Saturday, September 26, 2020
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व्यंग्य: बकैत रवीश कुमार भूमिपूजन पर बोले- बर्नोल न भेजें, घर में बर्फ की सिल्ली रखता हूँ

क्या दूसरी बार प्रधानमंत्री बने मोदी जी को बड़ा हृदय करते हुए 'सब बुत उठवाए जाएँगे, बस नाम रहेगा अल्लाह का' वाली नज्म फैज के फैजाबाद में बन रहे मंदिर में नहीं पढ़ना चाहिए था? अयोध्या में क्या सिर्फ ब्राह्मण ही रहते हैं कि कार्यक्रम संस्कृत में कराया गया? क्या ये दलितों को अलग-थलग करने की कोशिश नहीं है?

चलिए… जो होना था वो तो हो ही गया। संवैधानिक मूल्यों की बलि चढ़ाई गई और मेरे चैनल तक पर बूँद-बूँद टेलीकास्ट हुआ। क्या कीजिएगा, मैं एक अदद पत्रकार, छलकत हमरो जबनिया ऐ राजा बकैत कुमार, कर ही क्या लेता। मैं तो चैनल नहीं चलाता लेकिन एक पत्रकार के तौर पर चुप भी तो नहीं रह सकता।

बताइए कि जिनके ऊपर मस्जिद गिराने का आरोप है, वो भूमिपूजन में शामिल थे! आज के दौर में जबकि न्यायपालिका न्याय नहीं करती, फैसले सुना देती है, वैसे समय में हम वामपंथियों के पास क्या चारा बचा है! हम तो आरोप को ही निर्णय मानते हैं। आप कहेंगे कि मेरे चैनल और उसके मालिक पर सीबीआई ने केस दर्ज किए हुए हैं। तो भाई, हमारे मालिक कौन सा भूमिपूजन जैसा पवित्र कार्य कर रहे थे? वो तो यहीं चैनल के दफ्तर में बैठे रहते हैं।

चौबीस घंटे एक ही बात चल रही है कि कैसा होगा मंदिर, मोदी किधर जाएँगे, किस गाड़ी से आएँगे, कौन से रंग का कुर्ता पहनेंगे… क्या यही है विकास? कब तक मंदिर-मस्जिद होता रहेगा इस देश में? सॉरी, मंदिर तो हो गया, मस्जिद की कोई बात नहीं की गई, जबकि दोनों ‘म’ अक्षर से ही शुरू होते हैं। अक्षर का मतलब होता है जो नष्ट न किया जा सके, जबकि मस्जिद का भाग्य देखिए कि उसे नष्ट कर दिया गया।

नष्ट तो खैर मंदिर को भी किया गया, ऐसा हिन्दू मानते हैं। लेकिन क्या एक समाज के तौर पर ये हमारी सामूहिक हार नहीं है कि हम 492 साल पहले हुए अन्याय को याद किए बैठे हैं? और राम को अयोध्या में आप मान रहे हैं, जबकि कहा जाता कि ‘राम तो रोम-रोम में हैं’। तो फिर हिन्दुओं को तो रोम जाना चाहिए और वहाँ मंदिर निर्माण का कार्य करना चाहिए। लेकिन नहीं, वो तो दूर पड़ जाएगा, वहाँ भाजपा की रैलियों के लिए लाखों की भीड़ कैसे जुटाएँगे, इसलिए अयोध्या का नाम लिया गया, जो कि वास्तव में फैजाबाद था।

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फैज से याद आया कि उसे मिट्टी नहीं ले जाने दी गई! बताइए, ये किस तरह का समाज अपने बच्चों के लिए छोड़े जा रहे हैं हम? कल टीवी का एक स्क्रीनशॉट किसी ने व्हाट्सएप्प पर भेजा जिसमें आजतक चैनल पर भूमिपूजन लाइव चल रहा था और साइड में ‘जलन हो तो बर्नोल लगाएँ’ जैसा कुछ लिखा हुआ था। क्या मीडिया पैसों के लिए हम वामपंथियों को खुलेआम ट्रोल करेगा? क्या हमें एक दिन का सुकून नहीं है? हमारे गिरोह के सदस्यों ने लाल रंग का डीपी लगाया तो ट्रोलर अजीत भारती ने लिखा कि वो हनुमान जी का रंग है!

