गुजरात हाईकोर्ट ने बुधवार (24 दिसंबर 2025) को शक्तिपीठ अंबाजी मंदिर से जुड़े लंबे समय से चल रहे विवाद पर अपना फैसला सुनाया। इस मामले का मुख्य मुद्दा मंदिर के स्वामित्व को लेकर था, हालाँकि इससे जुड़े कई सवाल कोर्ट के सामने थे।
कोर्ट ने अपने फैसले में उस ट्रस्ट को वैध ठहराया, जिसके तहत फिलहाल अंबाजी मंदिर को चलाया जा रहा है। इसके साथ ही कोर्ट ने दांता के शाही परिवार को नवरात्रि के आठवें दिन विशेष पूजा करने और उस दौरान श्रद्धालुओं के प्रवेश पर रोक लगाने के अधिकार को भी समाप्त कर दिया। इस फैसले के बाद अंबाजी मंदिर के प्रबंधन और पूजा से जुड़े विशेष अधिकारों को लेकर चला आ रहा विवाद खत्म हो गया।
शक्तिपीठ अंबाजी मंदिर के मालिकाना हक के विवाद का इतिहास
यह मामला दांता के शाही परिवार के हाईकोर्ट में दायर अपील से शुरू हुआ। इस याचिका में 2008 के बनासकांठा जिला कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। याचिका में कहा गया कि अंबाजी मंदिर उनके पूर्वजों से उन्हें विरासत में मिला है, इसलिए यह उनका निजी/व्यक्तिगत संपत्ति है। अगर यह निजी संपत्ति है, तो मंदिर का संचालन सार्वजनिक ट्रस्ट द्वारा नहीं किया जा सकता, इसलिए ट्रस्ट को गैरकानूनी घोषित किया जाना चाहिए।
साल 2011 में मंदिर ट्रस्ट ने आपत्ति याचिका दायर की। ट्रस्ट ने कहा कि मंदिर ट्रस्ट पूरी तरह से वैध है। साथ ही, दांता के शाही परिवार की परंपरा नवरात्रि के आठवें दिन मंदिर में पूजा करने और इस दौरान श्रद्धालुओं के प्रवेश पर रोक लगाने को भी बंद किया जाना चाहिए क्योंकि अब सभी लोग बराबर हैं।
आखिरकार, यह मामला हाईकोर्ट तक पहुँचा। हाईकोर्ट ने अपना फैसला देते समय मामले को दो हिस्सों में बाँटा आजादी से पहले की स्थिति और आजादी के बाद की स्थिति।
हाईकोर्ट ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि 1948 से पहले उस क्षेत्र में राजनीतिक शक्ति दांता के महाराजा के पास थी लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज, जमीन के रिकॉर्ड और गजट से पता चलता है कि मंदिर की मालिक माता जी (माँ अंबाजी) हैं और महाराजा केवल उनके सेवक या प्रशासक थे।
यहाँ यह उल्लेख करना जरूरी है कि भारतीय कानून के अनुसार, मंदिर में रहने वाली देवी ही मंदिर की मालिक मानी जाती हैं। कोर्ट ने स्वतंत्रता से पहले के 1934 और 1937 के सिविल कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया। इन फैसलों में भी यह स्पष्ट किया गया कि महाराजा केवल मंदिर के प्रबंधक थे क्योंकि वह वहाँ के शासक थे, ना कि मालिक।
1934 और 1937 के फैसलों में सिविल कोर्ट ने लिखा कि महाराजा मंदिर का मालिक नहीं थे बल्कि केवल प्रशासक थे और संपत्ति देवी (माँ अंबाजी) की थी। हाईकोर्ट के अनुसार, यह तथ्य कि इन फैसलों को बाद में किसी भी कोर्ट में चुनौती नहीं दी गई, यह स्पष्ट करता है कि स्वतंत्रता से पहले भी शाही परिवार का मंदिर पर कोई मालिकाना हक नहीं था।
आजादी के बाद विवाद की समय-सीमा
भारत ने 1947 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता हासिल की और 1948 तक सभी रियासतों को भारतीय संघ में शामिल कर लिया गया। 5 अक्टूबर 1948 को दांता के महाराजा ने सरकार के साथ विलय समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के अनुसार, राजा अपनी निजी संपत्ति रख सकते थे और राज्य या सार्वजनिक संपत्ति सरकार को दी जाती।
महाराजा ने विलय के बाद जो सूची प्रस्तुत की, उसमें अंबाजी मंदिर और उससे जुड़े अन्य संपत्ति को निजी संपत्ति के रूप में बताया। सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया और कई पत्रों में स्पष्ट किया कि महाराजा मंदिर के सेवक हैं और मंदिर एक धार्मिक संस्था है, इसलिए इसका प्रबंधन सार्वजनिक ट्रस्ट द्वारा किया जाएगा। उस समय की बॉम्बे सरकार ने महाराजा को ट्रस्ट का अध्यक्ष बनने का भी आमंत्रण दिया लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया और अड़े रहे कि मंदिर उनकी संपत्ति में आता है और इसका पूरा प्रबंधन उन्हें सौंपा जाए।
1954 में महाराजा बॉम्बे हाईकोर्ट गए और मंदिर पर सरकार के कब्जे को रोकने के लिए स्थगन की माँग की। हाईकोर्ट ने अस्थायी राहत दी और सरकार की कार्रवाई रोक दी। इसी बीच मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा और 1957 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया।
