Sunday, May 9, 2021
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बुद्ध-सारिपुत्र संवाद: राहुल गाँधी की विचित्र स्पीच, मायावती की बौद्ध बनने की धमकी और सत्य की खोज

अंबेडकर, गाँधी, बोस, भगत सिंह जैसा दिखने और बनने में अंतर है। कइयों का पूरा इतिहास, निजी और खानदानी, धूर्त संवादों, भ्रष्ट आचरण, आम नागरिकों के हिस्से की निधि लूटने, सत्ता के दुरुपयोग, निजी हितों को साधने में गया है लेकिन नाम में गाँधी लगाए फिरते हैं...

बुद्ध अपने एक शिष्य, सारिपुत्र, के साथ बरिस्ता में बैठे थे। जब तक बुद्ध ऑर्डर देने गए, सारिपुत्र ने उनका आइपैड निकाला और ट्विटर खँगालने लगा। वहाँ राहुल गाँधी और मायावती ट्रेंड कर रहा था। चुनाव का समय था तो ट्रेंड करना नैसर्गिक था। सारिपुत्र ने गूगल किया तो पाया कि श्रीयुत राहुल गाँधी ने धारावी के लोगों को बताया है कि वहाँ 50,000 उद्योग-धंधे बंद हो गए, और यह भी कि धारावी के लोगों के साथ अन्याय हुआ है। साथ ही, मायावती ने भी एक अजीब ऐलान कर दिया था, जिससे सारिपुत्र उद्विग्न महसूस करने लगे। तब तक गौतम वापस आ रहे थे, तो तुरंत ही आईपैड को झोले में डाल दिया।

“हे तथागत! इस राहुल गाँधी नामक जीव पर आपके क्या विचार हैं? आखिर यह व्यक्ति करोड़ों लोगों की उम्मीद कैसे बाँध देता है? एक हिस्सा इसे विदूषक कहता है, दूसरा इसे दो डिम्पलों वाला क्यूट प्राणी जिसमें भारत भूमि के नेतृत्व की प्राकृतिक क्षमता है क्योंकि इसके माता-पिता, दादी, परनाना आदि ने राष्ट्र के लिए बलिदान दिया दिया था। मीडिया भी उसी तरह से दो हिस्सों में बँटा हुआ है। क्या सही है, क्या गलत, कैसे विवेचना की जाए?” सारिपुत्र ने पूछा।

“मत-मतान्तर-वैभिन्य के कारण कहा-सुनी स्वीकार मत करो, गूगल को स्वीकार मत करो, अधीरता में यह ना मान लो कि यह ऐसा ही है, किसी कथन को इसीलिए सत्य ना मानो कि वह किसी वेवसाइट पर है, किसी ने कहा है, ना ही इसलिए की यह गुरू का वाक्य है,” बुद्ध ने समझाते हुए कहा। तब तक वेटर कॉफ़ी लेकर आ गया था, “कृपया ये व्हाइट शुगर ले जाइए, मैं सिर्फ ब्राउन लेना पसंद करता हूँ।” बुद्ध ने आग्रह किया तो वेटर ब्राउन शुगर लाने चला गया।

वेटर के जाते ही सारिपुत्र ने हैरत से कहा, “तो क्या वो भी ना मानूँ जो आप कहते हैं? आप तो स्वयं इतना घूम चुके हैं, हज़ारों लोग आपको मानते हैं। आपको मानने में क्या बुराई है?”

“देखो सारिपुत्र, मैं जो कहता हूँ वो मेरा सत्य है। लेकिन वो तुम्हारे लिए बिना अन्वेषण के ना तो परम सत्य है ना ही झूठ। सच और झूठ व्यक्ति-विशेष के दृष्टिकोण भर हैं। सबको पता है कि राहुल… राहुल तो वैसे मेरे पुत्र का भी नाम है लेकिन अब क्या कर सकते हैं, भूत में जा कर नाम परिवर्तन तो संभव नहीं… हाँ, मैं कह रहा था कि मीडिया में क्या चल रहा है, उसे सत्य मत मानो। उस जीव को सुनो कि वो कहना क्या चाहता है, उससे अर्थ का दोहन करो, उसके शब्दों को निचोड़ कर देखो कि सारतत्व क्या है?”

