Sunday, May 19, 2024
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गाँधी जब उठाए थे लाठी: PETA ने उनकी बकरी और दूध पर कर दी थी हिंसक बात

नहीं, काटने के लिए मशीन इस्तेमाल करने से इतना कष्ट नहीं होता जितना दूध निकालने से होता है। ये आर्टिकल पढ़िए, इसमें एक अमरीकी वैज्ञानिक ने यह साबित कर दिया है कि दूध निकालते समय गाय के अंदर PETAtene हार्मोन बनता है जिससे उन्हें कष्ट होता है पर उन्हें काटते समय यह हॉर्मोन नहीं बनता इसलिए उन्हें कष्ट नहीं होता।

आज विश्व दूध दिवस है। दूध दिवस! मतलब एक जून की रोटी के साथ दूध मिलने की गारंटी? विश्व दूध दिवस सुनकर लगा जैसे किसी राजा ने नियम निकाला हो कि साल में बस आज के दिन सबको दूध मिलेगा। या फिर दूध ने विश्व भर के लोगों के साथ यह समझौता किया हो कि उसे साल में बस एक दिन खाया या पीया जा सकता है? भाई, विश्व दूध दिवस सुनकर सदियों से दूध खाने और पीने वाले हम भारतीयों के मन में और आएगा?
 
हम बचपन से सुनते आए हैं कि हमारे देवी देवता तो क्षीर सागर में आज भी रहते ही हैं, पर पहले हमारे देश की धरती पर भी दूध की नदियाँ बहती थीं। सोचिए कि हमारे पूर्वज जाने-अनजाने में डूबते भी होंगे तो पानी की नदी में नहीं बल्कि दूध की नदी में। मने नदी पार करते हुए नाव में छेद होता होगा तो उसके भीतर पानी नहीं बल्कि दूध घुसता होगा और उसमें बैठे हमारे पूर्वज नाव को डूबने से बचाने के लिए उस दूध को बाहर न फेंक कर पी जाते होंगे। पीने की इच्छा न होती होगी तो नींबू गार करके उस दूध का छेना बना लेते होंगे। उसी छेना में से कुछ नाव में हुए छेद में घुसा देते होंगे। नाव डूबने से बच जाती होगी और वे बाकी का बचा छेना लेकर पार भी उतर जाते होंगे। आपदा में अवसर वाला मुहावरा पहली बार यहीं से निकला होगा। 

इतिहासकार ऐसा बताते हैं कि हमारे पूर्वज जब यात्रा पर जाते थे तब साथ नींबू लेकर जाते थे ताकि जब किसी झरने से पानी लें तो उसमें नींबू गार के पीते थे जिससे उन्हें पेट की बीमारियाँ नहीं होती थी। दरअसल इन इतिहासकारों ने सच नहीं लिखा है। सच यह है कि वे लोग नींबू इसलिए साथ रखते थे ताकि जहाँ मन करे नदी से दूध लेकर उसमें नींबू का रस डाल कर छेना बना लें और उसके साथ घर से लाई रोटी खा लें। ऐसा लिखने के पीछे इतिहासकारों का उद्देश्य यह था कि हमने बचपन से दूध की नदियाँ बहने की जो कहानी सुनी है, उसे भूल जाएँ।

इन इतिहासकारों का मानना था कि हमसे यह बात छिपा ली जाए ताकि हम अपनी संस्कृति और इतिहास पर गर्व न कर सकें। वैसे तो इस बात का लिखित प्रमाण नहीं मिलता कि नगर पालिका के नियमों में पहले भी खतरे के निशान वाला कांसेप्ट था या नहीं पर यदि होता होगा तो बाढ़ के समय पानी नहीं बल्कि दूध खतरे के निशान से ऊपर जाता होगा।

ऐसे भारतवासियों से आज PETA कह रहा है कि वेगन मिल्क पीयो। बता रहा है कि गाय और भैंस का दूध पीना पाप है। दूध निकालना गायों और भैंसों के साथ क्रूरता है, निष्ठुरता है, निर्दयता है। (मैंने प्रवाह में तीन शब्द लिख दिए हैं, आपको जो पसंद आए उसे चुन लें।) यह बात उन्हें कही जा रही है जिनके भगवान कान्हा गाय के दूध से बनी दही और माखन से कितना प्यार करते थे यह हम सब जानते हैं। मने वे तो इतना प्यार करते थे कि दूसरों के घर में घुसकर इन चीजों की चोरी कर लेते थे। सोचिए कि आज यदि कान्हा सुनते तो क्या कहते? वे तो भगवान थे तो शायद कुछ न कहते पर सोचिए कि जो गोपियाँ मन ही मन प्रार्थना की थीं कि उनका कान्हा उनके घर से माखन चुरा लेता तो उनके सात जनम तर जाते, वे क्या कहतीं? 

क्या होता जब वे पूछती कि ; क्यूँ री, तुझे हमारी गायों से प्यार नहीं है जो तू हमारे दूध निकालने को गायों के प्रति निर्दयता बता रही है? 

इधर से PETA वाली कहती; आप हमें गलत समझ रही हैं। हम दूध के खिलाफ इसलिए हैं क्योंकि उसे निकालते समय गायों को कष्ट होता है, यू नो! इसलिए हम इस कष्ट से उन्हें बचाने के लिए अभियान चलाते हैं। 

यदि अगला प्रश्न आ जाता; कष्ट तो उन्हें तब भी होता है जब उन्हें काटा जाता है?

