बरखा जी, पीरियड्स को पाप और अपवित्रता से आप जोड़ रही हैं, सबरीमाला के अयप्पा नहीं!

अनभिज्ञता और अज्ञान से भरे इस आर्टिकल की नींव ही गलत अवधारणा को सार्वभौमिक सत्य मानकर डाली गई है। बरखा दत्त जी को ऐसे स्वीपिंग जनरलाइज़ेशन की जगह कम से कम एक वैसे व्यक्ति से बात करनी चाहिए थी जो दूसरी तरह से इसे देखता है।

बरखा एक सुंदर-सा नाम है जिसका अर्थ है वर्षा या बारिश। बारिश की प्रक्रिया बहुत ही रोचक होती है। धरती का पानी किसी भी रूप में हो, चाहे वो गंदा नाला हो, नदी हो, समुद्र हो, पोखर हो या झील, गर्मी के कारण वाष्प बनकर, तमाम गंदगी को त्यागकर अपने शुद्ध रूप में, आसमान में पहुँचता है। वहाँ शीतलता के कारण वो बादल बनता है, फिर वही पानी बनकर हम पर वापस बरसता है। ये होती है बरखा!

ये नाम मुझे इसलिए याद आया क्योंकि भारत की मशहूर पत्रकार हैं बरखा दत्त जो अमेरिका को बराबर याद दिलाती हैं कि हमने इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाया, तुम्हारे यहाँ आजतक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बनीं। ये बात उनके उस आर्टिकल में दिखी जिसे उन्होंने ट्विटर के माध्यम से शेयर किया है और कहा है कि आइए और असहमति जताइए।

इस आर्टिकल के शीर्षक से लेकर अंत तक कई जगह कॉन्सैप्चुअल ग़लतियाँ हैं, जो नहीं होनी चाहिए थी क्योंकि बरखा तो वो है जो तमाम प्रदूषणों को तज कर शुद्ध, शीतल जल बनकर आती है। यहाँ बरखा ने जो लिखा है वो मानसिक प्रदूषण का वैयक्तिकरण है क्योंकि लिखने वाले को इतनी मेहनत तो करनी चाहिए कि वो जिस विषय पर लिख रही है, उसके बारे में अपनी अवधारणाओं और पूर्वग्रहों से बाहर निकलकर कुछ सोचने की कोशिश करे!

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बरखा दत्त ने ऐसा कुछ नहीं किया, बस पहले पैराग्राफ़ से एक गलत सोच को सार्वभौमिक सत्य और सनातन धर्म का निचोड़ मानकर ऐसे समाँ बाँधा कि लेफ़्ट-लिबरल आह-वाह करते पगला गए होंगे। वाशिंगटन पोस्ट के ‘ग्लोबल ओपिनियन’ स्तम्भ में शीर्षक से ही बरखा जी ने क्रिएटिविटी और अपनी नासमझी दोनों का परिचय दिया है। ‘स्टेन्स’ शब्द पर किया गया खेल रोचक ज़रूर है, लेकिन जैसा कि वोल्टेयर ने कहा है, ‘अ विटी सेईंग प्रूव्स नथिंग’, तो उस शब्द से साबित कुछ नहीं हुआ।

बरखा दत्त के विचारों के मूल में जो बात है, वो यहाँ आकर शुरु और ख़त्म हो जाती है कि “menstruation should not bar us from praying at a temple”। मतलब, माहवारी या पीरियड्स के लिए किसी भी महिला को मंदिरों में पूजा करने से रोका नहीं जाना चाहिए। ऊपर से यह कथन बिलकुल सही लगता है, तर्कसंगत भी कि आज के दौर में ऐसी बातों की कोई जगह कैसे है?

लेकिन बात ‘अ टेम्पल’ की नहीं है, बात है ‘द टेम्पल’ की। अंग्रेज़ी का थोड़ा बहुत ज्ञान मुझे भी है, इसलिए पता चल जाता है कि बुद्धिजीवी जो ढेला फेंक रहे हैं, वो कहाँ गिरेगा। एक अक्षर से आपने जेनरलाइज़ कर दिया कि महिलाओं को पीरियड्स के कारण पूजा करने से मंदिरों में रोकना ग़लत है, लेकिन आप यह तो बताइए कि कितने मंदिरों में, और क्यों?