“परंतु भगवन!” सारिपुत्र ने काउंटर क्वेश्चन किया, “राहुल गाँधी के भाषणों से अर्थ निकालना तो थार के शुष्क बालू से जल की चाह रखने जैसा है! जिस व्यक्ति को स्वयं ही अपने शब्दों का सार पता न हो, जो पिछले साल से ही एक ही स्पीच लिए घूम रहा है, जिसमें वो जगह का नाम बदल कर, हर जगह के लोगों के साथ अन्याय होता बता देता है, जो हर जगह मेड इन दिस, मेड इन दैट की बातें करता है, ऐसी तथ्यहीन बातें करता है जिसे हास्यास्पद कहना भी उस मनोभाव का अपमान है, उस जीव को सुन कर भला कैसा सार ग्रहण करूँ स्वामी?”

“देअर यू आर!” तथागत ने सारिपुत्र की तरफ देखते हुए कहा, “तुमने यह कहाँ से जाना कि राहुल निरा मूर्ख, मंदबुद्धि या मूढ़मति है?”

“लोग कहते हैं…”

“यहीं फिर से तुम्हारा कथन त्रुटिपूर्ण है। लोग जो कहते हैं वो लोग कहते हैं, उसे सत्य मत मानो। उसे अपनी विवेचना का आधार मत बनाओ। तथागत स्वयं, यानी मैं, ये दावा अगर करें भी कि मुझे सब पता है तो वो बकवास माना जाना चाहिए। ये दावा तुमसे कोई भी करे तो ये मान लो कि वो सफ़ेद झूठ बोल रहा है। ये संभव नहीं कि तथागत सब बातें जान लें। आप खुद को जान लें, और खुद को संतुष्ट कर सकें वही समाज के लिए बहुत है।” तथागत ने कॉफ़ी का सिप लेते हुए सारिपुत्र को पीने का इशारा किया, “यॉर कॉफी इज़ गेटिंग कोल्ड ब्रो!”

भावविभोर होकर सारिपुत्र ने एक घूँट लिया और कहा, “हे प्रभु! मेरा मत है कि आपसे बुद्धिमान महात्मा न हुआ है, न है, न होगा।”

बुद्ध ने उत्तर में कहा, “निस्सन्देह सारिपुत्र, तो तुमने इसके पूर्व के समस्त बुद्धों को जान लिया होगा।”

“नहीं, स्वामी,” सारिपुत्र ने कहा, तो बुद्ध ने फिर पूछा, “तब क्या भविष्य के बुद्धों को जानते हो?”

“नहीं, महाराज,” सारिपुत्र ने फिर अपनी अनभिज्ञता दिखाई तो बुद्ध ने पुनः पूछा, “तब कम से कम मुझे जानते हो और मेरे मन को सम्पूर्णतया परख चुके हो?”

सारिपुत्र ने पुनः कहा, “वह भी नहीं स्वामी!”

फिर बुद्ध ने उन्हें देखते हुए पूछा, “तब सारिपुत्र, तुम्हारा कथन इतना पुष्पित और साहसपूर्ण क्यों है?”

अब सारिपुत्र के लिए गर्दन झुका कर कॉफी पीने के अलावा कोई रास्ता न था। बुद्ध बोलने लगे, “तुमने स्वयं ही अभी कहा कि राहुल गाँधी हर जगह एक ही बात बोलते हैं, जिस भी जगह रैली करते हैं उस जगह को बौद्धिक ज्ञान का केन्द्र कहते हैं, तथ्यहीन बातें करते हैं, स्वयं के ही सरकार द्वारा लाई गई बर्बादी को ऐसे बताते हैं मानो सत्तर सालों से कोई और सत्ता में था। इसका अर्थ यह हुआ कि तुमने स्वयं उस भाषण को सुना और अपनी सामान्य बुद्धि पर तौला। इसीलिए, दूसरे क्या कहते हैं, नैरेटिव क्या चल रहा है, काउंटर नैरेटिव क्या है, उसे त्याज्य मानो। स्वयं की बुद्धि की कसौटी पर जो सत्य जान पड़े, उसे ही सत्य मानो। लेकिन हाँ, मस्तिष्क को इतना खुला अवश्य रखो कि अगर कोई अलग तरह की बात कर रहा है, तो उसे सुन सको, और आवश्यकतानुसार स्वयं में सुधार ला सको। जैसे राहुल को ही देखो, रैली की जगह के हिसाब से स्पीच में उस जगह का नाम सुधार लेता है।”

