Friday, July 10, 2020
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फेक न्यूज वाले पत्थर-विज्ञानी गंजे ने बताई पत्थर से वॉलेट बनाने के 101 तरीके

'वॉलेट शब्द के मूल में वॉल है जिसका अर्थ है दीवार। यूँ तो आज-कल दीवार ईंट से बनती है, परंतु जिस कालखंड से इस शब्द की उत्पत्ति हुई है, तब सिर्फ पत्थरों से ही बनती थी। अतः, वॉलेट शब्द वस्तुतः पत्थर का पर्यायवाची है।'

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

पत्थर शब्द सुनते ही हमें पाषाण युग, पुरापाषाण युग और नवपाषाण युग से ले कर ‘पत्थर के सनम तुझे हम ने मोहब्बत का खुदा माना’ और ‘पत्थर के फूल’ की भी याद आती है। फिर पत्थरों से हमें पहाड़ों की याद आती है जिसके बारे में अमर उजाला ने बताया था कि ‘फलाने गाँव की नवयुवतियाँ होतीं हैं सबसे हॉट’ कह कर कई पहाड़ी नवयुवकों के आक्रोश का पात्र बना था। और हिमालय को तो हम सब जानते ही हैं जो कि पहाड़ों का राजा है, वो भी पत्थरों से ही बना है।

हालाँकि, कालांतर में एक कम बालों वाले जीव का भारतभूमि पर अवतरण हुआ और उन्होंने प्रस्तर एवम् शिला विज्ञान में अपने बेडरूम में मनोरंजन हेतु दैनिक कार्य पर रखे निजी हमसफर भालू से पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। कहा जाता है कि कई युगों के बीत जाने के पश्चात भी बेरोजगारी झेलते पाषाणविज्ञानी ने कलिकाल में दिल्ली नामक प्रदेश में घुँघराले बालों वाले एक जीव की मदद से सॉल्ट न्यूज नामक संस्था की आधारशिला रखी। देखिए, आधारशिला में भी पत्थर होता है।

इसी समय, भारत के कई प्रदेशों में एक खास तरह के लोगों में पत्थर को ले कर उत्सुकता हुई। हालाँकि, इस कालखंड में जहीर खान से ले कर जसप्रीत बुमराह और मोहम्मद शमी जैसे लोग अपने हाथों से अपने देश का नाम क्रिकेट नामक क्रीड़ा में ऊपर ले जा रहे थे, परंतु कुछ नवोन्मेषी लम्पटाधीशों द्वारा इन खास तरह के लोगों को हाथ का एक तीसरा इस्तेमाल भी बताया गया।

कहते हैं कि शिव और शारदा से ले कर बौद्ध दर्शन के केन्द्र रहे, कश्यप मुनि की धरती कश्मीर में नवजात शिशुओं से ले कर प्रौढ़ पुरुषों तक को पत्थर का यह उपयोग बताया गया। उपयोग में यूँ तो सतही तौर पर कोई प्रक्षेपण विज्ञान नहीं था, लेकिन एक खास तरह के स्कूल में पत्थरों के प्रक्षेपण की तकनीक विकसित की गई और उसे पूरे देश में प्रसारित किया गया। वैसे, इस विषय पर विद्वानों में मतभेद है कि पत्थर प्रक्षेपण की तकनीक भारत से अरब में गई, या अरब से भारत में आई।

इस तकनीक में हाथों के अलावा कपड़े के एक टुकड़े का गले में लटका होना अत्यंत ही आवश्यक या अपरिहार्य बताया गया था। हमने जब एक पाषाण प्रक्षेपण विज्ञानी से इस विषय पर चर्चा की तो उन्होंने बताया, “देखिए अजीत जी ब्रो! थीटा-बीटा वाला हिसाब लगाएँगे, या त्रिकोणमीति का प्रयोग करेंगे तो आप पाएँगे कि रुमाल से शरीर को मदद की जगह उल्टे एयर रेजिस्टेंस यानी वायु प्रतिरोधन से प्रक्षेपण की गति कम ही करता है। परंतु, यहाँ आप जिस बात की सामान्यतः उपेक्षा कर देते हैं वो यह है कि यही रुमाल जब प्रक्षेपक (जिसे बोलचाल की भाषा में पत्थरबाज, या कल से वॉलेटबाज भी कहा जाता है) के नाक पर अटक जाता है, तो उसमें त्वरित आत्मविश्वास का संचार होता है। जैसे कि आप कार चला रहे हैं और आपको विडियो गेम वाला नाइट्रस बूस्ट मिला जाए।”

