Saturday, September 19, 2020
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हिन्दी चैनलों के एंकर: लिखना नहीं आता, उदासीन, नाटकीय, यथास्थिति को स्वीकारने वाले

कभी सोचा है कि हिन्दी चैनलों के एंकर इतने बेकार क्यों हैं? 'मैंने तो न्यूज देखना बंद कर दिया है' क्यों कहते हैं लोग? आखिर चालीस साल पुराना फॉर्मेट कैसे चल रहा है न्यूज चैनलों पर?

एक स्क्रीन है, उस पर रंग-बिरंगी आयताकार पट्टियाँ आपको विचित्र तरह की बातें ऐसे बता रही हैं, जैसे वो बातें उस क्षण में जानना अत्यावश्यक है। एक चेहरा उभरता है, वो अमूमन इस भाव को लिए हुए होता है जैसे कुछ हो गया है, और कुछ लोग जिम्मेदार हैं जिन पर जिम्मेदारी डालनी सबसे ज़रूरी काम है। वो चेहरा बहुत धीरे-धीरे, लेकिन अतिगंभीर भंगिमा के साथ, एक-एक शब्द चबाता हुआ कहता जाता है। वो कहीं रुकता भी तो है तो एक नाटकीयता के साथ।

चेहरा तीन से चार मिनट तक में डेढ़ से दो मिनट में पढ़ा जा सकने वाला स्क्रिप्ट पढ़ता है। फिर कुछ और चलते चित्र उभरते हैं, पीछे से गंभीर आवाज आपको बताती है कि हर चीज के होने के पीछे कोई साजिश है, या कुछ तो गड़बड़ चल रहा है। उसके बाद दो से ले कर बारह की संख्या तक में ‘गेस्ट’ अपने-अपने चौकोर डब्बों में अपनी उपलब्धियों के दो शब्दों में कैद हो जाते हैं और इंतजार करते हैं कि या तो वो चेहरा उनसे चिल्लाते हुए सवाल करे, या उन्हें किसी दूसरे चिल्लाते चेहरे के साथ लगा दे कि ‘ज-व्वाब दीजिए उनके स-व्वालों का’। फिर खूब शोर होता है। ऐसा चौबीस घंटे चलता है। चेहरे बदलते हैं, लोगो बदलता है, टेम्पलेट बदलता है, आवाज बदलती है, लेकिन जो हो रहा होता है, वो ऐसे ही होता है।

हर दूसरा आदमी, एक-दूसरे से यही कहता पाया जाता है कि ‘मैंने तो अब टीवी पर न्यूज देखना छोड़ दिया है।’ ये स्थिति खराब कही जानी चाहिए। लोगों को जिस सूचना तंत्र पर विश्वास था, उन्हें वहाँ से कुछ भी ऐसा नहीं मिलता कि उनके ज्ञान में वृद्धि हो सके। हम समाचार चैनल क्यों देखते हैं? आज के दौर में जब खबरें ट्विटर, या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, या ऑनलाइन माध्यम पर ब्रेक होती हैं, तो टीवी पर एक आम आदमी क्यों जाता है?

टीवी पर न्यूज के लिए क्यों जाते हैं हम?

टीवी पर हम तब जाते हैं जब हमें किसी विषय पर ज्यादा चाहिए। हमें विश्लेषण चाहिए, विषय पर अपनी वैचारिक स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए, जानकारी के लिए, या इसलिए भी कि कहीं चर्चा हो तो हम क्या बोलें। ये विश्लेषण हम तक कौन लाता है? सोशल मीडिया पर भी लोग लिखते हैं, लेकिन वहाँ आपको एक्टिव हो कर खोजना पड़ेगा, पढ़ना पड़ेगा। टीवी पर आपको पता है कि इस चैनल पर, ये आएँगे और बताएँगे कि क्या हुआ है।

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लेकिन वास्तव में ऐसा हो नहीं रहा। हिन्दी न्यूज चैनलों की बात की जाए तो लगभग सारे चैनलों ने मान लिया है कि एक न्यूज डिबेट का फॉर्मेट वही है जो अमेरिका बीस साल पहले त्याग चुका है। उन्होंने कभी पहले के फॉर्मेट से बाहर जाने की बात सोची ही नहीं। पाँच से सात मिनट उस घंटे के न्यूज बताने में निकल जाते हैं, फिर पाँच-सात मिनट विषय की भूमिका बाँधने और अपनी समझ से चर्चा को दिशा देने की जगह ‘क्या हुआ, कब हुआ, कहाँ हुआ’ बताने में बर्बाद किए जाते हैं, फिर जो एंकर ने अभी बताया है, उसी को एक विडियो के ज़रिए बताया जाता है, फिर बाकी का काम शोरगुल में हो जाता है।