सुप्रीम कोर्ट का 1957 का फैसला एक अहम मोड़ था
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दांता के महाराजा मंदिर पर अपने मालिकाना हक को साबित नहीं कर पाए हैं और यह संपत्ति एक धार्मिक संस्था है। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 363 का हवाला देते हुए कहा कि विलय समझौते से जुड़े मामलों की दोबारा सुनवाई कोर्ट नहीं कर सकती। इसलिए मंदिर के स्वामित्व का सवाल यहीं खत्म हो जाता है।
संविधान का अनुच्छेद 363 यह स्पष्ट करता है कि देश की कोई भी कोर्ट रियासतों के विलय के समय किए गए समझौतों में दखल नहीं दे सकती और न ही ऐसे मामलों को दोबारा खोलकर सुन सकती है। यह प्रावधान इसलिए किया गया था ताकि विलय के समय हुए समझौतों को बाद में कोर्ट में चुनौती न दी जाए और कोर्ट पर बिना मतलब का बोझ न पड़े।
कोर्ट के आदेश पर सरकार ने मंदिर को अपने कब्जे में ले लिया, लेकिन विवाद जारी रहा
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन करते हुए सरकार ने अंबाजी मंदिर का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया। गुजरात राज्य की स्थापना 1960 में हुई और इसके बाद 1961 में सरकार ने मंदिर के लिए एक प्रशासक नियुक्त किया। इस प्रशासक ने बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के तहत ‘श्री अंबाजी माता देवस्थान’ के नाम से सार्वजनिक ट्रस्ट बनाने के लिए आवेदन किया। दांता के महाराजा ने इसका विरोध किया।
महाराजा के विरोध के बाद जॉइंट चैरिटी कमिश्नर ने मामले की जाँच की, दोबारा आवेदन हुए और मामला जिला अदालत तक पहुँचा। कई सालों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बावजूद सभी संस्थाओं और अदालतों का यही रुख रहा कि मंदिर का स्वामित्व शाही परिवार के पास नहीं है।
हालाँकि, 1979 में एक अहम मोड़ आया। जॉइंट चैरिटी कमिश्नर ने महाराजा की मालिकाना हक की माँग को खारिज कर दिया लेकिन उन्हें नवरात्रि के दौरान कुछ विशेष पूजा करने की अनुमति दे दी। यही से एक नया विवाद शुरू हो गया।
जॉइन चैरिटी कमिश्नर ने शाही परिवार को यह खास अधिकार दिया, जिसे बाद में बनासकांठा कोर्ट ने भी बरकरार रखा
महाराजा ने मंदिर के स्वामित्व का दावा करते हुए बनासकांठा जिला कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसी बीच 1981 में मंदिर ट्रस्ट ने याचिका दायर कर शाही परिवार को मिले विशेष पूजा अधिकार पर आपत्ति जताई।
आखिरकार 2008 में बनासकांठा जिला कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने एक बार फिर मंदिर ट्रस्ट को वैध ठहराया और महाराजा के स्वामित्व संबंधी दावों को खारिज कर दिया। हालाँकि, कोर्ट ने जॉइंट चैरिटी कमिश्नर द्वारा दिए गए नवरात्रि पूजा के विशेष अधिकार को बरकरार रखा।
इसके बाद महाराजा ने फिर से गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया और बनासकांठा कोर्ट के फैसले को पलटने की माँग की। उन्होंने ट्रस्ट को अवैध घोषित करने और मंदिर का स्वामित्व अपने नाम करने की माँग की। इसके जवाब में मंदिर ट्रस्ट ने भी आपत्ति याचिका दायर कर शाही परिवार को मिले विशेष पूजा अधिकार को चुनौती दी।
गुजरात उच्च न्यायालय का फैसला
गुजरात हाईकोर्ट के सामने मुख्य रूप से दो सवाल थे पहला, क्या बनासकांठा जिला कोर्ट का 2008 का फैसला कानूनन सही था और दूसरा, क्या चैरिटी कमिश्नर या किसी अन्य प्राधिकरण द्वारा शाही परिवार को दिया गया विशेष पूजा अधिकार सही था।
कोर्ट ने कहा कि पहले सवाल पर उसके पास ज्यादा गुंजाइश नहीं है क्योंकि इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 1957 में ही तय कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कोई भी निचली कोर्ट दोबारा विचार नहीं कर सकती। इसके अलावा, अगर कोर्ट ऐसा करना भी चाहे, तो संविधान का अनुच्छेद 363 इसमें बाधा बनता है। यह अनुच्छेद साफ तौर पर कहता है कि 1948 के विलय समझौते को बाद में किसी भी कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि शाही परिवार कभी भी मंदिर पर अपने मालिकाना हक को साबित नहीं कर पाया। सभी दस्तावेजों में उन्हें केवल संरक्षक या प्रबंधक बताया गया है, मालिक नहीं। मंदिर की संपत्ति देवी की मानी जाती है। इसलिए कोर्ट ने माना कि अंबाजी मंदिर कभी भी निजी संपत्ति नहीं रहा है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ इस वजह से कि ऐतिहासिक रूप से मंदिर का प्रबंधन महाराजाओं के हाथ में था, उन्हें मालिक नहीं माना जा सकता। प्रबंधन एक सीमित जिम्मेदारी है, इससे संपत्ति पर मालिकाना अधिकार सिद्ध नहीं होता।
