Thursday, January 28, 2021
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फिरोज खान काण्ड पर तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा उठाए गए हर प्रश्न का BHU के विद्वानों ने दिया उत्तर

BHU के विद्वानों ने SVDV में फिरोज खान की नियुक्ति से पैदा हुए संस्कृत भाषा, कबीर, रहीम रसखान, कर्मकाण्ड, उनके भजन-श्लोक, संस्कृत प्रेमी के साथ, क्यों नहीं हो सकते हमारे आचार्य और उनके काबिलियत जैसे सभी प्रश्नों और भ्रमों का जनता और मीडिया को दिया जवाब

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों द्वारा डॉ. फिरोज की नियुक्ति विरोध जारी है। लगातार आंदोलन के तहत कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। शकराचार्यों, काशी विद्वत परिषद, सहित तमाम प्रोफेसरों, आचार्यों और विद्वानों का समर्थन छात्रों को मिल रहा है। तमाम विद्वान ने इस बात पर आपत्ति जताई कि मीडिया एक धड़े ने अपने अज्ञान वश या बिना यहाँ की स्थिति जाने ही आंदोलन के शुरूआती दौर से ही इसे संस्कृत भाषा और मजहब का प्रश्न बनाकर एक बार फिर हिन्दुओं को असहिष्णु सिद्ध करने में लग गए।

काशी विद्वत परिषद के वर्तमान पदाधिकारी और SVDV के पूर्व प्रोफ़ेसर रामयत्न शुक्ल ने कहा भी कि हमारे लिए वसुधैव कुटुम्बकम नारा नहीं है बल्कि जीवन शैली है और इसके तहत ही भारत ने सभी को अपनाया। लेकिन कभी भी दूसरे की परम्पराओं में हस्तक्षेप नहीं किया। बाहर के लोगों ने हमारी सहृदयता को हमारी कमजोरी समझी और समय-समय पर हमें नुकसान पहुँचाया। लेकिन कठिन से कठिन समय में भी धर्म की रक्षा के लिए कोई न कोई खड़ा रहा जिसकी बदौलत आज हमारी सनातन परम्पराएँ जीवित हैं। आज उन्हीं परम्पराओं की रक्षार्थ छात्र खड़े हैं। इनका आज संघर्ष करना केवल आज के लिए नहीं है बल्कि आने वाले समय और पीढ़ियों के लिए है। और आज जब मीडिया सहित तमाम लोग बिना जाने इनके विरोध में हैं तो हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम उन्हें सही मुद्दे से अवगत कराएँ।

न्याय शास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान प्रोफ़ेसर शिवराम गंगोपाध्याय ने कहा, “लोगों के बीच मीडिया द्वारा फैलाए भ्रम और उनके खुद के अज्ञान के कारण विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा। लेकिन इसमें दोष किसका है? जब संकाय और BHU के लोग ही संस्कृत विद्या धर्म संकाय’ के नियमों से ठीक से अवगत नहीं हैं। यह विवाद होता ही नहीं अगर कुलपति (VC) और विभागाध्यक्ष उमाकांत चतुर्वेदी को नियमों की जानकारी होती।

न्याय शास्त्र के ही एक और प्रोफ़ेसर वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी ने भी अपने वक्तव्य में प्रशासन की कमी को रेखांकित किया। उन्होंने साथ ही तमाम विद्वानों ने मीडिया द्वारा फैलाए भ्रम और इधर-उधर की सही और अधकचरी सभी सवालों का जवाब दिया है। जिसे ऑपइण्डिया आपके सामने लेकर आई है तो अगर आप अभी भी संदेह में हों या किसी भ्रम के शिकार हों और गूगल पर फैली आधी-अधूरी और गलत जानकारी को ही ज्ञान समझ कर अपना लिए हों तो पढ़िए, खुद समझिए और दूसरों को भी समझाइए ताकि सही मुद्दा लोगों तक पहुँचे और विश्विद्यालय अपनी गलतियों को सुधारने के लिए विवश हो।

कल अस्सी घाट के सुबहे बनारस के मंच पर हुए कार्यक्रम में सवालों का जवाब देने के क्रम में SVDV के ही पूर्व छात्र डॉ. मुनीश मिश्र ने कहा, “हम स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मों भयावहः जैसे वाक्यों का अनुसरण करने वाले वैदिक सनातनी है।” उन्होंने कहा कि संस्कृत का ज्ञान होना पृथक विषय है पर उस परम्परा का आचार्य बनना अलग बात है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज कुछ तथाकथित बुद्धिजीवीयों के द्वारा भी छात्रों और देश की जनता को गलत बताया जा रहा है। आज उन तमाम प्रश्नों का उत्तर मैं यहाँ सार्वजनिक रूप से देने जा रहा हूँ। तो पेश है कुछ प्रमुख प्रश्न और उनके उत्तर:


शिक्षक की नियुक्ति की बर्खास्तगी का अधिकार छात्रों को किसने दिया?