ये फॉर्मेट अब बेकार हो चुका है। न्यूज चैनलों को कुछ नया सोचना चाहिए। जब सूचनाओं के आने का, पहुँचने का, ग्रहण करने का तरीका बदल चुका है तो फिर टीवी अभी तक चालीस साल पुराने फॉर्मेट पर क्यों घूम रहा है? आखिर, दर्शकों को यह क्यों कहना पड़ रहा है कि उन्होंने टीवी पर न्यूज देखना बंद कर दिया है? वो भी उस स्वर्णिम दौर में जब व्यक्ति टीवी जेब में ले कर घूमता है।

जब दर्शक बढ़ रहे हैं, उनका जन्म बिलकुल ही अलग समय में हुआ है, तब न्यूज वाले उनके दादा की जवानी के शो क्यों चला रहे हैं? याद कीजिए कि चौबीस घंटे का न्यूज टेलीविजन जब से आया है, आपने न्यूज डिबेट में क्या बदलाव देखे हैं? आपको याद नहीं आएगा। मेरे पास कुछ समाधान और विकल्प हैं, लेकिन श्रीमान जोकर जी ने कहा है कि आप अगर किसी कार्य में अच्छे हैं, तो उसे कभी भी मुफ्त में न करें।

कारण क्या हैं?

एक कारण जो सबसे सीधा है कि हिन्दी के एंकरों का लिखना नहीं आता। वो हमेशा किसी भी विषय पर छिछले ट्रीटमेंट के साथ, अपना एक घंटा निकाल कर भागना चाहते हैं। अपने काम को अगर आप इन्ज्वॉय नहीं करते तो आप उसकी बेहतरी के लिए कदम उठाना छोड़ देते हैं। आप रिसर्च के नाम पर आँकड़े तो ले आते हैं, लेकिन उन आँकड़ों को आज को परिप्रेक्ष्य में रख नहीं पाते। आप बता नहीं पाते कि इन आँकड़ों से किसी के जीवन पर क्या असर पड़ेगा। वो महज संख्या बन कर स्क्रीन पर आते और चले जाते हैं।

जब तक एंकर एक मेकअप से पुते हुए चेहरे से आगे नहीं जाएँगे, अपनी अहमियत नहीं समझेंगे, तब तक वो एक काम को ढोते रहेंगे। लिखने के लिए जानना ज़रूरी है, अध्ययन करना आवश्यक है, परिस्थितियों के हिसाब से उसका संबंध बिठाने की क्षमता चाहिए, तब जा कर आप चार मिनट में उतना बोल देंगे जितना कोई आठ मिनट में नहीं बता सकता। लेकिन, एक फॉर्मेट बना हुआ है, एक मुद्दा पकड़ना है, कैमरे के सामने बैठना है, कॉपी-पेस्ट करके कुछ भी लिखना है, टेलिप्राम्प्टर चल पड़ता है, आप पढ़ देते हैं।

ये एंकर अपने लिखे हुए शब्दों से अनासक्ति के भाव में होते हैं। लगता है कि उन्हें मतलब ही नहीं कि वो जो पढ़ रहे हैं, उसे कितने लोग देख रहे हैं और क्यों देख रहे हैं। यहाँ दर्शक यह सोच रहा है कि वो टीवी पर है, वो ज़्यादा जानता है और हमारे एंकर हैं कि इन सब दुनियावी बातों से दूर, निर्मोही बने, शब्दों को पढ़ कर, उन्हें बोल कर, तमाम भाव अभिव्यक्त करते हुए, लेकिन भीतर से भावहीन बने, चले जाते हैं। आपके पास कुछ नहीं होता उस एक घंटे के बाद।

24 घंटे चलने की मजबूरी और मुद्दों का अभाव

अंग्रेजी में एक शब्द है: कंटेंटलेसनेस। यानी, सामग्री के अभाव की स्थिति। भारत बहुत बड़ा देश है, बहुत सी बातें होती रहती हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप सुबह के छः बजे से रात के ग्यारह तक, हर घंटे, कुछ न कुछ उठा लेंगे और बताएँगे कि कहीं, कुछ हो रहा है। ये कोई रुचिकर बात नहीं है। किसी दिन कई बड़ी खबरें आती हैं, किसी दिन आपके लिए सबसे बड़ी खबर किसी घोड़े की टाँग टूटना हो जाता है, तो किसी दिन आप इंटरनेट पर वायरल हो रहे किसी मीम पर आधे घंटे निकाल देते हैं।

