Tuesday, January 18, 2022
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तालिबान की ‘मोस्ट वांटेड’ सरकार, भारत के बुद्धिजीवी देख रहे प्रेस कॉन्फ्रेंस… उधर गिर गई बाइडन की रेटिंग

अफगानिस्तान जलेगा। अमेरिका चिंतित रहेगा। रूस कन्फ्यूज्ड दिखेगा। यूरोप अपने लिए भूमिका खोजेगा। पाकिस्तान राज करेगा। चीन माइनिंग करेगा। भारत के बुद्धिजीवी तालिबान के प्रेस कॉन्फ्रेंस देखेंगे। दुनिया व्यस्त हो जाएगी।

उधर बीस साला मेहनत के बाद अमेरिका डेमोक्रेसी और सभ्यता की स्थापना करके अफगानिस्तान से निकला तो इधर आई एस आई कैबिनेट स्थापना करने घुस गई। वैसे तो अशरफ गनी भी अफगानिस्तान से ही निकले पर वे क्या स्थापित करके निकले यह शोध का विषय है। मुझे विश्वास है कि शोध का यह काम तालिबान लड़ाके… सॉरी, तालिबान सरकार करके ही चैन लेगी। वैसे भी तालिबान का अर्थ विद्यार्थी होता है। ऐसे महत्वपूर्ण शोध के लिए विद्यार्थियों से अच्छा और कौन होगा? आशा है भविष्य में होने वाले इस शोध का परिणाम तालिबान प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताएँगे। 

लड़ने-भिड़ने से बोर होने के बाद एक ही काम बचा था और वह था सरकार बनाने का। सरकार बन गई। सरकार बनने की प्रक्रिया बड़ी पारदर्शी है। सबकुछ खुल्लम खुल्ला। न तो EVM हैक किए जाने का खतरा, न चुनाव आयोग के सामने धरना और न ही चुनाव प्रचार का झंझट। ब्राह्मण, राजपूत, दलित, महादलित, यादव, कुर्मी, ओबीसी, बीबीसी, सीवीसी वगैरह का भी लफड़ा नहीं। लड़ाकों की संख्या के आधार पर ताक़त और ताक़त के आधार पर सत्ता। सरकार बनी तो प्रधानमंत्री भी बनेगा ही। प्रधानमंत्री बने तो गृहमंत्री और रक्षामंत्री भी बनेंगे। 

हमारे समय के दार्शनिक और विचारक रवीश कुमार से शब्द उधार लें तो कह सकते हैं; बड़ी विडंबना है कि सरकार चलेगी शरीयत के अनुसार लेकिन स्ट्रक्चर रहेगा डेमोक्रेटिक।  

तालिबान ने बताया (प्रेस कॉन्फ्रेंस करके?) कि यह परमानेंट सरकार नहीं है। सरकार परमानेंट नहीं है तो प्रधानमंत्री भी ‘टेम्परवारी’ ही होगा। दुनिया भर के मन में सवाल उठ सकता है कि जब चुनाव वगैरह का लफड़ा नहीं है तो परमानेंट सरकार क्यों नहीं? इसका उत्तर विशेषज्ञ अपने अपने अनुमान से देंगे पर मुझे लगता है यह सोची-समझी नीति के तहत किया गया है। आई एस आई ने सोचा होगा कि कल को चीन से डॉलर लेते-लेते बोर हो गए और अमेरिका और ब्रिटेन से डॉलर पाउंड खेंचने की इच्छा हुई तो ज़म्हूरियत की स्थापना के लिए बाकी सूबों की तरह अपने पांचवें सूबे में भी इलेक्शन करवा के साबित कर दिया जाएगा कि पूरे पकिस्तान में डेमोक्रेसी है। 

उधर तालिबान सरकार बनी और इधर बाइडन की रेटिंग गिर गई। वैसे भी देखा जाय तो गिरने के लिए यही एक अमेरिकी चीज बची थी। गिर गई। यदि सैम पित्रोदा से शब्द उधार लें तो कहेंगे; गिरी तो गिरी। इतनी चिंता किसलिए? ये अमेरिकी सकल ब्रह्मांड में दो ही चीजों की तलाश में हलकान हुए फिरते हैं; डेमोक्रेसी और रेटिंग। इन्हें बाकी चीजों की चिंता बाद में होगी पर डेमोक्रेसी और रेटिंग की पहले। मुझे विश्वास है कि जंगल से गुजर रहे किसी अमरीकी के सामने अचानक शेर आ जाए तो वो उससे भी पूछा लेगा; अच्छा तुम्हारे जंगल में डेमोक्रेसी है या राजशाही। और अगर शेर ने जवाब में कहा कि; राजशाही है और मैं यहाँ का राजा हूँ तो अमेरिकी अगला सवाल पूछेगा; तुम्हारी रेटिंग क्या है? लास्ट क्वार्टर में ऊपर गई या नीचे आई? 