मैं उनका मुँह ताकने लगा कि ये क्या बेहूदी बात कही जा रही है, लेकिन उन्होंने आगे बताया तो मेरी समझ में पूरी बात आ गई, “मैं आपको तोड़ कर समझाता हूँ अजीत जी ब्रो… नाक पर रुमाल लगाते ही आपका चेहरा छुप जाता है। भीड़ में आप नर हैं या मादा, यह भ्रम भी उत्पन्न हो सकता है। यह भ्रम उत्पन्न न भी हो तो आप विश्व के चार अरब नरों में से कोई भी हो सकते हैं, आपको कोई पहचान नहीं पाएगा। जैसे ही, पहचान का एंगल बाहर जाता है, पत्थर के प्रक्षेपण में व्यक्ति स्वयं को भूल कर, पूरी स्वतंत्रता से, खुले विचारों के साथ अभिव्यक्त कर पाता है।”

“ओह! लाइक दैट!” मैंने जब जवाब दिया तो उन्होंने कहा, “आई नो, राइट…”

यह तकनीक कश्मीर से होते हुए भारत के हर उस इलाके में पहुँच गई जहाँ इस खास तरह के लोग रहते हैं। उन लोगों ने भी अपने घरों में, खास तरह के स्कूलों में, खास तरह के लोगों के साथ इस प्रक्षेपण विज्ञान को साधा। यह तकनीक बच्चे सीखते रहे, अपने घरों पर भी ड्रोन फुटेज के अनुसार पत्थर जमा कर के रखते देखे गए और कई बार ‘बोल बम का नारा है, बाबा एक सहारा है’ कह कर उनके गाँवों से गुजरने वाले काँवड़ियों पर भी फेंक कर इसमें महारत पाई।

लेकिन, किन्हीं कारणों से इनके इस वैज्ञानिक उपलब्धि पर कोई चर्चा नहीं हुई। फिर इन लोगों ने ‘अपना टाइम आएगा’ का इंतजार किया जो जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दिसंबर 2019 में प्रतिफलित होता दिखा। यूँ तो जामिया का मतलब यूनिवर्सिटी कहा गया है, लेकिन दिसम्बर के दूसरे सप्ताह में वहाँ इस पुरातन कला का जम कर प्रयोग हुआ। आगजनी हुई, कट्टे चले, दंगे की स्थिति बनी और बाद में एक दिशाहीन बाग का उदय हुआ जिसने हिन्दूघृणा के नए आयाम गढ़े।

यूँ तो पूरा फुटेज तौहीन बाग ही 55 दिन तक खाता रहा, लेकिन तीन दिन पहले कुछ चलचित्रों के जनसामान्य के पास पहुँचने से इस पाषाण क्रीड़ा के ‘इनडोर’ में भी प्रयुक्त होने के प्रमाण मिलने लगे। अमूमन, इतिहासकारों का दावा है कि इसे क्रिकेट की तर्ज पर बाहर ही खेला जा सकता है क्योंकि भीतर में जगह की कमी होती है। परंतु, नए-नए, उच्च गुणवत्ता के चलचित्रों के आम जनता में पहुँचते ही इसके इनडोर में भी होने के दावे होने लगे।

तभी, लम्बे समय से चुटकुलों और इंटरनेट पर घूमते मीमों का फैक्टचेक करता प्राणी अपने भालू के साथ सोशल मीडिया पर प्रकट हुआ और अपने प्रस्तर एवम् शिला विज्ञान की डिग्री दिखाता हुआ अपने सहकर्मियों से बोला, “पत्थर! अबे, ये तो वॉलेट है, वॉलेट!” एक सहकर्मी ने जब इस पर आपत्ति जताई तो कम बालों वाले प्राणी ने कहा, “मैंने कहा कि वॉलेट है, अब इसमें तुम हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, गूगल, एचडी, क्रोमा, फ्लैट, लीनियर, लहसुन आदि छिड़काव करते हुए हजार शब्दों का आर्टिकल लिखो और साबित करो कि वॉलेट है। और हाँ, मार्च आ रहा है, तुम्हारा इन्क्रीमेंट इसी पर निर्भर करेगा कि ये वॉलेट बन पाता है कि नहीं।”

