Thursday, June 4, 2020
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भरे सदन में नेहरू को सुनाने वाला राष्ट्रकवि जो चाहता था ‘हर-हर-बम’ का महोच्चार

आज रामधारी सिंह दिनकर की जन्मतिथि है। आधुनिक समस्याओं का द्वापर से समाधान तलाश लाने वाले इस कवि के जीवन, लेखनी और विचारों के बारे में चर्चा करने का इससे बेहतर समय भला क्या हो सकता है।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

भारत के राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का तैल चित्र संसद भवन में लगा हुआ है। उनका जन्म बिहार के बेगूसराय जिले स्थित सिमरिया गाँव में आज ही के दिन 1908 में हुआ था। लोकसभा चुनाव से पहले केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह से लेकर जेएनयू छात्र संगठन के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार तक वहाँ स्थित दिनकर के प्रतिमा पर लोकार्पण करने पहुँचे। ये तो रही राजनीति की बात। नेता वोट के लिए अक़्सर महापुरुषों का सम्मान करते रहते हैं। लेकिन, दिनकर किसी जाति, धर्म, विचारधारा और क्षेत्र से ऊपर के कवि थे। एक ऐसा लेखक, जो पद्य में महारथी था लेकिन जब गद्य लिखा तो वह भी ऐतिहासिक साहित्य बन गया।

रामधारी सिंह दिनकर समसामयिक समस्याओं के समाधान की तलाश के लिए लिखते थे। वह भारत-चीन युद्ध में भारत की हार पर क्रुद्ध होकर अपने विचारों को प्रकट करने के लिए अपने लेखनी का सहारा लेते थे। उनकी कृतियाँ ‘सम्पूर्ण क्रांति’ के दौरान जयप्रकाश नारायण जैसे महान नेता के लिए भी प्रेरणा बन जाती थीं और वह इसका उपयोग लाखों की भीड़ में ऊर्जा का संचार करने के लिए करते थे। वह राज्यसभा सांसद रहे। वह एक शिक्षाविद थे, जो भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। लेकिन, दिनकर की कृतियों में क्या अलग था?

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की एक बहुत बड़ी ख़ासियत यह थी कि इतिहास और भारतीय धर्म-ग्रंथों के मामले में उनका ज्ञान अभूतपूर्व था, जिसे जनमानस तक पहुँचाने के लिए उन्होंने अपनी लेखनी का सहारा लिया। वह बात-बात में किसी भी वर्तमान समस्या का समाधान ढूँढने के लिए द्वापर युग जा पहुँचते थे। ख़ुद उन्होंने ‘संस्कृति के चार अध्याय’ और ‘कुरुक्षेत्र’ में ऐसा स्वीकारा है। जब कृष्ण से कर्ण संवाद कर रहा होता है तो उसकी बातों में दिनकर रिश्ते-नातों की महत्ता, त्याग की भावना और वैभव-विलास को लेकर एक उचित विचार-प्रक्रिया को बुन रहे होते हैं।

मनोज वाजपेयी की आवाज़ में ‘रश्मिरथी’ के कुछ अंश

जब मृत्युशैया पर पड़े भीष्म युधिष्ठिर से अपने जीवन के अनुभव साझा कर रहे होते हैं, तब उनके शब्दों में दिनकर शासन चलाने के तरीके और सत्तासीनों के लिए एक नियमावली तैयार कर रहे होते हैं। आज जब पीएम मोदी ‘सबका साथ-सबका विकास’ की बात करते हैं तो तालियाँ बजती हैं। लेकिन, दिनकर ने बिना पक्षपात किए सम्पदा और समृद्धि के मामले में जन-जन की समान भागीदारी सुनिश्चित करने और हर चीज में उनकी समान हिस्सेदारी की बात करते हुए ‘कुरुक्षेत्र’ में लिखा था:

शान्ति नहीं तब तक; जब तक
सुख-भाग न नर का सम हो,
नहीं किसी को बहुत अधिक हो,
नहीं किसी को कम हो।

वामपंथी ही कुछ ऐसी ही बात करते हैं लेकिन उनकी विचारधारा में ‘जबरदस्ती’ है, ‘हिंसा’ है और ‘हर प्रकार की सत्ता से संघर्ष’ है, जिसके कारण यह एक तानाशाही रवैये को जन्म देता है, जहाँ दूसरों की बातें सुनी ही नहीं जाती। दिनकर की विचारधारा सभी पक्षों की राय विस्तृत रूप से जानने के बाद ही आकार लेती है। वह द्वापर से आती है। भारतीय संस्कृति से आती है, इतिहास से आती है, धर्म-ग्रंथों की कहानियों से आती है। ‘रश्मिरथी’ में जब स्वयं श्रीकृष्ण कर्ण को पांडव कुल में मिल जाने और बदले में पूरे भारतवर्ष का सम्राट बनने को कहते हैं तो वह अस्वीकार कर देता है। इसकी वजह है ‘दुर्योधन से उनकी मित्रता’। कर्ण दुर्योधन के स्नेह से अभिभूत है और दिनकर उसके शब्दों में मित्रता की परिभाषा कुछ इस तरह बताते हैं:

मैत्री की बड़ी सुखद छाया, शीतल हो जाती है काया,
धिक्कार-योग्य होगा वह नर, जो पाकर भी ऐसा तरुवर,
हो अलग खड़ा कटवाता है, खुद आप नहीं कट जाता है।
जिस नर की बाह गही मैने, जिस तरु की छाँह गहि मैने,
उस पर न वार चलने दूँगा, कैसे कुठार चलने दूँगा,
जीते जी उसे बचाऊँगा, या आप स्वयं कट जाऊँगा,
मित्रता बड़ा अनमोल रतन, कब उसे तोल सकता है धन?
धरती की तो है क्या बिसात? आ जाय अगर बैकुंठ हाथ।
उसको भी न्योछावर कर दूँ, कुरूपति के चरणों में धर दूँ।

