हाथी-मगरमच्छ की कहानी से समझें कश्मीरियत का दर्द सुनाने वालों ने लद्दाख जाना क्यों उचित नहीं समझा

विकट परिस्थितियों में फँसे लोगों को अक्सर “गजेन्द्र मोक्ष” पढ़ने की सलाह दी जाती है। मेरे विचार से धर्म को आम भारतीय लोगों की तरह राजनीति को दिशा-निर्देश करते रहना चाहिए।

सुदूर केरल अपने वनों के सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है और आम तौर पर पर्यटन विभाग भी इसे “गॉड्स ओन कंट्री” के तौर पर प्रचारित करते दिखते हैं। कुछ सौ साल पहले जब त्रावनकोर राजवंश शासन में था, तब यहाँ एक छोटा सा महल बनवाना शुरू किया गया था। समय बीतने के साथ-साथ (संभवतः 1728 से 1758 के बीच) केरल के कायमकुलम में स्थित ये कृष्णापुरम महल अपने पूरे स्वरूप में आया।

आजकल इस महल का इस्तेमाल संग्रहालय के तौर पर होता है। संग्रहालय की प्रसिद्धि यहाँ के “कायामकुलम वाळ” (दोधारी तलवार/खांडा) और इसी जिले में पाई गई एक बुद्ध की मूर्ति के यहाँ होने की वजह से भी है। इसकी असली प्रसिद्धि यहाँ मौजूद “गजेन्द्र मोक्ष” की मुरल पेंटिंग की वजह से है। ये अपने तरीके की सबसे बड़ी पेंटिंग है।

दक्षिण भारत के ही तमिलनाडु में “गजेन्द्र मोक्ष” से जुड़ा गजेन्द्र वर्धा पेरूमल मंदिर भी है। इस मंदिर के बारे में ऐसा माना जाता है कि एक बार हनुमान जी ने यहाँ भगवान विष्णु की उपासना की ताकि वो “गजेन्द्र मोक्ष” का दृश्य देख सकें। उनके यहाँ “गजेन्द्र मोक्ष” का दर्शन करने के कारण इस जगह को “कबीस्थलम” भी कहा जाता है। छठी से नौवीं शताब्दी के बीच के तमिल संतों ने “दिव्य प्रबंध” में इस मंदिर की काफी प्रशंसा की है। आजकल ये दूसरे कई मंदिरों की ही तरह, ‘सेक्युलर सरकार बहादुर’ के नियंत्रण में है, इसलिए इसकी अभी की दशा पर चर्चा जाने देते हैं। जुलाई-अगस्त के समय तमिल मास “आदि” चल रहा होता है और इसी समय इस मंदिर में कुछ विशेष अनुष्ठान भी होते हैं।

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अब वापस अगर इन स्थलों से जुड़ी कहानी, यानी “गजेन्द्र मोक्ष” पर चलें तो ये कई जन्मों की कहानी है। जैसा कि गजेन्द्र नाम से ही जाहिर है, कथा में एक हाथी है। अपने पूर्व जन्म में ये हाथी, इंद्रदयुम्न नाम के एक विष्णु भक्त राजा थे। एक बार जब इनके दरबार में अगस्त्य ऋषि आए तो ये उनके स्वागत में उठकर खड़े नहीं हुए। इस पर क्रुद्ध ऋषि ने उन्हें शाप दे डाला कि अगर इतने भारी हो गए हो कि उठ भी नहीं सकते तो अगले जन्म में तुम हाथी के रूप में ही पैदा हो और फिर समझो कि शरीर का बोझ कैसा होता है। कहानी के दूसरे मुख्य किरदार मगरमच्छ भी पिछले जन्म में हुहू नाम के एक गंधर्व राजा थे। एक बार ऋषि देवल के साथ स्नान करते समय उन्हें ठिठोली सूझी।

जैसे ही ऋषि देवल नदी में स्नान करते समय सूर्य को जल अर्पण करने लगे, हुहू पानी के अन्दर घुसकर उनका पैर कुछ ऐसे खींचने लगे जैसे कोई मगरमच्छ हो! इससे क्रुद्ध देवल ऋषि ने उन्हें मगरमच्छ हो जाने का शाप दिया। काफी अनुनय विनय के बाद जब देवल ऋषि माने तो उन्होंने कहा कि भगवान विष्णु आकर तुम्हें इस शाप से मुक्ति दिलाएंगे। शापों के मुताबिक, हाथी और मगरमच्छ अपना जीवन-यापन कर रहे होते हैं।

एक दिन जब हाथी पानी पीने आता है तो मगरमच्छ उसे दबोचकर पानी के अन्दर खींचने लगता है। हाथी अपने आप को छुड़ाने का खूब प्रयास करता है, मगर वो पानी में मगरमच्छ से जीत नहीं पाता। आख़िरकार वहीं के एक कमल के फूल को भगवान विष्णु को अर्पित करते हुए वो उनसे मदद मांगता है। इस वैष्णव कथा के मुताबिक भक्त की पुकार पर भगवान फ़ौरन दौड़े आते हैं और सुदर्शन चक्र चलाकर भक्त को बचाते हैं।

वैष्णव मान्यताओं में इस कहानी की प्रतीकों के रूप में मान्यता भी है। ऐसा माना जाता है कि हाथी यहाँ जीव का स्वरूप है, मगरमच्छ उसके पाप और माया हैं, जिस नदी के कीचड़ जैसे स्थान में हाथी मगरमच्छ के जबड़े में फँसा है, वो कीचड़ संसार है। विकट परिस्थितियों में फँसे लोगों को अक्सर “गजेन्द्र मोक्ष” पढ़ने की सलाह दी जाती है।

शुक्लांबरधरं विष्णुं शशि वर्णं चतुर्भुजं ।
प्रसन्न वदनं ध्यायेत सर्व विघ्नोपशान्तये ।।

बाकी हालिया राजनीति में रूचि रखने वालों के लिए शायद लद्दाख का कश्मीरियत के जबड़े से छूटना कुछ ऐसा ही दृश्य उपस्थित करता होगा। जामयांग सृंग नामग्याल द्वारा लद्दाखी जनता की ओर से दिया गया आभार भी मिलता-जुलता लगता है। आप ये मान सकते हैं कि भगवान हैं, तो “भक्तों” की पुकार भी सुनते होंगे। कश्मीरियत का दर्द सुनाने वालों ने लद्दाख जाना क्यों उचित नहीं समझा, ये भी एक बड़ा सवाल हो सकता है। मेरे विचार से धर्म को आम भारतीय लोगों की तरह राजनीति को दिशा-निर्देश करते रहना चाहिए।

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