पुराणों के अनुसार कई विद्यार्थियों ने अपने आचरण से प्रतिकूल गुरु का परित्याग किया जैसे भक्त प्रह्लाद जी ने शुक्राचार्य पुत्र सण्डामर्क का परित्याग किया क्योंकि वो परमात्मज्ञानाश्रयी थे और सण्डामर्क दैत्य समर्थक थे इसलिए सनातन शास्त्र में व्यवस्था है कि शिष्य प्रतिकूल गुरु का परित्याग कर सकता है।

भाषा का भी कोई धर्म होता है क्या?

भाषा के धर्म का पता नहीं पर हर धर्म की शास्त्रीय भाषा जरूर होती है जिसके सहारे हमे उस धर्म की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है यदि ऐसा नहीं होता तो अलग अलग धर्मों के अंतरंग तथ्यों के विषय में जानने के लिए उस भाषा में लिखित ग्रंथ को नहीं पढ़ना पड़ता। जैसे इस्लाम धर्म को जानने के लिये ऊर्दू फारसी में लिखित ग्रंथों को पढ़ना पड़ता है, ईसाई धर्म के अंतरंग जानकारी के लिए बाईबिल पढ़ना पड़ता है और सनातन के गूढ़ रहस्यों को जानने के लिए संस्कृत में लिखित शास्त्र ही परम सहायक होतें हैं। इसलिए अपने अंतरंग रहस्यों की रक्षार्थ अपने शास्त्रों को अन्य धर्मावलंबियों से बचा कर रखने की अत्यावश्यक्ता है।

कबीर, रहीम, रसखान, दाराशिकोह इन सब के साथ एपीजे अब्दुल कलाम जैसे लोगों का सम्मान और फिरोज खान का विरोध क्यों?

रहीम, रसखान, दाराशिकोहादि ने संस्कृत तथा सनातन परम्परा के ग्रंथों के जानकार होने पर भी सनातन धर्माचार्यों के पद प्राप्ति के लिए ना तो कोई आवेदन किया ना हीं कोई आंदोलन किया और ना ही वे किसी पद के लोलुप थे किन्तु फिरोज़ खान यह जानते हुए कि ये केवल सनातनियों के लिए उपयुक्त पद है फिर भी अपने जिद्द पर अड़कर उस पद की दावेदारी बनाए हुए हैं इसलिए भइया हम उदारवादी लोग हैं जिन्होंने सनातन को समझा पर दावेदारी नहीं की ऐसे रसखान, रहीम का हृदय से सम्मान करते है किन्तु यदि कोई हमारे घर में आकर अपना दावेदारी ठोकेगा तो हमें उसका विरोध करना भी आता है। हमने हर दौर में ऐसे प्रतिकार किए तभी आज सनातन परम्परा को बहुत हद तक बचा पाए हैं। संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के मूल में ही प्राच्च विद्या का संवर्धन और संरक्षण है और ये अपने आप में एक विशिष्ठ संस्थान है।

फिरोज़ के घर में सभी संस्कृत प्रेमी हैं पिता भजन श्लोक आदि का गायन करते हैं फिर भी आप लोगों को क्या आपत्ति है?

संस्कृत पढ़ना कोई कौतूहल की बात नहीं है पर संस्कृत प्रेमी कहना पूर्ण सत्य नहीं है यदि ये संस्कृत प्रेमी होते तो दूसरे के धर्म पर आघात नहीं करते मुझे लगता है ये केवल व्यवसायिक तौर पर ही संस्कृत को पढ़ें है यदि ये तीन पीढ़ी से संस्कृत ही पढ़ रहे हैं, भजन-श्लोक गाने में ही रूचि है तथा वैचारिक रूप से सनातनी ही है तो फिर इन्होंने अबतक सनातन धर्म क्यों नहीं अपना लिया? एक तरफ ये नमाज भी पढ़तें हैं, बकरीद जैसे हिंसक पर्व भी मनाते हैं और दूसरे तरफ आजीविका के लिए मंदिर में भजन गाते हैं। सनातनी होने का ढोंग है ये सब आजीविका के लिए ये सब दिखावा करते हैं। संस्कृत प्रेमी संस्कृत शास्त्रों का उल्लंघन नहीं करता इसलिए फिरोज को संस्कृत प्रेमी कहना अनुचित है।

फिरोज़ खान को वेद कर्मकांड नहीं अपितु साहित्य पढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया है उनसे रसगंगाधर पढ़ने में क्या आपत्ति है?

