Monday, June 17, 2024
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मरते हुए पल्लव राजा के दो अधूरे स्वप्न.. पुल्लालूर में भव्य मंदिर… अंग्रेजों-मुगलों नहीं, 7वीं शताब्दी में वातापी के युद्ध पर अरुण कृष्णन की पुस्तक

7वीं शताब्दी का ये वो समय था जब बौद्ध-जैन धर्म के अनुयायियों की संख्या अपने शबाब पर थी और दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन का सूत्रपात हो रहा था। चीनी यात्री ह्वेन त्सांग भारत के दौरे पर था। पुस्तक को पढ़ने समय आपको ऐसा बिलकुल भी नहीं लगेगा कि अरुण कृष्णन की ये पहली ही किताब है।

कुछ पुस्तकें महज पुस्तकें होती हैं, जबकि कुछ ‘दस्तावेज’ बन जाते हैं। जो दस्तावेज बन जाते हैं, उनमें भी एक श्रेणी ऐसी पुस्तकों की होती हैं जिनकी भाषा इतनी सरल और स्पष्ट होती है कि उस विषय का ABC न जानने वाला व्यक्ति भी A-Z स्पष्ट रूप से समझ जाता है। विषय समझ में आ जाए तो लेखक उसे फिक्शन के रूप में ढाल कर जनता तक मूल बात पहुँचा सकता है। अरुण कृष्णन ने एक ऐसी ही पुस्तक लिखी है ‘Battle of Vathapi: Nandi’s Charge‘ नाम की, जो वातापी में हुए चालुक्य और पल्लव साम्राज्य के बीच के युद्ध की कहानी को एक नए ढंग से कहती है।

वातापी प्राचीन चालुक्य समाज की राजधानी हुआ करती थी। आज इस जगह को कर्नाटक के बागलकोट में बादामी के नाम से जानते हैं। इस युद्ध में चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय की मृत्यु हो गई थी। 642 ईस्वी में हुए इस भयंकर युद्ध में पल्लव राजा नरसिंहवर्मन की विजय हुई थी। असल में पल्लव साम्राज्य लंबे समय से पुलकेशिन द्वितीय द्वारा उनके राजा महेन्द्रवर्मन को हराए जाने का बदला लेना चाहता था। विजय के बाद वातापी में चालुक्य राजा ने मल्लिकार्जुन मंदिर का निर्माण करवाया।

तो ये थी एकदम संक्षेप में विषय की जानकारी, अब पुस्तक पर आते हैं। लेकिन, उससे पहले लेखक की बात कर लेते हैं। सोशल मीडिया पर अक्सर वामपंथियों का बाजा बजाने वाले अरुण कृष्णन ‘nFactorial Analytical Sciences’ नामक कंपनी के संस्थापक और CEO हैं, जो रियल टाइम कर्मचारी-ग्राहक के बीच इंगेजमेंट के लिए प्लेटफॉर्म प्रोवाइड करती है। लेखक होने के साथ-साथ वो पेशे से एक डेटा साइंटिस्ट और संगीतकार भी हैं।

ये पुस्तक एक ट्राइलॉजी का हिस्सा है, जिसके अगले दोनों भाग के लिए आप शायद ही इंतजार कर पाएँ, बशर्ते कि आपने पहला भाग पढ़ रखा हो। ‘ऐतिहासिक उपन्यास’ की श्रेणी में ‘Battle of Vathapi: Nandi’s Charge’ शानदार नैरेशन और हमारी प्राचीन सभ्यता का दर्शन कराने के लिए जानी जाएगी। आप खुद इसे पढ़ते-पढ़ते सातवीं सदी में पहुँच जाएँगे और हर एक किरदार के भविष्य को लेकर अनुमान लगाते रहेंगे।

बात ये है कि वामपंथी इतिहासकारों और उपन्यास लेखकों ने कभी भारतीय इतिहास को छुआ ही नहीं। उन्होंने अंग्रेजों और मुगलों का गुणगान करते हुए दशकों काट दिए। प्राचीन काल की हर एक घटना से ऐसे कई उपन्यास अलग-अलग एंगल से निकल सकते हैं, ऐतिहासिक दस्तावेज निकल सकते हैं और वर्तमान की समस्याओं का समाधान भी मिल सकता है। आप अपने घर या दफ्तर में 10 लोगों से पुलकेशिन द्वितीय या नरसिंहवर्मन के बारे में ही पूछ लीजिए, शायद ही कोई कुछ बता पाए।