“आपके वचनों को सुन कर मैं धन्य हुआ तात!” सारिपुत्र ने कृतज्ञ नयनों से गौतम को देखा और उनके तेजोमय आनन को देख कर स्वतः दूसरा प्रश्न पूछ बैठा, “तात! सुश्री मायावती का नाम तो आपने सुना ही होगा? उन्होंने आपकी पूज्य माता महारानी महामाया के नाम का सेतु भी बनवाया है और स्वयं उनका नाम भी माया ही है। वो भी आज कल ट्विटर आदि पर ट्रेंड कर रही हैं।

“चुनाव आने वाले हैं सारिपुत्र, अभी तो और भी विचित्र बातें होंगी। देवी माया ने वो सेतु हमारी माता की स्मृति में बनाया या स्वयं की, ये तो काल तय करेगा, परंतु यह संयोग तो देखो कि आज हमारी बातचीत के विषय में एक का नाम मेरे पुत्र का है, दूसरे का मेरी माता का… व्हाट अ टाइम टू बी अलाइव सारिपुत्र!”

“बात मात्र नामों तक ही नहीं है महात्मन! आज एक खबर है कि सुश्री मायावती सनातन धर्म को छोड़ कर बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर की तरह बौद्ध मत को स्वीकार कर लेंगी। साथ ही, उन्होंने यह भी बताया है कि उनके साथ लाखों लोग ऐसा करेंगे। इस पर आपकी क्या राय है?” सारिपुत्र ने पूछा।

“ऐसी दुर्घटनाओं पर क्या मत रखे जाएँ! अगर कोई अंबेडकर की तरह नीला रंग अपना कर वैसा बनने की सोचे तो वो मूर्खता ही है। गाँधी, बोस, भगत सिंह जैसा दिखने और बनने में अंतर है। दिखने के लिए तो बहुत बहुरूपिए हैं जो मनचाहा वेश धारण कर लेते हैं। कइयों का पूरा इतिहास, निजी और खानदानी, धूर्त संवादों, भ्रष्ट आचरण, आम नागरिकों के हिस्से की निधि लूटने, सत्ता के दुरुपयोग, निजी हितों को साधने में गया है लेकिन नाम में गाँधी लगाए फिरते हैं। ऐसे गाँधी अपने परिवार की लूट को पीछे रख कर, हमेशा राफेल-राफेल चिल्लाते हैं। कई बार, अपनी ही मूर्खता में, दूसरों पर दोष मढ़ते हुए स्वयं ही सत्य बता देते हैं।”

“ऐसे लोगों के लिए हिन्दी में एक शब्द है महात्मन!”
“उस शब्द का प्रयोग शास्त्रों में वर्जित माना गया है सारिपुत्र!”

“खैर, उस जीव को रहने दो,” बुद्ध बोलते रहे, “अब इस मायावती नामक जीव को ही देखो। जब तक एक जाति को दूसरे से लड़ा कर, भटका कर, झूठे वादों पर विश्वास दिला कर इनका काम निकलता रहा, तब तक ठीक था। आंदोलनों के नाम पर हिंसा और आगजनी से इनका इतिहास पटा पड़ा है। नाम मेरा लेते हैं और दूसरी ही पंक्ति में कहते हैं कि गरीब प्रतिकार कर रहा है तो फलाँ जाति को पीड़ा हो रही है। मैंने कब बताया कि प्रतिकार का दायरा इतना व्यापक कर दो कि उसमें दूसरों की हत्या भी एक आवश्यक तत्व मान लिया जाए? आज ये बौद्ध बनने जा रही हैं, बेशक बन जाएँ, भले ही मैंने स्वयं किसी को ऐसा करने को नहीं कहा। लेकिन ये बौद्ध दिखेंगी, बन नहीं पाएँगी। उसके लिए काष्ठ पात्र ले कर भिक्षाटन करना होता है। बौद्ध व्यक्ति भिक्षु होता है, उसे हजारों जोड़ी चप्पलें, लाखों के कपड़े, अपनी ही मूर्ति वाले करोड़ों के बगीचे और अरबों की संपत्ति नहीं चाहिए। बौद्ध बनना है तो सब त्याग दो, बौद्ध दिखना है तो वेल! दैट्स अनदर थिंग।”

