भारतीय कैलेंडर केवल त्योहारों की तारीख तय करने का माध्यम नहीं रहा है। हजारों वर्षों से यह समय, ऋतुओं के बदलाव, सूर्य और चंद्रमा की गति और उनके जीवन पर प्रभाव को समझने की एक व्यवस्था भी रहा है। आज दुनिया का बड़ा हिस्सा ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ का उपयोग करता है, लेकिन भारत का पारंपरिक पंचांग समय की गणना का अलग तरीका अपनाता है, जिसमें सूर्य और चंद्रमा दोनों की चाल को महत्व दिया जाता है।
इसी कारण भारतीय पंचांग को ‘लूनीसोलर सिस्टम’ यानी चंद्र-सौर प्रणाली कहा जाता है। इस व्यवस्था का सबसे रोचक हिस्सा है ‘अधिक मास’, जिसे ‘पुरुषोत्तम मास’ भी कहा जाता है। यह एक अतिरिक्त महीना होता है, जो कुछ वर्षों के अंतराल पर कैलेंडर का संतुलन बनाए रखने के लिए जोड़ा जाता है।
इस साल अधिक ज्येष्ठ मास शुरू हुआ है। इसके साथ ही फिर से लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि यह अतिरिक्त महीना क्यों आता है, हर साल क्यों नहीं आता, कभी अधिक ज्येष्ठ तो कभी अधिक श्रावण क्यों बनता है और इसे धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण मानने के बावजूद विवाह जैसे शुभ कार्य इस दौरान क्यों टाले जाते हैं।
इन सवालों का जवाब केवल पौराणिक कथाओं में नहीं, बल्कि खगोल विज्ञान और गणित में भी छिपा है।
पश्चिमी कैलेंडर से अलग कैसे काम करता है भारतीय पंचांग?
दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला ग्रेगोरियन कैलेंडर केवल सूर्य की गति पर आधारित है। पृथ्वी को सूर्य का एक चक्कर पूरा करने में लगभग 365 दिन और करीब 6 घंटे लगते हैं। इसी अतिरिक्त समय को संतुलित करने के लिए हर चार साल में एक अतिरिक्त दिन जोड़कर लीप ईयर बनाया जाता है।
भारतीय पंचांग का तरीका अलग है। इसमें सूर्य और चंद्रमा दोनों को महत्व दिया जाता है। महीनों की गणना मुख्य रूप से चंद्रमा की गति से होती है, जबकि सूर्य की चाल कैलेंडर को ऋतुओं से जोड़कर रखती है। यही कारण है कि पंचांग में केवल तारीखें ही नहीं, बल्कि तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण भी शामिल होते हैं, जिन्हें पंचांग के पाँच अंग कहा जाता है।
इस व्यवस्था में चंद्रमा महीनों को तय करता है, जबकि सूर्य ऋतुओं का संतुलन बनाए रखता है। प्राचीन भारतीय विद्वानों ने समझ लिया था कि अगर केवल चंद्र के महीनों के आधार पर कैलेंडर चलाया जाए, तो धीरे-धीरे त्योहार और ऋतुएँ एक-दूसरे से अलग हो जाएँगी। इसलिए एक सुधार प्रणाली की जरूरत थी।
चंद्र और सौर वर्ष के अंतर से पड़ी अधिक मास की जरूरत
चंद्रमा को पूर्णिमा से पूर्णिमा तक एक चक्र पूरा करने में लगभग 29.5 दिन लगते हैं। ऐसे 12 चंद्र मास मिलकर करीब 354 दिनों का एक चंद्र वर्ष बनाते हैं। वहीं सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का होता है। यानी दोनों के बीच हर साल करीब 11 दिनों का अंतर बन जाता है। अगर इस अंतर को ठीक न किया जाए, तो धीरे-धीरे कैलेंडर ऋतुओं से अलग होने लगेगा।
समय के साथ त्योहार अपने तय मौसमों से हट जाएँगे। ऐसा भी हो सकता है कि सर्दियों के त्योहार गर्मियों में आने लगें या फसल से जुड़े पर्व दूसरी ऋतुओं में पहुँच जाएँ। प्राचीन भारतीय खगोलविदों ने इस समस्या को बहुत पहले समझ लिया था और इसका समाधान निकाला। जब यह अंतर काफी बड़ा हो जाता है, तब एक पूरा अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है।
लगभग 32 महीने बाद ही क्यों आता है अधिक मास?