आगे बरखा जी ने लिखा है कि ‘मायथोलॉजी के अनुसार’ स्वामी अयप्पा, जो कि वहाँ के देवता हैं, वो ‘एक बैचलर थे’ इसलिए उन्होंने नियम बनाए कि उनके यहाँ कौन आकर आशीर्वाद ले सकता है। बरखा जी, हम लोग एक विचित्र देश में रहते हैं। विचित्र इस कारण कि आप इस देवता के मंदिर में जाने का ढिंढोरा दुनिया भर में भारतीय महिलाओं के प्रोग्रेस पर धब्बे के रूप में दिखा सकती हैं, लेकिन आपको और धब्बे नहीं दिखते।

दूसरी विचित्र बात यह है कि इस देश में मंदिरों के देवी-देवता को ‘लीगल पर्सन’ का दर्जा मिला हुआ है। जैसे कि आपको शायद ज्ञात होगा, और आपने अनभिज्ञता में उसे ज़रूरी नहीं समझा हो, कि अयोध्या केस में ‘रामलला’ भी एक पार्टी है जिसे सुप्रीम कोर्ट तक स्वीकारती है। उसी तरह, अयप्पा स्वामी भी अपने परिसर में कौन आए, न आए उसी तरह डिसाइड कर सकते हैं जैसे कि आप, अपने घर के लिए करती हैं। घर तो छोड़िए, आपके टाइमलाइन पर कोई कुछ बोल देता है तो वो ट्रोल कह दिया जाता है।

आखिर मूर्ति और मंदिर को पत्थर से ज़्यादा क्यों मानते हैं हिन्दू?

जो लोग ईश्वर को मानते हैं, वो मंदिरों को मानते हैं, वो उन बातों को भी मानते हैं जो जानकार पुजारी या शास्त्र बताते हैं। जैसे कि हनुमान की उपासना महिलाएँ कर सकती हैं, पर आप उन्हें छू नहीं सकती। इसके पीछे तर्क यह है कि बजरंगबली की प्राण-प्रतिष्ठा किसी मंदिर या पूजाघर में होने के बाद उनमें उस देवता का एक अंश आ जाता है, और हमारे लिए पत्थर की मूर्ति देवता हो जाती है। जब आप मूर्ति को देवता मानते हैं, और प्राण-प्रतिष्ठा कराकर स्थापित करते हैं, तो आप यह नहीं कह सकते कि मैं तो नहीं मानती कि हनुमान को छूने से उनका ब्रह्मचर्य नष्ट हो जाएगा।

उसी तरह सबरीमाला में जो देवता हैं, उनकी प्रकृति ब्रह्मचारियों वाली है, और आप वहाँ, वहाँ के स्थापित नियमों के साथ छेड़-छाड़ करके जा रही हैं, तो आपको मनोवांछित फल नहीं मिलेगा। यहाँ आप सामाजिक व्यवस्थाजन्य जेंडर इक्वैलिटी की बात को ग़लत तरीके से समझने की कोशिश कर रहे हैं। क्योंकि अगर यहाँ स्त्रियों का जाना वर्जित नहीं रहा तो क्या मूर्ति के पास बैठकर मांसाहार सही होगा? वहाँ क्या जूठन फेंक सकते हैं? क्योंकि मांसाहार तो संविधान प्रदत्त अधिकार है कि हमारी जो इच्छा हो, हम खा सकते हैं। यहाँ मंदिर को आप एक स्थान मात्र नहीं, देवस्थान मानते हैं इसलिए आप उसके नियमों को भी मानते हैं कि यहाँ मांसाहार वर्जित है। कल को संवैधानिक अधिकारों के नाम पर मंदिर में मांस ले जाना भी सही कहा जाएगा क्योंकि बस स्टेशन में तो मना नहीं होता!

