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अयोध्या में श्री राम मंदिर के 161 फीट ऊँचे शिखर पर लहराया भगवा ध्वज: जानें इस धर्म ध्वज पर अंकित ‘ॐ, सूर्य देव और कोविदार वृक्ष’ का महत्व

गरुड़ पुराण में कहा गया है कि मंदिर के शिखर पर लहराता ध्वज देवता की उपस्थिति, महिमा और संरक्षण का संकेत देता है। जिस दिशा में ध्वज लहराता है, वह क्षेत्र पवित्र माना जाता है।

अयोध्या नगरी आज फिर इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखी गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर के 161 फीट ऊँचे शिखर पर केसरिया धर्म ध्वज फहराया। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सैकड़ों वर्षों की प्रतीक्षा के बाद आया क्षण है।

प्रभु राम के मंदिर के शिखर पर फहराया जाने वाला यह केसरिया ध्वज अपनी पवित्रता और विशिष्टता के लिए जाना जाता है। इसमें ॐ (ओम), सूर्य देव और कोविदार वृक्ष जैसे तीन महत्वपूर्ण प्रतीकों का चित्रण किया गया है। इन सभी प्रतीकों का सनातन धर्म में अलग-अलग आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व माना जाता है। चलिए, जानते हैं कि इन चिह्नों का क्या संदेश और अर्थ है।

फोटो साभार: मिंट

ओम के प्रतीक का अर्थ

राम मंदिर के ध्वज पर अंकित ॐ का चिह्न सनातन धर्म में अत्यधिक पवित्र माना जाता है। यह ऐसा स्वर है जिससे सम्पूर्ण सृष्टि के मूल कंपन की अनुभूति होती है। हिंदू धर्म में प्रत्येक पूजा और मंत्र की शुरुआत ओम से होती है, क्योंकि इसे दिव्यता और शुभता का स्रोत माना गया है।

(फोटो साभार: हिंदुस्तान)

ओम को ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों शक्तियों का संयुक्त रूप भी कहा गया है, जो संसार के सृजन, पालन और संहार का प्रतीक है। ओम की उपस्थिति वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाती है, इसलिए इसे ध्वज पर प्रमुखता से दर्शाया गया है।

सूर्य के चिन्ह का महत्व

ध्वज पर बनाया गया सूर्य का चिह्न भगवान श्रीराम की सूर्यवंशी परंपरा को दर्शाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, सूर्यदेव के वंशज वैवस्वत मनु से यही वंश आगे बढ़ा और इसमें श्रीराम अवतरित हुए। कथा यह भी कहती है कि राम के जन्म के समय सूर्य का रथ थम गया था, जिससे एक माह तक रात्रि नहीं हुई।

(फोटो साभार: BsyBee design)

भगवान राम सूर्यदेव के उपासक थे और रावण से युद्ध के समय भी उन्होंने सूर्यदेव की आराधना कर शक्ति प्राप्त की। इसी कारण ध्वज पर सूर्य प्रतीक श्रीराम के तेज, शक्ति और वंश गौरव का द्योतक है।

कोविदार वृक्ष की पौराणिक महत्ता

कोविदार वृक्ष अयोध्या की प्राचीन पहचान और पवित्रता का द्योतक है। कोविदार वृक्ष मंदार और पारिजात वृक्षों से मिलकर बना एक हाइब्रिड वृक्ष है, जिसे ऋषि कश्यप ने बनाया था। यह प्राचीन वनस्पति हाइब्रिड का भी प्रतीक माना जाता है।

कोविदार वृक्ष को आयुर्वेद में उपयोगी माना जाता है। कहा जाता है कि इसके फूल, पत्तियाँ और छाल कई रोगों में औषधि के रूप में प्रयुक्त होती हैं। माना जाता है कि यह वृक्ष देवताओं का प्रिय है और इसके आसपास सकारात्मक शक्ति बनी रहती है।

प्राचीन काल में अयोध्या के ध्वजों पर यही वृक्ष अंकित किया जाता था। रामायण में प्रसंग आता है कि जब भरत सेना सहित वन में भगवान राम को लौटने के लिए मनाने गए, तब सेना की ध्वनि सुनकर राम और लक्ष्मण सतर्क हुए।

फोटो साभार: ग्रोक

लक्ष्मण ने उत्तर दिशा से आती सेना के ध्वज पर कोविदार का चिन्ह देखकर ही पहचाना था कि यह अयोध्यावासियों की सेना है। तभी से कोविदार वृक्ष को अयोध्या की राज-परंपरा का प्रतीक माना गया है। इसी कारण इसे राम मंदिर के ध्वज पर स्थान मिला है।

ध्वज का स्वरूप और ध्वजारोहण का शुभ मुहूर्त

राम मंदिर पर फहराया गया ध्वज केसरिया रंग का है, जिसकी लंबाई 22 फीट और चौड़ाई 11 फीट रखी गई है। ध्वजदंड 42 फीट ऊँचा होगा और इसे मंदिर के 161 फीट ऊँचे शिखर पर स्थापित किया गया।

खास बात यह है कि केवल एक नहीं बल्कि परकोटे में स्थित छह अन्य मंदिरों पर भी इसी प्रकार के ध्वज फहरा गए। सभी ध्वज विशेष रूप से अहमदाबाद में तैयार कराए गए हैं। ध्वजारोहण अभिजीत मुहूर्त में किया गया। माना जाता है कि इसी मुहूर्त में भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। आज मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी भी है जिस दिन माता सीता और भगवान राम का विवाह हुआ था। इसे विवाह पंचमी भी कहा जाता है।

ध्वज: मंदिर में देव उपस्थिति और संरक्षण का प्रतीक

गरुड़ पुराण में कहा गया है कि मंदिर के शिखर पर लहराता ध्वज देवता की उपस्थिति, महिमा और संरक्षण का संकेत देता है। जिस दिशा में ध्वज लहराता है, वह क्षेत्र पवित्र माना जाता है। इसलिए यह पावन ध्वज अयोध्या में लहराकर दुनिया को बता रहा है कि यहाँ प्रभु श्रीराम की छत्रछाया और दिव्य आशीर्वाद सदा कायम रहेगा।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
ख़ुद को तराशने में मसरूफ़

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