आप ही बताइए कि अब रंग भी हनुमान जी के होने लगे! तब तो कह दीजिएगा कि वामपंथियों का झंडा भी हनुमान जी का है और ‘लाल सलाम’ वास्तव में ‘जय श्री राम’ का अपभ्रंश है जो कि बाली और सुग्रीव ने मुँह में सेव का टुकड़ा खाते हुए बोला था, तो वो ‘लाल सलाम’ जैसा लगा। अब यही सब होगा इतिहास की किताब में कि कौन सा रंग किस भगवान का है।

हमने इतिहासकार दिए आपको, जो तथ्य नहीं कल्पना लिखता हो, आपने कहा कि गलत इतिहास पढ़ाया जा रहा है। अरे भाई, सही इतिहास तो इंटरनेट पर है ही, लेकिन देश में कभी रचनात्मकता की कक्षा लगी है? कभी बच्चों को बोला गया है सरकारी स्कूलों में कि कहानी लिखो, अपने मन से? उसी क्रिएटिविटी को बढ़ावा देने के लिए रोमिला ने, इरफान हबीब, विपिन चंद्रा, गुहा आदि ने तथ्य को परे रख कर काल्पनिक बातों को इतिहास के रूप में लिखा ताकि अगली पीढ़ी कहानी बनाने में माहिर हो, नैरेटिव गढ़ सके।

आपको यह क्या कम लगता है कि इन्हीं में से कई इतिहासकार अयोध्या मामले में कोर्ट में लड़े थे ये साबित करने में कि रामजन्मभूमि अयोध्या नहीं है, ये बात और है कि जजों ने उनकी रिपोर्ट को मोड़ कर कूड़ेदान में फेंक दिया। फासीवाद तो तभी से मुझे दिखने लगा था।

ख़ैर, मंदिर का भूमिपूजन हो गया और एक घेराबंदी की गई कि हम वामपंथी लोग ठीक से अभिव्यक्ति भी न कर पाएँ। हमारे एक ट्वीट पर तीन हजार लोग गरियाने आ जाते हैं। ट्रोलर अजीत भारती ने कल यहाँ तक लिख दिया कि मंदिर तो बन जाएगा, लेकिन बड़े दिल वाले मुसलमान भाइयों को मस्जिद की पाँच एकड़ जमीन पर अस्पताल या स्कूल खोलने की पहल करनी चाहिए, समाज आशीर्वाद देगा।

ये क्या जान-बूझकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश नहीं हो रही है? एक तो मस्जिद के लिए वहाँ जमीन दे दी गई जहाँ कोई मंदिर है ही नहीं, जबकि भारत में कई बड़े मस्जिद मंदिरों के ही ऊपर बनाए गए हैं। आप ही बताइए कि जिस देश में परंपरा यही रही हो कि मंदिर तोड़ो, मस्जिद बनाओ, या मंदिर न टूट रहा हो तो सीमेंट से उसकी दीवार सफेद रंग से पोत कर गुंबद लगा दो, हो गई मस्जिद, वहाँ आपने कहा कि खाली जमीन पर मस्जिद बना लो।

और तब इन मीडिया वालों को देखिए कि वो वक्फ बोर्ड से पूछते हैं कि मस्जिद कब बनेगा? जबकि वो लोग इस चक्कर में हैं कि जहाँ जमीन दी, वहाँ भी खोद कर देख लें कि नीचे कोई मंदिर तो नहीं क्योंकि मस्जिद बनते ही कुछ लोग ये याचिका न लगा दें कि रामलला घुड़कते हुए एक दिन वहाँ भी गए थे, अब मंदिर यहीं बनेगा। ये सब अच्छा लगता है क्या? एक समाज के तौर पर, एक जो तहजीब का दायरा है, एक जो बिरयानी के मसालों वाली बात है, एक जो रायता होता है, हमें वो सब भी देख कर चलना चाहिए।