तालिबान सरकार बनी। तालिबान ने एफ बी आई के मोस्ट वांटेड सिराजुद्दीन हक्कानी को गृहमंत्री बना दिया। इसपर बाइडन सरकार ने चिंता व्यक्त कर दी है। क्या करे? व्यक्त करने के लिए बहुत कुछ है भी नहीं। वैसे भी किसी भी सरकार के मुखिया के लिए चिंता व्यक्त करना हर समस्या का हल है। कुछ नहीं कर सकते तो चिंता व्यक्त कर दो। मुझे तो लगता है कि बाइडन और उनके मुख्य सलाहकार के बीच काफी दिनों तक कुछ ऐसा वार्तालाप चलेगा।

बाइडन- हाँ, तो बताओ आज किस बात पर चिंता व्यक्त करनी है?

सलाहकार- चीन के विदेश मंत्री काबुल जा रहे हैं। ऐसे में एक बार आप अफगानिस्तान में चीन के रोल को लेकर चिंता व्यक्त कर देते तो आपकी रेटिंग में सुधार आ सकता है। साथ ही वो पंजशीर में आईएसआई के रोल पर भी चिंता व्यक्त कर दें तो इंडियन लॉबी में आपको थोड़ी क्रेडिबिलिटी मिल जाती। 

बाइडन- चीन के रोल पर चिंता व्यक्त करने के लिए मुझे थोड़ा टाइम दो। हंटर से कंसल्ट करना होगा। आई एस आई के रोल पर आज शाम की प्रेस कॉन्फ्रेंस में चिंता व्यक्त कर दूँगा। अभी हाल ही में दस मिलियन डॉलर दिया है पाकिस्तान में वीमेन एम्पावरमेंट के लिए। चिंता व्यक्त करना तो बनता है। कल किस बात पर चिंतित होना है?

सलाहकार- वो तालिबान कैबिनेट में एक भी महिला नहीं है। जेंडर इक्वलिटी पर चिंता व्यक्त करने का सही समय है। आपने चिंता व्यक्त कर दी तो डेमोक्रेट्स के एथिक्स को रिवाइव किया जा सकेगा। 

बाइडन- बेवकूफ है क्या? मेरी रेटिंग और गिर जाएगी। 

सलाहकार- तो फिर कमला मैडम से चिंता व्यक्त करवा दीजिए। उन्होंने बहुत दिनों से किसी बात पर चिंता व्यक्त नहीं की है। वे महिला भी हैं तो उनकी चिंता को दुनियाँ सीरियसली लेगी। वैसे भी अमेरिका सबसे पुरानी डेमोक्रेसी है। डेमोक्रेसी का सिद्धांत ही है कि सबको मिल बाँट कर चिंता व्यक्त करनी चाहिए। 

बाइडन- नहीं-नहीं, वह ये करेगी तो इससे उसकी रेटिंग बढ़ जाएगी। एक काम करो। स्टेट डिपार्टमेंट को बोलो कि वो इसबात पर चिंता व्यक्त करे कि तालिबान कैबिनेट में किसी महिला मंत्री का न रहना चिंता का विषय है। 

सलाहकार- वो एक बात और कहनी थी। 

बाइडन- हाँ हाँ, बोलो। 

सलाहकार- वो इल्हान ओमर चाहती है कि आप एक बार भारत में माइनॉरिटी के राइट्स को लेकर चिंता व्यक्त कर देते!

बाइडन- अरे, प्रेसिडेंट हूँ मैं, एनजीओ या न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट का कॉलम लिखने वाला नहीं। वैसे भी अभी फ्रीडम हाउस से…            

अफगानिस्तान जलेगा। अमेरिका चिंतित रहेगा। रूस कन्फ्यूज्ड दिखेगा। यूरोप अपने लिए भूमिका खोजेगा। पाकिस्तान राज करेगा। चीन माइनिंग करेगा। भारत के बुद्धिजीवी तालिबान के प्रेस कॉन्फ्रेंस देखेंगे। दुनिया व्यस्त हो जाएगी। 

 

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