चूँकि चंद्र और सौर वर्ष के बीच हर साल लगभग 11 दिनों का अंतर होता है, इसलिए करीब तीन साल में यह अंतर 33 दिनों के आसपास पहुँच जाता है, जो लगभग एक चंद्र महीने के बराबर है। इसी वजह से लगभग 32 महीने 16 दिन और कुछ घंटों के बाद एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है। यही अधिक मास कहलाता है।
यह पश्चिमी लीप ईयर सिस्टम से अलग है। ग्रेगोरियन कैलेंडर में हर चार साल में केवल एक दिन जोड़ा जाता है, जबकि भारतीय पंचांग में पूरा महीना जोड़ा जाता है, क्योंकि यहाँ केवल दिनों का नहीं बल्कि चंद्र और सौर चक्रों के संतुलन का सवाल होता है। यह व्यवस्था प्राचीन भारतीय समय गणना की गहराई को दिखाती है।
आधुनिक उपकरणों के बिना भी विद्वानों ने ऐसा सिस्टम बनाया, जिसने त्योहारों, ऋतुओं और खगोलीय चक्रों को एक साथ जोड़े रखा।
कैसे तय होता है कौन-सा महीना बनेगा अधिक मास?
बहुत से लोग सोचते हैं कि अधिक मास हर तीन साल में आने वाला एक तय अतिरिक्त महीना है, लेकिन इसकी गणना इससे कहीं ज्यादा जटिल होती है। इसे तय करने में संक्रांति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। संक्रांति का अर्थ है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना।
सामान्य रूप से हर चंद्र महीने में सूर्य एक नई राशि में प्रवेश करता है और एक संक्रांति होती है। लेकिन अगर कोई चंद्र मास ऐसा गुजर जाए, जिसमें सूर्य किसी नई राशि में प्रवेश न करे, यानी उस पूरे महीने में कोई संक्रांति न हो, तो वही महीना अधिक मास बन जाता है। यही कारण है कि हर बार अधिक मास का नाम एक जैसा नहीं होता।
अगर यह स्थिति ज्येष्ठ महीने में बने, तो वह अधिक ज्येष्ठ कहलाता है। अगर श्रावण में बने, तो अधिक श्रावण कहा जाता है। इसी तरह अन्य महीने भी अधिक मास बन सकते हैं। इस साल यह स्थिति ज्येष्ठ महीने में बनी है, इसलिए इसे अधिक ज्येष्ठ कहा जा रहा है।
कभी अधिक ज्येष्ठ तो कभी अधिक श्रावण क्यों बनता है?
यह लोगों के बीच सबसे सामान्य सवालों में से एक है, क्योंकि अधिक मास को अक्सर केवल अधिक श्रावण से जोड़कर देखा जाता है। इसका जवाब फिर सूर्य और चंद्रमा की गति में ही छिपा है। चंद्र महीने अपनी गति से चलते रहते हैं, जबकि सूर्य अपनी अलग चाल से राशियों में आगे बढ़ता है।
कभी-कभी ऐसा होता है कि ज्येष्ठ के पूरे चंद्र महीने में सूर्य कोई नई राशि में प्रवेश नहीं करता। तब ज्येष्ठ अधिक ज्येष्ठ बन जाता है। दूसरी बार यही स्थिति श्रावण में बन सकती है, तब वह अधिक श्रावण कहलाएगा। यानी अतिरिक्त महीना किसी एक तय महीने से जुड़ा नहीं होता। यह पूरी तरह खगोलीय गणना और संक्रांति के नियमों पर निर्भर करता है।
इसी कारण कभी लोगों को अधिक ज्येष्ठ देखने को मिलता है और कभी अधिक श्रावण।
लोगों के बीच अधिक श्रावण की ज्यादा चर्चा क्यों होती है?