उत्तर: रसगंगाधर हीं नहीं अपितु काव्यप्रकाशादि भी पढ़ाने के अधिकारी नहीं है क्योंकि वे देवी देवताओं को नहीं मानते ऐसे में देवी देवतादि विषयक रति को कहीं रस ना कहने लग जाएँ जो कि शास्त्र विरुद्ध है। एक बात और साहित्य केवल रसगंगाधर तक सीमित नहीं है ज्यादातर साहित्यिक ग्रंथों के उपजीव्य वेद पुराण हीं है अतः साहित्य को लौकिक कहना अनुचित है।

क्या आपके लिए काबिलियत कोई महत्व नहीं रखता किसी विद्वान से ज्ञान लेने के बजाय उसका धर्म जानना जरूरी है?

जब जाति के आधार पर आरक्षण काबिलियत को निगल जाती है तब तो कोई नहीं बोलता आज लोग काबिलियत की बात कर रहें है। बात यहाँ काबिलियत का निरादर करने की नहीं हैं यदि वो इतने काबिल हैं तो झगड़ा करने के बजाए दूसरे विभाग में स्थानांतरण हेतु एक आवेदन डाल दें। हम उनकी काबिलियत को सलाम करेंगे किन्तु यदि कोई धर्म पढ़ाने आएगा तो उससे उसका धर्म जरूर पूछा जाएगा। उदाहरण के रूप में जैसे जिस व्यक्ति ने स्वयं कभी वाहन नहीं चलाया और हम उसे किसी को वाहन सिखाने के लिए नियुक्त कर दे तो क्या होगा सीखने तथा सिखाने वाले दोनों दुर्घटनाग्रस्त हो जाएँगे। इसलिए धर्म सिखाने वाले गुरु को भी उसी धर्म का होना आवश्यक है।

अस्सी घाट पर हुए कार्यक्रम में डॉ. मुनीश मिश्र सहित सभी विद्वानों और पूर्व छात्रों ने लोगों के सवालों और मीडिया में उछाले गए कई कुतर्कों का जवाब दिया। साथ ही उन्होंने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा भी कि यदि कोई झूठ फैला रहा हो या फिर से कोई नया प्रश्न आ जाए बेशक वह तर्क के नाम पर कुतर्क ही क्यों न हो तो आप हमें सूचित किजिएगा। सनातन में तो शास्त्रार्थ की परंपरा रही है। हमारे यहाँ कुछ भी अंतिम सत्य नहीं है। और ये संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान की स्थापना ही इन्हीं व्याख्याओं और धर्म के सत्य और उसके विज्ञान के अनुसन्धान और संरक्षण के लिए हुआ है।”

मुनीश मिश्र ने यह भी कहा, “धर्म की लडाई सदैव सत्य तथा तथ्य के आधार पर जीती जाती है और हमारे पास ये दोंनों हैं इसलिए हमारी जीत सुनिश्चित है। देवतागण लाख विपत्ति आने पर भी अपने गुरू बृहस्पति का ही आश्रय लिया जबकि शुक्राचार्य बृहस्पति से ज्ञान के मामले मे कम नहीं थे पर देवताओं ने अपने परम्परानुसार गुरू का ही अनुसरण किया इसलिए वो सदा विजयी हुए। हमारी परम्परा विद्वानों का सम्मान करने की रही है जिस प्रकार से भगवान श्री राम ने रावण के विद्वता का सम्मान किया था पर केवल सम्मान किया ना कि किसी गुरुकुल में अध्यापन कराने के लिए आहूत किया क्योंकि वो राम और रावण के परम्परागत आचरण में भेद था। अतः फिरोज़ खान विद्वान हो सकते है और हम सम्मान भी करतें है किंतु परम्परागत आचरण में विभेद के कारण वो हमारे आचार्य नहीं बन सकतें।”

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रवि अग्रहरि
अपने बारे में का बताएँ गुरु, बस बनारसी हूँ, इसी में महादेव की कृपा है! बाकी राजनीति, कला, इतिहास, संस्कृति, फ़िल्म, मनोविज्ञान से लेकर ज्ञान-विज्ञान की किसी भी नामचीन परम्परा का विशेषज्ञ नहीं हूँ!

 

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