तो उत्तर आता; नहीं, काटने के लिए मशीन इस्तेमाल करने से इतना कष्ट नहीं होता जितना दूध निकालने से होता है। ये आर्टिकल पढ़िए, इसमें एक अमरीकी वैज्ञानिक ने यह साबित कर दिया है कि दूध निकालते समय गाय के अंदर PETAtene हार्मोन बनता है जिससे उन्हें कष्ट होता है पर उन्हें काटते समय यह हॉर्मोन नहीं बनता इसलिए उन्हें कष्ट नहीं होता। 

कान्हा ये कन्वर्सेशन सुन लेते तो सुदर्शन चक्र नचाने लगते।  

PETA वालों की बात सुनकर आशुतोष की तरह मेरे मन में भी प्रश्न उठा कि; आज यदि महात्मा गाँधी होते तो क्या कहते? 

महात्मा ने बकरी पाल रखी थी। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उन्होंने बकरी इसलिए पाल रखी थी ताकि उसका दूध पी सकें। कुछ घुटे हुए टाइप इतिहासकार मानते हैं कि; उन्होंने बकरी इसलिए पाल रखी थी ताकि कोई अवांछित व्यक्ति मिलने आ जाए तो वे बकरी को चारा खिलाने के बहाने व्यस्त हो जाएँ। इन घुटे हुए इतिहासकार इस निष्कर्ष पर वे तमाम तस्वीरें देखकर पहुँचे हैं जिनमें गाँधी जी के आस-पास दो-चार लोग बैठे हुए हैं और गाँधी जी अपनी पालतू बकरी को घास खिला रहे होते थे। 

जरा कल्पना कीजिये कि गाँधी जी अपनी बकरी को घास खिला रहे हैं और पास ही बर्तन रखा हुआ है क्योंकि घास खाने के बाद बकरी को दुहा जाएगा। उसी समय PETA से एक कन्या पहुँच जाती और कहती; महात्मा, आप बकरी का दूध न पीया करें? आप वेगन दूध पीया करें। 

बा वहीं होती और पूछती; बेटी, तुम्हारे कहने का अर्थ है बैंगन के तने से निकलने वाले दूध को हम पीयें! पर उससे उतना दूध निकलेगा कि बापू पी सकें?

कन्या बोलती; बैंगन नहीं,  बैंगन नहीं, वेगन बा, वेगन। 

बा पूछतीं; ये वेगन क्या होता है बेटी? मुझे समझाओ जरा। 

कन्या बोलती; बा, वेगन का मतलब और चीजों का दूध पीजिये जैसे सोयाबीन, काजू, बादाम… वगैरह वगैरह। जब बकरी का दूध निकाला जाता है न बा, तब बकरी को बहुत कष्ट होता है। इसलिए हम चाहते हैं कि बापू वेगन दूध पीएँ। 

ये सुनकर बापू के मन में आता; आज तक तो बकरी को कोई कष्ट होते नहीं देखा। ये किस कष्ट की बात कर रही है! यह सोचते सोचते अहिंसा के पुजारी महात्मा भी अपनी लाठी उठाकर दौड़ा लेते। यह घटना इतिहास में दर्ज हो जाती। इसे भी अलग-अलग इतिहासकार अपनी तरह से लिखते। 

असली इतिहासकार लिखते कि; एक क्षण ऐसा भी आया था जब महात्मा गाँधी ने अहिंसा त्याग दी थी। पर गाँधी जी की महानता यह थी कि उन्होंने बकरीद पर कटने वाले बकरों और बकरियों को लेकर PETA के स्टैंड पर सवाल नहीं उठाए। इससे साबित होता है कि वे बकरियों से शायद यह कहना अधिक उचित समझते कि; मुसलमान यदि चाहते हैं कि वे तुम्हें काटें तो तुम्हारा खुद को उनके सामने समर्पण कर देना ही मानवता की सेवा है। 

वहीं घुटे हुए नकली इतिहासकार लिखते; महात्मा उस लड़की की बात सुन यह सोचकर नाराज हो गए कि; इतने वर्षों की मेहनत के बाद मैंने एक गरीब की अपनी इमेज बनाई। ये लड़की तो बादाम का दूध पिलाकर मुझे अमीर साबित करवा देगी। ऊपर से मैंने जानबूझकर गाय नहीं पाली ताकि हिन्दुओं की ओर खड़ा न दिखाई दूँ और ये मेरी छवि बर्बाद करने पर तुली है। 

PETA वाले यह भी बताते हैं कि गाय भैंस का दूध छोड़ लोगों को हर वह चीज पीना चाहिए जो दूध का फील देता हो। लोग तो यह सोचकर भी परेशान हैं कि; ये लोग इस चक्कर में वो डिटर्जेंट और यूरिया वाला दूध भी न प्रमोट करने लग जाएँ। सोचिए कि ऐसा जो हो जाए तो क्या-क्या हो सकता है! 

हम देखेंगे कि देश में यूरिया की कमी हो गई। किसानों को यूरिया नहीं मिल पा रहा। उधर देश में बनने वाला सारा डिटर्जेंट दूध में खप जा रहा है। लोगों के पास कपड़े धोने के लिए डिटर्जेंट नहीं है। सब मैले कुचैले कपड़े पहने घूम रहे हैं। PETA वाले खुश हैं। गायों को कष्ट नहीं हो रहा है। वे जहाँ-तहाँ खुश होकर घूम रही हैं। यूरिया न मिलने की वजह से फसलों की पैदावार में भीषण कमी आ गई है। सब केवल वेगन दूध पी रहे हैं। 

सीन कुछ डरावना हो गया न! अरे परेशान न हो, युधिष्ठिर ने कहा था कि मन बहुत तेज चलता है। ये सब बस उसी मन की वजह से है।          

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