पैसा किसे प्रिय नहीं है! सॉल्ट न्यूज के कर्मचारी ने बाकायदा, इन सारे शब्दों का प्रयोग करते हुए, बस एक्सीलेरेशन और टॉर्क जैसी बातें नहीं बताईं, बाकी सारा विज्ञान समझा दिया कि लम्बे बालों वाले जामिया लाइब्रेरी में चहलकदमी करते लौंडे के हाथों में वॉलेट ही है। वहीं मेरी टीम के एक एडिटर अजित झा का मानना है कि अगर उचित पैसा और समय दिया जाता तो वो लाइब्रेरी को चम्पारण मीट स्टॉल भी साबित कर सकते थे। मैंने पूछा कैसे, तो उन्होंने ‘ब्रो कोड’ का बहाना बनाते हुए बात को टाल दिया।

तो पत्थर बन गया वॉलेट। रवीश ने भी अपने गुप्त सूटकेस से ‘सॉल्ट न्यूज की जय हो’ वाला कैसेट निकाल कर प्रोफाइल पर बजा दिया। लोग कसमें वादे खाने लगे, कुछ नारियों ने गॉड को याद करते हुए यहाँ तक कह दिया कि ‘सॉल्ट न्यूज’ न होता तो पता नहीं क्या होता।

लेकिन किसी की हाय लग गई गंजे को। दो घंटे के भीतर चलचित्र प्रेमियों ने ऐसे ही कई वॉलेटधारियों को ढूँढ निकाला। इन चित्रों में यह पाया गया कि जामिया के पाषाण प्रक्षेपक अपने वॉलेट से ही हमला कर देते हैं। कई जगह दिखा कि ये लोग ऊपर से नीचे ‘वॉलेट’ फेंकते पाए गए। ये पता नहीं चल पाया है कि ऐसे अजीब आकार के वॉलेट कहाँ मिलते हैं? हमारे गुप्त सूत्र ने बताया कि सॉल्ट न्यूज ऐसे वॉलेट एमेजॉन पर बेचता है।

लाइब्रेरी में इतने वॉलेट देख कर किसी मनचले दिल्ली वाले ने वहाँ ‘कमरे ही कमरे’, ‘गद्दे ही गद्दे’ और ‘फ्लोर ही फ्लोर’ की तर्ज पर ‘वॉलेट ही वॉलेट’ लिख दिया। लेकिन प्रस्तर एवम् शिला विज्ञानी सॉल्ट न्यूज संस्थापक के गंजे सर का एक बाल भी नहीं हिला। उसने मानने से इनकार कर दिया।

ताजा जानकारी के अनुसार, सॉल्ट न्यूज का गंजा अपना संस्कारहीन, मलिन मुख ले कर ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी वालों को लगातार फोन लगा रहा है कि वो अपनी तरफ से ‘वॉलेट’ शब्द के उद्गम की बात कहते हुए यह लिख दें कि ‘वॉलेट शब्द के मूल में वॉल है जिसका अर्थ है दीवार। यूँ तो आज-कल दीवार ईंट से बनती है, परंतु जिस कालखंड से इस शब्द की उत्पत्ति हुई है, तब सिर्फ पत्थरों से ही बनती थी। अतः, वॉलेट शब्द वस्तुतः पत्थर का पर्यायवाची है।’

इस वाक्य के अंत होते-होते ऑक्सफोर्ड वालों ने सॉल्ट न्यूज के गंजे को ऐसा कनटाप मारा कि उसके सर के सातों बाल खड़े हो गए। खबर लिखे जाने तक, वो अपने भालू के साथ बेडरूम में सिसकता देखा गया है।

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
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