नवरात्रि के दौरान पूजा करने के शाही परिवार के विशेषाधिकार पर कोर्ट का फैसला
नवरात्रि के आठवें दिन अंबाजी मंदिर में शाही परिवार को मिलने वाले विशेष पूजा अधिकार के मुद्दे पर गुजरात हाईकोर्ट ने साफ सवाल उठाया, “जब किसी व्यक्ति का किसी संपत्ति पर मालिकाना हक ही नहीं है, तो उसे वहाँ विशेष अधिकार कैसे मिल सकता है?” कोर्ट ने कहा कि चैरिटी कमिश्नर और अन्य प्राधिकरणों द्वारा दिया गया यह विशेष अधिकार कानूनी रूप से गलत है और इसमें सुधार जरूरी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि 1947 के बाद भी शाही परिवार को मिले ये विशेष अधिकार जारी रहने थे। न तो बॉम्बे सरकार और न ही गुजरात सरकार के किसी दस्तावेज में ऐसी कोई बात दर्ज है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता से पहले अगर कोई परंपरा थी, तो जरूरी नहीं कि उसे स्वतंत्रता के बाद भी कानूनी संरक्षण मिले और इस मामले में ऐसा कोई आधार नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि कुछ समय के लिए भी श्रद्धालुओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन है। यह एक धार्मिक संस्था है, जहाँ सभी बराबर हैं। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जब शाही परिवार के पास मंदिर का स्वामित्व ही नहीं है, तो चैरिटी कमिश्नर के पास उन्हें कोई विशेष पूजा अधिकार देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था।
वहीं, शाही परिवार ने अनुच्छेद 25 और 26 का हवाला देते हुए दलील दी कि परंपरा खत्म होने से उनकी धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित होगी। इस पर कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता जरूर देते हैं लेकिन यह सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के अधीन हैं।
सार्वजनिक मंदिर में लोगों को प्रवेश से रोकना धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पूर्व शासक रहे हों या कोई और किसी को भी विशेष दर्जा नहीं दिया जा सकता और कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है।
इसी आधार पर गुजरात हाईकोर्ट ने बनासकांठा जिला कोर्ट के 2008 के फैसले के खिलाफ शाही परिवार की पहली अपील खारिज कर दी और सार्वजनिक ट्रस्ट को वैध ठहराया। साथ ही कोर्ट ने ट्रस्ट की आपत्ति याचिका स्वीकार करते हुए शाही परिवार को दिए गए सभी विशेष पूजा अधिकार रद्द कर दिए और श्रद्धालुओं को मंदिर से बाहर रखने की अनुमति भी समाप्त कर दी।
फैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ, शाही परिवार जल्द ही सुप्रीम कोर्ट का खटखटा सकता है दरवाजा
इस मामले में गुजरात हाईकोर्ट के फैसले को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। एक वर्ग का मानना है कि अब रियासतों का दौर खत्म हो चुका है, इसलिए पुराने विशेष अधिकारों का खत्म होना स्वाभाविक है। उनका कहना है कि शाही परिवार को पूजा करने से कोई रोक नहीं है, लेकिन अब मंदिर में सभी श्रद्धालुओं के साथ समान व्यवहार होना चाहिए और सबको प्रवेश मिलना चाहिए।
वहीं दूसरी ओर, शाही परिवार के समर्थकों और कुछ लोगों का कहना है कि यही एक परंपरा थी, जो शाही परिवार और अंबाजी मंदिर को जोड़ती थी और भावनात्मक महत्व के कारण इसे जारी रहना चाहिए था।
उनका तर्क है कि कई लोगों की आस्था और भावनाएँ शाही परिवार और मंदिर से जुड़ी हुई हैं। भले ही रियासतें खत्म हो चुकी हों लेकिन लोगों की भावनाएँ आज भी कई पूर्व रियासतों में शाही परिवारों के साथ जुड़ी हुई हैं।
इसी वजह से अब यह माँग उठने लगी है कि शाही परिवार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाए। मामले के लंबे इतिहास और इसके महत्व को देखते हुए यह तय माना जा रहा है कि यह मामला अंततः देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुँचेगा।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती में मेघल सिंह परमार ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)