“तो क्या आपको इस बात से तनिक भी प्रसन्नता नहीं है कि आपके अनुयायियों में लाखों की वृद्धि हो रही है? लोग तो संख्या ही गिनते हैं आज कल। क्या आपका जीवन, आपकी बातें सब मानने लायक नहीं? क्या महापुरुषों का अनुकरण ज़रूरी नहीं है क्योंकि ‘महाजनो येन गतः स पंथाः’ कहा गया है?” सारिपुत्र ने शंका प्रकट की।

“देखो सारिपुत्र, प्रथमतया मैं ‘लोग’ नहीं हूँ, न ही ‘लोग’ क्या करते हैं उनसे मैं प्रभावित होता हूँ। लोग तो एक पार्टी में चोर और दूसरी में साधु भी बन जाते हैं। ऐसे लोगों का क्या किया जाए! महापुरुष अनुकरणीय होते हैं लेकिन अंधानुकरण मत करो। कोई महापुरूष क्यों है, उसने ऐसा क्या किया ये सुनिश्चित करना बहुत ज़रूरी है इससे पहले कि तुम बाल मुँडवा कर उसके पीछे हो लो। ये जो धमकी दे कर दल या मत बदलने वाले लोग होते हैं ना, वो ‘महाजनो येन गतः स पंथाः’ वाले नहीं है। उनको न तो अपने महापुरूष का सत्य मालूम है, ना स्वयं अपना। वो अंधे हैं। उनके दोनों नेत्रों के साथ साथ, उनके ज्ञान चक्षु भी बंद पड़े हैं,” बुद्ध लगातार बोल रहे थे। उनकी कॉफ़ी ठंढी हो रही थी।

“जो सुप्तावस्था में हैं, जो व्हाट्सएप्प पर मैसेज पढ़ कर भीड़ की शक्ल में सड़कों पर मार-काट मचाने निकल जाते हैं, वो अपनी नींद में दूसरों के द्वारा संचालित हो रहे होते हैं। ये अनुकरण नहीं है। भीड़ को कहीं आना है, इसलिए वो वहाँ पहुँचा दी जाती है। उसे कह दो कि धारावी के साथ अन्याय हुआ है, वो मान लेती है। उसे कह दो यहाँ पचास हजार फैक्ट्रियाँ बंद हो गईं वो मान लेंगे। जब तंद्रा टूटेगी तो याद करेंगे कि आखिर वो पचास हजार फ़ैक्ट्रियाँ धारावी के किस इलाके में थीं, और कब, तो उन्हें याद नहीं आएगा।”

“मायावती बौद्ध बन जाएँ, जैन बन जाएँ, हज पर निकल लें या मानसरोवर जा कर धरने पर बैठ जाएँ, उससे उन्हें कोई फायदा नहीं होता दिखता, चाहे वैयक्तिक हो या राजनैतिक। क्योंकि जिन मुद्दों पर सुश्री मायावती जी ने इन गरीब, अशक्त, शोषित लोगों की भीड़ को सत्ता पाने के बावजूद गरीब, अशक्त और शोषित बनाए रखना ही सही समझा, उनकी गरीबी को कोई और दूर कर रहा है, उन्हें सुविधाजनक चिकित्सा कोई और दिला रहा है, उन्हें शोषण के कुचक्र से बाहर निकालने के लिए उनके सशक्तिकरण की कोशिश मायावती तो नहीं ही कर रही।”

“इसलिए, हे सारिपुत्र,” बुद्ध बोलते रहे, “ये जो मायाजाल रचा जा रहा है, वो ठगने के लिए है। माया पर तो कबीर ने भी लिखा है कि ‘माया महाठगिनी हम जानी, तिरगुन फाँस लिए कर डोले, बोले मधुरी बानी’। ये सब बस मधुर बातें करते हुए, गरीबों को उनकी गरीबी के कारण मूर्ख समझने की पुरानी कहानी है।”

यह भी पढ़ें: लोकतंत्र का लहसुन: रावण से रा.टू होने तक मायावती का मनुवादी होना ज़रूरी है

बुद्ध ने अपनी बात और कॉफी खत्म की, सारिपुत्र को भीम एप्प से भुगतान करने को कहा और झोला उठा कर यात्रा पर निकल गए।

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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