हालाँकि कोई भी महीना अधिक मास बन सकता है, लेकिन लोगों को अधिक श्रावण ज्यादा याद रहता है। इसकी वजह खगोल विज्ञान से ज्यादा सामाजिक और धार्मिक है। श्रावण या सावन का हिंदू परंपरा में विशेष महत्व है। यह भगवान शिव की उपासना से जुड़ा महीना माना जाता है।
कांवड़ यात्रा, सावन सोमवार, शिव मंदिरों में पूजा और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के कारण यह महीना सार्वजनिक जीवन में बेहद प्रमुख दिखाई देता है। जब अधिक श्रावण आता है, तो सोमवारों और धार्मिक अनुष्ठानों की संख्या बढ़ जाती है, जिससे लोगों का ध्यान इस ओर ज्यादा जाता है।
उदाहरण के तौर पर अधिक श्रावण के दौरान आठ सावन सोमवार और नौ मंगल गौरी व्रत तक पड़ सकते हैं। इसी वजह से कई लोगों को लगने लगा कि अधिक मास का मतलब हमेशा अतिरिक्त श्रावण ही होता है, जबकि ऐसा नहीं है।
श्रावण, चातुर्मास और विस्तारित पूजा-अर्चना
श्रावण को चातुर्मास का पहला महीना माना जाता है। चातुर्मास में श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक शामिल होते हैं। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए श्रावण महीने में कठोर तप और व्रत किए थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनकी इच्छा स्वीकार की।
इसी कारण श्रावण महीना शिव और पार्वती की पूजा के लिए विशेष माना जाता है। अधिक श्रावण के दौरान यह महीना लंबा हो जाता है। भक्त भगवान शिव के लिए सोमवार का व्रत रखते हैं और मंगलवार को माता पार्वती की पूजा करते हैं। महिलाएँ परिवार की सुख-समृद्धि और लंबी आयु के लिए मंगल गौरी व्रत करती हैं।
बुधवार भगवान विट्ठल, गुरुवार गुरु, शुक्रवार माता लक्ष्मी और तुलसी, शनिवार शनि देव और रविवार सूर्य देव को समर्पित माना जाता है। इस दौरान भगवान शिव का अभिषेक भी किया जाता है। दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बने पंचामृत से पूजा होती है। बेलपत्र चढ़ाए जाते हैं और महामृत्युंजय मंत्र, गायत्री मंत्र तथा रुद्र गायत्री का जाप किया जाता है।
कई लोग इस समय सात्विक जीवनशैली अपनाते हैं और मांसाहार, शराब व तंबाकू जैसी चीजों से दूरी बनाते हैं।
अलग-अलग कैलेंडर परंपराओं से भी बदलती हैं श्रावण की तारीखें
श्रावण को लेकर भ्रम की एक वजह भारत में मौजूद दो अलग-अलग चंद्र कैलेंडर परंपराएँ भी हैं। हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश जैसे उत्तर भारतीय राज्यों में पूर्णिमांत पंचांग का पालन होता है, जिसमें महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है।
वहीं महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, गोवा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में अमांत प्रणाली ज्यादा प्रचलित है, जिसमें महीना अमावस्या पर समाप्त होता है। इसी अंतर के कारण अलग-अलग राज्यों में श्रावण की तारीखें बदल सकती हैं, हालांकि धार्मिक महत्व लगभग समान रहता है।
मलमास से पुरुषोत्तम मास तक की पौराणिक कथा
अधिक मास का धार्मिक और पौराणिक महत्व भी काफी बड़ा है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में बताया गया है कि पहले इस अतिरिक्त महीने को मलमास कहा जाता था। कथा के अनुसार जब यह अतिरिक्त महीना बना, तब बाकी बारह महीनों ने इसे स्वीकार नहीं किया, क्योंकि इसका संबंध किसी संक्रांति से नहीं था। इसे उपेक्षित और महत्वहीन माना गया।