आखिर जून की गर्मी में ‘आजादपुर में गिरी बर्फ’ का स्पेशल कोई चैनल क्यों चलाता है? क्या सोचा होगा उसके प्रोड्यूसर ने? उस आवाज देने वाले ने क्या सोचा होगा जो सायकिल के करियर पर रखी बर्फ की सिल्ली के सड़क पर गिरने को ‘आजादपुर में बर्फ गिरी’ कह कर चला रहा होगा? ऐसा करना रचनात्मकता का नमूना तो है, लेकिन ऐसी क्रिएटिविटी पूरे उद्योग को हास्य का पात्र बना देती है।

अगर एंकर और उनकी टीम घंटे-दो घंटे भर की मेहनत कर लें, तो हर मुद्दे पर वो दर्शकों को काफी जानकारी दे सकते हैं। अगर मैं ये काम आराम से कर सकता हूँ, तो करोड़ों का टर्नओवर दे रहे मीडिया संस्थान संसाधन समृद्ध भी हैं, और उनके पास टीम भी होती है, वो इसे और भी बेहतर तरीके से कर सकते हैं।

लेकिन, ‘चल रहा है’, ‘ये तो काम कर ही रहा है’ वाला एटीट्यूड इस पूरे उद्योग को उसी मोड़ पर रखे हुए है, जिसे इसे बीस साल पहले मुड़ कर छोड़ देना चाहिए था। टीवी पर होने वाली चर्चाओं में बेहतरी के इतने स्कोप हैं कि अगर लोग बैठ कर थोड़ा सोचें, दर्शकों में आए बदलाव को पढ़ें, उनकी राजनैतिक जागरूकता को समझने की कोशिश करें, तो उन्हें रास्ता खुद ही दिखने लगेगा।

टीवी अपने कम्फर्ट जोन को छोड़ने को तैयार ही नहीं है। जबकि हर चैनल को, दिन के एक घंटे पूरी तरह से प्रयोगधर्मिता के लिए छोड़ देना चाहिए। उन्हें आलस्य को त्याग कर, यह सोचना चाहिए कि इस मुद्दे को कितने नज़रिए से दिखाया जा सकता है, इसके लिए किस-किस को जोड़ना सही होगा, इसे दिखाने के लिए कौन-सा माध्यम बेहतर होगा, क्या इस मुद्दे को आधे घंटे की चिल्ल-पों से अलग भी दिखाया जा सकता है?

लोग उब चुके हैं, मैं अपने धंधे में ठहराव से बोर हो गया हूँ

यूट्यूब के जमाने में अगर कोई एक व्यक्ति, दिन में एक वीडियो बना कर, बहुत कामचलाऊ एडिटिंग का सहारा ले कर, कुछ आँकड़े और तस्वीरें दिखा कर लाखों कमा रहा है, तो टीवी वालों को सोचना चाहिए कि उनके दर्शक कहाँ जा रहे हैं। इन स्वतंत्र लोगों को लाखों लोग देखते हैं, उनसे संवाद करते हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि उनका विश्वास टीवी से उठ चुका है।

जिस एकमात्र एंकर को लिखना आता है, वो उस क्षमता को एक व्यक्ति, पार्टी या विचारधारा से घृणा करने में लगाए हुए है। बाकियों को लिखना नहीं आता क्योंकि शायद वो अपने आप को महज एक चेहरा मानते हैं, जिन्हें कैमरे में देख कर नाटकीयता से पढ़ना ही बेहतर लगता है। जो स्वयं ही हीन भावना से, या हीन भावना के ही ग्लोरिफाइड रूप, सुपियोरिटी कॉम्प्लेक्स से ग्रस्त हों, उन्हें न तो सामने दिखता है, न आस-पास। वो अपने आप में भरे हुए, अपने अंदाज में चलते रहते हैं।

ऐसे लोगों से चर्चा में कुछ भी ग्राह्य प्रस्तुत करने की उम्मीद बचकानी है। ये आपको वही बताते रहेंगे, जो आप जानते हैं। इनके ‘जानकार’ स्क्रीन पर भी डब्बों में बंद रहते हैं और जब बोलते भी हैं तो शोर में उनकी बातें दब कर गायब हो जाती हैं। कुल मिला कर स्थिति बहुत खराब है एंकरों की। हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी पर भी यही बातें लागू होती हैं। चिल्लाने को सफलता की एकमात्र सीढ़ी या मंत्र मान लिया गया है। कहीं एक आदमी चिल्लाता है, कहीं पूरा चैनल ही हर बात पर चिल्लाता रहता है।

ऐसे में, दो-तरफा संवाद के दौर में, संवाद की संभावना नगण्य हो जाती है। आप जब इन चैनलों को देखते हैं तो धिक्कारते हुए देखते हैं कि ये लोग टीवी पर आखिर कर क्या रहे हैं! मेरे पास विकल्प हैं, समाधान भी, लेकिन श्रीमान जोकर जी ने कहा है कि आप अगर किसी कार्य में अच्छे हैं, तो उसे कभी भी मुफ्त में न करें।

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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