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होली स्पेशल में हिरण्यकश्यप, रावण और शिशुपाल की कथा: वैकुंठ लोक के द्वारपाल जय-विजय को क्यों 3 जन्म बनना पड़ा असुर? भगवान ने दिलाई मुक्ति

बहुत कम लोग जानते हैं कि हिरण्यकश्यप राक्षसी प्रवृत्ति का क्यों बना और उसके बाद के जन्मों में वो क्या बना। यह अनसुनी रोचक कथा वैकुंठ लोक से शुरू होती है।

होली का अवसर आ रहा है। होली आते ही हमें होलिका, प्रहलाद और प्रहलाद के पिता हिरण्यकश्यप का स्मरण आता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हिरण्यकश्यप राक्षसी प्रवृत्ति का क्यों बना और उसके बाद के जन्मों में वो क्या बना।

यह अनसुनी रोचक कथा वैकुंठ लोक से शुरू होती है, जो भगवान विष्णु का निवास स्थान है। एक दिन ब्रह्मा के मानस पुत्र सनकादिक ऋषि, भगवान विष्णु से मिलने बैकुंठ लोक गए। सनकादिक ऋषि हमेशा बाल-रूप में विचरण करते थे, उनको बालक समझकर द्वारपाल जय और विजय ने उन्हें बैकुंठ लोक में प्रवेश करने से रोक दिया। क्रोध में आकर ऋषि सनकदिक ने उन दोनों को असुर योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया।

दोनों भाइयों का यह शाप चलकर तीन जन्मों तक चला। पहले जन्म में वे हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष के रूप में दिति के पुत्र बने। हिरण्याक्ष को भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर मारा, और हिरण्यकश्यप का अंत भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार ने किया।

दूसरे जन्म में वे रावण और कुम्भकर्ण बने, और भगवान राम ने उनका वध किया।

तीसरे जन्म में द्वापर युग में, वो शिशुपाल और दन्तवक्त्र के रूप में जन्मे। इस बार भगवान कृष्ण ने उनका वध किया।

तीसरे जन्म में जब भगवान ने उनका वध किया, तो उसके पश्चात, जय और विजय, सनकादि ऋषियों के शाप से मुक्त होकर पुनः अपने मूल स्वरूप में वैकुंठ लौट गए।

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श्रीमद्भागवत पुराण में देवर्षि नारद कहते हैं कि ईश्वर से दूरी और घृणा भी उनकी लीला का हिस्सा होती है। अंततः हर आत्मा को उसी परम चेतना में विलीन होना होता है जहाँ से उसकी यात्रा शुरू हुई थी। यह कथा होली पर भक्ति के गहरे रहस्य को समझाती है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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