Wednesday, January 27, 2021
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6 दिसंबर 1992 इस बात का प्रमाण है कि ‘अयोध्या’ वही है, जिसे युद्ध में पराजित नहीं किया जा सकता

तथाकथित धर्म निरपेक्ष पार्टियों के पितामह राममनोहर लोहिया ने कहा था, “देश के धार्मिक इतिहास में भारतीय पुराण के महान लोगों के अस्तित्व पर प्रश्न करना खुद में निरर्थक है। राम हिन्दुस्तान की उत्तर-दक्षिण की एकता के देवता थे।”

पूरा देश जान चुका है कि 6 दिसंबर 1992 को क्या हुआ था। कुछ घंटों के भीतर लाखों कारसेवकों की भीड़ ने विवादित ढाँचा ढहा दिया। देश के बहुसंख्यक हिन्दू समाज की सदियों पुरानी भावनाओं का ज्वार फूटा और बाबरी मस्जिद का ढाँचा गिरा दिया गया। देश का हिन्दू अमूमन इतना प्रतिक्रियावादी नहीं होता है लेकिन यहाँ विषय ही अलग था। पूरा विमर्श यह था कि जो अपना था, उसे हासिल करना है। 

ऐसा भी नहीं था कि यह पहला ऐसा मौक़ा था, जब हिन्दुओं की भावनाएँ सामाजिक और राजनीतिक मंच पर सामने आई थीं। अंतर बस इतना था कि इसके पहले सामने आई भावनाओं पर दबाव डाला जा सका था और लेकिन 1992 में धैर्य बनाए रखने की कोई दलीलें काम न आईं और न ही समरसता को बढ़ावा देने की। 

ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि 6 दिसंबर 1992 को जो कुछ हुआ, वह किसी धार्मिक प्रक्रिया या मान्यता का हिस्सा है। लेकिन ऐसा हुआ क्यों, इस पहलू पर विमर्श लगभग शून्य हैं। 1855 के दौरान अयोध्या (तत्कालीन फैजाबाद) में हिन्दुओं का भीषण प्रतिकार देखने को मिला था, नतीजा अयोध्या की ज़मीन पर संघर्ष हुआ। लगभग 12000 लोगों ने ढाँचे को घेर लिया था, तब भी ढाँचे का एक हिस्सा गिराया गया था। 

हिन्दुओं की एक विशाल भीड़ ने साल 1934 में बाबरी मस्जिद के तीनों गुंबद तोड़ दिए थे लेकिन अयोध्या के कलेक्टर ने इसका पुनर्निर्माण कराया था। इन दो कालखंडों में न तो कोई चुनाव था और न ही राजनीतिक दल… यानी ढाँचे को लेकर जनमानस में आक्रोश शुरुआत से ही था। जो थी वह सिर्फ और सिर्फ आस्था थी, हिन्दुओं की अटूट आस्था। जिसे हमेशा से नज़रअंदाज़ किया गया, नतीजतन 6 दिसंबर 1992 हुआ।     

इसलिए बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में 28 साल बाद दिए गए न्यायालय के आदेश का उल्लेख भी अहम हो जाता है। इसमें सीबीआई की विशेष अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह विध्वंस पूर्व नियोजित नहीं था बल्कि आकस्मिक घटना थी। न्यायाधीश सुरेन्द्र कुमार यादव ने लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा समेत कुल 32 अभियुक्तों को बरी कर दिया था। लगभग तीन दशक तक चली इस सुनवाई के दौरान 17 अभियुक्तों की मृत्यु हो गई थी।        

पूरे विषय के संबंध में देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी का एक भाषण बेहद प्रासंगिक और चर्चित है। इस अभियान के इर्द-गिर्द उस दौर में दिए गए तमाम भाषणों के बीच लोग इस भाषण को जनभावना जागृत करने में अहम मानते हैं। उस भाषण का अंश कुछ इस प्रकार है, “वहाँ नुकीले पत्थर निकले हैं, उन पर तो कोई नहीं बैठ सकता है। तो ज़मीन को समतल करना पड़ेगा, बैठने लायक बनाना पड़ेगा। राम मंदिर के निर्माण का आन्दोलन सिर्फ एक मंदिर के निर्माण का आन्दोलन नहीं है। क्या राम को छोड़ कर इस देश की कल्पना की जा सकती है।” 

लेकिन अवरोध का सबसे बड़ा आधार ऐसी जमात थी, जो राजनीतिक दल से लड़ते-लड़ते श्रीराम के अस्तित्व से लड़ने लगी थी। इन्हें भी सर्वोच्च न्यायालय ने करारा जवाब दिया था। न्यायालय ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था, “श्रीराम को अयोध्या से अलग करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। अयोध्या की पहचान ही राम से है, हिन्दुओं की आस्था के गलत होने का कोई प्रमाण नहीं है।” यह तर्क स्वयं में पर्याप्त था कि इस देश का हिन्दू समाज जिस पर अक्सर असहिष्णु होने का आरोप लगाया जाता है, वह असल मायनों में कितना सहिष्णु है। 

इस संबंध में प्रख्यात समाजवादी और तथाकथित धर्म निरपेक्ष राजनीतिक दलों के पितामह राममनोहर लोहिया के विचार भी लगभग ऐसे ही थे। कभी लोहिया ने कहा था, “मैं जानता हूँ कि इस देश का मानस गढ़ने में राम, कृष्ण और शिव की भूमिका रही है। देश के धार्मिक इतिहास में भारतीय पुराण के इन महान लोगों के अस्तित्व पर प्रश्न करना खुद में निरर्थक है। राम हिन्दुस्तान की उत्तर-दक्षिण की एकता के देवता थे।” 

दुर्भाग्य कि लोहियावादियों ने यह समझने की कोशिश कभी नहीं की और उनका प्रतिरोध राजनीतिक दल से बढ़ कर श्रीराम के अस्तित्व तक पहुँच गया। अयोध्या का अर्थ ही है, ‘जिसे युद्ध में हराया नहीं जा सके’ – सर्वोच्च न्यायालय के आदेश ने यह सिद्ध किया कि अयोध्या को पराजित नहीं किया जा सकता है। जो हिन्दुओं का है, वह हिन्दुओं के पास आना ही था और वह वापस आया।    

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