आप ये बताइए कि कुछ लोग यह भी कहते पाए जाते हैं कि मुगलों ने कुछ नहीं दिया है, बस हिन्दुओं के मंदिरों को तोड़ कर गुंबद जोड़ देते थे। ये कितना गलत है अपने आप में! ठीक है कि ज्ञानवापी है, मथुरा है, भारत के 40,000 मंदिर हैं जिन्हें तोड़ दिया गया या गुंबद रख कर इस्लामी आक्रमणकारियों ने मस्जिद बना दी उसके ऊपर, लेकिन आप ये कैसे कह रहे हैं कि कुछ नहीं दिया? गुंबद किसने लगाई? सीमेंट-बालू, पत्थर, रंग आदि तो मुगलों या उसकी संतानों ने लगाया होगा न अपना? फिर आप ये कैसे कह देते हैं कि उन्होंने कुछ नहीं दिया? ये क्या समाज में वैमनस्य फैलाने वाली बात नहीं है?

राफेल आया तो उसके लैंडिंग की फोटो दिखाते रहे, मंदिर बन रहा है तो संस्कृत में चैनलों पर मंत्र पढ़ा जा रहा है… एक सेकुलर समाज में संस्कृत में मंत्र पढ़ना क्या हिन्दू तुष्टीकरण नहीं है? क्या दूसरी बार प्रधानमंत्री बने मोदी जी को बड़ा हृदय करते हुए ‘सब बुत उठवाए जाएँगे, बस नाम रहेगा अल्लाह का’ वाली नज्म फैज के फैजाबाद में बन रहे मंदिर में नहीं पढ़ना चाहिए था? अयोध्या में क्या सिर्फ ब्राह्मण ही रहते हैं कि कार्यक्रम संस्कृत में कराया गया? क्या ये दलितों को अलग-थलग करने की कोशिश नहीं है?

एक प्रधानमंत्री यजमान बन कर बैठे थे, क्या यह शोभा देता है? क्या यह प्रधानमंत्री पद की गरिमा के अनुरूप है? जो प्रधानमंत्री संविधान को प्रणाम करता है, वो राम को कैसे प्रणाम कर सकता है? उसे तो हमने इफ्तार पार्टी में जालीदार टोपी पहन कर केले खाते नहीं देखा, फिर रामलला को साष्टांग दंडवत् किया जा रहा है! एक राष्ट्र के नाम पर हम विश्व में क्या मुँह दिखाएँगे कि देखो यहाँ का प्रधानमंत्री एक मूर्ति के आगे लेट गया है?

मैं कल पूरे दिन इतना परेशान रहा कि क्या बताऊँ। कोई कह रहा था कि बाजार में मिट्टी का दीया नहीं मिल रहा है, कोई पटाखे ढूँढ रहा था, कोई कह रहा था चायनीज झालर मत खरीदना… सरयू किनारे योगी आदित्यनाथ ने फिर से दीपोत्सव करा दिया। इस आदमी को दीपों से इतना प्रेम है कि अगले साल से पाँच अगस्त को राजकीय दीवाली ही न मनाने लगे!