उसके बाद बरखा जी ने “institutional weaponization of bigotry against women” का ज़िक्र किया है जिसका मतलब उतना ही ख़तरनाक है जितनी अंग्रेज़ी के ये भारी-भरकम शब्द। कुल मिलाकर मैडम यह कह रही हैं कि व्यवस्थित तरीके से महिलाओं के साथ भेदभाव करने का हथियार तैयार कराया जा रहा है! जी! कल को इसी तर्क से पुरुषों के ट्वॉयलेट महिलाओं को न घुसने देने की बात भी व्यवस्थित तरीके से महिलाओं के साथ भेदभाव की संज्ञा दी जा सकती है? जब एबसर्ड बातें ही करनी हैं, तो ये भी सही!

बरखा दत्त को न तो हिन्दू धर्म के बारे में पता है, न ही वो ऐसी कोशिश करती दिखती हैं। क्योंकि मैंने कोशिश की तो मुझे वैसे लोग मिल गए जो इस पर शोध कर चुके हैं, या इस विषय की अच्छी समझ रखते हैं। हो सकता है वो बेकार ही लोग होते, जिन्हें बरखा दत्त समझ नहीं पाती, यही कह देतीं कि कुतर्की है, लेकिन कोशिश तो कर लेती! उन्होंने नहीं की।

क्या कहते हैं इस विषय पर जानकार

मैंने नितिन श्रीधर नाम के एक लेखक से बात की जिन्होंने सबरीमाला और पीरियड्स को लेकर एक पुस्तक लिखी है जिसमें तमाम समाजों और संस्कृतियों में इसकी अवधारणा को लेकर बात की गई है। उन्होंने बरखा दत्त के आर्टिकल को पढ़ने के बाद संक्षेप में यह कहा:

“बरखा दत्त का लेख सिर्फ़ इसलिए ग़लत नहीं है कि वो हिन्दू संस्कृति की इन बुनियादी बातों से अनभिज्ञ हैं जैसे कि मंदिर ऊर्जा का एक केन्द्र होता है, न कि घूमने-फिरने की जगह; या यह कि मंदिर में उस देवता का एक विशिष्ट तत्व और विशिष्ट ऊर्जा का वास होता है, जिसे सुरक्षित रखना ज़रूरी है; बल्कि इस स्तर पर भी उनके लेखन में समस्या है कि वो पश्चिमी संस्कृति के ईसाई मत में पीरियड्स को लेकर फैली भ्रांतियों को हिन्दू धर्म पर थोप रही हैं।

हिन्दू धर्म में माहवारी या पीरियड्स को ‘अशौच’ कहते हैं जिसका ‘नैतिक पतन’ से कोई वास्ता नहीं। ये किसी भी तरह से किसी पाप की तरफ़ इशारा नहीं करता। हिन्दू धर्म में अशौच का मतलब बस इतना है कि रजस्वला स्त्री ‘रजस्’ की ऊँची अवस्था को प्राप्त है। यहाँ ‘रज’ का तात्पर्य रक्त से है, और ‘रज’ को राजसिक ऊर्जा भी कहते हैं। ‘रज’ ही ‘रजोगुण’ भी है।

यही कारण है कि जब आप ‘रजस्’ की ऊँची अवस्था में होते हैं तो आप धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने या मंदिरों में जाने की स्थिति में नहीं होते। जब पीरियड्स के लिए ‘अशौच’ का प्रयोग होता है तो उसका मतलब बस यही है। पीरियड्स को अशुद्धता से जोड़ने की बात ईसाई मत में है जहाँ इसे ईव के पतन से जोड़कर देखा जाता है। उनके लिए पीरियड्स में होना पाप की स्थिति में होने जैसा है। ये हमारा दुर्भाग्य है कि भारतीय लोग पश्चिमी संस्कृति की इन बातों का अंधानुकरण करते हैं, और फिर उन्हें हिन्दू परम्पराओं के साथ मिलाकर कुछ का कुछ बना देते हैं।”

