ने एनडीटीवी की हैडलाइन और अशोक स्वाइन की प्रतिक्रिया की तुलना सर्कस से की। ऑपइंडिया से बात करते हुए आलोक कुमार ने बताया कि उन्होंने इस प्रक्रिया में यूरिया का इस्तेमाल किया है, जो कई स्रोतों से आता है। इस प्रक्रिया में आर्टिफीसियल एडिटिव का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने बताया कि कुछ रिसर्च लैब्स यूरिया के सोर्स के लिए यूरिन के अध्ययन की प्रक्रिया में लगे हैं।

बकौल आलोक कुमार, ऐसा इसीलिए किया जा रहा है ताकि अगर भविष्य में चाँद पर मानवों की कोई कॉलनी बसती है तो उनके मल-मूत्र का उपयोग भी कंस्ट्रक्टिव कार्यों के लिए हो सके। हालाँकि, लिबरल गैंग ने इसे मजाक में ले लिया। IISC की प्रेस रिलीज में भी कहा गया है कि यूरिया केवल इसका एक हिस्सा है। चाँद पर ‘ब्रिक लाइक स्ट्रक्चर’ के लिए ISRO और IISC ने साथ मिल कर काम किया था।

कई मीडिया संस्थानों ने चलाई खबर, सिर्फ NDTV ने हैडलाइन में की कारगुजारी

लोड लेने वाली संरचना बनाने के लिए इसमें लूनर मिट्टी के साथ-साथ अन्य सामग्रियों का इस्तेमाल किया गया है। हालाँकि, इसकी खबर प्रकशित करते समय NDTV ने PTI से सूचना ली थी लेकिन हैडलाइन में उसने खुद से कारगुजारी की थी। वहीं ‘द इकनोमिक टाइम्स’ ने भी PTI की ही खबर डाली लेकिन उसने हैडलाइन में गड़बड़ी नहीं की। इससे NDTV के असली इरादों का पता चलता है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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