आप सोचिए कि दीपकों में तो घी या तेल पड़ा है, उससे कितने घरों में पूड़ियाँ छानी जा सकती थी! या फिर ठेले पर जो चाऊमीन बिकता है, एक दीपक के तेल से हाफ प्लेट तो बन ही जाता है अजीनोमोटो डाल कर। किसी गरीब को चाऊमीन खिला देते योगी जी, तो याद रखता। हो सकता है उनकी रैली में भी आता, उनका परमानेंट वोटर बन जाता। ऐसे ही तो परमानेन्ट वोटर बनते हैं कि कलावती के घर खाना खा लो, उसी के खर्चे का खाना, और वही कृतज्ञता में कॉन्ग्रेसी भी बन गई।

कोई कहता है कि कुम्हार ने दीये बनाए होंगे, तेल बेचने वाले ने तेल निकाला होगा, इन सबसे उनके घरों में भोजन बना होगा। ठीक है, बना होगा, लेकिन हाफ प्लेट चाऊमीन का जो आनंद मिलता है किसी गरीब को, जिसने कभी चाऊमीन खाई न हो, उसकी भरपाई क्या किसी गरीब कुम्हार के घर में भोजन बनने से हो सकेगी?

आप देखिए कि इस कार्यक्रम का हर भाग ऐसा था मानो हिन्दुओं का ही कार्यक्रम हो। देश सेकुलर है तो यहाँ मंदिर कैसे बन रहा है? संविधान में जब सेकुलर लिखा हुआ है तो यहाँ मंदिर कैसे बन रहा है? क्या हम बचपन से यह सीखते नहीं आए कि सेकुलर का मतलब ही होता है हिन्दुओं की हर चीज, हर प्रतीक, हर कर्मकांड, हर बात से घृणा करना। ऐसे में, मंदिर बना देना क्या संविधान की इस अवधारणा के खिलाफ नहीं?

क्या नेहरू जी ने राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू को सोमनाथ जाने से नहीं रोका था? क्या आपको लगता है कि नेहरू जी ने कुछ गलत किया होगा? आपको लगता है कि नेहरू जी कभी कुछ गलत कर सकते थे? उन्होंने डिस्कवरी ऑफ इंडिया की थी। वो असली सेकुलर थे, उन्होंने अपने समय में राम मंदिर नहीं बनने दिया क्योंकि यही तो भारत की पहचान है कि प्रधानमंत्री स्वयं को दुर्घटनावश हिन्दू मानता रहा। ये बात और है कि उनकी संततियों की संततियों के संततियों ने बार-बार योजनाबद्ध तरीके से हिन्दू बनने की कोशिश कर के बैलेंस करने की कोशिश की है। मुझे इसका दुख था, लेकिन क्या कर सकते हैं, घर जहाँ से चले, वहाँ ज्यादा सवाल नहीं करना चाहिए… हें हें हें!

मुझे तो मोदी के यजमान बनने से ज्यादा समस्या उस बेगूसराय के पंडित से है! बताइए बेगूसराय की धरती से कन्हैया जैसे महान विचारक और शोधार्थी हुए हैं, वहीं के एक पंडित ने अपने काम से काम नहीं रखा। एक तो पूरा कार्यक्रम संस्कृत का था, एक भी गालिब का शेर या फराज की गजल का कोई मिसरा नहीं कहा… बाबर ने जो गंगा-जमुनी तहजीब शाब्दिक तरीके से मिला दी थी कि मंदिर के ऊपर ही मस्जिद बनवा दिया, तो क्या पंडित जी से यह आशा नहीं की जा सकती कि वो उर्दू में ‘एक बिरहमन ने कहा है ये साल अच्छा है’ ही पढ़ देते? हिन्दुओं को लिए तो अच्छा ही है साल!

लेकिन नहीं, उर्दू का एक शब्द नहीं बोला गया उनसे! संस्कृत तक तो फिर भी बर्दाश्त हुआ क्योंकि हिन्दुओं ने खुद ही उसे त्याग दिया है तो उन्हें समझ में कहाँ से आता। लेकिन पंडित जी ने, यह जानते हुए कि सारे चैनल उसी डीडी न्यूज का फीड चला रहे हैं, हिन्दी में भी बताना शुरू किया। और जो वो हिन्दी में कह रहे थे, वो हिन्दुओं के लिए तो बड़ी अच्छी बात कही जा सकती है लेकिन, हम जैसे वामपंथियों की कितनी सुलग रही थी, वो हमें ही पता है। मुझे निजी तौर पर कहाँ-कहाँ कष्ट हुआ, और पूरे घर में कितना धुआँ भर गया, वो मैं ही जानता हूँ। इसकी क्या जरूरत थी?