काफ़ी सुन्दर तरीके से दिनकर ने कर्ण की भावनाओं को शब्द दिया है और उसका पक्ष पेश किया है। कर्ण कहता है कि मित्रता एक घने पेड़ की ठंडी छाया की तरह है और ऐसे पेड़ को छोड़ कर कौन जाएगा? कर्ण का तर्क है कि वह जिस पेड़ की छाया में खड़ा है, उसे कैसे कटने देगा? दिनकर ने कर्ण के शब्दों में मित्रता और धन की तुलना करते हुए लिखते हैं कि मित्रता के आगे वैकुण्ठ तक का भी त्याग करना पड़े तो यह ग़लत नहीं है। दरअसल, रामधारी सिंह दिनकर कर्ण के शब्दों की प्रासंगिकता आज के ज़माने में खोज रहे हैं और द्वापर से एक उदाहरण लेकर अपनी बात को साबित भी कर रहे हैं।

रामधारी सिंह दिनकर ने ‘कुरुक्षेत्र’ में भीष्म के शब्दों में आज के सत्ताधीशों को शासन करने का तरीका सिखाया है और शत्रु से निपटने का गुर बताया है। भला इसके लिए उन्हें शरशैया पर पड़े भारतवर्ष के उस बूढ़े महावीर से अच्छा कौन मिलता, जिसनें महाभारत जैसे पूरे युद्ध को देखा हो, उसमें हिस्सा लिया हो और कुरुवंश की कई पीढ़ियों को अपना मार्गदर्शन दिया हो। कुरुक्षेत्र में दिनकर शांति की वकालत करते हैं लेकिन ऐसी परिस्थितियों की भी बात करते हैं, जब युद्ध को टाला ही नहीं जा सके। शत्रु को बार-बार क्षमा करने और उसके कुकृत्यों को झेलते रहने का विरोध करते हुए भीष्म ‘कुरुक्षेत्र’ में कहते हैं:

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।
अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।
क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो।

दिनकर की इस कृति में कवि के मन में अंग्रेजों के अत्याचार से उत्पन्न पीड़ा साफ़ झलक देखी जा सकती है। पांडवों ने पग-पग पर कौरवों को क्षमा किया लेकिन शत्रु इसका ग़लत फायदा उठा कर एक से बाद एक बड़ी ग़लती करता रहा और पांडवों को नुकसान पहुँचाता रहा। दिनकर ने भीष्म के शब्दों को अपनी लेखनी से सँवारते हुए लिखा है कि अत्याचार को सहन करना भी ग़लत है। अत्याचार सहन करने से व्यक्ति की क्षमता जाती रहती है। अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के साथ ज्यादतियाँ हों या पाकिस्तान द्वारा बार-बार की जाने वाली हरकतें, भारत और भारतीयों ने जब भी पलटवार किया है, तभी सफलता मिली है।

दिनकर लिखते हैं कि क्षमा भी वही कर सकता है जो सचमुच बलशाली हो, क्षमतावान हो। भारत-चीन युद्ध के बाद भी वह व्यथित थे। उस समय वह राज्यसभा सांसद थे। नेहरू की नीतियों से ख़फ़ा होकर कहा,

रे, रोक युधिष्ठिर को न यहाँ, जाने दे उनको स्वर्ग धीर,
पर, फिरा हमें गाण्डीव-गदा, लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।
कह दे शंकर से, आज करें
वे प्रलय-नृत्य फिर एक बार।
सारे भारत में गूँज उठे, ‘हर-हर-बम’ का फिर महोच्चार।

दिनकर ने संसद में अपनी ये कविता तब पढ़ी, जब भारत चीन से युद्ध हार गया था। यहाँ भी देखिए, वह समसामयिक घटनाक्रम की समस्याओं के समाधान के लिए फिर द्वापर पहुँचते हैं और उस समय के शासक युधिष्ठिर को लेकर आते हैं। दिनकर लिखते हैं कि ऐसे समाय में युधिष्ठिर की नहीं बल्कि गदावीर भीम धनुर्धारी अर्जुन की ज़रूरत है। कई लोगों का मानना है कि दिनकर ने नेहरू के लिए युधिष्ठिर का उदाहरण दिया। दिनकर यहाँ भगवान शिव की बात करते हैं, उनके तांडव नृत्य की बात करते हैं और ‘हर-हर-बम’ की बात करते हैं।

राष्ट्रकवि दिनकर पर कुमात्र विश्वास का शो (साभार: ABP News)

रामधारी सिंह दिनकर भारतीय संस्कृति और इतिहास से उदाहरण लेकर आते तो हैं लेकिन सोचिए अगर आज के ज़माने में कोई ऐसा करे तो वर्ग विशेष द्वारा उसे सांप्रदायिक थाने में कितना वक़्त लगाया जाएगा? वह राष्ट्र के लिए और राष्ट्र की जनता के लिए सोचते थे। तभी भरी सभा में देश के पीएम के ख़िलाफ़ बोलने की हिम्मत रखते थे और चोट भी ऐसी कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। रामधारी सिंह दिनकर की जन्मतिथि 23 सितम्बर है। उनके जीवन के बारे में, उनकी लेखनी के बारे में और उनके विचारों के बारे में चर्चा करने का आज से बेहतर समय भला क्या हो सकता है?

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
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