बरखा दत्त चाहतीं तो इसके दूसरे नज़रिए को देख पातीं क्योंकि वो एक पत्रकार हैं, राजनेता नहीं कि उन्हें विचारधारा के खूँटे में बँधे रहने की बाध्यता है। केरल के ही क़रीब छः मंदिर ऐसे हैं जहाँ पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। दुर्गा को सिंदूर सिर्फ़ महिलाएँ ही लगा सकती हैं। कामख्या मंदिर के बारे में मैं क्या लिखूँ जहाँ रजस्वला होती देवी की उपासना होती है क्योंकि बरखा दत्त की बुनियाद ही हिली हुई है जहाँ वो ‘अ टेंपल’ कहते हुए भारत के हर मंदिर में रजस्वला लड़की के जाने पर प्रतिबंध की बात ‘ग्लोबल ओपिनियन’ में रख रही हैं।

आर्टिकल का अंत झूठ और अनभिज्ञता की बुनियाद पर खड़े लेख के अंत होने के नैसर्गिक तरीक़े से ही होता है जहाँ वो कहती हैं कि औरतों की उपलब्धियों का जश्न मनाने की हर बात बेकार है अगर ये माना जाता रहे कि “female blood is a social blot” (स्त्री का ख़ून समाज पर लगा कलंक है)।

अपने आप को वो एक जगह नारीवादी भी बताती हैं जो कि कोई बुरा काम नहीं है लेकिन अगर वो नारीवाद को समझ पातीं तो उन्हें इस बात का अहसास होता कि नारीवाद, नारी के पुरुष बनने की कोशिश नहीं है, बल्कि नारीवाद नारियों को समान अवसर देने की बात है। साथ ही, कोई भी ‘वाद’ सामाजिक या धार्मिक दायरे से बाहर नहीं हो सकता क्योंकि हम इसी समाज का हिस्सा हैं, जो आप चाहें, या न चाहें, धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से चलता है।

जो मान्यताएँ ग़लत हैं, उन्हें हम नकारेंगे। कोई परम्परा है जो कि स्त्री की स्वतंत्रता का हनन करती है, तो उसका विरोध होना चाहिए लेकिन स्त्री की स्वतंत्रता का ये बिलकुल मतलब नहीं है कि आप ज़िद करके एक बड़ी जनसंख्या के धार्मिक अनुष्ठान को सिर्फ़ इसलिए भंग करने पर तुली हैं क्योंकि उसके कुछ नियम आपकी समझ से बाहर हैं।

अंत में, बरखा जी, मंदिर वो जाते हैं जिनकी आस्था है भगवान में। मंदिरों को पर्यटन स्थल की तरह देखने के लिए भी लोग जाते हैं, उस पर मनाही नहीं है। लेकिन किसी दूसरे की धार्मिक मान्यताओं का हनन सिर्फ़ इसलिए करना क्योंकि आप कर सकती हैं, सर्वथा अनुचित है। मैं चाहूँगा कि आप इस धर्म को समझने की कोशिश करें, कुछ जानकार लोगों से बात करें, अपने आप को अंतिम अथॉरिटी मानने की कुलबुलाहट पर नियंत्रण रखें और दूसरों को सुनने की कोशिश करें।

चूँकि आप गोमांस खा सकती हैं, तो क्या कल आप संविधान के मौलिक अधिकारों का हवाला देकर किसी मंदिर के गर्भगृह में बैठकर गोमांस खाएँगी? क्योंकि आपके तर्क के अनुसार आप ‘ग्लोबल ओपिनियन’ वाले स्तम्भ में यह भी लिख सकती हैं कि इक्कीसवीं सदी के भारत में मंदिरों में मन का भोजन खाने पर पाबंदी हैं। आपको शायद पता न हो, पर कुतर्क इसी को कहते हैं। आप अगर चाहें तो सबरीमाला पर अपने दस मिनट इस लेख पर दे सकती हैं, क्या पता नए आर्टिकल के लिए किसी ‘बिगट’ के कुछ शब्द आपको स्ट्राइक कर जाएँ!

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