यहाँ ‘मल’ शब्द का अर्थ गंदगी नहीं बल्कि उपेक्षित या छोड़ा हुआ था। अपमानित होकर यह महीना भगवान विष्णु के पास पहुँचा और अपना दुःख बताया। तब भगवान विष्णु ने इसे अपनाया और अपना एक पवित्र नाम ‘पुरुषोत्तम’ इसे दे दिया, जिसका अर्थ है सर्वोच्च पुरुष। तभी से मलमास पुरुषोत्तम मास कहलाने लगा और इसे विशेष आध्यात्मिक महत्व प्राप्त हुआ।
यह कथा यह संदेश भी देती है कि जिसे समाज कभी महत्वहीन समझे, वही आगे चलकर सम्मान और आदर प्राप्त कर सकता है।
पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व
पुरुषोत्तम मास का वैष्णव परंपरा में विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और उनके विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। भक्त भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हैं। कई मंदिरों में कथा, भजन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
मान्यता है कि चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में चले जाते हैं, जबकि भगवान शिव सृष्टि के कार्यों का संचालन संभालते हैं। इसे पुराने चक्रों के समाप्त होने और नए बदलावों के आने के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।
इस दौरान क्यों टाले जाते हैं विवाह और नए काम?
हालाँकि पुरुषोत्तम मास को पवित्र माना जाता है, लेकिन इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मूर्ति स्थापना और नए व्यापार जैसे शुभ कार्य अक्सर टाल दिए जाते हैं। परंपरागत रूप से इस महीने को आत्मचिंतन और भक्ति का समय माना गया।
इसे वार्षिक चक्र के बीच एक ठहराव की तरह देखा गया, जहाँ सामाजिक उत्सवों की बजाय पूजा, दान, ध्यान और साधना को महत्व दिया गया। यही वजह है कि इस महीने का सम्मान भी किया जाता है और बड़े मांगलिक कार्यों से इसे अलग भी रखा जाता है।
सामाजिक जीवन और खेती-किसानी में भी थी अधिक मास की भूमिका
इतिहास में पंचांग केवल मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं था। यह खेती, यात्रा, त्योहारों और दैनिक जीवन को भी प्रभावित करता था। इसलिए अधिक मास जैसी व्यवस्थाएँ ऋतुओं और सामाजिक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाए रखने में मदद करती थीं।
अलग-अलग क्षेत्रों में इस महीने से जुड़ी अपनी परंपराएँ विकसित हुईं। कहीं दान-पुण्य को महत्व मिला, कहीं भागवत कथा आयोजित की गई, तो कहीं भगवान विष्णु की पूजा पर विशेष जोर दिया गया। इस तरह अधिक मास केवल गणितीय सुधार नहीं बल्कि सांस्कृतिक जीवन का भी हिस्सा बन गया।
अधिक मास- विज्ञान और आस्था के मिलन का प्रतीक
आज के समय में विज्ञान और आस्था को अक्सर एक-दूसरे के विरोध में देखा जाता है, लेकिन अधिक मास एक अलग तस्वीर पेश करता है। इसकी शुरुआत एक खगोलीय समस्या के समाधान के रूप में हुई थी, जहाँ चंद्र और सौर वर्षों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत थी। बाद में इसके साथ धार्मिक मान्यताएँ और सांस्कृतिक परंपराएँ जुड़ती चली गईं।
इसी कारण अधिक मास आज खगोल विज्ञान, कैलेंडर गणना, पौराणिक कथाओं और सामाजिक परंपराओं के संगम का प्रतीक बन चुका है। यह महीना याद दिलाता है कि भारतीय समय गणना केवल दिनों की गिनती तक सीमित नहीं थी। इसमें ग्रहों की चाल, ऋतुएँ, खेती, त्योहार और मानव जीवन, सबको एक साथ जोड़ने की कोशिश की गई थी।
शायद यही वजह है कि हजारों साल पुरानी यह परंपरा आज भी लोगों के जीवन में उतनी ही प्रासंगिक बनी हुई है।
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