पूरे दिन बर्फ की सिल्ली पर बैठा रहा और जलन ऐसी कि ‘जिया जले, जाँ जले, सिल्ली पर धुआँ चले’ हो गया। जैसे ऊर्ध्वपाती पदार्थ होते हैं न जो ठोस से सीधा गैसीय अवस्था को प्राप्त कर जाते हैं, वैसे ही आप यकीन मानिए कि बर्फ की सिल्ली ठोस बर्फ से सीधे वाष्पीकृत हो रही थी और रत्ती भर भी पानी नहीं बन पा रहा था। यूँ तो सिल्ली का लाभ मैंने पहले कई बार लिया है, क्यूब्स का भी सहारा लेता हूँ, लेकिन मंदिर वाला मसला इतना परीशाँ कर देगा, ये मैंने सोचा नहीं थ। वो तो अच्छा हो व्हाट्सएप के मित्रों का जिन्होंने बिना पैसे लिए सुबह ही कुछ सिल्लियाँ भिजवा दी थीं, जिसे मैंने सूती बोरे में लपेट कर रखा हुआ था। उन मित्रों को आभार जो मेरे स्वास्थ्य का इतना ध्यान रखते हैं, वरना कोरोना काल में तो घर से भी निकलना मुश्किल ही है। हें हें हें!

ख़ैर, ज्यादा समय नहीं लूँगा आपका क्योंकि अहमदाबाद के कोरोना अस्पताल में एक दुर्घटना हो गई है और मुझे उन लाशों पर राजनीति करनी है, मुझे ये दिखाना है कि ऐसी दुर्घटना दुनिया में पहली बार हुई। मुझे ये लिखना है कि ‘ये है गुजरात मॉडल’, और पीछे के कई पोस्ट के बारे में बताऊँगा कि कैसे मैंने अहमदाबाद पर काफी कुछ लिखा लेकिन कोई मेरी बात सुन नहीं रहा था।

अंत में, हिन्दुओं से अपील है कि रामजन्मभूमि पर उल्लास मनाइए, गाइए, नाचिए लेकिन यह भी याद रखिए कि आपकी खुशी के कारण बीस करोड़ लोगों को भयानक दर्द हो रहा है। आप हमेशा कहते हैं कि आप सहिष्णु हैं, मैं हमेशा कहता हूँ भारत इन्टोलरेंट हो गया है, तो आप ही की बात मान लेते हैं। आप बड़ा दिल दिखाइए, अभी भी कुछ बना नहीं है वहाँ, दे दीजिए मस्जिद वालों को जमीन, उन्हें अच्छा लगेगा।

अरे क्या हुआ कि नीचे मंदिर के अवशेष निकल आए? क्या हुआ कि लाखों हिन्दू पाँच सौ सालों में मुगलों द्वारा भी काटे गए, और मौलाना मुलायम द्वारा भी गोलियों के शिकार बने? क्या होता है इससे कि सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में आपके पक्ष में निर्णय दे दिया? सत्य तो यही है न कि जो लोग कहते थे कि वो कोर्ट का फैसला मानेंगे, आज नहीं मान रहे… अब आप ही कहिए कि किसी को कोर्ट का फैसला ही स्वीकार्य नहीं तो क्या हम इसे न्याय मानेंगे? क्या गाँधी जी होते तो यह न कहते कि ‘अब्दुल तो अपना भाई है’?

क्या आप गाँधी जी से भी बड़े हैं? उन्होंने तो मंदिर में कुरान पढ़वाया था, मुस्लिम हत्यारों को वो माफ कर देते थे। आप एक मंदिर तक न दे सके? ये हिन्दू समाज की न्यायिक जीत जरूर है, लेकिन एक समाज के तौर पर हम हार गए हैं।

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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