हमारे समृद्ध इतिहास को ऐसे ही सामने लाने की जरूरत है, वो किसी भी रूप में आए – उसमें हमारी संस्कृति की महक होनी चाहिए, गुलामी की नहीं। पुस्तक को अरुण कृष्णन ने 54 भागों में बाँटा है, जो इसे पढ़ना आसान बना देता है। ये वो समय था जब बौद्ध-जैन धर्म के अनुयायियों की संख्या अपने शबाब पर थी और दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन का सूत्रपात हो रहा था। खुद अरुण कृष्णन लिखते हैं कि भले ही उन्होंने कागज़ पर जो-जो लिखा है एकदम वैसा-वैसा ही हुआ, लेकिन उन्हें आशा है कि पाठकों को इसकी थाह लगेगी कि असल में हुआ क्या था।

पुस्तक में कहानी कांची से शुरू होती है और उज्जैन में ख़त्म होती है। पुस्तक में सबसे विशेष ये है कि किरदारों को सरीके से ढाला गया है। चालुक्य साम्राज्य के प्रमुख गुप्तचर नागानंदी का किरदार इसमें सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। भले ही कहानी चालुक्य और पल्लव साम्राज्य की हो, लेकिन आपको उस समय के इतिहास के अन्य राजघरानों और राज्यों, जैसे गंगा राजवंश, पंड्या और चोल के अलावा श्रीलंका का भी जिक्र मिलेगा।

पहली बात तो ये कि पुस्तक को पढ़ने समय आपको ऐसा बिलकुल भी नहीं लगेगा कि अरुण कृष्णन की ये पहली ही किताब है। इस किताब को थ्रिलर की तरह बुनने का प्रयास किया गया है, जिसमें सफलता भी मिली है। इसमें चित्रित तत्कालीन भूगोल को दर्शाते नक़्शे याद दिलाते हैं कि ये कहानी वास्तविक है। जब मम्मला (नरसिंहवर्मन) के पिता अंतिम साँस गिन रहे होते हैं और अपने बेटे से अपने दो अधूरे स्वप्नों को पूरा करने का वचन लेते हैं, तभी हमें पता चल जाता है कि आगे मजा आने वाला है।

हम यहाँ जानबूझ कर उन दोनों बातों का जिक्र नहीं कर रहे, क्योंकि आप स्वयं पढ़ेंगे तो अधिक अच्छा रहेगा। कैसे पल्लव सेनापति परंज्योति ने अन्य राज्यों के साथ गठबंधन बनाए, कैसे कभी-कभी ऐसा लगा कि दिवंगत राजा का स्वप्न शायद पूरा नहीं हो पाएगा और कैसे कई घटनाएँ एक-एक कर एक-दूसरे से जुड़ती जाती हैं – इसे सही तरीके से लिखा गया है। हाँ, पाठकों को ये सलाह ज़रूर है कि हर एक किरदार के बारे में पहले ही अच्छे से पढ़ लें, वरना आगे आप कन्फ्यूज हो सकते हैं।

अक्सर ऐतिहासिक फिक्शन के नाम पर स्त्रियों का गलत तरीके से चित्रण किया जाता रहा है, एक नायक और एक विलेन को चुन कर कहानी उसी अनुरूप लिखी जाती है और सस्पेंस के चक्कर में कहानी से खेल हो जाता है। इस पुस्तक में ऐसा कुछ भी नहीं है। सबसे बड़ी बात कि ये धीमी भी नहीं है, जो बोर करे। दक्षिण भारत ही नहीं, भारत के उत्तरी हिस्से के लोगों को भी इसे पढ़ना चाहिए। ऐसा नहीं है कि सोमनाथ पर केएम मुंशी की पुस्तकें सिर्फ गुजरातियों के लिए ही हैं।

हाँ, अगले भाग में अरुण कृष्णन को ये सलाह दी जा सकती है कि किरदारों को सामने लाने के साथ-साथ उनका बैकग्राउंड भी दिया जाए, ताकि पाठकों के जेहन में वो अंत तक रहें। मेरा मानना है कि अगर इसके आधार पर पटकथा तैयार के इसे वेब सीरीज के रूप में ढाला जाए, तो आराम से ये एक अच्छा कंटेंट साबित हो सकता है जो दुनिया को भारत के एक अलग ऐतिहासिक पहलू के बारे में बताएगा। कहानी में ह्वेन त्सांग नाम के एक रोचक चीनी किरदार भी है, जिसके बारे में आपने बचपन में भी सुना ही होगा।

अंत में बता दें कि ‘Battle of Vathapi: Nandi’s Charge‘ आपको एक नहीं, बल्कि तीन सामानांतर कहानियों का आनंद देगी। कई घटनाओं को आप वर्तमान से जोड़ कर भी देखेंगे। युद्ध में कैसे एक से बढ़ कर एक हथकंडे और रणनीतियाँ अपनाई गईं, ये पढ़ना रोचक है। रोमांस के नाम पर जबरदस्ती समय जाया नहीं किया गया है। जंगल, पानी, जमीन, किला – आपको कई जगह युद्ध देखने को मिलेगा। आशा है। पुस्तक को अन्य भाषाओं में भी अनुवाद कर के प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

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अनुपम कुमार सिंह
अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
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